रोज़ा पू (वयस्क कहानी) : जयंती रंगनाथन

  

Roza Poo : Jayanti Ranganajan ki Adult Kahani

नल खोलने की आवाज़ आयी, सर्ररर बाल्टी भरने लगा। दरवाज़ा आहिस्ते से खुला। कपड़े उतारने की हलकी-सी सरसराहट भरी आवाज़।

दो आँखें रौशनदान के पास बनी झिरी में टिक गयीं। रोज़ की तरह स्कूल जाने से पहले के सुनहरे पाँच मिनट।

उदास था बंटू। स्कूल का समय बदल गया है। अब उसे सुबह जल्दी जाना होगा। साढ़े छह बजे। सत्रह साल का बंटू पूरे रास्ते एक खाली टिन को पैरों से बजाते हाँफते हुए घर आया। सड़क के कोने में उसे पद्मा आंटी दिख गयीं। हँसकर पूछा, “क्यों रे, कल तेरे को इडली-सांभर भेजा था खाने को? पसन्द नहीं आया क्या?”

बंटू की साँस रुक गयी। पद्मा के साँवले चौकोर चेहरे पर पसीने की बूँदें चमक रही थीं। नीले रंग की चैक की साड़ी के आँचल से माथे को पोंछकर लापरवाही से आँचल उछाल पीछे फेंक दिया। पारदर्शी रुबिया ब्लाउज़ से लगभग बाहर को झलकता सफ़ेद अन्तःवस्त्र। नाक में झिलमिल करता हीरा, कानों में सोने के बड़े वाले कुण्डल, सीने पर झूमता हुआ भारी-सा मंगलसूत्र, गीले बालों में मोगरे का गजरा और पान से लाल हो आये होंठ, पद्मा को न जाने कितनी बार पास से, बहुत पास से, ध्यान से देख चुका था।

पद्मा कह रही थी, “बंटू, तेरा स्कूल टाइमिंग बदल गया क्या रे? तू कब्बी आता है, कब्बी जाता है, मालूमइच नहीं पड़ता…”

बंटू ने आँख उठाकर पद्मा की तरफ़ देखा, फिर थोड़ा सजग होकर बोला, “विकास…बंटू नहीं…” कहते हुए वह शरमाकर वहाँ से भाग गया।

रायपुर की उस गर्द से भरी कॉलोनी के पुराने से मकान में कम-से-कम तीस किरायेदार रहते थे, सबके घर आपस में सटे हुए, ऐसा लगता था एक ही घर के अलग-अलग हिस्से हों। बाक़ी घरों से कोई मतलब नहीं था बंटू का। पद्मा आंटी और श्रीनि अंकल सबसे अलग थे, अंकल से ज़्यादा आंटी, जो उसके सिर पर टपली मारते हुई कहती थीं, “आंटी नहीं बोलने का, मामी बोलने का मेरे को…”

मा…मी…पद्…मा…उसने अपनी इतिहास की कॉपी का पिछला पन्ना-भर रखा था इस नाम से। बॉलपेन से स्केच भी बनाया था। खुले लम्बे केश, केशों में लगा गजरा, चेहरे पर बड़ी-सी बिन्दी। गोल-गुदाज उघड़ा सीना, इसे बनाने में उसने ढेर सारा समय लगाया। शायद पूरी एक क्लास।

स्केच पूरी नहीं हो पाया। डर-सा लगा, उसने पेन और स्याही से स्केच को तहस-नहस कर डाला। पर काग़ज़ के उस टुकड़े को फेंकने की हिम्मत नहीं हुई। जब से स्कूल का समय बदला है, वह स्केच करके मन को मना लेता है। मन मानता नहीं, यह और बात है…

बंटू स्कूल से आने के बाद खाना खाकर कुछ देर टीवी देखता है, फिर ट्यूशन। लौटते-लौटते रात हो जाती है। पद्मा के घर के सामने दिया जल जाता है, अगरबत्ती की तीखी ख़ुश्बू तले मोगरे-सी आँखें झिलमिलाती हुई उसे कोंचने लगती हैं, “क्यों रे बंटू, आज क्या सीख कर आया रे?”

बंटू का मन होता है, सच कह दे। कम-से-कम एक बार। वह कुछ नहीं कहता, बस तिरछी नज़रों से देखता है और आँखें नीची कर अन्दर चला जाता है।

मेज़ पर रखी स्टील की कटोरी उसे मुँह-सा चिढ़ाती है। वह खोलकर देखता है, चने की दाल के वड़े, काबुली चने से बना चुण्डल, पनिहारम, जिनके ऊपर चटनी पाउडर और तिल का तेल होता है। वह कटोरी सरकाकर अन्दर चला जाता है। माँ कहती रहती हैं, पद्मा ख़ास तेरे लिए छोड़कर गयी है, खा ले।

बंटू नहीं खाता। घूमते-घामते माँ ही खा लेती हैं और बड़बड़ाते हुए कह भी देती हैं, “कितनी बार कहती हूँ पद्मा से, सरसों के तेल का इस्तेमाल कर। न, उसे बदबू आती है हमारे तेल से। उसका तेल जैसे बहुत ख़ुशबूदार है…तिल्ली का तेल…”

बंटू को पसन्द नहीं, माँ का पद्मा के बारे में कुछ भी कहना। जिस तेल को खाने से पद्मा के बाल इतने काले और सुन्दर हो सकते हैं, त्वचा इतनी कोमल और चिकनी हो सकती है, बदन इतना सेक्सी हो सकता है, उस तेल पर हज़ारों दूसरे तेल क़ुरबान…

रोज़ वाली कटोरी में आज कुछ नया था। सफ़ेद-सा। बंटू ने कटोरी हाथ में लेकर सूँघा। दूध और सेंवई की अनोखी-सी ख़ुश्बू थी। गाढ़ी-सी हलकी गुलाबी खीर, ऊपर पतले कतरे सूखे मेवे। बंटू ने दायें हाथ की छोटी उँगली को कटोरी में डुबोकर चाट लिया। किशमिशी मीठा-सा स्वाद।

माँ ने देख लिया, झिड़कती हुई बोलीं, “चटोरेपन से बाज न आयेगा। सही से चम्मच लेकर खा। दूसरे क्या खायेंगे तेरा जूठा?”

बंटू ने सिर उठाया, “आज किस ख़ुशी में खीर आ गयी?”

“पद्मा का जन्मदिन है…”

बंटू को झुरझुरी-सी हो आयी…जन्मदिन। वह जल्दी से घर से बाहर निकला। समझ नहीं आया क्या करे। ख़ुद ही ख़ुश होकर हिलकता रहा। जेब टटोलकर देखा, कुछ चिल्लर और पन्द्रह रुपये होंगे। क्या ले सकता है?

सड़क पार फूलों की दुकान थी। वह लपककर गया। उसने एक गुलदस्ते की तरफ़ इशारा करके पूछा-‘तीन सौ रुपये…’

बंटू मायूस हो गया। पास में पड़े गुलाब के गुच्छों की तरफ़ उसकी नज़र गयी। दुकानवाले ने बिना देखे कहा, ‘दस रुपये का एक गुलाब…’

बंटू ने एक खिला गुलाब हाथों में लिया। जेब में से खनकता हुआ एक दस का सिक्का निकालकर मेज़ पर रखा और तेज़ी से वहाँ से निकल गया।

रास्ते में रुककर उसने गुलाब की पंखुड़ियों को हलके हाथों से छुआ, अजीब-सी सिहरन हुई। अधखुले से पत्तों को सूँघने लगा, आँखों में चमक-सी आ गयी। उसने गुलाब की पत्तियों पर अपने होंठ लगाये। चेहरे पर मुस्कराहट-सी आ गयी।

पद्मा के घर के आगे चावल की बड़ी-सी रंगोली बनी थी। उसके ऊपर और आजू-बाजू जूते-चप्पलों का ढेर। बंटू ने हड़बड़ी में हवाई चप्पल उतारी, एक इधर-एक उधर। पद्मा उसे देखकर लपककर सामने आयी, “वा वा। गुड यू केम…”

कई अनदेखे चेहरे। असहज हो गया बंटू। उसने हाथ आगे कर गुलाब का फूल सामने कर दिया। पद्मा हँसने लगी, “ओहो, रोज़ा पू…”

बंटू पीछे की तरफ़ पलटा और एकदम से बाहर निकल गया। रात की रानी के झाड़ के पास खड़ा हो गया। रोज़ा…पू…रो…ज़ा…पू…

अच्छा नहीं लगा कुछ। पैर पटकते हुए वह घर आ गया। माँ घर का ताला लगा रही थी, ‘आज खाना पद्मा के घर पर है। जो देगी चुपचाप खा लेना।’

बंटू ने तुनककर कहा, “नहीं, मुझे नहीं जाना…”

माँ ने ताला खोल दिया, “अच्छा, कटोरदान में एकाध पराँठा रखा होगा। खा लेना। मैं थोड़ी देर में आऊँगी। पापा आयें, तो उनको भेज देना वहाँ। डोसा-पोसा कुछ खा लेंगे वहाँ…”

बंटू आकर बिस्तर पर गिर गया। रोज़ा…पू…मोबाइल में गूगल पर देखा, रोज़ा पू, यानी गुलाब का फूल। ओह…उठकर बैठ गया। खिड़की खुली थी। सामने दिख रहा था हल्ला-गुल्ला। पद्मा का भारी आवाज़ में ठहाका। उषा उथुप का गाना-डार्लिंग आँखों से आँखें चार करने दो-गा रही थी। तालियाँ, शोर।

बंटू ने आँखें बन्द कर लीं। अब उसके सामने थी नीले रंग की धर्मावरम साड़ी में पद्मा। धीरे-से पल्लू को कन्धे से सरकाती हुई। पसीने से तरबतर ब्लाउज़ के हुक खोलती हुई। साँवली, नंगी पीठ पर पानी की चमकती बूँदें। उन बूँदों को पीते अधीर अनगढ़ से होंठ। आहिस्ता से साड़ी ज़मीन पर गिर रही है। सलोनी-सी कमर, कमर के ठीक नीचे नाभि। होंठ अब वहाँ पहुँच गये हैं। होंठों के चूमने की गति बढ़ रही है। नीचे, नीचे और नीचे।

हाँफते-हाँफते बंटू ने आँखें खोल दीं। अजीब-सा अहसास। पसीने से तरबतर। उसने तकिये को अपने दोनों पाँव पर रखा और पैर सिकोड़कर लेट गया। रोज़ा…पू…

अगले दिन स्कूल से आते ही पद्मा ने उसे घेर लिया, “कल तू भाग क्यों गया था पार्टी से? नॉट गुड यू नो…”

बंटू ने धीरे-से कहा, “सिर में दर्द था…”

“मेरे को बोलता न। मैं मालिश कर देती। रेड ऑयल है मेरे पास, वेरी स्ट्रॉन्ग…”

बंटू बड़बड़ाया, “सॉरी,”

“परवाह नहीं। तुमने बताया नहीं, पायसम कैसा लगा? नारियल के दूध की स्पेशल खीर। डिड यू लाइक इट?”

बंटू ने सिर हिलाया।

“गुड, गुड। बचाकर रखा है थोड़ा, खायेगा?” पद्मा ने उसके बालों को हलका-सा सहलाकर पूछा।

बंटू ने पीछे हटने की कोशिश की। पद्मा हँसकर बोली, “तू कितना शरमाता है रे! तेरा ऐज का लड़का लोग क्या-क्या करता है, मालूम है तेरे को? बोल?”

पद्मा मिनट-भर में स्टील की कटोरी में खीर लेकर आ गयी। बंटू ने हलकी-सी मुस्कराहट दी और घर आ गया। माँ झुँझला गयी, “ये क्या ले आया कटोरी में? सब बचा-खुचा इधर सरका देती है पद्मा। पता है न कटोरी ख़ाली तो वापस नहीं जायेगी।”

बंटू ने माँ की बात जैसे सुनी ही नहीं। मेज़ पर पड़ा चम्मच उठाकर उसने पूरी खीर खा डाली। खीर का एक-एक क़तरा उसे भिगोता चला गया। पता नहीं था, खीर इतनी स्वादिष्ट भी होती है! दो-तीन दिन गुज़र गये। ट्यूशन से लौटकर आता तो मेज़ पर कटोरी नहीं दिखती थी। तीन दिन बाद माँ से पूछ ही लिया, “पद्मा आंटी नहीं दिख रहीं।”

माँ ने कहा, “तबीयत ठीक नहीं है बेचारी की।”

बंटू का मन बहुत कुछ पूछने का हो आया। माँ ने उसकी दिक्क़त दूर करते हुए अपने आप कह दिया, “मैंने टमाटर का सूप बनाया है, तू पद्मा को दे आयेगा? श्रीनि ऑफ़िस के काम से कहीं गया है। अकेली है, पूछ लेना कुछ और चाहिए तो?”

बंटू अजीब-सी सनसनी से भर गया। हाथ में सूप का बरतन पकड़े वह पद्मा के घर का दरवाज़ा खटखटाने लगा। काफ़ी देर बाद पद्मा ने दरवाज़ा खोला।

पद्मा नाइटी में थी। उतरी हुई शक्ल, भुस से बन गये बाल। बंटू ने भगौना आगे कर दिया। पद्मा ने खोलकर देखा और कहा, “सूप आ…? माँ ने भेजा है। गुड…”

बंटू दरवाज़े पर खड़ा रहा। पद्मा कमरे के अन्दर जाते हुए बोली, “उधर कायको खड़ा है? अन्दर आ…”

घर बेतरतीब-सा था। जगह-जगह कपड़े, अख़बार। सोफ़े के एक कोने पर जगह बनाकर बैठ गया बंटू। पद्मा एक कप में सूप डालकर ले आयी और सुड़ककर पीने लगी। दो घूँट पीने के बाद पूछा, “तू पियेगा?”

बंटू ने नहीं में सिर हिलाया। पद्मा आकर उसके सामने बैठ गयी। सूप पीने के बाद कप किनारे पर रखती हुई बोली, “दो दिन से फीवर उतरताइच नहीं है। देख तो अभी है कि नईं?” पद्मा ने अपना हाथ बंटू के हाथ में पकड़ा दिया। बंटू अनाड़ी की तरह हाथ अपने हाथ में लेकर बैठा रहा। पद्मा के शरीर से आँच-सी उठ रही थी। बंटू का शरीर गर्म होने लगा। अचानक उसने पद्मा का हाथ चूम लिया और तुरन्त उठ खड़ा हुआ और भागते हुए बाहर निकल गया।

घर जाते ही माँ ने सवाल किया, “कैसी है तबीयत उसकी? तू भगौना लेकर नहीं आया? अब कल वह फिर कुछ अल्लम-गल्लम बनाकर पकड़ा देगी…”

बंटू रुक गया, “ले आऊँ?”

“रहने दे। कल ख़ुद दे जायेगी। बुख़ार उतर गया न उसका?”

बंटू ने हाँ में सिर हिलाया। इस समय उसका दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। उसके होंठ लरज रहे थे, लग रहा था, हज़ारों-हज़ार सितारे होंठ पर आकर जम गये हों। कितना मुलायम था पद्मा का हाथ। कितना गुदगुदा।

रात को नींद नहीं आयी बंटू को। सपने में वह आती रही, कभी अपना हाथ आगे करती तो कभी खुले बालों की छतरी-सी बनाकर उसे ढँक लेती। उफ़…रोज़ा…पू…(गुलाब) की ख़ुशबू पहले तो ऐसी न थी!

सप्ताह-भर बाद मेज़ पर कटोरी नज़र आयी। इस बीच बंटू को मौक़ा ही नहीं मिला था पद्मा से मिलने का। फिर कुछ हिचकिचाहट-सी भी थी, पता नहीं क्या सोच रही होगी पद्मा उसके बारे में।

कटोरी में बूँदी के छोटे-छोटे लड्डू थे। बंटू ने एक उठाकर गप से मुँह में रख लिया। मिश्री भरे लड्डू। माँ ने किचन से झाँककर कहा, “कह रही थी पद्मा बंटू को ज़रूर खिला देना…”

बंटू की साँस थम-सी गयी। कुछ कह गयी क्या माँ से?

माँ ने मूली के पराँठे बनाये थे। बंटू को आवाज़ देकर कहा, “पद्मा का प्लेट रखा है टेबल के ऊपर। ये दो पराँठे उसे दे आ। गर्म-गर्म खा लेगी वो भी।”

बंटू ने प्लेट उठा लिया। जाने से पहले आईने के सामने खड़ा हो गया। हलकी-सी मसें भीगने लगी थीं। उसने बालों को हलका-सा पीछे की तरफ़ धकेला। टीशर्ट का कॉलर सही से किया। हथेली में थूक लगाकर चेहरे पर मल लिया।

पद्मा के घर की घण्टी बजाते समय अजीब-सा एक्साइटमेंट होने लगा। दरवाज़ा खुला। पद्मा सज-धजकर खड़ी थी। भारी-सी नीले रंग की जगमग साड़ी। चेहरे पर बड़ी-सी सिन्दूर वाली बिन्दी, बालों में गजरा।

बंटू ने प्लेट आगे किया।

पद्मा मुस्करायी, “लड्डू खाया तू? तेरी सद्बुद्धि के वास्ते पूजा करके लायी मैं अयप्पा टेम्पल से।’

बंटू समझा नहीं, “एक्ज़ाम के लिए?”

“अइयो, तेरा बुद्धि सही हो इसके लिए…” गम्भीर आवाज़ में बोली पद्मा।

बंटू अचकचाया, “ऐसे क्यों बोल रही हैं?”

“उस दिन तू क्या किया मेरे को? किस किया हाथ पे? मिसटेक न? तू मेरा बेटा जैसा…मैंने किसी को नहीं बोला, तू ऐसा किया करके…”

बंटू का चेहरा लाल हो गया। वो फौरन पलटकर अपने घर चला गया। ये पद्मा कौन-सी है? ये वो तो नहीं जो दिन-रात उसके अन्दर-बाहर रहती है। जो उसे न पढ़ने देती है न कुछ करने। पूरी-की-पूरी औरत, वो कह रही है उसने ग़लत किया। रोज़ा पू ग़लत कैसे हो सकता है?

वो अपने कमरे में जाकर थोड़ा रोया भी। खिड़की के पास खड़ा होकर देर तक पद्मा के घर की तरफ़ देखता रहा।

आने वाले कई दिनों तक वह उखड़ा-उखड़ा रहा। स्टेशन के पास भटकते हुए उसे दस पन्नों वाली किताबें दिख गयीं। चार-पाँच बार फेरी लगाने के बाद हिम्मत कर उसने ज़मीन पर दुकान फैलाकर बैठे आदमी से पूछ लिया, “कितने की है?”

आदमी की नज़रें कुटिल थीं। उसने ध्यान से हाँफते-काँपते बंटू की तरफ़ देखा और बोला, “पचास…”

बंटू ने जेब से मुड़ा-तुड़ा नोट निकालकर दे दिया।

“जो किताब चाहिए, चुन ले…”

बंटू ज़मीन पर बैठ गया। सेक्सी पड़ोसिन, बिन्नी का घाघरा, स्वीट जीजू, जालिम किरायेदारनी…उसने सेक्सी पड़ोसिन उठा ली। खड़ा हुआ। आदमी ने खीसें निपोरते हुए कहा, “चल एक और उठा ले…”

बिन्नी का घाघरा हाथ में आ गया। दोनों किताबें शर्ट के अन्दर रखकर वह तेज़ी से घर की तरफ़ बढ़ गया।

कोई कैसे उसके दिल की बात इतनी अच्छी तरह से समझ सकता है? वही कहानी। सन्तोष के पड़ोस में रहने वाली सविता भाभी। जब भैया नहीं होते, उसे घर बुलाती है। खाना खिलाती है, फिर…

बंटू की साँस रुक गयी। सन्तोष को सब मिल रहा है, भाभी मेहरबान है उस पर। सन्तोष चूम रहा है, खेल रहा है उसके जिस्म से, वह हँस रही है, गुदगुदा रही है, और…

बंटू ने किताब बन्द कर दी। बिन्नी का घाघरा तो और भी नशीला था। बंटू ने लम्बी साँस ली…

स्कूल से आने के बाद और रात को सोने से पहले वह ज़रूर पढ़ता दोनों किताबें। बहुत बाद में पता चला कि एक किताब की क़ीमत दस रुपये है। यहाँ भी वह लुट गया…

पद्मा पहले की तरह आती थी घर पर, उसके सिर पर हाथ भी फेर देती थी। वह झटक देता उसका हाथ…

ज़्यादा दिनों तक नहीं चला ये…ग्यारहवीं में फेल हो गया बंटू। माँ दुखी, पापा नाराज़। ट्यूशन में इतने पैसे लग गये। तय हुआ, अगले साल वो नये स्कूल में जायेगा, विषय बदल लेगा, गणित दिमाग़ में नहीं चढ़ता, न सही। कुछ और कर लेगा।

बंटू दुखी था, अपने आप से। सबसे मुँह छिपाकर घूमता। स्टेशन के आसपास। वहीं मिला था उसे केसू। होगा उसकी उम्र का, एकदम घाघ। दो दिन में उसने पता कर लिया कि बंटू को चाहिए क्या। बंटू ने कहा कुछ नहीं, पर केसू जैसे सब समझ गया।

तीसरे दिन वो उसे अपने स्कूटर पर बिठाकर साथ ले गया, धूल-मिट्टी, शोर, गन्दगी, पॉलीथिन और बदबू से पटे नाले, पतली गली के दोनों तरफ़ बनी कच्ची कॉलोनी। परदा पड़े एक घर के दरवाज़े के सामने स्कूटर रोक केसू ने उसे अन्दर चलने का इशारा किया।

सँकरा, काला, तीन दीवारों वाला कमरा। अन्दर जाते ही हवा की बदबूदार लहर ने बंटू का दिमाग़ भन्ना दिया। केसू ने हाथ पकड़कर उसे बिठाया और फुसफुसाते हुए पूछा, “अंटी में माल है?”

बंटू सकपकाया। एक सौ से कुछ ज़्यादा रुपये थे। केसू ने झपटकर सौ का पत्ता उठाते हुए उसकी तरफ़ देखकर आँख मारी और कमरे से बाहर निकल गया। झिरी से आती रोशनी में बंटू ने आँख मिचमिचाकर देखा। कोने में एक स्टूल पर एक लड़की-सी बैठी थी। स्कर्ट और ब्लाउज़ में। साफ़ दिखने लगा। पकी शक्ल की लड़की। उसकी तरफ़ देखकर लड़की ने आँख मारी, होंठ दबाया और अपना ब्लाउज़ खोलने लगी।

बंटू डर गया।

लड़की हँसने लगी। उसने ज़ोर की अँगड़ाई ली और इशारे से बंटू को अपने पास बुलाया। बंटू डरते-डरते गया। लपककर लड़की ने बंटू का एक हाथ अपने नग्न सीने पर रखा। बंटू को करंट मार गया। वह हाथ छुड़ाने लगा। लड़की उसे अपनी तरफ़ खींचने लगी।

लड़की के दिल की धड़कन उसे सुनाई पड़ रही थी। लड़की ने उसका हाथ अपने शरीर पर फिराना शुरू किया। स्कर्ट के ऊपर और बटन खोलकर नीचे।

बंटू पसीना-पसीना हो गया। अब लड़की का एक हाथ बंटू की कमर के नीचे सरकने लगा। पैरों के बीच जींस को वह ऊपर से टटोलने लगी। बंटू कसमसाया।

लड़की की हरकतें बढ़ने लगीं। बंटू ने आँख बन्द कर सेक्सी पड़ोसिन को ज़ेहन में लाने की कोशिश की, उसकी नसें तनने लगीं। ज़ुबाँ शुष्क होने लगी। ये वो नहीं है…

एक झटके में वो उठा, लड़की के हाथों से ज़बरदस्ती अपने को छुड़ाया और दरवाज़ा खोलकर बाहर निकल गया। इस समय पेट में जबरदस्त उबाल था, दिमाग़ और मुँह कसैला-सा हो रहा था। दरवाज़े के सामने स्कूटी पर केसू बैठा था। उसने बंटू को आवाज़ दी। बंटू ने नहीं सुना, वह दौड़ता हुआ गली पार कर बाहर निकल गया।

उस दिन रात को बंटू ने पापा से कहा, “मुझे ग्यारहवीं रायपुर से नहीं करनी। मुझे कहीं और भेज दो।”

सोच-समझकर पापा ने जबलपुर का नाम लिया-बुआ के घर। बंटू सुबह-सुबह बिना किसी से मिले जबलपुर चला गया।

विकास दिल्ली यूनिवर्सिटी से पढ़ाई पूरी करके घर लौट रहा था। पापा का कहना था, उनके बिज़नेस में हाथ बँटाये। माँ का रोना, घर लौट आ, पाँच साल हो गये तुझे घर से दूर गये। दिल्ली स्टेशन पर गर्लफ्रेंड निम्मी के बालों में हाथ फेरकर उसके गाल पर चुम्मा लेते हुए विकास ने कहा, “बेबी, डोंट वरी, मैं आ जाऊँगा, जल्दी।”

निम्मी रुआँसी होकर बोली, “तुम्हारे डैड तुम्हें न जाने दें तो?”

“तुम नया बॉयफ्रेंड ढूँढ़ लेना…”

निम्मी उसकी पीठ पर मुक्का मारने लगी। विकास हँसने लगा।

पापा ने पिछले साल रायपुर की नयी बनी समता कॉलोनी में अपना दोमंज़िला घर बना लिया था। पापा का बिज़नेस अच्छा चल रहा था। घर में गाड़ी आ गयी थी, एसी आ गया था। दो दिन आराम करने के बाद विकास पापा की नयी गाड़ी में तफ़री करने निकला। चलते समय माँ ने कहा, “तू अगर शहर की तरफ़ जा रहा है तो एक काम करेगा? पुराने घर में सिलबट्टा रखा है, लेता आयेगा?”

घूमते-घूमते रात हो गयी। अपना पुराना इलाक़ा पहचान में ही नहीं आया। मकान कुछ और पुराना हो गया था। जर्जर-सी दीवारें, सड़क के नाम पर उखड़े हुए पत्थर। किसी तरह वो गाड़ी मकान के सामने लेकर आया। धूल में लिपटा ताला खोल वह अन्दर गया। यक़ीन नहीं हुआ कि यह घर इतना छोटा था। उसने घूम-घाम कर देखा। पीछे का दरवाज़ा खोला। बाहर निकलते ही पड़ोस के घर के बाथरूम की खिड़की दिख गयी। उसके होंठों पर मुस्कराहट आ गयी। उसने खिड़की के बन्द पड़े पट को हलका-सा खोला, आँखों को यक़ीन नहीं हुआ। कभी यहाँ उसे स्वर्ग नज़र आता था। अब दीवारें बासी-सी, सीलन से भरी, नल से चूता पानी, दोरंगा हुआ बकेट। ज़मीन पर पड़े ढेर सारे अनधुले, भीगे कपड़े।

उसने निगाह फेर ली। सिलबट्टा उठाकर वह बाहर निकला। ताला लगाते-लगाते निगाह पड़ोस पर पड़ी। दरवाज़ा खुला था। सिलबट्टा गाड़ी में रखकर वह पड़ोस के दरवाज़े के सामने रुक गया और हलके हाथों से दस्तक देने लगा। अन्दर से आवाज़ आयी, भारी-सी, पहचानी-सी, “कौन है?”

एक सेकेंड के लिए विकास के दिल की धड़कन रुक गयी। क्या वो उसे पहचानेगी?

दरवाज़े पर पद्मा आयी। विकास दो क़दम पीछे हट गया। वही थी…वैसी ही थी…बालों में हलकी-सी सफ़ेदी झलक रही थी, जूड़े में मोगरे का गजरा। आँखों के नीचे ज़रा-सा कालापन था, गहरे काजल भरी वही दपदपाती आँखें। वैसा ही मुलायम चेहरा। नीले रंग की साउथ कॉटन साड़ी से वही भीनी-भीनी ख़ुश्बू आ रही थी।

विकास के दिल की धड़कन तेज़ हो गयी। क्या वह पहचान पायेगी? जिम से बना गठीला बदन, चेहरे पर खुरदरी-सी दाढ़ी, आँखों पर चश्मा…

पद्मा की आँखें उस पर टिक गयीं। रुककर उसने पूछा, “यस? कौन माँगता है?”

विकास ने बुदबुदाते हुए कहा, “यहाँ एक लड़का रहता था, बंटू …”

पद्मा की आँखें चमकने लगीं। कुछ भर-सा आया उन आँखों में। आँखों के साथ-साथ होंठ मुस्कराने लगे। पद्मा कुछ कह रही थी। विकास को सुनाई नहीं पड़ा। विकास पीछे मुड़कर गाड़ी की तरफ़ चलते हुए धीरे से बोला, “रोज़ा…पू…”