अतर (वयस्क कहानी) ~ प्रत्यक्षा सिन्हा

 

Atar Kahani by Pratyusha Sinha (Adult Story in Hindi)

पतली-सी गली थी जहाँ घर एक-दूसरे से सटे पड़े थे। खिड़कियाँ और छज्जे इसी गली में झाँकते जैसे अब गिरे तब गिरे। औरतें इन्हीं छज्जों से लटक, इन्हीं खिड़कियों के पल्लों से झाँकते एक-दूसरे से गपियातीं। अगर कोई जो इस गली से गुज़रता उसके सर पर गप्पों और नमक-मिर्च मिली अफ़वाहों का चँदोबा तना होता। राहगीर ऊपर तकते मुस्कराते। गर तो इसी मोहल्ले का बाशिन्दा होता तो उसे ऊपर देखने की ज़हमत न उठानी पड़ती। आवाज़ से मालूम पड़ जाता कि कौन कह रहा है। अजनबी राहगीर जबकि ज़रा उत्सुकता से एक नज़र ऊपर फेर लेते और मुस्कराते निकल जाते।

फिर बिना किसी जासूसी के ये पता लग जाता कि शकूर की बीवी ने भेड़ का शोरबा पकाया है, याकि मोहसिन की अम्मी ने रात के लिये सेवईयाँ पकाई हैं, या फिर दस साल के गफ़ूर मियाँ पतंग उड़ाते छज्जे से गिर सर तुड़ा चुके हैं, या ये कि किरपा के सन्निपात बुख़ार हुआ पड़ा है। ये भी सबकी जानकारी में था कि फ़रिया का मियाँ दुबई गया है और ये कि सुबूही का ब्याह किसी दूर देश के लड़के से तय हुआ है जहाँ से जब एक दफ़ा मिलने आया था तो एक अजीब-सा अतर लेकर आया था।

अबान ख़ूब लम्बा ख़ूबसूरत जवान था। उसके चेहरे पर हलकी भूरी दाढ़ी थी और आँखें, माशाअल्लाह ऐसी आँखें जो न जाने किस दुनिया में खोयी आँखें थीं। ताई अम्मा बुड़बुड़ाती हैं, जैसे ख़ुद ही कहीं गुम हो आया हो।

नुसरत, सुबूही की अम्माजानी चेहरा सिकोड़कर चुपके से एक कोने थूकती-फूँकती बला टालतीं, निगोड़ी ताई अम्मा मेरी बन्नो की क़िस्मत से जलती हैं, मरे मेरे दुश्मन, खोयें मेरे दुश्मन।

लेकिन पहली दफ़ा जब सुबूही ने ये सुना, उसके शरीर पर एक सिहरन दौड़ गयी थी। अबान की नज़र उसे याद आयी थी, भेदती-टटोलती जानकार नज़र, जैसे उसे उसके आर-पार की ख़बर हो गयी हो।

अबान दूर के रिश्ते में था, या शायद दूर के रिश्ते के किसी का साथी। ये तार इतना पेचीदा था कि रिश्ते को साफ़-साफ़ चीन्ह लेना एकदम मुश्किल। उसके लिए ज़मीन में किसी लकड़ी से पूरा नक़्शा बनाना कि ये रहे अलाँ और इनकी बेगम फलाँ, उनका बेटा ये, उसकी साली वो, साली के शौहर की चाचाजाद बेटी की मुमानी जिस गाँव में ब्याही…ऐसे-ऐसे-ऐसे, और फिर सब इतना गड्डमड्ड हो जाता कि कौन बेटी, कौन मुमानी, किसकी खाला, किसके भाई, सब तार उलझ जाते।

फिर अबान!

अबान तो था ऐसा कि जाने किस जहाँ की धूल फाँक आया हो और उस दूर देश के नज़ारे अब भी उसकी आँखों में ऐसे बसते हों कि इस जहाँ के नज़ारे सब बदरंग फीके हों। वो चुप गुम अपने में खोया रहता और बहुत कुरेदे जाने पर हूँ-हाँ में जवाब देता। सुबूही का दिल किसी गहरी खाई में पत्थर की तरह जा गिरा था। हाय, ये कैसा आदम ज़ात उसके हिस्से पड़ना था, यही जो उसे देखता न था। जाने कौन-से जहाँ की छाया उसकी नज़रों में डोलती थी। लेकिन एक बार उसकी नज़र किसी बाज़ की तरह उसके चेहरे पर पड़ी थी, जैसे आग की लहक हो, जैसे अबान ने उसे दाग दिया हो, तुम मेरी हो। उफ़्फ़ क्या था उस निगाह में? कितनी दफ़ा सोचती है सुबूही, पहचान ले उस नज़र को? मोहब्बत थी, हिक़ारत थी? पा लेने की शिद्दत थी? क्या था आख़िर?

और ऐसा नहीं था कि सुबूही बुरी थी दिखने में। ठीक है कोई हसीन न थी, पर उसकी गन्दुमी रंगत में एक ऐसी रोशनी झलकती कि उसका चेहरा किसी नूर-सा दमकता। उसकी आँखें ज़रा फैली-सी थीं और उनकी पुतलियाँ ऐसी भूरी हरी कि लगता कोई हैरान, दुनिया को अचरज से देखता, हिरण का बच्चा हो।

जवान-जहान लौंडे पलटकर उसे देखते ज़रूर थे सारे। जब वो मदरसे को जाती, कभी दर्जी से कढ़ाई-कसीदा करवाने, या किसी गुइयाँ सहेली के ठिकाने। बुर्क़ा तो ओढ़ लेती, पर चेहरा खुला रहता। आख़िर उसी का मोहल्ला था, उसी की अपनी दुनिया जहाँ पैदा हुई, पली-बढ़ी, जहाँ हर कोई खाला, ताया, चचा, भाई, आपी, बाजी थे। सब अपने थे। और हर घर दूसरे से जुड़ा था आँगन-सहन से, छतों की दुछत्तियों से। और कई बार किसी के घर जाने के लिए गली में निकलना क़तई ज़रूरी न होता, बस आँगन की दीवार में जड़े किवाड़ से पड़ोस के घर में और फिर उससे अगले में जाया जा सकता था। तो तुर्रा ये कि हर मकान की साझी दीवार थी और हर घर दूसरे में खुलता। इस तरह सब खरगोश के बिलों की तरह एक-दूसरे के साथ रहते ऐसे ही उनकी ज़िन्दगियाँ भी दूध में रूह-अफ़्ज़ा की तरह घुल गयी थीं। उनके बच्चों की एक-दूसरे से शादियाँ हो जातीं और कई पुश्तों से ये होता आया था कि अब किसी का दूसरे से रिश्ता निकालना बड़ी मगजमारी थी। कोई किसी का मामू और भाई एक साथ हो जाता, कोई मुमानी, आपी, खाला। किसी का किसी से एक सीधा इकहरा रिश्ता नहीं था। उसमें दस उतार-चढ़ाव और पेचोख़म थे।

ऐसा होते हुए भी लेकिन ये कोई ज़मानत न थी कि सब मीठा सुबुक ही रहेगा। जो नदी भीतर-भीतर बहती थी वो हमेशा मीठी नदी नहीं थी। कभी उसमें दोजख़ की गन्ध भर जाती। उसमें गाढ़ा अँधेरा मचलता, उससे एक बू उठती। ऐसी सड़ी हवा की भाप उठती जैसे शैतान ने ही ख़ुद मूत दिया हो। पर कभी न जाने क्यों एक मीठी ख़ुश्बू भी तिरती आती, ताज़े फूलों की सब्ज़ महक, लोबान की पाक सुगन्ध।

उस घर में ऐसे कई गुप्त कमरे थे जहाँ अँधेरे और मकड़जाल का राज था। ये कमरे तालेबन्द थे और सदियों से यूँ पोशीदा थे कि अब घरवालों को याद तक न था कि घर में ऐसी कोई जगह भी है। कोई भूत जिन्नात था जिसने अन्दर की सब हवा को निगल लिया था और अम्माएँ बच्चों को डरातीं, ख़बरदार जो उस तरफ़ देखा भी। गर कोई बच्चा उधर भटक जाता तो तुरत मुट्ठी-भर लाल मिर्च आग पर जलाकर, उसकी धाँस वाली हवा को बच्चे के सिर पर वार कर बलाएँ टाली जातीं।

बलाएँ जाने कहाँ जातीं, पर पूरा घर खाँस-खाँसकर बेदम बेहाल हो जाता।

ये कमरे आख़िर बने भी क्यों, कब और किसलिए थे? और ऐसे ताबूत से बन्द भी किसने और क्यों किये आख़िर?

सबसे उम्रदराज सौ बरस की बीबी थीं। शायद उन्हें ही पता था। और उनसे कुछ निकलवा लेना नामुमकिन। कोई पूछ ले तो अपने कान ऐसे ढँक लेतीं जैसे पिघला सीसा डाल दिया हो किसी ने। फिर ऐसे झूमतीं जैसे कोई जिन्न सवार हो गया हो। उनकी आवाज़ फुसफुसाती-बुदबुदाती आती, जाने कौन-से रहस्य का खुलासा करती हो, पर कान सटाओ तो पता चलता कि, ओ अच्छा! क़ुरान की आयत बुदबुदा रही हैं।

कभी-कभी जब होशमन्द होतीं, तो साफ़ टनक आवाज़ में कहतीं, “उफ़्फ़ क्या हौलनाक समय था। सबको मारकर, कमरे में ठूँसकर जला दिया कमबख़्तों ने, उन कमरों में मौत है, जली हड्डियाँ हैं, राख है, मौत की चीख़ है। मत खोलना, वरना उस कमरे में बन्द शैतान निकल आयेगा, हम सबको लील लेगा।”

हाड़ कँपाती आवाज़ में बीबी ऐलान करतीं, उसके बाद ऐसे झूमतीं जैसे जोग चढ़ा हो, फिर अचानक से रोने लगतीं, सूखी-सी रुलाई जिसमें आँसू न गिरते बस चेहरा ओड़मोड़ होता जैसे बदन से जान निकलती हो।

फिर एकदम अचानक से हँसतीं, गिड़गड़ातीं, मिन्नतें करतीं, “ऐ निगोड़ियों कुछ खाने को तो दो, महीनों से कुछ मीठा नहीं खाया, ऐ लड़की जा भाग जल्दी से, ला दे मुझे मीठे चावल, फिरनी, शीर खुरमा, शीरमाल, बाकरखानी।” उँगलियों पर नाम गिनातीं ऐसे जैसे कोई बच्चा पहाड़ा रटता हो।

फिर ऐसे भूख में सुबकतीं जैसे महीनों से न खाया हो जबकि सच्चाई ये थी कि आधे-एक घण्टे पहले ही दम-भर खाकर उठी थीं।

बीबी की भूख उनके जिस्म के उलट बड़ी भारी और दमदार थी। वो दिखतीं तो सूखे छुहारे-सी जैसे सब पानी निचोड़ दिया गया हो, और शरीर सूखी दरार पड़ी ज़मीन-सा ऐंठा, सूखा, बंजर हो गया हो। लेकिन बीबी के पास कहानियाँ-क़िस्से थे, शहरजाद के हज़ार रातों से भी बढ़कर। एक से एक, जादू भरे, एक से एक ख़ूबसूरत जवाँमर्दों और हसीन बेगमात के, ऐसे नवाबों और बादशाहों के, इस मुहल्ले और घरों के भीतर सात पुश्तों से छुपे राज़ों के। ये और बात थी कि अब ज़हन पर जाले तारी हो गये थे और कोई भी क़िस्सा समूचा-साबुत उनके पास बचा न था।

सुबूही उनके पास दिन में कई बार बैठती, जब-जब काम से फ़ुरसत होती तब-तब। क्रोशिए से सफ़ेद झाग-सा लेस बुनती और बीबी की बुदबुदाहटों पर धीमे-धीमे मुस्कराती, ऊपर आसमान देखती और फुर्र से उड़ जाती। ये आसमान का टुकड़ा भी वैसे साबुत-समूचा कहाँ था। नीले आसमान पर बिजली के तारों का ताना-बाना था। फिर एक तरफ़ वो विशाल पीपल का पेड़ था जिससे दिन-भर पत्तियाँ झरतीं। जैसे कोई धीमा राग गिरता हो, जैसे कोई बजाता हो दिलरुबा और उसके सुर नाचते गिरते हों बड़े धीमे-धीमे। फिर दिन-भर आँगन बुहारना पड़ता। सुबूही धीमे-धीमे गाते हुए बुहारती जैसे नाचती हो। परिन्दे चहचहाते शाखों और फूलों पर उतरते मानो साथ संगत देते हों।

आँगन की चारदीवारी सफ़ेदी से पुती थी और धूप चकत्ते में पीपल के पत्तों से गुज़रती ऐसे गिरती कि सब नया नकोर हलका होता, उजास से भरा, एक ठहरती सिमटी हुई ख़ुशी जैसे ये पल कभी न गुज़रते हों इस इफ़रात समय में। भीतर के ठण्डे पत्थरों और भारी लकड़ी की दीवारों वाले दमघांटू कम्बल के अँधेरों से कितना अलहदा।

दिन-भर काम में फँसी सुबूही अबान के बारे में सोचती। उसकी आँखें ऐसे मुँदी छुपी क्यों थीं? क्या था उनके भीतर? सौ तालों में ढँका?

अबान से उसे उस अतर की याद आती जो वो लाया था। कितना गाढ़ा, तिलिस्मी, जादुई और सबके ऊपर जैसे किसी गुनाह से उपजा हो, कोई पोशीदा-सी बात हो। उसकी ख़ुशबू ने रेशमी साटन-सी कसीदाकारी उसके दिल पर कर दी थी, जैसे मन्तर फूँका हो और उसका एक रेशा धुआँ था, एक क़तरा रात का घना साया था। उसमें एक परत मोहब्बत का जज़्बा था और सौ सूत तलब थी। और सबके ऊपर उसकी पागल कर देने वाली दीवानावार ख़ुश्बू थी जो जाने किस गर्त से आती थी कि बेहोश कर देती, सिहरा देती ऐसी उम्मीद से कि उफ़्फ़, ऐसी ख़्वाहिशों से जिन्हें कभी सोचने तक की तवक़्को न की हो, रात की गहरी नींद के सपने तक में न देखा हो। उसका शरीर भारी हो जाता, जैसे कोई गाढ़ी शराब उसकी शिराओं में बह रही हो, उसका चलना मदहोशी का आलम था। लगता उसका बदन बह जायेगा, उस तरफ़ जहाँ वो सुगन्ध है, कोई खींचे लिए जाता था-जाने किस स्याह जादू-भरी दुनिया में, जहाँ आवाज़ फुसफुसाती-‘आओ, आओ जानेमन, आओ!’ और इस शिद्दत से उसे ‘वहाँ’ होना था, कि वहाँ बस अब इसी समय ‘यहाँ’ हो जाये, बस अभी इसी समय, वरना वो हज़ार टुकड़ों में टूटकर बिखर जायेगी, जैसे एक स्याह नदी, रेशम-सी उसके भीतर बहती थी। और चूँकि इस नदी की ज़द उसे मालूम न थी, उसकी ताक़त डरावनी थी, सुबूही ऐसी बेचैन जान हो जाती कि बेचैनी उसके भीतर किसी चील सी ऊपर-ऊपर चक्कर काटती तीखी तेज़ कटार होती जाती।

अब उससे बीबी के बगल में बैठा न जाता। वो क्रोशिया चलाते सुकून बिनना कहीं गुम गया था, अम्मा के साथ रसोई में बड़े देग में गोश्त और बगेरी पकाते अम्मा की लगातार बुड़बुड़ पर मुस्कराना गुम गया था। सिर्फ़ जब वो दालचीनी और लौंग कूटती तो दरदरे टूटते मसाले से उठती ख़ुश्बू उसे वहीं ले जाती जहाँ अबान था जहाँ अतर की कस्तूरी जान थी।

उसके पास अतर का एक डब्बा है, अतरदानी, चन्दन की लकड़ी का जिसकी नक्काशी पीतल के सुनहरे तारों की है और कोने संगमरमर के। उसके भीतर नीले साटन पर इत्र की शीशियाँ सोती हैं। जब अतरवाला आता, सुबूही सबसे पहले भागती, इस बार कौन-सी नयी ख़ुश्बू लाये हैं बाबा मियाँ।

बाबा मियाँ सफ़ेद दाढ़ी वाले बुज़ुर्ग थे। बड़ी दूर से आते थे जहाँ समन्दर भी था और पहाड़ भी। उनके ठिकाने के पास देवदार, बेयार, शेगुल, बन पीपल, कनूर और बाँज के ऊँचे पुराने दरख़्त थे और इन सबकी ख़ुश्बू का अर्क वो अपने साथ लिए आते। केसर, अखरोट, अंजीर, चिलगोज़े और रसभरियों की महक उसके अतीदान में घुसपैठ करती। समन्दर के झाग की नमकीन हवा, समुद्री वनस्पतियाँ, शंख और भीगा रेत बवण्डर मचाते, लहरों का गर्जन, मछलियों का तैरना, कछुओं की साँस, गुलाबी सेंधा नमक समन्दर से निकलकर अतर में समा जाता।

और जैसे-जैसे वो इत्रदानी खोलते एक-एक करके, जमा हुए लोग उस जगह पहुँच जाते जहाँ हवा साफ़, ठण्डी और कुरकुरी थी, जहाँ फ़िज़ा मीठी और मासूम थी, जहाँ फूल और पत्तियाँ त्वचा पर खिलते-खिलखिलाते थे।

ये रहा गुलाब, ये सुर्ख़ नारंजी, और ये रहा फिरदौसे अतर, और ये…उनकी आवाज़ भारी हो जाती, बाँहें खुल जातीं, जैसे जन्नत को आग़ोशवार कर रहे हों, अल हरमैन, जन्नते फ़िरदौस, ये कस्तूरी, ये मुश्क़े हिना, ये ज़र्दे आफ़ताब, बलूत, ये फ़ारसी शिफ़ायत, ये ईरानी गुलयास, और…उनकी आवाज़ अब फुसफुसाती…जैसे कोई नाटक का अहम पार्ट अदा होना हो…ये रहा सुफ़ैद धतूरा…अफ़ियुन काफ़ूरी।

कभी उनका एक भी इत्र न बिकता, कभी अब्बा मान जाते तो सुबूही अपनी पसन्द के उठाती कुछ। धीरे-धीरे साल-दर-साल उसकी अतरदानी भरती गयी। नन्ही शीशे की हीरे की कनी-सी चमकती इत्रदानियाँ जिसमें सब्ज़, फ़िरोज़ी, सुर्ख़ अतर झलमलाता। इन पारदर्शक झिलमिल शीशियों में जुगनू चमकते, तारे चमकते, याक़ूत और ज़मुर्द की कनी लश्कारा मारती।

सुबूही महक जानती थी, सचमुच जानती थी, उसका रेशा-गोशा पहचानती थी। उसको ख़बर थी कि उस इत्र में क्या सामान गया है, उसे पता था कि उस सामान का असर कितना मारक है। हाँ, उसे महक की पहचान थी, उसकी हर हरकत-मुरकत को जानती थी, उसके अँधेरों-उजालों को देख सकती थी, हर ख़ुशबू से बात कर सकती थी, जैसे दरख़्तों फूलों से बात करती, वैसे महक को छूती सूँघ सकती थी, ज़ुबान पर उसका स्वाद चख सकती थी।

रात होते ही सुबूही एक-एक करके इत्रदानियाँ खोलती, हौले से नाक के पास अपने होंठों के ऊपर फिराती। हरेक इत्र अलग था, हर एक ख़ास था, पर कोई भी अबान के लाये इत्र-सा नहीं था।

अबान का इत्र अलग दुनिया से था जो न जन्नत था न दोजख़। बीच रात जब चाँद टहनियों पर झुक खिड़कियों के रास्ते कमरे में झाँकता, तब सुबूही उस अतर को निकालती, अपनी कलाइयों की उस नब्ज़ पर लगाती जहाँ से उसका दिल जुड़ा था, अपने कान के पीछे की उस नाज़ुक छुपी जगह पर मलती, अपनी कुहनी के भीतर उस नन्हे गड्ढे पर टपकाती, फिर इन्तज़ार करती। एक सुलगन-सी लहक उठती, जैसे लोबान जला हो, उसका धुआँ छल्ले बनाता उठता और उसके बदन के हरेक पोर, त्वचा के हर इंच, उसके बदन के हर गुप्त कोने अन्तरे को भीतर सेंध लगाता ढँक लेता।

फिर हर सुराख़ के भीतर बहता, पहले उसकी नाक के भीतर, फिर त्वचा के भीतर किसी नदी-सा बहता और फिर एक ऐसा धमाका होता कि उसकी चीख़ निकल जाती। उसको पटक डालता, उठाता-गिराता, धमाल मचाता, उसके भीतर सब चीथड़े करता किसी बन्दूक़ की गोली-सा दनदनाता फट पड़ता। उसके भीतर एक लावा दहकता, सुर्ख़ लाल और फिर उसी तेज़ी से एक ठण्डा नीला ग्लेशियर सब जकड़ने लगता। फिर रंगों की बरसात होने लगती, हर रंग क़ुदरत की अलग ख़ुश्बू के आयाम बिखेरता।

दहकता जंगली आग-सा, शैतान, नटखट, रंगीला, चंचल, कामुक। हर एहसास को वो अपने भीतर गुज़रने देती एक के बाद एक, कभी सब साथ, और जब ये वक़्फ़ा गुज़रता, तब ख़ुश्बू उसके कानों में दाख़िल होती और तब उसे परिन्दों के रात को रोने के स्वर सुनाई देते, हाथियों के चिंघाड़ने के, आदिवासियों के पूर्णमासी की रात को नगाड़े बजाकर रूहों के आह्वान के, लहरों के गरजने के, व्हेल मछलियों के गाने के, हवा के किसी चुड़ैल की तरह बीच दोपहरी के सुन्न सन्नाटे में चीख़ने के, पेड़ों के जंगलों में रहस्यमय तरीक़े से फुसफुसाने के, भीगे फिसलन भरे, सालन के देग में उबलने के, खुली आग के चरमराने के और सूफ़ियों के नात गाते किसी आदिम तन्द्रा में चले जाने के।

और जैसे इतना काफ़ी न था, ख़ुश्बू उसकी आँखों में झिलमिलाती और फिर उसे सिर्फ़ समा में नाचते जुनूनी दरवेश दिखते। फिर वो भी उन्हीं में एक हो जाती, गोल-गोल नाचती बेक़ाबू बेहोश।

और फिर वो उसके होंठों को सहलाते, उसकी जीभ पर ठहरते, उसके मुँह में आबेहयात का स्वाद होता, इतना तीखा फिर भी कितना मुलायम, हलका-हलका जैसे कोई नूर, झलमलाता जैसे मलमल, फिर भी गाढ़ा जैसे शहद।

और अन्त में वो उसके बाग़-ए-बहार को छूता, मुलायमियत से जैसे झिझकता अन्दर आता हो। उसका मीठा कुआँ, उसकी गेहूँ की बाली, उसकी हरियर नर्म सरसब्ज़ मिट्टी, उसके भीतर का जगमगाता कोहिनूर। उसका शरीर किसी दर्द की ऐंठन में और किसी ऐसी लज़्ज़त से बल खाता जैसे ये दुनिया यहीं ख़त्म हुई और दूसरी की झलक दिखती हो। दर्द किसी तीखेपन से उसे पहाड़ की चोटी पर ले जाकर पटक देता।

वो इस दर्द की लहर पर नाचती हुई किसी सुरूर के लुत्फ़ पर सवार झूमती है, रेशम, साटन, मलमल के तितली पंख से धागे और जबकि रात की स्याह चादर करोड़ों तारों से जड़ी है। उसका बदन धड़कता है, एक लहर फिर एक और फिर एक और। दालचीनी किसी ने धुँआया है, बलूत जलाता है कोई, आग रात में पीली गरम सुलगती है। उसका बदन ऐंठता है, एड़ियाँ कितनी दहकती लाल हैं, चेहरा कितना तमतमाया दमकता है, उसका बदन, उफ़्फ़ कितना-कितना गर्म है, कितना-कितना नदी है, लज़्ज़त के उस मुहाने पर खड़ी, उसके भीतर की चिड़िया एक अन्तिम उड़ान भरती है।

ओह कैसी थकन है, पसीने और अतर की ख़ुश्बू उसके सारे शरीर पर फैली है। नींद गाढ़ी है, अचानक गिरती है, अपनी आग़ोश में दबोचती उसकी पलकें बन्द करती, जैसे कोई आशिक़ बाँहों में समेट लेता हो। बिन सपनों की बेहोश नींद। और जब भोर का झुटपुटा होता है वो देखती है ख़ुद को उस कमरे के किवाड़ खोलते, जो सौ बरसों से बन्द पड़ा था। वो दाख़िल होती है और तुरत से कमरा उसे भीतर सोख लेता है। उसका बदन टुकड़ा-टुकड़ा टूटता, क़तरा-क़तरा समाता कमरे के बीचोबीच खिंचता है। ये अबान ही था जो उसे खींचता बुलाता था। ये कमरा लज़्ज़त का था, शहवत का, बीबी ठीक कहती थीं, यहाँ शैतान का ही तो रहवास था, पुर शहवत शैतान।

नुसरत को आश्चर्य होता है। आज इस लड़की का रवैया कुछ फ़रक़ है। कुछ है जो उसकी नज़र में आता है फिर ओझल हो जाता है। दिन-भर माथे में एक कील जड़ा उसे परेशान करता है।

फिर बीबी के पास बैठती नुसरत कहती है, “बीबी आज जी हलकान है, अच्छा नहीं लग रहा।”

बीबी दायें-बायें झूमती कुछ नहीं बोलतीं।

“बीबी सुबूही की बात है।”

बीबी अब भी झूमती हैं।

नुसरत कुछ देर बैठती है, उसका माथा चिन्ता की सलवटों से सजा है। फिर एक आह भरती उठ जाती है। सुबूही के अब्बा से तो इस बात को करना ही बेकार है, मर्दों को ये बातें कहाँ समझ में आती हैं, मोटी खोपड़ी वाले, औरतें फ़रक़ होती हैं, उनके भीतर जो दिल धड़कता वो किसी दूसरे संगीत पर थपकता है। उन्हें तब भी संगीत सुनाई देता है जब कुछ न बजता हो।

उन्हें बंजर चट ज़मीन में भी पानी मिल जाता है, सूखे में वो अनाज तलाश लेती हैं, काली अँधियारी रातों में भी उम्मीद की किरण देख लेती हैं। वो ख़ौफ़ज़दा माहौल में सुकून बोती हैं, दर्द में मरहम होती हैं, वो पूरी क़ायनात की दुश्वारियों और ख़ुशियों का कोहसार होती हैं। तो इस तरह वो मुक़द्दस और सज़ायाफ़्ता दोनों एक साथ होती हैं।

दिन बीतते हैं, एक-दूसरे में घुलते-मिलते, बिना रुके, बिना बदले कि हर दिन बिलकुल एक-सा बीतता है और सारे दिन एक लम्बी यकसाँ चादर में तब्दील हो जाते हैं। सब कुछ बिल्कुल वैसा ही है जैसे होना चाहिए। खाना पकता है, घर की साफ़-सफ़ाई होती है, कपड़े धुलते हैं, आँगन बुहारा जाता है। फिर भी ये बीतता बहता नदी दिन जो ऊपरी सतह पर शान्त पुरसुकून दिखता है, भीतर क्या तूफ़ान छिपाये है, कौन जाने। और पहली बार इस तूफ़ान से अनजान है नुसरत। ‘कुछ है’ का अन्देशा है, पर ‘क्या है’ की बेचैनी है। किसे कहे, किससे बाँटे ये हौल दिल।

बस बीबी बाहोश होतीं। उनमें ज़ेहनी सफ़ाई होती, काश! फिर तो कोई मसला मुश्किल न था, सब उनके मशविरे से ठीक कर लिया जाता। बीबी तो सब जानती थीं, सौ परत भीतर और पेट के अन्दर पेंच को पकड़ लेतीं। फिर ताबीज़ बनातीं जिसका ऐसा असर होता कि सब परेशानियाँ उड़नछू हो जातीं। पर अब तो बीबी चन्द लम्हों को होश में आती हैं।

नुसरत फ़ातिहा पढ़ती है, बिस्मिल्लाह-हिर्-रह्मा-निर्-रहीम। या अल्लाह ये जो काला बीज मेरे दिल में धँसा है, कोई हौलनाक दरख़्त न बन जाये, बस एक साया ही हो, सच न हो, दूर निकल जाये मुझसे, दूर-दूर।

किसी से कहकर आयतल कुर्सी लिखवाकर ताबीज़ बनवाती है।

अल्लाह, मैं तेरी रहनुमाई में हूँ!

लेकिन ये नहीं पता कि इस ताबीज़ को पहनेगा कौन? फिर कुछ सोच सुबूही के कमरे के ताखे में छुपा देती है।

सुबूही जानती है हर रात अतर लगाने से ख़त्म हो जायेगा। एक घबराहट तारी होती है। अबान ने उसे उस स्याह नशीली दुनिया में किसी ऐयार के कमन्द-सा अटकाकर अन्दर खींच लिया है, गड़प से। एक शदीद जिंसी ख़्वाहिश से उसका जिस्म सिहरता है, ऐसे एहसास उसे लपेट लेते हैं जो ख़्वाब में भी सोचना गुनाह है। लेकिन जब रात गिरती है, उसके बदन का कमल खिलता है। अबान अपनी ढँकी-मुँदी आँखों से उसे इशारा करता है।

ओह अबान, तो ये छुपाते थे तुम, अबान-अबान, सुबूही की आवाज़ थरथराती है चाहत की इन्तहाई से।

अगले दिन आँगन बुहारते हुए बीबी उसे पुकारती हैं,

“ऐ लड़की, इधर आ।”

उनकी आवाज़ साफ़ और मज़बूत है।

सुबूही बुहारना बन्द कर भौंचक देखती है उनको।

बीबी के पास ऐसी जानकार नज़र है, सुबूही की हथेली को अपनी हथेलियों में ज़ोर से दाबकर मुस्कराती हैं। दालचीनी की महक उनके बीच नाचती है।

मैं भी तेरी तरह थी लड़की। अतर के अँधेरे रहस्य हैं, जादू-टोना है। मेरे पास भी था। पर देखो, वो कमरा बन्द है अब।

सुबूही की साँस जाल फँसी चिड़िया है।

बीबी अपनी कमर में खोंसे किसी छुपे बटुए से एक चाभी निकालती हैं-

“लो, ये तुम्हारा हुआ अब से।”

चाभी पीतल की है, भारी और नक्काशीदार, अकेली।

“ऐ लड़की कुछ मीठा खिलाओ, कितनी देर से कुछ खाया नहीं, जा ला मेरे लिए।”

फिर झूमती हैं, मुँह-मुँह में कुछ अटपटा गुनगुनाती हैं, सुबूही को अनदेखी आँखों से देखती हैं। बेहोशी की चादर फिर से तन गयी है। उनके झूमने की गत बढ़ती है, पगलाई-सी।

रात जब पूरा घर नींद की गुफा में दफ़न है, सुबूही दबे पाँव उठती है। ऊपरी मंज़िल के गलियारे के अन्तिम सिरे कमरा इन्तज़ार में गुपचुप खड़ा है, बरसों से। ताला कब से खुला नहीं बकरी साल, हाथी साल, चील साल; पर ग़ज़ब, चाभी ताले में ऐसे घूमती है जैसे हर रोज़ बीस मर्तबा खोला बन्द किया जा रहा था।

अगले दिन अबान अचानक बिन ख़बर आ धमकता है।

अपने साथ एक ख़ूबसूरत डब्बा लाया है, इत्रदानियों से भरा। सुबूही उसे देखती नज़रें बचा-बचाकर मुस्कराती है।

उसका बदन एक अलग लय में डोलता है, उसके कूल्हे अलग गोलाई लिए हैं आज, उसकी गर्दन तनी हुई है जैसे एक हिरणी, उसकी कलाइयाँ, उसकी बाँहें, हवा में ऐसे फैलती हैं जैसे किसी को आग़ोश में भर लेने को आतुर हों, उसकी छाती फैलती, कुर्ते पर तन जाती है, उसके गाल पके फल की तरह तमतमा जाते हैं, गुलाबी, दमकते, फट पड़ने को तैयार अनार।

उसका डर निकल गया है। अबान को देखती उसकी नज़रें बेख़ौफ़, बरजोरी की हैं। अबान उसे अपनी भारी आँखों से देखता है। उनके बीच आग लहक जाती है।

न, अब उसे कोई ख़ौफ़ नहीं।

कहीं और कोई और जगह या समय नहीं, बस यही जगह, यही समय है। जैसे उस बन्द कमरे से डरती थी कि मौत का कमरा है, बीमारी और पागलपन का कमरा है। पर न, वो तो सिर्फ़ एक कमरा था, बीबी के कमरे जैसा, गहने और ख़ूबसूरत चीज़ों से अटा हुआ, उनका बड़ा काठ का सन्दूक़ जिसमें साटन की सलवार, रेशम का शरारा, मखमल के चादर, चाँदी और सोने के पाजेब, कामदार चूड़ियाँ। वो सब जो उन्होंने शौक़ से अपनी जवानी में ओढ़ा-पहना, सरियाया होगा।

उस कमरे में फुसफुसाता अँधेरा था, नीम बेहोशी थी, इत्र की ख़ुश्बू से गमकता, पाजेब की रुनझुन से बजता। किसी की गाढ़ी शहद भरी, मनुहार भरी आवाज़ धीमे से टेरती, नशे और सुरूर में,

मैंने लाखों के बोल सहे, सितमगर तेरे लिए

वो कमरा नशे और सुरूर की जगह थी, डोलती अँगड़ाइयों की, तृप्त-अतृप्त लालसाओं की, उस वर्जित सेब की, साँप की, पसीने और हरारत की, किसी के होंठों के स्पर्श की, उस मादक एहसास की, दीवानावार मुहब्बत की। एक नीला नशा डोलता जिसमें बदन अपनी हदें पार कर लेना चाहता, बाँहें शिथिल पड़ जातीं, आँखें मुँद जातीं, पलकें भारी हो जातीं, एक तन्द्रा, एक बेहोशी, एक पोशीदा चाहत कि कोई छू भर ले, कि सब टूट-टूटकर बिखर जाये, बस। अबान की देह उसकी देह से लगी एक साँस एक लय में हिलती, काँपती, थिरकती। ये सच था कि झूठ, छलावा था कि जादू। ओह! कोई शरीर ऐसा होता है? कठोर और नर्म एक साथ? ये कैसी ख़ुश्बू है? ये गोल-गोल चकरघिन्नी खाता दिल? ये किसका है? ये हाँफती-भागती रेल? किसकी है? कौन है? ये सीटी बजती, ये समन्दर पछाड़ खाता मेरी चट्टानों पर, ये हवा जो सहला जाती पूरे जिस्म को, ये सपना, इस सपने में अबान का होना, उसकी जलती आँखों की लपट? उसके गले की साफ़ त्वचा, उसकी उँगलियाँ, उसके कान के लाल लौ, उसके जिस्म की मर्दानी ख़ुश्बू, उसकी बाँहों की कसावट? ये सच में है कि ख्वाब की दुनिया?

ये कमरा उसके पागलपन की पोशीदा दुनिया है, यहाँ अबान है, उसका अतर है, सब छुपा है दुनिया से, सब खुला है, उससे। तो ये था कमरे का रहस्य।

फिर वो अबान को देखती, शर्मीलेपन से नहीं, संकोच और झिझक से नहीं बल्कि उस जानकारी से जिसमें उसे अपनी ख़्वाहिशों की लज़्ज़त समझ आ गयी हो।

मुझे ले चलो, जल्दी, यहाँ से दूर, जाने किससे फुसफुसाती कहती वो अबान के बगल से गुज़र जाती है।

सारे आशिक़ क़ुर्बान बरबाद हुए मोहब्बत में।

फिर भी जिसने इस वर्जित फल को न चखा उसे दुनिया में क्या हासिल?