बुद्ध के दाँत (व्यंग्य) : शरद जोशी | Buddha ke Dant : Sharad Joshi ke Vyangya

पेकिंग के बाज़ार में वैसी मन्दी कभी नहीं आई। दुकानदारों को समझ नहीं आता था कि क्या करें ? सब गाँठ क…

मुद्रिका-रहस्य (व्यंग्य) : शरद जोशी | Mudrika-Rahasya : Sharad Joshi ke Vyangya

उन दिनों विक्रमादित्य के दरबार में ले-देकर कवि कालिदास की ही चर्चा होती थी। ‘शाकुंतल’ के प्रदर्शन क…

यमदूत और नर्स (व्यंग्य) : शरद जोशी | Yamdoot aur Nurse : Sharad Joshi ke Vyangya

यमदूतों की हालत में इधर काफी सुधार हुआ है। अब पुराने दिनों जैसी बात नहीं रही। पहले जब वे किसी के प्…

अतृप्त आत्माओं की रेल-यात्रा (व्यंग्य) : शरद जोशी | Atripta Aatmao ki Railyatra : Sharad Joshi ke Vyangya

कम्बल ढकी पहाड़ियाँ, तीखी तेज़ हवा और लदी-लदी रेल चली जा रही थी। आत्माओं ने काँच की खिड़कियाँ बन्द …

तिलस्म (व्यंग्य) : शरद जोशी | Tilasma : Sharad Joshi ke Vyangya

भगवान भास्कर अपनी किरणों को समेटकर अस्ताचलगामी हो चुके थे और खूबसूरत चिड़ियाँ गाती हुई दिल पर बेढब…