आतिशी कुमारी हिंदी साहित्य की एक उभरती हुई सशक्त आवाज़ हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय से शिक्षित और वर्तमान में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहीं आतिशी कुमारी पिछले पाँच वर्षों से अनवरत सृजनरत हैं। उनकी लेखनी गीत और साहित्यिक कविताओं से लेकर कहानी और मुक्त छंद तक विस्तृत है। उनकी रचनाओं की मुख्य विशेषता भावों की स्वतंत्रता और शब्दों की शुचिता है, जहाँ वे वैचारिक गहराई के साथ मानवीय संवेदनाओं को शब्द देती हैं।
सम्प्रति : एम ए हिंदी (दिल्ली विश्वविद्यालय)
पुरुष भी सुंदर है
पुरुष भी सुंदर हैं
सुंदरता के सभी वर्णन,
क्यों सिर्फ़ स्त्रियों के लिए लिखे जाते हैं?
पुरुष भी तो सुंदर हैं -
उनकी थकी हुई पलकों के नीचे छिपी गहराइयों में,
नींद से भरी आवाज़ की गर्माहट में,
और उन मुस्कानों में जो बस आधी खिलती हैं।
वे सुंदर हैं,
जब शब्द कम पड़ जाते हैं,
पर आँखें सब कुछ कह जाती हैं।
जब वे अपनेपन की तरह कंधा देते हैं,
और खामोशी में भी एक सुकून बाँट जाते हैं।
पुरुष सुंदर हैं,
उनके सलीके में नहीं, सच्चाई में -
जब वे रोने से नहीं डरते,
जब किसी के लिए खुद को तोड़ते हैं।
उनकी मजबूत भुजाओं में सुरक्षा है,
लंबी पलकों में कोमलता,
गहरी आँखों में संसार का सबसे सच्चा प्रेम है।
वे सुंदर हैं,
जब अपने सपनों को थामे चलते हैं,
थकते नहीं, पर थमकर किसी की बात सुन लेते हैं।
जब वे हँसते हैं,
तो आसमान तक उजाला पहुँच जाता है।
पुरुष भी सुंदर हैं -
अपने संघर्षों में, अपने मौन में,
अपने असमंजस और अपनत्व के उस जादू में,
जहाँ वे बस “होने” से ही
सब कुछ बदल देते हैं।
2. तुम कहती हो —
प्रेम भाव है, अनुभूति है,
पर मैं कहता हूँ —
यह भी एक गणित है,
जहाँ दो आत्माएँ जुड़ती हैं
और एक हो जाती हैं।
तुम कविता में बहती हो
मैं समीकरण में टिकता हूँ,
तुम रूपक में ढलती हो
मैं तर्क में दिखता हूँ।
फिर भी —
जब तुम्हारी मुस्कान
मेरे "स्थिरांक" को हिला देती है,
तो मुझे लगता है
संन्यासी भी कभी प्रेमी था,
और गणित भी कभी कवि हुआ था।
तुम्हारी आँखों में जो प्रकाश है
वह किसी “प्रमाण” से बड़ा है,
तुम्हारा मौन
मेरी हर "समीकरण" को हल कर जाता है।
अब समझा हूँ —
प्रेम और गणित में फ़र्क बस इतना है,
गणित में सिद्ध करना पड़ता है,
प्रेम में मान लेना पड़ता है।
3. प्रेम (योजक × सन्धि)
योजक बोला—
"मैं ही रिश्तों का पुल हूँ,
दूरी मिटाता हूँ,
दिलों को जोड़ता हूँ…
मेरे बिना कोई मिलन पूरा नहीं होता।"
सन्धि मुस्कुराई,
"पुल?
तू तो बस बीच में खड़ा
एक लंबा-सा डैश है,
जो दो दिलों को
पास आने ही नहीं देता।
असली संगम तो मैं करवाती हूँ,
जहाँ दो शब्द मिलकर
एक धड़कन बन जाते हैं।"
योजक तुनककर बोला,
"तो मैं बेकार हूँ क्या?"
सन्धि ने उसकी आँखों में देख
धीरे से कहा—
"नहीं…
जब भाव बहुत गहरे हों,
जब दिल में भीड़ हो,
तो तू ही जगह बनाता है।"
दोनों चुप हुए।
योजक थोड़ा झुका,
सन्धि थोड़ी पास आई।
कुछ धड़कनें टकराईं…
फिर सन्धि बोली
"सुन, शब्द हों या रिश्ते
मिलन तभी खूबसूरत होता है,
जब मैं उन्हें पास लाऊँ
और तू
उन्हें एक नाम दे।"
योजक ने उसके हाथ छूकर कहा
"तो फिर…
चल, आज
हम खुद की सन्धि कर लें
तू और मैं,
दो शब्द नहीं…
एक कविता बन जाएँ।”
4. उपमान और प्रतीक — एक प्रेमकथा
एक दिन झुँझलाकर बोला मेरा मित्र -
ये उपमान और प्रतीक,
दोनों अजीब हैं यार!
दोनों प्रेम करते हैं,
पर किसी एक के नहीं होते!”
मैं मुस्कुराया और बोला -
सुन, बात समझ.
उपमान वैसा है
जैसे एक प्रेमी जिसने वचन निभाया है,
जिसके जीवन में बस एक ही ध्रुवतारा है -
उसका उपमेय!
वही उसका लक्ष्य, वही संसार।
पर प्रतीक!
वह प्रेम का आवारा बादल है,
किसी एक आकाश से बंधता नहीं,
हर दिल में बरसता है,
हर आँख में चमकता है।
वह मुक्त है -
पर उसी में बंधन की गंध है।
वह सबका अपना है,
पर किसी का पूरी तरह नहीं।
प्रतीक प्रेम का वो रसिक कृष्ण है,
जो हज़ारों गोपियों संग रास रचाता है,
हर किसी को पूर्णता का सुख देता है,
फिर भी खुद को अधूरा बचा लेता है।
जबकि उपमान -
एक का होकर, एक में ही मिट जाता है,
बंधन को प्रेम समझकर
स्वयं को समर्पित कर देता है।
वह ‘जानू’ से ‘अभियुक्त’ बन जाता है,
पर प्रेम के अपराध में
मुक्त नहीं, समर्पित रहता है।
तो मित्र!
यही तो फर्क है दोनों में -
प्रतीक प्रेम को हवा की तरह जीता है,
और उपमान -
प्रेम को श्वास की तरह।
5. पांच साल के बाद
उसने कहा —
"आ जाना...
अगर कभी लगे,
मिलना बाकी है अभी भी।"
शायद बाँहें न खोल पाऊँ,
पर चाय का प्याला रखूँगा दो —
एक तेरे लिए,
एक अपनी ख़ामोशी के लिए।
बस बैठेंगे साथ,
बिना किसी सवाल के —
तुम बोलना,
मैं सुनूँगा…
जैसे वक़्त ठहर गया हो।
6. कुछ यूं ही
उसको देखकर,
मेरे होठों पर हँसी अच्छी लगती है,
उसकी आँखें जब झाँकती हैं मेरी आँखों में,
तो अपनी ही परछाई अच्छी लगती है।
अक्सर जब लगाती हूँ माथे पर बिंदी,
न जाने क्यों,
थोड़ी-सी टेढ़ी भी अच्छी लगती है।
अब चुपके-चुपके देखने वाली ये आँखें,
उसी के इंतज़ार में
कुछ ज़्यादा ही अच्छी लगती हैं।
उसके हाथों को छू लेती मेरी हथेली,
अब हर स्पर्श में वही एहसास,
वो छुहन भी अच्छी लगती है।
हाँ—
आजकल ये दुनिया भी मुझको
थोड़ी-सी नई, थोड़ी-सी प्यारी,
और हर चीज़ में वही झलक लिए हुए—
अच्छी लगती है।