प्रोफेसर हिजबिजबिज : सत्यजित राय की कहानी

 

Professor Hijibijbij Kahani in Hindi | Satyajit Ray ki Kahaniya


मेरे साथ जो घटना घटी है, उस पर शायद ही कोई विश्वास करे। अपनी आँखों से देखे बिना बहुतेरे आदमी बहुत-सी बातों पर विश्वास नहीं करते। जैसे भूत। इतना जरूर है कि मैं भूत-प्रेत की कहानी लिखने नहीं बैठा हूँ। सच कहने में हर्ज ही क्या, इसे किस तरह की घटना कहूँ, यह बात खुद मैं ही नहीं जानता।
 मगर घटना घटी है और घटी है मेरे जीवन में ही। इसीलिए इसमें सचाई है और उसके सम्बन्ध में लिखना भी स्वाभाविक है।

पहले ही बता दूँ कि जिसके कारण यह घटना घटी थी, उसका असली नाम मुझे नहीं मालूम। उसने बताया था कि उसका कोई नाम है ही नहीं। इतना ही नहीं, नाम के बारे में उसने छोटा-मोटा एक भाषण भी दे डाला था— 
“नाम से क्या आता-जाता है साहब? किसी जमाने में मेरा कोई नाम था। अब उसकी ज़रूरत नहीं है, इसलिए उसको मैंने त्याग दिया है। आप चूंकि आए, बातचीत की, अपना नाम बताया, इसीलिए नाम का प्रश्न उठता है। यों यहाँ कोई नहीं आता, और न आने का मतलब है कि कोई मुझे नाम लेकर नहीं पुकारता है। जान-पहचान का कोई आदमी है ही नहीं, किसी से खत-किताबत नहीं। अखबारों में रचना नहीं छपवाता हूँ, बैंक के चेक पर दस्तखत नहीं करना पड़ता है-फलस्वरूप नाम का कोई प्रश्न खड़ा होता ही नहीं। एक नौकर है, मगर वह भी गूँगा। गूँगा न होता तो भी वह मेरा नाम लेकर मुझे नहीं पुकारता; बल्कि मुझे ‘बाबू’ कहता। बस बात खत्म। अब सवाल यह पैदा होता है कि आप मुझे क्या कहकर पुकारिएगा। आप इसी पर सोच रहे हैं न?”... 
अन्तत: तय पाया कि मैं उन्हें प्रोफेसर हिजबिजबिज कहकर पुकारूँ। ऐसा क्यों हुआ, यह बात मैं बाद में बताऊँगा। पहले ज़रूरी है कि शुरू की कुछ बातें बता दूँ। 

घटना गोपालपुर में घटी थी। उड़ीसा के गंजम जिले के बरहमपुर स्टेशन से दस मील दूर समुद्र के किनारे गोपालपुर नामक एक छोटा शहर है। पिछले तीन सालों से दफ्तर से छुट्‌टी नहीं मिल रही थी, क्योंकि काम का दबाव बहुत ज्यादा था। इस बार तीन सप्ताह की छुट्‌टी लेकर तय किया कि इस अनदेखी, परन्तु नाम से परिचित, जगह में जाऊँगा। दफ्तर के कामों के अलावा मैं एक और काम करता हूँ और वह है अनुवाद का काम। आज तक मेरे द्वारा अंग्रेजी से बंगला में अनुवादित सात जासूसी उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। प्रकाशक का कहना है कि उन उपन्यासों की खपत काफी तादाद में हो रही है। बहुत-कुछ उसी के दबाव के कारण मुझे छुट्‌टी लेनी पड़ी। इन तीन सप्ताहों के बीच एक पूरी किताब के अनुवाद का कार्य-भार मेरे कंधे पर है। 

इसके पहले मैं कभी गोपालपुर नहीं आया था। जगह का चुनाव अच्छा हुआ है, इसका पता मुझे पहले दिन ही चल गया। इतने एकान्त और मनोरम स्थान इसके पहले मैंने बहुत ही कम देखे हैं। एकान्त होने का एक दूसरा ही कारण है। यह अप्रैल का महीना है, अप्रैल सैलानियों के आने का मौसम नहीं होता। वायु-परिवर्तन के लिए आने वाले लोगों का झुँड अभी यहाँ नहीं पहुँचा है। मैं जिस होटल में आकर टिका हूँ वहाँ मेरे अतिरिक्त और एक व्यक्ति है—एक वृद्ध आर्मेनियम—नाम मिस्टर ऐराटुन। वे होटल के पश्चिमी छोर के एक कमरे में रहते हैं और मैं पूर्वी छोर के एक दूसरे कमरे में। होटल के लंबे बरामदे के ठीक नीचे से ही रेतीला मैदान शुरू हो जाता है। एक सौ गज की दूरी में फैली रेत पर समुद्र की लहरें आकर पछाड़ खाती रहती हैं। लाल केकड़े बीच-बीच में बरामदे पर चढ़कर चहल-कदमी करते रहते हैं। मैं डेक चेयर पर बैठा-बैठा दृश्यावलोकन और लेखन का कार्य करता रहता हूँ। शाम के वक्त दो घंटे के लिए काम करना बंद कर देता हूँ और रेत पर चहल-कदमी करने के लिए निकल जाता हूँ। 

शुरू में दो दिन समुद्र के किनारे से होता हुआ मैं पच्छिम की ओर गया; तीसरे दिन सोचा, पूरब की तरफ़ भी जाना ज़रूरी है। रेत पर पुराने ज़माने के टूटे-फूटे घर अजीब जैसे दीखते हैं। मिस्टर ऐराटुन ने बताया था कि ये घर तीन-चार सौ साल पुराने हैं। किसी जमाने में गोपालपुर डचों की चौकी था। इन मकानों में से ज्यादातर उसी जमाने के हैं। दीवार की ईंटें चिपटी और छोटी-छोटी हैं, दरवाजे और खिड़कियों के स्थान पर सिर्फ दरारें रह गई हैं और छत के नाम पर छावनी के बजाय खुली जगह ही ज्यादा है। मैंने एक घर के अन्दर घुसकर देखा और वहाँ सन्नाटे का आलम पाया। 

पूरब की तरफ़ कुछ दूर जाने पर देखा, एक जगह रेतीला भाग काफ़ी चौड़ा है, इसके फलस्वरूप शहर बहुत पीछे छूट गया है। करीब-करीब पूरी जगह लगभग सौ तिरछी पड़ी नावों से भरी हुई है। समझ गया कि मछुआरे इन्हीं नावों को लेकर समुद्र में मछली पकड़ने निकलते हैं। देखा, मछुआरे जहाँ-तहाँ जमा होकर अड्‌डेबाजी कर रहे हैं, उनके बच्चे पानी के पास जाकर केकड़े पकड़ रहे हैं, चार-पाँच सूअर इधर-उधर चक्कर लगा रहे हैं। 

इसी बीच एक उलटी पड़ी नाव पर दो बंगाली सज्जन बैठे हुए नजर आए। एक आदमी की आँखों पर चश्मा है। वे अपने हाथ में पड़े अखबार को हवा के झोंके के बीच मोड़ने में परेशानी का अनुभव कर रहे हैं। दूसरे सज्जन अपने हाथों को छाती के पास रखकर अपलक समुद्र की ओर देखते हुए बीड़ी का कश ले रहे हैं। मैं ज्योंही उनके निकट पहुंचा, अखबारवाले सज्जन ने परिचय प्राप्त करने की मुद्रा में पूछा, ‘आप यहां नये-नये आए हैं?’ 
‘हां...दो दिन...’ 
‘साहबी होटल में टिके हैं?’ 
मैंने मुस्कराकर कहा, ‘आप लोग यहीं रहते हैं?’ 
अब वे अखबार को संभालने में सफल हो गए। बोले, ‘ मैं यहीं रहता हूँ। छब्बीस बरसों से गोपालपुर में ही। ‘न्यू बेंगॉली मेरा ही होटल है। तब हाँ, घनश्याम बाबू आपकी ही तरह चेंज में आए हैं।’ 
मैंने कहा ‘अच्छा’ और बातचीत का सिलसिला खत्म कर आगे बढ़ने लगा, तभी भला आदमी एक दूसरा ही सवाल पूछ बैठा, ‘उधर कहाँ जा रहे हैं?’ 
यूँ ही, ज़रा घूमूँगा और क्या? 
क्यों?’ 
भारी मुसीबत में फँसा! क्यों? जा रहा हूँ, यह भी उनसे कहना होगा? तब तक वे खड़े हो चुके थे। रोशनी आहिस्ता-आहिस्ता फीकी पड़ती जा रही है। आसमान के उत्तरी-पश्चिमी हिस्से में मेघ का एक स्याह चकत्ता आहिस्ता-आहिस्ता फैलाता जा रहा। आँधी आएगी क्या? 
भले आदमी ने कहा, ‘एकाध साल पहले कुछ कहा नहीं जा सकता था। उस समय ऐसी हालत थी कि जहां मर्जी हो, आदमी घूम-फिर सकता था। पिछले सितंबर से पूरब की तरफ, मछुआरों की बस्ती से एकाध मील दूर, एक आदमी डेरा-डंडी डाले बैठ गया है। इन टूटे-फूटे मकानों को देख रहे हैं न, ठीक वैसा ही एक मकान है। मैंने उस मकान को नहीं देखा है। यहाँ के पोस्टमास्टर महापात्र ने बताया कि उसने देखा है।’ 
मैंने कहा, ‘साधु-संन्यासी टाइप के आदमी हैं क्या?’ 
‘बिल्कुल नहीं।’ 
‘फिर?’ 
‘वे क्या हैं, मालूम नहीं। महापात्र ने बताया है कि मकान के टूटे-फूटे हिस्से को तिरपाल से ढँक रखा है। अन्दर क्या करते हैं, किसी को भी इसका पता नहीं। तब हां, छत के एक छेद से बैंगनी रंग का घुंआ निकलता हुआ दिखाई पड़ा है। मकान मैंने नहीं देखा है, लेकिन उस आदमी को दो बार देख चुका हूँ। मैं इसी जगह बैठा हुआ था और वह मेरे सामने से पैदल जा रहा था। हरदिया कोट-पतलून पहने था। दाढ़ी-मूंछ नहीं हैं, लेकिन सिर पर घने बाल हैं। चहलकदमी करता हुआ मन ही मन कुछ बुड़बुड़ा रहा था। यहां तक कि कई बार ज़ोरों से हँसते हुए भी देखा। मैंने बातें कीं मगर उसने जवाव नहीं दिया। या तो अभद्र है या फिर पागल। शायद अभद्र और पागल दोनों। उसके पास एक नौकर भी है। वह सवेरे के वक्त बाजार में दिखाई पड़ता है। इतना हट्टा-कट्टा कोई दूसरा आदमी मैंने नहीं देखा है, साहब। उसके सिर के बाल छोटे-छोटे हैं, लंबा-चौड़ा चेहरा। बहुत-कुछ इस सूअर के जैसा। या तो वह गूंगा है या फिर मुंह बन्द किए रहता है। सामान खरीदने के समय भी जबान से शब्द नहीं निकालता है। दुकानदार को हाथ के इशारे से बता देता है। मालिक चाहे जैसा हो, लेकिन वैसा नौकर जिस घर में है, वहाँ न जाना क्या अक्लमंदी का काम नहीं है?’ 
घनश्याम बाबू भी तब तक उठकर खड़े हो चुके थे। बीड़ी को रेत पर फेंक कर बोले, ‘चलिए साहब।’ दोनों आदमी जब होटल की ओर रवाना होने लगे तो मैनेजर बाबू ने बताया कि उनका नाम राधा विनोद चाटुर्ज्यो हैं। इसके साथ ही उन्होंने अपने होटल में आने का अनुरोध भी किया। 
जासूसी उपन्यासों का अनुवाद करते-करते रहस्य के प्रति मेरे मन में जो एक स्वाभाविक आकर्षण पैदा हो गया है, यह बात ‘न्यू बेंगॉली होटल’ के मैनेजर साहब को मालूम नहीं थी। मैंने घर लौटने की बात सोची ही नहीं, बल्कि पूरब की तरफ ही बढ़ता गया। 

अभी भाटे का समय है। समुद्र का पानी पीछे की ओर चला गया है। ज्वार भी बहुत ही कम आ रहे हैं। किनारे के जिस स्थान पर लहरें झाग उगल रही हैं, वहाँ कुछ कौवे फुदक रहे हैं, फेनों का अम्बार सरसराता हुआ आगे बढ़ता है और फिर पीछे हट जाता है। उसके तुरंत बाद फेन के बुदबुदों को चोंच मारकर कौवे जैसे कुछ चीज खाने लगते हैं। मछुआरों के गाँव को पार करने के बाद लगभग दस मिनटों तक मैं आगे की ओर चलता गया। भीगे रेत पर एक चलती हुई लाल चादर देखकर शुरू में मैं अचकचा उठा। निकट जाने पर पता चला कि यह केकड़ों का एक दल है जो पानी हट जाने के कारण झुँड बनाकर अपने निवास-स्थान की ओर लौटा जा रहा है। 

और पांच मिनटों तक चलने के बाद उस मकान पर नज़र पड़ी। तिरपाल के घेरे की बात पहले सुन चुका था, इसलिए पहचानने में असुविधा नहीं हुई। लेकिन निकट जाने पर देखा, वहां सिर्फ तिरपाल ही नहीं है-बांस, लकड़ी के तख्ते, जंग लगा कॉरगेटेड टीन, यहां तक कि पेस्ट बोर्ड के टुकड़े भी मकान की मरम्मत के काम में लाए गए हैं। देखकर लगा, अगर छत को भेदकर बरसात का पानी अंदर नहीं गिरता है तो किसी आदमी के लिए इस मकान में रहना असंभव नहीं है। मगर वह आदमी है कहाँ? 
कुछ देर तक वहां खड़े रहने के बाद मुझे लगा, वह आदमी अगर अधपगला है और उसके पास सचमुच ही एक विशालकाय नौकर है, तो मैं जिस तीव्र कौतूहल के साथ इस मकान की ओर देख रहा हूँ मेरा यह देखना बुद्धिमानी का काम नहीं है। इससे तो अच्छा यही होगा कि यहाँ से थोड़ी दूर हटकर अनमनेपन के साथ चहल-कदमी करता रहूँ। इतनी दूर जब आ ही चुका हूँ तो फिर उसे बिना देखे कैसे चला जाऊँ? 

मैं यह सब सोच ही रहा था कि एकाएक ऐसा लगा जैसे घर के सामने के दरवाजे की दरार के पीछे अँधेरे में कोई चीज हिल-डुल रही है। उसके बाद एक नाटा जैसा आदमी बाहर आया। यह समझने में देर नहीं लगी कि यही आदमी इस मकान का मालिक है। और यही अँधेरे से फायदा उठाकर कुछ देर से मुझ पर निगरानी रख रहा था। 
‘आपके हाथ में छह उँगलियाँ देख रहा हूँ! हीं-हीं!’ अचानक महीन आवाज़ सुनाई दी। 
बात सही है। मेरे हाथ में अँगूठे के पास एक ज़्यादा उँगली मेरे जन्म से ही है और जिससे मैं कोई काम नहीं लेता हूँ। लेकिन इस आदमी ने इतनी दूर से इसे कैसे देख लिया? 
जब वह बिल्कुल पास चला आया तो देखा, उसके हाथ में पुराने ज़माने की एक आँख से देखी जाने वाली दूरबीन है और उसीसे वह बेझिझक मेरा अध्ययन कर रहा था। 
‘दूसरी उंगली अवश्य ही अंगूठा है। है न? हीं-हीं।’ 
इस आदमी के गले की आवाज़ अत्यन्त महीन है। इतनी उम्र के किसी आदमी की आवाज़ इस तरह की मैंने कभी सुनी नहीं थी। 

‘आइए बाहर क्यों खड़े हैं?’ 
उसकी बात सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ। राधाविनोद बाबू की बातों से इस आदमी के बारे में मैंने कुछ और ही धारणा बनाई थी। लेकिन अब देखने में आया कि बहुत ही खुशमिजाज़ है और व्यवहार में अत्यन्त शालीन। 
अभी वह मुझसे दसेक हाथ की दूरी पर है। शाम के धुंधलके में उसे साफ-साफ देख नहीं पा रहा था, हालांकि देखने की इच्छा प्रबल थी। इसीलिए उसके अनुरोध को ठुकराया नहीं। 
‘ज़रा सावधानी से, आप लम्बे आदमी हैं और मेरा दरवाजा छोटा’... 

झुककर अपने सिर को बचाते हुए मैंने उसके निवासस्थान में प्रवेश किया। एक पुरानी सोंधी गंध के साथ समुद्र की नमी से भरी एक गंध तथा एक अजनबी गंध मिल-जुलकर इस पंचमेली पैबन्ददार मकान से सामंजस्य स्थापित कर रही है। 
‘बायीं तरफ आइए। दाहिनी तरफ मेरा-हें-हें-काम का घर है।’ 
दाहिनी तरफ से दरवाजे की दरार की ओर देखा, वह लकड़ी के एक बड़े तख्ते से मजबूती से बन्द था। हम बायीं तरफ की कोठरी के अन्दर चले आए। इसे बैठक कहा जा सकता है। एक कोने में, लकड़ी की एक मेज पर कुछ मोटी कापियाँ, तीन कलमें, दवात, गोंद की शीशी और एक कैंची, पड़ी हुई हैं। मेज के सामने एक जंग-लगी टीन की कुर्सी। एक किनारे उलट कर रखा हुआ एक पैकिंग केस और कोठरी के बीचोंबीच एक विशाल कुर्सी। इस आखिरी असबाब को किसी राजमहल की बैठक में रहना चाहिए था। कीमती लकड़ी पर बहुत ही खूबसूरत नक्काशी है, बैठने की जगह पर गाढ़े लाल रंग की मखमल है जिस पर बेलबूटे कड़े हैं। 
“आप इस बक्से पर बैठ जाइए, मैं कुर्सी पर बैठता हूँ। 
बस, यहीं से मन में खटका पैदा हुआ। यह आदमी अगर घनघोर पागल नहीं है तो कम-से-कम बेहूदा और खामखयाली तो अवश्य ही है। ऐसा न हो तो कहीं एक बाहरी आदमी को अपने घर के अन्दर बुलाकर पैकिंग के बक्से पर बिठाए और खुद सिंहासन पर विराजमान हो जाए? 
लेकिन खिड़की के तिरपाल की फाँक से आती हुई शाम की रोशनी में उसकी आँखों में पागलपन की कोई निशानी नहीं दीख रही है। बल्कि बच्चे के जैसा खुशी का एक भाव तैर रहा है। और इसी से उस आदमी के बेहूदगी से भरे अनुरोध के बावजूद उसके चेहरे पर विरक्ति की छाप नहीं पड़ी है। मैं पैकिंग केस पर बैठ गया। 
“कहिए।” उसने कहा। 
क्या कहूँ? दरअसल मैं कुछ कहने नहीं आया हूँ, सिर्फ देखने ही आया हूँ, इसलिए जब उसने चट से ‘कहिए’ कहा तो मैं मुश्किल में पड़ गया। अन्तत: जब कोई दूसरा विचार मन में नहीं आया तो मैंने अपना परिचय ही दे डाला— 
‘मैं छुट्टियों में कलकत्ते से आया हूँ! मैं यानी कहने का मतलब है कि लेखक हूँ। मेरा नाम है हिमांशु चौधरी। इस ओर घूमने आया था कि आपके मकान पर नज़र पड़ गई’ ... 
‘ठीक है, ठीक है। परिचय प्राप्त कर खुशी हुई। तब हाँ, मेरा कोई नाम नहीं है।’ 

फिर संदेहजनक बात! हर आदमी का कुछ न कुछ नाम होता ही है। फिर इसे अपवाद क्यों मान लिया जाए? यह पूछते ही भले आदमी ने नाम के बारे में एक भाषण दे डाला। इसका दौर जब समाप्त हुआ तो मुझे खामोश पाकर वह मुस्कराता हुआ बोला, ‘मेरी बातें शायद आपके मन को नहीं भाईं। फिर आपसे एक बात कहूँ, मैंने मन ही मन अपना एक नाम रख छोड़ा है। इतना ज़रूर है कि यह नाम किसी से बताया नहीं है, मगर आपकी चूंकि छह उँगलियाँ हैं, इसलिए आपसे बताने में कोई हर्ज़ नहीं।’ 
भले आदमी की ओर निहारता रहा। कमरे की रोशनी धीरे-धीरे कम होती जा रही है। नौकर क्यों नहीं दिखाई पड़ रहा है? कम से कम मोमबत्ती या मिट्टी के तेल की कोई ढिबरी इस समय तो रखनी ही चाहिए थी। 
भले आदमी ने अपना सिर घुमाकर कहा, ‘आपने मेरे कानों को ध्यान से देखा है?’ 
अब तक मैंने ध्यान नहीं दिया था, ‘अब आंखें उस ओर गईं तो चौंक पड़ा। 
आदमी के इस तरह के कान मैंने कभी नहीं देखे थे। ऊपर का हिस्सा गोल के बजाय नुकीला है-ठीक उसी तरह जिस तरह कि सियार-कुत्ते के हुआ करते हैं। ऐसा क्यों हुआ? 
कान दिखाने के बाद वह मेरी ओर घूमा और एक अजीब हरकत कर बैठा। अपने सिर के बालों को एक बार जोरों से झटक दिया। नतीजा यह हुआ कि बाल खुलकर हाथ में आ गए। मैंने आश्चर्य में आकर देखा-चांद और कनपटी के अलावा कहीं बालों का नामोनिशान नहीं है। इस नये चेहरे और झलकती हुई आंखो में शरारत-भरी हंसी देखकर मेरे मुँह से अनायास एक नाम निकल पड़ा— “हिजबिजबिज।” 
‘इग्जैक्टली।’ भले आदमी ने तालियाँ बजाईं और खिलखिलाकर हँस पड़ा, ‘आप चाहें तो तसवीर से मिलाकर देख सकते हैं।’ 
‘ज़रूरत नहीं है,’ मैंने कहा, हिजबिजबिज का चेहरा बचपन से ही मन में बना हुआ है।’ 
‘ठीक है! आप चाहे तो स्वच्छंदतापूर्वक इस नाम को उपयोग में ला सकते हैं। अगर नाम के आगे ‘प्रोफेसर’ शब्द जोड़ दें तो और अच्छा रहे। तब हाँ, यह बात किसी से बताइएगा नहीं। अगर बता दिया तो हें-हें-हें...’ 
अब पहले-पहल मुझे तनिक भय का अहसास हुआ। यह आदमी निःसंदेह पागल है या फिर बेहूदे किस्म का सनकी। ऐसे लोगों को बर्दाश्त करना मुश्किल है। हर वक्त यही सोच कर तटस्थ रहना पड़ता है कि क्या करूँ, क्या नहीं करूँ, क्या बोलूँ, क्या नहीं बोलूँ। 

हम दोनों एक साथ चुपचाप रहें, यह भी अच्छा नहीं लग रहा था। इसीलिए मैंने कहा, ‘आपके कान के नुकीले हिस्से का रंग कुछ दूसरी ही तरह का दीखता है।’ 
‘यह तो होगा ही’, उस आदमी ने कहा, ‘वह मेरा अपना नहीं है। जन्म के समय मेरे कान इस तरह के नहीं थे।’ 
‘फिर क्या आपके कान भी आपके बालों की ही तरह नकली हैं? खींचते ही खुल जाएँगे?’ 
भले आदमी ने उसी तरह खिलखिलाकर कहा, ‘बिलकुल नहीं। नहीं, नहीं, नहीं।’ 
हाँ, यह आदमी ज़रूर ही पागल है। ‘फिर वह क्या चीज है?’ मैंने पूछा। 
‘ठहरिए। पहले अपने नौकर से आपका परिचय करा दूँ। उसे भी शायद आप पहचान लेंगे।’ 
अब तक मैंने ध्यान नहीं दिया था। पता नहीं कब एक दूसरा आदमी पीछे के दरवाजे से वहां आकर खड़ा हो गया था। उसके हाथ में मिट्टी के तेल की एक ढिबरी थी। यह वही नौकर है जिसके बारे में राधाविनोद बाबू ने बताया था। 
भले आदमी ने जब ताली बजाई तो वह कमरे के अन्दर चला आया और मिट्टी के तेल की ढिबरी मेज पर रख दी। वास्तव में इस तरह का विशालकाय आदमी मैंने देखा हो, ऐसा याद नहीं आता। उस आदमी के बदन पर एक धारीदार फतूही है और वह छोटे पनहे की धोती पहने है। पाँव और हाथ की मांस-पेशियाँ, कलाई का घेरा, सीना और गरदन की चौड़ाई देखकर स्तंभित रह जाना पड़ता है। हालांकि उस आदमी की लंबाई पाँच फीट और दो या तीन इंच से अधिक न होगी। 
‘मेरे नौकर को देखकर आपको किसी की बात याद आ रही है क्या?’ हिजबिजबिज ने पूछा। 
वह ढिबरी रखकर अपने मालिक के आदेश का इन्तजार कर रहा है। एकाध पल उसकी ओर देखने के बाद उसके चेहरे के सादृश्य का याद आ गया। मैंने अवाक् होकर कहा, ‘अरे यह तो षष्ठिचरण है।’ 
“आपने बिलकुल सही बात कही।’ भला आदमी खुशियों के मारे बैठे-बैठे ही नाचने लगा। 
‘खेल-खेल में षष्ठिचरण जी लोक रहे हाथी को क्षण-क्षण 
वजन देह का उनसठ मन है, लोहे जैसा सख्त गठन है...’ 
“इतना ज़रूर है कि उसका वजन उनसठ मन नहीं, बल्कि साढ़े तीन मन से कुछ ज्यादा होगा। कम-से-कम उन्नीस सौ सड़सठ में इतना ही था। हाथी लोकने की बात तो मालूम नहीं, तब इतना ज़रूर है कि वह हर रोज़ सबेरे दो बड़े-बड़े सूअरों को पकड़कर लोकता रहता है, यह घटना मैं अपनी आँखों से देख चुका हूँ। मेरी यह जो कुरसी है, उसे भी वह एक ही हाथ से उठाकर ले आया है।” 
“कहाँ से?” 
“हीं-हीं-हीं, यह बात मत पूछिए। जाओ षष्ठि, हम लोगों के लिए दो डाब ले आओ।” 
षष्टि आदेश-पालन के लिए चला गया। 
बाहर बादल गरज रहे हैं। हवा के एक तेज झोंके से तिरपाल खड़खड़ाने लगे। 
अब अगर यहाँ से उठकर नहीं जाता हूँ तो मुसीबत में फँसना होगा। 
‘आप मेरे कान के बारे में पूछ रहे थे न?’ भले आदमी ने कहा, ‘असल में वे बनबिलाव के कान और ऑरिजनल कान को मिलाकर बनाये गये हैं।’ 
उसकी बात पर मुझे हँसी आ गई। मैंने पूछा, ‘उन्हें मिलाया कैसे?’ 
भलेमानस ने कहा, ‘क्यों, इसमें आश्चर्य की कौन-सी बात है? एक आदमी का दिल जब दूसरे आदमी में बिठा दिया जाता है, तो जानवर के आधे कान को आदमी के कान के ऊपर नहीं बिठाया जा सकता?’ 
‘‘आप शुरू में क्या डाक्टरी करते थे? प्लास्टिक सर्जरी टाइप का कुछ?” 
‘‘बात तो सही है। करता नहीं था, बल्कि अब भी करता हूँ, हीं-हीं-हीं। तब हाँ, वह सर्जरी कोई मामूली नहीं है। मसलन आप अपने अंगूठे को ही लें—अगर वह नहीं होता तो ज़रूरत पड़ने पर उसे लगा देना मेरे लिए बिलकुल आसान काम था।” 
मैंने बहुत कोशिश की कि उस आदमी की कल्पना एक बड़े डाक्टर के रूप में करूं, परन्तु सफलता नहीं मिली। हालांकि कानों की ओर ताकने पर सचमुच वे बहुत ही अजीब जैसे लग रहे थे। किस सफाई से जोड़ लिया है कि कुछ मालूम ही नहीं होता। 

भले आदमी ने कहा, ‘डाक्टरी और विज्ञान की पुस्तकों के अलावा मैंने मात्र दो ही पुस्तकें पढ़ी हैं- ‘ऊटपटांग’ और ‘ह-ष-ब-र-ल’। और दोनों में ही जो चीजें मुझे सबसे अच्छी लगीं, वे हैं उस तरह के प्राणी जिन्हें लोग अजीब और बेढब कहा करते हैं। सामान्य के बाहर अगर कुछ हो या कुछ किया और कहा जाए तो लोग उसे पागलपन और अजीब कहकर कोई महत्व ही नहीं देते। जानते हैं, मैं बचपन में मोमबत्ती चूसकर खाता था। खाने में बहुत ही अच्छी लगती है। इसके अलावा इतनी मक्खियों को पकड़-पकड़कर मैंने खा डाला है कि इसकी कोई गिनती ही नहीं।’ 
पष्ठिचरण डाब ले आया, इसलिए भले आदमी को कुछ क्षणों तक चुप्पी धारण करनी पड़ी। दो मुलम्मे-चढ़े गिलासों को मेज पर रखकर, उसने सिलसिलेबार दोनों डाबों को अपनी तलहथियों से दबाया। वे पटापट टूट गए और उनका पानी गिलासों के अन्दर गिर पड़ा। षष्ठिचरण ने गिलास हमारी ओर बढ़ा दिए। 

डाब के पानी का घूंट लेकर भलेमानस ने कहा, ‘डाक्टरी पढ़कर मैंने प्लास्टिक सर्जरी में स्पेशलाइज क्यों किया, जानते हैं?’ 
‘क्यों?’ मेरे कौतुहल की मात्रा बढ़ती जा रही थी और वह इसलिए कि मैं जानना चाहता था कि इस भलेमानस की कल्पना की दौड़ कहाँ तक है। 
हिजबिजबिज ने कहा, ‘क्योंकि सिर्फ तसवीरों से ही मेरे मन को तसल्ली नहीं मिलती थी। सिर्फ यही सोचता रहता था कि इस तरह के जानवर अगर सचमुच होते तो कितना अच्छा होता। ये सब प्राणी कहीं-न-कहीं है, इस बात पर मेरे मन में कोई सन्देह नहीं था। मगर मैं चाहता था कि वे मेरे घर पर रहें, मेरे हाथ के बिलकुल करीब, आँखों के सामने। समझे?’ 
मैंने कहा, ‘नहीं साहब, बात समझ में नहीं आई। आप किन प्राणियों के बारे में कह रहे हैं?’ 
‘यही जैसे-बगुला, गिरगिट या हंस।’ 
मैंने कहा, ‘समझ गया। उसके बाद?’ 
‘उसके बाद और क्या? मैंने गिरगिट से शुरुआत की। दोनों चीजें मेरे हाथ के करीब ही थीं-तोते का माथा और गिरगिट की पूँछ। ठीक उसी तरह जिस तरह किताब में है। पहली कोशिश में ही सफलता हासिल हो गई। ऐसा जोड़ दिया कि बाहर से कुछ मालूम ही नहीं पड़े। मगर जानते हैं...’ 
भला आदमी गम्भीर होकर एक पल चुप बैठा रहा, उसके बाद बोला, ‘अधिक दिनों तक जिन्दा नहीं रहा। कुछ खाता ही न था। बिन खाए जिन्दा कैसे रहेगा? असल में जो लिखा हुआ है, वही ठीक है—शरीर से शरीर जुड़ने पर भी मन आपस में मिल नहीं पाते। इसलिए अब धड़ और सिर को जोड़ना छोड़ कर एक दूसरे ही एक्सपेरिमेंट कर रहा हूँ।’ 
वह एकाएक अनमना जैसा हो गया। मेरी तकदीर अच्छी है कि डाब का पानी ही पीने के लिए दिया है, अगर चाय-बिस्कुट दिया होता तो मुँह के अन्दर रखने की हिम्मत नहीं होती। 
षष्ठिचरण कहाँ चला गया, मालूम नहीं। खट्-खट्-खट्-खट् आवाज हो रही है। यह आवाज जिधर से आ रही है, उससे यही लग रहा है कि भले आदमी ने जिसे अपने काम-धन्धे का कमरा बताया था, उसी के दरवाजे खोले जा रहे हैं। 
बाहर तेज हवा चल रही है। मेघों की गड़गड़ाहट अच्छी नहीं लग रही है। अब बैठना ठीक नहीं है। भले आदमी को धन्यवाद देकर मैं उठकर खड़ा हो गया। 
‘चले? आपसे एक बात पूछनी थी।’ 
‘कहिए...’ 
‘जानते हैं, बात क्या है? सब कुछ का इन्तजाम कर चुका हूँ-साही का काँटा, बकरे का सींग, सिंह के पीछे के दो पैर, भालू का रोआं ले आया हूँ। लेकिन आदमी का थोड़ा-सा हिस्सा बाकी रह गया है। और वह भी ऐसा होना चाहिए जो तसवीर से मिलता-जुलता हो। वैसे आदमी पर आपकी नजर अगर पड़ी हो और उसकी सूचना दे सकें तो सहूलियत हो।’ 
यह कहकर भले आदमी ने अपनी मेज पर रखी कापियों के नीचे से पुराने जमाने का ‘ऊटपटांग’ निकालकर एक पन्ना उलटा और उसे मेरे सामने रख दिया। मेरी यह देखी हुई तसवीर है। हाथ में मुद्‌गर लिए एक अद्‌भुत प्राणी एक भागते हुए आदमी की ओर क्रोधभरी दृष्टि से ताक रहा है— 
डरो नहीं तुम डरो नहीं जी-मारूँगा मैं तुम्हें नहीं, 
कुश्ती में तुमको पछाड़ दूं ताकत उतनी मुझे नहीं... 
‘बताइए, अगर ऐसा प्राणी बना सका तो कितना अच्छा रहे। कुछ भी बाकी नहीं है—तोड़ना-जोड़ना जो कुछ था सब हो चुका है, नीचे की तरफ थोड़ा-सा हिस्सा जोड़ भी चुका हूँ, अब सिर्फ इसी तरह के एक आदमी की ज़रूरत है।’ 
मैंने कहा, ‘इतनी गोल-गोल आँखें कहीं आदमी की होती हैं?’ 
‘हां, होती हैं।’ भला आदमी करीब-करीब उछल पड़ा। ‘आँखें तो गोल ही होती हैं। पलकों से चूँकि गोलाई का ज्यादा हिस्सा ढंका रहता है, इसीलिए उतनी गोल मालूम नहीं पड़ती हैं।’ 
मैं दरवाजे की ओर बढ़ गया। पागल तो है ही, इसके अलावा जल्दी छुटकारा देने वाला जीव भी नहीं है। शब्दों का भी इसके पास खजाना है। 
‘ठीक है प्रोफेसर हिजबिजबिज, किसी पर नजर पड़ी तो बताऊँगा।’ 
‘ज़रूर बताइएगा। बड़ा ही उपकार होगा। मैं भी खोज-पड़ताल कर रहा हूँ। आप कहाँ टिके हुए हैं?’ 
आखिरी सवाल को न सुनने का बहाना बनाकर मैं अंधेरे में चला आया। बाहर आते ही मैं दौड़ने लगा। भीगने से मुझे आपत्ति नहीं है, मगर आँधी में रेत उड़ रहा है, और वह नाक और आँखों में घुसकर बहुत परेशान कर रहा है। 

हाथों से मुँह को छिपाये किसी तरह आँखों को बचाते हुए जब होटल पहुँचा तो बारिश शुरू हो चुकी थी। कमरे में घुसकर जब स्विच दबाया तो बत्ती नहीं जली। बरामदे पर जाकर बेयरा को पुकारने की ज़रूरत नहीं पड़ी। बेयरा मोमबत्ती लिए मेरे कमरे की तरफ ही आ रहा था। जब मैंने पूछा कि बात क्या है तो उसने बताया, ज्यादा आँधी-पानी में गोपालपुर में बत्ती का बुझना एक साधारण घटना है। 

आठ बजे खाना-पीना समाप्त कर जब मैं खाट पर बैठकर टिमटिमाती रोशनी में लिखने बैठा तो मन नहीं लगा। मन बार-बार दौड़कर प्रोफेसर हिजबिजबिज की ओर जाने लगा। तीन सौ साल पुराने मकान को जहाँ-तहाँ मरम्मत कर (यहाँ भी ‘उटपटाँग’ की थुल-थुल बुढ़िया की बात याद आती है।) वह आदमी वहाँ कैसे रहता है? घनघोर पागल के अलावा ऐसा कोई कर सकता है? और षष्ठिचरण? सांड जैसे इस नौकर का उसने कहाँ से इन्तजाम किया? सचमुच क्या पूरब की तरफ के उस बन्द कमरे में वह कुछ अद्‌भुत काम करता है? उसकी बात में कहां तक सचाई है? उसकी पूरी बात को पागल का प्रलाप कहकर उड़ा दिया जा सकता था, मगर उन कानों के चलते गड़बड़ी पैदा हो रही है। उन कानों को न केवल सफाई के साथ जोड़ा गया है, बल्कि आने के समय ढिबरी की रोशनी में देखा था कि एक कान के नुकीले हिस्से में फफोला भी है। इसका मतलब तो यही निकलता है कि वह कान शरीर का ही हिस्सा है और शरीर के सभी हिस्सों की तरह वहां भी शिरा और स्नायु है, वहाँ भी रक्त का संचालन होता है। 
सचमुच, जितना ही सोचता हूँ उतना ही मन में होता है कि वे कान न रहते तो मैं राहत की साँस लेता। 
दूसरे दिन सवेरे साढ़े पाँच बजे उठकर देखा, रात ही में बदली छंट गई है। चाय, पीने बैठा तो हिजबिजबिज की बातें याद आईं और जी में हुआ कि हँस पड़ं। मामूली-सी बात है-हलके अंधेरे में, ढिबरी की रोशनी में जो कुछ देखा उसका आधा ही हिस्सा दिखाई पड़ा था और आधे की मैंने कल्पना कर ली है। होटल में लौटने पर भी उसी तरह का अंधकार मिला था, इसलिए मन के संदेह को दूर हटाने का मौका नहीं मिला। आज रेत पर सुबह की धूप और शांत. समुद्र की शक्त देखकर मुझे लगा कि वह आदमी पागल के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। 
पाँव के नीचे, एडी के पास थोड़ा दर्द महसूस हो रहा था। गौर से देखने पर पता चला कि एक जगह काँटे का दाग है। समझ गया कि कल अंधेरे में जब मैं रेत पर दौड़ता हुआ वापस आ रहा था तो सीप जैसी कोई चीज गड़ गई होगी। अपने साथ मैं डिटोल या आइडिन नहीं ले आया था, इसलिए नौ बजने पर बाजार की तरफ निकल गया। 

न्यू बेंगॉली होटल के सामने से होकर सड़क बाजार की ओर गई है। होटल के सामने, बरामदे पर घनश्याम बाबू को एक फेरी वाले से मूँगा लेकर उलटते-पलटते देखा। मेरे पैरों की आवाज सुनकर उन्होंने सिर उठाकर मेरी ओर देखा और उनके चेहरे पर नजर पड़ते ही मेरा कलेजा धक् से काँप उठा। 
यह चेहरा तो वैसा ही है जैसा कि ‘ऊटपटाँग’ में था। पगला हिजबिजबिज इसी चेहरे की तलाश में है। इसमें कोई सन्देह की बात नहीं—उसी तरह चपटी नाक की दोनों ओर फैली हुई लंबी-मूँछें हैं। लम्बे गले के दोनों ओर तसवीर की जैसी पतली दाढ़ी भई उससे मिलती-जुलती है। असल में कल इस आदमी का हाव-भाव मुझे पसन्द नहीं आया था और इसीलिए उसके चेहरे को मैंने गौर से नहीं देखा था। आज हम लोगों की आँखें मिलीं और मैंने नमस्कार भी किया परन्तु उन्होंने उस ओर ध्यान ही नहीं दिया। बड़ा ही अभद्र जैसा लगा। 
फिर भी मुझे उस आदमी के लिए चिन्ता हुई। उस पागल के पल्ले इसे नहीं पड़ने दिया जा सकता है। हिजबिजबिज या उसका नौकर अगर इसे देख ले तो ज़रूर ही बगल में दबाकर उसे टूटे मकान के अन्दर ले जाएगा और उसके बाद उसकी क्या हालत होगी, राम जाने। 
सोचा, बाजार से लौटते वक्त एक बार राधाविनोद बाबू से मिलूँगा और सारी बातें खोलकर कहूँगा। उन्हें सावधान कर दूंगा कि अपने होटल के इस एकमात्र अतिथि पर निगरानी रखे रहें। 
मगर डिटॉल खरीदते समय मेरे मन से यह विचार अपने आप दूर हो गया। राधाविनोद बाबू से मुझे अजीब-अजीब बातें कहनी होंगी और वे क्या उन बातों पर विश्वास करेंगे? ऐसा लगता नहीं। यहाँ तक कि उन बातों को सुनकर मुझे पागल करार कर देंगे। इसके अलावा उनकी बात न मानकर मैं जो हिजबिजबिज के पास गया था, यह बात उन्हें पसन्द नहीं आएगी। 

लौटते वक्त घनश्याम बाबू पर जब दुबारा नजर पड़ी तो मुझे लगा—मेरी आँखों से जिस आदमी का चेहरा तसवीर से मिलता-जुलता है, हिजबिजबिज की आँखों से वैसा न भी हो सकता है। इसलिए भय का जितना कारण प्रतीत हो रहा है, असल में उतना न भी हो सकता है। इसलिए बुद्धिमानी इसी में है कि इन लोगों से कुछ भी न कहूँ और प्रोफेसर को भी कुछ न बताऊँ। अब मैं सिर्फ पच्छिम की तरफ ही घूमने-फिरने जाऊँगा और बाकी समय होटल के कमरे में बैठकर लिखने का काम करता रहूँगा। 
होटल आते ही बेयरा ने बताया कि एक आदमी मुझे खोजने आया था। मुझ से मुलाकात न होने पर वह एक चिट्‌ठी लिखकर रख गया है। 
बहुत ही छोटे-छोटे, चींटी जैसे अक्षरों में यही बात लिखी हुई है—प्रिय षडांगुल जी, 
आज शाम अवश्य ही मेरे घर पर आइए। सिंह के पिछले हिस्से के साथ साही के काँटे और भालू के रोएं को भलीभाँति जोड़ चुका हूँ। एक बहुत बढ़िया मुद्‌गर भी तैयार कर लिया है। अब तीनों सींग के लिए एक माथे की ज़रूरत है। माथा और हाथों का इन्तजाम हो जाए तो काम बन जाए। षष्ठिचरण को एक आदमी का पता चला है, जिसका चेहरा मूल चित्र से बहुत-कुछ मिलता-जुलता है। आशा है, आज ही मेरा परीक्षण सफल हो जाएगा। इसलिए आज शाम को एक बार ‘किंकर्तव्यविमूढ’ में आने का कष्ट करें तो बेहद खुशी होगी। 
भवदीय
एच.बी.बी.

याद आया, हिजबिजबिज ने ही बताया था कि ह-ष-ब-र-ल’ के अनुसार ही घर का नाम ‘किंकर्तव्यविमूढ़’ रखा गया है। चिट्‌ठी पढ़ने के बाद मन में पुन: दुश्चिन्ता समा गई; क्योंकि मेरा मन कह रहा है कि षष्ठिचरण ने शायद घनश्याम बाबू को ही देखा है। 

दोपहर-भर यथासंभव लिखने का काम किया। तीसरे पहर तेज हवा चलने लगी। बरामदे पर डेक चेयर पर बैठे-बैठे मैं समुद्र की ओर देखता रहा, जिससे बहुत-कुछ हलकेपन का अहसास हुआ। उत्तर-पच्छिम से आती हुई हवा लहरों से टकरा रही है, फलस्वरूप लहरों के ऊपर फैली फेन राशि चूर-चूर होकर हवा के झोंके से बिखर रही है। देखने में बड़ा ही अच्छा लग रहा है। 
छह बजे राधाविनोद बाबू को रेत से होकर अपने बरामदे की ओर आते देखा। उनके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही थीं। 
‘मेरे उस गेस्ट को इस तरफ चहल-कदमी करते हुए देखा है?’ 
‘किसको?—घनश्याम बाबू को?’’ 
‘हाँ साहब। कल हम आपसे जिस जगह मिले थे, वहीं ठहरने की बात थी। अभी गया तो नहीं पाया। आसपास कहीं कोई आदमी नहीं था कि जिससे पूछताछ करूँ। इधर मेरे होटल में भी शोर-गुल मचा हुआ है। मेरी सोने की घड़ी की चोरी हो गई है। नौकर से सवाल-जवाब करने में देर हो गई। वे क्या इस तरफ से होकर नहीं गए हैं?’ 
मैं कुरसी छोड़कर खड़ा हो गया। 
‘नहीं, इस तरफ़ से नहीं गए हैं,’ मैंने कहा, ‘तब हाँ, मेरे मन में एक सन्देह हो रहा है। एक जगह जाऊँ तो हो सकता है पता चल जाए। आपके हाथ में जो लाठी है, वह काफी मजबूत है न?’ 
राधाविनोद बाबू ने अचकचाकर कहा, ‘‘लाठी? हां...लाठी तो मेरे दादा जी के जमाने की है... इसलिए...” 
मेरे साथ और कोई चीज नहीं है—जब यहाँ पहले-पहल आया था तो आरा- मछली का एक दांत खरीदा था। उसे अपने साथ ले लिया। दूसरे हाथ में अपना टार्च थाम लिया। 
मुझे पूरब तरफ जाते देखकर राधाविनोद बाबू ने भर्राई आवाज में कहा, ‘मछुआरों की बस्ती के पार जाइएगा क्या?’ 
‘हाँ। लेकिन ज्यादा दूर नहीं, एकाध मील।’ 
रास्ते-भर राधाविनोद बाबू एक ही बात को तीन बार दुहराते रहे, ‘कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है, साहब।’ 
एक प्रौढ़ आदमी के साथ डेढ़ मील का रास्ता तय करने में लगभग एक घंटे का वक्त लग गया। शाम उतर चुकी है। जब तक घर के पास नहीं पहुँच जाता हूँ तब तक यह समझना मुश्किल है कि वहाँ कोई है या नहीं। उस मकान की तरफ हम जितना बढ़ते जा रहे हैं, राधाविनोद बाबू का उत्साह उतना ही ढीला पड़ता जा रहा है। अन्तत: जब वह मकान दस हाथ दूर रह गया तो वे एकाएक ठिठक कर खड़े हो गए और बोले, ‘आपका मतलब क्या है?’ 
मैंने कहा, ‘जब इतनी दूर आ ही चुके तो और दस हाथ चलने में आपत्ति क्यों कर रहे हैं?’ 
आख़िरकार वे मेरे पीछे-पीछे चलने लगे। 
घर के पास आने पर टार्च जलाना पड़ा, क्योंकि अन्दर गहरा अंधेरा फैला हुआ था। कल मिट्‌टी-तेल की जो डिबरी जल रही थी, उसे अब तक जल जाना चाहिए था, पर जली नहीं है। 
सामने के दरवाजे से अन्दर जाकर जब टार्च जलाई तो देखा, एक आदमी चित पड़ा हुआ है। वह अभी तक मरा नहीं है क्योंकि उसकी विशाल छाती अब तक धड़क रही है। 
‘यह तो वह नौकर है।’ राधाविनोद बाबू ने भर्रायी आवाज में कहा। 
‘जी हाँ! यह षष्ठिचरण है।’ 
‘आपको इसका नाम भी मालूम है?’ 
इस बात का उत्तर न देकर मैं बैठक के अन्दर चला गया। कमरा खाली है प्रोफेसर का वहाँ कोई नामोनिशान नहीं है। वहाँ से निकलकर मैं उसकी प्रयोगशाला के अन्दर गया। 
वह कमरा भी बैठक की तरह लम्बा-चौड़ा है। मेज पर एक ओर सरो-सामान का ढेर लगा है—शीशी, बोतल, काँटा, छुरी, दवा-दारू वगैरह। एक तेज गंध से कमरा भरा हुआ है। बचपन में चिड़ियाखाने में जानवरों के पिंजड़े के सामने खड़े होने पर इसी तरह की गंध का अहसास हुआ था। 
‘‘अरे, उस आदमी का कुरता तो यहीं पड़ा है।” राधाविनोद बाबू चिल्ला उठे। आज सवेरे कुरते पर मेरी भी नजर पड़ चुकी थी। तीन-चौथाई आस्तीन वाला भूरे रंग का कुरता है, सीने के पास सफेद बटन। इसमें सन्देह नहीं कि यह घनश्याम बाबू का ही कुरता है। 
और उस कुरते की जेब में हाथ डालते ही इस भयावह स्थिति में भी राधाविनोद बाबू चौंक पड़े। उन्हें अपनी सोने की घड़ी मिल गई थी। 
‘यहाँ क्या किया जाता है? ये सरो-सामान यहाँ क्यों है? कुरता है, जेब में घड़ी पड़ी है, मगर वह पट्टा कहाँ चला गया? उस बूढ़े का भी पता नहीं चल रहा है।’ 
मैंने कहा,. ‘यह तो देख ही रहे हैं कि वे घर के अन्दर नहीं है। बाहर चलिए।’ 
षष्ठिचरण अब भी बेहोश पड़ा है। उसे लांघते हुए हम घर के बाहर रेत पर आए। समुद्र की ओर ताकने पर हलके अंधेरे में एक आदमी दिखाई पड़ा। वह इस ओर आ रहा है। जब वह थोड़ा और करीब आ गया तो मैंने उस पर टार्च की रोशनी डाली। देखा, प्रोफेसर हिजबिजबिज आ रहे हैं। 
षडांगुल ही हैं?’ 
‘जी हाँ, मैं हिमांशु चौधरी हूँ।’ 
‘थोड़ी देर पहले क्यों नहीं आए?’ उसने शिकायत-भरे लहजे में कहा। 
‘क्यों?’ मैंने पूछा। 
‘वह तो चला गया। तसवीर के जैसा आदमी मिल गया था। एक ही घंटे में मैंने जोड़ दिया। मजे में घूमने-फिरने लगा, बातचीत भी की। षष्ठिचरण डरने लगा तो उसके सिर पर मुद्‌गर दे पटका और उसके बाद सीधे समुद्र की ओर चला गया। सोचा पुकारूँ मगर नाम तो कुछ था ही नहीं कि पुकारता।... आदमी का सिर, सिंह के पैर, साही की पीठ, बकरी के सींग... लेकिन पानी के अन्दर क्यों चला गया, समझ में नहीं आया...’ 
बात करते-करते वह अपने अंधेरे घर के भीतर चला गया। अब तक मेरी टार्च की रोशनी उस पर पड़ रही थी, अब नीचे की तरफ रोशनी पड़ी तो रेत पर पैरों की छाप दिखाई दी। पैरों की ताजा छाप। पैर नहीं बल्कि पंजा कहना चाहिए। 
छाप का अनुसरण करते हुए हम आगे बढ़ते गए। धीरे-धीरे हम भीगे रेत के पास पहुँचे। भीगे रेत पर छाप और भी स्पष्ट थी। केकड़ों के गड्‌ढे की बगल से होती हुई, अगनित सीपों पर से होती हुई पंजे की वह छाप क्रमश: पानी की ओर जाकर समुद्र में खो गई थी। 
इतनी देर बाद राधाविनोद बाबू के मुँह से आवाज निकली, ‘सब कुछ तो समझ गया। वह आदमी घनघोर पागल है, आप शायद अधपगले हैं, मगर मेरे होटल का वह बटमार बाशिन्दा कहाँ चला गया?’ 
अपने हाथ के आरा-मछली के दांत को पानी में फेंककर होटल की तरफ कदम बढ़ाते हुए मैंने कहा, ‘‘इसकी तहकीकात पुलिस से करने को कहिए। कुरता जब यहाँ मिला है तो यहीं तलाश करने को कहिए। तब हाँ, मुझे आशंका इस बात की है कि रहस्य का पता लगाते-लगाते पुलिस भी कहीं मेरी ही तरह न हो जाए-यानी किंकर्तव्यविमूढ़।”


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