साहित्य मानव चेतना, संवेदना और सामाजिक परिस्थितियों का लिखित दस्तावेज है। हिंदी साहित्य का इतिहास केवल काल-विभाजन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अभिव्यक्ति के उन विविध रूपों (Forms) की विकास यात्रा भी है, जिन्हें हम 'विधाएँ' (Genres) कहते हैं। स्नातक स्तर के विद्यार्थियों के लिए साहित्य के इन रूपों—गद्य और पद्य—के तात्विक और संरचनात्मक भेद को समझना अत्यंत आवश्यक है। साहित्य को मुख्य रूप से दो कोटियों में विभाजित किया गया है: श्रव्य काव्य (जिसे पढ़ा या सुना जाए, जैसे उपन्यास, कहानी, कविता) और दृश्य काव्य (जिसे देखा जाए, जैसे नाटक)। आधुनिक युग में तकनीक के आगमन ने दृश्य-श्रव्य काव्य के नए आयाम (रेडियो, सिनेमा, दूरदर्शन) भी प्रस्तुत किए हैं।
प्रस्तुत विस्तृत शोध प्रतिवेदन का उद्देश्य हिंदी गद्य की प्रमुख विधाओं (उपन्यास, कहानी, निबंध, संस्मरण) और दृश्य-श्रव्य माध्यमों (नाटक, एकांकी, गीतिकाव्य) का गहन, तार्किक और विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत करना है। यह सामग्री परिभाषाओं के रटे-रटाए ढांचों से आगे बढ़कर विधाओं के आंतरिक स्वरूप, उनकी उत्पत्ति के ऐतिहासिक कारणों और माध्यम (Medium) बदलने पर उनमें आने वाले तकनीकी परिवर्तनों का सूक्ष्म विश्लेषण करती है।
आधुनिक काल को आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने 'गद्य काल' की संज्ञा दी है, क्योंकि इसी युग में विचारों की स्पष्ट और तार्किक अभिव्यक्ति के लिए गद्य का विकास हुआ। पद्य जहाँ भाव-प्रधान होता है, वहीं गद्य विचार-प्रधान और विश्लेषणात्मक होता है।
उपन्यास आधुनिक युग की सबसे समर्थ और लोकप्रिय विधा है। इसे 'गद्य का महाकाव्य' भी कहा जाता है क्योंकि जिस प्रकार प्राचीन काल में महाकाव्य संपूर्ण युग और जीवन को समेटते थे, वही कार्य आज उपन्यास कर रहा है।
क) परिभाषा और व्युत्पत्ति
'उपन्यास' शब्द संस्कृत के 'उप' (समीप) और 'न्यास' (धरोहर) शब्दों के योग से बना है। इसका शाब्दिक अर्थ है—'वह वस्तु जो सामाजिक जीवन के समीप धरोहर के रूप में रखी गई हो'। अर्थात्, उपन्यास वह रचना है जिसमें पाठक को अपना ही जीवन प्रतिबिंबित होता दिखे। मुंशी प्रेमचंद, जिन्हें 'उपन्यास सम्राट' कहा जाता है, ने इसकी परिभाषा देते हुए कहा है: "मैं उपन्यास को मानव चरित्र का चित्र मात्र समझता हूँ। मानव चरित्र पर प्रकाश डालना और उसके रहस्यों को खोलना ही उपन्यास का मूल तत्व है" । पाश्चात्य साहित्य में इसे 'Novel' (नॉवेल) कहा गया, जिसका अर्थ है 'नया'। इसका तात्पर्य यह है कि उपन्यास हमेशा अपने युग की नई संवेदनाओं और नए यथार्थ को प्रस्तुत करता है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार, उपन्यासकार का कार्य केवल यथार्थ (Realistic) चित्रण करना नहीं है, बल्कि 'वास्तविक' (Real) लगना है। वह कहते हैं कि एक चित्रकार द्वारा बनाया गया सिंह का चित्र यथार्थवादी हो सकता है, लेकिन उसमें 'सिंहत्व' का होना आवश्यक है। इसी प्रकार उपन्यास में जीवन का 'छंद' (Rhythm of Life) होना अनिवार्य है ।
ख) उपन्यास का स्वरूप (Nature of Novel)
उपन्यास का स्वरूप अत्यंत व्यापक है। कहानी जहाँ जीवन की एक झलक मात्र है, वहीं उपन्यास जीवन का एक विशाल और विस्तृत चित्रफलक (Canvas) है।
समग्रता (Totality): उपन्यास में नायक के जीवन की किसी एक घटना का नहीं, बल्कि उसके संपूर्ण व्यक्तित्व और परिवेश का चित्रण होता है। इसमें मुख्य कथा के साथ-साथ अनेक प्रासंगिक कथाएँ (Sub-plots) भी चलती हैं जो मूल कथा को पुष्टि प्रदान करती हैं ।
युगीन दस्तावेज: एक श्रेष्ठ उपन्यास अपने समय के इतिहास, राजनीति, समाज और अर्थव्यवस्था का दस्तावेज होता है। जैसे प्रेमचंद का 'गोदान' केवल एक किसान की कहानी नहीं, बल्कि तत्कालीन भारतीय कृषि समाज की त्रासदी का जीवंत दस्तावेज है।
यथार्थ और कल्पना का समन्वय: उपन्यास इतिहास नहीं है, इसलिए इसमें तथ्यों के साथ-साथ कल्पना का भी प्रयोग होता है। लेखक 'संभाव्य सत्य' (Probable Truth) की रचना करता है—यानी जो घटा नहीं है, पर घट सकता है ।
बहुआयामी चरित्र: उपन्यास के पात्र स्थिर (Static) नहीं होते, बल्कि परिस्थितियों के साथ विकसित (Dynamic) होते हैं। उपन्यास के अंत तक पात्रों के चरित्र में मनोवैज्ञानिक परिवर्तन स्पष्ट दिखाई देते हैं।
ग) उपन्यास के तत्व (Elements)
उपन्यास की संरचना छह प्रमुख तत्वों पर आधारित होती है, जिनका विस्तृत विवेचन निम्नानुसार है:
कथावस्तु (Plot): यह उपन्यास का ढांचा है। इसमें घटनाओं का एक तर्कसंगत क्रम होता है। कथावस्तु में 'कार्य-कारण संबंध' (Cause and Effect) होना अनिवार्य है। कथावस्तु के तीन चरण होते हैं—प्रारंभ, संघर्ष (Conflict) और चरमोत्कर्ष (Climax)।
पात्र एवं चरित्र-चित्रण (Characterization): उपन्यास की सफलता उसके पात्रों की जीवंतता पर निर्भर करती है। पात्र दो प्रकार के होते हैं—वर्गीकृत (Type) और व्यक्तिगत (Individual)। प्रेमचंद के पात्र अक्सर पूरे वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं (जैसे होरी किसान वर्ग का), जबकि मनोवैज्ञानिक उपन्यासों (जैसे 'शेखर: एक जीवनी') में पात्रों की व्यक्तिगत कुंठाओं का विश्लेषण होता है ।
कथोपकथन या संवाद (Dialogue): संवाद कहानी को गति देते हैं और पात्रों के चरित्र को उद्घाटित करते हैं। उपन्यास के संवाद नाटकों की तरह बहुत नाटकीय नहीं होते, बल्कि वे विश्लेषणात्मक और विवरणात्मक अधिक हो सकते हैं। संवादों को देशकाल और पात्र की सामाजिक स्थिति के अनुकूल होना चाहिए।
देशकाल और वातावरण (Setting/Atmosphere): उपन्यास में जिस समाज और कालखंड की कथा कही जा रही है, उसका सजीव चित्रण आवश्यक है। इसमें भौगोलिक स्थिति, रीति-रिवाज, वेशभूषा और सामाजिक मान्यताओं का वर्णन आता है। यह पाठकों को उस दुनिया में ले जाने (Transport) का कार्य करता है।
भाषा-शैली (Language & Style): भाषा पात्रों के अनुकूल होनी चाहिए। लेखक वर्णनात्मक, आत्मकथात्मक, पत्रात्मक या डायरी शैली का प्रयोग कर सकता है।
उद्देश्य (Purpose/Theme): हर उपन्यास का एक केंद्रीय विचार या दर्शन होता है। यह केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मानव जीवन की किसी समस्या का विश्लेषण या किसी आदर्श की स्थापना करना होता है ।
कहानी हिंदी गद्य की सर्वाधिक लोकप्रिय विधा है। प्राचीन काल की 'कथा' या 'आख्यायिका' से लेकर आधुनिक 'नई कहानी' तक की यात्रा में इसके स्वरूप में क्रांतिकारी परिवर्तन आए हैं।
क) परिभाषा
कहानी वह गद्य रचना है जिसमें जीवन के किसी एक अंग, एक मनोभाव या एक संवेदना को प्रदर्शित किया जाता है। मुंशी प्रेमचंद ने कहानी के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए लिखा है: "कहानी एक गमला है, जिसमें एक ही पौधे का माधुर्य अपने समुन्नत रूप में दृष्टिगोचर होता है" (जबकि उपन्यास एक विशाल वनस्थली है)। अमेरिकी कथाकार एडगर एलन पो (Edgar Allan Poe) के अनुसार: "कहानी वह छोटी गद्य रचना है जिसे एक ही बैठक में (15-20 मिनट से लेकर एक-दो घंटे में) पढ़ा जा सके और जो पाठक पर एक समन्वित प्रभाव (Single Effect) डालती हो" ।
ख) कहानी का स्वरूप: आधुनिक दृष्टि
आधुनिक कहानी प्राचीन किस्सागोई से भिन्न है। इसमें अब 'घटना' के स्थान पर 'संवेदना' और 'मनोविज्ञान' प्रमुख हो गए हैं।
संक्षिप्तता और एकसूत्रता: कहानी का सबसे बड़ा गुण उसकी संक्षिप्तता है। इसमें अनावश्यक विवरण, लंबी भूमिकाएँ या उपदेशों के लिए स्थान नहीं होता।
अन्विति (Unity of Impression): कहानी का लक्ष्य पाठक के मन पर 'एक गहरा प्रभाव' छोड़ना है। उपन्यास में पाठक का ध्यान कई स्थानों पर बंट सकता है, लेकिन कहानी में आरम्भ से अंत तक एक ही भावधारा बहती है ।
जीवन का खंड-चित्र: कहानी संपूर्ण जीवन का लेखा-जोखा नहीं है। यह जीवन की एक खिड़की है जिससे एक विशेष दृश्य दिखाई देता है।
अंत: कहानी का अंत प्रायः अप्रत्याशित और प्रभावपूर्ण होता है, जो पाठक को सोचने पर विवश कर देता है।
ग) कहानी के प्रकार (Types of Story)
विषय-वस्तु और शिल्प के आधार पर कहानी के कई भेद किए गए हैं :
घटना प्रधान: इनमें घटनाओं का कौतूहल मुख्य होता है (जैसे जासूसी या साहसिक कहानियाँ)।
चरित्र प्रधान: इसमें लेखक का उद्देश्य किसी पात्र के चरित्र की गहराइयों को उजागर करना होता है। चंद्रधर शर्मा गुलेरी की प्रसिद्ध कहानी 'उसने कहा था' इसका उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ लहना सिंह का त्याग और प्रेम मुख्य विषय है ।
वातावरण प्रधान: इसमें विशेष परिवेश (जैसे डरावना माहौल या युद्ध क्षेत्र) का निर्माण मुख्य होता है। जयशंकर प्रसाद की 'आकाशदीप' इसका उदाहरण है ।
ऐतिहासिक कहानी: इतिहास के पात्रों या घटनाओं पर आधारित, जैसे प्रेमचंद की 'शतरंज के खिलाड़ी' ।
सामाजिक कहानी: समाज की कुरीतियों, परिवार और संबंधों पर केंद्रित, जैसे प्रेमचंद की 'पूस की रात' या 'कफन' ।
घ) कहानी और उपन्यास में तात्विक अंतर (Comparison)
उपन्यास (Novel)
जीवन का समग्र और व्यापक चित्रण। अनेकों घटनाएँ और प्रासंगिक कथाएँ।
पात्रों की संख्या अधिक होती है। चरित्र का विकास क्रमिक और धीमा होता है।
गति धीमी और मंथर हो सकती है। लेखक को विश्लेषण का अवसर मिलता है।
पाठक पर समग्रता में प्रभाव डालता है, जिसे ग्रहण करने में समय लगता है।
लेखक अपने जीवन-दर्शन को विस्तार से समझा सकता है।
कहानी (Story)
जीवन के किसी एक खंड या मनोभाव का चित्रण। केवल एक मुख्य घटना।
पात्र अत्यंत सीमित होते हैं। चरित्र का उद्घाटन त्वरित और सांकेतिक होता है।
गति तीव्र होती है। यह सीधे लक्ष्य (चरमोत्कर्ष) की ओर दौड़ती है।
पाठक पर एक ही, तीखा और तुरंत प्रभाव डालती है।
जीवन-दर्शन संकेत रूप में आता है, उपदेशात्मकता से बचती है।
निबंध गद्य साहित्य की वह विधा है जो लेखक के पांडित्य और व्यक्तित्व दोनों की परीक्षा लेती है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल का कथन प्रसिद्ध है: "यदि गद्य कवियों या लेखकों की कसौटी है, तो निबंध गद्य की कसौटी है।"
क) परिभाषा और अर्थ
'निबंध' का व्युत्पत्ति-लभ्य अर्थ है—'नियमों में अच्छी तरह बंधी हुई रचना' (नि+बंध)। किन्तु आधुनिक हिंदी निबंध अंग्रेजी के 'Essay' का पर्याय है, जिसका मूल फ्रांसीसी अर्थ है—'प्रयास' (To attempt)। बाबू गुलाबराय के अनुसार: "निबंध उस गद्य रचना को कहते हैं जिसमें एक सीमित आकार के भीतर किसी विषय का वर्णन या प्रतिपादन एक विशेष निजीपन, स्वच्छंदता, सजीवता और संगति के साथ किया गया हो" । यहाँ 'निजीपन' (Subjectivity) सबसे महत्वपूर्ण शब्द है। निबंध केवल तथ्यों का संग्रह नहीं है, बल्कि उन तथ्यों पर लेखक की निजी प्रतिक्रिया है।
ख) निबंध का स्वरूप
वैयक्तिकता (Individuality): निबंध में विषय गौण होता है और लेखक का व्यक्तित्व प्रधान। हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार, "नए युग के निबंध व्यक्ति की स्वाधीन चिंता की उपज हैं।" लेखक अपने पाठकों से एक मित्र की तरह आत्मीयता से बात करता है ।
बुद्धि और हृदय का समन्वय: श्रेष्ठ निबंधों में वैचारिकता (बुद्धि तत्व) और भावात्मकता (हृदय तत्व) का संतुलन होता है। डॉ. गणपति चंद्र गुप्त के अनुसार, निबंध में विचारों का प्रतिपादन करते हुए भी 'भावोत्तेजन' की क्षमता होनी चाहिए ।
अपूर्णता: निबंध अपने आप में पूर्ण होते हुए भी अपूर्ण होता है, क्योंकि किसी भी विषय पर सब कुछ कह देना संभव नहीं है। यह केवल एक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।
स्वच्छंदता: निबंधकार पर नियमों का कठोर बंधन नहीं होता। वह अपनी मर्जी से विचारों की "टेढ़ी-मेढ़ी रेखाओं" (Discursive method) पर चल सकता है ।
ग) निबंध के तत्व एवं अंग
एक व्यवस्थित निबंध के तीन मुख्य अंग माने जाते हैं:
प्रस्तावना (Introduction): यह विषय का प्रवेश द्वार है। इसे संक्षिप्त, आकर्षक और मूल विषय को स्पष्ट करने वाला होना चाहिए।
विषय-विस्तार (Body): यह निबंध का शरीर है। इसमें लेखक तर्कों, उदाहरणों और विश्लेषण द्वारा अपने विचारों को पुष्ट करता है। इसमें एकसूत्रता (Coherence) होना आवश्यक है।
उपसंहार (Conclusion): यहाँ लेखक अपनी बात को समेटता है और निष्कर्ष प्रस्तुत करता है, जो पाठक के मन पर स्थायी छाप छोड़ता है ।
घ) निबंध के प्रकार (Types of Essay)
शैली और विषय के आधार पर निबंधों को चार प्रमुख वर्गों में विभाजित किया जाता है :
विचारात्मक (Reflective): इसमें बुद्धि तत्व और तर्क की प्रधानता होती है। दर्शन, मनोविज्ञान या गंभीर विषयों पर लिखे गए निबंध। उदाहरण: आचार्य रामचंद्र शुक्ल के 'चिंतामणि' के निबंध।
भावात्मक (Emotional): इसमें हृदय पक्ष प्रधान होता है। शैली कवित्वपूर्ण और अलंकृत होती है। लेखक तर्क के बजाय भावना के प्रवाह में बहता है ।
वर्णनात्मक (Descriptive): इसमें किसी स्थान, यात्रा, त्योहार या वस्तु का यथार्थ चित्रण होता है। इसमें लेखक 'तटस्थ दृष्टा' की तरह वर्णन करता है ।
ललित निबंध (Lalit Essay): यह आधुनिक युग की देन है। इसमें पांडित्य, लोक-संस्कृति और लेखक के उन्मुक्त व्यक्तित्व का संगम होता है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी (कुटज, अशोक के फूल) और विद्यानिवास मिश्र इसके प्रमुख हस्ताक्षर हैं ।
संस्मरण एक कथेतर (Non-fiction) गद्य विधा है जो इतिहास और साहित्य के बीच का सेतु है।
क) परिभाषा
'संस्मरण' का अर्थ है—'सम्यक स्मरण' (Deep Memory)। जब कोई लेखक अपनी स्मृति के आधार पर किसी व्यक्ति, घटना या दृश्य का आत्मीय और कलात्मक चित्रण करता है, तो उसे संस्मरण कहते हैं। यह 'आत्मकथा' से भिन्न है। आत्मकथा में लेखक अपने स्वयं के जीवन को केंद्र में रखता है, जबकि संस्मरण में वह 'अन्य' (किसी दूसरे व्यक्ति या घटना) को केंद्र में रखता है। लेखक इसमें एक दृष्टा या सहयात्री की भूमिका में होता है ।
ख) संस्मरण का स्वरूप
स्मृति का आधार: संस्मरण का कच्चा माल 'स्मृति' है। समय बीतने के बाद जो यादें शेष रह जाती हैं, वही संस्मरण बनती हैं।
यथार्थता (Reality): संस्मरण कल्पित नहीं हो सकता। इसके पात्र और घटनाएँ वास्तविक होनी चाहिए। "इसमें काल्पनिकता को स्थान प्राप्त नहीं है" ।
आत्मपरकता (Subjectivity): यद्यपि विषय 'दूसरा' होता है, लेकिन उसे देखने वाली दृष्टि लेखक की अपनी होती है। इसलिए इसमें वस्तुनिष्ठता के साथ-साथ लेखक की भावनाओं का रंग भी घुला होता है ।
विशिष्टता का अंकन: संस्मरण प्रायः किसी विशिष्ट व्यक्ति (महान साहित्यकार, नेता) या किसी सामान्य व्यक्ति के 'विशिष्ट गुणों' को रेखांकित करने के लिए लिखा जाता है ।
ग) संस्मरण के तत्व
स्मृति: विस्मृति के गर्त से स्मृतियों को निकालकर उन्हें पुनर्जीवित करना।
तटस्थता और आत्मीयता: लेखक को सत्य के प्रति तटस्थ रहना चाहिए (झूठी प्रशंसा नहीं), लेकिन वर्णन में आत्मीयता होनी चाहिए ।
चित्रण-शैली: भाषा ऐसी हो जो पाठक के सामने चित्र खड़ा कर दे।
घ) संस्मरण और रेखाचित्र में सूक्ष्म अंतर
अक्सर विद्यार्थी इन दोनों में भ्रमित हो जाते हैं।
रेखाचित्र (Sketch): यह चित्रकला के 'स्केच' जैसा है। इसमें लेखक शब्दों के माध्यम से किसी व्यक्ति का हूबहू चित्र खींचता है। रेखाचित्र में लेखक का 'तटस्थ' (Neutral) होना आवश्यक है। रेखाचित्र कल्पित पात्र का भी हो सकता है।
संस्मरण (Memoir): इसमें लेखक का उस व्यक्ति के साथ बिताए गए अतीत का 'निजी संबंध' और 'आत्मीयता' (Intimacy) अनिवार्य है। संस्मरण केवल वास्तविक व्यक्ति का ही हो सकता है ।
साहित्य को इन्द्रियों के माध्यम से ग्रहण करने के आधार पर दो भागों में बांटा गया है:
श्रव्य काव्य: जिसका आनंद पढ़कर या सुनकर लिया जाए (उपन्यास, कहानी, कविता)। इसमें पाठक को कल्पना करनी पड़ती है।
दृश्य काव्य: जिसका आनंद आँखों से देखकर और कानों से सुनकर लिया जाए (नाटक, सिनेमा)। इसमें प्रत्यक्ष दर्शन होता है ।
नाटक साहित्य की वह विधा है जो जन-रुचि के सर्वाधिक निकट है, क्योंकि यह एक 'सामूहिक कला' (Collective Art) है। यह केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि मंच पर अभिनीत होने के लिए लिखा जाता है।
क) परिभाषा और व्युत्पत्ति
'नाटक' शब्द की व्युत्पत्ति 'नट' धातु से मानी जाती है, जिसका अर्थ है 'अभिनय करना'। कुछ विद्वान इसे 'नृत्' (नाचना) से भी जोड़ते हैं, क्योंकि प्राचीन काल में नृत्य और नाटक मिले-जुले थे । संस्कृत काव्यशास्त्र में इसे 'रूपक' कहा गया है, क्योंकि इसमें नट (अभिनेता) अपने ऊपर पात्र (राम, दुष्यंत आदि) का 'रूप' आरोपित कर लेता है । भरतमुनि ने 'नाट्यशास्त्र' में कहा है: "त्रैलोक्यस्यास्य सर्वस्य नाट्यं भावानुकीर्तनम्" (तीनों लोकों के भावों का अनुकीर्तन ही नाटक है) ।
ख) नाटक की उत्पत्ति के सिद्धांत (Theories of Origin)
नाटक की उत्पत्ति के विषय में कई मत प्रचलित हैं :
दैवी उत्पत्ति (Divine Origin): नाट्यशास्त्र के अनुसार, जब त्रेतायुग में लोग ईर्ष्या-द्वेष से ग्रस्त हो गए, तो इंद्र की प्रार्थना पर ब्रह्मा ने चारों वेदों से तत्व लेकर 'नाट्यवेद' (पंचम वेद) की रचना की। उन्होंने ऋग्वेद से 'पाठ्य' (संवाद), सामवेद से 'गीत' (संगीत), यजुर्वेद से 'अभिनय' और अथर्ववेद से 'रस' ग्रहण किया ।
संवाद सूक्त सिद्धांत: पाश्चात्य विद्वान मैक्समूलर आदि वेदों के संवाद सूक्तों (जैसे यम-यमी संवाद, पुरुरवा-उर्वशी संवाद) में नाटक के बीज मानते हैं।
वीर पूजा सिद्धांत (Hero Worship): डॉ. रिजवे का मानना है कि मृत वीरों की स्मृति में जो श्रद्धापूर्ण अभिनय किए जाते थे, उनसे नाटक का जन्म हुआ ।
पुत्तलिका नृत्य (Puppet Dance): डॉ. पिशेल के अनुसार, कठपुतली नृत्य से नाटक का विकास हुआ है, इसीलिए नाटक के निर्देशक को 'सूत्रधार' (धागा पकड़ने वाला) कहा जाता है ।
ग) नाटक के तत्व (Elements of Drama)
भारतीय और पाश्चात्य समीक्षा के समन्वय से नाटक के निम्नलिखित तत्व माने गए हैं :
कथावस्तु (Plot): नाटक की कहानी। यह तीन प्रकार की हो सकती है—प्रख्यात (इतिहास/पुराण से), उत्पादित (काल्पनिक), या मिश्र।
नायक/पात्र (Characters): मुख्य पात्र को 'नेता' कहा जाता है जो विनीत, मधुर, त्यागी और दक्ष होना चाहिए।
रस (Sentiment): भारतीय मत में रस ही नाटक की आत्मा है। नाटक का उद्देश्य दर्शक को 'रसानुभूति' कराना है।
अभिनय (Acting): यह नाटक का विशिष्ट धर्म है। अभिनय चार प्रकार का होता है:
आंगिक: शरीर के अंगों से।
वाचिक: संवादों से।
आहार्य: वेशभूषा और मेकअप से।
सात्विक: भावों (आंसू, पसीना, कंपकंपी) से ।
वृत्ति और संवाद: नाटक के संवाद दृश्य और अभिनय के अनुकूल होने चाहिए।
तकनीकी क्रांति ने नाटक को रंगमंच की सीमाओं से निकालकर रेडियो और टेलीविजन तक पहुँचा दिया है। माध्यम बदलने से नाटक के स्वरूप में भी बदलाव आया है।
क) रंगमंच नाटक (Stage Drama)
यह नाटक का मूल रूप है।
जीवंतता: इसमें दर्शक और अभिनेता आमने-सामने (Live) होते हैं। अभिनेता की हर सांस और गति को दर्शक महसूस करता है।
त्रि-आयामी (3D): मंच पर सब कुछ वास्तविक आकार में होता है।
सीमाएँ: इसमें दृश्य-परिवर्तन (Scene Change) में समय लगता है। एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना कठिन होता है। 'रीटेक' (Retake) की सुविधा नहीं होती, एक गलती पूरा खेल बिगाड़ सकती है ।
ख) रेडियो नाटक (Radio Drama)
यह 'श्रव्य माध्यम' का नाटक है। इसे 'अंधों का रंगमंच' (Theatre of the Blind) कहा जाता है।
ध्वनि और संवाद: इसमें दृश्य नहीं होते। सब कुछ—पात्रों का रूप, स्थान, वातावरण—संवादों और ध्वनि प्रभावों (Sound Effects) के माध्यम से निर्मित किया जाता है। जैसे—घोड़े की टाप, हवा की साय-साय, या बादलों की गड़गड़ाहट ।
पात्र-संख्या: इसमें पात्रों की संख्या सीमित (5-6) रखनी पड़ती है, क्योंकि केवल आवाज सुनकर श्रोता बहुत से पात्रों को याद नहीं रख सकता ।
अवधि: इसकी अवधि 15 से 30 मिनट तक होती है, क्योंकि केवल सुनकर एकाग्रता बनाए रखना कठिन होता है ।
ग) दूरदर्शन नाटक (TV Drama / Teleplay)
यह दृश्य-श्रव्य माध्यम है, जो घर के भीतर देखा जाता है।
तकनीकी श्रेष्ठता: इसमें कैमरा, संपादन (Editing) और क्लोज-अप (Close-up) का प्रयोग होता है। रंगमंच पर हम अभिनेता के आंसू नहीं देख सकते, लेकिन टीवी पर क्लोज-अप के जरिए आँखों की नमी भी देखी जा सकती है ।
संपादन और काल: संपादन के जरिए समय को काटा जा सकता है। फ्लैशबैक (Flashback) तकनीक से पात्र के अतीत में जाना बहुत आसान है।
धारावाहिक: टीवी नाटकों को धारावाहिक (Serials) के रूप में विस्तार दिया जा सकता है, जो महीनों या सालों तक चल सकते हैं।
तुलनात्मक तालिका: रंगमंच, रेडियो और दूरदर्शन नाटक
रंगमंच (Theatre)
दृश्य-श्रव्य (प्रत्यक्ष)
मंच, अभिनेता, प्रकाश
प्रेक्षागृह (Auditorium)
ऊंचे स्वर और बड़े हाव-भाव (Loud)
कठिन और समय लेने वाला
रेडियो (Radio)
केवल श्रव्य (Auditory)
माइक्रोफोन, ध्वनि प्रभाव
कहीं भी (निजी)
सूक्ष्म स्वर-विस्तार (Voice Modulation)
अत्यंत सरल (ध्वनि संकेत से)
दूरदर्शन (TV)
दृश्य-श्रव्य (परोक्ष/स्क्रीन)
कैमरा, संपादन, स्क्रीन
घर का बैठक कक्ष (Drawing room)
अत्यंत स्वाभाविक और सूक्ष्म (Natural)
संपादन द्वारा क्षण भर में
एकांकी आधुनिक जीवन की व्यस्तता और समय के अभाव की उपज है। यह नाटक का संक्षिप्त रूप है, किंतु यह नाटक का 'अंश' नहीं, बल्कि अपने आप में पूर्ण विधा है।
क) परिभाषा
'एकांकी' का अर्थ है—'एक अंक वाला नाटक'। पाश्चात्य साहित्य में इसे 'One Act Play' कहा जाता है। डॉ. रामकुमार वर्मा के अनुसार: "एकांकी में एक ऐसी महत्वपूर्ण घटना रहती है जिसकी जिज्ञासा कौतूहलमय नाटकीय शैली में चरमोत्कर्ष पर पहुँचकर समाप्त होती है" ।
ख) एकांकी का स्वरूप
संकलन-त्रय (Unity of Time, Place, Action): एकांकी की सफलता के लिए 'संकलन-त्रय' अनिवार्य है। इसका अर्थ है—एक ही कार्य (Action), एक ही स्थान (Place) और एक निश्चित समय (Time) के भीतर घटना का घटना। इससे प्रभाव की एकता बनी रहती है ।
एक ही घटना: नाटक में जीवन का विस्तार होता है, एकांकी में केवल एक महत्वपूर्ण घटना या समस्या का चित्रण होता है।
पात्र और संवाद: पात्र बहुत कम (3-4) होते हैं। संवाद छोटे, चुटीले और कथा को सीधे लक्ष्य की ओर ले जाने वाले होते हैं ।
संघर्ष (Conflict): एकांकी में संघर्ष आरंभ से ही शुरू हो जाता है और बहुत तेजी से चरम सीमा (Climax) पर पहुँचता है ।
ग) नाटक और एकांकी में अंतर
नाटक (Full Length Play)
विस्तृत (3 से 5 या अधिक अंक)
आधिकारिक कथा के साथ प्रासंगिक कथाएँ (Sub-plots) भी होती हैं।
पात्रों के चरित्र का विकास धीरे-धीरे और विस्तार से होता है।
कई घंटों का मंचन। घटनाओं का काल वर्षों में फैला हो सकता है।
एकांकी (One-Act Play)
संक्षिप्त (केवल 1 अंक)
केवल एक ही मुख्य कथा होती है। कोई प्रासंगिक कथा नहीं।
चरित्र का विकास नहीं, बल्कि उसका उद्घाटन (Revelation) होता है।
20-40 मिनट का मंचन। घटनाएँ प्रायः कुछ घंटों की होती हैं।
गीतिकाव्य 'प्रबंध काव्य' (जैसे रामायण, महाभारत) से भिन्न 'मुक्तक काव्य' का एक रूप है, जिसमें भावना और संगीत की प्रधानता होती है।
क) परिभाषा और स्वरूप
'गीति' का अर्थ है 'गाया जाने वाला'। पाश्चात्य साहित्य में इसे 'लिरिक' (Lyric) कहा जाता है, जो 'लायर' (Lyre) नामक वाद्ययंत्र के साथ गाया जाता था। महादेवी वर्मा, जो आधुनिक हिंदी गीतिकाव्य (छायावाद) की प्रमुख स्तंभ हैं, कहती हैं: "सुख-दुख की भावावेशमयी अवस्था का विशेषकर गिने-चुने शब्दों में स्वर साधना के उपयुक्त चित्रण कर देना ही गीति है" । आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने मुक्तक (गीति) और प्रबंध काव्य में अंतर करते हुए कहा है: "यदि प्रबंध काव्य एक विस्तृत वनस्थली है, तो मुक्तक (गीति) एक चुना हुआ गुलदस्ता है" ।
ख) गीतिकाव्य के तत्व एवं विशेषताएं
वैयक्तिकता (Subjectivity/Individuality): यह गीतिकाव्य का सबसे प्रमुख तत्व है। प्रबंध काव्य में कवि दूसरों की कहानी कहता है (जैसे तुलसी राम की कहानी कहते हैं), लेकिन गीतिकाव्य में कवि 'अपनी' (निजी) अनुभूतियों, सुख-दुख और प्रेम को व्यक्त करता है। यह 'मैं' की कविता है ।
संगीतात्मकता (Musicality): गीतिकाव्य में नाद-सौंदर्य, लय और तुक का विशेष महत्व है। शब्दों का चयन उनकी मधुरता के आधार पर किया जाता है ताकि कविता स्वतः गाने योग्य हो जाए ।
भाव की एकता (Unity of Emotion): गीत में एक ही केंद्रीय भाव होता है। कवि एक क्षणिक आवेश को पकड़ता है और उसे पूर्णता के साथ व्यक्त करता है। इसमें विचारों का संघर्ष नहीं, बल्कि भावों का प्रवाह होता है ।
संक्षिप्तता: तीव्र भावनाएँ बहुत देर तक नहीं टिकतीं, इसलिए गीतिकाव्य का आकार छोटा होता है। विस्तार से इसकी तीव्रता (Intensity) नष्ट हो सकती है ।
ग) हिंदी में गीतिकाव्य का विकास
विद्यापति: हिंदी गीति परंपरा का आरंभ विद्यापति की 'पदावली' से माना जाता है।
भक्तिकाव्य: सूरदास, मीराबाई और कबीर के पद उत्कृष्ट गीतिकाव्य हैं। सूर के पदों में वात्सल्य और श्रृंगार की, तथा मीरा में विरह की मार्मिक अभिव्यक्ति है ।
छायावाद: आधुनिक काल में प्रसाद, निराला, पंत और महादेवी वर्मा ने गीतिकाव्य को सर्वोच्च शिखर पर पहुँचाया। महादेवी के गीतों में विरह और रहस्यवाद का अद्भुत संगम है ।
स्नातक स्तर के विद्यार्थियों के लिए यह समझना आवश्यक है कि साहित्य की ये विधाएँ—गद्य की (उपन्यास, कहानी, निबंध, संस्मरण) और दृश्य-श्रव्य (नाटक, एकांकी, गीतिकाव्य)—एक-दूसरे से स्वतंत्र होते हुए भी अंतर्संबंधित हैं। उपन्यास और कहानी जीवन के यथार्थ को कथा के माध्यम से रखते हैं, तो निबंध विचारों की कसौटी है। संस्मरण अतीत को वर्तमान में जीवित करता है। नाटक और एकांकी समाज को दृश्य रूप में दर्पण दिखाते हैं, और गीतिकाव्य मनुष्य की कोमलतम व्यक्तिगत भावनाओं को संगीत में ढालकर अमर कर देता है। माध्यम (रेडियो, टीवी) बदलने पर शिल्प बदलता है, पर मूल उद्देश्य—मानवीय संवेदना का विस्तार—वही रहता है।
अध्ययन स्रोत संकेत:
प्रेमचंद, आचार्य शुक्ल और हजारी प्रसाद द्विवेदी के विचार ।
नाट्यशास्त्र और नाटकों की उत्पत्ति के सिद्धांत ।
रेडियो और दूरदर्शन नाटक की तकनीकी विशेषताएं ।
गीतिकाव्य और प्रबंध काव्य का तुलनात्मक अध्ययन ।