समकालीन हिंदी कविता की उभरती हुई हस्ताक्षर सौम्या मिश्रा, डीडीयू गोरखपुर विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान (Political Science Honors) की छात्रा हैं। उनकी कविताओं में नारीवादी चेतना और सामाजिक यथार्थ का अनूठा संगम देखने को मिलता है। सौम्या अपनी लेखनी के माध्यम से न केवल अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक जड़ों से जुड़ती हैं, बल्कि समाज में व्याप्त अंधविश्वासों और रूढ़ियों को तार्किक चुनौती भी देती हैं। भू-राजनीति (Geo-politics) की समझ रखने वाली सौम्या के व्यक्तित्व में गायन और साहित्य का सुंदर समन्वय है। उनकी रचनाएँ स्त्री-पक्ष को एक सशक्त और नवीन स्वर प्रदान करती हैं।
पापा कहते हैं
हमारे समय में प्यार ऐसे ही बोला जाता था,
कठोर शब्द, ऊ ची आवाज़-यही परवाह थी।
मैं चाहती थी
थोड़ा ठहराव, थोड़ी नरमी,
एक वाक्य जो डाँ टे नहीं - बस गले लगा ले ।
वो झुकना नहीं चाहते,
कहते हैं - हम बदले तो हमारी पहचान टू ट जाएगी।
मैं समझाना नहीं चाहती,
क्योंकि हर बार समझाना,
मुझे ही छोटा कर देता है ।
हम दोनों के बीच
पीचि यों का नहीं,
अहं का फासला था।
फिर एक दिन समझ आया-
वो सख़्त नहीं हैं,
बस उन्होंने प्यार
कभी किसी और भाषा में सीखा ही नहीं ।
और मैं ने मान लिया - हर पिता को प्यार कहना नहीं आता, कुछ बस उसे बचाने की तरह निभाते हैं ।
आँगन से विदाई
बचपन से
वही थी घर की रौनक—
बाबूजी की हँसी,
माय की दुआ।
जो बोली, वही हुआ,
पर इतना सब होते हुए भी
उसे मालूम था—
हद लांघना लड़की के हिस्से में नहीं।
पढ़ी-लिखी,
सपने देखे,
पर गाँव-समाज कहता रहा—
शादी से पहले सब अधूरा है।
फिर हल्दी लगी,
हथेली पर मेहंदी रच गई,
गीत गूँजे—
“आज बिटिया पराई होई।”
घर हँस रहा था,
मन डूब रहा था।
जिस घर में
उसे कभी झाड़ू न उठानी पड़ी,
आज वहीं से
ज़िम्मेदारियों का पूरा गठ्ठर
बाँध दिया गया।
कन्यादान में
बाबूजी की आँखें झुक गईं।
बेटी दी—
फिर भी दहेज माँगा गया,
जैसे बेटी देना
कम पड़ गया हो।
ससुराल पहुँची तो
किताबें चुप करा दी गईं।
अब वह “समझदार बहू” थी—
जिसका काम है
सब निभाना,
और कुछ न कहना ।
टिप्पणी :- यह कविता बिहार के उन असंख्य घरों की कहानी कहती है, जहाँ बेटी को पूरे लाड़-प्यार से पाला जाता है, पढ़ाया जाता है, लेकिन उसकी पहचान को शादी के बाद धीरे-धीरे सीमित कर दिया जाता है। बिहारी विवाह में हल्दी, मेहंदी, गीत-संगीत और रस्में केवल उत्सव नहीं होतीं, वे एक लड़की के जीवन का सबसे बड़ा मोड़ भी होती हैं।
कविता उस मानसिक तैयारी की कमी पर सवाल उठाती है, जहाँ शारीरिक रूप से तो शादी की पूरी तैयारी होती है, पर लड़की के भीतर चल रहे डर, अनिश्चितता और बदलाव को समझने की कोशिश नहीं की जाती। कन्यादान और दहेज जैसे प्रसंग पिता के त्याग को और भी पीड़ादायक बना देते हैं—जहाँ बेटी देना भी पर्याप्त नहीं माना जाता।
यह रचना किसी एक स्त्री की नहीं, बल्कि उस सामाजिक संरचना की आलोचना है, जहाँ पढ़ी-लिखी बेटी ससुराल पहुँचते ही “कुछ नहीं जानती” घोषित कर दी जाती है। कविता पाठक से यह पूछती है—क्या शादी सचमुच स्त्री की पूर्णता है, या उसके संघर्ष का नया अध्याय?