चमक रहा उत्तुंग हिमालय, यह नगराज हमारा ही है।
जोड़ नहीं धरती पर जिसका, वह नगराज हमारा ही है।
नदी हमारी ही है गंगा, प्लावित करती मधुरस धारा,
बहती है क्या कहीं और भी, ऎसी पावन कल-कल धारा?
सम्मानित जो सकल विश्व में, महिमा जिनकी बहुत रही है
अमर ग्रन्थ वे सभी हमारे, उपनिषदों का देश यही है।
गाएँगे यश ह्म सब इसका, यह है स्वर्णिम देश हमारा,
आगे कौन जगत में हमसे, यह है भारत देश हमारा।
यह है भारत देश हमारा, महारथी कई हुए जहाँ पर,
यह है देश मही का स्वर्णिम, ऋषियों ने तप किए जहाँ पर,
यह है देश जहाँ नारद के, गूँजे मधुमय गान कभी थे,
यह है देश जहाँ पर बनते, सर्वोत्तम सामान सभी थे।
यह है देश हमारा भारत, पूर्ण ज्ञान का शुभ्र निकेतन,
यह है देश जहाँ पर बरसी, बुद्धदेव की करुणा चेतन,
है महान, अति भव्य पुरातन, गूँजेगा यह गान हमारा,
है क्या हम-सा कोई जग में, यह है भारत देश हमारा।
विघ्नों का दल चढ़ आए तो, उन्हें देख भयभीत न होंगे,
अब न रहेंगे दलित-दीन हम, कहीं किसी से हीन न होंगे,
क्षुद्र स्वार्थ की ख़ातिर हम तो, कभी न ओछे कर्म करेंगे,
पुण्यभूमि यह भारत माता, जग की हम तो भीख न लेंगे।
मिसरी-मधु-मेवा-फल सारे, देती हमको सदा यही है,
कदली, चावल, अन्न विविध अरु क्षीर सुधामय लुटा रही है,
आर्य-भूमि उत्कर्षमयी यह, गूँजेगा यह गान हमारा,
कौन करेगा समता इसकी, महिमामय यह देश हमारा।
ओ दुर्बल कन्धोंवाले, भारत !
जा जा जा, जा तू भाग !
ओ दबे हुए सीनेवाले, भारत !
जा जा जा, जा तू भाग !
ओ तेजहीन मुखवाले, भारत !
जा जा जा, जा तू भाग !
ओ निष्प्रभ आँखोंवाले, भारत !
जा जा जा, जा तू भाग !
ओ कातर, दीन-हीन वाणी वाले
जा जा जा, जा तू भाग !
ओ कान्तिहीन तनवाले भारत !
जा जा जा, जा तू भाग !
ओ भयभीत दिलवाले, भारत !
जा जा जा, जा तू भाग !
ओ ओछी-छूछी हरकतों वाले, भारत !
जा जा जा, जा तू भाग !
आ आ आ, आ तू आ !
कान्तियुक्त आँखों वाले भारत आ !
आ आ आ, आ तू आ !
दृढ़ संकल्पोंवाले भारत आ !
आ आ आ, आ तू आ !
मनमोहक वाणीवाले भारत आ !
आ आ आ, आ तू आ !
ताक़तवर कन्धोंवाले भारत आ !
आ आ आ, आ तू आ !
निर्मल मति-गति वाले भारत आ !
आ आ आ, आ तू आ !
ओछेपन को देख खौलनेवाले भारत आ !
आ आ आ, आ तू आ !
दीनों के दुख में रोनेवाले भारत आ !
आ आ आ, आ तू आ !
वृषभ शान से चलनेवाले भारत आ !
आ आ आ, आ तू आ !
फिर कहीं नहीं जा
यहीं रह जा !
(वह लोकगीत, जो शोषित ’पल्लु जाति के लोग गाते हैं।)
आज़ादी ले ली है हमने, इसकी ख़ुशी मनाएँ
आओ नाचें और पल्लु गाएँ ।
वे दिन अब दूर हुए जब ब्राह्मण मालिक कहलाता
जब गोरी चमड़ी वाला कोई बनता था हमारा आका
जब झुकना पड़ता था हमको उन नीचों के आगे
धोखे से गुलाम बनाकर हम पर जो गोली दागे
आओ नाचें और पल्लु गाएँ
आज़ादी ले ली है हमने, इसकी ख़ुशी मनाएँ
आओ नाचें और पल्लु गाएँ ।
आज़ादी ली है हमने, बात हमारे हक़ की
अब हम सभी बराबर हैं, यह बात हो गई पक्की
विजयघोष का शंख बजाकर चलो, विश्व को बतलाएँ
आज़ादी ले ली है हमने, इसकी ख़ुशी मनाएँ
आओ नाचें और पल्लु गाएँ
आज़ादी ले ली है हमने, इसकी ख़ुशी मनाएँ
आओ नाचें और पल्लु गाएँ ।
बहा पसीना तन का अपने, जो खेतों में मरता
उठा हथौड़ा, कर मज़दूरी, उद्योगों में खटता
उसकी जय-जयकार करेंगे, हम उस पर सब कुछ वारें
जो हराम की खाता है, उसको हम धिक्कारें
नहीं झुकेंगे, नहीं सहेंगे, शोषण को मार भगाएँ
आओ नाचें और पल्लु गाएँ
आज़ादी ले ली है हमने, इसकी ख़ुशी मनाएँ
आओ नाचें और पल्लु गाएँ ।
अब यह धरती हमारी ही है, हम ही इसके स्वामी
इस पर काम करेंगे हम सब, हम हैं इसके हामी
अब न दास बनेंगे हम, न दबना, न सहना
जल-थल-नभ का स्वामी है जो, उसके होकर रहना
केवल उसको मानेंगे हम, उसको ही अपनाएँ
आओ नाचें और पल्लु गाएँ
आज़ादी ले ली है हमने, इसकी ख़ुशी मनाएँ
आओ नाचें और पल्लु गाएँ ।
स्वतंत्रता स्वतंत्रता स्वतंत्रता
है स्वतंत्रता भंगी और चर्मकारों को।
है स्वतंत्रता आदिवासियों, बंजारों को॥
क्षमता के अनुकूल सभी उद्योग चलाएँ ।
उच्चज्ञान, शिक्षा पा जीवन सुखद बनाएँ ।
सबको मिली देश में आज स्वतंत्रता॥
स्वतंत्रता स्वतंत्रता स्वतंत्रता॥1॥
बृहद् जाति में नहीं अकिंचन, दास न कोई ।
अब भारत में नीच व्यक्ति का नाम न कोई॥
शिक्षित हों, समुचित धन धान्य सभा जन पाएँ ।
आपस में हिलमिल समता का समय बिताएँ ।
सबको मिली देश में आज स्वतंत्रता॥
स्वतंत्रता स्वतंत्रता स्वतंत्रता॥2॥
जिससे जन नर से नारी को नीचा जाने ।
हम अपनी वह अज्ञानता दूर कर डालें॥
तोड़ दासता को जीवन को सुखी बनाएँ ।
'नर नारी समान है' यह सद्भाव जगाएँ ।
सबको मिली देश में आज स्वतंत्रता॥
स्वतंत्रता स्वतंत्रता स्वतंत्रता॥3॥
मूल शीर्षक : 'विडुदलै'
(रूपांतरकार: नागेश्वर सुंदरम्, विश्वनाथ सिंह विश्वासी)
निर्भय, निर्भय, निर्भय !
चाहे पूरी दुनिया हमारे विरुद्ध हो जाए,
निर्भय, निर्भय,निर्भय !
चाहे हमें अपशब्द कहे कोई, चाहे हमें ठुकराए,
निर्भय, निर्भय,निर्भय !
चाहे हम से छीन ली जाएँ जीवन की सुविधाएँ
निर्भय, निर्भय,निर्भय !
चाहे हमें संगी-साथी ही विष देने लग जाएँ
निर्भय, निर्भय,निर्भय !
चाहे सर पर आसमान ही क्यों न फटने लग जाए
निर्भय, निर्भय,निर्भय !
महाकालि की, पराशक्ति की, वहाँ कृपा की दृष्टि हुई है।
देखो-देखो, रूस देश में एक महा युगक्रांति हुई है।
देख अंत अत्याचारी का, हैं प्रसन्न अत्यधिक देवगण ।
यह नवीनता देखे दुनियाँ, देख जिसे मरते पिशाचगण॥1॥
अन्यायी हिरण्य-सा क्रूर ज़ार ने अपना राज्य किया था,
उस शासन में सद्धर्मी सज्जन, अनाथ बन तड़प रहा था,
महामूढ़ था, मान लिया था धर्म तुच्छ, उसके शासन में-
मूल पाखंड भरे थे जैसे सर्प भरे होते हैं वन में॥2॥
श्रमी किसानों को न अन्न था, बस बीमारियों का स्वराज था ।
जो असत्य के आश्रय में थे, उनके घर ऐश्वर्य भरा था।
फाँसी थी आसान, सत्यवादी को बंदीगृह की पीड़ा ।
साइबेरिया के वन में थी मृत्यु बुलाती करती क्रीड़ा॥3॥
हाँ, बोले तो कारावास, मिले वनवास अगर क्यों पूछे।
तृप्त हुआ सद्धर्म, अधर्म धर्म था नीच ज़ार के नीचे ।
पिघला उर माँ का त्रिकाल में, सत्य संघ भक्तों की पालक-
कृपादृष्टि फेरी अपनी, यम ज़ार महापापी कुल-घातक॥4॥
गिरा ज़ार - शासन, जैसे हिमालय गिरे धरा पर ।
धर्मविनाशक असत् वचन से एक-एक कर मिटे समय पर ।
झंझा के झोंकों में जैसे वृक्ष टूट ईंधन बन जाते ।
दुनियाँ ने देखा वैसे, अधर्मियों को विनष्ट हो जाते॥5॥
देखो यह जनतंत्र, एक-सा न्याय सभी को मिला है।
जन शासन है, पनप न सकती दासवृत्ति, उद्घोष हुआ है।
गिरा हुआ कलिकाल, गिरी दीवार, यहाँ ज्यों ठोकर खाकर ।
खड़ा हो रहा है कृतयुग देखो उसकी टूटी काया पर॥6॥
मूल शीर्षक : 'पुदिय रुशिया'
(रूपांतरकार: नागेश्वर सुंदरम्, विश्वनाथ सिंह विश्वासी)
आओ गाएँ 'वन्देमातरम'।
भारत माँ की वन्दना करें हम ।
ऊँच-नीच का भेद कोई हम नहीं मानते,
जाति-धर्म को भी हम नहीं जानते ।
ब्राह्मण हो या कोई और, पर मनुष्य महान है
इस धरती के पुत्र को हम पहचानते ।
आओ गाएँ 'वन्देमातरम'।
भारत माँ की वन्दना करें हम ।
वे छोटी जाति वाले क्यों हैं क्यों तुम उन्हें कहते अछूत
इसी देश के वासी हैं वे, यही वतन, यहीं उनका वज़ूद
चीनियों की तरह वे, क्या लगते हैं तुम्हें विदेशी ?
क्या हैं वे पराए हमसे, नहीं हमारे भाई स्वदेशी ?
आओ गाएँ 'वन्देमातरम'।
भारत माँ की वन्दना करें हम ।
भारत में है जात-पाँत और हज़ारों जातियाँ
पर विदेशी हमलावरों के विरुद्ध, हम करते हैं क्रांतियाँ
हम सब भाई-भाई हैं, हो कितनी भी खींचतान
रक्त हमारा एक है, हम एक माँ की हैं संतान
आओ गाएँ 'वन्देमातरम'।
भारत माँ की वन्दना करें हम ।
हम से है ताक़त हमारी, विभिन्नता में एकता
शत्रु भय खाता है हमसे, एकजुटता हमारी देखता
सच यही है, जान लो, यही है वह अनमोल ज्ञान
दुनिया में बनाएगा जो, हमें महान में भी महान
आओ गाएँ 'वन्देमातरम'।
भारत माँ की वन्दना करें हम ।
हम रहेंगे साथ-साथ, तीस कोटि साथ-साथ
डाल हाथों में हाथ, तीस कोटि हाथ साथ
हम गिरेंगे साथ-साथ, हम मरेंगे साथ-साथ
हम उठेंगे साथ-साथ, जीवित रहेंगे साथ-साथ
आओ गाएँ 'वन्देमातरम'।
भारत माँ की वन्दना करें हम ।