द्यूत पाप है, इसमें कैसे शक्ति-परीक्षा होगी,
इसमें क्या यश, शौर्य, शूरता और वीरता होगी ॥ 1॥
आमंत्रण के पीछे मन में कुटिल चाल है तेरी ।
फूटी आँखों नहीं सुहाती, तुम्हें भलाई मेरी ॥ 2 ॥
अट्टहास कर उठा शकुनि बोला यह क्या करते हो ।
होकर विश्वविजेता, द्यूत नाम से यों डरते हो ॥ 1 ॥
वृहद राज्य के अधिपति वीर व्यक्ति हो, यही सुना था ।
क्षत्रिय हो यह समझ अक्ष- आमंत्रण तुम्हें दिया था ॥ 2॥
महाकृपण हो, व्यय से डरते हो यह मान गया मैं।
मक्खीचूस बना भारत अधिपति है जान गया मैं ॥3 ॥
जुआ खेलना पाप नहीं है, है क्षत्रिय कुल धर्म ।
वीर नृपति क्यों डरते यह भी है सेवा का कर्म ॥ 4 ॥
इतने जहाँ सभासद हैं, बैठे क्षत्रियगण ऐसे ।
वहाँ तुम्हारी जायदाद सब हम हड़पेंगे कैसे ॥ 5 ॥
कब से अक्ष पड़ा है, द्यूत फलक तो देखो यह तुम ।
जीत तुम्हारी होगी, धर्मराज निश्चित खेलो तुम ॥ 6 ॥
बध करें जो चर्महित गोवत्स का, उस बधिक के सदृश बनकर निर्दयी ।
धर्मराज न रोक पाए स्वयं को, व्यथित मन उद्विग्न हो कहने लगे ॥ 1 ॥
असित देवता प्रभृत मुनिवर कह चुके, अक्ष क्षत्रिय हेतु जहर विशेष है।
युद्ध कर सब जीतना है धर्म उसका, जूआ निश्चित कपटपूर्ण अधर्म है॥2॥
मानते हैं मरण श्रेष्ठ अधर्म से, सदा से यह आर्यों की रीति है।
सुजन धर्मी लोग जुआ न खेलते, अधर्मी जन के लिए वह प्रीति है ॥3 ॥
इसलिए इस खेल में मुझको हिचक है, और कोई भय न मन में है अरे !
राज्य भी करता नहीं हूँ मैं सुनो, किसी धन की या विभव की आस में॥4॥
धर्म और सुभिक्ष के हित ही सदा, या कलाओं के अनंत विकास हित ।
राज्य करता हूँ शकुनि रे ! मैं यहाँ, सहज से इस सत्य को तुम जान लो॥ 5 ॥
नाश ही वह करेगा इस देश का, जो कपट से हड़प लेगा राज्य मम ।
वह न कुछ मेरा बिगाड़ेगा कभी, यह सहज-सी बात है तुम समझ लो ॥6॥
कलाकौशल का गला घुट जाएगा, निमंत्रण मिल जाएगा कलिकाल को ।
धर्म का स्वयमेव सत्यानाश होगा, और होगा बीज वपन अधर्म का ॥ 7 ॥
सर्वनाश दिखाएगा ऐसा पुरुष देश भारत में मेरे प्रिय देश में।
समझ लो वह सत्य को धकिया रहा, निमंत्रित कर रहा सहज असत्य को ॥ 8 ॥
इसलिए रे शकुनि ! तुमसे बार-बार, कर रहा हूँ प्रार्थना यह सुनो तुम ।
छोड़ दो यह द्यूतक्रीड़ा अभी से, एक छोटी बात मेरी मान लो ॥9॥
उत्तेजित हो उठा शकुनि धर्मज की बातें सुनकर ।
बोला, अपने शास्त्रज्ञान की डींग हाँकते क्योंकर ॥ 1 ॥
आत्म-प्रशंसा अपने आप किए जाते हो क्यों तुम,
छोटी-सी यह बात शास्त्र की नहीं जानते हो तुम ॥2॥
तुमको विपुल ज्ञान है शास्त्रों का यह खुद कहते हो ।
हो करके शास्त्रज्ञ निमंत्रण अस्वीकृत करते हो ॥3॥
सुनते जब ललकार वीर क्षत्रिय आगे बढ़ते हैं।
या तुम सदृश आके रण पर पग पीछे धरते हैं ॥ 4 ॥
असि - कौशल में निपुण जीतता, अन्य हार जाता है।
जैसे विजयी होता तार्किक, अन्य मात खाता है ॥5॥
वैसे ही निपुणता जूए में जो भी दिखलाएगा।
विजयी होगा और दूसरा स्वयं हार जाएगा ॥6॥
इसमें क्या षड्यंत्र, योग्य यदि जीता दूजा हारा,
तुमको क्षत्रिय समझ सामने सबने है ललकारा॥ 7 ॥
आमंत्रण स्वीकार अगर तो हाँ बोलो, आ जाओ ।
धैर्य न जुटा सको, डरते हो, तो वह भी बतलाओ ॥ 8 ॥
धर्मज ने कुखेल को सच्चा धर्म विचार लिया तब ।
कुजन रीति को फर्ज मानकर खुद को फँसा लिया तब ॥1॥
कितने सज्जन पुरुष इस तरह पीड़ा पाते हैं।
परंपरा के कीच-कुंड में खुद ही गिर जाते हैं ॥2॥
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विधना है बलवान नहीं तो धर्मराज-सा ज्ञाता ।
कुटिल शकुनि की बातों में बरबस ही क्यों आ जाता॥14॥
होनी के आगे मानव की बुद्धि सदा सोती है।
विधना से बलवान दूसरी शक्ति कहाँ होती है ॥15॥
कभी कर्म कोई करता है, मरता कोई जैसे ।
गिरा शकुनि के नीचकर्म का फल धर्मज पर वैसे ॥16॥
“पराशक्ति शंकरी, पार्वती देवी को साक्षी रख करके,
मैं लेती हूँ आज शपथ यह-
मैं रखूँगी खुले केश ये तब तक, जब तक-
रक्त नीच इस दुःशासन का
और अधम इस दुर्योधन का
होता नहीं सुलभ है मुझको ।
मिश्रित करके रक्त दुष्ट दोनों कुरुओं का
जब चुपडूंगी अपने सिर पर -
तभी केश बाँधूंगी अपने
यह ध्रुव सच है ॥1॥
“सुन लें सभी सभासद पापी दुःशासन के
जिन अपवित्र हाथों ने छुए केश ये,
खुले रहेंगे तब तक, जब तक-
दोनों पापी कुरुवंशी हैं, जीवित जग में,
और नहीं मर जाते मेरे पति के हाथों ।"
सभा स्तब्ध हो सुनती रही प्रतिज्ञा उसकी,
और द्रुपदतनया इतना कह मौन हो गई ॥2॥
देवगणों ने किया उच्चरित “ॐ"
"ॐ" ध्वनि धरती से आकाश तलक थी व्याप्त हो गई,
“ॐ ॐ" कह उठा सतत संसार समूचा,
ॐ, ॐ के भीषण रव से पृथ्वी काँप उठी थी ।
"धर्मराज है स्वामी सबका"
लगा शब्द ये दुहराने साक्षात पवन भी ।
यहाँ समापन करता हूँ मैं-
द्रुपदसुता की शपथकथा का,
और शुभाशंशा करता हूँ
परमेश्वर सबका कल्याण करें जगती में ॥3॥
(इति)
(रूपांतरकार: नागेश्वर सुंदरम्,
विश्वनाथ सिंह विश्वासी)
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