एडोनिस का रक्त और लिली के फूल (कहानी) - मनीषा कुलश्रेष्ठ

मेरे दर्द की स्मृतियाँ बनी रहेंगी और तुम्हारी मृत्यु का दृश्य मेरी आँखों में गड़ता रहेगा। मेरे एडोनिस, मेरा यह मातम हर वर्ष हरा हो जायेगा, जब-जब तुम्हारा रक्त फूलों में बदल जायेगा। मुझे अधूरे वरदान की तरह मिली इस सान्त्वना से कोई ईर्ष्या कैसे कर सकता है?…
-वीनस (ग्रीक माइथोलॉजी की पुस्तक ‘बुल फिंच’स माइथोलॉजी)

 Adonis ka Rakta aur Lili ke Phool Kahani by Manisha Kulshrestha


“मैं अपने भीतर एक जहाज़ क्रेश होते देख रहा था। बिना तारों की इस रात में जैसे चाँद अकेला छूट गया था। मैं टूटकर रोना चाहता था, मुझे लग रहा है कि तुम मुझे भूल गयी हो, मेरे यूनिट वाले और यह देश मुझे भूल गया है। मैं कैसे तुम्हें बताऊँ कि इस गर्म रात में जंग में घायल 70-80 लोग मेरे आसपास कराह रहे हैं। मैं नहीं जानता कितनों की यह आख़िरी रात है। घायल हर कोई है, देह पर ही नहीं, मन पर भी घाव हैं। तुम मुझे फ़ोन क्यों नहीं कर रही हो? कोई पत्र भी नहीं!”
वह वार्ड में अधलेटा अपने कम्पनी कमांडर को वापस वहाँ बुला लेने और अस्पताल के कमांडेंट को रिलीज़ कर वापस युद्ध में शामिल होने देने के लिए ख़त लिख चुका था, अब आख़िरी सीले हुए नीले अन्तर्देशीय पत्र पर प्रेमिका को पत्र लिख रहा था। जंग की औपचारिक शुरुआत से ज़रा पहले, दुश्मन की तरफ़ से हुई बॉमशेलिंग में उसके कन्धे में धातु का एक तीखा टुकड़ा धँस गया था। वह घाव टिटनेस में बदल गया, एक दिन वह बंकर में बेहोश मिला…तेज़ बुख़ार में।
जिस दिन वह सैन्य अकादमी से पासआउट हुआ, उसी दिन लड़ाई काग़ज़ों और वार्ताओं की ज़द से निकल गयी थी। उसे अफ़सोस था कि जंग में शामिल होने से केवल सत्रह दिन पहले उसे वहाँ से हटा दिया गया। लड़ाई शुरू हो चुकी थी, सुदूर पश्चिम से चले कॉनवॉय (क़ाफ़िले) भी पहुँचने लगे थे। परसों सुबह से जो बुरी ख़बरें आना शुरू हो गयी थीं, वो लगातार जारी रहीं। खिड़की के पार स्ट्रेचर्स पर चीख़ें भींचते सैनिक रात को भी लगातार लाये जा रहे थे। हर एम्बुलेंस कई-कई जिस्म लाती, अधमरे या रास्ते में मर चुके, कुछ ब्रेनडेड…बस कहने-भर को ज़िन्दा…लाशें लाने वाला ट्रक अलग-थलग खड़ा था, जहाज़ की प्रतीक्षा में। टिंचर बेंजीन की महक में ख़ून और घावों के सड़ने की गन्ध जा मिली थी। अस्पताल छोटा था, स्टाफ़ सीमित। वो लोग तीन दिन से बिना सोये काम में लगे थे, क्योंकि महज़ चार घण्टे की दूरी पर युद्ध जारी था।
उसके सीने में बेचैनी घर कर गयी। सीना मलते हुए उसने अपनी बन्द मुट्ठी पलंग की रॉड पर दे मारी और हताशा में अपने बायें कन्धे को हलका चलाकर देखा फिर चीख़ दबा ली। घाव को कुरेद कर गहरा कर दिया था। संक्रमित और मृत ऊतक गहरे तक निकाल फेंके थे इसीलिए घाव भरने में वक़्त लग रहा था। एक मोटी पट्टी पूरी पीठ जकड़े थी। उसे कमांडेंट और अपने कमांडर के जवाबों की उत्सुकता थी। कुछ वह ख़ुद को स्वस्थ दर्शाना चाह रहा था, कुछ वह मन से चाहता था कि अस्पताल के काम में कुछ मदद कर सके।
वह बाहर नये आये स्ट्रेचर्स के पास चला आया। उन्हें अस्पताल के कुछ कर्मचारी घेरे थे। कुछ देर वह खिड़की के पार आकाश को ताकता रहा, कौन कहेगा इस नीले शान्त विस्तार को देखकर कि क्षितिज के उस पार युद्ध जारी है! वहाँ टेबल पर पड़ी केस-हिस्ट्री पर नोट डालती हुई एक नर्स खड़ी थी, उसने गरदन झुकाकर उसके सीने पर लगा नेमटैब पढ़ा, तो यही ‘मेजर अम्बिका जेम्स’ थी। पोस्ट ऑपरेटिव वार्ड की इंचार्ज। ‘अम्बिका’ उसने मन-ही-मन दोहराया, यह नाम एक सुन्दर, दुबली और साँवली मगर स्निग्ध त्वचा वाली लड़की का ही हो सकता था। वह उसे देख रहा है, यह अम्बिका जानती थी, उसने व्यस्तता में से भी पलक उठाकर उसका देखना देख लिया। उसके देखने से उसकी हिम्मत बढ़ी, वह उठकर उसके पास चला गया और उससे पूछने लगा कि क्या वह कुछ काम बाँट सकता है?
उसने सौजन्यता भरी खीज से कहा, “बस आप अपने बेड पर आराम करें।” बाद का वाक्य उसने फुसफुसाकर कहा था, मगर उसने सुन लिया, “गनीमत है कि तुम अफ़सर हो और तुम्हारे पास बेड है।”
तभी एक बुरी तरह घायल, लगभग ख़ून के कुण्ड में डूबे युवा सिपाही को स्ट्रेचर पर लाया गया, उसके दस्तख़त लेने के लिए तैयार केस-हिस्ट्री के काग़ज़ लिए वह जल्दी-जल्दी ओ.टी. में चली गयी। वह उसे भीतर तक जाते देखता रहा। फिर भीतर आकर टीपॉय (तिपाई) पर रखा एक अख़बार उठा लिया, नये पासआउट रंगरूट सिपाहियों के ट्रेन में लदे, आपस में हँसते-बतियाते, अनजान और अशान्त दिशाओं को ले जाये जाते फ़ोटो छपे थे…
अब उसका सब्र जवाब दे रहा था। उसने अपना पोस्ट ऑपरेटिव लबादा उतार दिया, बगल के बैग में रखा केमोफ़्लेज प्रिंट का, ख़ून सना कॉम्बेट यूनिफॉर्म पहनने लगा। अम्बिका भीतर लौट आयी-
“ये तुम क्या कर रहे हो?”
“कमांडेंट से मिलने जा रहा हूँ।”
“नहीं जा सकते…”
“वे क्यों नहीं समझते कि मैं घर नहीं वापस अपनी यूनिट के पास जाना चाहता हूँ।”
“कमांडेंट यहाँ नहीं हैं, वे बेस हॉस्पिटल में हैं, तुम भी तो नहीं समझ रहे हो, हम तुम्हें बिना डिस्चार्ज ऑर्डर के नहीं छोड़ सकते।”
“मैं कुछ नहीं समझना चाहता।” वह चीख़ पड़ा, हताशा में उसने फिर अपना हाथ पलंग की रॉड पर दे मारा।
अम्बिका ने घबराकर कॉरीडोर में रखा फ़ोन मिलाया। एक मेजर उसकी कॉल के तुरन्त बाद आ गया, यह एजुटैंट था। युवा लेफ़्टिनेंट ने उसे बावजूद घायल कन्धे के एक दमदार सैल्यूट दिया खड़े होकर। फिर बोला-
“सर, ऐसे समय में मैं बिना बात महज़ एक-डेढ इंच का घाव लिए एक पूरा कमरा और बिस्तर घेरे पड़ा रहूँ…जबकि बुरी तरह घायल सैनिकों के लिए जगह की कमी है। मुझे रिलीव करें सर, मैं डिप्लॉयमेंट पर हूँ। मेरी यूनिट फ्रंट पर है, दे ऑल्सो नीड मी।…”
अम्बिका तब तक एक सीनियर डॉक्टर को ले आयी। वह टेम्परेरी ड्यूटी पर आया नया लेफ़्टिनेंट कर्नल रैंक का डॉक्टर, निस्पृह-सा उसके मेडिकल के काग़ज़ देखता रहा।”
एजुटैंट ने अधीर होकर पूछा, “क्या कहते हैं सर?”
“ये काग़ज़ तो कहते हैं, इन्फ़ेक्शन इनकी हड्डियों तक फैल चुका था। टेस्ट होना चाहिए।”
“सर अब तो ठीक है, बस ज़रा-सा वुंड है। बेस अस्पताल से रिपोर्ट आने तक दो सप्ताह लग जायेंगे।” अम्बिका उसकी तरफ़ से बोली।
“फिर, सर बेड्स भी बहुत कम हैं।”
“वी विल डिसाइड।”
“जमे ख़ून, पकते घावों और दवाओं की महक मेरी बर्दाश्त के बाहर है, सर। आपने नहीं छोड़ा तो मैं अस्पताल से भाग जाऊँगा।”
“तुम ग़लत करोगे, यूँ अस्पताल से भाग जाना, डेज़र्टर होने जैसा ही है।” एजुटैंट ने घोर निर्लिप्तता से कहा।
“ये आप जानें।”
“एक यूनिट जल्दी ही मूव करेगी। अगर आप जाना चाहते हैं?”
“जल्दी यानी…?”
“तीन दिन के भीतर।
“वाह! क्या मैं इस यूनिट के साथ जा सकता हूँ, तब तक बचा-खुचा ज़ख़्म भी भर जायेगा। क्या आप कमांडेंट से बात करेंगे?”
“देखते हैं, करते हैं।”
बाहर आते ही एजुटैंट अम्बिका से बोला, “अम्बिका, इसके पेपर बनवा दो।”
“सर!”
“कमांडेंट का ही सन्देश था कि स्वस्थ हो रहे, कुछ कम ज़ख़्मी सैनिकों को वापस ऊपर भेजा जाये। वक़्त की ज़रूरत है, जब तक कि नये ट्रूप्स नहीं आ जाते। परसों सुबह यहाँ से भी बहुत से लोग जा रहे हैं। तब तक…मेस में है कोई कमरा?”
“आपको पता ही है, इस छोटे से बेस यूनिट के मेस में बस कितने कमरे हैं, वहाँ सीनियर्स भी दो-दो साथ रह रहे हैं।”
“एक-दो दिन की बात है। कुछ करो, वरना यह इमोशनल फूल पता नहीं क्या कर बैठे।”
“मैं एक टेम्परेरी क्वार्टर में रहती हूँ, वहाँ एक एक्स्ट्रा लॉबी है, क्या वहाँ रह सकोगे? मगर वहाँ कुछ भी सुविधा नहीं है। डाइनिंग टेबल पर सोना होगा।” वह अन्दर आकर उससे बोली।
“तुम्हें दिक्क़त न हो तो! यहाँ से निकलकर तो मैं तम्बू में रह लूँगा, या तुम्हारे गैराज या किचन में भी। क्योंकि यहाँ से तो मैं उस ट्रेंच में ज़्यादा सुखी था, जहाँ मैं सोलह घण्टे दर्द में भी ख़्वाब देख पाता था उस प्यारी सूरत के कि लौटते ही उससे शादी करूँगा। या फिर उन लड़कियों की गिनती दुबारा करता जिनके साथ…सो चुका था। अरे! घूर क्या रही हो? हिस्ट्री की क्लास में जिनके साथ सोया था, लेक्चर के वक़्त।”
अम्बिका हँस दी। वह उसे देखता रह गया, वह अब तक एक गम्भीर प्रोफ़ेशनल लग रही थी, उसकी हँसी ने उसे सुन्दर लड़की बना दिया था।
“ये एक्स्ट्रा जोश प्यारा है लेफ़्टिनेंट! मगर काम का नहीं है। इसे काम का बनाओ।” अम्बिका ने वही कन्धा थपथपा दिया जिसमें ज़ख़्म था, उसने दर्द दबा लिया।
अगले दिन दोपहर उसने अस्पताल छोड़ दिया, वह अम्बिका के घर आ गया था। घर क्या था, एक अस्थायी व्यवस्था थी। पुरानी मेस की बोसीदा इमारत का एक हिस्सा। घुसते ही एक छोटा बरामदा था जिसके एक छोर पर स्लैब था, दूसरे छोर पर बीच में खाने की मेज़ रखी थी, मेज़ पर अण्डे के छिलके और आटा बिखरा था, दरवाज़े की जाली से पीछे दिखते अहाते में गुज़रते मौसम के कुछ फूल उगे थे-सफ़ेद-नीले पिटुनिया। एक तिपाई पर सूखा एक्वेरियम रखा था।
सामान अर्दली ने कोने में रख दिया। वह बरामदे से लगे एकमात्र कमरे में आ गया। कमरा बेतरतीब था, जिसमें बहुत प्रभावी तौर पर एक स्त्री की निजता बसी थी, बिस्तर पर अम्बिका की उतरी हुई नाइटी थी, सीला-सा तौलिया और उसमें लिपटी उसकी ब्रा। वहीं एक कंघा था जिसमें बाल फँसे थे। फ़र्श पर औंधी स्लिपर…वह संकोच से भर गया कि वह सुबह जल्दी में भागी होगी और उसे ख़याल तक न होगा कि कोई उसकी निजता में दख़ल देने भी आ सकता है। उसकी ज़िद से अम्बिका को…दवाओं के असर के चलते वह ज़्यादा सोच न सका। अम्बिका का सामान उसने खिसकाकर एक तरफ़ कर दिया फिर बिस्तर पर जा लेटा।
दोपहर कब ढली उसे पता न चला, वह नींद में था जब किसी ने खटखटाया। उसने दरवाज़ा खोला एक अजनबी सामने था। वह वर्दी में ज़रूर नहीं था, मगर फ़ौजी ही था।
“कहाँ है वह? और आ…प जनाब?” अजनबी ज़्यादा चौंका।
“वो अस्पताल में हैं,” कहकर लेफ़्टिनेंट ने हाथ बढ़ा दिया।
“लेफ़्टिनेंट वी. अनुज नायर।”
“मेजर तुषार सक्सेना।”
वह साधिकार सीधे बेडरूम में गया और अम्बिका की वार्डरोब खोलकर उसने ताज़ा धुला तौलिया निकाला और बिस्तर और उस पर पड़े सामान पर उचटती नज़र डालकर बाथरूम में चला गया। एक बेरौनक सलेटी शाम थी। पंखे के ब्लेड से टकराकर गर्म हवा कमरे में घूम रही थी। हरी झालर वाले लैम्पशेड से हलकी रोशनी झर रही थी। वह बरामदे में बैठा हुआ एक पुराने रंग उड़े रुबिक क्यूब से खेल रहा था। छह बजते ही मेजर ने पीना शुरू कर दिया। रम का पहला पैग ख़त्म होने तक वो दोनों चुप के बुलबुलों में बन्द थे। दूसरी बार गिलास भरे गये तो ख़ामोशी टूटी। अनुज ने अपने वहाँ होने की वजह बतायी, मगर मेजर इस विषय पर चुप रहा।
तभी अम्बिका भी अस्पताल से आ गयी उसके हाथ में कुछ ताज़े वायलेट लिलीज़ थे, जो उसने रास्ते में पड़ने वाले जंगल से तोड़े थे।
“तुम! कब आये?” वह सायास मुस्करायी। उसने वायलेट लिलीज़ चुपचाप टेबल पर रख दिये।
“सो, फाइनली आई हैव गॉट द कॉल…” मेजर ने कहा।
“…”
“सोचा तुमसे मिल लूँ फिर…”
“अनुज से मिले? अनुज, ये मेजर सक्सेना। मेरे…”
“हम पिछले यूनिट में एक ही जगह पर साथ पोस्टेड थे। ये स्यूडो वॉर (छद्म युद्ध) नहीं शुरू होती तो हम मंगेतर होते।”
अम्बिका सर हिलाते हुए मुस्कराने लगी। बायीं तरफ़ होंठ ज़्यादा फैले थे। फिर वह अनुज की उपस्थिति की वजह को लेकर कुछ कहती उससे पहले ही वह ‘मुझे पता है’ कहकर उठ गया और अम्बिका के वार्डरोब में से सिगरेट निकालने चला गया। लिलीज़ का गुच्छा मुरझाता रहा टेबल पर।
“अब?” वह कुछ पूछता मेजर को लेकर तब तक वह बाहर आ गया।
“अब क्या, मैंने फ़ैक्स कर तो दिया है, रिलीज़ ऑर्डर तुम्हारा सीनियर ऑफ़िशियल को। परसों दोपहर तुम मूव कर रहे हो। ख़ुदा न खास्ता, वो फ़ैक्स न मिला और तुम पहले ही कहीं…तो तुम भगोड़े कहलाये जाओगे…तुम्हारा ये जज़्बा बेकार जायेगा न…”
“हह…जज़्बा तो है न। लोग युद्ध से भागने के लिए ऐसा करते हैं। मैंने तो युद्ध में भाग लेने के लिए ऐसा किया। इफ़ यू वांट लाइफ़ ऑफ़ एक्शन, गो फॉर वॉर एंड फॉल इन लव। यूथ इज़ ऑलवेज़ फिट फॉर वॉर एंड फिट फॉर वीनस टू।” वह अम्बिका को देखते हुए, मेजर को सुनाते हुए बोला।
शराब के बिन मापे दूसरे पैग ने उसे और बातूनी बना दिया था। अब मेजर और अम्बिका दोनों उसे सुन रहे थे, अम्बिका महसूस कर रही थी कि वह बहुत से ऐसे शब्द बोल रहा था जो वह पीछे छोड़ आयी थी, लहजा भी वही। मेजर ने अम्बिका के चेहरे पर चोर रास्ते से आयी एक चमक अनायास देख ली, उसने मेजर को अपनी तरफ़ तकते देखा, सिगरेट के बट की तरह उस चमकीली लौ को उसने ऐश ट्रे में मसल दिया और स्लैब की तरफ़ चली गयी। ख़ूबसूरत चेहरे से उसकी प्रेमिका को फ़र्क़ नहीं पड़ता यह वह जानता था, वह जो नहीं जानता था वह यह था कि उसकी प्रेमिका बाक़ी लड़कियों से बहुत अलग है।
“व्हाट वी आर फाइटिंग फॉर? आ’यम ब्लाइंड टू सी, दे टैल मी देयर इज़ एन एनिमी।”
कहते हुए मेजर ने सामने टँगी अपनी जैतूनी हरी वर्दी को उदासीनता से देखा। उस पर टँके मैडल भी, जो उसे कभी यू. एन. मिशन पर जाने के लिए, कभी रेगिस्तान में रहने के लिए, कभी उत्तर-पूर्वी राज्यों के तथा कभी कश्मीर के आतंकवाद से लड़ने के लिए मिले थे…लेफ़्टिनेंट भी देख रहा था, मगर उसके मन में जोश था, उन मैडल्स और कलर्स के लिए ललक थी, वह सोच रहा था कि उसके पास भी जल्दी ही एक होगा।
“तुम्हारा जोश क़ाबिलेतारीफ़ है, मैन। मगर एक युवक जब युद्ध से लौटता है, तो यूनिट में बहुत कुछ बदल चुका होता है, शहीदों की तस्वीरों में बढ़ोतरी और फिर सीने पर मैडल लगाने का मतलब नहीं रह जाता, मेस में मिलने वाले दोस्त ही नहीं रहते तो…।” उसकी आवाज़ में अनुभव था।
अम्बिका की देह किसी लम्बी नींद से जागी, वह क्लोज़ेट में से क्रॉकरी निकाल रही थी। उसने हैरानी से एक बार उस लेफ़्टिनेंट को देखा जो युद्ध में शामिल होने के लिए अजीब रोमानी क़िस्म की भावुकता से ग्रस्त था। वह देख रही थी कि वह कन्धे को बार-बार छू रहा था। वह दर्द और नशे के असर के बीच दर्द को देह की सहज प्रक्रिया मान लेने के भीतरी संघर्ष में लगा था। मगर पहले से काफ़ी ख़ुश था। दूसरी तरफ़ मेजर युद्ध की भयावहताओं से वाक़िफ़, युद्ध से विकर्षित, विचलित।
“अरे, तुम्हारी कमीज़…ख़ून निकल रहा है।” मेजर का ध्यान उसकी कमीज़ पर गया।
“कहा था न मैंने, अपने घाव को तो भर जाने देते। एक दिन और वार्ड में रुक जाते।”
“जमे ख़ून, पकते घावों और दवाओं की महक मेरी बर्दाश्त के बाहर थी। मैं कराहों को सुन-सुनकर पागल हो जाता…” युवक की आँखों में नमी थी, विवशता थी। मेजर का मन उसके लिए कुछ नर्म हो आया।
“अम्बी, फर्स्ट एड बॉक्स ले आओ।” मेजर बोला।
“रास्ते में भर जायेगा। ज़्यादा बड़ा नहीं है, पट्टी ढीली हो गयी है इसलिए यह कन्धा हिलने पर ज़रा ब्लीड कर जाता है।”
कमीज़ बाँह तक ख़ून से सन चुकी थी। उसने बहुत कोमलता से ड्रेसिंग कर दी। वह दर्द से सिहरा तो अम्बिका ने उसकी हथेली थाम ली। उसने ग़ौर किया लेफ़्टिनेंट ख़ूबसूरत है, एडोनिस की तरह-पुरुष सौन्दर्य का ग्रीक प्रतीक। छरहरा, लम्बा, गोरा, ठहरी हुई गहरी काली आँखों वाला, कोमल भावों वाला। अम्बिका रात को ही तो पढ़ रही थी शेक्सपियर की कविताएँ। वीनस (एफ्रोदिती का रोमन पर्याय) और एडोनिस। आसक्त वीनस और बेख़बर एडोनिस।
“पसीने से नम
नर्म मुलायम जिजीविषा भरी
उसकी हथेली ली थाम
स्वयं वीनस ही कामावेग से थरथराती रही
पसीना है कि सुगन्धित बाम”
रात को खाने में उसने बढ़िया चिकन बनाया और वे तीनों खाने के साथ भी शराब पीते रहे…
“तो अब भी समय है, इस बेकार की और थोपी हुई जंग से बचा लो ख़ुद को। मत जाओ फ्रंट पर, वे बेस अस्पताल भेज देंगे तुम्हें।” डिनर रोल कुतरते हुए वह उसे गहरी नज़र से देखती रही। फिर होंठों की कोर से हलका-सा मुस्करायी।
“एक सैनिक के पास खोने को दो ही तो चीज़े होती हैं, प्रेम और जान। ‘वन इन द वार, लॉस्ट इन द लव।’ यह कहावत यूँ ही तो नहीं बनी।”
“लम्बे चले दूसरे विश्वयुद्ध के फ़ौजी हों या इराक में अमरीकी सैनिक, यह सब पर फिट होता है। उनकी मंगेतर सगाई तोड़ लेती हैं, प्रेमिकाएँ दूसरे लड़के ढूँढ़ लेती हैं। अगर यह भी लम्बा खिंचा तो…इसे धोखा नहीं कहना चाहिए, हारते घोड़े पर रेस में कौन दाँव लगाता है?” कहते हुए अम्बिका की तरफ़ देखकर मेजर बेवजह मुस्कराने लगा।
“छोड़ो भी…बेकार की लिजलिजी बातें।” अम्बिका बोली।
तभी बेडरूम में फ़ोन बजा। यह लेफ़्टिनेंट के लिए था। यहाँ से स्वस्थ हो चुके कुछ सैनिकों की टुकड़ी के फ्रंट पर लौटने की तैयारी हो चुकी थी। सुबह जो जहाज़ आयेगा, मृतकों को लेकर। उसी से उसे पौ फटने से पहले ही निकलना होगा। हालात बिगड़ रहे थे। मेजर को भी परसों की जगह कल ही जाना होगा, दोनों के लामबन्दी वाले बैग साथ ही बँधे रखे थे।
बरामदे में बैठे मेजर के नशे में गाने की आवाज़ सुन रहा था वह, सेकेंड वर्ल्डवॉर पर बनी हॉलीवुड की किसी फ़िल्म का गीत था।
“लेट्स किस, नॉट फाइट
ट्राइ टू डू व्हाट्स राइट
टुनाइट मेक लव, नॉट वार
व्हाट द हैल वी आर लिविंग फॉर?”
समय, उस घर की दीवारों में फँसी गौरैया की तरह हाँफने लगा। महज़ चार घण्टों की दूरी पर युद्ध जारी था। इन्सान कितना दुर्बल और नश्वर है। मेजर बहुत देर से चुप था। अम्बिका उसके कन्धे से सर टिकाये कुर्सी पर अधलेटी थी। उसके हाथ मेजर के बालों को छू रहे थे। शराब की अधिकता ने उन्हें एक ऐसी आत्मविस्मृति में बाँध दिया था कि वो दोनों प्रेम और बिछोह के बीच के किसी मार्मिक बिन्दु पर थे। आँसू, पीड़ा और अन्तिम सम्बोधनों के लिए अब अवकाश नहीं बचा था या वे हो-होकर बीत चुके थे या घनत्व में भारी होने के कारण मन के तल पर जा बैठे थे।
“मैं इनके बीच क्या कर रहा हूँ? मुझे नहीं पता मेरा होना इन्हें सहज कर रहा है या असहज?” लेफ़्टिनेंट बाहर लॉबी में सोने जाने के लिए उठा मगर वह रात के पूर्वनियोजित षडयन्त्र या अपूर्वनियोजित अन्तिम उत्सव में शामिल हो चुका था। अचानक ब्लैकआउट हो गया था, कोई लड़ाकू जहाज़ लम्बी दूरी की मारक मिसाइल छोड़ता हुआ गुज़रा।
“जूते उतार दो और जहाँ हो वहीं लेट जाओ।” मेजर चिल्ला कर बोला।
“कुछ बदलने को दूँ? जींस में कैसे सोओगे?” अम्बिका ने पूछा।
“मुझे आदत है।”
“इसे तो आदतों की आदत है।” अम्बिका की नशीली, कामुक हँसी अँधेरे में चिलकी। बहुत देर तक उनकी फुसफुसाहटें बरामदे में घोंसला बनाती रहीं, जब देर तक बिजली वापस नहीं आयी तो वे दोनों लिपटे हुए भीतर आ गये, वह बाहर जाने को उठा मगर मेजर ने कहा, “जहाँ हो वही बने रहो, हमें तो ज़रा-सी जगह चाहिए।”
वह तीनों एक बिस्तर में थे। खिड़की के बाहर पत्ते ही हवा से झगड़ रहे थे, हवा तो पत्ते बुहार रही थी चुपचाप। झींगुरों की आवाज़ टीन की छत की परतें खुरच रही थी।
कुछ देर बाद ही लेफ़्टिनेंट को लगा कि वह जैसे एक ऑब्लीक के पार रेशमी चादर के ब्रेकेट में बन्द ज़रूर था, मगर उस पार कोई समीकरण था जिसे कि हल होना था। हलकी फुसफुसाहटें उसके नींद के कोटर में घुसकर फड़फड़ाने लगी थीं। अँधेरे के कसाव मांसल थे। पूरा पलंग मानो समुद्र पर तैर रहा था। अँधेरे में वे तीनों ही महसूस कर पा रहे थे कि जल्दी ही कुछ ऐसा घटने को है जो उस कमरे में मौजूद हर अणु को प्रभावित करने वाला था। कोई समीकरण आकार ले रहा था, जो प्रेम से कहीं ज़्यादा शक्तिसम्पन्न था। सपनों, मौन रुझानों की जादुई रस्मों से कहीं ताक़तवर। आज अँधेरा मैटेलिक चमक लिए था। बुझी हुई चाँदनी बारूद के धुएँ से भर गयी थी और रात सलेटी-ताम्बई चूर्ण बनकर खिड़की से झरने लगी। सुनहरी आभा वाली ये अम्बिका है कि वीनस? मेजर अपोलो है तो वह इन दोनों के बीच तीसरा कौन था?
‘एडोनिस’ अम्बिका के नशे में विकृत होंठ हिले। अम्बिका की बाँहें कोई तिलिस्माती वल्लरी थीं, जो कमरे में, बिस्तर पर, हर जगह फैली थीं। उसकी बगलों में कोई नम जंगल महक रहा था। युवा लेफ़्टिनेंट उसका चेहरा देखने की हिम्मत नहीं कर सका, बीच रात के सलेटी उजलेपन में उसे बस उसके सुनहरे वक्ष पर अवस्थित जामुनी-भूरे एरोला दिख रहे थे, धुन्ध से ढँकी उसकी कमर पर मेजर का हाथ रखा था, रात पर एक विपुल मांसल परत तारी हो गयी। वह निर्णायक पल की हलचल में दोनों किनारों के बीच सतह पर एक चमकीले शंख की तरह तैर रहा था कि अम्बिका ने मेजर की तरफ़ से उसकी तरफ़ करवट बदल ली, चॉकलेट और वाइन की महक वाले अपने होंठ उसकी तरफ़ बढ़ा दिये, उसने भी उसकी नरम और सौम्य इच्छा के वशीभूत गर्दन झुकाकर अपना मुँह खोल दिया, वीनस मुस्करायी, अपोलो ने पलकों की जुम्बिश से इशारा किया, मासूम एडोनिस को ऐसी शान्त चमकीली घड़ी में मौत का ख़्वाब भी रूमानी लगने लगा। उसका ज़ख़्म खिल रहा था और रक्त फूलों में बदल रहा था।
विंडोपैन पर गिरती बारिश की बूँदों की सम्मोहक ताल उन्हें किसी अनजान द्वीप पर लिए जा रही थी, जहाँ निषिद्ध शब्द ही नहीं था। बल्कि शब्द थे कहाँ, महज़ ध्वनियाँ थीं। पत्तियों से, हवा से, प्रपात से, अजगरों से, सिंहों और हाथियों से उधार ली हुई। नैतिक या अनैतिक, अपने पूरे अर्थ में यह जो भी था, तीनों की आत्मा का हिस्सा बन गया था। कुछ था जो बीत गया था, कुछ बीतने को था। एक पारदर्शी बुलबुला फूटने को था। इससे पेशतर कि वह टूटे और इस रात का सच, ग्लानि में बदल जाये और यह चमकीला क्लाइडोस्कोप स्मृति के हाथों टूटकर बिखर जाये। लेफ्टिनेंट ने अम्बिका की उँगलियों को अपनी उँगलियों में कसा और होंठों से सटाकर शुक्रिया जैसा कुछ फुसफुसाया।
सुख की एक चीख़ किसी बाज की चीख़-सी उभरी और जंगल में कहीं गुम होकर फीकी हो गयी।
लेफ़्टिनेंट ने आँखें बन्द कर लीं। मेजर को लगा कि वह गहरी शान्त नींद में था। वह उसके चेहरे को देखता रहा, उसने पलकें खोल दीं, सुनहरे गोलकों में उदात्त आलोक था और होंठों पर आश्वस्ति की मुस्कान थी। मेजर इस बार मुस्करा न सका। मुचड़ी चादर की तरह रात स्लथ और गर्म थी, कमरे की हवा में थक गये जिस्मों, बुझी सिगरेटों की गन्ध थी।
युवा लेफ़्टिनेंट मन में सुख और देह में एक शान्ति लिए जाने कब सो गया…हेलीकॉप्टर के शोर से उसकी नींद खुली, नींद खुलने पर अँधेरे को सहने की स्थिति में आँखों के अभ्यस्त होने का उसने इन्तज़ार किया। अब वह कमरे का फ़र्नीचर देख पा रहा था। नींद में चेतना दाख़िल हो गयी थी। फिर कोई घायल जिस्म या कोई शहीद लाश तिरंगे में लिपटी। उसने पुतलियाँ घुमायीं, एक सुनहरी नंगी पीठ पर उसका हाथ था, एक सफ़ेद रुपहले शंख-सा, जिसे लहरों ने सुनहरी रेत पर छोड़ दिया था। उसने अतिरिक्त सावधानी से अपना हाथ हटा लिया। मेजर का गोरा-विशाल जिस्म किसी आइसबर्ग की तरह रात के सलेटी समुद्र में लेटा था, अम्बिका उस पर भटक आयी मरमेड की तरह क्लान्त उलटी पड़ी थी। पेट के नीचे दबे उसके फिंसनुमा हाथ हलके-हलके थरथरा रहे थे। जहाँ गर्दन सीने से अलग होती है, वहाँ एक रोशन उभार था। चेहरा काले घुँघराले बालों से ढँक गया था। उसने देखा उसके खुले, गोरे दायें कन्धे पर अम्बिका का एक बाल लगा था। लम्बा, काला, लहरदार बाल। उसने उसे उँगली के पोरों से पकड़कर ऐश ट्रे में कोमलता से रख दिया और बिस्तर से उठ गया, जींस की फ्लाइ बन्द कर के उसने कमीज़ उठाना चाही, मगर वह अम्बिका के टखनों में लिपटी थी। उसने उसे वहीं रहने दिया। कमीज़ पहनने से पहले उसने ढीली हो आयी पट्टी कसनी चाही, जो कि एक दर्दनाक कवायद है, उसने घायल बायाँ कन्धा उचकाया, दर्द हुआ मगर बहुत फीका और नामालूम। ‘टच थैरेपी’! वह अम्बिका की तरफ़ देखने लगा, उसे नहीं पता था कि अम्बिका की आँखें उसकी खुली बाँह के नीचे से उसे ही देख रही थीं।
वह आहिस्ता से बिस्तर से उठा और टैरेस पर चला आया, उसने अँधेरे में अपनी निगाह एक जाल की तरह फेंक दी कि कोई जुगनू रोशनी का पकड़ सके। दूर क्षितिज पर उत्तर में सुर्ख़ और चमकीली बिजली की रेखा चमकी। मिलिट्री अस्पताल के अहाते, सड़कें, वाहन, खम्भे, पानी की टंकी…सब पर टॉर्च की-सी रोशनी डालकर मिट गयी। इसी क्षण में चमक उठे थे खिड़की के बाहर, एक इतिहास जी चुके पुराने हेडक्वार्टर की झुकी छत और उसकी बाउंड्री वॉल पर दगी गोलियों के निशान और बीती सदी की दीवारों में बन्द अनजाने शहीद नाम, भूले हुए शहीद चेहरे, मायने खो चुके युद्ध और इतिहास।
बाहर रात के किसी निशाचर पक्षी ने बेचैनी से पंख फड़फड़ाये। भीतर भी ‘कुछ’ तो था जो जवाब में पर मारता रहा, पिंजरे की तीलियों पर। ठीक तीन मिनट बाद इस बिजली के कड़कने की ध्वनि ने धरती तक की अपनी यात्रा तय की और भीषण गड़गड़ाहट से चौंककर वह जागकर उठ बैठी…मेजर की शिथिल मगर गुनगुनी हथेलियाँ थामकर निःशब्द बैठी रही, लेफ़्टिनेंट को उसकी आकृति के कम्पन से लगा कि वह रो रही है। मगर वह चादर ओढ़े ठण्ड से काँप रही थी। वह उसके पास आ गया।
“तुम जाग क्यों गये?”
“बस, बरसात देख रहा था।”
“खिड़की बन्द कर दो। कहीं तुम्हें डर तो नहीं लग रहा…”
“बिजली से?”
“वॉर से।”
“तुम्हें?”
“मैं डरती नहीं, मैं ट्रेंड हूँ इस सबके लिए, कैजुअल्टीज़ मेरे लिए कोई नयी बात नहीं। मगर दर्द तो मुझे भी होता है न, जब देश के लिए शहीद हुए सिपाहियों के आइडेंटिटी टैग उनके ठण्डे जिस्मों से उतारती हूँ।”
“मेजर से बहुत प्यार करती हो!” उसने बात बदलने को पूछा, उसने उत्तर में कन्धे उचकाये, जिसका ठीक-ठीक अर्थ वह नहीं पकड़ पाया।
वह फुसफुसायी-“यू नो लव इज़ माय सोलफूड एंड आय’म बैगर,”
“क्या एक साथ दो पुरुषों से कोई स्त्री प्रेम कर सकती है?”
“…”, उसने फिर कन्धे उचकाये, जिसका अर्थ फिर से वह नहीं पकड़ सका। फिर वह ठण्डे-बर्फ़ीले स्वर में, रुक-रुककर बोली- “कल रात जो था प्रेम नहीं था। सेकेंड वर्ल्ड वॉर में फ्रांसीसी सैनिक इसे ‘मैनेज ए त्रायोस’ कहते थे। यह पुरुष-मनोलोक की अजीब-सी फंतासी है। अपनी प्रेमिका को किसी और के साथ देखना। बट इट्स डिज़ायर्ड बाय एवरी मेन, लिव्ड बाय वेरी फ्यू। क्योंकि हर कोई तो इस फंतासी से निकलकर, सच का सामना नहीं कर सकता न!
“…”
लेफ़्टिनेंट अवाक्-सा खड़ा हो गया और हैरानी से अम्बिका को देखता रहा। फिर वह अपना बैग उठाकर बालकनी में आ गया और उसमें बेतरतीब रखा सामान सहेजने लगा। बाहर हवा ठण्डी और ताज़ा थी। उसने बैग में से सिगरेट निकालकर सुलगा ली और बीती रात की पहेली के टुकड़े जोड़ने लगा। अन्दर कुछ देर तो सन्नाटा बना रहा फिर आहटें होने लगीं, भीतर वो अलगाव से पहले की तयशुदा उदास बातें कर रहे थे, जिनसे वह अब उकता रहा था। ग्लानि को मन से खुरचने के लिए अब वह बस युद्ध की और यूनिट को ट्रेक करने की बात सोचने लगा।
“कुछ अन्दाज़ा है क्या कि कब तक लौटोगे?”
वह नाटकीयता के साथ थोड़े ऊँचे स्वर में बोला-“क्या पता? दो दिन बाद ही या महीनों बाद या पता नहीं मैं लौटूँ कि यह!”
उसकी तेज़ आवाज़ पर लेफ़्टिनेंट चौंका, उसने भीतर देखा, वह युद्ध में पहने जाने वाला आइडेंटिटी डिस्क हाथ में लेकर झुला रहा था, उसके चेहरे के आगे।
“कल से मैं महसूस कर रही हूँ। या तो तुम मौत से डर रहे हो या मौत से ऑबसेस्ड हो। यह एक युद्ध है, और तुम सैनिक, तुम्हारा काम है लामबन्दी। सिम्पल। इतना क्या उलझा रहे हो चीज़ों को। मरना तो सबको ही है। रोज़ कितने सैनिक, अपने अंग खोकर, बुरी तरह घायल होकर, मगर फिर भी मुस्कराते हुए, यहाँ अस्पताल में आते हैं। फिर सीमा पर लौटकर लड़ने जाने का विश्वास लेकर। एक उदाहरण तो देख ही रहे हो। कहने को तो कल यहाँ इस बेस कैम्प पर भी…बम फट सकता है।” वह खीजी हुई थी।
अब अम्बिका की टाँगें स्लिपर टटोल रही थीं, फिर वह बिस्तर से खड़ी हो गयी, हाथ को एक घुमाव देकर बालों को ढीले जूड़े मे बाँध दिया और विवस्त्र ही रसोई में चली गयी। वह उसे देखता ही रह गया, सच में भोर के धुँधले प्रकाश में समुद्री झाग से जन्मी एफ्रोदिती (वीनस) लग रही थी। यह छवि उसके मन पर टँक गयी। वह उसे जीवन-भर देखता रहता मगर उसने पहले इलेक्ट्रिक कैटल में पानी डालकर स्विच ऑन किया फिर खूँटी पर टँगा हाउसकोट पहन लिया और बाथरूम में घुस गयी। जल्दी ही मेजर दो प्याले चाय लेकर बालकनी में उसके पास आ गया।
“नाश्ते में क्या खाना पसन्द करोगे?” शान्त-सौम्य अन्दाज़ में उससे पूछा।
“बस दो उबले अण्डे।” उसने उदासीनता से कहा, बिना उसका चेहरा देखे।
“थोड़ा सिरियल, ओट्स या पोहा भी ले लो। अम्बी बना रही है,”
“…”
“क्या कहते हो? इस लड़ाई के लिए? खिंचेगी…अनसुलझी बन्द हो जायेगी या एक मुक़म्मल जंग में बदल जायेगी?”
“हमारे नेताओं के फूहड़ हाथों से न फिसली तो एक सबक के साथ बन्द हो जायेगी।” वह सोचकर बोला।
“तुम चू…भोले हो…नये भी।” वह समझ गया कि मेजर उसे फ़ौज की बहुत प्रचलित गाली देते-देते रह गया है।
कुछ देर चुप रहकर मेजर फिर बोला-“बहुत विकट समय है, आने वाले दिनों में तुम्हें बहुत कुछ देखना है। अपने हमप्याला और हमनिवालाओं के शव, जंग के रास्ते पड़ने वाले क़ब्रगाह बनते जाते गाँव के गाँव…लूट और मासूम औरतों का खुले में बलात्कार करते दुश्मन ही नहीं हमारे अपने सिपाही भी। शान्ति सेना के समय मैं तुम्हारी उम्र का था, बहुत जोश था। जान को गुलाब का फूल समझ कर दिलफेंक आशिक़ की तरह अकड़कर चलता था। मगर फिर मैंने जब क़रीब से देखा तो जाना कि कोई भी युद्ध लम्बा चलता है तो विशुद्ध निराशा में पत्थर हो जाता है सैनिक। आत्मघातक क़िस्म की अवज्ञा और अनैतिकता आ जाती है उसमें। तुम ख़ुद देखना। अभी बहुत जोशीला और रोमानी लग रहा है न, सब कुछ!”
“अनैतिकता!”
“हाँ, नैतिकता, संयम, अंहिसा ऐसे बर्बर माहौल में अपने मायने खो देते हैं। कलाएँ, संगीत और साहित्य भी, अमन के दिनों के शगल हैं। इन विध्वंसक पलों में बस मूल प्रवृत्तियाँ काम करती हैं। हत्या और बलात्कार तक का असल अर्थ बदल जाता है, मरने जाने से पहले अपने बीज बिखेर जाना, ज़्यादा से ज़्यादा…दूर से दूर। दूसरे के मूल और बीज नष्ट करते जाना।”
वह रात की बात सोचने लगा। फिर सर हिलाता हुआ नहाने चला गया। लौटा तो, मेजर रसोई में नाश्ता बनाती अम्बिका के पास खड़ा था।
उसने बाहर से अम्बिका के सुबकने की आवाज़ सुनी तो वह अपने जूते पहनने भीतर गया। नाश्ता लग चुका था। नाश्ते के बाद मेजर ने उसे गले लगाकर कहा-“फिर मिलते हैं, ज़िन्दगी रही तो। बर्ट्रेंड रसल ने कहा है, ‘वॉर डज़ नॉट डिटरमाइन हू इज़ राइट। ओनली हू इज़ लेफ़्ट।’”
उसकी गाड़ी आयी तब तक अम्बिका की आँखें सुर्ख़ हो चुकी थीं। वह बाहर नहीं आयी बालकनी में खड़ी रही। विदा में उसने भावुकता में, ज़ोर-ज़ोर से हाथ हिलाया तो लेफ़्टिनेंट को लगा कि कुछ भी हो वह अम्बिका से दुबारा मिलना चाहेगा।
उस रात जी गयी फंतासी के पल उसे युद्ध के हिंसक पलों में भी कोमल करते रहे। विध्वंस के समय तक उसके मुँह में चॉकलेट और वाइन के फ्लेवर वाली जीभ का स्वाद बना रहा। आख़िरी हमलों तक उसके मन में ‘भोर की एफ्रोदिती’ वाली छवि बनी रही।
युद्ध को समाप्त होना था, क्योंकि यह युद्ध था ही नहीं, जबरन थोपी गयी एकतरफ़ा झौड़नुमा जंग थी। लेकिन ख़ुद की सीमाएँ बचाने में हमने उनसे कहीं ज़्यादा खोया। जाने के आठ दिन बाद, नवें दिन ही लेफ़्टिनेंट लौट आया था। एक फ़ोनकॉल पर वह सुबह चार बजे, जहाज़ की आवाज़ सुनकर भागी और धुँधलके में घायलों के वार्ड में उसे ढूँढ़ती रही बेचैनी से। वह टकरायी एक मेडिकल असिस्टेंट से जो ट्रे में मज़बूत काले धागों में बँधे, ख़ून, मिट्टी और बारूद से सने कुछ आइडेंटिटी डिस्क रखे लिए जा रहा था। जिन पर इन्हें पहनने वाले मृत सैनिकों का नाम नहीं, सर्विस नम्बर और धर्म लिखा था। ताकि दुश्मनों की ज़मीन पर भी किसी सैनिक का शव मिलने पर उसे उसके धर्म के अनुसार अन्तिम संस्कार मिले। यह युद्ध का अनलिखा नियम है। उस ट्रे में एक डिस्क काले धागे समेत चाँदी की चैन में बँधी थी, स्मृति की सूखी परत को अम्बिका की लम्बी उँगलियों ने कुरेद दिया, अन्तिम आलिंगन के समय वह कुछ फुसफुसा रही थी और उसके हाथ, युवा लेफ़्टिनेंट की इसी चैन से खेल रहे थे। वह मॉचरी की तरफ़ भागी। तिरंगे में लपेटे जाने से पहले, उसके हिस्से का कॉफ़िन पेंट किया जा रहा था। वह खुले अहाते में अन्य शवों के साथ रखा था, उलटा। उसने उसे पलटा, उसका चेहरा, वर्दी सब कुछ धुएँ से सलेटी था, खुले हुए गुलाबी मुँह में से झाँकते दाँत एकदम सफ़ेद थे। उसने उसे चूम लिया फिर अन्य लोगों की उपस्थिति को महसूस करते ही एकदम उठकर चल पड़ी, कुछ दूर जाकर उसने पलटकर देखा, उसका चेहरा शान्त था। उसे उसकी जेब में एक मुचड़े हुए नोटपैड पर कुछ लिखा मिला था। मॉचरी के बाहर, विशाल पीपल के पेड़ के नीचे रखी बेंच पर वह बैठ गयी। वह प्रेम और मृत्यु का गीत था, ‘माय रॉन्देवु विद डेथ’-
जानता था,
एक दिन उससे मिलूँगा
जब बसन्त गडरिया लौट रहा होगा चरागाहों से
चुरा चुका होऊँगा वह सेब अदम के बगीचे से
मगर यूँ अनायास और जल्दी मिलेगी वो,
एन उस पल में जब चरागाह में अब भी बसन्त ठिठका होगा
जब चुराया हुआ सेब दाँतों की तरफ़ ले जा रहा होऊँगा
अशान्त सीमाओं की तरफ़,
बैरीकेड के नीचे एक फूल खिला होगा।
बसन्त गुपचुप अपनी छायाएँ समेट रहा होगा।
मृत्यु, मैं तुमसे वहीं मिलूँगा।
अम्बिका ने मेजर को आख़िरी बार लेफ़्टिनेंट के अन्तिम संस्कार के समय देखा था। अपनी ऑलिव ग्रीन यूनिफॉर्म की ट्यूनिक में, वह किसी से कह रहा था-वह अनूठा अफ़सर था, हालाँकि मैं उसके साथ एक सप्ताह भी न रह सका था। बहुत जोश था उसमें। प्रेमी जीव था।
वह कहता था-“सैनिक और प्रेमी में कोई फ़र्क़ नहीं होता। प्रेमी और सैनिक दोनों सोते हुए या नशे में डूबे दुश्मन का फ़ायदा उठाते हैं। गुपचुप फेंस कूदकर। जंगली तीतर की आवाज़ निकालकर, टॉर्च का इशारा कर, रूमाल हिलाकर, गार्ड्स को धोखा देकर लक्ष्य तक पहुँचना और गुप्त और आकस्मिक हमला करना एक सैनिक का मिशन होता है, ठीक उसी तरह जैसे मार्स से आये प्रेमी टॉर्च का इशारा करते हैं, और वीनस से उतरी देवियाँ स्कार्फ़ लहराती हैं।” वह जानता था कि अम्बी ठीक उसके पीछे खड़ी है।
सफ़ेद लिली के फूलों की रीथ को शव पर रखकर, आँखों में दर्प लिए, उसके कॉफ़िन के आगे सैल्यूट करके, वह अम्बिका को जानबूझकर अनदेखा कर वहाँ से चला गया था। उसका मन शरीर में ही दफ़न हो गया था।
तेरह वर्ष बाद मेजर को, जो अब ब्रिगेडियर था, एक ख़त मिला…
“उस रात तुमने कहा था, मैं एक रात तुम्हारी हर फंतासी को सच कर दूँ। क्योंकि फिर तुम फेंस के पार अनजानी ज़मीनों की तरफ़ चले जाओगे। युद्ध में काम आये तो अनजाने क्षितिजों के पार…
तब मुझे नहीं पता था कि वो नयी ज़मीन कहाँ होगी। मगर मैं जानती थी कि आसमान तो फिर भी एक ही होगा न, जिसके नीचे एक दिन तुम ज़रूर लौटोगे। तुम लौटे। एकदम पड़ोस में मेरे अस्तित्व से अनजान तुम बूढ़े होने लगे। राजसी ढंग से, वीरता के तमगों के साथ। मैं जानबूझकर नहीं मिली तुमसे। जानती थी कि तुम मिलते ही रॉयल सुनहरा लबादा उतारकर एक सलेटी क्लोक पहन लोगे और प्लूटार्क बन जाओगे। ‘लाइफ़ ऑफ़ डीमीट्रियस’, का नाटक दोहराते हुए। जब यह नाटक ख़त्म होगा तो तुम क्लोक उतारकर चल दोगे, मुड़कर अपने अभिनय की दक्षता पर मुस्कराते हुए।”
‘लाइफ़ ऑफ डीमीट्रियस’ प्लूटार्क की लिखी मेसीडोनिया के डीमीट्रियस की बायोग्राफ़ी है, इस कथा को शेक्सपियर ने भी बाद में नाटक में ढाला था। कई जगह यह नाटक खेलते में इस कथन को रूपकात्मक तरीक़े से लिया गया, और डीमीट्रियस को अन्त में सलेटी क्लोक पहने प्लूटार्क की तरह मुस्कराते दिखाया गया।