एक रात (वयस्क कहानी) ~ जयश्री रॉय

 

Ek Raat - Jayshree Roy ki Kahani in Hindi

चौदह वर्ष की अवस्था में मेरा पहली बार बलात्कार हुआ था।” टकीला का छोटा-सा पैग एक ही घूँट में गले से उतारते हुए उसने एक भयावह लापरवाही के साथ यह बात कही थी। सुनकर मेरे भीतर एक सनाका-सा हुआ था। भूना काजू टूँगते हुए एकदम से गले में अटक गया था। खाँसते हुए बड़ी मुश्किल से पूछ पाया था-“यानी…?” पर पूछते ही, अपना यह सवाल मुझे स्वयं ही बहुत अश्लील जान पड़ा था। मगर उसके चेहरे की मुलायम रेखाओं में कोई शिकन न देखकर दूसरे ही पल निश्चिन्त हो गया था।

“बलात्कार यानी मेरी सुहागरात! यही ख़ूबसूरत नाम दिया है न इसे हमारे समाज ने?” मुँह बनाकर नीबू की फाँक चूसते हुए उसने कहा था। उस क्षण उसकी पारदर्शी त्वचा के नीचे कुछ नील जैसा झलक आया था। उसके प्रश्न का जवाब न देकर मैं टकीला की बोतल उठाकर कई घूँट एक साथ गटक गया था, हालाँकि उस समय मुझे पानी की तलब हो रही थी। तेज़ाब की एक सुनहरी नदी मेरी शिराओं में चिनगारी फूँकती चली गयी थी और यकायक मेरे सामने बैठी मन्दिरा का चेहरा केसर हो उठा था।

किस बेतकल्लुफ़ी से हम दोनों इस समय एक साथ इस निर्जन डाकबँगले में बैठे हैं, जैसे हमारा वर्षों का परिचय हो, जबकि यथार्थ में हमारा परिचय कुछ ही घण्टे पुराना है। गर्मी की छुट्टी के सात दिन इस रिज़र्व फॉरेस्ट में बिताकर आज ही शाम मेरी पत्नी बच्चों के साथ घर लौट गयी है। मैं दो-चार दिन और यहाँ रुककर अपनी किताब पूरी करना चाहता था। मन्दिरा देर शाम को यहाँ आयी थी, अपनी छुट्टी का आख़िरी दिन वह भी मानिकेरी के इस छोटे-से डाकबँगले में बिताना चाहती थी। कल दोपहर की फ़्लाइट से उसे मुम्बई लौट जाना है। फिर वहाँ से सीधे लन्दन, जहाँ उसके अनुसार वह अपने चित्रकार प्रेमी के साथ विगत तीन वर्षों से रह रही थी।

मुझे पहली ही नज़र में वह अद्भुत लगी थी। उसकी गहरी कत्थई आँखों में कुछ ऐसा था जिसे सम्मोहन कहा जा सकता है। अधिकतर वह अपनी आँखों से ही कहती-सुनती और मुस्कराती थी। यह बात मुझे विलक्षण लगी थी। थोड़े ही समय में वह मेरे सामने किसी किताब की तरह खुल गयी थी। जैसे हम दोनों एक-दूसरे को हमेशा से जानते हों। बक़ौल उसके, आज की रात उसने मुझे अपने कन्फ़ेशन के लिए चुना था और मैं अब तक यह तय नहीं कर पाया था कि इसके लिए मुझे ख़ुश होना चाहिए या उसके प्रति कृतज्ञ। और अब अपनी आपबीती का आरम्भ उसने जिस विस्फोट के साथ किया था, उससे मैं एक तरह से स्तम्भित रह गया था।

एक वर्ज्य के दुर्वार आकर्षण में राख कुरेद कर आग ढूँढ़ते हुए मैंने उसे टटोला था-“फिर?”

“फिर…” काजू की तश्तरी को अनमनी-सी अपनी ओर सरकाते हुए उसने मेरा प्रश्न दोहराया था और फिर यकायक सजग होकर मेरी तरफ़ देखकर हलके-से हँसी थी। उसे इस निस्तब्ध रात में सुनते हुए यकायक मुझे अहसास हुआ, उसकी हँसी टूटे हुए घुँघरू की तरह थी, छनछनाकर हर कोने में बिखरती हुई…

“फिर क्या, पूरी बिरादरी खा-पीकर मस्त थी और शहनाई की गूँज में मेरा रुदन दब गया था। मेरे अपने ही मुझे उस कमरे में क़ैद कर गये थे जिसमें बिछी सेज पर फूलों की सुगन्धित पंखुरियाँ बिखरी हुई थीं।” एक क्षण रुककर वह फिर जैसे स्वयं से ही मुख़ातिब होते हुए रुक-रुककर बोली थी-

“अपनी इत्ती बड़ी नथ से जूझते हुए तब मुझे पता नहीं था कि थोड़ी देर बाद उसी सेज पर अपनी सुगन्ध हमेशा के लिए खोकर एक नुचे-कुतरे फूल की तरह पड़ी रहूँगी। एक डरावनी सूरत वाली बुढ़िया मेरे घूँघट में अपनी गिद्ध जैसी आँखें धँसाकर मुझे चेता गयी थी-“यह सेज ही हम औरतों की सनातन चिता है बिट्टी! सीता मैया की तरह हर औरत को इस पर अपना सतीत्व सिद्ध करने के लिए अग्निपरीक्षा देनी पड़ती है…तेरे पुरखों की लाज अब तेरे हाथों में है!”

“मुझे काटो तो ख़ून नहीं! मामू की चुम्मी, बचपन में दूसरे बच्चों के साथ गर्मी की दोपहरों में ‘डॉक्टर-डॉक्टर’ खेल और मास्टरजी की दुलार भरी धौल-धप्प-सब एक साथ याद आ गये थे।” अब वह खुलकर हँस रही थी। हवा में बजते हुए जलतरंग की हलकी ठुनक को महसूसते हुए मैं चुपचाप बैठा रहा। कुछ बोलकर मैं इस क्षण के तिलस्म को तोड़ना नहीं चाहता था। वह मेरे लिए सचमुच स्वप्न-सा पारदर्शी कुछ रच रही थी। मैं बिल्कुल मन्त्रमुग्ध था।

“एनीवे…” अपने पैर सामने की मेज़ पर रखते हुए उसने अपनी आँखें मूँद ली थीं-“अपने बारह गजी लहँगे के जगर-मगर घेर में अपने पूर्वजों की भारी-भरकम लाज समेटे आधी रात तक मैं उनींदी आँखों से दीवारों पर जड़ी तस्वीरों से झाँकती बालिश्त भर करारी मूँछें तकती रही थी और न जाने कैसे उनकी ग़ुस्सैल आँखों के नीचे ही एक समय मेरी आँखें मुँद गयी थीं। इतना कहकर वह एक बार फिर चुप हो गयी थी। उसके चेहरे की गहरी होती रेखाओं को देखकर प्रतीत हो रहा था कि वह अपने ही अन्दर की किसी यन्त्रणा भरी यात्रा में कहीं दूर निकल गयी है। अप्रैल की हवा में सितारे घुले थे, क्षितिज की साँवली उजास में हलका-सा मोतिया आब था, चाँद से अबरक झड़कर रात गोरी हो आयी थी।

उसके आँखें खोलने तक मैं अधीर प्रतीक्षा में चुपचाप बैठा रहा था और फिर एक समय न जाने वह कैसी आवाज़ में बोली थी, “भोर होने से कुछ पहले शराब, इत्र और पान-ज़र्दे की तीखी, तुर्श गन्ध से मेरी आँख खुल गयी थी। मेरे सामने छह फुट का अधेड़ दूल्हा अपनी जपा फूल जैसी लाल, मद्यप आँखों से लार चुआते हुए खड़ा-खड़ा नाग-सा झूम रहा था। मेरा चोली में धड़कता दिल और लहँगे में पूरे ख़ानदान का सम्मान एकबारगी थरथरा उठा था। इससे पहले कि मैं कुछ कहती या समझती, वह किसी आदमखोर की तरह मुझ पर हमला कर बैठा-अपनी पशुवत् कठोरता के साथ बुरी तरह मुझे बेधते हुए! उस क्षण की पीड़ा और आतंक की अभिव्यक्ति किसी भी शब्द में सम्भव नहीं…

एक क्षण ठिठककर अपने लरजते हुए शब्दों के साथ वह इस तरह आगे बढ़ी थी, जैसे कन्धे पर मय्यत उठाये हुए हो, “अपनी रोमस जाँघों के नीचे जाँत कर वह मेरी देह के सारे अविकसित फूलों को रौंद, मसल रहा था और मैं चीख़ भी नहीं पा रही थी। जानती थी, मुझे बचाने कोई नहीं आयेगा। सीता बनना इतना आसान नहीं था! मेरी माँ, उनकी माँ, नानी-सभी सीता की परम्परा की स्त्रियाँ थीं और अब उनसे मिले इस उत्तराधिकार का निर्वाह तो मुझे करना ही था। दर्द की एक काली नदी में शनैः-शनैः डूबते हुए मैंने सुना था, नीचे के हॉल में सबकी वाहवाही के बीच बनारस की हुस्न बानो अपनी मर्दानी आवाज़ में गा रही थी-तेरे प्यार में बड़ा दर्द है रे बेदर्द…उस दिन दर्द की परिभाषा कोई मुझसे पूछता तो वह हमेशा के लिए बदल कर रह जाती।”

“दूसरे दिन सुबह-सबेरे ससुराल की सभी बड़ी-बूढ़ियाँ हमारी सुहाग-सेज का मुआयना कर रही थीं और मैं एक कोने में सिमटी-सिकुड़ी बैठी किसी आसन्न वनवास के भय से मरी जा रही थीय क्योंकि मुझे पता था, यहाँ अग्निपरीक्षा में खरी उतरने के बाद भी सीताओं को वनवास मिल जाता है! बिस्तर पर जो ख़ून के धब्बे मिले थे वे मेरी देह से ज़्यादा मेरी आँखों से निकले थे और वे बूढ़ी औरतें इस बात की ख़ुशी मना रही थीं। एक पुरुष के अहंकार की जय और स्त्री के पराजय का उत्सव उस दिन उन सनातन दासियों ने ख़ूब मनाया था।”

देर तक बोलते हुए अब शायद वह सचमुच थक गयी थी और उसकी यह थकान मानसिक ज़्यादा प्रतीत हो रही थी। मैं बैठा हुआ उसकी गहरी साँसों की आवाज़ सुनता रहा था। बहुत पहले मैंने एक हलाल हुए जानवर को देर तक छटपटाने के बाद धीरे-धीरे मरते हुए देखा था, तब वह कुछ इसी तरह साँसें ले रहा था। उस स्मृति की मटमैली छायाएँ मुझे आज भी समय-असमय बोझिल कर जाती हैं। अपनी डूब से उबरकर मैंने शान्त जल में हलके-से कंकड़ मारने की तरह पूछा था-“हो गयीं ख़त्म आपकी बातें? एकदम से चुप हो गयीं…”

उसने अपनी तन्द्रालस आँखें खोलीं और मेरे पार देखती हुई जैसे नींद में बोली-“कभी-कभी चुप रहकर ही सही अर्थों में बोला जा सकता है, विशेषकर तब जब मन की गहनतम भावनाएँ भाषा से परे हटकर स्वयं को निःशब्द व्यक्त करना चाहती हैं। ऐसे में भाषा की विडम्बनाओं और सीमाबद्ध सत्यों से परे होकर शब्द एकदम अर्थहीन हो जाते हैं और फिर, हम दोनों का यूँ लगातार बोलना किसी सत्य को छूने से बचने की एक बचकानी कोशिश जैसा लगता है जो शायद हमारे चुप होते ही मुखर हो उठे।”

अपनी बात समाप्त करते हुए उसने मुझे फिर उनींदी आँखों से देखा था। वह मुझे मेरे आर-पार देख रही है, ये उसकी तरल हो आयी चावनी से स्पष्ट था। मैं अनायास अपनी शिराओं में पिघले हुए शीशे का बहाव महसूस करने लगा था। उसके सूक्ष्म संकेत मेरे कपड़ों के अन्दर पहुँचकर मेरी त्वचा को छूने लगे थे शायद। अपनी असहज होती देह रेखाओं के प्रति सचेत होते हुए मैं संकोच से घिरने लगा था। मेरे आत्मसंयम से परे जीवन का आदिम उत्सव अपना चरम चाहता है। एक बनैली चाह रगों में जंगली बिल्ली-सी गुर्राने लगी है।

यह निशिगन्धा-सी रात और सागौन के दैत्याकार घने पेड़ों के पीछे से झाँकता शुक्ल पक्ष का आधा चाँद…मैंने पलाश की सुलगती डालों पर रात के किसी पंछी की झटपटाहट टोहने का भान करते हुए अपनी दृष्टि फेर ली थी।

मेरी झिझक पर मुस्कराते हुए उसने मेरे बायें कन्धे पर हलके-से हाथ रख दिया था-“क्या हुआ…झेंप गये? अच्छा, यदि तुम मेरा मौन गा सकते हो तो क्या मैं तुम्हारे गीतों की ख़ामोशी नहीं सुन सकती! ऐसा तो आज की रात हमारे बीच कुछ बँध ही चुका है जिसे रिश्तों का टैग लगाये बग़ैर जिया जा सकता है, ढोने की विडम्बना से परे होकर…”

उसके इंगित बहुत विलक्षण हो उठे थे, मेरे भीतर मधुमालती की कड़वी-मीठी गन्ध के साथ किसी ग्लेशियर के निःशब्द दरकने की धीरे-धीरे फैलती हुई कम्पित तरंग थी। इससे पहले कि मैं कुछ कह पाता, उसने अचानक प्रसंग बदला था-“कहो, क्या लिखते हो?”

“ज़िन्दगी, और क्या!”

“काग़ज़ों में छपी ज़िन्दगी…या काग़ज़ी ज़िन्दगी…इतने सारे स्वप्नों, उच्छ्वासों, दर्द और संवेदनाओं की एक पूरी दुनिया और उनका कुछ पन्नों का अनुवाद, बस! क्या तुम्हें कभी ऐसा नहीं लगता कि यदि एक सफल कहानी के लिए एक पूरी ज़िन्दगी का विफल हो जाना अनकही शर्त है तो फिर ऐसी कहानियों का जन्म न लेना ही बेहतर है? किस-किस के मृत सपनों पर तुम लोगों के ये काग़ज़ी राजप्रासाद खड़े होते हैं! जीवन की विडम्बनाओं को नक़द करके तुम लोग अपनी आजीविका चलाते हो, काग़ज़ की ज़मीन पर लफ़्ज़ों के व्यापारी हो…कभी यह अहसास तुम्हारी रात की नींद ख़राब करता है, सच कहना।”

उसकी कड़वी-कसैली बातों में हर रचनाकार के जीवन की विडम्बना छिपी है, यह मैं उसे बता नहीं सकता था। शायद उसकी तरह मेरे कन्फ़ेशन का समय अभी नहीं आया था। मैंने एक तटस्थ-सा बयान देने का प्रयत्न किया था-“हाँ, जीवन को शब्द देना…”

“मगर तुम लेखकों को शब्दों, संवेदनाओं की क्या कमी, इमोशन के गोदाम होते हो, जब भी चाहो लज़्ज़तदार शब्दों का ढेर लगा दो-रेडीमेड, ताज़े, ओवन फ्रेश! रुपये के दस, अच्छा चलो, बारह ले लो।” कहते हुए कौतुक में उसकी आँखों की पुतलियाँ झिलमिलाने लगी थीं।

“नहीं, ऐसा नहीं, हमारे भीतर नदी होती है तो पत्थर भी होते हैं। मन ऐसा कोई टकसाल होता तो किल्लत पड़ते ही छाप लेते हरे-हरे नोट की तरह करारी संवेदनाएँ…”

मेरी बात सुनकर वह खिलखिलाकर हँस पड़ी थी। मुझे लगा था, एकदम से रातरानी फूल गयी है! तन्द्रिल हवा उसी की मदिर गन्ध से बोझिल हो रही है। मैंने घड़ी देखते हुए कहा था-“हम खा लें?”

“अरे यार! तुम वन की इस निबिड़ दुनिया में भी अपना समय उठा लाये! चलो, इस यन्त्र को यहीं उतार फेंको और आज की रात को यहीं ठहर जाने दो-हमेशा के लिए! …इस आधे चाँद और नीली हवा में गुँथी आदिम चाहना की गन्ध के साथ, लिबास और मुखौटों की दुनिया से दूर, त्वचा पर अपना खालिस मन ओढ़े, ईप्सा के अतर में सराबोर, किरणों की गीली पगडण्डियों पर महुआ मदालस हवा की तरह…”

मैं समझा था, टकीला के नन्हे पैग अब उसके अन्दर बड़े हो रहे थे। वह बहक रही थी।

“मैं तो काजू टूँगकर गले तक भर गयी हूँ। क्यों न हम थोड़ा चलें? ये साल, सागौन, महुआ, करम की आदिम, अभेद्य दुनिया हमें बुला रही है। दूर से आते सान्थालों के मादल की ‘धप-धप’ और हवा में महुआ की मदिर गन्ध…” वह अपनी दोनों बाँहें फैलाकर किसी राजहंसिनी की तरह अपनी मराल ग्रीवा तानकर खड़ी हो गयी थी। मुझे प्रतीत हुआ था, चाँदनी रात में ताजमहल देख रहा हूँ। वही जमुना की नीली धारा की गवाही में ख़्वाब और मुहब्बत से रची गयी संगमरमर की उजली कहानी-हमेशा की तरह ख़ूबसूरत मगर बेतरह उदास भी! मैं एक गहरी साँस लेता हूँ।

वह चलते-चलते रुक गयी थी-“क्यों, नहीं चलोगे?”

“जो तुम ले चलोगी…” मैं एक पुराने गीत के बोल गुनगुना गया था। चलते हुए अन्दर कोई अजनबी आवाज़ में बोल रहा था, तुम्हारे साथ मैं जीवन के पार तक चलने को तैयार हूँ, फिर ये आकाश और धरती क्या! अपनी इस सोच पर मुझे ख़ुद ही हैरत हो रही थी।

“तुम शायद सोच रहे हो, इस समय हम कहाँ जा रहे हैं।” वह कभी मुझे आप तो कभी तुम कहकर सम्बोधित कर रही थी।

“आप जैसी कोई शख़्सियत साथ हो तो चलना अहम हो जाता है, मंज़िल या मक़सद नहीं!”

“अब आप कविता करने लगे!” वह हलके-से हँसी थी और उसी क्षण उसके चेहरे पर चाँद उतर आया था। मैं उसे रात की ओट में देखता रहा था। आसपास फूलते किसी अनाम जंगली फूल की तीखी सुगन्ध मुझे अन्दर तक बेसुध कर गयी थी।

ग्रीष्म ऋतु में कोयल नदी की धार क्षीण हो आयी है। उसकी चाँदी की ज़ंजीर-सी पतली धारा रात के फीके अन्धकार में लगभग निःशब्द बह रही थी। आसपास फैली रेत की सफ़ेद राशि में अबरक़ के असंख्य कण चाँद के आलोक में जुगनू की तरह टिमटिमा रहे थे। यहाँ पहुँचकर एक बड़े पत्थर से टेक लगाकर वह पैरों से पानी छपछपाने लगी थी। ऐसा करते हुए उसके चेहरे पर किसी बच्चे की-सी मासूमियत झलक आयी थी। मैं इस क्षण की मासूमियत को मन के किसी अदृश्य कैमरे में क़ैद कर लेना चाहता था मगर वह फिर एक गम्भीर सवाल कर बैठी थी-“क्यों प्रणय, अपने विवाहित जीवन से ख़ुश हो?”

मैं चुप रहना चाहता था, मगर बोलना पड़ा था-“हाँ! सबकी तरह मैं भी ख़ुश हूँ…”

“सब की तरह! ये अच्छी बात कही तुमने!” मन्दिरा ने ताली बजाई थी, हँसते हुए।

मैंने उसकी बात अनसुनी कर दी थी-“अब कोई उम्मीद नहीं करता, सही या ग़लत। तो बहुत कुछ सहज हो गया है। उम्मीद में जीना बहुत कठिन होता है…अब सोचता हूँ, कोई ग़लत नहीं होता, बस हमारी उम्मीदें ग़लत होती हैं।”

वह घुटनों तक पानी में डूबी दोनों हाथों से पानी उलीचती रही थी, जैसे मेरी बातें उस तक पहुँच ही न रही हों। थोड़ी देर बाद फिर पूछा था-“कभी प्यार किया है किसी से क़ायदे से?”

“क़ायदे से! वह भी प्यार…!” अबकी बार मैं हँसा था। मगर वह गम्भीर बनी रही थी। तो मुझे भी होना पड़ा-“हम तो क्या करते या न करते प्यार-व्यार! प्यार तो अपनी मर्ज़ी का मालिक होता है। दरअसल प्यार आपको चुनता है, आप प्यार को नहीं। और जब यह आपके जीवन में घटित होता है, आप बस इसके साथ हो लेते हैं। इसके सिवा आपके पास कोई दूसरा विकल्प होता ही नहीं। प्यार हमारे चाहने न चाहने पर निर्भर नहीं करता मन्दिरा, ना ही यह कोई निर्णय होता है! अन्दर एक इशारा होता है और बस, हम चल पड़ते हैं, इस पर ख़त्म होकर पूरे होने के लिए या फिर ठीक इसका उलटा भी। प्रेम की यात्रा में सिर्फ़ यात्रा होती है, कोई मंज़िल नहीं! मंज़िल का अर्थ ठहराव होता है और प्यार में ठहराव आ जाये तो वह प्यार नहीं रह जाता, उसकी समाधि बन जाती है! कहीं पढ़ा था, प्रेम चाँद की तरह होता है, जिस दिन वह बढ़ना बन्द हो जायेगा, घटना शुरू हो जायेगा!”

मेरी बात सुनते हुए मन्दिरा अनमनी-सी गुनगुनाती रही थी- “न ये रुकती है, न ठहरी है, न ठहरेगी कभी, नूर की बूँद है, सदियों से बहा करती है…” उसके साथ मैं गा रहा था मगर चुप था। मन्दिरा ने सुना था मुझे। “हमने देखी है उन आँखों की महकती ख़ुश्बू…” उसने न जाने कैसी स्वप्न भरी आवाज़ में आगे की पंक्तियाँ पूरी की थीं-“तुम ठीक कहते हो…” कहते हुए उसका मोतिया आँचल हवा के झोंके से यकायक ढलक गया था और इसके साथ ही आकाश का आधा चाँद उसके सीने के दो पूरे चाँदों पर जगमगा उठा था। पीछे के बूढ़े बरगद पर रात के कई पंछी एक साथ बोल उठे थे। मैं भूला-सा उसे देखता रह गया था। अन्दर एक श्रृंखलाबद्ध पशु अपने बन्धन से जूझ रहा था। उसकी छटपटाहट मुझे अस्थिर कर रही थी। मगर वह इस सबसे अनजान कह रही थी-“प्रेम हम में घटित होता है, हम प्रेम में होते हैं, ठीक जैसे जीवन हमारे भीतर होता है, किसी दैवी शक्ति से, हमारे चाहने या न चाहने से नहीं। इस प्रेम का वितरण भी हमारे अधिकार में नहीं होता। कोई कहीं होता है अदृश्य, जिसके संकेत से हम इसे सौंप देते हैं उसे, जिसका यह प्राप्य होता है। हमारा प्रेम किसी की सनातन थाती है। हमें तो बस इस अमानत को सम्हालना होता है…”

“मगर अपना सब कुछ देकर भी इस प्रेम को जीवन में कहाँ रोक पाया!” मेरी आवाज़ में न जाने क्या था कि वह उठकर एकदम से मेरे कन्धे से लग गयी थी-“प्रेम को बाँधना चाहोगे तो वह एक दिन ज़रूर खो जायेगा। बन्धन में भी कभी बँधा है प्यार! वह तो हवा की उँगलियों में उलझी ख़ुश्बू का झोंका है, मुक्त होकर दूर तक फैलती है मगर मुट्ठी में बन्द होकर मर जाती है…”

“नहीं, ऐसा नहीं है कि मेरी ज़िन्दगी में कुछ भी नहीं है। है बहुत कुछ है!” अपने एक क्षण की दुर्बलता के लिए अब मैं शर्मिन्दा हो रहा था।

“हाशिये में ठिठके रिश्ते भी हमारे जीवन का हिस्सा होते हैं। चाहे यह हिस्सा कितना ही छोटा क्यों न हो। मगर हाँ…” अब वह मेरी बाँहों में कुछ अदृश्य शब्द लिख रही थी और मेरे अन्दर की एक आवेग भरी नदी अपना तटबन्ध तोड़ बह निकलने को आमादा हो रही थी-“कृष्ण की तरह सब में बँटकर भी सबके हिस्से में पूरा-पूरा आ सको तो देने का सुख जान सको। सब में बँटकर ख़त्म हो जाना उदारता नहीं, अपने भीतर का कंगालपन है!”

मैंने महसूस किया था, एक आदमक़द आईने के समान वह पूरा सच बोलती है। उसके सामने किसी झूठ के लिए कोई गुंजाइश नहीं बचती। न जाने चोट पहुँचाने की किस आदिम, हिंस्र इच्छा के वशीभूत होकर मैंने अनायास पूछ लिया था-“और आप…? सिर्फ़ बलात्कार ही झेलती रहीं या कभी प्रेम-व्रेम भी किया, बक़ौल आपके-क़ायदे से?” कहते हुए मुझे लगा था, चाँद सफ़ेद शव की तरह उसकी पुतलियों में उतर आया है। उसी समय आसमान पर रात के ढेर सारे पंछी अपने पंख फड़फड़ाते हुए सिर के ऊपर से उड़ते हुए गये थे। मेरे भीतर कहीं गहरे एक कच्ची दीवार-सी अनायास बैठ गयी थी। वह एक ही क्षण में आत्मीयता का हाथ छुड़ाकर जैसे मीलों दूर चली गयी थी। फिर न जाने कितनी सदियों बाद उसने अजनबी-सी आवाज़ में कहा था-“हाँ! प्रेम मेरे जीवन में भी आया था। जब मैं प्रेम में थी, ज़ाहिर है, बहुत अच्छी थी। प्रेम आपको मुक़म्मल ही नहीं, बहुत अच्छा भी बना देता है। मगर…एक भूल हो गयी-लालच कर बैठी! प्रेम को अपने वश में करना चाहती थी! उस पर अपनी मिल्कियत चाहती थी! लॉकर में बन्द कर सुरक्षित महसूस करना चाहती थी! कुछ चीज़े सिर्फ़ बाँटने से, शेयर करने से बढ़ती हैं, यह बात भूल गयी थी। इसका प्रायश्चित्त भी किया-इसे बिना शर्त अपना सर्वस्व दे दिया। तुम हैरान होकर मेरी बात सुन रहे हो मगर प्रेम में इसी तरह सब लक्षणा में होता है-खोकर पाना, देकर लेना, तुम यह सब नहीं समझोगे। शब्दकोश के अर्थ से जो प्रेम को समझते आये हो अब तक। अच्छा, जो परिभाषित हो जाय वह प्रेम कैसा! यह तो गूँगे के मुँह में धीरे-धीरे घुलती हुई गुड़ की ढली है!”

कुछ देर चुप रहकर फिर जैसे उसने ख़ुद से ही कहा था- “मैंने रुक्मिणी होकर सहेजा है, राधा होकर आराधा है और मीरा होकर त्यागा है मगर…हर रूप में बस पाया ही पाया है। अपने इष्ट को पूरी तरह समर्पित हुए बिना उसे पूर्णता में पाया नहीं जा सकता। …यह हर औरत का सच है। चाहे वह माँ हो, बहन हो या कि प्रेयसी!”

न जाने किस अधिकार भाव से भरकर मैंने उसे अपनी बायीं बाँह में भरकर डाकबँगले की ओर लौटना शुरू कर दिया था। वह भी बिना किसी प्रतिवाद के मेरे संग चुपचाप चल पड़ी थी। इस सामीप्य से उसकी देह की हलकी आँच मेरे शिराओं में बह आयी थी। नासिकापुटों में स्त्री देह की मादक गन्ध थी। कहीं भँवरा फूलते हुए जंगली फूलों पर मँडरा रहा था। रात की पलकें धीरे-धीरे भारी हो आयी थीं। मैंने उसे अपने और क़रीब खींचते हुए गहरी आवाज़ में पूछा था-“ज़िन्दगी की सबसे ख़ूबसूरत रात का एक हादसे में तब्दील हो जाना आपके अन्दर सब ऊसर कर गया होगा, सच बताइए, उसके बाद देह का सुख, स्वाद क्या आपके लिए एकदम से वर्जित हो गया है?”

मेरे इस प्रश्न में कई प्रश्न छिपे हैं, शायद वह भी समझ रही थी, तभी मुझसे यकायक परे हो गयी थी-“ऐसा क़तई नहीं है! सेक्स मेरे लिए देह से की गयी प्रार्थना है। ऐसी प्रार्थना जो दो शरीर दो हथेलियों की तरह एक साथ जुड़कर एक ही छन्द, लय और ताल में एक ही उद्देश्य से करते हैं-उस बन्धन में जो योग और अर्द्धनारीश्वर है और उस मुक्ति के लिए जो बुद्ध का निर्वाण या आशुतोष का ध्यान है। प्रेम में घटित हुआ सम्भोग बन्धन में अपनी मुक्ति तलाश लेता है और हर मुक्ति को अपना आलिंगन बना लेता है।”

अपनी बात समाप्त कर वह थोड़ी देर चुपचाप चलती रही थी। रुपहली चाँदनी में उसके अंग के रचाव और कटाव रह-रहकर तलवार की तरह चमक उठते थे, और मैं उस क्षण के सम्मोहन में बँधा चलते-चलते ठिठककर रुक जाता था। बँगले में पहुँचकर अन्दर घुसने से पहले उसने मुड़कर न जाने किस नज़र से मुझे देखा था- “उस वहशी को मैंने अपने अन्दर की सारी सुन्दरता नष्ट करने का सुख नहीं दिया था। एक दिन जब वह नशे में धुत् था, प्रेम के खेल के नाम पर उसके हाथ-पाँव बाँध कर मैंने उसके सीने पर सवार होकर उसे बुरी तरह रौंदकर छोड़ दिया था। अन्त में वह पीड़ा और आतंक से भरकर रोने-गिड़गिड़ाने लगा था। अपना प्रतिशोध पूरा कर उसी रात मैं उसकी हवेली से भाग आयी थी। मेरे पीछे सभी ने मुझे बहुत ढूँढ़ा मगर मैं लन्दन में अपने मामा के पास चली गयी थी। उन्होंने मुझे शरण दी थी। वहाँ उनके पास रहकर मैंने अपनी आगे की पढ़ाई पूरी की थी।”

“ओह नो!” उसकी बात सुनते हुए मैं आतंकित हो उठा था। “ओ यस!” रोशनी और छाया के मायावी आलोक में उस समय उसका चेहरा कितना विलक्षण हो उठा था, कैसा दुर्दान्त! अँगीठी-सी धधकती पुतलियों से उसने मुझे घूरा था-“अब क्या है कि पांचाली के सखा तो एक थे, मगर पांचाली तो एक नहीं, तो हम आधुनिक द्रोपदियों को अपनी लज्जा की रक्षा ख़ुद ही करनी पड़ती है और उसका एक तरीक़ा मुझे यह भी लगा!”

और फिर मेरे चेहरे के भाव देखते हुए उसके चेहरे की कठिन रेखाएँ नर्म हो आयी थीं-“सेक्स एक बहुत ख़ूबसूरत अनुभव है, मगर हमें अपनी देह को जीना चाहिए, न कि उसमें मरना-खपना। देह में आत्मा रह सकती है, मगर आत्मा पर देह नहीं लद सकती, वरना इसकी यात्रा भी श्मशान की चिता तक जाकर ख़त्म हो जायेगी।”

अपने कमरे के दरवाज़े पर खड़ी होकर अब वह मुझे देख रही थी। ऐसे जैसे अपने पूरे वजूद के साथ मुझ में उतर रही हो। उसी क्षण मुझमें कुछ अद्भुत, कुछ विलक्षण-सा घटा था, जिसे एक जाना-पहचाना नाम देकर मैं उसे सरलीकृत नहीं करना चाहता था। मैं अपने अनुभव पर स्वयं चकित था। पीड़ा और हर्ष का ऐसा दुर्दान्त स्वाद आज से पहले मैंने कभी इस तरह से एक साथ नहीं चखा था। वह जो अब तक मेरे आसपास थी, अब मेरे अन्दर थी, कुछ इस तरह से कि मेरे लिए जैसे मेरे ही अन्दर कोई जगह नहीं बची थी। आश्रय पाकर निराश्रित हो जाने का यह कैसा अद्भुत अनुभव था!

उसने यकायक आगे बढ़कर मुझे अपने पास खींच लिया था, इतना कि मैं नज़र भर की दूरी तलाशने लगूँ! कैसी विडम्बना है कि प्रेम और आतंक की अनुभूति एक-सी होती है-वही नसों में लहू की तेज़ सनसनाहट, कनपटियों पर धड़कता दिल और निगाहों के सामने धुन्ध और धुआँ…उसने मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिये थे-भीगे और ऊष्ण! उनके मखमली दबाव को महसूस करते हुए मैं अपनी नसों में बहती शहद की मीठी धार में अनायास डूबने लगा था। वह मुझे हलके-हलके चूमती रही थी। उसकी देह से उठती पसीने और परफ्यूम की मिली-जुली मादक स्त्री गन्ध का मौन-निमन्त्रण मेरे अन्दर कहीं आँच देने लगा था। मैं अपने रगो-रेश में उत्तेजना महसूस कर रहा था-ख़ुद को पूरी तरह देकर उसे सम्पूर्णता में पाने की एक पागल इच्छा, अनजाने ही मेरे हाथ उसकी खुली कमर के इर्द-गिर्द लिपट गये थे। उसके उरोजों का हरारत भरा नर्म दबाव मेरे सीने पर था। मुझे लग रहा था, दो सहमे हुए कपोत थरथराते हुए मेरी गरम हथेलियों में अपना आश्रय ढूँढ़ रहे हैं। मैं उन्हें किसी उन्माद भरी इच्छा और प्यार से भरकर दबोच लेना चाहता था, सहलाना चाहता था देर तक…

लेकिन इससे पहले कि मेरे हाथ कुछ ज़्यादा उद्दण्ड होते, वह अचानक मुझसे अलग हो गयी थी-“नहीं, बस, हम यहीं ठहर जायेंगे प्रणय! अगर इतना-सा क़रीब नहीं आते, ज़िन्दगी-भर एक ख़्वाहिश हमारा पीछा करती रहती, और अगर इससे आगे बढ़ गये तो कुछ बहुत ख़ूबसूरत हमेशा के लिए खो देंगे!”

मैं कुछ न समझने की स्थिति में उसे चुपचाप देखता रह गया था। मेरे लिए मेरा जिस्म सबसे बड़ा सच था, उसके बिना न कोई सम्बन्ध मुक़म्मल था न मैं होने देना चाहता था। मगर वह सच होकर भी परछाईं बनकर रह जाना चाहती थी। मैं परछाइयों के पीछे भटकने में यक़ीन नहीं रखता था। मेरी दुनिया गरम ख़ून, उत्तप्त श्वास और चिकनी त्वचा के मादक स्पर्श से बनती थी, अमूर्त, देहातीत स्वप्नों से नहीं! मैं शान्त था, मगर मेरे भीतर कुछ उबाल खाने लगा था-एक प्रछन्न क्षोभ, विरक्ति…

कुछ क्षणों की चुप्पी के बाद उसने फिर आगे बढ़कर मेरा हाथ पकड़ लिया था-“आज तुमसे बहुत कुछ पाया है प्रणय! इसे आगे की यात्रा के लिए सहेजकर रखना चाहती हूँ, जिस्म के जंगल में खोना नहीं! तुम नहीं समझोगे, हम औरतों के लिए अक्सर यह जिस्म ही पिंजरा बन जाता है। चाहती हूँ, इस देह के आगे भी कोई आये, वहाँ जहाँ पशुता की सीमा समाप्त कर आदमी इन्सान बनता है, रूह, सोच और अहसास बनता है! रूहों के बीच से इस तन की मिट्टी को हटाना चाहती हूँ, यह हमें एक-दूसरे तक पहुँचने नहीं देती। बहुत अकेलापन है इस हाड़-मांस के राजप्रासाद में!”

मेरे लिए उसके सारे शब्द पहेली थे। मैं अब भी अपने शरीर की आँच और उत्तेजना से उबर नहीं पाया था। उसकी आग, रेशम और ख़ुश्बू से गुँथे उस तिलस्मी शरीर ने मुझे मेरी आदिम. कैफ़ियत में डाला हुआ था। उसने हलके-से मेरे होंठों पर उँगली फिरायी थी-“आज की ये ख़ूबसूरत रात रह जाने दो हमारे बीच ताकि कभी उजाले में मिलें तो नज़र न चुराकर एक-दूसरे को पहचान सकें।”

“मगर…” मेरे अन्दर इच्छाओं के एक अनाम बवण्डर ने उठकर मेरी आवाज़ को रौंद डाला था।

“अब कुछ मत कहना प्रणय! ज़रूरी नहीं कि स्त्री-पुरुष के जिस्म हमेशा प्रार्थना में दो हथेलियों की तरह जुड़ें। वे एक दुआ में दो हाथों की तरह अलग-अलग रहकर भी एक सनातन साथ में हो सकते हैं। आओ, हम हमेशा एक दुआ की तरह साथ रहें, प्रार्थना में जुड़कर अपना-अपना अस्तित्व समाप्त न कर लें।”

बात ख़त्म करके उसने अपने कमरे में घुसकर अन्दर से दरवाज़ा बन्द कर लिया था और मैं उसकी कही बातों का मतलब समझने की कोशिश करता हुआ वहाँ न जाने कितनी देर तक खड़ा रह गया था। पूरब में रात की साँवली कोर हलके-से रसमसाई थी, क्षितिज पर उजाले की नर्म दस्तक-सी थी। पास ही कहीं हरसिंगार के फूल निःशब्द झर रहे थे। हवा सुगन्ध से बोझिल हो रही थी। सुबह होने में अब ज़्यादा देर नहीं थी शायद। मगर ये रात अपनी गहरी तृष्णा और अमित तृप्ति के साथ मेरी ज़िन्दगी से अब कभी बीत नहीं पायेगी। रह जायेगी अपने अनोखे रस, गन्ध और स्वाद के साथ चिर दिन के लिए, अपने अन्दर मैं कहीं बहुत गहरे यह शिद्दत से महसूस कर रहा था।