फ्रिन्स : सत्यजित राय की डरावनी कहानी

Fritz Horror Story : Satyajit Ray ki Horror kahaniya


जयन्त की ओर कुछ क्षणों तक ताकते रहने के बाद उससे सवाल किए बिना नहीं रह सका, ‘आज तू बड़ा ही मरियल जैसा दीख रहा है? तबीयत खराब है क्या?’
जयन्त अपने अनमनेपन को दूर हटाकर बच्चे की तरह हंस दिया और बोला, ‘न:। तबीयत खराब नहीं है बल्कि ताजगी ही महसूस कर रहा हूँ। सचमुच जगह अच्छी है?” 
‘तेरी तो जानी-पहचानी जगह है। पहले यह पता नहीं था कि जगह इतनी अच्छी है?’ 
‘भूल ही चुका था।’ जयन्त ने एक लम्बी साँस ली, ‘इतने दिनों के बाद धीरे-धीरे सब कुछ याद आ रहा है। बंगला पहले के जैसा ही है। कमरों में भी कोई खास परिवर्तन नहीं किया गया है। फर्नीचर भी पुराने जमाने का ही है। जैसे बेंत की यह टेबल और कुरसियाँ।’ 
बेयरा ट्रे में चाय और बिस्कुट ले आया। कुल मिलाकर अभी चार ही बजे हैं पर धूप ढलने लगी है। चायदानी से चाय ढालते-ढालते मैंने कहा, ‘कितने दिन बाद यहाँ आना हुआ?’ 
जयन्त ने कहा, ‘इकत्तीस साल के बाद। तब मैं छह साल का था।’ 

हम लोग जहाँ बैठे हैं वह है बूंदी शहर के सर्किट हाउस का बगीचा। आज सवेरे हम यहाँ पहुँचे हैं। जयन्त मेरा बचपन का मित्र है। हम एक ही स्कूल और एक ही कॉलेज के सहपाठी रह चुके हैं। आजकल वह एक अखबार के संपादकीय विभाग में नौकरी करता है और मैं एक स्कूल में शिक्षक का काम। नौकरी, जीवन में हम लोगों में अलगाव आ जाने पर भी हमारी दोस्ती ज्यों-की-त्यों बनी है। हम लोगों ने बहुत पहले ही राजस्थान के भ्रमण करने की योजना बनाई थी। दोनों को एक साथ छुट्‌टी मिलने में असुविधा हो रही थी। आज इतने दिनों के बाद यह सम्भव हुआ है। साधारण आदमी राजस्थान आते हैं तो शुरू में जयपुर, चित्तौड़ और उदयपुर ही देखते हैं मगर जयन्त पहले से ही बूंदी जाने पर दबाव डाल रहा था। मैंने भी आपत्ति नहीं की क्योंकि बचपन में मैंने रवीन्द्रनाथ की ‘बूंदी का किला’ कविता पढ़ी थी और उस किले को इतने दिनों के बाद देखने का मौका मिला। ज्यादातर आदमी बूंदी नहीं आते, लेकिन इसके माने ये नहीं कि यहाँ देखने के लायक कोई चीज ही नहीं है। ऐतिहासिक घटना की दृष्टि से विचार किया जाए तो उदयपुर, जोधपुर और चित्तौड़ का बहुत महत्त्व है मगर सौंदर्य के लिहाज से बूंदी किसी से कम नहीं है। 
जयन्त ने जब बूंदी के बारे में इतना जोर डाला था तो मुझे अजीब जैसा लगा था। जब ट्रेन से आने लगा तो इसका कारण मालूम हुआ। बचपन में एक बार वह बूंदी आ चुका है, इसलिए उन पुरानी यादों के साथ नये सिरे से मिलान करने के लिए उसके मन में इच्छा जोर मार रही थी। जयन्त के पिता अमियदास गुप्त पुरातत्व विभाग में काम करते थे, इसलिए उन्हें बीच-बीच में ऐतिहासिक स्थानों का भ्रमण करना पड़ता था। इसी सिलसिले में जयन्त भी बूंदी हो आया था। 
सर्किट हाउस वास्तव में बहुत ही खूबसूरत है। अंग्रेजों के जमाने का है, सौ साल से कम पुराना न होगा। एकमंजिला भवन। टाइल की छावनी की हुई ढालू छत, कमरे ऊँचे-ऊँचे। ऊपर की तरफ स्काइलाइट है जिसे रस्सी खींचकर इच्छानुसार खोला या बन्द किया जा सकता है। पूरब की ओर बरामदा है। उसके सामने के विशाल अहाते की क्यारियों में गुलाब के फूल खिले हुए हैं। बगीचे के पीछे के हिस्से में नाना प्रकार के बड़े-बड़े पेड़ हैं, जिन पर अनगिनत चिड़ियाँ बैठी रहती हैं। तोते भी हैं। मयूर का भी स्वर बीच-बीच में सुनाई पड़ता है, तब इतनी बात ज़रूर है कि वह स्वर अहाते के बाहर से आता है। 
हम सुबह पहुंचने के साथ ही एक बार शहर की परिक्रमा कर चुके हैं। पहाड़ पर बूंदी का विख्यात किला है। आज दूर से देख रहे हैं, कल हम अन्दर जाकर देखेंगे। शहर में बिजली के खम्भे नहीं होते तो लगता, हम जैसे प्राचीन राजपूत युग में चले आए हैं। सड़कें पत्थर की बनी हैं, मकानों के सामने दोमंजिले से टंगे हुए नक्काशी किए बरामदे हैं। लकड़ी के दरवाजों पर भी निपुण हाथों से नक्काशी की गई है। देखकर यह नहीं लगता कि हम यांत्रिक सभ्यता के युग में वास करते हैं। 
यहां आने पर मैंने गौर किया कि जयन्त आमतौर से जितनी बातें करता है, उसकी तुलना में यहाँ कम बातें करता है। हो सकता है, बहुत पुरानी यादें उसके मन में लौटकर आ रही हैं। बचपन के किसी पहचाने स्थान में बहुत दिनों के बाद आने से मन उदास हो जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। और जयन्त आम लोगों से जरा अधिक ही भावुक है। यह बात सभी को मालूम है। 

चाय की प्याली हाथ से नीचे रखकर जयन्त ने कहा, ‘मालूम है शंकर, बात बड़ी ही अजीब है। शुरू में जब यहाँ आया था, इन कुरसियों पर मैं पाँव मोड़कर बाबू साहब की तरह बैठा करता था। लगता, मैं जैसे किसी सिंहासन पर बैठा हुआ होऊँ। अब देख रहा हूँ कुरसियाँ लम्बाई-चौड़ाई में बड़ी नहीं हैं और देखने में भी अत्यन्त साधारण हैं। सामने जो ड्राइंग-रूम है, इससे दोगुना प्रतीत होता था। अगर मैं यहाँ आज नहीं आता तो बचपन की धारणाएँ ज्यों-की-त्यों बनी रहतीं। 
मैंने कहा, ‘स्वाभाविक यही है। बचपन में हम छोटे रहते हैं, उसके अनुपात में आसपास की चीजें बड़ी लगती हैं। उम्र के साथ-साथ हम भी बढ़ते जाते हैं, मगर चीजें तो बढ़ती नहीं।’ 
चाय पीना खत्म कर बगीचे में चहल-कदमी करते-करते जयन्त एकाएक ठिठककर खड़ा हो गया और बोला, ‘देवदारु।’ 
उसकी बात सुनकर मैंने अवाक् होकर उसकी ओर देखा। वह फिर बोल उठा, ‘देवदारु का एक पेड़ उधर होना चाहिए था।’ 
यह कहकर वह तेजी से पेड़-पौधों के बीच से होता हुआ अहाते के कोने की ओर बढ़ गया। अचानक जयन्त को देवदारु के एक पेड़ की बात क्यों याद आ गई? 

कुछ सेकेंड के बाद जयन्त का उल्लसित कंठ-स्वर सुनाई पड़ा, ‘‘है। इद् ‘स हियर। जहाँ था, ठीक वहीं।’ 
मैंने आगे बढ़कर कहा, ‘अगर पेड़ रहा होगा तो वह जिस जगह था वहीं होगा। पेड़ चहलकदमी नहीं करता है।’ 
जयन्त ने ऊब के साथ सिर हिलाते हुए कहा, ‘वहीं है’ से मेरा मतलब यह नहीं कि पेड़ ने अपनी जगह बदल ली है। मतलब यह कि मैंने पेड़ के जहाँ होने का अनुमान लगाया था, वहीं है।’ 
‘लेकिन पेड़ की बात तुझे अचानक क्यों याद आ गई?’ 
जयन्त कुछ देर तक भौंहें सिकोड़कर एकटक पेड़ की ओर देखता रहा, उसके बाद आहिस्ता से सिर हिलाकर बोला, ‘वह बात अब याद नहीं आ रही है। किसी कारणवश में उस पेड़ के पास गया था और वहाँ जाकर कुछ किया था। एक अंग्रेज...’ 
‘अंग्रेज?’ 
‘न: कुछ भी याद नहीं आ रहा है। मेमॉरी का मामला सचमुच बहुत अजीब...’ 
यहाँ का बावर्ची अच्छी रसोई बनाता है। रात में डाइनिंग रूम में ओवेलशेप टेबल पर बैठकर जयन्त ने खाना खाते-खाते कहा, ‘उन दिनों जो बावर्ची था, उसका नाम था दिलवार। उसके बायें गाल पर एक दाग था-छुरी का दाग-और उसकी आँखें हमेशा अड़हुल के फूल की तरह लाल रहती थीं। मगर रसोई बहुत उम्दा पकाता था। ‘ 

खाना खाने के बाद जयन्त जब सोफे पर बैठा तो उसे धीरे-धीरे और भी पुरानी बातें याद आने लगीं। उसके पिताजी किस सोफे पर बैठकर चुरुट पीते थे, माँ कहाँ बैठकर स्वेटर बुनती थीं, टेबल पर कौन-कौन-सी पत्रिकाएं पड़ी रहती थीं- सारी बातें उसे याद आ गईं। 

और इसी तरह उसे पुतली की भी बात याद आ गई। 
पुतली का मतलब लड़कियों की डील पुतली नहीं। जयन्त के मामा ने स्विट्‌जरलैंड से दस-बारह इंच लंबी स्विस पोशाक पहने एक बूढ़े की मूर्ति लाकर उसे दी थी। देखने में वह एक छोटे-से जीवित आदमी की तरह लगती थी। अन्दर कल-कब्जा नहीं था, मगर हाथ-पाँव, उंगुलियाँ और कमर इस तरह बनी थीं कि इच्छानुसार उसे घुमाया-फिराया जा सकता था। चेहरे पर हमेशा एक हँसी तैरती रहती थी। सिर पर छोटी-सी एक स्विस पहाड़ी टोपी थी जिस पर पंख खुसे थे। इसके अलावा पोशाक में भी कहीं कोई त्रुटि नहीं थी-बेल्ट, बटन, पॉकेट, कॉलर, मोजा—जहाँ तक कि जूते के बकलस भी त्रुटिहीन थे। 

पहली बार जब जयन्त बूंदी आया था तो उसके कुछ पूर्व ही उसके मामा विलायत से लौट आए थे और उन्होंने जयन्त को वह पुतली दी थी। स्विट्‌जरलैंड के किसी गाँव में एक बूढ़े से उन्होंने पुतली खरीदी थी। बूढ़े ने मजाक में कहा था कि उसका नाम फ्रिंस है और इसी नाम से इसे पुकारना। दूसरे नाम से पुकारोगे तो जवाब नहीं मिलेगा। 

जयन्त ने कहा, ‘बचपन में मुझे कितने ही खिलौने मिले थे। माँ-बाप की एकमात्र सन्तान रहने के कारण उन्होंने इसकी कोई कमी नहीं रहने दी थी। मगर मामा ने जब मुझे फ्रिंस दिया तो मैं अपने तमाम खिलौनों को भूल बैठा। रात-दिन उसी को लेकर पड़ा रहता, यहाँ तक कि एक ऐसा वक्त आया जब मैं फ्रिंस से घंटों बातचीत करने लगा। बात बेशक एकतरफा रहती थी, मगर फ्रिंस के चेहरे पर एक ऐसी हँसी और आँखों की दृष्टि में एक ऐसा भाव रहता था कि मुझे लगता, वह मेरी बात समझ लेता है। कभी-कभी मुझे ऐसा भी महसूस होता कि मैं बंगला के बजाय अगर जर्मन भाषा में बातचीत कर सकता तो बातचीत का सिलसिला एकतरफा न होकर दुतरफा होता। अभी सोचता हूँ तो लगता है कि वह बचपना और पागलपन था, मगर उन दिनों यह बात मेरे लिए एकदम यथार्थ जैसी थी। माँ और बाबू जी मना करते थे, मगर मैं किसी की भी बात पर कान नहीं देता था। तब मैंने स्कूल जाना शुरू नहीं किया था, इसलिए फ्रिंस को समय न दे पाने का कोई सवाल पैदा ही नहीं होता था।’ 
इतना कहकर जयन्त चुप हो गया। घड़ी की ओर देखने पर पता चला कि रात के साढ़े नौ बजे चुके हैं। हम सर्किट हाउस की बैठक में लैंप जलाकर बैठे थे। 

मैंने पूछा ‘पुतली कहाँ चली गई?’ 
जयन्त अब भी जैसे कुछ सोच रहा था। जवाब इतनी देर के बाद आया कि मुझे लगा, उसने सुना ही नहीं। 
‘‘पुतली को बूँदी ले आया था। यहीं टूट गई।’ 
‘टूट गई? कैसे?’ मैंने पूछा। 
जयन्त ने एक लम्बी साँस ली और कहा, ‘एक दिन हम बाहर बरामदे में बैठकर चाय पी रहे थे। पुतली को बगल में घास पर रख दिया था। पास ही बहुत-से कुत्ते जमा हो गए थे। तब मैं जिस उम्र का था, मुझे चाय नहीं पीनी चाहिए थी। मगर मैंने जिद करके चाय ले ली और पीने लगा। चाय की प्याली अचानक तिरछी हो गई और थोड़ी-सी गरम चाय मेरे पैंट पर गिर पड़ी। बंगले के अन्दर जाकर मैंने पैंट बदला और उसके बाद जब बाहर आया तो पुतली को वहाँ नहीं पाया। खोज-पड़ताल करने पर देखा, सड़क के दो कुत्ते मेरे फ्रिंस को लेकर ‘टगऑफवार’ खेल रहे हैं। चूँकि वह बहुत मजबूत चीज थी, इसलिए फटकर दो टुकड़ों में नहीं बँटी। लेकिन उसका चेहरा क्षत-विक्षत हो गया और कपड़ा फट गया। यानी मेरे लिए फ्रिंस का कोई अस्तित्व रह ही न गया। हि वाज डेड।’ 
‘उसके बाद?’ जयन्त की कहानी मुझे बहुत मजेदार लग रही थी। 

‘उसके बाद क्या? नियमानुसार फ्रिंस की अंत्येष्टि सम्पन्न कर दी।’ 
‘इसका मतलब?’ 
‘उस देवदारु के नीचे उसे दफना दिया। इच्छा थी, ताबूत का इन्तजाम करूँ क्योंकि विलायती आदमी था न। कोई बक्सा होता तो भी काम चल जाता, मगर बहुत खोजने-ढूँढ़ने पर भी कुछ न मिला। इसलिए आखिरकार उसी तरह दफना दिया।’ 
इतनी देर के बाद देवदारु के पेड़ का रहस्य मेरे सामने स्पष्ट हुआ। 

दस बजने पर हम सोने चले गए। 
एक खासे बड़े बेडरूम में अलग-अलग दो पलंगों पर हमारे बिस्तर बिछे थे। कलकत्ते में पैदल चलने का अभ्यास नहीं था। एक तो यों ही थकावट महसूस हो रही थी और उस पर डनलपपिलो। माथे के नीचे तकिया रखते ही दस मिनट के अन्दर नींद ने मुझे अपनी बाँहों में भर लिया। 
तब रात कितनी हो चुकी थी, पता नहीं। किसी चीज की आवाज से नींद टूट गई। बगल की तरफ मुड़ने पर जयन्त को बिस्तर पर बैठा हुआ पाया। उसकी बगल में टेबल लैंप जल रहा था। उसकी रोशनी में जयन्त के चेहरे पर घबराहट दीख रही थी। मैंने पूछा, ‘क्या हुआ? तबीयत खराब है क्या?’ 
इस बात का जवाब न देकर जयन्त एक दूसरा ही सवाल पूछ बैठा, ‘सर्किट हाउस में बिल्ली या चूहा जातीय कोई चीज है?’ 
मैंने कहा, ‘रहे तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं। मगर तुम ऐसा क्यों पूछ रहे हो?’ 
‘छाती पर चढ़कर कोई चीज गई और इसीलिए मेरी नींद टूट गई।’ 
मैंने कहा, ‘चूहा आमतौर से नाली से आता है। इसके अलावा मुझे यह मालूम नहीं कि चूहा खाट पर चढ़ता है या नहीं।’ 
जयन्त ने कहा, ‘इसके पहले भी एक बार मेरी नींद टूट चुकी है। तब खिड़की से ‘खच-खच’ जैसी आवाज आ रही थी।’ 
‘अगर खिड़की से आवाज आई है तो ज्यादा सम्भावना बिल्ली की ही हो सकती है। 
मगर...’ 
जयन्त के मन से खटका दूर नहीं हो रहा है। मैंने कहा, ‘रोशनी जलाने पर किसी चीज पर नजर नहीं पड़ी?’ 
‘नथिंग। इतना ज़रूर है कि नींद खुलते ही बत्ती नहीं जलाई थी। शुरू में अचकचा उठा। सच कहूँ, थोड़ा-थोड़ा डर भी लग रहा था। रोशनी जलाने के बाद किसी चीज पर नजर नहीं पड़ी।’ 
‘इसका मतलब यह कि कोई चीज अगर आई होगी तो वह कमरे के अन्दर ही होगी?’ 
‘सो...दरवाजा जब कि बन्द है...’ 
मैं तुरन्त बिस्तर से नीचे उतर आया और घर के हर कोने में, खाट के नीचे, सूटकेस के पीछे की ओर खोज-पड़ताल की। कहीं कुछ नहीं था। बाथरूम के पल्ले उड़के हुए थे, मैं उसके भीतर भी खोजने गया। तभी जयन्त ने धीमी आवाज में मुझे पुकारा- 
‘शंकर!’ 
मैं कमरे के अन्दर लौट आया। देखा, जयन्त अपनी रजाई के सफेद खोल की तरफ देख रहा है। मैं जब उसके पास गया तो उसने रजाई के एक हिस्से को रोशनी की तरफ बढ़ाकर कहा, ‘देखो तो, यह क्या है?’ 
मैंने जब झुककर कपड़े की तरफ देखा तो उस पर हलके कत्थई रंग की छोटी-छोटी गोल छापें दिखाई दीं। मैंने कहा, ‘बिल्ली के पंजे की छाप हो सकती है।’ 
जयन्त कुछ नहीं बोला। पता नहीं, वह क्यों बेहद चिंतित हो गया। रात के ढाई बज रहे थे। इतनी कम नींद से मेरी थकावट दूर नहीं होती है, इसके अलावा कल दिन-भर चक्कर लगाना है। इसलिए यह कहकर कि मैं बगल में ही हूँ कि भय का कोई कारण नहीं है, कि छाप पहले से भी हो सकती है, मैंने उसे आश्वासन दिया और बत्ती बुझाकर फिर से लेट गया। मुझे इसमें सन्देह नहीं था कि जयन्त ने जो कुछ कहा है, वास्तव में वह सब उसने सपने में देखा है। बूँदी आने पर उसे पुरानी बातें याद आ गई हैं और वह मानसिक तनाव में जी रहा है। इसीसे बिल्ली के चलने का सपना देखा होगा। 

रात में अगर कोई और घटना घटी हो तो इसके बारे में मुझे कुछ मालूम नहीं। जयन्त ने भी सवेरे उठने के बाद किसी नये अनुभव के बारे में नहीं बताया। तब हाँ, देखने पर लगा, वह रात ठीक से सोया नहीं है। मैंने मन ही मन तय किया कि मेरे पास जो नींद की टिकिया हैं, आज रात सोने के पहले एक टिकिया जयन्त को खिला दूँगा। 
अपनी योजना के अनुसार हम नाश्ता-पानी करके नौ बजे बूँदी का किला देखने चले गए। गाड़ी का इंतजाम पहले ही कर लिया था। किले के पास पहुँचते-पहुँचते साढ़े नौ बजे गए। 
यहाँ आने पर भी जयन्त को बचपन की सारी बातें याद आने लगीं। उनका सौभाग्यवश पुतली से कोई रिश्ता नहीं था। सच कहूँ, जयन्त का बचपना आनन्द देखकर लग रहा था, वह पुतली की बात भूल चुका है। वह एक-एक चीज को देखता है और चिल्ला उठता है—‘गेट के ऊपर वही हाथी है। यह वही चाँदी का पलंग और वही सिंहासन है। यह वही दीवार पर उकेरा हुआ चित्र है।’... 

मगर एक घंटा बीतते न बीतते उसका उत्साह ढीला पड़ने लगा। मैं इतना तन्मय था कि शुरू में इसे समझ नहीं सका। एक लम्बी कोठरी में चहल-कदमी कर रहा था और सीलिंग के झाडू-फानूसों को गौर से देख रहा था कि तभी याद आया, जयन्त मेरे पास नहीं है। वह कहाँ गया? 
हमारे साथ एक गाइड था, उसने कहा, ‘बाबू बाहर छत की तरफ गए हैं।’ 
दरबार-घर देखकर जब मैं बाहर आया तो जयन्त को थोड़ी दूर पर, छत की दूसरी तरफ दीवार के पास अनमना-सा खड़ा पाया। वह चिन्ता में इतना डूबा था कि मैं जब उसकी बगल में जाकर खड़ा हुआ तो उसकी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया। अन्त में जब मैंने नाम लेकर उसे पुकारा तो वह चौंक उठा। मैंने कहा, ‘तुझे क्या हुआ है, ठीक-ठीक बता। इतनी खूबसूरत जगह आकर भी तू मुँह सीकर चुपचाप पड़ा रहेगा तो मुझसे यह बरदाश्त नहीं होगा।’ 
जयन्त ने इतना ही कहा, ‘तेरा देखना खत्म हो चुका? फिर अब...’ 

मैं अकेला होता तो ज़रूर ही कुछ देर तक रुकता, लेकिन जयंत की भाव-भंगिमा देखकर सर्किट हाउस लौटना ही तय किया। 
पहाड़ पर जो रास्ता बना हुआ है वह शहर की तरफ चला गया है। हम दोनों चुपचाप गाड़ी के पिछले हिस्से में बैठे। जयन्त को मैंने सिगरेट ऑफर की परन्तु उसने नहीं ली। उसके अन्दर एक दबी हुई उत्तेजना थी जो उसके हाथों की हरकत से ज़ाहिर हो रही थी। कभी वह खिड़की पर हाथ रखता है, कभी गोद में, फिर उँगलियों को मटकाता है या नाखून दाँत से काटता है। यों जयन्त एक शान्त आदमी है। उसे छटपटाते हुए देखकर मैं अशान्ति का अनुभव कर रहा था। 
दस मिनटों तक जब यही सिलसिला चलता रहा तो मैं चुप नहीं रह सका। कहा, ‘अपनी दुश्चिन्ता का कारण मुझे बता दे, तो हो सकता है तेरा कुछ उपकार हो जाए।’ 
जयन्त ने सिर हिलाकर कहा, ‘कहने से कोई फायदा नहीं है, क्योंकि कहूँगा तो तू यकीन नहीं करेगा।’ 
‘यकीन न भी हो, पर उस विषय पर तुझसे विचार-विमर्श तो अवश्य कर सकता हूँ।’ 
‘कल रात फ्रिंस हमारे कमरे में आया था। रजाई पर फ्रिंस के पैरों की ही छाप थी।’ 
इस बात पर जयन्त के कन्धों को झकझोरने के अतिरिक्त मुझे कुछ दूसरा काम नहीं करना चाहिए था। जिसके दिमाग में इस तरह की अजीब धारणा जड़ जमाकर बैठ गई है, उसे क्या कुछ कहकर समझाया जा सकता है? फिर भी मैंने कहा, ‘तूने अपनी आँखों से तो कुछ देखा नहीं था।’ 
‘नहीं, तब इतनी बात ज़रूर है कि छाती पर जो चीज चल रही थी वह चौपाया न होकर दो पाया थी, यह बात मैं साफ-साफ समझ रहा था।’ 
सर्किट हाउस के पास आकर गाड़ी से उतरते समय तय किया कि जयन्त को नर्व टॉनिक किस्म की कोई चीज दूँगा। सिर्फ नींद की टिकिया से काम नहीं चलेगा। बचपन की एक साधारण स्मृति सैंतीस साल के जवान को इतना परेशान करेगी, यह किसी भी हालत में नहीं होने देना चाहिए। 
कमरे के अन्दर आने पर मैंने जयन्त से कहा, ‘बारह बज चुके हैं। अब स्नान कर लेना चाहिए।’ 
जयन्त ने कहा, ‘पहले तू हो आ।’ और वह पलंग पर लेट गया। 
स्नान करते-करते मेरे मन में एक विचार आया। जयन्त को स्वाभाविक स्थिति में लाने का यही उपाय है। 
जो विचार आया वह यह कि अगर पुतली को किसी खास जगह में दफनाया गया है और उस जगह की जानकारी है तो वहाँ मिट्‌टी खोदने पर पुतली चाहे पहले की जैसी हालत में न भी मिले मगर उसका कुछ न कुछ अंश मिल ही जाएगा। कपड़े-लत्ते जमीन के तले तीस साल के बाद नहीं रह सकते हैं, मगर धातु की चीज-जैसे फ्रिंस के बेल्ट का बकलस, कोट के पीतल के बटन-अगर बरकरार हों तो इसमें कोई अचरज की बात नहीं। जयन्त को अगर दिखाया जाए कि उसकी लाड़ली पुतली की केवल वे ही चीजें बची हुई हैं और बाकी सब मिट्टी में समा गई हैं, तो हो सकता है उसके मन से यह ऊटपटाँग धारणा दूर हो जाए। अगर ऐसा नहीं किया जाए तो वह हर रोज अजीब-अजीब सपना देखेगा और सुबह उठकर कहेगा कि फ्रिंस मेरी छाती पर चल रहा था। इस तरह उसका दिमाग कहीं खराब न हो जाए। 
यह बात जब मैंने जयन्त से कही तो लगा, उसे मेरा विचार पसन्द आया है। कुछ देर तक खामोश रहने के बाद वह बोला, ‘खोदेगा कौन? कुदाल कहाँ मिलेगा?’ 
मैंने हँसकर कहा, ‘जब इतना बड़ा बगीचा है तो माली होगा ही। और माली रहने का मतलब है कुदाल भी है। उसे हम कुछ बख्शीश दें तो मैदान की थोड़ी-सी मिट्टी खोदने में वह आनाकानी नहीं करेगा।’ 
जयन्त तुरन्त राजी हो गया। इसके बाद मैंने भी कुछ न कहा। एक-दो बार जब और डाँट पिलाई तो वह नहा-धो आया। भोजन-पसन्द आदमी रहने पर भी दोपहर में दो अदद रोटी और माँस के शोरबे के अतिरिक्त उसने कुछ नहीं खाया। खाना खाने के बाद हम बगीचे की तरफ के बरामदे की कुरसी पर बैठ गए। हम दोनों के सिवा सर्किट हाउस में कोई नहीं है। दोपहर में भी सन्नाटा छाया हुआ है। दाहिनी तरफ रोड़े-बिछे रास्ते के किनारे एक गुलमोहर के पेड़ पर कई हनुमान बैठे हैं, बीच-बीच में उनकी हुप-हुप’ आवाज सुनाई पड़ती है। 
तीन बजने पर एक पगड़ीधारी आदमी हाथ में झारी लिए बगीचे में आया। उम्रदराज आदमी है। बाल, मूँछें और गलपट्‌टे सफेद हो चुके हैं। 
‘तुम कहोगे या मैं कहूँ?’ 
जयन्त के सवाल पर मैंने आश्वासन की मुद्रा में हाथ उठाकर इशारा किया और कुर्सी छोड़कर सीधे माली के पास चला गया। 
मिट्‌टी खोदने के प्रस्ताव पर माली ने शुरू में मेरी ओर सन्देह भरी निगाहों से देखा। समझ गया, ऐसा प्रस्ताव इसके पहले किसी ने उसके सामने नहीं रखा है। उसके ‘काहे बाबू सवाल पर मैंने उसके कन्धे पर हाथ रखकर मीठे स्वर में कहा, ‘कारण अगर न जान सके तो हर्ज ही क्या है? पाँच रुपए बख्शीस दूँगा, जो कह रहा हूँ कर दो।’ 
कहना न होगा कि इस पर माली न केवल राजी हुआ, बल्कि दाँत निपोरकर सलामी ठोंकी और ऐसा भाव दिखाया जैसे वह हमारा खरीदा हुआ गुलाम हो। 
बरामदे में बैठे जयन्त को मैंने हाथ के इशारे से बुलाया। वह कुर्सी छोड़कर मेरे पास चला आया। निकट आने पर देखा, उसका चेहरा अस्वाभाविक तौर पर बुझा हुआ है। मुझे उम्मीद हुई कि खोदने के बाद पुतली का कुछ न कुछ अंश मिल ही जाएगा। 

इस बीच माली कुदाल ले आया है। हम तीनों देवदारु के पेड़ की ओर आने लगे। 
पेड़ के तने के लगभग डेढ़ हाथ दूर एक स्थान की ओर हाथ से इशारा करता हुआ जयन्त बोला, ‘यहीं।’ 
‘ठीक-ठीक याद है न?’ मैंने पूछा। 
जयन्त ने कहा कुछ नहीं, सिर्फ माथे को एक बार हिलाकर हामी भरी। 
‘कितने नीचे गाढ़ा था?’ 
‘एक बित्ता तो होगा ही।’ 
माली बेझिझक उस स्थान को खोदने लगा। आदमी रसिक मालूम होता है। खोदते-खोदते पूछा कि जमीन के नीचे धन-दौलत है या नहीं और अगर है तो उसे हिस्सा मिलेगा या नहीं? यह बात सुनकर यद्यपि मैं हँस पड़ा लेकिन जयन्त के चेहरे पर हँसी का कोई आभास नहीं दीख पड़ा। अक्तूबर में बूँदी में गरमी नहीं पड़ती है मगर जयन्त के कॉलर के नीचे का हिस्सा भीग गया है। वह एकटक जमीन की ओर देख रहा है। माली कुदाल चलाए जा रहा है। पुतली का कोई चिन्ह अभी तक क्यों नहीं दिखाई पड़ रहा है? 

एक मयूर की तेज आवाज सुनकर मैंने अपना सिर घुमाया, तभी जयन्त के गले से एक अजीब आवाज निकली और मेरी आँखें तत्क्षण उसकी ओर चली गईं। उसकी आँखें जैसे छिटककर बाहर निकल रही हों। दूसरे ही क्षण अपने काँपते हाथ को धीरे से बढ़ाकर तर्जनी से गड्‌ढे की ओर इशारा किया। उसकी उँगली भी काँप रही है। 
उसके बाद एक अस्वाभाविक शुष्क और भयावह स्वर में उसने पूछा, ‘वह क्या चीज है?’ 
माली के हाथ से कुदाल जमीन पर गिर पड़ा। 
जमीन की ओर ताकने पर मैंने जो कुछ देखा उसके फलस्वरूप भय, विस्मय और अविश्वास से मेरे चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। 
देखा, गड्‌ढे के अन्दर धूल से भरा हुआ दस-बारह इंच का एक सादा-समूचा नरकंकाल हाथ-पैर फैलाए चित पड़ा है।


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