लेखिका परिचय
नैन्शी सोनी 'नयना' समकालीन हिंदी साहित्य की एक प्रखर एवं संवेदनशील उभरती हुई हस्ताक्षर हैं। उनके लेखन में दार्शनिक गहराई और व्यक्तिगत ईमानदारी का एक अनूठा संगम देखने को मिलता है। वे अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में स्त्री के अस्तित्व, उसकी अस्मिता और मानसिक स्वास्थ्य जैसे जटिल एवं मानवीय पहलुओं को बड़ी सूक्ष्मता और मजबूती के साथ स्वर प्रदान करती हैं।
शैक्षिक एवं वर्तमान पृष्ठभूमि: आपने अवध विश्वविद्यालय से स्नातक (B.A.) की उपाधि प्राप्त की है। वर्तमान में आप संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की एक गंभीर अभ्यर्थी के रूप में प्रयासरत हैं। अकादमिक अनुशासन और साहित्यिक अभिरुचि का यह मेल उनके लेखन को तार्किक और प्रभावशाली बनाता है।
1.अनुभव का आयाम
यह प्रेम का पारंपरिक बंधन नहीं,
न ही कोई मोह का पाश है;
यह तो अस्तित्व का एक विशेष कालखंड है,
जिसमें तुम्हारी और मेरी चेतना का संयोग हुआ।
स्मृतियों के इस धधकते मरुस्थल में
जहाँ सब कुछ निरंतर राख हो रहा है,
तुम एक 'मरुद्वीप' की तरह हो—
एक ठहरा हुआ सत्य,
एक शीतल बोध।
तुम्हें संजोना, किसी पाने की लालसा नहीं,
बल्कि शून्य में एक सगुण उपस्थिति को
अंकित कर लेना है।
तुम कोई लक्ष्य नहीं जिसे प्राप्त करना हो,
तुम वह विश्राम हो, जिसे मैंने जी लिया है।
जब मैं भावनाओं के उस अंधे गर्त में थी,
जहाँ चेतना धूमिल और दिशाएँ मौन थीं,
तब जिन उंगलियों ने मेरा हाथ थामा—
वे केवल सहारा नहीं, वे शिल्पकार थीं
मेरे व्यक्तित्व के दूसरे आयाम को गढ़ने वाली।
मैं कृतज्ञ हूँ....
कि तुम मेरी विवशताओं का दूसरा भावगर्त नहीं बने
मेरे एकांत को एक नई सार्थकता प्रदान की।"
अब जब भी मैं पीछे मुड़कर देखूँगी,
कोई टीस नहीं, कोई दावा नहीं होगा—
बस उन उंगलियों की छुअन पर
एक शांत, दार्शनिक मुस्कुराहट होगी।
वह मुस्कुराहट जो बुद्ध के चहरे पर थी जब उन्होंने अंतिम बार देखा था, यशोधरा को...
2.रक्त का मानचित्र
मेरे पास तुम्हारी कोई तस्वीर नहीं है, कुन्ती!
हस्तिनापुर के इन सर्द गलियारों में
जब तुम्हारी स्मृति दस्तक देती है,
तो कोई ममतामयी सूरत आँखों में नहीं तैरती।
उभरती है तो बस एक तीखी गूँज—
जो मेरे अस्तित्व के कवच-कुंडल को बेधकर
मेरे होने के अर्थ पर करती अंतहीन प्रहार ।
मैं पत्थर की उस शिला की तरह हूँ,
जो टूटने के बाद भी पत्थर ही रही,
किंतु जिसका कोई आकार न बचा।
जब करीब आ रहे लोगों को मेरा परिचय ओछा लग रहा होता है
तब वे पूछते हैं— तुम्हारा पता,
वे माँगते हैं— तुम्हारी तस्वीर।
यह वाक्या भी नहीं उभार पाता मेरे पाषाण हृदय पर तुम्हारी ममतामयी मूर्ति का कोई खंड
जब वे मेरे चेहरे की ज्यामिति में
ढूंढते हैं तुम्हारी आँखों की बनावट
मैं बस हँस देता हूँ—
एक ऐसी हँसी, जो मानचित्रों को धुंधला कर देती है।
काश! मैं भी उस 'नक़्शे' का हिस्सा होता,
जहाँ पुत्र होना महज़ एक अनुत्तरित 'प्रश्न' नहीं—
होता एक उत्सव , एक पूर्ण सत्य ।
मैं पत्थर न होता, होता एक जीवंत मनुष्य।
तुम्हारी तस्वीर पर होता मेरा भी कोई अधिकार
मैं 'सूत-पुत्र' के अंधेरे अपमान में नहीं,
जीता बस 'तुम्हारे पुत्र' होने के धधकते मान में।
किंतु अभागी ही रही तुम कुंती ;
और अभागा मैं भी!
उसी भग्नावशेष की भांति—अंततः अभिशप्त शिला ही।
जब तुम पांडवों के विजय-तिलक को निहारोगी,
तुम्हें अपनी उंगलियों पर आएगी मेरे रक्त की गंध —
वह रक्त, जो सूत का नहीं था ; तुम्हारा ही था ।
जब तुम मेरी निर्जीव देह पर अपना अधिकार माँगने आओगी,
तब शायद मेरी बंद आँखों के सन्नाटे में
तुम्हें मिल जाए अपनी धुंधली तस्वीर..।
3.इस दुनिया का कोई दूसरा द्वार है,
जो अस्तित्व के अंतराल में बार-बार घटित होता है।
भोर की पहली किरण से पूर्व भी,
वह द्वार वहीं था—
जहाँ समय थमता है और केवल मौन शेष रहता है, तुम्हारे रूप में...
4."तुम पृथक नहीं, मेरा ही विस्तार हो.."
मेरी अतृप्त तृष्णाओं का साकार आधार...
वह कोरा पट, जिस पर मेरी कल्पनाओं ने रेखाएं उकेरी हैं,
मुझे तुमसे प्रेम नहीं, उस 'कायिक ज्यामिति' से मोह है,
जिसे मेरी बंद पलकों ने गढ़ा, और मेरे ही चैतन्य ने रंगा है।
तुम सत्य नहीं, मेरी मानसिक सृष्टि का एक बिम्ब भर हो,
धरातल से परे, मेरे द्वारा रचित एक 'मिथक' मात्र।
"मैं तुम्हारी सत्ता को नहीं पूजती,
मैं स्वयं की ही 'सृजन-शक्ति' की उपासक हूँ।"
5.अनुकरणीय इच्छा
मैं चाहती हूँ,
तुम्हें वह सब प्राप्त हो
जिसे तुमने अपनी आत्मा की गहराइयों तक महसूस किया है,
इस बनावटी और मिथ्या संसार को नकार कर।
मैं जानती हूँ,
मात्र मेरी एक इच्छा से कुछ नहीं बदलेगा,
किंतु मेरा प्रयास बस इतना भर है कि—
जब ईश्वर तुम्हारी नीयत का मापन करे,
तब न्याय के उस पलड़े पर
मेरे मौन समर्थन का भार इतना हो कि
वह बहुमत बनकर तुम्हें सिद्ध कर दे।
जब वह परम सत्ता
तुम्हारी अद्वैत इच्छा का मूल्यांकन करे,
तब संपूर्ण बहुमत तुम्हारे पक्ष में खड़ा हो।
और उस दैवीय सभा के भीतर,
इस ब्रह्मांड की समस्त मूक सहमतियाँ
तुम्हारी सार्थकता के लिए
एक साथ गवाही दें।
6.शहरी मरुस्थल
दीवारों के कान हैं, पर हृदय बधिर हैं
यह एक ऐसा भूगोल है
जहाँ हम एक-दूसरे की छाया से तो टकराते हैं
पर अस्तित्व से नहीं।
मनोविज्ञान की फाइलों में
हमारा अकेलापन अब कोई 'विकार' नहीं,
बल्कि इस सभ्यता का 'स्थायी भाव' है।
हाथों में चमकती स्क्रीनें
खिड़कियाँ नहीं, बल्कि वे दीवारें हैं
जिन्होंने संवाद की हत्या कर
हमें अपनी ही छवियों का कैदी बना दिया है।
दार्शनिक दुविधा यह नहीं कि हम कौन हैं,
त्रासदी यह है कि हम 'होने' के बजाय 'दिखने' में व्यस्त हैं।
भीड़ का यह रेला
सुरक्षा का भ्रम तो देता है,
मगर सच यह है कि हम
एक-दूसरे के लिए बस 'उपयोगी वस्तु' भर हैं।
यहाँ संवेदनाओं की नीलामी
डाटा की मंडियों में होती है,
जहाँ हर आंसू का एक एल्गोरिदम है
और हर हंसी का एक डिजिटल सांचा।
यथार्थ यही है—
कि हम उस ऊँची मीनार पर चढ़ रहे हैं
जिसकी नींव ही अजनबीपन की रेत पर है।
रिश्ते अब प्रेम की नहीं,
बल्कि 'लॉजिस्टिक्स' और 'सर्वाइवल' की ज़रूरत हैं।
हम एक ही छत के नीचे, अलग-अलग कालखंडों में जीते
वे मुसाफिर हैं
जो अपनी-अपनी मंजिलों के नक्शे
अपनी ही तन्हाई की स्याही से लिख रहे हैं।
शहरी मरुस्थल में प्यास पानी की नहीं,
एक निश्छल पहचान की है,
जो प्रगति के इस कोलाहल में
कहीं गुम हो गई है।
7.क्षितिज की ज़िद
तुम्हारी ओर चलते चलते मुझे एक तारा दिखाई देता है ;
क्षितिज से थोड़ा पहले ,
मेरी हथेलियों के बिल्कुल पास ;
बस एक पुकार दूर...!
एक पुकार जो शब्दों की देह ओढ नहीं पाती !
एक पुकार जो मौन के कोख से जन्मती है!
तारा नहीं, वह तुम्हारा अक्स है,
जो मेरी मुट्ठियों में कैद होने ही वाला था।
मगर पुकार...
वह तो अनकहे के दलदल में फंसी है,
होठों तक आने से पहले ही
मौन की चादर ओढ़ कर सो गई।
वह तारा अब भी वहीं है—
क्षितिज की ज़िद और मेरी छुअन के बीच,
एक अधूरी वर्णमाला की तरह।
8.नीला अस्तित्व : एक दार्शनिक एकालाप
जब संसार का सारा कोलाहल मिलकर भी,
तुम्हारी अंतरात्मा की धुरी न हिला पाए,
तब बोध होता है—कि 'होना' वास्तव में क्या है।
एक नीला परिधान, कलाई पर बँधी एक नीली घड़ी—
यह केवल वर्ण नहीं, एक शाश्वत ठहराव है।
जो पलकों के झपकने के व्याकरण को झुठलाकर,
घंटों तुम्हें खुद में समेटे रखता है;
जैसे इस नीलिमा को अपलक निहारना ही अंतिम सत्य हो
भय है कि दृष्टि हटते ही ध्यान बिखर जाएगा,
सदियों का मौन एक पल में टूट जाएगा;
क्योंकि 'दूसरी ओर' मायावी संसार का शोर है,
और 'इस ओर'—सिर्फ तुम और तुम्हारा नीला निर्वाण।
वह अनंत आकाश—
अपनी विशालता में नितांत तटस्थ,
मगर व्याकुलता में एक शीतल छत ;
और विरह में मौन आंसुओं की बारिश !
दर्शन की पराकाष्ठा बस यही है कि—
तुम कृतज्ञता से देखो या मोह के वशीभूत होकर,
वह अपना-सा ' आभास ' कराता है ;
मगर कभी तुम्हारा हिस्सा नहीं बनता।
वह मुक्त है...
और तुम्हें भी मुक्त ही देखना चाहता है।
9.एक आम दिन
फुटपाथ—
एक नग्न वास्तविकता है,
जहाँ मस्तिष्क का संचय और अँतड़ियों की पुकार
एक ही चिथड़े की ओट में, बेबस साथ लेटे होते हैं।"
हम गुजरते हैं वहाँ से—
हाथों में 'सभ्यता' का झोला लटकाए,
हमारी सुसंस्कृत नज़रें ठहरती हैं ;
फुटपाथ की धूल झाड़ती उन अधखुली किताबों पर।
हमें टीस उठती है—
कि इन अक्षरों को पुस्तकालयों के मखमल की ज़रूरत है,
ये निर्वासित हैं अपने आधिकारिक स्थान से..!
हम उठाते हैं, एक किताब
दाम चुकाते हैं—सस्ते में अपनी संवेदनशीलता खरीदने का,
और खुश होते हैं कि हमने बचा लिया एक विचार
उसी किताब के ठीक बगल
बैठा होता है एक मैला-सा बचपन,
जिसकी आँखों में किताबों से बड़ा सवाल होता है ;
वहाँ पसरी होती है एक आवाज़—
जो न विलाप है, न विद्रोह,
बस एक लंबी, अंतहीन भूख है ।
हम भाग्यवादी हैं और दे देते हैं उनके हाथ में अपनी ग्लानि की कीमत
एक वक्त की रोजी और उनका भाग्य भी..
हमारा न्याय 'चयनित' है
हम कागज़ के दुखों को गोद ले लेते हैं,
किंतु उस हाड़-मांस के सिसकते सच को—
'भाग्य' की कील से वहीं ठोंक आते हैं।
हम उसके हाथ में एक वक्त की 'दया' थमाते हैं,
और उसकी पूरी उम्र को फुटपाथ की वसीयत कर देते हैं।
फुटपाथ... वह हम सबसे ज़्यादा उदारवादी है।
वह अपनी तपती छाती पर सबको देता है बराबर जगह—
उन उपनिषदों को भी, जिन्हें हम घर ले जाना चाहते हैं,
और उन बच्चों को भी,
जिन्हें हमने अपनी सभ्य समाज से बेदखल कर दिया है ।
10.मेरे भीतर धूप का एक टुकड़ा मुस्कुरा रहा है,
अब वह केवल आभास नहीं, साकार उत्सव है।
बाहर बसंत की पदचाप है,
पर मेरे एकांत मरुस्थल में 'चैत' जी उठा है।
पतझड़ की राख और ठहरे अवसाद से परे,
मैं अब सिर्फ जीवित नहीं, घटित हो रही हूँ।
11.मेरे भीतर धूप का एक टुकड़ा मुस्कुरा रहा है,
अब वह केवल आभास नहीं, साकार उत्सव है।
बाहर बसंत की पदचाप है,
पर मेरे एकांत मरुस्थल में 'चैत' जी उठा है।
पतझड़ की राख और ठहरे अवसाद से परे,
मैं अब सिर्फ जीवित नहीं, घटित हो रही हूँ।
12.फरवरी की इस धुंधली देहलीज पर,
मन एक संशय का पेंडुलम है ;
जो जमे हुए ‘कल’ के हिमखंड
और बहते ‘आज’ के नीर के बीच,
अविराम स्पंदित है।
व्याकुल धड़कनों ने अब लय पा ली है ।
कुहासा सिमट रहा है,
और हम...
अतीत के भग्नावशेषों से मुक्त होकर,
वर्तमान की अंतहीन धारा में विलीन हो रहे हैं।
13.फरवरी
यह वर्षा नहीं है,
यह तो काल-कोठरी की दीवारों के पीछे
अंधेरे में पलता एक हिंस्र भ्रूण है!
माघ की जड़ता और वसंत के छल के बीच
एक रक्तरंजित गीली संधि।
सर्दियों के उस बंद, घुटन भरे सीलन-भरे कमरे में—
जहाँ स्मृतियाँ दीमक की तरह चाटती हैं वजूद को—
वहाँ यह कोई आकस्मिक सैलाब नहीं,
बल्कि जर्जर दीवारों की दरारों से झाँकता
नग्न, नृशंस यथार्थ है!
14.मेरे शहर में तुम्हारी उपस्थिति—
मानो घर के आँगन में तुम हो,
मैं रसोई की चौखट से निहारती हूँ तुम्हें।
तुम साक्षात नहीं दिखते,
तुम्हारी आवाज़ आती है टुकड़ों में—
हवा में तैरते किसी पुराने राग की तरह।
धुंधली, आधी छाया सी तुम्हारी छवि,
पर मन में अटूट, पूरी आश्वस्ति—
कि तुम हो, मेरे ही घर में हो !
15.उजाड़ ; ईश्वर का मौन संगीत
उजाड़ वह भूमि है जहाँ स्मृतियाँ अवशेष बनकर बिखरी रहती हैं।
यह वह ठहराव है जब शब्द अपना अस्तित्व खो चुके होते हैं केवल अनुभव शेष रह जाता है।
यह अहंकार के पतन का दृश्य रूप है और सृजन के पहले का अनिवार्य तत्व;
जब तक संसार की आसक्तियों का घर 'उजड़ता' नहीं, तब तक ईश्वर अथवा आत्मज्ञान का प्रवेश संभव नहीं
यह विनाश की सूचना कम, और अस्तित्व की अनिवार्य परिणति का संदेश अधिक देता है।
"उजाड़ का सम्मुख होना, मन में अपार विचलन भर सकता है किंतु
उजाड़ का आंखों में बसना त्रासदी नहीं अपितु चिट्ठी है तुम्हारे ईश्वर की!"
16.स्वायत्तता की देहरी
वह बच्चा, जो कंचों में ब्रह्मांड देखता था,
अब 'नार्सिसिज्म' की रिक्तता में डूब चुका है।
बाहर कोई बरसात नहीं है,
यह तो 'मेलंकलिया' की वह गाद है
जो आत्मा में जलती हुई सलाखों की तरह
'साइकोसोमैटिक' घावों को कुरेदती है।
मेरा चेहरा—
एलियट के 'होलो मैन' जैसा धंसा हुआ,
अब तुम्हारे स्पर्श की मिट्टी नहीं माँगता।
यह 'कॉग्निटिव डिसोनेंस' का खेल,
यह जुड़ने और टूटने का भ्रामक द्वंद्व—
अब थका चुका है।
पर सुनो,
इस बार अंत वह नहीं जो तय था।
मैं अब 'अम्बिवेलेंट अटैचमेंट' की बेड़ियों को
कोई विलाप नहीं सौंपूँगी ;
न मुझे वह 'डिसीजन पैरालिसिस' चाहिए,
न वह दोराहा,
जाओ, कि अब मैं 'होने' और 'न होने' के बीच नहीं,
बल्कि अपनी पूर्ण स्वायत्तता के उजाले में खड़ी हूँ।
अब न कोई 'सह-अपराधी' है, न कोई मलाल—
सिर्फ मैं हूँ, और मेरी अपनी पहली आज़ाद सांस !
17.तथाकथित हमारा समय
इस 'क्लिक-टू-कनेक्ट' वाली दुनिया में,
जहाँ हर कोई हर समय उपलब्ध है,
वहाँ तुम्हारी अनुपलब्धता एक रणनीतिक हथियार है।
यह 'अति-उपलब्धता' का वह दौर है,
जहाँ इंसानी जज़्बात अब स्क्रोल किए जाते हैं,
अनंत विकल्पों की इस भीड़ ने
धैर्य का गला घोंट दिया है।
जब विकल्प 'कैटलॉग' की तरह बिखरे हों,
तो संवाद की गरिमा एक बोझ लगने लगती है।
यह घोस्टिंग नहीं,
आधुनिक 'उपभोक्तावाद' का चरम है,
जहाँ इंसानी वजूद एक 'डिस्पोजेबल' वस्तु है।
यह डिजिटल समाज का एकल नियम है —
"बिना स्पष्टीकरण दिए मुड़ जाओ, क्योंकि तुम किसी के ऋणी नहीं।"
तुम जानते हो..
वे तुम्हें खोकर खुद को छोटा कर रहे हैं—यह उनकी 'नियति'।
इंसान बनो, कोई 'इंटरफेस' नहीं जिसे हर कोई इस्तेमाल करे।
अपनी गरिमा का घेरा इतना बड़ा करो,
कि जो तुम्हें समझने का साहस न रखते हों,
उनकी उंगलियां 'ब्लॉक' बटन तक पहुँचने से पहले ही कांप जाएँ।
तुम पिक्सेल्स का शोर नहीं, एक मुकम्मल सन्नाटा हो।"
18.सफेद ख्वाब :एक अस्तित्व वादी विमर्श
मैं बैठी हूँ तुमसे विमुख
अपनी रीढ़ की हड्डी पर महसूस करती हुई
तुम्हारी उंगलियों की थरथराहट,
तुम लिख रहे हो मेरी पीठ पर एक ऐसी भाषा
जिसकी लिपि मेरी त्वचा तो पहचानती है, पर चेतना नहीं।
यह 'दैहिक स्मृति' है,
एक अधूरी इच्छा का प्रक्षेपण (Projection),
जहाँ मेरा मस्तिष्क दूरी को तुम्हारे स्पर्श से भर रहा है।
कल्पनावाद के आकाश में तुम एक पूर्ण विचार हो ;
एक ऐसा 'सफेद ख्वाब' जिसमें कोई दाग नहीं !
किंतु अस्तित्ववाद की ज़मीन पर—
तुम सिर्फ एक 'अनुपस्थिति' हो !
यह सफेदी शांति नहीं, एक रिक्तता है,
जैसे कोहरे में डूबा हुआ कोई निर्जन तट !
सार्त्र के दर्शन में—मैं अपने होने का अर्थ ढूँढ रही हूँ
उस कविता में, जो तुम लिख रहे हो,
पर वास्तविकता यह है कि लेखक और पाठक दोनों मैं ही हूँ ;
हमारा मिलना, तुम्हारा लिखना, मेरा मुड़कर न देखना—
यह सब एक 'भ्रम' है, जिसे मैंने जिया है ;
ताकि मैं इस ठोस और निष्ठुर यथार्थ को सह सकूँ।
यह स्वप्न सफेद है क्योंकि इसमें सत्य का रक्त नहीं,
पर यह यथार्थवादी है, क्योंकि इसमें एक मनुष्य की
अकेले होने की चरम स्वीकारोक्ति है।
अंततः, तुम्हारी उंगलियों के निशान मेरी पीठ पर नहीं,
मेरे अस्तित्व के अकेलेपन पर छपे हैं।
मेरा विमुख होना ही उचित है, इस भ्रम को मान देने के लिए
क्योंकि -
"आमने-सामने होने पर
तुम और यह कविता—दोनों धुएँ की तरह उड़ जाते हैं...."
19.यह ग्लानि वैसी ही है,
जैसे किसी मंदिर की देहरी पर,
अपवित्र पैरों के निशान देख लेना—
भले ही वो पैर तुम्हारे अपने न हों।
शून्य में भी प्रतिध्वनि होती है।
जहाँ कुछ नहीं हुआ, वहाँ 'होने की आशंका' का दानव खड़ा है।
यह पश्चाताप रिक्तता का नहीं,
उस 'अति-नैतिकता' का है,
जो मन को एक पिंजरा बना देती है।
साँसों पर टिका यह बोझ,
उस पानी की छुअन का डर है,
जिसे तुमने छुआ, और मैंने सिर्फ चाह लिया।
कर्म से पहले विचार का जन्म ही,
शायद आत्मा की पहली चूक है?
या फिर यह सिर्फ एक भ्रम है—
खुद को देवता मानने की जिद में,
इंसान होने का दंड।
20.चेतना के भग्नावशेष
मेरी बंद पलकों के पीछे
सिगमंड फ्रायड की मेज पर बिखरे
किसी अधूरे मानचित्र जैसी है तुम्हारी उपस्थिति।
मेरा चेतन मन—वह कठोर प्रहरी
जो दिन के उजाले में
तुम्हारी स्मृतियों के द्वार पर 'वर्जनाओं' की कीलें ठोक देता है,
रात के सन्नाटे में वही द्वार
स्वप्न की 'काम-ऊर्जा' से दरक जाते हैं।
ये सपने—
महज स्मृतियां नहीं,
मेरी दमित इच्छाओं के 'आक्रामक विस्थापन' हैं।
वह सब कुछ जिसे मैंने 'अहम्' (Ego) की रक्षा के लिए नकारा,
वह 'इड' (Id) की गहराइयों से निकलकर
एक हिंसक सत्य बनकर उभरता है।
विचलनों का यह खेल कितना क्रूर है!
मेरा मन—
एक ऐसा 'अचेतन' (Unconscious) कारागार है
जहाँ तुम कैद हो, एक ऐसी छाया बनकर
जो मुझे मुझसे ही छीन लेती है।
विडंबना तो यही है,
कि फ्रायड के 'साझा अचेतन' का कोई अस्तित्व नहीं।
यदि होता—
तो मेरे मन के इस 'स्वप्न-सेंसर' (Dream Censorship) को तोड़कर
तुम्हारी उपस्थिति का यह कम्पन
तुम्हारे भीतर भी एक हलचल पैदा करता ;
पर अफ़सोस,
तुम मेरे मन के एक संकीर्ण न्यूरॉन में कैद हो,
और मैं—
अपनी ही दमित इच्छाओं के मलबे में
तुम्हें सार्थक सिद्ध करने की जद्दोजहद में व्यस्त !
*अपूर्णता बतौर प्रतिरोध*
तय था मेरा अधूरा रहना,
ठीक उसी तरह—
जैसे किसी सुचिंतित शास्त्रीय मीमांसा के अंत में
अपरिहार्य रूप से छूट जाता है एक 'किन्तु'।
यह अवसाद की कोई लहर नहीं,
बल्कि जीवन की वह नग्न विसंगति है
जहाँ रसोई की आर्द्र भाप और शास्त्र की शुष्क ऋचाएँ
एक साथ दम तोड़ देती हैं।
मेरा अधूरा रहना ही नियति थी—
ताकि सभ्यता के इन सुघड़, कल्पित ढाँचों के मध्य
वह दरार जीवित रहे,
जहाँ से झाँकता है झुलसा हुआ 'यथार्थ'।
मुझमें एक मनोवैज्ञानिक द्वंद्व निरंतर गतिशील है—
एक ओर पूर्णता का वह रसवादी, प्राचीन मोह,
दूसरी ओर यथार्थ की वह खुरदरी मेज़,
जिस पर प्रतिपल नीलाम होते हैं मेरे स्वप्न।
कैसी विसंगति है यह—
स्वयं को समेटने का हर प्रयास, मुझे और अधिक बिखेर देता है
बाज़ार की निर्दयी माँगों और
घर की उन अभिशप्त दीवारों के बीच,
जो मेरी 'संपूर्णता' का हिसाब माँगती हैं।
हाँ, यह विद्रोह है—
उस हर पाषाण-खंड के विरुद्ध,
जिससे निर्मित हुई है 'समाज' नामक यह भव्य अट्टालिका।
उन्होंने एक मानचित्र उकेरा, नाम दिया— 'स्त्रीत्व',
और मेरे हिस्से के अनंत आकाश को
अपनी संकुचित कैंचियों से काटकर
एक तंग खिड़की में तब्दील कर दिया।
मैं इस व्यवस्था के छद्म-पूर्ण होने के दंभ को
अपनी अपूर्णता से ललकारती हूँ।
मैं वह खंडित कविता हूँ,
जिसे कोई भी शब्द-शिल्पी
अपने तयशुदा छंदों के अनुशासन में बाँध नहीं सकता ।
मेरा अधूरापन, विवशता नहीं— मेरा चयन है।
क्योंकि जिस क्षण मैं पूर्ण हुई,
मैं इस सड़ी-गली व्यवस्था का अंग बन जाऊँगी।
मैं अस्वीकार करती हूँ उनका थोपा हुआ 'पूर्णता का प्रमाणपत्र'।
मैं अधूरी हूँ... यही मेरा अंतिम सत्य है,
यही मेरा मौन विद्रोह ।
शीर्षक: अनाम चेहरों का कोलाहल
शहर महज़ इमारतों का जमघट नहीं,
एक मनोवैज्ञानिक 'भूलभुलैया' है—
जहाँ बगल वाले कमरे की दीवारें तो जुड़ती हैं,
पर उनमें रहने वाले मन कभी नहीं मिलते।
यहाँ हर हाथ में एक 'यंत्र' है,
जो दूरी मिटाने का दावा तो करता है,
पर भीतर के सन्नाटे को और गहरा कर देता है।
यहाँ अजनबीपन कोई मजबूरी नहीं,
बल्कि एक 'सुरक्षा-कवच' है;
भीड़ में खो जाना यहाँ की सबसे बड़ी आज़ादी है,
और किसी की आँखों में आँखें डालना—
एक अनजाना सा खतरा।
लिफ्ट में खड़े चार लोग
एक ही छत के नीचे होकर भी,
चार अलग-अलग ग्रहों की यात्रा पर होते हैं।
यहाँ का मनोविज्ञान 'दिखने' पर टिका है, 'होने' पर नहीं,
सुविधाओं की चमक में
अस्तित्व का रंग फीका पड़ चुका है।
हम 'डाटा' के आंकड़े तो बन गए हैं,
पर किसी की याद का हिस्सा नहीं।
प्रगति के इस शोर में,
संवेदनाओं की आवाज़ दब गई है,
क्योंकि यहाँ हर रिश्ता 'जरूरत' की कसौटी पर है,
और हर इंसान, एक चलता-फिरता 'बाज़ार'।
मृगतृष्णा के इस दौर में
हम सब भाग रहे हैं—
एक ऐसी मंज़िल की तलाश में,
जिसका नक्शा ही शायद
अकेलेपन की स्याही से बना है।
*सपनो के पक्ष में*
सपनो की दो परिणीति होती है;
तत्कालिक परिणीति ; हमारी आंखों के खुल जाने भर से आभासी दुनिया का टूट जाना !
दीर्घ कालिक ; जो आंख खुल जाने के बाद भी हममें बच जाती है और उम्रभर हम, हर औषधि से उन्हें जीवित करने की कोशिश करते हैं !
दुर्भाग्य वश पूर्ण भी होते हैं..
किंतु जीवन नहीं रहता तब बस सपने बचते हैं, वो भी पूर्ण!
"ये बात देर से समझ आती है कि सपने ईंधन है, जीवन नहीं!"
*सपनों की भाषा *
सपनो की भाषा उपस्थिति के एहसासों से चलती होगी!
इसी लिए सपनों में तुम अधिक प्रिय हो जाते हो..
सपनो में अक्सर जब मैं तुम्हारी तरफ देखती हूं , और तुम मेरी तरफ!
सहमति इतनी प्रगाढ़ होती है, कि कभी वाचिक भाषा की कोशिश ही नहीं हुई दोनों ओर से,
और सपना अपनी परिणति पर समाप्त हुआ!
*बोध का बोझ*
यह कोई रणक्षेत्र नहीं, जहाँ जयघोष सुनाई दे,
यह तो एक अंतहीन ऊब है,
एक दलदली जद्दोजहद... ऊपर की ओर!
आत्मा के भूगोल पर बिछा हुआ है अवसाद का गुरुत्व ;
जिसने बड़ी बेरहमी से खुरच दी हैं—
आँखों की तमाम निश्चिंत पुतलियाँ !
सुनहरी नींद का मायावी कांच टूटता है,
और सहसा, मैं खुद को खड़ा पाती हूँ
एक भयावह 'शून्य' की लकीर पर ;
जहाँ मन का विचलन—एक हिंसक पशु की तरह—
तय करता है मेरे गिरने की दिशा ।
यह चुनाव की विडंबना!
यहाँ 'सही' को चुनना कोई शीतल छाँव नहीं,
बल्कि माथे पर रिसता हुआ गरम पसीना है।
सही का चुनाव... एक भारी, काला पत्थर है,
जिसे रीढ़ की हड्डी पर लादकर चलना ही
अब इस जीवन का पर्याय है।
हम अब हर्ष के उत्सवों के लिए नहीं जीते,
हम जीते हैं—सिर्फ उस बोझ को 'सलीके' से ढोने के लिए।
वही पत्थर, वही बोझ,
जो हमें यथार्थ की ठोस जमीन से बाँधे रखता है,
शून्य का आकर्षण बहुत गहरा था,
हमें अर्थहीनता की ओर खींचने के लिए।
किंतु हमने चुना—इस बोझ का आलिंगन,
हम खड़े हैं, इसी भार को साक्ष्य मानकर,
कि संघर्ष ही अंततः सार है—अस्तित्व का ।
*मतिभ्रम*
मैं चाहती हूँ—
तुम हो, मैं हूँ,
और हो एक ढलती हुई संध्या,
जो रात होने को अधीर है
मैं चाहती हूँ—
तुम मुझे उस आस से देखो,
जैसे सूरजमुखी ताकता है अपने प्राणदाता सूर्य को।
और जब मैं अस्त होने लगूँ,
तुम भी मेरे साथ उसी क्षितिज पर उतर जाओ;
मुझमें तिल-तिल ढलो,
बिल्कुल उसी एहसास की तरह,
जो डूबता हुआ सूरज देख कर सूरजमुखी महसूस करता है।
अब उस गहन अंधेरे में—
सिर्फ मैं रहूँ,
और मुझ पर धीरे-धीरे बीतते हुए... तुम।
जैसे 'इवेंट होराइजन' निगल लेता है प्रकाश की अंतिम किरण,
तुम अपनी अधीरता से मुझे वैसे ही ढँक लो।
तुम इतने विराट बनो कि मैं तुममें छिप जाऊँ,
जैसे किसी पूर्ण ग्रहण में एकाकार हो जाते हैं खगोलीय पिंड।
तुम चूमो मेरे पोर-पोर,
जैसे अब ब्रह्मांड में कुछ शेष न बचा हो—
तुम्हारे होंठों के योग्य।
तुम चूमो मेरा हर वो उभार,
जिसे अब तक सिर्फ तुम से होकर आई परावर्तित किरणों ने चूमा है।
मैं चाहती हूँ—
तुम चूमो मेरा हर वो तिल,
जिसे दुनिया ने 'सौर-कलंक' कहकर पुकारा है।
तुम मुझे अपनी भुजाओं में ऐसे भर लो,
जैसे आदि-गर्भ (Primordial Womb) सहेजता है ऊर्जा के प्रथम स्पंदन को।
जैसे भय से वशीभूत होकर कोई माँ अपने पहले नवजात को भुजाओं में भरती है; पहली बार
मुझे ऐसे ढँक लो...
जैसे 'एंट्रॉपी' निगल लेती है सृष्टि के समस्त आकारों को,
मेरा अस्तित्व तुममें विलीन हो जाए,
और मैं—
मैं शेष न बचूँ।
यह मतिभ्रम नहीं,
समय के सातत्य (Space-time continuum) में घूमता
एक अनंत चक्र है,
जहाँ होना और न होना, एक ही बिंदु पर मिल जाते हैं।
स्वयं को मिटते देखना 'दृष्टा' होना है,
उस साक्षी भाव की तरह—
जहाँ पदार्थ (Matter) पुनः चेतना (Energy) में बदल जाता है।
हमारा अंत उस सूरजमुखी सा नहीं होगा जो मुरझा जाए,
हमारा अंत होगा—
जैसे एक 'सुपरनोवा' स्वयं को बिखेर देता है अनंत में,
ताकि फिर से कोई नई गैलेक्सी जन्म ले सके।
जहाँ न समय बचेगा, न स्थान,
सिर्फ एक 'सिंगुलैरिटी' होगी—
जहाँ मैं तुम हूँ, और तुम मैं।
*मन और ब्रह्मांड की संधि*
तुम्हारी पृथ्वी की फुर्ती,
सिर्फ एक यांत्रिक चक्र नहीं—
एक बेचैन मनोविज्ञान है,
जहाँ हर पल को मुट्ठी में भींच लेने की छटपटाहट है।
तुम सोलह बार जगे, सोलह बार सोए,
ताकि शून्य को भरने का भ्रम पाल सको,
परंतु टाइटन का वह एक लंबा सूर्योदय
अस्तित्व की उस पूर्णता का प्रतीक है—
जहाँ समय 'होने' की शर्त नहीं, केवल एक गवाह है।
जो तेज़ी से दौड़ता है, वह केंद्र से दूर भागता है,
जो धीमे ठहरता है, वह केंद्र को स्वयं में पाता है।
पृथ्वी का समय एक खंडित अनुभव है (Anxiety of fragments),
जहाँ तुम पखवाड़ों की गिनती में खुद को खो देते हो।
पर टाइटन की वह सुस्त दोपहर,
एक गहरे 'ध्यान' (Meditation) जैसी है,
जहाँ 'वक़्त का पत्थर' गिरता नहीं, बस ठहर जाता है,
क्योंकि वहाँ मंजिल और मार्ग—एक ही बिंदु हैं।
तुम्हारी गति 'अंश' की प्यास है,
मेरा ठहराव 'समग्र' की तृप्ति।
तुम पलों को जोड़कर जीवन बनाते हो,
मैं एक जीवन को एक पल में संकुचित कर लेती हूँ।
अंततः,
जब ब्रह्मांड के गणित की वह गाँठ खुलती है,
तब पता चलता है कि—
तेज़ धड़कन और स्थिर श्वास,
एक ही महाशून्य के दो अलग स्वर हैं।
जहाँ 'होना' और 'न होना' विलीन होते हैं,
वहीं पृथ्वी की छटपटाहट और टाइटन की पूर्णता
एक मौन आलिंगन में बंध जाते हैं।
वहाँ न कोई पखवाड़ा है, न कोई ऋतु,
सिर्फ एक निरंतर 'वर्तमान' है—
जो न बीतता है, न आता है,
बस 'है'।
कलेवर: एक मनोवैज्ञानिक विस्थापन
पैकिंग सुंदर थी, सो स्वीकार ली गई
मैं एक उत्पाद की तरह सजा दी गई तुम्हारे बाईं ओर
साक्षी-अग्नि की लपटें गवाह हैं
कि आवरण अगर मोहक हो, तो सत्य गौण हो जाता है।
दुनिया इसे सलीका कहती है, मैं इसे 'छद्म' कहती हूँ
पर इस 'आम' होने में एक सुरक्षा थी
जिसने मुझे पहचान दी, पर मेरी पहचान छीन ली।
तुम देखते हो मेरी आँखों में—
वहाँ एक 'संधि-पत्र' लिखा है मुस्कुराहटों की स्याही से
तुम आश्वस्त हो कि यह चमक शाश्वत है,
पर मनोविज्ञान कहता है—
कि सबसे गहरी चुप्पी अक्सर सबसे सुंदर आवरण में लिपटी होती है।
यह मुस्कान?
यह मेरा समर्पण नहीं, मेरा 'अनुकूलन' (Adaptation) है
एक अस्तित्वगत समझौता, जो मैंने खुद से किया है
ताकि यह कलेवर बना रहे, ताकि तुम बने रहो।
पर इस आभासी रेखा के उस पार
जहाँ कोई साक्षी-अग्नि नहीं, कोई दर्शक नहीं
वहाँ एक 'विभत्स सत्य' सांस लेता है
एक विचलन, जो मन को दो फाड़ कर देता है।
बाहर—मैं एक पूर्ण प्रतिमा हूँ,
भीतर—मैं एक विखंडित विचार।
मैं मुस्कुरा रही हूँ, क्योंकि यही मेरा 'कवर' है
पर इस खूबसूरत पैकिंग के भीतर
सत्य सड़ रहा है, अनाकर्षक और नग्न।
यही मेरा यथार्थ है—
कि मैं अब वह नहीं जो हूँ,
मैं वह हूँ जो दिख रही हूँ।
और यही विक्षेप (Dissonance) ही अब मेरा स्थायी निवास है।
*ईश्वर और क्षतिपूर्ति *
जब तर्क की सीमाएँ समाप्त होती हैं
और मैं हार को ओढ़कर
अश्रुओं में स्वयं को विसर्जित कर रही होती हूं,
तब शून्य के उस गहन विस्तार में
एक मौन प्रतिध्वनि सुनाई देती है—
जो न प्रश्न करती है, न उत्तर माँगती है।
ईश्वर शब्दों में नहीं आता,
न ही वह घावों को भरने की हड़बड़ी दिखाता है;
वह बस बैठता है पास—
धैर्य की पराकाष्ठा बनकर
मेरे सहज होने का करता है इंतज़ार
उसका सान्निध्य कोई उपचार नहीं, एक गवाही है—
कि मेरी पीड़ा व्यर्थ नहीं है।
मैंने चाहा था कि तुम भी वही बनो—
एक स्थिर किनारा, जहाँ मैं लहरों सी सिर पटक सकूँ।
तुम्हारे शब्द मुझे कभी स्वस्थ नहीं कर सकते थे,
किंतु तुम्हारा पास होना, मेरे 'अकेलेपन' का अंत होता।
पर मनुष्य की सीमा 'उपस्थिति' नहीं, 'पलायन' है।
जब तुम उठे और चले गए,
तो उस रिक्त स्थान को ईश्वर ने किसी दूसरे विशेष से नहीं भरा ;
वहाँ वह स्वयं आ बैठा।
तुम्हारी अनुपस्थिति ने वह द्वार खोला
जहाँ अब ईश्वर साक्षात है।
"यही मेरी कुचली गई भावनाओं की क्षतिपूर्ति है—
कि एक नश्वर साथ के छूट जाने के बदले,
मुझे वह शाश्वत साथ मिला..!"
*मूल की रिक्तता*
एक अंतहीन प्यास है
कि किसी के हृदय के कोष्ठक में
सुरक्षित कर लूँ अपना नाम,
जैसे कोई पत्थर पर उकेरता है अपनी वंशावली।
इस लालसा की जड़ें
उस मिट्टी में नहीं, जिसे मैं आज सींच रही हूँ,
बल्कि उस आदि-बिंदु पर हैं—
जहाँ 'स्व' के अंकुर को
अपने ही 'मूल' की छाँव से निष्कासित कर दिया गया
वह जो मेरा आधिकारिक स्थान था ;
मेरे अस्तित्व का प्रथम घर !
वहाँ जब रिक्तता की एक दरार रह गई,
तो उस शून्य ने ही जन्म दिया
इस विराट 'मोह' को !
अब यह मोह एक खोखली नींव है,
एक अगाध गर्त,
जिसमें मैं हर अर्जित संबंध को,
हर प्रेम को, हर निष्ठा को—
ईंधन की तरह झोंक देती हूँ।
मैं रिश्तों का महल खड़ा करती हूँ
ताकि उस पुराने अभाव को ढँक सकूँ,
पर नींव का वह सन्नाटा
हर दीवार को सोख लेता है।
अंततः,
जब भावनाएँ राख होने लगती हैं,
मैं ठिठक कर देखती हूँ खुद को—
जहाँ न कोई संबंध शेष है, न कोई अपनापन,
बस मैं हूँ—
"अपने ही हाथों से रचा गया, एक अर्थहीन विस्तार.."
* आत्म-छलावा और मुक्ति*
१. आवरण
अहं की ढाल के पीछे
सत्य के नाम पर,
हमने बुने हैं झूठ के अनगिनत विन्यास !
२. द्वंद्व
चेतना का दुर्ग रचे बैठा है सुविधानुसार यादें,
जबकि अवचेतन की दमित इच्छाएँ
मौन कोलाहल बन अस्तित्व पर करती हैं निरंतर प्रहार!
३. विसंगति
व्यक्तित्व कोई ठोस धरातल नहीं,
बल्कि संज्ञानात्मक भ्रमों की एक निरंतर ढलान है—
जहाँ हम स्वयं को ही छलते हैं, थोड़ा और !
४. बोध
मुक्ति सत्य की खोज में नहीं,
बल्कि अपने भीतर के इस जटिल मानचित्र को
बिना किसी पूर्वग्रह के स्वीकारने में है !
५. नियति
हम विवश हैं,
स्वयं के गढ़े अर्थों और शून्य के सन्नाटे के बीच
एक अंतहीन संवाद जीने के लिए !
हमारे विश्वास के अनुरूप न हुई चीजें हमें दुःख में डाल जाती हैं
हमारे सोच से बाहर घटित घटनाएं, विस्मय में..!
दोनों ही स्थितियां हमें धरातल पर नहीं रहने देतीं
"हम खुद को अपने ही अर्ध सत्य में फंसा हुआ पाते है,
टूटे विश्वास और हृदय विदारक यथार्थ के मध्य..!"
*ट्राइटन*
यह अस्वीकार नहीं,
एक आत्म-बोध है—
कि मेरी परिधि और तुम्हारे केंद्र के बीच
एक शाश्वत दूरी का होना अनिवार्य है।
तुम्हारा सानिध्य एक 'भंवर' है—
ऐसा सुख, जो धीरे-धीरे मेरी सत्ता निगल जाता है,
ऐसी चमक, जो मुझे मुझसे ही ओझल कर देती है।
जब तुम दूर होते हो,
अपनी 'नौ से पांच' की दुनिया में सुरक्षित,
अपनी बेबाकी में रमे हुए,
तब मैं सांस लेती हूं।
तुम्हारी सामान्यता ही मेरी शांति है,
तुम्हारे जीवन का सलीका ही मेरा संबल है।
पर जैसे ही बढ़ते हैं तुम्हारे कदम मेरी ओर,
मैं पिघलने लगती हूं,
मेरा व्यक्तित्व, मेरा सामर्थ्य, मेरा 'स्व'
सब उस ताप में जलकर भस्म होने लगता है।
मैं अब और 'अर्थहीन' नहीं होना चाहती।
मैंने स्वीकार कर लिया है—
दूरी के अनुशासन को।
मैने स्वीकार कर ली है—
एक मूक उपग्रह की नियति।
तुम्हारे सोलह चंद्रमाओं में से एक बनकर
मैं तुम्हारे इर्द-गिर्द घूमती रहूंगी आठों याम,
न कभी पास आऊंगी, न कभी विमुख होऊंगी ;
तुम्हें बचाए रखने और खुद के बचे रहने के बीच
यही मेरा दर्शन है,
यही मेरी मुक्ति—
"दूर से देखते रहने का सुख।"
मन—
एक उद्दंड बालक सा
तुम्हारी स्मृतियों की उंगली थामे भागता है,
मेरे तर्क, मेरी वर्जनाएं
उसके लिए बेमानी हैं।
शायद यह 'प्रक्षेप' (Projection) है,
पर मेरे लिए यह एक अंतहीन भंवर है—
एक ऐसा 'ब्लैक होल' जहाँ समय और संकल्प
दोनों दम तोड़ देते हैं।
ये 'अति-यथार्थवाद' (Surrealism) की वो जमीन है जहां
मैं दर्शन की ऊँचाइयों से गिरकर
उदासी के तलघर में बैठी हूँ।
इसका आधार हो तुम!
काले गुलाम
प्रकृति के कैनवास पर कहाँ है पूर्णता का रंग?
आदर्श, मृत्यु, और निषिद्ध प्रेम—
बस मानवीय कल्पना के द्वंद्व हैं,
साहित्य की गलियों में रचे गए प्रपंच हैं।
देखो इन काले गुलाबों को,
ये मिट्टी की उपज नहीं, चेतना का विद्रोह हैं;
जहाँ लाल रंग की कोमलता दम तोड़ती है,
वहाँ इन गहरी रंगतों का जन्म होता है।
यह मृत्यु का शोक नहीं, 'अंतिम सत्य' का उत्सव है,
एक त्रासद अंत के विरुद्ध मौन उद्घोष है;
पुराने 'स्व' की राख पर खड़ा,
एक नई, जागृत चेतना का जीवंत बोध है।
पारंपरिक सौंदर्य के मापदंडों को नकारते,
ये पुष्प नहीं, एक मौन घोषणा हैं;
कि सुंदरता केवल उजालों में नहीं होती,
अंधेरे की कोख से उपजा सत्य भी शाश्वत है।
*दहलीज पर अटका अस्तित्व*
आँख खुलते ही
संसार की ठोस दीवारें खड़ी हो जाती हैं सामने
पर भीतर कहीं...
अभी भी थिरक रही होती है उस सपने की राख।
हम फँसे रह जाते हैं
दो नावों के बीच की उस शून्य दूरी में
जहाँ न वह दृश्य पूरी तरह मरा है,
न यह यथार्थ पूरी तरह जीवित हुआ है।
आत्मा को आदत है 'अद्वैत' की,
वह भेद नहीं कर पाती कि 'सत्य' कौन सा है?
वह जो बंद पलकों के पीछे विस्तार था,
या वह जो खुली आँखों के सामने यह संकुचित कमरा है।
हम उस दुनिया का हिस्सा खुद को इसलिए मानते हैं
क्योंकि मन—काल (Time) से परे है।
जैसे गुफा से बाहर निकला व्यक्ति
देर तक अपनी आँखों में अंधेरा ढोता है,
वैसे ही हम चेतना के उस लोक की गूँज
इस शोर भरे दिन में साथ ले आते हैं।
शायद इसलिए...
जागने के बाद भी कुछ देर तक
हम उसी के होकर रहते हैं,
क्योंकि पूर्ण सत्य न यहाँ है, न वहाँ,
वह तो बस उसी 'बीच' के ठहराव में है।
प्रश्नचिह्न का बोझ
मन की परतों में दबे भेद
अब रहस्य नहीं रहे,
वे भार बन गए हैं—
इतने भारी कि तर्क की रीढ़ चटकने लगी है।
आत्म-संदेह की इस कोहरे भरी घाटी में
स्मृतियाँ धुंधली हैं,
पर एक सवाल किसी नुकीले पत्थर-सा
पाँव में चुभता रहता है—
"हमें जीना क्यों होता है?"
दर्शन की भारी-भरकम किताबों से परे
जहाँ सार (Essence) से पहले अस्तित्व (Existence) खड़ा है,
वहाँ सार्त्र और कामू की दलीलें
किसी भीगे हुए कागज़-सी लगती हैं।
मन बस एक ही धुरी पर घूमता है—
जैसे कोई थका हुआ बैल
कोल्हू के चारों ओर अनंत चक्कर काट रहा हो,
बिना यह जाने कि मंज़िल कहाँ है।
शायद जीना कोई 'उत्तर' नहीं है,
न ही यह किसी उद्देश्य की उपलब्धि है।
यह बस एक मौन सहमति है—
उस निरर्थकता (Absurdity) के साथ,
जिसे हम रोज़ सुबह ओढ़कर
सूरज के सामने खड़े हो जाते हैं।
"जब उत्तर थक जाते हैं,
तब जीना ही एकमात्र विद्रोह बन जाता है.!"
आत्महत्या के ठीक पहले:
अंतिम मौन
सब कुछ ठहर गया है—
शोर, जो कल तक कानों में चीखता था,
अब एक भारी सन्नाटे में बदल चुका है।
मेज पर रखी आधी पढ़ी किताब
और दीवार पर टिकती घड़ी की सुइयाँ,
अब समय का हिस्सा नहीं रहीं।
मैंने जीवन से युद्ध नहीं किया,
बस, सामंजस्य के धागे टूट गए थे।
स्मृतियाँ, जो कभी घर हुआ करती थीं,
अब बेगाना खंडहर लगने लगीं।
दर्शन कहता है कि मृत्यु सत्य है,
किन्तु इस क्षण, सत्य सिर्फ यह बोझ है—
जो साँसों के साथ अधिक भारी हो रहा है
मैंने ईश्वर को नहीं ढूँढा,
न ही निर्वाण की कोई लालसा की,
मैंने बस उस 'शून्य' को चाहा,
जहाँ न कोई प्रश्न हो, न कोई उत्तर की अपेक्षा।
यह विदाई नहीं है,
न ही यह किसी पराजय की घोषणा है;
यह तो बस एक बूंद का
अपनी ही मर्जी से सागर में गिर जाना है,
ताकि पहचान मिट जाए,
और सिर्फ़ शांति शेष रहे!
पर्दा गिर रहा है,
और पहली बार—
मैं अभिनय से मुक्त हूँ!
कविता: मन के क्षुधित (शून्य की देहरी पर)
1. प्रस्थान
कहाँ को प्रस्थान है इन मन के क्षुधितों का?
जहाँ देह की जीर्ण दीवारें ढह जाती हैं,
जहाँ सीमाओं की परिधि थमती है,
वहीं से अतृप्ति का नील व्योम शुरू होता है।
ये पथिक हैं उस शाश्वत मार्ग के,
जहाँ रसद अन्न नहीं, अपनत्व की ओस है।
2. द्वार
जब संसार जड़ देता है मोह के किवाड़,
कठोरता से, निष्ठुरता से, इनके मुख पर—
तब ये ठहर जाते हैं उस 'तृतीय अदृश्य द्वार' पर;
जिसे दर्शन 'शून्य' की समाधि कहता है,
और साहित्य— केवल 'अपेक्षा' का अंतहीन विस्तार।
3. प्रतीक्षा
वहाँ नीरव खड़े ये 'काल' को सुनते हैं,
जैसे थका चातक ताकता है मेघ के अधरों को।
पर अम्बर तो निर्लिप्त है, महामौन है, निराकार है,
वह कब गिनता है किसी की प्यास की लकीरें?
विचित्र है यह मानुष होने का जटिल व्याकरण,
कि बंद मुट्ठियों में भी, चाह उसी निर्मम की है।
4. विरोधाभास
कैसी विवशता है? कैसा यह विरोधाभास?
अक्षि मूँद ली है कि बाहर का शोर न सताए,
पर अंतर्दृष्टि उसी निष्ठुर सत्ता की ओर उन्मुख है।
वह सत्ता...
जो मौन रहकर ब्रह्मांड का हाहाकार सुनती है,
जो स्वयं रिक्त होकर भी,
इन मन के क्षुधितों की 'भूख' को अमर विस्तार देती है।
*मेरे हारे लोग*
धूप की लंबी कतारों में
जब कोई साया साथ छोड़ देता है,
तब वे जागते हैं—
मेरे भीतर के हारे हुए लोग !
वे कोई बाहरी शत्रु नहीं,
मेरी ही कोशिशों के थके हुए अवशेष हैं,
वे अधूरी प्रार्थनाएं हैं जो होठों तक न आईं,
वे रास्ते हैं जो मोड़ से पहले ही खत्म हो गए !
जीवन की समस्या बाहर नहीं,
उस द्वंद्व में है—
जहाँ एक ओर चमकता हुआ 'सफल' मैं खड़ा हूँ,
और दूसरी ओर वे अनगिनत 'मैं'
जो गिरकर कभी उठ नहीं पाए !
हम केवल एक व्यक्ति नहीं, एक कब्रिस्तान हैं—
अपनी ही पुरानी इच्छाओं और असफलताओं का ;
पर ये हारे लोग बोझ नहीं हैं,
ये मेरी मिट्टी की वह नमी हैं ;
जो मुझे पत्थर होने से बचाए रखती है !
वे मुझ में ही रहते हैं,
मुझसे ही बात करते हैं,
और मुझे बताते हैं कि "शिखर की हवाएँ ठंडी ज़रूर हैं,
पर असली गर्माहट
उसी संघर्ष में थी जो हम हार गए..."
*शून्य का व्याकरण*
यह तलाश किसी वस्तु की नहीं, एक 'अनुपस्थिति' की है।
उस मलबे में, जिसे हम 'सत्य' कहते हैं।
सत्य कहीं नहीं है ;
यह मानव मन की आत्म-प्रवंचना का एक महीन जाल है
यहाँ कोई निश्चित व्याकरण नहीं !
न्यूरॉन्स के बीच जो बिजली कड़कती है,
वह संदेश नहीं, एक चीख है—
उस पूर्णता की, जो प्रकृति ने कभी बनाई ही नहीं।
मस्तिष्क एक कुशल बाजीगर है,
जो अभाव की रिक्तियों को
'आदर्श' के रंगों से भरने का हुनर जानता है।
आदर्श एक मानसिक विकार है,
सच्चाई केवल एक सुविधाजनक दृष्टिकोण,
अस्तित्ववाद की ठंडी दीवार पर लिखा है:
"यहाँ कोई व्याकरण नहीं, केवल कोलाज है।"
पर यह हृदय, जो तर्क की भाषा नहीं समझता,
उस 'झूठ' को ओढ़कर सोना चाहता है,
क्योंकि नग्न सत्य बहुत बर्फीला है।
शायद मुक्ति इस बात में नहीं कि
तलाश छोड़ दी जाए,
बल्कि इस स्वीकारोक्ति में है कि—
मृगतृष्णा ही मेरा यथार्थ है।
मैं उस क्षितिज की ओर बढ़ूँगी,
यह जानते हुए कि वह पैर पसारते ही पीछे हट जाएगा।
सत्य का न होना ही,
मेरे सत्य रचने की आज़ादी है।
अगर दुनिया बेतरतीब है,
तो मैं इस बेतरतीबी की सबसे सुंदर भूल हूँ।
मैं उस भावना को ढूँढूँगी जो अस्तित्व में नहीं,
क्योंकि उसे अस्तित्व में लाना ही
मेरे होने का एकमात्र प्रमाण है।
शीर्षक: निर्वासन और खिड़की
पाँव यथार्थ की कीचड़ में धंसे हैं,
जहाँ सत्य, मुखौटों की मंडी में नीलाम है।
यह दुनिया जिसे 'पलायन' का नाम देती है,
वह दरअसल, एक बेदखल नागरिक की
अपनी पैतृक भूमि की तलाश है।
जीवन की समस्याएँ जब भूख बनकर डसती हैं,
और पथरीला सच संवेदनाओं का गला घोंटता है,
तब अवचेतन का 'इह लोक' की देहरी लांघ जाना—
कोई विलासिता नहीं, अस्तित्व का अनिवार्य युद्ध है।
कल्पना यहाँ केवल स्वप्न नहीं,
बल्कि कठोर सत्य को सहने की 'तितिक्षा' है।
यह वह एकमात्र खिड़की है—
जहाँ यथार्थ की कंक्रीट की दीवारों के पीछे भी,
आत्मा का आकाश नीला बचा रहता है।
जब पैतृक स्मृतियों के बागों से निकाल फेंके गए हों,
तब कल्पना में लौट जाना 'हार' नहीं,
बल्कि खुद को बचाए रखने का 'निर्वाण' है।
*धुंध और होश का मनोविज्ञान*
मेज का एक कोना—
जहाँ से धुआँ उठता है,
वह फेफड़ों की प्यास नहीं,
बल्कि अवचेतन की एक छटपटाहट है।
सफेद और मटमैले घेरे
उन दमित इच्छाओं का आकार लेते हैं,
जिन्हें शब्दों का व्याकरण नहीं मिला।
सिगरेट का जलना, समय का कोई रैखिक बीतना नहीं,
बल्कि एक मानसिक क्षरण है—
जहाँ हम धीरे-धीरे राख होते हुए
खुद को 'मुकम्मल' महसूस करने का भ्रम पालते हैं।
यह विनाश में सुकून खोजने का एक 'डिफेंस मैकेनिज्म' है।
वही मेज, दूसरा सिरा—
जहाँ काली कॉफी की कड़वाहट रखी है।
यह तरल सचेत मन का पहरेदार है।
जो कल्पनाओं के अफीम को काटकर
हकीकत के तीखे स्वाद से परिचय कराती है।
कॉफी का ताप, शरीर को अपनी भौतिकता याद दिलाता है—
एक 'ग्राउंडिंग तकनीक', जो बताती है कि
सिर्फ विचार होना काफी नहीं, जीवित होना अनिवार्य है।
इन दोनों के बीच का शून्य—
यही वह 'कैथार्सिस' है, जहाँ चरित्र का निर्माण होता है।
एक तरफ 'शून्य' होने की चाहत : धुआँ
दूसरी तरफ 'पूर्ण' होने का बोध : कॉफी
इंसान इन दो विरोधाभासों के बीच झूलता हुआ,
अपनी विसंगतियों को स्वीकार करना सीखता है
यह लत का मनोविज्ञान नहीं,
यह चेतना के दो ध्रुवों के बीच संतुलन की खोज है।
एक तरफ अनिश्चितता का कुहासा है,
दूसरी तरफ यथार्थ की स्पष्ट रेखा।
और इसी तनाव के बीच,
इंसान खुद को थोड़ा और पहचान लेता है।
विनाश को निहारता हृदय,
जब याचना नहीं सुनता ,
कोई युक्ति नहीं चलती इस पर ; तो स्वार्थ से वशीभूत होकर कहा जाता है इसे शीत हृदय !
शीत हृदय अधिक कुछ नहीं तुम्हारा अपना बिंब है जिसे देखने से तुम जुगुप्सा से भर जाते हो!
*सपनों की सत्ता*
इह लोक की सत्ता गुण और दोषों से चलती है !
सपनो की सत्ता गुणों से चलती होगी..
तभी मुझे तुम्हारे दोष दिखाई नहीं देते
और तुम मात्र मेरे प्रतिबिंब भर बन कर रह जाते हो !
"तुम सत्य का अनुभव कराते हो ;
वरन् सत्य नहीं हो !"
शायद इसीलिए प्रतिबिंब की अपनी वास्तविक सत्ता नहीं होती!
*सपनो का साम्राज्य*
नींद की दहलीज पार करते ही
चेतना की चौकसी ढीली पड़ जाती है
और खुल जाता है वह बंद द्वार
जहाँ दमित इच्छाओं की परछाईं
एक नया भूगोल रचती है।
जब तक पलकों पर भारी है तंद्रा
सपना ही एकमात्र संप्रभु है !
वहाँ समय की कोई रैखिकता नहीं
न ही तर्क का कोई अंकुश!
उस धुंधले रंगमंच पर
उभरते हैं कुछ परिचित-अपरिचित पात्र
जो न रक्त के हैं, न मांस के
वे मात्र 'इड' (Id) की अतृप्त पुकारें हैं ;
जो छद्म वेश धारण कर
अतीत की स्मृतियों से उधार लेकर अपना अस्तित्व
एक झूठे देवत्व या दानवत्व को ओढ़ लेते हैं।
वे पात्र—
बिना किसी वंशावली के, बिना किसी प्रमाण के
स्वयं को मिथक घोषित कर देते हैं ;
वे कभी पूर्वज बन डराते हैं, कभी ईश्वर बन लुभाते हैं
उनका कोई 'आधिकारिक दावा' नहीं
फिर भी वे परम सत्य की तरह हावी रहते हैं !
परंतु यह सत्ता क्षणभंगुर है
जैसे ही बाहरी जगत का प्रकाश
'ईगो' (Ego) की खिड़की खटखटाता है
सपना अपनी समस्त भव्यता के साथ
रेत के टीले की तरह ढह जाता है !
टूटते ही वह मायावी तंत्र
वे मिथकीय पात्र फिर से लौट जाते हैं
अचेतन की उन्हीं अंधेरी गुफाओं में
"जहाँ वे फिर से प्रतीक्षित हैं—
एक नई नींद, एक नई सत्ता के उदय के लिए..!"
वैराग्य ; पलायन नहीं है
वरन् अपनी अनुरक्ति को मरते हुए स्वीकार कर लेने की क्षमता विकसित कर लेना है!
हम पलायन चुनते हैं जबकि अंततः हमें वैराग्य ही स्वीकारना पड़ता है !
*दो मितभाषी*
भाषा दैवीय उपहार है;
विक्षोभ आत्मिक परिवर्तन का परिमाण !
मौन ईश्वर की भाषा है;
और मेरा मानसिक आविर्भाव हमारे बीच हुआ संवाद!
मैं जब भी दुःख का अनुभव कर रही होती हूं,
ईश्वर वहीं होता है, एकल संवाद लिए मेरी प्रतिक्षा में;
देता है मुझे फिर से दैवीय उपहार और हो जाता है खुद अंतर्ध्यान !
"जब हम प्रकटीकरण की स्थिति में नहीं होते , तो होते है थोड़ा अधिक निकट अपने ईश्वर के..!"
यह कितना बड़ा चमत्कार है, कि
वो मन जिसमें हम डूबे रहते हैं आठों पहर
उसे मूर्तिमान करने के लिए ईश्वर एक शरीर भी देता है!
जिसे छूना , गंगा का जल छूने जैसा है!
" तुम्हे छू लेना, जीते जी तीर्थ है, तुम्हे देख भर लेना
मानस तीर्थ !"
और मुझे तुम्हारी उंगलियां इस लिए भी पसंद हैं कि वो तुम्हारी हथेली में बिखरे नसीब पर आरूढ़ हैं!
भाग्यवाद का इससे उत्तम खंडन क्या होगा !
तुम्हारा प्रबोधन ; जीवन का एक मुस्कुराहट जितना सरल होना , मार्क्सवाद की साम्यवादी कल्पना जितना जटिल नहीं है।
मेरा प्रबोधन ; मेरे जीवन में यथार्थवाद का आगमन सदैव
तुम्हारा पर्याय रहेगा!
आषाढ़ के अंतिम दिन ऐसे बीते जैसे खुले ज़ख्म पर मूसलाधार बारिश हो रही हो..!
तुम्हारा जाना यूं हमेशा से ही भयावह रहा है परन्तु वापस आना
मुझे ग्लानि से भर रहा है!
मैने कभी नहीं चाहा कि तुम मेरा हाथ छोड़ो
मैने कभी नहीं चाहा कि तुम्हारा जाना देखूं,
परन्तु हमेशा मेरे सपने में आती रही तुम्हारी पीठ और तुम्हारे छूटे हुए हाथ!
यह सपना भयावह हो सकता है किंतु
"सपने से निकलने के बाद पुनः सपने में न जा पाना त्रासदी है और अस्वीकार्य नियति भी!"
कभी - कभी खुद से बाहर निकल कर देखने पर लगता है..
ये दुनिया प्रतीति मात्र है...जिसे हम जीवन- मरण का प्रश्न समझ कर, समय की वंचना को पीछे छोड़ रहे थे,
मंचन का आयाम पूरा होने पर,
"बचपन में अनायास जीती गई कांच की गोलियों से भी अधिक निरर्थक सिद्ध होता है ये जीवन!"
हमें कब मालूम पड़ता है कि हम निकल आए हैं बाहर किसी अंधे ख्याल की गिरफ्त से
कितनी दूर चलने पर मालूम होता है कि हम निकल आए है उस आश्रितता से बाहर जहां हमें खड़े होने के लिए अब किसी दीवार के सहारे की जरूरत नहीं रह गई
जब हमें नितांत अकेलेपन का अनुभव हो या जब कोई न हो हमारे पास हमें हंसता देख खुश होने के लिए और हंसते हंसते थक कर फिर उदास होते देखने के लिए लिए !
शायद हां...
" खुशी और उदासी हमारी निजी संपत्ति हैं
और हम इसे वेब्लेन गुड्स समझ बैठे हैं..!"
कभी कभी मुझे लगता है कि
खुश होना हमारा धर्म होना चाहिए...
जो हमारे पैदा होते ही सुनिश्चित हो जाए ,
बिना हमारी अनुमति के
जिसके लिए हर कुछ त्यागा जा सके
जिसके होने के लिए एक निश्चित कीमत का होना तय न हो
जिसे बचाने के लिए हर आदमी खड़ा हो भूखे पेट
जिसे खोने से चला जाए पूरे कुल का मान
जिसे बचाए रखने के लिए त्यागा जा सके हर वो व्यक्ति जो हमारे धार्मिक पराभव के खिलाफ हो!
ऐसा लगता है मुझे ...पर कभी कभी
कभी कभी और शाश्वत में कितना अंतर है
हम यह गहराई से समझते हैं और बस सोच लेते है...
कभी - कभी !
प्रेम की दुनिया में प्रयास मायने रखते हैं!
वास्तविक दुनिया परिमाण से चलती है!
दुविधा ये है कि..प्रेम की दुनिया में हम परिणाम चाहते हैं और वास्तविक दुनिया के प्रयास कोई देख ले..
ये अभिलाषा शेष ही रही!
"प्रयास - परिणाम का यह अनुबंध , वांक्षित परिणाम के सदैव विपरीत ही रहा..!"
नितांत अंधेरे में खुद को पाने के बाद
शायद ही कभी ऐसा होता है जब आपको एक गर्म हाथ की शक्त पकड़ का अहसास होता है, जो उजाला आते ही हम अनदेखा कर देते हैं..!
संभवतः वह मेरा ईश्वर है...अथवा कभी-कभी एक किताब!