ग्रामोफोन पिन का रहस्य - ब्योमकेश बक्शी की जासूसी कहानी

 


ब्योमकेश ने सुबह का अखबार अच्छे से तह करके एक ओर रख दिया। उसके बाद अपनी कुरसी पर पीछे सिर टिकाकर खिड़की के बाहर देखने लगा। 

बाहर सूरज चमक रहा था। फरवरी की सुबह थी। न कोहरा, न बादल, आसमान दूर-दूर तक नीला था। हम लोग घर की दूसरी मंजिल में रहते थे। ड्राइंग-रूम की खिड़की से शहर की आपा-धापी और ऊपर खुला आसमान साफ दिखाई देता था। नीचे तरह-तरह के ट्रैफिक की आवाजों से पता चलता था कि शहर रोजाना के शोर-शराबे के लिए जाग रहा है। नीचे हैरीसन रोड का शोरगुल बढ़कर आकाश तक कुलाँचे मारने लग गया था, क्योंकि पक्षियों की चहचहाट आसमान में उड़ने लगी थी। ऊपर दूर तक कबूतरों की कतारें उड़ती दिखाई दीं, लगा, जैसे वे सूरज के इर्द-गिर्द घेरा बनाना चाह रहे हों। सुबह के आठ बजे थे। हम दोनों नाश्ता करके आराम से अखबार के पन्ने उलट रहे थे, इस आस में कि कोई दिलचस्प समाचार दिखाई दे जाए।

ब्योमकेश ने खिड़की से हटने के बाद कहा, ‘‘तुमने वह अजीब विज्ञापन देखा, जो कुछ दिनों से बराबर छप रहा है?’’

मैंने उत्तर दिया, ‘‘नहीं, मैं विज्ञापन नहीं पढ़ता।’’

आश्चर्य से देखते हुए ब्योमकेश बोला, ‘‘तुम विज्ञापन नहीं पढ़ते? तो क्या पढ़ते हो?’’

‘‘जो हरेक व्यक्ति पढ़ता है, समाचार!’’

‘‘दूसरे शब्दों में वो कहानियाँ जैसे मंचूरिया में कोई व्यक्ति है, जिसकी उँगली से खून बहता है या फिर ब्राजील में एक महिला के तीन बच्चे हुए—यही सब पढ़ते हो! क्या फायदा यह पढ़कर? क्यों पढ़ा जाए यह सब? यदि तुम आज के संदर्भ में असली खबर चाहते हो तो विज्ञापन पढ़ो।’’

ब्योमकेश विचित्र व्यक्ति था। यह जल्दी ही पता लग जाएगा। ऊपर से उसे देखकर, उसके चेहरे या बातचीत से कोई यह कह नहीं सकेगा कि उसमें अनेक विशेष गुणों का समावेश है, लेकिन यदि उसे ताना मारो या उसे तर्क में उद्वेलित कर दो तो उसका यह वास्तविक रूप सामने आ जाता है। लेकिन आमतौर पर वह एक गंभीर और कम बोलनेवाला व्यक्ति है। लेकिन जब कभी उसकी खिल्ली उड़ाकर उसका मजाक बनाया जाता है तो उसकी जन्मजात प्रखर बुद्धि सभी संभावनाओं और अवरोधों को तोड़कर उसकी जुबान पर खेलने लग जाती है, तब उसका वार्त्तालाप सुनने लायक हो जाता है।

मैं यही लोभ सँवरण नहीं कर पाया और सोचा कि क्यों न उसे एक बार उद्वेलित करके देखा जाए? मैंने कहा, ‘‘तो यह बात है? इसका मतलब यह हुआ कि अखबारवाले सब बदमाश लोग हैं, जो अखबार के पन्नों को विज्ञापनों से भरने की जगह फिजूल की खबरें छापकर जगह भर देते हैं?’’

ब्योमकेश की आँखों में एक चमक दिखाई देने लगी। वह बोला, ‘‘कसूर उनका नहीं है, क्योंकि वे जानते हैं कि यदि वे तुम्हारे जैसे व्यक्तियों के मनोरंजन के लिए ये फिजूल की कहानियाँ न छापें तो उनका अखबार नहीं बिकेगा। लेकिन वास्तव में चटपटी खबर व्यक्तिगत कॉलमों में मिलती है। यदि तुम सभी प्रकार की महत्त्वपूर्ण खबरें चाहते हो, जैसे कि तुम्हारे इर्द-गिर्द क्या हो रहा है; दिनदहाड़े कौन किसे लूटने की साजिश कर रहा है; स्मगलिंग जैसे गैर-कानूनी काम को बढ़ाने के लिए क्या नए हथकंडे अपनाए जा रहे हैं, तो तुम्हें व्यक्तिगत कॉलम के विज्ञापन पढ़ने चाहिए। ‘रायटर्स’ ये सब खबरें नहीं भेजता।’’ मैंने हँसकर जवाब दिया, ‘‘अगर ऐसा है तो आज ही से केवल विज्ञापन ही पढ़ा करूँगा। पर तुमने यह नहीं बताया आज तुम्हें कौन सा विज्ञापन विचित्र लगा?’’

ब्योमकेश ने अखबार मेरी तरफ फेंकते हुए कहा, ‘‘पढ़ लो, मैंने निशान लगा दिया है।’’

मैंने पन्नों को पलटकर देखा। एक पेज पर लाल पेंसिल से तीन लाइन की लाइनों पर निशान लगा था। यदि लाल निशान न होता तो शायद साधारण दृष्टि में वह दिखाई भी न देता। विज्ञापन इस प्रकार था—

शरीर में काँटा

यदि शरीर से काँटा निकलवाना चाहते हैं तो कृपया शनिवार साढ़े पाँच बजे ‘वाइट वे लेडलॉ’ के दक्षिण-पश्चिमी कोने पर लगे बिजली के खंभे से कंधों को टिकाए खड़े रहें।

मैंने उस विज्ञापन को कई बार पढ़ा और जब मुझे उसका कोई सिर-पैर नहीं मिला तो मैंने पूछा, ‘‘वह आखिर कहना क्या चाहता है? उस चौराहे के लैंपपोस्ट से कंधा टिकाने पर क्या जादू से शरीर से काँटा निकल जाएगा? उस विज्ञापन का अर्थ क्या है? और क्या है यह शरीर का काँटा?’’

ब्योमकेश ने उत्तर दिया, ‘‘मैं भी तो अभी यह समझ नहीं पाया हूँ। अगर तुम पिछले अखबारों पर नजर डालोगे तो पाओगे कि यह विज्ञापन प्रत्येक शुक्रवार बिना किसी नाम के छप रहा है।’’

‘‘लेकिन इस खबर में संदेश क्या है? आमतौर पर किसी विज्ञापन को छपवाने का कोई उद्देश्य होता है। इस विज्ञापन से तो कुछ पता नहीं चलता।’’

ब्योमकेश बोला, ‘‘पहली नजर में तो यही लगता है कि इसमें कोई संदेश नहीं है, पर कुछ भी नहीं है, यह कैसे मान लिया जाए? आखिर कोई व्यक्ति अपनी मेहनत की कमाई फिजूल के विज्ञापन पर क्यों खर्च करेगा? यदि ध्यान से पढ़ा जाए तो पहला संदेश बिल्कुल स्पष्ट है।’’

‘‘और वो क्या है?’’

‘‘विज्ञापनकर्ता बताना नहीं चाहता कि वह कौन है? विज्ञापन में कहीं कोई नाम नहीं है। अकसर विज्ञापन ऐसे छपते हैं, जिनके विज्ञापनकर्ता का नाम-पता नहीं होता, पर यह सब जानकारी अखबार के दफ्तर में रहती है। अखबार अपनी ओर से एक बॉक्स नं. छापता है। इसमें यह भी नहीं है। तुम जानते होंगे कि जब कोई विज्ञापन छपवाता है तो उसका उद्देश्य यह होता है कि वह खुद मौजूद रहकर लेन-देन पर कोई सौदेबाजी करे। यह भी वही करना चाहता है, पर सौदेबाजी के लिए सामने नहीं आना चाहता।’’

‘‘मैं ठीक-ठीक समझ नहीं पाया?’’

‘‘ठीक है, मैं समझाता हूँ। ध्यान से सुनो। विज्ञापन देनेवाला व्यक्ति इस विज्ञापन के माध्यम से लोगों से यह कहना चाहता है कि ‘हे भाई, सुनो! यदि तुम में से कोई अपने शरीर का काँटा निकाल देना चाहता हो तो अमुक जगह इतने बजे मिलो। और इस मुद्रा में खड़े रहो, ताकि मैं तुम्हें पहचान सकूँ।’ अभी हम इसकी चर्चा न करें कि आखिरकार यह शरीर में काँटा है क्या चीज? इस समय हम इतना ही सोच लें कि हम यदि उस काँटे को निकाल फेंकना चाहते हैं तो हमें क्या करना होगा? उस जगह उतने बजे वहाँ जाएँ और लैंपपोस्ट से कंधा टिकाकर खड़े हो जाएँ। मान लो, तुम उसी समय पर जाकर इंतजार करते हो, तो क्या होगा?’’

‘‘क्या होगा?’’

मुझे यह बताने की जरूरत नहीं है कि शनिवार की शाम को उस स्थान पर कितनी भीड़ हो जाती है। ‘वाइटवे लैडलो’ एक तरफ है, उसके दूसरी तरफ न्यू मार्केट है और चारों तरफ अनेक सिनेमा हॉल हैं। तुम वहाँ निर्धारित समय से लेकर आधा घंटे तक उक्त लैंपपोस्ट से टिककर खड़े रहते हो तो खंभे के आगे-पीछे चलने वाली भीड़ के धक्के तुम्हें खाने पड़ेंगे। लेकिन इतने इंतजार के बाद भी जिस काम के लिए तुम वहाँ खड़े हो, उसका कोई अता-पता तक नहीं और जादू से तो शरीर का काँटा निकल नहीं सकता! अंत में, तुम निराश होकर सोचने लगते हो कि किसी ने तुम्हें क्या मूर्ख बनाया है? तब एकाएक तुम्हें अपनी पॉकेट में एक रुक्का मिलता है, जो भीड़ में से किसी ने बड़ी सफाई से तुम्हारी पॉकेट में डाल दिया है।’’

‘‘और फिर?’’

‘‘फिर क्या? बीमार और दवा देनेवाला आपस में मिलते नहीं, फिर भी इलाज का नुस्खा मिल जाता है। तुम्हारे और विज्ञापनदाता के बीच संपर्क कायम हो जाता है, लेकिन तुम्हें नहीं पता लगता कि वह कौन है? और देखने में कैसा लगता है?’’

मैं कुछ देर उसकी बातों पर ध्यान देता रहा और बोला, ‘‘मान लो, मैं तुम्हारे वर्णन को सही मान भी लूँ, तो भी क्या साबित होता है इससे?’’

‘‘सिर्फ यह कि ‘शरीर में काँटें’ का सरगना हर कीमत पर अपनी पहचान को छुपाए रखना चाहता है और जो व्यक्ति अपनी पहचान उजागर करने में हिचकिचाता हो तो जाहिर है कि वह कोई सीधा-सादा व्यक्ति हर्गिज नहीं है।’’

मैंने अपना सिर हिलाकर कहा, ‘‘यह तुम्हारा केवल अनुमान है। इसका कोई सबूत नहीं कि जो तुम कह रहे हो, वह सही हो।’’

ब्योमकेश उठ खड़ा हुआ और फर्श पर चहलकदमी करते हुए बोला, ‘‘सुनो! सही अनुमान सबसे बड़ा सबूत होता है। जिसे तुम जाँच पर आधारित सबूत कहते हो, उसे तुम यदि बारीकी से अध्ययन करो तो पाओगे कि वह अनुमानों के एक क्रम के अलावा कुछ नहीं है। परिस्थिति पर आधारित प्रमाण बौद्धिक अनुमान नहीं है तो क्या है? फिर भी इसके आधार पर कितने ही लोगों को आजन्म कैद की सजा हुई है।’’

मैं चुप रहा, किंतु हृदय से उसके तर्कों को स्वीकार नहीं कर पाया। एक अनुमान को प्रमाण मान लेना आसान नहीं लगा, लेकिन फिर ब्योमकेश के तर्कों को यों ही झुठला देना भी मुश्किल था। इसलिए मैंने निर्णय किया कि इस समय यही बेहतर होगा कि प्रतिक्रिया के रूप में मैं फिलहाल कुछ न कहूँ। मैं जानता था कि मेरी चुप्पी ब्योमकेश को उद्वेलित करेगी और जल्दी ही वह कोई तर्क प्रस्तुत करेगा, जिनको मैं किसी तरह भी अस्वीकार नहीं कर पाऊँगा।

इसी बीच एक गौरैया उड़कर हमारी खिड़की के दरवाजे पर बैठ गई। उसकी चोंच में एक छोटी सी टहनी थी। उसने अपनी छोटी चमकती आँखों से देखा। ब्योमकेश चलते-चलते एकाएक रुक गया और गौरैया की ओर इशारा करके उसने पूछा, ‘‘क्या तुम बता सकते हो कि यह चिड़िया क्या कहना चाह रही है?’’

चौंककर मैं बोला, ‘‘क्या करना चाह रही है माने? मैं समझता हूँ कि वह अपना घोंसला बनाने के लिए जगह ढूँढ़ रही है, और क्या?’’

‘‘क्या यह निश्चयपूर्वक कह सकते हो, बिना किसी संदेह के?’’

‘‘हाँ, बिना किसी संदेह के।’’ ब्योमकेश दोनों बाजुओं को आपस में बाँधकर खड़ा हो गया और हल्की मुसकान से बोला, ‘‘तुमने ऐसा कैसे सोच लिया? क्या प्रमाण है?’’

‘‘प्रमाण...वह तो है, उसके मुँह में पेड़ की टहनी...’’

‘‘उसके मुँह में टहनी क्या निश्चित रूप से यह बताती है कि वह घोंसला ही बनाना चाहती है?’’

मैं समझ गया कि मैं ब्योमकेश के तर्कों के जाल में फँस गया हूँ। मैंने कहा, ‘‘नहीं...लेकिन...’’

‘‘अनुमान? अब तुम लाइन पर आए। तो क्यों इतनी देर से मानने से इनकार करते रहे?’’

‘‘नहीं, इनकार नहीं। लेकिन तुम्हारा कहना है कि जो अनुमान गौरैया के बारे में लगाया गया, वह मनुष्य पर लागू होता है?’’

‘‘क्यों नहीं?’’

‘‘यदि तुम मुँह में टहनी दबाकर किसी की दीवार पर चढ़कर बैठ जाओ तो यह साबित हो जाएगा कि तुम घोंसला बनाना चाहते हो?’’

‘‘नहीं, इससे तो यह साबित होगा कि मैं बहुत ही ऊँचे दर्जे का उल्लू हूँ।’’

‘‘क्या इसके लिए भी कोई सबूत चाहिए?’’

ब्योमकेश हँसने लगा। उसने कहा, ‘‘तुम मुझे किसी भी तरह नाराज नहीं कर सकते। तुम्हें यह मानना ही पड़ेगा कि भले ही जाँच पर आधारित प्रमाण में भूल हो जाए, पर तर्क पर आधारित अनुमान गलत नहीं हो सकता।’’

मैं भी अपनी जिद पर अड़ गया और बोला, ‘‘मैं इस विज्ञापन को लेकर तुम्हारे तरह-तरह के अनुमानों और अटकलों पर यकीन करने के लिए तैयार नहीं हूँ।’’

ब्योमकेश ने कहा, ‘‘इससे तो यही साबित होता है कि तुम्हारा दिमाग कितना कमजोर है? जानते हो, आस्था को भी मजबूत इच्छाशक्ति की जरूरत पड़ती है। खैर, तुम्हारे जैसे लोगों के लिए जाँच पर आधारित प्रमाणपत्र ही सर्वाधिक उपयोगी मार्ग है। कल है शनिवार! शाम को हमारे पास कोई काम नहीं है। मैं कल दिखा दूँगा कि मेरा अनुमान सही है।’’

‘‘क्या करोगे?’’

इतने में सीढ़ियों से किसी के चढ़ने की पदचाप सुनाई दी। ब्योमकेश ने कानों पर जोर दिया और बोला, ‘‘आगंतुक...अजनबी...मध्य वय का...भारी-भरकम...या फिर गोल-मटोल...हाथ में बेंत...कौन हो सकता है? जरूर हम ही से मिलना चाहता है, क्योंकि इस मंजिल में हमारे अलावा और कौन है?’’ वह अपने आप पर ही हँस दिया। 

दरवाजे पर दस्तक सुनाई दी। ब्योमकेश जोर से बोला, ‘‘भीतर आ जाइए। दरवाजा खुला है।’’

एक मध्य वय के भारी-भरकम व्यक्ति ने दरवाजा खोलकर प्रवेश किया। उसके हाथ में ‘मलाका’ बाँस से बनी बेंत थी, जिसकी मूठ पर चाँदी चढ़ी हुई थी। वह बटनोंवाला ‘अप्लाका’ ऊन का काला कोट पहने हुए था। नीचे बढ़िया प्लेटोंवाली फाइन धोती झलक रही थी। वह गोरा-चिट्टा क्लीन शेव था। आगे के बाल उड़ गए थे, पर देखने में वह प्रियदर्शी था। तीन मंजिल सीढ़ियाँ चढ़ने से अंदर आते ही बोलने में उसे असुविधा हो रही थी। उसने अपनी जेब से रूमाल निकालकर चेहरा पोंछा। 

ब्योमकेश मेरी ओर इशारा करके आहिस्ता से बड़बड़ाया, ‘‘अनुमान... अनुमान।’’

मुझे ब्योमकेश का ताना चुपचाप सहना पड़ रहा था, क्योंकि उसका अजनबी के बारे में अनुमान सही निकला था।

आगंतुक सज्जन तब तक सहज हो चुके थे। उन्होंने प्रश्न किया, ‘आप दोनों में से जासूस ब्योमकेश बाबू कौन है?’

ब्योमकेश ने पंखा चलाकर कुरसी की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘तशरीफ रखिए, मैं ही ब्योमकेश बक्शी हूँ, लेकिन मुझे जासूस शब्द से चिढ़ है। मैं एक सत्यान्वेषी हूँ; सच को खोजनेवाला! मैं देख रहा हूँ, आप काफी परेशान हैं। कुछ देर आराम कर लें, फिर आपसे ग्रामोफोन-पिन का रहस्य सुनूँगा।’’

वे सज्जन बैठ गए और बड़ी देर किंकर्तव्यविमूढ़ होकर ब्योमकेश की तरफ ताकते ही रह गए। आश्चर्य में तो मैं भी था, क्योंकि मेरे भेजे में यह घुस नहीं पा रहा था कि ब्योमकेश ने एक ही नजर में उन मध्य वय के संभ्रांत सज्जन को उस कुख्यात ग्रामोफोन-पिन की कहानी से कैसे जोड़ दिया? मैंने ब्योमकेश के कई अजूबे देखे हैं, पर यह तो कोई जादुई कारनामे से कम नहीं था।

बहुत प्रयास करने के बाद उन सज्जन ने अपने विचारों पर नियंत्रण किया और पूछ ही लिया, ‘‘आप! यह कैसे जान गए?’’

ब्योमकेश ने हँसकर उत्तर दिया—‘‘केवल अनुमान! पहला यह कि आप मध्य वय के हैं; दूसरा आप संपन्न व्यक्ति हैं; तीसरा आपको यह समस्या हाल ही में होने लगी और अंततः आप मेरे पास सहायता के लिए आए हैं, इसलिए...’’ ब्योमकेश ने वाक्य वहीं छोड़ दिया और अपने हाथों को हवा में इस प्रकार उड़ाया, जैसे कह रहा हो कि इतना सब होने के बाद उनके आने का कारण तो एक बच्चा भी जान जाएगा।

यहाँ यह बताना जरूरी है कि इधर कुछ सप्ताहों से शहर में कुछ अजीब घटनाएँ घट रही थीं। अखबारों ने उन घटनाओं को ‘ग्रामाफोन-पिन का रहस्य’ के शीर्षक से छापना शुरू कर दिया था और उन घटनाओं की विस्तृत जानकारी पहले पेज की हेडलाइन के रूप में छाप रहे थे। इन समाचारों ने कलकत्ता की जनता को उत्सुकता, व्याकुलता और आतंक के मिले-जुले प्रभाव से त्रस्त कर दिया था। अखबारों में भयमिश्रित आतंक पैदा करनेवाले वृत्तांत पढ़ने से पान अैर चाय के अड्डों पर तरह-तरह की आशंकाओं और अफवाहों का बाजार गरम था। भय और आतंक से शायद ही कोई कलकत्तावासी रात के अँधेरे में घर से बाहर निकलता हो।

घटना की शुरुआत इस प्रकार हुई : करीब डेढ़ महीने पहले सुकिया स्ट्रीट निवासी जयहरि सान्याल सुबह के समय कार्नवालिस रोड पर चल रहे थे। सड़क पार करने के लिए जैसे ही उन्होंने कदम बढ़ाया, वे एकाएक औंधे मुँह सड़क पर गिर गए। उस समय सड़क पर काफी भीड़ थी। उन्हें सड़क से उठाकर एक ओर लाया गया तो पता चला कि उनकी मृत्यु हो चुकी है। उनकी एकाएक मृत्यु की जब खोजबीन की गई तो देखा गया कि उनके सीने पर खून की बूँद है, पर आस-पास किसी घाव का कोई निशान नहीं पाया गया। पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में अप्राकृतिक मृत्यु घोषित करके लाश को अस्पताल भेज दिया। पोस्टमार्टम में एक विचित्र तथ्य सामने आया, जिससे पता चला कि मौत ग्रामाफोन के छोटे से पिन (सुई) से हुई है, क्योंकि वह हृदय में पाई गई, जो गढ़कर अंदर पहुँची थी। यह पिन कैसे हृदय के अंदर पहुँची? इस प्रश्न के उत्तर में हथियार विशेषज्ञों ने अपने निर्णय में बताया कि इसे छोटी रिवॉल्वर या उसी प्रकार के यंत्र से सीने के ठीक सामने, बिल्कुल पास से मारा गया है, जिससे पिन मृत व्यक्ति की खाल और मांस से होकर सीधा हृदय में पहुँची और उसकी तत्काल मृत्यु हो गई।

अखबारों में इस वृत्तांत को पढ़कर काफी शोरगुल हुआ था। इसके बाद मृत व्यक्ति की संक्षिप्त जीवनी भी प्रकाशित हुई और पत्रों में ऐसी अटकलें भी छापी गईं कि यह वास्तव में हत्या ही है या कुछ और? अगर हत्या है तो इसको कैसे अंजाम दिया गया? लेकिन एक बात, जो कोई नहीं बता पाया कि इस हत्या के पीछे उद्देश्य क्या था और हत्यारे को इससे क्या लाभ हुआ? अखबारों में यह भी छपा कि पुलिस ने अपनी जाँच शुरू कर दी है। चाय के अड्डों से अब वह उड़ने लगा कि यह झाँसापट्टी के सिवाय कुछ नहीं है। उस व्यक्ति को दिल का दौरा पड़ा था और अखबारों के पास कोई सनसनीखेज समाचार नहीं था तो उन्होंने यह कहानी गढ़कर तिल को ताड़ बना दिया है। लेकिन आठ दिनों के बाद अखबारों ने अपने मुखपृष्ठों पर डेढ़ इंच के बड़े-बड़े टाइप में जो समाचार छापा, उसको पढ़कर कलकत्ता का संभ्रांत तबका भी चौंककर सोचने पर मजबूर हो गया। चाय के अड्डों के धुरंधर भी सन्नाटे में आ गए। अफवाहों, आशंकाओं और अटकलों का बाजार बरसात के कुकुरमुत्तों की भाँति तेजी से बढ़ने लगा। दैनिक ‘कालकेतु’ ने लिखा—

‘ग्रामाफोन-पिन ने फिर से तांडव शुरू किया।’

‘अजीब और रहस्यमय घटनाओं से लोग भयभीत।’

‘कलकत्ता की सड़कें पूर्णतः असुरक्षित’। ‘कालकेतु’ के पाठकों को याद होगा कि कुछ दिन पहले श्री जयहरि सन्याल की सड़क पार करते समय एकाएक मृत्यु हो गई थी। जाँच से पता चला कि एक ग्रामाफोन-पिन उनके हृदय में घुसा मिला और डॉक्टर ने उस पिन को ही मृत्यु का कारण घोषित किया था। उस समय हमने संदेह उजागर किया था कि वह कोई साधारण दुर्घटना नहीं है और उसके पीछे कोई छुपा भयानक षड्यंत्र है। हमारा वह संदेह अब पक्का हो गया है। कल ठीक वैसी ही अजीब दुर्घटना घटी है। प्रख्यात व्यवसायी कैलाश चंद्र मौलिक कल शाम लगभग पाँच बजे मैदान के निकट गाड़ी से जा रहे थे। रेड रोड पर उन्होंने अपनी कार रुकवाई और पैदल चलने के लिए गाड़ी से बाहर आए। एकाएक उनके मुँह से एक चीख निकली और वे जमीन पर गिर पड़े। उनके ड्राइवर और अन्य लोग उन्हें उठाकर कार तक लाए, लेकिन तब तक उनका प्राणांत हो गया। यह देखकर वहाँ एकत्र सभी लोग घबरा गए, लेकिन भाग्यवश जल्दी ही पुलिस आ गई। कैलाश बाबू रेशमी कुरता पहने हुए थे और पुलिस को उनके सीने पर खून की बूँद दिखी। इस भय से कहीं यह अस्वाभाविक मृत्यु न हो, पुलिस ने तुरंत लाश को अस्पताल भेजा। डॉक्टर की रिपोर्ट में कहा गया कि मृतक के हृदय में ग्रामाफोन पिन घुसा पाया गया और बताया गया कि वह पिन नजदीक से उनके सीने में सामने से ‘शूट’ किया गया था। यह स्पष्ट है कि यह कोई अप्रत्याशित अपराध नहीं है और यह कि जघन्य हत्यारों का गिरोह शहर में आ गया है। यह कहना मुश्किल है कि ये कौन लोग हैं? और कलकत्ता के इन जाने-माने नागरिकों को मारने में उनका प्रयोजन क्या हो सकता है? लेकिन जो वास्तव में अनोखा है, वह है उनकी हत्या का तरीका। इसके अलावा, हथियार और उसका इस्तेमाल भी रहस्य के परदे में छिपा हुआ है।

कैलाश बाबू अत्यंत उदार और मिलनसार सज्जन पुरुष थे। यह कल्पना भी नहीं की जा सकती कि उन जैसे व्यक्ति का कोई अहित चाहता हो। मृत्यु के समय उनकी आयु केवल अड़तालीस वर्ष थी। कैलाश बाबू विधुर थे। उनके बाद उनकी संपत्ति की स्वामी उनकी बेटी होगी। हम कैलाश बाबू की बेटी और दामाद के लिए गहन सहानुभूति प्रकट करते हैं, जो उनकी मृत्यु से शोकाकुल हैं।

पुलिस अपनी जाँच-पड़ताल कर रही है। फिलहाल कैलाश बाबू के ड्राइवर को संदेह के चलते हिरासत में ले लिया गया है।

इसके बाद लगभग दो सप्ताह तक अखबारों में काफी उत्तेजना फैली रही। पुलिस जोर-शोर से अपराधी की तलाश में व्यस्त रही, लेकिन हाथ-पल्ले कुछ पड़ता न देख करके भी हैरान और परेशान पुलिस खोजबीन में लगी रही; लेकिन अपराधी का कोई सुराग पाना तो दूर, वह ग्रामाफोन-पिन के गहन रहस्य के बारे में भी कोई प्रकाश नहीं डाल पाई।

और फिर करीब पंद्रह दिन बाद ग्रामाफोन-पिन ने अपनी करामात दिखाई। इस बार का शिकार कृष्ण दयाल लाह नामक एक सूदखोर धनवान था। वह धर्मतल्ला और वेलिंगटन स्ट्रीट के चौराहे पर सड़क पार करते समय सड़क पर ही गिर गया और फिर कभी नहीं उठा। इस बार फिर मीडिया में ऐसा घमासान छिड़ा, जिसने खबरों के परखच्चे उड़ा दिए। संपादकीय लेखों में पुलिस की कार्यक्षमता और व्यर्थता पर तीखे प्रहार और तेज हो गए। कलकत्ता महानगर में आतंक छा गया। नागरिकों में भय और दहशत घर करने लगे। अड्डों में, चाय-दुकानों, होटलों और ड्राइंगरूमों में इस विषय को छोड़कर कोई और विषय ही नहीं रहा।

कुछ ही दिन के अंतराल में ऐसी ही दो मौतें और हो गईं। सारा शहर दहशत से सकते में आ गया। एक नागरिक यह समझ नहीं पा रहा था कि वह हत्यारे से अपने को कैसे सुरक्षित रखे?

कहना न होगा कि ब्योमकेश भी गहन रूप से इस रहस्य पर अपना ध्यान केंद्रित किए हुए था। गलत कार्य करनेवालों को पकड़ना उसका व्यवसाय था और इस क्षेत्र में उसने पर्याप्त नाम भी अर्जित किया था। वह चाहे जितना ‘जासूस’ शब्द से घृणा करता हो, पर वह अच्छी तरह से जानता था कि सभी तत्त्वों और उसके कार्यक्षेत्र को देखते हुए वह एक प्राइवेट डिटेक्टिव ही है। इसलिए भी इस जघन्य हत्याकांड ने उसके मस्तिष्क की समस्त क्षमताओं को हिला दिया था। हम दोनों सभी अपराध के घटनास्थलों पर जाते और प्रत्येक घटनास्थल को सभी कोणों से जाँचते। मैं कह नहीं सकता कि ब्योमकेश को इस जाँच-पड़ताल से कोई नया सुराग मिला या नहीं, और यदि मिला भी हो तो उसने मुझसे इस बारे में कोई चर्चा नहीं की। लेकिन इतना जरूर था कि वह अपनी नोटबुक में बड़ी मुस्तैदी से छोटी-छोटी जानकारी को दर्ज करता जा रहा था। संभवतः अपने मन के भीतर से उसे विश्वास था कि किसी दिन रहस्य की कोई टूटी डोर उसके हाथ लग ही जाएगी।

इसलिए आज जब वह टूटी डोर उसके हाथ के करीब आ गई तो मुझे अहसास हो गया कि शांत चेहरे के बावजूद भीतर से वह कितना उद्वेलित और अशांत है। वे सज्जन कहने लगे, ‘‘मैं आया था, क्योंकि मैंने आपके बारे में सुना था और अब देख रहा हूँ कि वह सब गलत नहीं है। आश्चर्यजनक दक्षता, जो आपने अभी दिखाई है, उसे देखकर मुझे लगता है कि आप ही ही हैं, जो मुझे बचा सकते हैं। पुलिस कुछ भी नहीं कर पाएगी। इसलिए मैं उसके पास गया ही नहीं। जरा देखिए तो, कम-से-कम पाँच हत्याएँ दिनदहाड़े उसकी नाक के नीचे हो गईं, क्या वे कुछ कर पाए? और आज तो मैं भी जाने कैसे बच गया।’’ उनकी आवाज लड़खड़ाकर मध्यम हो गई और उनकी कनपटी पर पसीने की बूँदें चमक आईं।

ब्योमकेश ने उन्हें सांत्वना देकर शांत करते हुए कहा, ‘‘मुझ पर विश्वास कीजिए। अच्छा हुआ कि आप पुलिस के बजाय मेरे पास चले आए। अगर कोई इस रहस्य को खोल सकता है तो यकीनन वह पुलिस नहीं है। कृपा करके शुरू से सारी बात विस्तारपूर्वक बताइए। कोई भी बात छोड़िए नहीं, क्योंकि मेरे लिए कोई भी जानकारी व्यर्थ नहीं होती। उन सज्जन ने सहज होकर कहना शुरू किया, ‘‘मेरा नाम आशुतोष मित्र है। मैं नजदीक ही नेबुटोला में रहता हूँ। अठारह साल की उम्र से ही मैं अपने व्यवसाय में लगा हुआ हूँ। मुझे कभी समय ही न मिला कि मैं अपने परिवार या शादी वगैरह के बारे में सोच पाऊँ। दूसरे, मुझे बच्चों का भी कोई शौक नहीं, इसलिए मैं इन सब झंझटों से दूर ही रहा। मेरे शौक भी कुछ अलग ही हैं। कुछ चीजें बहुत अधिक पसंद हैं; कुछ से मुझे सख्त नफरत है और इसलिए मैं अकेला रहना ही पसंद करता हूँ। समय के साथ उम्र भी बीत गई। मैं अगली जनवरी को पचास वर्ष पूरे कर लूँगा। दो साल पहले मैंने अपने काम से अवकाश ले लिया। मेरे पास मेरी बचत का पैसा लगभग डेढ़ एक लाख रुपया बैंक में जमा है, जिसका ब्याज मेरी जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त है। मुझे रहने के लिए भाड़ा भी नहीं देना पड़ता, क्योंकि जिस घर में रहता हूँ, वह मेरा है। मुझे केवल संगीत का ही शौक है। सबकुछ होते हुए मुझे जीवन से कोई शिकायत नहीं है।’’

ब्योमकेश ने प्रश्न किया, ‘‘लेकिन क्या आपके ऊपर कोई निर्भर भी है?’’

आशुतोष ने सिर हिलाकर कहा, ‘‘नहीं मेरा कोई भी संबंधी नहीं है और इसीलिए मेरे ऊपर कोई बोझ नहीं है। एक निठल्ला भानजा जरूर है, जो पहले पैसा माँगने आया करता था। लेकिन वह छोकरा शराबी और जुआरी है, इसलिए मैंने उसके घर में घुसने पर रोक लगा दी है।’’

ब्योमकेश ने पूछा, ‘‘ये भानजा अब कहाँ है?’’

आशुतोष बड़े संतोष के साथ बोले, ‘‘आजकल वह जेल में है। उसे मार-पीट करने और पुलिस से हाथापाई करने के जुर्म में दो महीने की कैद हुई है। अब जेल में है।’’

‘‘अच्छा ठीक है! अब आगे कहिए, जो आप कह रहे थे।’’

‘‘जब से वह बेहूदा विनोद, मेरा भानजा जेल गया है, तब से जीवन आराम से कट रहा था। मेरा कोई मित्र नहीं है और मैंने जान-बूझकर कभी किसी का नुकसान नहीं किया है, इसलिए मुझे नहीं लगता कि कोई मेरा दुश्मन भी होगा। लेकिन कल एकाएक मैं जैसे आसमान से गिरा। मैं सोच भी नहीं सकता था कि मेरे साथ भी ऐसा हो सकता है! मैंने अखबारों में ग्रामाफोन-पिन के रहस्य की खबरों को पढ़ा जरूर था, लेकिन मुझे उन पर विश्वास नहीं होता था। मुझे लगता था, ये सब मनगढ़ंत कहानियाँ हैं, लेकिन मैं गलत था।’’

‘‘वह कैसे?’’

‘‘कल शाम मैं रोजाना की तरह घूमने निकला। जोड़ासाँको के पास एक संगीत संगोष्ठी है, जहाँ मैं शाम का समय गुजारता हूँ और रात में नौ बजे के आस-पास लौटता हूँ। आमतौर पर मैं पैदल ही जाता हूँ, क्योंकि मेरी उम्र में स्वास्थ्य के लिए यह फायदेमंद है। कल रात को लौटते समय जब मैं हरीसन रोड और एम्हर्स्ट स्ट्रीट के चौराहे पर पहुँचा, उस समय वहाँ की घड़ी सवा नौ बजा रही थी। उस समय भी सड़कों पर भीड़ काफी थी। मैं फुटपाथ पर कुछ समय के लिए रुका रहा, मैं चाहता था कि आने वाली दो ट्राम भी निकल जाएँ। जब ट्रैफिक बिल्कुल साफ हो गया तो मैं सड़क पार करने लगा। मैं सड़क के बीच में पहुँचा ही था कि एकाएक मैंने अपने सीने पर झटका महसूस किया। मुझे ऐसा लगा, जैसे किसी ने मेरे हृदय के ऊपर की हड्डियों के पास, जहाँ मैं अपनी ब्रेस्ट पॉकेट में अपनी घड़ी रखता हूँ, कुछ ठोंक दिया है। इसके साथ ही मुझे दर्द हुआ, जैसे किसी ने हृदय में काँटा घुसा दिया हो। मैं गिरते-गिरते बचा। किसी तरह मैंने अपना संतुलन बनाए रखा और सड़क पार कर गया। मुझे चक्कर आया और मैं समझ नहीं पाया कि यह हुआ क्या? जब मैंने ब्रेस्ट पॉकेट से अपनी घड़ी निकालकर देखी तो वह ठप्प हो गई थी, उसका शीशा पूरी तरह से टूट गया था...और...और एक ग्रामाफोन पिन उसमें घुस गया था।’’ आशु बाबू फिर पसीने से तरबतर हो गए। उन्होंने काँपते हाथों से अपनी भौंह पर आए पसीने को पोंछा और अपनी जेब से निकालकर एक डिब्बी दे दी और बोले, ‘‘यह रही, वह घड़ी।’’

ब्योमकेश ने डिब्बी खोलकर घड़ी निकाली। घड़ी ‘गनमेटल’ की बनी थी। ऊपर का शीशा नदारद था। घड़ी में समय साढ़े नौ बजे का था और एक ग्रामाफोन का पिन घड़ी के बीचोबीच गढ़ा हुआ था। ब्योमकेश ने घड़ी को बड़ी बारीकी से कुछ देर देखा, फिर उसे डिबिया में रखकर सामने मेज पर रख दिया और बोला, ‘‘हाँ तो, आप अपनी बात जारी रखिए।’’

आशु बाबू बोले, ‘‘भगवान् ही जानता है कि उसके बाद मैं कैसे घर पहुँचा। मैं तनाव और परेशानी में सारी रात सो नहीं पाया। यह घड़ी मेरे लिए वरदान ही समझिए, अन्यथा तो अब तक अस्पताल में पोस्टमार्टम की टेबिल पर मेरी लाश पड़ी होती।’’...आशु बाबू के रोंगटे खड़े हो गए, ‘‘एक ही रात में मैंने अपने जीवन के दस वर्ष खो दिए हैं, ब्योमकेश बाबू। पूरी रात मैं सोचता रहा हूँ कि मैं क्या करूँ? किसके पास जाऊँ? अपने को कैसे बचाऊँ? दिन की पहली किरण के साथ ही मुझे आपका नाम सूझा। मैंने आपकी अभूतपूर्व क्षमताओं के बारे में सुना था और इसलिए मैं पहली ही फुरसत में आपके पास चला आया हूँ। मैं एक बंद टैक्सी में आया हूँ। पैदल चलने की मेरी हिम्मत नहीं हुई, क्योंकि कहीं...’’

ब्योमकेश उठकर आशुतोष बाबू के पास गया और उनके कंधों पर हाथ रखकर बोला, ‘‘आप अब आराम से रहिए। मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि आपका अब कोई बाल बाँका भी नहीं कर पाएगा। यह सही है कि कल आप बाल-बाल बचे हैं, लेकिन आगे से यदि आप मेरी सलाह पर अमल करेंगे तो आपके जीवन को कोई खतरा नहीं रहेगा।’’ आशु बाबू ने ब्योमकेश के हाथों को अपने हाथों में लेते हुए कहा, ‘‘ब्योमकेश बाबू, कृपा करके मुझे इस दुर्गति से बचा लीजिए; मेरा जीवन बचा लीजिए। मैं आपको एक हजार रुपए का पुरस्कार दूँगा।’’

ब्योमकेश मुसकराते हुए वापस अपनी कुरसी पर बैठकर बोला, ‘‘यह तो आपकी उदारता है। इसको मिलाकर कुल तीन हजार रुपए हो जाते हैं, क्योंकि दो हजार रुपए के इनाम की घोषणा सरकार कर चुकी है, है कि नहीं? लेकिन यह सब बाद में। पहले मेरे कुछ प्रश्नों का उत्तर दीजिए। कल जब आप पर हमला हुआ, उस समय आपने कोई आवाज सुनी थी?’’

‘‘किस तरह की आवाज?’’

‘‘कोई भी, जैसे कार के टायर फटने की आवाज?’’

आशु बाबू ने निश्चयपूर्वक कहा, ‘‘नहीं।’’

ब्योमकेश ने फिर पूछा, ‘‘कोई और आवाज या ध्वनि?’’

‘‘जैसाकि मुझे याद आता है, मैंने ऐसा कुछ नहीं सुना।’’

‘‘ध्यान से सोचिए।’’

काफी देर सोचने के बाद आशु ने कहा, ‘‘मैंने वे ध्वनियाँ सुनीं, जो अकसर भीड़ भरी सड़कों पर होती हैं। जैसे कारों, ट्रामों, रिक्शों की आवाजें और जहाँ तक मुझे याद आ रहा है, मुझे झटका लगने के समय मैंने साइकिल की घंटी की आवाज सुनी थी।’’

‘‘कोई और अस्वाभाविक आवाज?’’

‘‘नहीं।’’

ब्योमकेश कुछ क्षणों तक चुप रहने के बाद बोला, ‘‘क्या आपके ऐसे दुश्मन हैं, जो चाहते हों कि आपकी मृत्यु हो जाए?’’

‘‘नहीं, जहाँ तक मेरी जानकारी में है, मैं ऐसे किसी व्यक्ति को नहीं जानता।’’

‘‘आपने शादी नहीं की, इसलिए आपके बच्चे तो हैं नहीं। मैं समझता हूँ, आपका भानजा ही आपका वारिस है?’’

आशु बाबू पहले तो दुविधा में हिचकिचाए और बाद में बोले, ‘‘नहीं।’’

‘‘क्या आपने अपनी वसीयत लिख दी है?’’

‘‘हाँ।’’

‘‘कौन है आपका वारिस?’’

आशु बाबू संकोच में मुसकराए और कुछ क्षण चुप रहने के बाद कुछ अटकते हुए बोले, ‘‘आप मुझसे इसे छोड़कर कोई भी प्रश्न पूछ सकते हैं। यह मेरा निजी मामला है, प्राइवेट है।’’ और वह अपनी उलझन में खो गए।

ब्योमकेश पैनी निगाह से आशु बाबू को देखकर बोला, ‘‘ठीक है, लेकिन क्या आपका भविष्य का वारिस, जो भी हो, आपकी वसीयत के बारे में जानता है?’’

‘‘नहीं। यह मेरे और मेरी वकील के बीच पूरी तरह से गोपनीय है।’’

‘‘क्या आप अपने वारिस से अकसर मिलते रहते हैं?’’

आशु बाबू ने दूसरी ओर देखकर कहा, ‘‘हाँ।’’

‘‘आपके भानजे को जेल गए कितने दिन हुए हैं?’’

आशु बाबू ने हिसाब लगाकर बताया, ‘‘लगभग तीन सप्ताह।’’

ब्योमकेश बाबू कुछ देर व्यग्रता में बैठा रहा, फिर एक निःश्वास छोड़कर उठ खड़ा हुआ—‘‘आप अभी घर जाइए। यह घड़ी और अपना पता मेरे पास छोड़ जाइए। यदि मुझे और किसी जानकारी की जरूरत पड़ेगी तो मैं आपसे संपर्क करूँगा।’’

आशु बाबू एकाएक परेशान हो उठे और बोले, ‘‘लेकिन आपने तो मेरे लिए कोई व्यवस्था नहीं की? यदि मुझे फिर...’’

‘‘आपको केवल इतना ही खयाल रखना है कि आप अपने घर से बाहर न निकलें।’’

आशु बाबू का चेहरा भय से सफेद हो गया। उन्होंने कहा, ‘‘मैं घर में अकेला रहता हूँ, यदि कोई...।’’

ब्योमकेश बोला, ‘‘घबराइए नहीं, आप घर में पूर्ण सुरक्षित हैं। हाँ, यदि आप दरबान चाहते हों तो रख सकते हैं।’’

आशु बाबू बोले, ‘‘क्या मैं घर से बाहर बिल्कुल नहीं निकल सकता?’’

ब्योमकेश कुछ क्षण सोचता रहा, फिर बोला, ‘‘यदि आप घर से बाहर निकलना ही चाहते हैं तो केवल फुटपाथ का ही प्रयोग करें। किसी भी स्थिति में सड़क का प्रयोग न करें। यदि करते हैं तो मैं आपकी सुरक्षा की जिम्मेदारी नहीं ले पाऊँगा।’’

आशु बाबू के चले जाने के बाद ब्योमकेश काफी देर तक त्यौरी चढ़ाकर विचारों में डूबा रहा। इसमें कोई संदेह नहीं कि फिलहाल उसके मस्तिष्क के लिए उन्हें काफी मसाला मिल गया था। इसलिए मैंने उसे छेड़ना नहीं चाहा। कोई आधा घंटे के बाद उसने मुँह उठाकर देखा और बोला, ‘‘तुम सोच रहे हो कि मैंने आशु बाबू को घर से निकलने के लिए मना कर दिया और मैं कैसे इस निर्णय पर आया कि वे केवल घर में ही सुरक्षित रहेंगे?’’

मैंने चौंककर देखा और मेरे मुँह से निकल गया, ‘‘हाँ।’’

ब्योमकेश ने कहा, ‘‘ग्रामाफोन-पिन केस में यह स्पष्ट है कि सभी हत्याएँ सड़क पर हुई हैं। सड़क के किनारे भी नहीं, बल्कि सड़क के बीच में। क्या तुमने सोचा, ऐसा क्यों हुआ है?’’

‘‘नहीं, क्या कारण है?’’

‘‘दो कारण हो सकते हैं। पहला, कि सड़क पर मारने से इल्जाम से बच जाना आसान हो सकता है हालाँकि, यह ज्यादा मुमकिन नहीं लगता। दूसरे, हत्या का हथियार भी ऐसा है, जिसका प्रयोग केवल सड़क पर ही संभव हो।’’

मैंने उत्सुकता से पूछा, ‘‘किस तरह का हथियार हो सकता है?’’

ब्योमकेश बोला, ‘‘अगर यही पता लग जाए तो ग्रामाफोन-पिन का रहस्य ही न खुल जाए?’’

मेरे मस्तिष्क में एक विचार रह-रहकर उठ रहा था। मैंने कहा, ‘‘क्या कोई व्यक्ति ऐसा रिवॉल्वर रख सकता है, जिसमें गोली के स्थान पर ग्रामाफोन-पिन का इस्तेमाल हो सके?’’

ब्योमकेश ने मेरी बात की हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा, ‘‘आइडिया मार्के का है। लेकिन इसमें कुछ संदेह दिखाई दे रहा है। कोई व्यक्ति, जो बंदूक और पिस्तौल इस्तेमाल करना चाहता है, वह क्यों चाहेगा? तर्क के अनुसार वह एकांत ही खोजेगा। दूसरे, बंदूक तो छोड़ो, पिस्तौल के शॉट का धमाका भी भीड़ के कोलाहल में छुप नहीं सकता। फिर गनपाउडर की महक रह जाती है। वो कहते हैं न कि एक धमाका दूसरे को छुपा सकता है, लेकिन महक कैसे छिपेगी?’’

मैंने कहा, ‘‘संभव है, वह एयरगन हो?’’

ब्योमकेश जोर से हँसा, ‘‘वाह! क्या बेहतरीन आइडिया है? कंधे पर एयरगन लटकाकर हत्या करने जाना! लेकिन क्या यह व्यावहारिक है? नहीं, मेरे प्यारे मित्र! यह इतना आसान नहीं है। यहाँ सोचने की बात यह है कि जो भी हथियार होगा, वह धमाका करेगा ही। तब कैसे उस धमाके को छुपाया जा सकता है?’’

मैंने कहा, ‘‘तुम अभी-अभी क्या कह रहे थे कि एक धमाका दूसरे को छुपा सकता है।’’

एक झटके से ब्योमकेश खड़ा हो गया और मुझे बड़ी-बड़ी आँखों से घूरने लगा और बड़बड़ाने लगा, ‘‘यह सही है, यह बिल्कुल सही है।’’

‘‘...’’

मैं चौंक उठा, ‘‘क्या बात है?’’ ब्योमकेश ने सिर हिलाते हुए कहा, ‘‘कुछ नहीं। मैं जितना ग्रामाफोन-पिन रहस्य के बारे में सोचता हूँ, उतना ही मुझे लगता है, जैसे सारी हत्याएँ एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। एक विशेष प्रकार की समानता सभी हत्याओं में दिखाई दे रही है। हालाँकि ऊपर से ऐसा कुछ नहीं लगता।’’

‘‘वह कैसे?’’

ब्योमकेश ने उँगली पर चिह्न लगाते हुए कहा, ‘‘शुरू करें तो सभी शिकार मध्य वय के व्यक्ति थे। आशुबाबू जो घड़ी के कारण बच गए, वे भी मध्य आयु के हैं। दूसरे, सभी खाते-पीते संपन्न व्यक्ति हैं। कुछ दूसरों से अधिक धनी हो सकते हैं, किंतु निर्धन कोई नहीं था। प्रत्येक व्यक्ति की हत्या सड़क के बीचोबीच हुई, सैकड़ों की भीड़ में, और अंत में महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि सभी संतानहीन थे।’’

मैंने कहा, ‘‘तो तुम्हारा अनुमान यह है...’’

ब्योमकेश बोला, ‘‘मैंने अभी तक कोई अनुमान नहीं लगाया है। यह सब बातें मेरे अनुमान के केवल आधार हैं। तुम इन्हें संभावना कह सकते हो।’’

मैंने कहा, ‘‘लेकिन केवल इन संभावनाओं से हत्यारों को पकड़ना...’’

ब्योमकेश ने टोक दिया, ‘‘हत्यारे नहीं, अजीत! हत्यारा। बहुवचन का प्रयोग केवल प्रतिष्ठा जोड़ने के लिए है। वास्तव में व्यर्थ है। अखबारवाले भले ही हल्ला मचा रहे हैं कि इनके पीछे हत्यारों का गिरोह है, लेकिन उस गिरोह में एक ही व्यक्ति है, जो इस मानवीय हत्याओं का पोषक, गुरु और हत्यारा है। सभी हत्याओं के पीछे केवल एक ही व्यक्ति है।’’

मैं अपने संदेह को रोक नहीं पाया, ‘‘तुम यह सब इतने विश्वास से कैसे कह सकते हो? क्या तुम्हारे पास कोई सबूत है?’’

ब्योमकेश ने उत्तर दिया ‘‘सबूत तो अनेक हैं, लेकिन फिलहाल एक ही पर्याप्त है। क्या यह संभव है कि सभी लोग इतनी अद्भुत दक्षता से एक ही जगह पर दागे गए हथियार से मारे जाएँ? प्रत्येक बार पिन हृदय के बीच में ही घुसा है, रंचमात्र भी, न इधर, न उधर। आशुबाबू का केस ही लो। यदि घड़ी न होती तो वह पिन कहाँ लगता? तुम्हारी नजर में कितने लोग हो सकते हैं, जो इतनी दक्षता से यह कार्य कर पाएँगे, जिनका निशाना इतना अचूक होगा? यह तो उस तरह हो गया, जैसे पानी में लकड़ी की मछली की छाया को देखकर घूमते पहिए के बीच मछली की आँख में तीर मारना। मैं समझता हूँ, तुम्हें द्रौपदी के स्वयंवर की कथा याद होगी! जरा सोचो, यह केवल अुर्जन ही कर पाया था—महाभारत काल में भी इतनी अचूक दक्षता का श्रेय केवल एक ही व्यक्ति को मिला था।’’ ब्योमकेश जब उठा तो हँस रहा था।

ड्राइंगरूम के बगलवाला कमरा ब्योमकेश का निजी कमरा था, जिसमें वह हर समय मुझे भी आने नहीं देता था। वास्तव में यह उसकी लाइब्रेरी, प्रयोगशाला, संग्रहालय और ड्रेसिंग-रूम था। उसने आशुबाबू की घड़ी उठाकर अपने कमरे की ओर जाते हुए कहा, ‘‘लंच के बाद इस केस पर मस्तिष्क लगाने के लिए पर्याप्त समय होगा, अब समय है नहाने का।’’

ब्योमकेश दोपहर में साढ़े तीन के आस-पास बाहर चला गया। मुझे नहीं मालूम कहाँ और क्यों गया? और वापस आया, तब तक अँधेरा हो चुका था। मैं उसके इंतजार में बैठा था। चाय का समय बीता जा रहा था। जैसे ही वह आया, पुत्तीराम नाश्ता ले आया। हम लोगों ने पूर्ण शांति में नाश्ता किया। हम लोगों की शाम को साथ-साथ चाय पीने की आदत थी।

ब्योमकेश ने कुरसी पर कमर टिकाते हुए चरूट जलाकर पहली बार मौन तोड़ा, ‘‘तुम्हें आशु बाबू कैसे व्यक्ति लगे?’’

मुझे प्रश्न कुछ अटपटा लगा, मैंने पूछा, ‘‘ऐसा क्यों पूछते हो? मैं समझता हूँ वे सज्जन पुरुष, काफी सहज और मिलनसार व्यक्ति हैं।’’

ब्योमकेश ने कहा, ‘‘और उनका नैतिक चरित्र?’’

मैंने उत्तर दिया, ‘‘जिस प्रकार अपने उस शराबी भानजे के बारे में उनकी नफरत देखी, मैं तो कहूँगा कि वे सीधे तथा सच्चे इनसान हैं। फिर उनकी उम्र भी हो गई है। उन्होंने विवाह भी नहीं किया। संभव है, जवानी में उन्होंने कुछ प्यार-व्यार की हरकतें की हों, लेकिन उन सबके लिए उनकी अब अवस्था नहीं है।’’

ब्योमकेश हँस पड़ा, ‘‘उनकी अवस्था न भी हो तो क्या उन बातों ने उन पर कोई रोक लगाई है? जोड़ासांको के जिस घर में आशु बाबू रोज शाम को संगीत सुनने जाते हैं, वह एक स्त्री का घर है। दरअसल यह कहना कि वह उस स्त्री का घर है, गलत है, क्योंकि आशुबाबू उसका भाड़ा भरते हैं। उस घर को संगीत संगोष्ठी स्कूल कहना भी शायद गलत होगा, क्योंकि संगोष्ठी बनाने के लिए कम-से-कम दो व्यक्तियों की दरकार होती है। यहाँ तो वे केवल एक ही है।’’

‘‘क्या बात कर रहे हो? तो बुढ़ऊ काफी रंगीन तबीयत के हैं, वाह!’’

‘‘और भी है। आशु बाबू उस स्त्री की पिछले बारह-तेरह वर्षों से देखभाल कर रहे हैं। इसलिए उनकी वफादारी पर शक नहीं किया जा सकता और जाहिर है कि बदले में उन्हें भी वही वफादारी मिली है, क्योंकि और किसी संगीत का शौकीन को घर में घुसने की इजाजत नहीं है। दरवाजे पर सख्त पहरा है।’’

मैं उत्सुकता से भर गया था, ‘‘तो क्या वास्तव में तुम संगीत-प्रेमी बनकर उस घर में गए थे? क्या देख पाए उस स्त्री को? कैसी थी देखने में?’’

ब्योमकेश बोला, ‘‘मैं एक झलक ही देख पाया। लेकिन मैं नहीं चाहता कि मैं उसके रूप का वर्णन करके तुम्हारे जैसे कुँवारे दोस्त की अनमोल रातों की नींदें उड़ा दूँ। एक ही शब्द कहूँगा, लाजवाब! उसकी आयु संभवतः 27-28 बरस की होगी। जो भी हो, मैं आशु बाबू की पसंद का कायल हो गया हूँ।’’

मैंने हँसकर कहा, ‘‘मुझे यह लग भी रहा था कि तुम्हें एकाएक आशु बाबू के निजी जीवन में इतनी दिलचस्पी क्यों हो गई है?’’

ब्योमकेश बोला, ‘‘अनियंत्रित उत्सुकता मेरी कमियों में से एक है। दूसरे, आशु बाबू का वारिस मुझे परेशान किए हुए था।’’

‘‘तो ये हैं आशु बाबू की वारिस?’’

‘‘यह मेरा अनुमान है। मैंने वहाँ एक और व्यक्ति को देखा, जिसकी आयु पैंतीस के लगभग होगी। देखने में काफी तड़क-भड़कवाला लगा। वह दरबान के पास तेजी से आया और उसके हाथ में एक पत्र देकर गायब हो गया। जो भी हो, विषय चाहे जितना भी मजेदार हो, पर इस समय हमारे लिए इतना उपयोगी नहीं है।’’

ब्योमकेश उठकर फर्श पर चक्कर लगाने लगा।

मैं समझ गया कि ब्योमकेश नहीं चाहता कि आशु बाबू के निजी जीवन की ये घटनाएँ आशु बाबू को सुरक्षा प्रदान करने के उसके प्रयासों में आड़े न आ जाएँ। मैं भी जानता था कि मानवीय मस्तिष्क कई बार ऐसी स्थितियों में अनजाने में केंद्र बिंदु से भटक जाता है। इसलिए मैंने भी विषय बदलते हुए कहा, ‘‘क्या तुम्हें घड़ी की जाँच करके कुछ मिला?’’

ब्योमकेश चलते-चलते मेरे सामने रुक गया और हल्की मुसकान के साथ बोला, ‘‘घड़ी को जाँचने के बाद मुझे तीन जानकारी मिली हैं। पहली, ग्रामाफोन-पिन साधारण एडीसन ब्रांड का है। दूसरी, उसका भार ठीक दो ग्राम है और तीसरी, घड़ी अब ठीक नहीं हो सकती। उसकी मरम्मत संभव ही नहीं है।’’

मैंने कहा, ‘‘इसका मतलब है कि तुम्हें कोई उपयोगी जानकारी हाथ नहीं लगी।’’

ब्योमकेश ने चेयर खींचकर बैठते हुए कहा, ‘‘लेकिन मैं तुम्हारी बात से सहमत नहीं हूँ, क्योंकि इससे मुझे यह पता चला कि जिस समय यह पिन मृतक के हृदय में दागा गया, उस समय मृतक और हत्यारे की दूरी सात-आठ फीट से ज्यादा नहीं हो सकती। एक ग्रामाफोन-पिन इतना हल्का होता है कि इससे अधिक दूरी से दागा जाए तो अपने निशाने पर नहीं लग सकता। और तुम जानते ही हो कि हत्यारे का निशाना कितना अचूक रहा है। प्रत्येक बार हथियार ने अपना काम बखूबी पूरा किया है।’’

‘‘आश्चर्य है,’’ मैंने भी प्रश्न किया, ‘‘हत्यारे ने इतने नजदीक आकर हत्या की है, फिर भी गायब हो गया, पकड़ा नहीं गया?’’

ब्योमकेश बोला, ‘‘यही तो सबसे बड़ी पहेली है। जरा सोचो, हत्या कर देने के बाद वह व्यक्ति भी भीड़ में खड़ा होगा, हो सकता है कि मृतक की लाश को हटाने में सहायक भी रहा हो। फिर भी कोई उसे पकड़ नहीं पाया, कितनी सफाई से उसने अपने को छुपाए रखा।’’

मैंने कुछ देर सोचकर कहा, ‘‘मान लो कि हत्यारे की पॉकेट में एक ऐसा यंत्र है, जो ग्रामाफोन-पिन को दाग सकता हो। जैसे ही वह अपने शिकार के सामने आता है, वह अपनी पॉकेट के अंदर से यंत्र को चला देता हो। अपना हाथ वह पॉकेट में ही रखता हो। किसी को शक भी नहीं होगा, क्योंकि बहुत से लोग चलते समय अपने हाथ पॉकेट में रखते हैं।’’

ब्योमकेश ने कहा, ‘‘अगर ऐसा होता तो वह अपना काम फुटपाथ पर भी कर सकता था। वह अपने शिकार के सड़क पार करने के लिए ही क्यों रुकेगा? दूसरे, मैं किसी ऐसे यंत्र को नहीं जानता, जो बिना कोई आवाज किए त्वचा और मांसपेशियों को चीरकर सीधे हृदय पर आघात कर सकता हो। क्या तुमने सोचा कि इसके लिए यंत्र में कितनी शक्ति की जरूरत होगी?’’

मैं चुपचाप सुनता रहा। ब्योमकेश बहुत देर तक अपनी कोहनियों को घुटनों पर रखे, मुँह हाथों में लिये गहन चिंतन में डूबा रहा। अंत में बोला, ‘‘मुझे लग रहा है, इसका बहुत ही साधारण हल है, जो मेरे हाथों के निकट ही है, लेकिन सामने नहीं आ रहा। जितना मैं प्रयास कर रहा हूँ, उतना ही हाथों से फिसलता जा रहा है।’’

उस रात हत्या के विषय पर और चर्चा नहीं हुई। जब तक ब्योमकेश सोया नहीं तब तक वह विचारों में उलझा रहा। यह जानकर कि रहस्य का हल उसके हाथों के नजदीक पहुँच गया है, जो बार-बार उसके हाथों से फिसला जा रहा है, मैंने भी उसके विचारों में व्यवधान पहुँचाना उचित नहीं समझा।

दूसरे दिन सुबह भी उसका चेहरा परेशान दिखाई दिया। वह जल्दी ही उठ गया और एक कप चाय पीकर चला गया। तीन घंटे बाद जब वह आया तो मैंने पूछ ही लिया, ‘‘कहाँ गए थे?’’

जूते के फीते खोलते हुए ब्योमकेश ने बड़ी व्यस्ततता से उत्तर दिया, ‘‘वकील के पास।’’ मैंने देखा कि वह अब भी विचारों में डूबा है, तो और कोई बात नहीं की। दोपहर भर वह कमरा बंद करके काम में लगा रहा। एक बार मैंने फोन पर बात करते भी सुना। लगभग साढ़े चार बजे उसने दरवाजा खोला और झाँककर चिल्लाया, ‘‘अरे भाई! कल की बात क्या भूल गए? शरीर में काँटे का रहस्य ढूँढ़ने का समय हो रहा है।’’

‘‘वाकई! मेरे दिमाग से भी वह बात एकदम निकल गई थी। ब्योमकेश ने हँसते हुए कहा, ‘‘तो आ जाओ भाई, तुम्हारा ड्रेसिंग कर दूँ। हम लोग ऐसे ही तो जा नहीं सकते?’’

मैंने उसके कमरे में घुसते हुए पूछा, ‘‘क्यों हम ऐसे ही नहीं जा सकते?’’

ब्योमकेश ने एक लकड़ी की अलमारी खोलकर टिन का बॉक्स निकाला। जिसमें से उसने क्रेप का टुकड़ा, छोटी कैंची, गोंद वगैरह कुछ चीजें निकालकर बाहर रख दीं और मेरे गाल पर स्पीरिट तथा गोंद लगाते हुए बोला, ‘‘लोगों में यह कोई अनजानी बात नहीं रह गई कि अजित बंद्योपाध्याय ब्योमकेश बक्शी के परम मित्र हैं, इसलिए थोड़ी सी सावधानी जरूरी है।’’

लगभग सवा घंटे तक ब्योमकेश काम करता रहा। जब उसने अपना काम कर लिया तो मैंने शीशे में जाकर देखा तो चौंककर मेरे मुँह से निकल गया, ‘‘ओरे बाबा! अजित ने मूँछ या फ्रेंचकट दाढ़ी कभी नहीं रखी।’’ जो व्यक्ति शीशे में दिख रहा था, उसकी आयु करीब दस वर्ष अधिक होगी। गालों पर कुछ झाँइयाँ थीं और रंग भी कुछ दबा हुआ था। मैंने किंचित् भय से पूछा, ‘‘यदि पुलिस ने धर लिया तो?’’

ब्योमकेश बड़े धैर्य से बोला, ‘‘डरो नहीं, काबिल से काबिल पुलिसवाला भी तुम्हें पहचान नहीं पाएगा कि तुमने भेष बदला है। यदि तुम्हें विश्वास न हो तो नीचे सड़क पर जाओ और अपनी जान-पहचान के किसी भी व्यक्ति से पूछो कि अजित बाबू कहाँ रहते हैं?’’

मेरा आतंक और भी बढ़ गया। मैंने कहा, ‘‘नहीं-नहीं भाई! इसकी जरूरत नहीं है। मैं जैसा हूँ, वैसे ही जाऊँगा।’’

मैं जब चलने के लिए तैयार हो गया तो ब्योमकेश बोला, ‘‘तुम्हें मालूम भी है, तुम्हें क्या करना है? बस लौटते समय सावधान रहना। हो सकता है, तुम्हारा पीछा किया जाए?’’

‘‘क्या इसकी भी आशंका है?’’

‘‘आशंका को निर्मूल नहीं किया जा सकता। मैं घर पर ही हूँ। प्रयास करना कि काम पूरा करके जल्दी से जल्दी लौट सको।’’

घर से बाहर निकलकर पहले तो मैं घबराता रहा, लेकिन जब मैंने देखा कि मेरे बदले भेष से कोई भी आकर्षित नहीं हो रहा है तो मैं सहज हो गया और मेरा आत्मविश्वास भी लौट आया। सड़क के कोने में पान की दुकान से मैं पान खाया करता हूँ। पानावाला पश्चिम का है और मुझे देखकर हमेशा अभिवादन करके पान बना देता है। मैंने उसकी दुकान पर जाकर पान माँगा। उसने पान बनाकर मुझे दिया। मेरे पैसे देने पर उसने एक सरसरी निगाह से देखा और पैसे ले लिये।

पाँच बज गए थे और अधिक समय अब नहीं बचा था। मैं ट्राम पकड़कर एसप्लेनेड में उतरा और निर्धारित स्थल की तरफ बढ़ने लगा। यद्यपि यह कोई रोमांटिक मुलाकात नहीं थी और न ही मेरे मन में रूमानी सपने थे, फिर भी एक प्रकार की उत्सुकता और उत्तेजना का अहसास हो रहा था। लेकिन यह उत्तेजना जल्दी ही विलुप्त हो गई। भीड़ के रेले में खंभे की तरह एक ही स्थल पर जमे रहना कोई मामूली काम तो था नहीं। अब तक न जाने कितने लोगों की कोहनी और घुटने टकरा चुके थे और मैं कुछ भी नहीं कर पा रहा था। लैंपपोस्ट पर टिककर यों ही खड़े रहने पर एक और भी डर पैदा हो गया, क्योंकि सड़क के उस पार क्रॉसिंग पर खड़ा सार्जेंट कई बार मुझे घूर चुका था। अगर वह मेरे पास आए और पूछे कि मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ, तो उसकी नजरों से बचने के लिए मैंने सामने ‘वाइटवे लैडलॉज’ के सजावटी शोरूमों पर अपनी दृष्टि गढ़ा दी, जैसे कि मैं उनमें रखी सुंदर वस्तुओं को निहार रहा हूँ। मैंने सोचा कि पॉकेटमार समझकर पकड़ा जाऊँ, इससे तो बेहतर है कि शहर देखने आया एक मूर्ख और गँवार बनकर ही खड़ा रहूँ।

मैंने अपनी घड़ी देखी। छह बजने में सिर्फ दस मिनट शेष थे। दस मिनट बिताकर मैं इस झंझट से पार हो जाऊँगा। व्याकुलता बढ़ती जा रही थी। मैं खंभे से टिककर जरूर खड़ा था, लेकिन बार-बार कुरते की जेब टटोल रहा था। जेब अब तक खाली थी।

आखिरकार छह बजे और मैंने आहिस्ता से लैंपपोस्ट से अपना कं धा हटाया। एक बार और जेब टटोली पर निराशा ही हाथ लगी। निराशा के साथ-साथ मन में खुशी भी हुई। अंततः मुझे एक उदाहरण मिला था, जिसके आधार पर मैं ब्योमकेश को चिढ़ा सकूँगा कि उसके सभी अनुमान सही नहीं होते। मन-ही-मन प्रसन्न होते हुए मैंने एसप्लानेड डिपो की तरफ कदम बढ़ाए ही थे कि ‘फोटो चाहिए, बाबू’ शब्दों ने मुझे चौंका दिया। मैंने मुड़कर देखा, लुँगी पहने एक मुसलिम नौजवान हाथ में एक लिफाफा लिये मेरी ओर देख रहा है। दुविधा में मैंने हाथ में लिफाफा ले लिया और लेने के बाद जैसे ही उसमें से अश्लील फोटो निकलकर जमीन में बिखरी, मैं घबरा गया। मैं जानता था कि कलकत्ता की सड़कों पर यह धंधा चलता है। मैंने अपने हाथ को उसकी ओर बढ़ाते हुए घृणा से इनकार कर दिया, लेकिन इससे पूर्व ही वह आदमी गायब हो गया। मैंने दाएँ-बाएँ, चारों ओर देखा, पर वह लुँगीवाला युवक कहीं भी दिखाई नहीं दिया।

मैं हैरानी में खड़ा हुआ था। समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूँ? एकाएक एक दबी हुई स्थिर आवाज ने मेरे विचारों को भंग कर दिया। मेरे बगल में एक उम्र वाला अंग्रेज व्यक्ति खड़ा था। मुझे न देखकर वह सामने की ओर देख रहा था और शुद्ध बँगला में एक जानी-पहचानी आवाज में बोल रहा था—‘‘मैं देख रहा हूँ, तुम्हें पत्र मिल गया है। इसलिए अब घर जाओ। सीधे नहीं बल्कि घूमकर जाओ। ट्राम से पहले बऊ बाजार जाओ। वहाँ उतरकर हावड़ा क्रॉसिंग तक बस लो, फिर टैक्सी से घर।’’ इतने में हमारे सामने सर्कुलर रोड जाने वाली ट्राम आकर रुकी। वह व्यक्ति उछलकर उसमें चढ़ गया।

आधे कलकत्ता का चक्कर लगाने के बाद जब मैं थका-हारा घर पहुँचा तो देखा कि ब्योमकेश आरामकुरसी पर पैर फैलाए चरूट पी रहा है। मैंने कुरसी खींचकर बैठते हुए पूछा, ‘‘तो साहेब! आप कब लौटे?’’

ब्योमकेश ने धुआँ उड़ाते हुए कहा, ‘‘करीब बीस मिनट हुए।’’

मैंने कहा, ‘‘तुमने मेरा पीछा क्यों किया?’’

‘‘इसलिए कि मैं कुछ ही मिनटों के लिए चूक गया था। जब तुम लैंपपोस्ट पर कंधा टिकाकर खड़े थे, उस समय मैं ‘लैडला’ के अंदर रेशमी मौजे देख रहा था और काँच की पारदर्शी दीवारों से तुम पर नजर रखे हुए था। उस समय ‘शरीर में काँटे’ का सरगना तुम्हें देखकर हिम्मत बँधा रहा था। उसका भी कारण था, क्योंकि तुम हड़बड़ी में बार-बार पॉकेट देख रहे थे। इसलिए वह रुककर चांस ले रहा था। मुझे स्टोर से बाहर आने में कुछ मिनट ही लगे होंगे, लेकिन तब तक तुम वहाँ से हट गए थे और पत्रवाहक को तुम्हें लिफाफा देने का पर्याप्त समय मिल गया। जब तुम कुछ दूरी पर मुझे मिले तो तुम हाथ में लिफाफा लिये भौंचक खड़े हुए थे। तुम्हें वह लिफाफा कैसे मिला?’’

जब मैंने लिफाफा पाने का वृत्तांत सुनाया तो ब्योमकेश ने पूछा, ‘‘तुमने ठीक से उस आदमी को देखा? क्या तुम उसका चेहरा याद कर सकते हो?’’

मैंने कुछ देर सोचकर कहा, ‘‘नहीं, बस इतना ही याद है कि उसके नाक के पास एक बड़ा मस्सा था।’’

निराश होकर ब्योमकेश सिर हिलाते हुए बोला, ‘‘वह तो जाली था, असल नहीं। ठीक वैसे, जैसे तुम्हारी दाढ़ी और मूँछें। जो भी है, लाओ देखूँ तो सही वह पत्र क्या है? तुम तब तक यह ‘मैकअप’ उतार आओ।’’

जब मैं अपना भेष उतारकर वापस आया तो देखा कि ब्योमकेश का व्यवहार एकदम बदल गया है। वह उत्तेजना में दोनों हाथ पीछे किए तेज कदमों से चहलकदमी कर रहा है। उसके चेहरे पर एक चमक थी। मेरा हृदय उम्मीद में धड़कने लगा। मैंने उत्सुकता में पूछा, ‘‘क्या है उस पत्र में? क्या तुमने कुछ पा लिया है?’’

एक नियंत्रित उल्लास से ब्योमकेश ने मेरी पीठ ठोंकते हुए कहा, ‘‘अजीत, एक बात बताओ? क्या तुमने हावड़ा ब्रिज को तब देखा है, जब वह जहाज के आने पर खुलता है? मेरा मस्तिष्क भी ठीक वैसा था—दो छोर दो तरफ से आकर मिलते हैं, लेकिन एक छोटा सँकरा भाग खाली रह जाता है—छोटे से पुल के लिए, आज वह भाग भर गया है।’’

‘‘यह कैसे हुआ? आखिर उस पत्र में क्या है?’’ ब्योमकेश ने वह कागज मेरे हाथों में पकड़ा दिया।

मैंने तब भी देखा था कि लिफाफे में उन अश्लील चित्रों के अलावा भी एक कागज है, लेकिन मैं उसे पढ़ नहीं पाया था। अब पढ़ रहा हूँ। बड़े अक्षरों में स्पष्ट रूप से लिखा गया था—

‘तुम्हारे शरीर का काँटा कौन है? उसका नाम और पता क्या है? तुम जो चाहते हो, उसे एक कागज पर स्पष्ट अक्षरों में लिख दो। कुछ भी न छिपाओ। अपना नाम लिखने की जरूरत नहीं है। कागज को लिफाफे में सीलबंद करके रविवार, 10 मार्च की आधी रात को खिदिरपुर रेसकोर्स पहुँचो और रेसकोर्स से सटी सड़क पर पश्चिम की ओर चलना शुरू करो। तुम्हें दूसरी ओर से एक साइकिल सवार आता दिखाई देगा। तुम्हारी पहचान के लिए उसने धूप का चश्मा पहना होगा। जैसे ही तुम उसे देखो, अपने हाथ में लिफाफे को दिखाते हुए आगे बढ़ते जाओ। वह साइकिल सवार तुम्हारे हाथ से लिफाफा ले लेगा और फिर समय आने पर तुमसे संपर्क किया जाएगा। कृपया अकेले और पैदल चलकर ही आओ। यदि तुम्हारे साथ किसी और को देखा गया तो हमारा मिलन रद्द कर दिया जाएगा।’

सावधानी से मैंने उसे दो या तीन बार पढ़ा। इसमें संदेह नहीं कि यह सब बहुत ही विचित्र तथा उतना ही रोमांचक भी था। इसलिए मैंने पूछ लिया, ‘‘लेकिन यह तो बताओ कि आखिर यह सब क्या है? मेरा मतलब है, मुझे कुछ दिखाई नहीं...’’

‘‘तुम्हें कुछ भी नहीं दिखाई देता? हाँ, इतना तो है कि जो कुछ तुमने कल भविष्यवाणी की थी, वह सबकुछ सच निकली है। यह भी दिखाई देता है कि उस व्यक्ति को अपनी पहचान छिपाने में उसकी कोई मंशा रही होगी। लेकिन इसके बाद क्या है?’’

‘‘अब सूरदासजी को कैसे दिखाया जाए? जो स्पष्ट दिखाई दे रहा है, वह तुम्हें दिखाई नहीं दे रहा?’’ एकाएक ब्योमकेश रुक गया। सीढ़ियों पर किसी के चढ़ने की आवाज थी। एक क्षण सुनता रहा, फिर बोला, ‘‘आशु बाबू हैं। उन्हें कुछ बताने की जरूरत नहीं है।’’ उसने वह कागज मेरे हाथ से लिया और अपनी पॉकेट में रख लिया। 

जब आशु बाबू अंदर आए, तब उनकी शक्ल देखने लायक थी। मैं सोच भी नहीं सकता था कि एक ही दिन में उनका चेहरा यों बदल जाएगा। उनके कपड़े अस्त-व्यस्त थे, बाल उलझे हुए, गालों में गड्ढे दिखाई दे रहे थे। आँखों के चारों ओर काले स्याह गोले। ऐसा प्रतीत होता था कि किसी गहरे आघात से उन्हें सिर से पाँव तक हिला दिया है। कल जब वे लगभग मौत से बचकर आए थे, तब भी मैंने उनको इतना हैरान-परेशान नहीं देखा था। उन्होंने अपने आपको सामने की कुरसी पर लगभग फेंकते हुए कहा, ‘‘बुरी खबर है, ब्योमकेश बाबू! मेरे वकील विलास मल्लिक लापता हो गए हैं।’’

सहानुभूति दिखाते हुए गंभीर स्वर में ब्योमकेश बोला, ‘‘मुझे मालूम था। आपको शायद यह पता चल गया होगा कि जोड़ासाँको का आपका मित्र भी उसके साथ मारा गया है।’’ आशु बाबू अवाक् होकर उसे देखते रह गए। कुछ क्षण बाद बोले, ‘‘तुम्हें...तुम्हें मालूम है सबकुछ?’’

‘‘सबकुछ!’’ ब्योमकेश शांत स्वर में बोला, ‘‘मैं कल जोड़ासाँको गया था। वहाँ मैंने विलास मल्लिक को भी देखा। काफी दिनों से विलास बाबू और उस घर में रहनेवाली महिला आपके विरुद्ध साजिश में लगे हुए थे और जाहिर है कि आपको इसकी जानकारी नहीं थी। आपकी वसीयत लिखने के बाद विलास बाबू आपके वारिस से मिलने गए थे। आरंभ में तो शायद यह उनकी केवल उत्सुकता रही हो, पर बाद में तो आप समझ ही सकते हैं। वे दोनों इन तमाम वर्षों में सही अवसर की प्रतीक्षा कर रहे थे। आशु बाबू, आपको हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। अब आप बहुत अच्छे हैं। एक दगाबाज औरत और धोखेबाज वकील के चंगुल से बिल्कुल स्वतंत्र हो गए हैं। आपके जीवन को अब कोई खतरा नहीं है। अब आप सड़क के बीचोबीच निर्भय होकर चल सकते हैं।

आशु बाबू ने चिंतित निगाहों से ब्योमकेश को देखा और पूछा, ‘‘मतलब?’’

‘‘मतलब, स्पष्ट है। जिस संशय से आप घिरे रहते थे और बताने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे, वह एक सच्चाई थी। उन दोनों ने आपकी हत्या का षड्यंत्र रचा था, लेकिन अपने हाथों से नहीं। इस शहर में एक आदमी रहता है, कोई नहीं जानता वह कौन है या कैसा लगता है? लेकिन उसके जालिम हथियार ने अब तक बड़ी खामोशी से पाँच सीधे-सादे मासूम लोगों का इस पृथ्वी से सफाया कर दिया है। यदि आपका भाग्य साथ न देता तो आप भी उन्हीं के कदमों पर चलकर अपनी जान खो देते।’’

कई मिनटों तक आशु बाबू अपने हाथों में मुँह छिपाए बैठे रहे। अंत में उन्होंने एक उदास निश्श्वास छोड़ा और बोलना शुरू किया—‘‘मैं इस बुढ़ापे में अपने पापों की सजा भोग रहा हूँ, इसलिए मैं किसी और को दोषी नहीं ठहरा सकता। अड़तीस बरस तक मेरे चरित्र पर कोई दाग नहीं था, लेकिन फिर एकाएक मेरा पैर फिसल गया। अतिशय सुंदरी को देखकर मेरा माथा घूम गया। शादी से मेरा शुरू से ही लगाव नहीं रहा, लेकिन एकाएक मैं उससे विवाह करने के लिए पागल हो गया। अंत में एक दिन मुझे पता चला कि वह एक नाचनेवाली की बेटी है, इसलिए शादी तो नहीं हो सकती थी, पर मैं उसे छोड़ना भी नहीं चाहता था। मैं उसे ले आया और उसके लिए किराए पर मकान ले लिया। उसके बाद आज तक यानी बारह वर्षों से मैं उसकी देखभाल पत्नी के रूप में करता रहा हूँ। आप यह जान ही गए हैं कि मैंने अपनी सारी संपत्ति उसके नाम लिख दी और इस भ्रम में रहा कि वह भी मुझे पति की तरह उतना ही प्यार करती है। मुझे कभी कोई संदेह नहीं हुआ। मैं इस सच्चाई को नहीं समझ पाया कि पाप से जन्मी स्त्री में निष्ठा या वफादारी संभव ही नहीं है। जो भी हो, बुढ़ापे में मिले इस सबक का लाभ मैं अब दूसरे जन्म में ही ले पाऊँगा।’’ एक अंतराल के बाद उन्होंने टूटती आवाज में पूछा, ‘‘ये दोनों, क्या आपको मालूम है कि कहाँ गए हैं?’’

ब्योमकेश ने कहा, ‘‘नहीं और इस जानकारी का कोई लाभ भी नहीं है। आप उन दोनों के पीछे उस रास्ते पर जा भी नहीं सकते, जहाँ उनका भाग्य उन्हें खींचे ले जा रहा है। आशु बाबू! आपका यह सामाजिक उल्लंघन हो सकता है समाज की दृष्टि में निंदनीय माना जा सकता है, किंतु विश्वास कीजिए, मेरी दृष्टि में आप हमेशा सम्मानित रहेंगे। आपका हृदय कीचड़ और दलदल से निकलकर सही स्थान पर आ गया है, आपने अपनी ईमानदारी पुनः प्राप्त कर ली है और यही योग्यता तारीफ के लायक है। फिलहाल आपको गहन आघात पहुँचा है और वह कौन होगा, जो इतना बड़ा धोखा झेलकर मायूस न होगा? लेकिन धीरे-धीरे आप समझ जाएँगे कि इससे बढ़िया भाग्य आपको नहीं मिल पाता।’’ 

भावनाओं में डूबी आवाज में आशु बाबू बोले, ‘‘ब्योमकेश बाबू, आयु में आप मुझसे छोटे हैं, पर जो दिलासा और भरोसा आपने मुझे दिया है, वह मेरी उम्मीदों से कहीं ऊपर है। अपने पाप की सजा जब कोई भोगता है तो कोई भी उससे सहानुभूति नहीं दरशाता। इसीलिए पछतावा इतना कठिन माना जाता है। आपकी सहानुभूति और दया ने मेरे कंधों का आधा बोझ हल्का कर दिया है। इससे अधिक मैं क्या कहूँ? मैं जीवन भर आपके इस कर्ज से दबा रहूँगा।’’

आशु बाबू के चले जाने के बाद उनकी दुःख भरी कहानी ने पूरी शाम मुझे बोझिल बनाए रखा। सोने से पहले मैंने ब्योमकेश से केवल एक प्रश्न पूछा, ‘‘तुम्हें कब पता चला कि वह स्त्री और विकास बाबू आशु बाबू की हत्या के प्रयास के पीछे हैं?’’ ब्योमकेश ने ऊपर छत में लगे बीमों से अपनी दृष्टि हटाते हुए कहा, ‘‘कल शाम को।’’

‘‘तब तुमने उसे भागने से पहले पकड़ा क्यों नहीं?’’

‘‘वह सब व्यर्थ ही जाता, क्योंकि उनका अपराध किसी भी अदालत में साबित नहीं किया जा सकता था।’’

‘‘लेकिन उन्हें पकड़ने से ग्रामाफोन-पिन रहस्य के हत्यारे का तो पता लग सकता था?’’

ब्योमकेश ने अपनी मुसकान दबाते हुए कहा, ‘‘यदि यह संभव होता तो मैं निजी तौर पर उन्हें भाग जाने में सहायता नहीं करता।’’

‘‘तो क्या तुमने उन्हें भागने में मदद की है?’’

‘‘हाँ, चूँकि आशु बाबू उनके शिकार होने से बच गए थे। फिर वे दोनों तो भागने की योजना बना ही चुके थे। मैं आज सुबह विलास बाबू के घर गया था और बातों ही बातों में मैंने उन्हें बता दिया कि मैं पहले ही बहुत कुछ जान चुका हूँ, यदि वे तुरंत नहीं भाग जाते हैं तो उन्हें जेल जाना पड़ सकता है। विलास बाबू बुद्धिमान व्यक्ति हैं। उन्होंने देर नहीं की। शाम को ही अपनी साथी के साथ ट्रेन पकड़ ली।’’

‘‘लेकिन उनके भागने से तुम्हें फायदा क्या हुआ?’’

ब्योमकेश जोर की अँगड़ाई लेते हुए बोला, ‘‘अधिक लाभ तो नहीं हुआ, अलबत्ता उनकी निकृष्ट योजना के चक्र में मैंने एक छोटा तार जरूर घुसा दिया है। विलास बाबू खाली हाथ तो जाने वाले हैं नहीं, वे अपने साथ अपने सभी मुवक्किलों का पैसा भी ले गए हैं। अब तक, मैं समझता हूँ, पुलिस ने उन्हें बर्दवान में पकड़ लिया होगा, क्योंकि पुलिस को इसकी पूर्व सूचना थी। जो भी हो, वह कम-से-कम दो साल की जेल से तो नहीं बच सकते। उनकी सही सजा तो उम्रकैद होनी चाहिए, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में यह संभव नहीं है तो कम-से-कम दो वर्ष की कैद कुछ नहीं से तो अच्छा ही है।’’

दूसरे दिन प्रातः हमारे यहाँ एक अजनबी का आगमन हुआ। मैंने चाय पीकर अखबार खोला ही था कि दरवाजे पर दस्तक सुनाई दी।

ब्योमकेश ने सजग होकर देखा और जोर से बोला, ‘‘कौन है? कृपया अंदर आ जाएँ।’’ शालीन वस्त्रों में एक तीस-बत्तीस साल के युवक ने प्रवेश किया। उसका चेहरा दाढ़ी-मूँछ से साफ था और जिस अंदाज से वह अंदर आया था, उससे लगता था कि वह एथलीट है। मुसकराते हुए उसने अभिवादन किया और बोला, ‘‘आशा है, सुबह-सुबह आने से आपको कोई असुविधा नहीं होगी। मेरा नाम प्रफुल्ल रॉय है और मैं बीमा एजेंट हूँ’’ और कुरसी पर बैठकर जोर से हँस दिया। कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो शांत रहने पर प्रियदर्शी लगते हैं, किंतु हँसते ही उनका चेहरा विकृत हो जाता है। प्रफुल्ल रॉय उन्हीं लोगों में से एक था। वह शायद पान का शौकीन था, क्योंकि हँसते ही उसके दाँतों में कत्थे की लाली दिखाई दे गई। मैं यही सोच रहा था कि एक अच्छा-खासा चेहरा कैसे इतना विकृत किया जा सकता है?

‘‘मैं बीमा एजेंट जरूर हूँ, पर मेरे आने का कारण दूसरा है। आजकल यद्यपि हम लोगों के जाने से हमारे अपने ही मित्र-संबंधी दरवाजा बंद कर लेते हैं। मैं उनको दोष भी नहीं देता; किंतु विश्वास कीजिए, मैं इस समय बीमा एजेंट बनकर नहीं आया हूँ। आप, मैं समझता हूँ, प्रसिद्ध डिटेक्टिव ब्योमकेश बाबू हैं और मैं आपके पास एक निजी मामले में राय लेने के लिए आया हूँ श्रीमान! यदि आपको कोई आपत्ति न हो तो...।’’

ब्योमकेश के होंठों पर एक उलझन की रेखा उभर आई, वह बोला, ‘‘लेकिन, परामर्श से पूर्व एडवांस वगैरह भी होता है, जनाब!’’

प्रफुल्ल रॉय ने तुरंत अपने बटुए से दस रुपए का नोट निकालकर मेज पर रख दिया और बोला, ‘‘मैं जो आपसे कहना चाहता हूँ, वह नितांत निजी तो नहीं है, लेकिन...’’ वह कहते-कहते रुककर मुझे प्रश्नवाचक दृष्टि से देखने लगा। मैं जैसे ही उठने को हुआ तो ब्योमकेश ने सधे शब्दों में कहा, ‘‘ये मेरे सहयोगी और मित्र हैं। आप जो भी कहना चाहते हैं, इनके सामने कह सकते हैं?’’

प्रफुल्ल रॉय बोला, ‘‘क्यों नहीं? जरूर! चूँकि ये सहयोगी हैं तो मुझे क्या आपत्ति हो सकती है। आप...? ओह! क्षमा कीजिए, याद आया अजित बाबू हैं! मैं नहीं जानता था कि आप ब्योमकेश बाबू के मित्र भी हैं। आप कितने भाग्यशाली हैं, इतने प्रसिद्ध डिटेक्टिव के साथ काम करते हैं, इतने विचित्र मामलों और अपराधों को सुलझाने में सहायता करते हैं। आपके जीवन में तो शायद ही कभी नीरस क्षण आता हो! मैं कभी-कभी सोचता हूँ कि बीमा एजेंट का निरर्थक जीवन त्यागकर आप जैसा ही कोई काम शुरू करूँ।’’ उसने जेब से पान की डिबिया निकालकर एक पान मुँह में दबा लिया।

ब्योमकेश इस सारे वृत्तांत से व्याकुल हो रहा था। उसने परेशान होते हुए कहा, ‘‘मैं समझता हूँ कि आप अब अपना केस बताएँ, जिस पर आप मेरा परामर्श चाहते हैं।’’

प्रफुल्ल रॉय ने तुरंत उत्तर देते हुए कहा, ‘‘सर! मैं उसी पर आ रहा हूँ। जैसा कि मैंने बताया कि मैं बीमा एजेंट हूँ और बंबई की कंपनी ‘ज्वैल इंश्योरेंस’ का काम करता हूँ। मैंने कंपनी को दस से बारह लाख रुपए का फायदा पहुँचाया। इसके पुरस्कारस्वरूप कंपनी ने मुझे कलकत्ता में अपने कार्यालय के अध्यक्ष के रूप में भेजा है। पिछले आठ महीनों से इस शहर में स्थायी रूप से रह रहा हूँ।

‘‘कुछ महीने तो मेरे कामकाज में अच्छे बीते। फिर एकाएक समस्या पैदा हो गई। मैं किसी का नाम नहीं लेना चाहता, लेकिन प्रतियोगी कंपनी का एक कर्मचारी इसके लिए जिम्मेदार है। मैं कंपनी के छोटे-मोटे कमीशन के मामले नहीं देखता। मैं केवल बड़े कमीशन के एकाउंट देखता हूँ। अब हुआ यों कि इस व्यक्ति ने मेरे बड़े ग्राहकों को चुराना शुरू कर दिया। जहाँ भी मैं जाता, उसके बाद यह व्यक्ति जाकर मेरी कंपनी के बारे में झूठी शिकायतें करके मेरे ग्राहकों को मेरे हाथों से छीन लेता। धीरे-धीरे बड़े कमीशनों की बीमा पॉलिसी मेरे हाथों से जाने लगीं। 

‘‘इस तरह चार-पाँच महीने और बीत गए। मुझे ऊपर से काम बढ़ाने के लिए दबाव आने लगा, लेकिन इस व्यक्ति से छुटकारे का कोई उपाय नहीं सूझा। यदि मैं कानून का सहारा लेकर उस पर मुकदमा करता तो मेरी कंपनी की छवि खराब होती है। पर मुझे किसी भी तरह खून पीने वाली इस जोंक को उखाड़ फेंकना है। कुछ महीने इसी उधेड़-बुन में बीत गए, फिर...’’

चुपके से प्रफुल्ल रॉय ने अपने बटुए से दो चिट निकालीं और छोटी चिट को ब्योमकेश की ओर बढ़ाते हुए बोला, ‘‘लगभग दो सप्ताह पहले इस विज्ञापन ने मेरा ध्यान आकृष्ट किया। आपने शायद न देखा हो और आप देखते भी क्यों? लेकिन सर! है तो यह एक छोटा सा वर्गीकृत विज्ञापन, पर इसे पढ़ते ही मैं खुशी से उछल पड़ा। क्या मेरा केस भी शरीर में काँटे जैसा ही है? मैंने सोचा, देखूँ मेरे शरीर का काँटा भी यदि निकाल सके? मैं जिस परेशानी में फँसा हूँ, उसमें तो कोई मुझसे जादुई ताबीज पहनने को भी कहता तो मैं पहन लेता।’’

मैंने गरदन तिरछी करके देखा, वह उसी शरीर में काँटे के विज्ञापन की क्लिपिंग थी। प्रफुल्ल रॉय बोलता गया, क्या आपने पढ़ा है? है न विचित्र? जो भी है, निर्धारित दिन यानी पिछले सप्ताह शनिवार मैं गया और क्रिसमस ट्री की तरह उस लैंपपोस्ट से टिककर खड़ा रहा। खड़े रहने में क्या दुर्गति हुई! खड़े-खड़े मेरे पाँव सो गए। पर सब बेकार गया। कोई नहीं आया। अंत में निराश होकर जब मैं चलने लगा तो मुझे पता चला कि मेरी पॉकेट में एक पत्र है।’’

उसने दूसरी चिट ब्योमकेश की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘पढ़कर देख लीजिए, यह है वह पत्र।’’

ब्योमकेश ने पत्र खोलकर पढ़ना शुरू किया। मैं उठकर ब्योमकेश के पीछे कंधों के पास खड़े होकर पढ़ने लगा। वह हू-ब-हू ठीक वैसा ही पत्र था, जो मुझे भी मिला था। अपवाद केवल एक ही था। इसमें मिलने की तिथि रविवार के स्थान पर सोमवार ग्यारह मार्च थी।

प्रफुल्ल रॉय ने हमें पत्र पढ़ने का समय दिया। उसके बाद अपनी बात जारी रखते हुए उसने कहा, ‘‘पहले तो मुझे पता नहीं कि यह पत्र मेरी पॉकेट में कैसे पहुँचा? फिर इसको पढ़ने के बाद मैं एक अनजाने भय से ग्रस्त हो गया हूँ सर! मुझे रहस्यों में कोई दिलचस्पी नहीं है और इस पत्र में शुरू से अंत तक केवल रहस्य ही है। लगता है, जैसे इसमें कोई अशुभ उद्देश्य छुपा हुआ है। अगर ऐसा नहीं है तो इतनी गोपनीयता क्यों? मैं नहीं जानता कि यह व्यक्ति कौन है, क्या है? मैंने उसे कभी ढूँढ़ने की कोशिश भी नहीं की और यह मुझसे चाहता है कि आधी रात को एक सुनसान सड़क पर चलूँ। क्या यह भय का कारण नहीं है? आप ही बताइए, मैं गलत कह रहा हूँ?’’ उसने सीधे मुझे देखते हुए कहा।

इससे पहले कि मैं कुछ कहता, ब्योमकेश बोला, ‘‘कृपा कर अब यह बताएँ कि किस बात के लिए मेरा परामर्श चाहते हैं?’’

कुछ उलझन में प्रफुल्ल रॉय बोला, ‘‘यही तो पूछ रहा हूँ। मैं इस पत्र के लेखक को नहीं जानता, लेकिन उसका मंतव्य भरोसेमंद नहीं लगता। इसे देखते हुए क्या मेरे लिए उचित होगा कि इस पत्र के उत्तर स्वरूप में वहाँ जाऊँ? मैं पिछले दो सप्ताह से सोचता रहा हूँ, लेकिन कोई हल नहीं सूझा है। अब यदि मुझे करना ही है तो मेरे पास केवल एक दिन का समय रह गया है। इसलिए कोई रास्ता नहीं सूझने पर मैं आपके पास सहायता के लिए आया हूँ।’’

ब्योमकेश एक क्षण सोचता रहा, फिर बोला, ‘‘मुझे खेद है कि मैं आज आपकी सहायता नहीं कर पाऊँगा। क्यों न आप दोनों चिटों को यहाँ छोड़ जाएँ? पहली फुरसत में ही आपको हल बता दूँगा।’’

प्रफुल्ल रॉय ने कहा, ‘‘लेकिन कल मैं समय नहीं निकाल पाऊँगा। मुझे दफ्तर के कई काम करने हैं। क्या आज रात तक नहीं हो सकता? यदि मैं देर रात करीब आठ-नौ बजे तक आऊँ? क्या यह संभव हो पाएगा?’’

ब्योमकेश ने अपना सिर हिलाते हुए कहा, ‘‘नहीं, आज तो मैं व्यस्त हूँ। मुझे कुछ जरूरी काम करने हैं।’’ यह सोचकर कि आसामी हाथ से ही न निकल जाए, ब्योमकेश ने एक उड़ती दृष्टि प्रफुल्ल रॉय पर डाली और विषय बदलते हुए बोला, ‘‘लेकिन आपको चिंता की आवश्यकता नहीं है। यदि आप कल दोपहर बाद चार बजे के लगभग भी आ सकते हैं, तो काम हो जाएगा।’’

‘‘ठीक है, तो यह तय रहा। मैं कल आता हूँ।’’ उसने पान की डिबिया निकालकर दो पान मुँह में दबा लिये और बोला, ‘‘लीजिए, आप पान खाते हैं या नहीं? कुछ ऐसी आदतें हैं, जो आदमी छोड़ ही नहीं पाता।

‘‘खाना छोड़ सकता हूँ, लेकिन पान नहीं। तो फिर ठीक, मैं कल मिलता हूँ, नमस्कार!’’

हमने उसे अभिवादन का उत्तर दिया। वह दरवाजे तक जाकर रुक गया, फिर मुड़कर बोला, ‘‘यदि पुलिस को इसकी खबर कर दी जाए? मैं समझता हूँ कि पुलिस छानबीन करके उस आदमी के बारे में जरूर पता कर सकेगी!’’

ब्योमकेश एकाएक क्रोध में आ गया। उसने आवेश में उत्तर दिया, ‘‘यदि आप पुलिस के पास जाना चाहते हैं तो मेरे से सहायता की अपेक्षा न करें। मैंने पुलिस के साथ कभी काम नहीं किया है और न ही करना चाहता हूँ। लीजिए, अपने पैसे ले जाइए।’’ उसने दस रुपए के नोट की ओर संकेत किया, जो मेज पर रखा था।

‘‘अरे नहीं, नहीं सर! मैं तो बस आपकी राय जानना चाहता था। लेकिन आप इतना विरोध कर रहे हैं, तो ठीक है। मैं जाता हूँ।’’ और प्रफुल्ल रॉय तेजी से बाहर निकल गया।

उसके जाने के बाद ब्योमकेश ने उस नोट को उठाया और अपने कमरे में जाकर उसने दरवाजा बंद कर लिया। मैं जानता था कि कभी-कभी वह क्रोध में उद्वेलित हो जाता था, किंतु थोड़ी देर का एकांत उसे शांत कर देता था। इसलिए अपने मन में उठने वाले प्रश्नों के बावजूद मैंने अनपढ़े अखबार को उठाया और उसके पन्नों में डूब गया।

कुछ ही देर बाद मैंने सुना कि ब्योमकेश अपने कमरे में बोल रहा है, शायद टेलीफोन कर रहा था। मुझे वह अंग्रेजी वाक्य भी सुनाई दिए। टेलीफोन का वार्त्तालाप लगभग एक घंटे तक चला होगा। उसके बाद वह कमरे से निकला। वह अब पहले की तरह सामान्य और प्रफुल्ल दिखाई दे रहा था।

मैंने पूछा, ‘‘किससे बात कर रहे थे?’’ मेरे प्रश्न का उत्तर दिए बिना वह बोला, ‘‘तुम्हें मालूम है कि कल जब तुम एसप्नालेड से लौट रहे थे, तब तुम्हारा पीछा किया जा रहा था।’’

चौंककर मैंने कहा, ‘‘नहीं तो! क्या सच में?’’

ब्योमकेश ने कहा, ‘‘जी हाँ! यह शक की बात नहीं है। लेकिन मुझे उस व्यक्ति के साहस पर अचंभा होता है।’’ वह मन-ही-मन हँसने लगा।

मैं अंदाजा ही न लगाया पाया कि मेरा पीछा करने में साहस की बात क्या हो सकती है? किंतु कभी-कभी ब्योमकेश के वक्तव्य इतने चकराने वाले होते हैं कि उनका अर्थ ढूँढ़ने की तमाम कोशिश व्यर्थ हो जाती है। उससे पूछने का भी प्रश्न नहीं उठता था, क्योंकि जब तक सही समय नहीं आएगा, वह उसका उत्तर देगा ही नहीं। इसलिए समय को व्यर्थ न करके मैं नहाने चला गया।

ब्योमकेश ने पूरी दोपहर और शाम इधर-उधर बैठकर काट दी। कोई काम नहीं किया। मैंने प्रफुल्ल रॉय के बारे में कुछ प्रश्न किए भी, लेकिन वह आँखें बंद करके बैठा रहा, जैसे उसने सुना ही न हो। अंत में उसने आँखें खोलकर ऊपर देखा और उठ बैठा, ‘‘प्रफुल्ल राय? ओह, वह व्यक्ति जो सुबह आया था? नहीं, अभी मैं उसके बारे में कुछ भी नहीं सोच पाया हूँ।’’

रात को खाने के बाद हम लोग सिगरेट पी रहे थे। जैसे ही साढ़े दस बजे ब्योमकेश यह कहते ही उछल पड़ा, ‘‘जागो, उठो, ओ सोने वालो! तैयार होने का समय आ गया है, अन्यथा मिलन की घड़ी बीत जाएगी।’’

मैंने आश्चर्य में पूछा, ‘‘तुम्हारा मतलब क्या है?’’

ब्योमकेश बोला, ‘‘चलो, हम लोगों को शरीर में काँटे के स्थल पर मिलन का सम्मान करना है, याद है।’’

मैंने कुछ संशय में खड़े होकर कहा, ‘‘मुझे माफ करो। इतनी रात गए मैं वहाँ अकेले नहीं जाना चाहता। तुम चाहो तो खुद चले जाओ।’’

‘‘मैं तो जाऊँगा ही, लेकिन तुम्हें भी चलना चाहिए।’’

‘‘लेकिन क्या जाना जरूरी है? यह जरूरत से ज्यादा दिलचस्पी शरीर में काँटे के मामले में क्यों? इसकी जगह यदि तुमने ग्रामाफोन-पिन रहस्य पर थोड़ा भी ध्यान दिया होता तो अब तक कुछ गुत्थियाँ सुलझ गई होतीं।’’

‘‘शायद तुम सही कह रहे हो, लेकिन इसी बीच एक छोटी सी उत्सुकता पूरी करने में क्या नुकसान है? ग्रामाफोन-पिन तो कहीं भागा नहीं जा रहा। दूसरे प्रफुल्ल रॉय कल आएगा, उसके लिए हमें कुछ तो जानकारी चाहिए।’’

‘‘लेकिन हम दोनों के जाने से बात नहीं बनती। पत्र में जोर देकर कहा गया है कि केवल एक ही व्यक्ति को आना होगा।’’

‘‘मैंने उसका प्रबंध कर लिया है। अब कृपा करके दूसरे कमरे में चलो। समय बीता जा रहा है।’’

कमरे में जाकर ब्योमकेश ने फुरती से मेरा मैकअप कर दिया। मैंने सामने दीवार पर लगे शीशे में देखा। मेरी पुरानी मूँछ और फ्रेंचकट दाढ़ी लौट आई थी। उसके बाद वह अपने मैकअप में लग गया। उसने अपने चेहरे को नहीं बदला, केवल अलमारी से काला सूट और काले रबड़ सोलवाले जूते निकाले और पहन लिये। फिर उसने मुझे शीशे से पाँच-छह फीट दूर खड़ा कर दिया और ठीक मेरे पीछे खड़े होकर बोला, ‘‘क्या तुम शीशे में मुझे देख सकते हो?’’

‘‘नहीं!’’

‘‘ठीक है, अब आगे चलो, क्या तुम मुझे देख सकते हो?’’

‘‘नहीं।’’

‘‘तो ठीक है, काम बन गया। अब केवल एक आइटम रह गया?’’

‘‘वो क्या है?’’

मैं जब ब्योमकेश के कमरे में घुसा तो दो अंडाकार चीनी मिट्टी की प्लेटें मेज पर रखी दिखाई दीं, ठीक वैसी, जिनमें रेस्त्राँ में मटनचाप परोसा जाता है। उसने एक प्लेट को मेरे सीने पर रखकर एक चौड़े कपड़े से कसकर बाँध दिया और बोला, ‘‘ध्यान रखना, यह फिसलनी नहीं चाहिए। अब इसके बाद तुम कोट पहनकर बटन लगा लोगे तो कुछ भी दिखाई नहीं देगा। मैंने अचकचाते हुए पूछा, ‘‘यह सब क्या है?’’

ब्योमकेश हँसते हुए बोला, ‘‘अरे भाई, हमें भी शस्त्रों से सुसज्जित होना है। है न? मैं भी एक प्लेट लगा रहा हूँ।’’

ब्योमकेश ने दूसरी प्लेट अपनी बास्केट के अंदर लगाई और सारे बटन बंद कर लिये। उसे कपड़े से बाँधने की जरूरत नहीं पड़ी।

और इस प्रकार भेस बदलकर हम लोग ग्यारह बजे घर से निकल गए। ब्योमकेश चलने से पहले फुरती से अलमारी से कुछ चीजें निकालकर अपनी पॉकेट में रखता जा रहा था। उसने पूछा, ‘‘क्या तुमने वह पत्र रख लिया? अरे छोड़ो, एक सादा कागज मोड़कर लिफाफे में रख लो।’’

हमें सियादह क्रॉसिंग पर टैक्सी मिल गई। सड़कें खाली हो गई थीं, अधिकतर दुकानें भी बंद हो चुकी थीं। हमारी टैक्सी चौरंगी की ओर भाग रही थी।

हम लोग उस स्थल पर उतर गए, जहाँ कालीघाट और खिदिरपुर जाने वाली ट्राम लाइनें अलग होती हैं। टैक्सी ड्राइवर भाड़ा लेकर हॉर्न बजाते हुए चला गया। मैंने चारों ओर देखा, सड़क पर एक आदमी भी नजर नहीं आया। चारों ओर से पड़ने वाली लैंपपोस्ट की रोशनी सुनसान नगर के दृश्य को और भी भुतहा बना रही थी। मेरी घड़ी में आधी रात होने में केवल दस मिनट शेष थे।

हम लोगों ने अपने रोल को टैक्सी में ही समझ लिया था। इसलिए अब बातचीत की जरूरत नहीं थी। मैंने सड़क पर चलना शुरू किया। ब्योमकेश एक शांत छाया के रूप में कुछ दूरी पर मेरे पीछे चल रहा था। उसके काले कपड़े और बेआवाज रबड़ के जूतों ने उसकी मौजूदगी को बिल्कुल छिपा लिया था। वह अपने कदम मेरे कदमों से मिलाते हुए मेरे से छह फीट पीछे चल रहा था, लेकिन मुझे स्वयं लग रहा था कि मैं अकेला ही सड़क पर चल रहा हूँ। स्ट्रीट लाइटों की दूरियों के कारण रोशनी मध्यम थी। यदि सड़क के इर्द-गिर्द बिल्डिंग होती तो रोशनी की प्रतिच्छाया बढ़कर उस स्थल को और अधिक प्रकाशमय बना सकती थी। इसके विपरीत चारों ओर के वीराने ने प्रकाश की आधी शक्ति को अपने में ही सोख लिया था। ऐसी स्थिति में कोई भी सामने से आनेवाला व्यक्ति यह कह नहीं सकता कि मैं अकेला नहीं हूँ; कि मेरे पीछे एक छाया चुपचाप मेरे कदमों से साथ चल रही है।

सड़क के एक ओर की ट्राम लाइनें कुछ समय के लिए बंद पड़ी थीं। दूसरी ओर रेसकोर्स पर लगा सफेद रेलिंग सीधे चला जा रहा था। मैंने सड़क के बीच में चलना शुरू कर दिया। कुछ दूरी पर कहीं घड़ी में बारह बजने के घंटे बजने लगे। जैसे ही घंटों की आवाज बंद हुई, ब्योमकेश ने पीछे से दबे स्वर में कहा, ‘‘अब लिफाफे को हाथ में पकड़ लो।’’

मैं भूल ही चुका था कि ब्योमकेश मेरे पीछे ही चल रहा है। मैंने फुरती से जेब से लिफाफा निकालकर हाथ में पकड़ लिया। सड़क पर चलते हुए मुझे सात मिनट हो गए थे और मैंने खिदिरपुर पुल की आधी दूरी पूरी कर ली थी कि मुझे दूर रोशनी की एक हल्की झलक दिखाई दी। उसे देखकर मैं सजग हो गया। मेरे कानों में फिर आवाज सुनाई दी, ‘‘वह आ रहा है, तैयार रहो।’’

रोशनी की वह चमक तेज होती गई। कुछ ही क्षणों में स्पष्ट हो गया कि कोई वस्तु तेज रफ्तार से हमारी ओर बढ़ती चली आ रही है। उसका रंग हमारी तारकोल की सड़क से भी अधिक काला था। कुछ क्षण और बीतने पर साफ दिखने लगा कि वह एक साइकिल सवार है। मैंने चुपचाप खड़े होकर लिफाफे वाले हाथ को देने की मुद्रा में फैला दिया। मेरे सामने आते हुए साइकिल की रफ्तार कुछ धीमी पड़ गई।

मैं साँस रोके खड़ा था। वह अब केवल पच्चीस फीट की दूरी पर रह गया था। मैंने स्पष्ट देखा, साइकिल सवार काला सूट पहने है और काला चश्मा पहने मुझ पर दृष्टि जमाए हुए है।

साइकिल की रफ्तार थोड़ी और कम हुई। वह सीधे मेरी ओर बढ़ रही थी। हमारे बीच की दूरी करीब दस फुट रह गई थी कि एकाएक जोर से साइकिल की घंटी बज उठी। और उसी समय मेरे सीने में एक जोर का झटका लगा और मैं लड़खड़ाकर गिर गया। मुझे लगा कि मेरे सीने पर लगी प्लेट टूटकर कई टुकड़ों में हो गई है।

और इसके बाद कुछ क्षणों में कई घटनाएँ घट गईं। जैसे ही मैं लड़खड़ाकर जमीन पर गिरा, वैसे ही ब्योमकेश उछल के सामने आ गया। साइकिल सवार इस बात के लिए कतई तैयार नहीं था कि मेरे पीछे भी कोई होगा! फिर भी उसने ब्योमकेश को चकमा देने की कोशिश की, लेकिन बच नहीं पाया। ब्योमकेश ने उसे झपटकर साइकिल से खींचा और एक खूँखार बाघ की तरह उस पर टूट पड़ा। जब मैं उठकर मदद के लिए आया तो देखा कि ब्योमकेश उसके हाथों को पकड़े उससे जूझ रहा है। जब उसने मुझे देखा तो बोला, ‘‘अजित, मेरी पॉकेट से रेशम की रस्सी निकालकर इसके दोनों हाथों को बाँधो, कसकर बाँधो।’’

मैंने उसकी पॉकेट से रेशम की रस्सी निकाली और जमीन पर लेटे आदमी के दोनों हाथों को कसकर बाँध दिया। ब्योमकेश बोला, ‘‘ठीक है, अजित, तुमने इन महानुभाव को नहीं पहचाना यह हैं हमारे मित्र प्रफुल्ल रॉय, जो सुबह-सुबह हमारे यहाँ आए थे। और यदि पूरा ही जानना चाहते हो तो सुनो ग्रामाफोन-पिन रहस्य के प्रणेता भी यहीं हैं,’’ उसने उस व्यक्ति की आँखों से काला चश्मा हटा दिया।

इन शब्दों को सुनकर मेरा क्या हाल हुआ, मैं वर्णन नहीं कर सकता। लेकिन प्रफुल्ल रॉय एक विषैली हँसी के बाद बोला, ‘‘ब्योमकेश बाबू, आप मेरी छाती पर से अब तो हट सकते हैं। मैं अब भाग नहीं सकूँगा।’’

ब्योमकेश ने कहा, ‘‘अजित, इसकी दोनों पॉकेट की ठीक से तलाशी लो। उनमें कहीं कोई हथियार न हो!’’

उसकी एक पॉकेट में आपेरा की ऐनक थी और दूसरी में पान की डिबिया थी। मैंने डिबिया को खोलकर देखा। उसमें चार पान रखे हुए थे। ब्योमकेश ने जैसे ही उस पर अपनी पकड़ छोड़ी, वह उठा और बैठे ही बैठे ब्योमकेश को एकटक देखता रहा। फिर धीमी आवाज में बोला, ‘‘ब्योमकेश बाबू! तुमने बाजी मार ली, क्योंकि मैं तुम्हारी तीव्र बुद्धि का सही अनुमान नहीं लगा पाया और यह तुम भी भाँप गए।’ दुश्मन की शक्ति को कभी कम नहीं आँकना चाहिए। यह सबक सीखने में मुझे कुछ विलंब हो गया। इसका लाभ उठाने का अब समय नहीं रहा।’’ उसके चेहरे पर एक हारी हुई मुसकान तैर गई।

ब्योमकेश ने अपनी जेब से पुलिस की सीटी निकाली और जोर-जोर से बजाई फिर बोला, ‘‘अजित, साइकिल को उठाकर एक ओर कर दो और जरा सावधानी से। साइकिल की घंटी को हाथ न लगाना। वह खतरनाक है।’’

प्रफुल्ल रॉय हँसा, ‘‘देख रहा हूँ कि तुम सभी कुछ जानते हो! गजब की बुद्धि है? मुझे तुम्हारी बद्धि से ही डर था और इसीलिए मैंने आज का यह जाल बिछाया था। मैंने सोचा था कि तुम अकेले आओगे और हमारा मिलन निजी होगा, लेकिन तुमने सभी जगह मुझे मात दे दी। मैं अब तक अपने आप को अभिनय का सरताज समझता था, लेकिन तुम तो बहुत ऊँचे कलाकार निकले। आज सुबह ही तुमने मुझे बेनकाब करके मेरा दिमाग खाली कर दिया और मैं उलटे तुम्हारे जाल में फँस गया। मेरा गला सूख रहा है। क्या मुझे पानी मिलेगा?’’

ब्योमकेश ने कहा, ‘‘पानी यहाँ कहीं नहीं मिलेगा। पुलिस स्टेशन में ही पी सकोगे।’’

प्रफुल्ल रॉय ने थकी हुई मुसकान के साथ कहा, ‘‘सच में, कितना बेवकूफ हूँ मैं? यहाँ पानी कहाँ मिलेगा? वह कुछ देर रुका और पान की डिबिया को लालच भरी निगाहों से देखकर बोला, ‘‘क्या मैं एक पान खा सकता हूँ? मैं जानता हूँ कि पकड़े गए अपराधी को कौन होगा, जो पान खिलाएगा? लेकिन इससे कम-से-कम मेरी प्यास बुझ जाएगी।’’

ब्योमकेश ने एक बार मुझे देखा, फिर डिबिया से दो पान निकालकर उसके मुँह में रख दिए। पान चबाते हुए प्रफुल्ल रॉय बोला, ‘‘धन्यवाद! तुम चाहो तो शेष दो पान खा सकते हो।’’

ब्योमकेश ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया, क्योंकि वह व्यग्रता से चारों ओर देखकर पुलिस का इंतजार कर रहा था। थोड़ी दूर से मोटरसाइकिल की आवाज सुनाई दी। प्रफुल्ल रॉय बोला, पुलिस भी अब आने को है। इसलिए अब तो तुम मुझे जाने ही न दोगे?

ब्योमकेश ने कहा, ‘‘मैं तुम्हें कैसे जाने दे सकता हूँ?’’

प्रफुल्ल राय एक बार पागलों की तरह हँसकर फिर बोला, ‘‘तो तुमने मुझे पुलिस को सौंपने का निर्णय कर ही लिया है?’’

‘‘और नहीं तो क्या?’’

‘‘ब्योमकेश बाबू, तुम शायद भूल गए कि एक तीव्र बुद्धि का व्यक्ति भी भूल कर सकता है। तुम मुझे पुलिस को सौंप नहीं पाओगे!’’ और लड़खड़ाकर वह जमीन पर गिर पड़ा। इतने में एक मोटरसाइकिल भड़भड़ाते हुए आकर रुक गई। पुलिस की वरदी में एक अफसर कूदकर आ गया। उसने पूछा, ‘‘क्या हुआ? मर गया?’’

प्रफुल्ल राय ने बड़ी मुश्किल से आँखें खोली और बोला, ‘‘वाह क्या बात है! आप शायद पुलिस चीफ हैं। लेकिन सर, आने में देर कर दी! मुझे पकड़ नहीं पाएँगे। ब्योमकेश बाबू! अच्छा होता कि आप भी पान खा लेते। हमारी यात्रा साथ-साथ ही होती। अपने पीछे आप जैसा बुद्धिमान व्यक्ति को छोड़ जाऊँ, यह मेरे बरदाश्त के बाहर है।’’ हँसने की नाकाम कोशिश के बाद प्रफुल्ल रॉय ने आँखें बंद कर लीं और चेहरा निष्प्राण हो गया।

इसी बीच एक ट्रक लोड पुलिस दल आ पहुँचा और स्वयं कमिश्नर हथकड़ी लेकर आगे बढ़ा। तब तक ब्योमकेश मृत व्यक्ति की जाँच करके उठ खड़ा हुआ और बोला, ‘‘हथकड़ी की जरूरत नहीं, अपराधी फरार हो गया है।’’

दूसरे दिन ब्योमकेश और मैं अपने ड्राइंगरूम में बैठे थे। खिड़की से आती ताजा हवा और प्रकाश से कमरे के वातावरण में एक ताजगी थी। ब्योमकेश के हाथों में साइकिल की घंटी थी, जिसे वह मनोयोग से देख रहा था। मेज पर एक खुला लिफाफा पड़ा हुआ था। ब्योमकेश घंटी के कवर को खोलकर उसके यंत्रों का मुआयना कर रहा था। कुछ देर बाद वह बोला, ‘‘कमाल का दिमाग था। कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि इतना लाजबाव यंत्र कोई आविष्कार कर पाएगा? यह स्प्रिंग! इसे देख रहे हो? कितना शक्तिशाली पावर! यही असली यंत्र है। कितना छोटा किंतु कितना खतरनाक और जानलेवा, और यह देख रहे हो, यह छोटा सा छेद! यही बंदूक का काम करता था। और यह है घंटी बजाने का ट्रिगर—यह दो काम करता था—शूट करना और घंटी बजाना अर्थात् उसको घुमाने पर वह छोटा पिन निकलकर अपने निशाने पर लगेगा और साथ-साथ घंटी बजेगी। लोग समझेंगे घंटी बजी पर उधर गोली चली। घंटी की आवाज स्प्रिंग की आवाज को छुपा लेती थी। याद है, हमने चर्चा भी की थी। एक आवाज दूसरी आवाज को छुपा सकती है, लेकिन जो दुर्गंध फैलती है, वह कैसे छिपेगी? उसी दिन मुझे इस व्यक्ति के प्रखर मस्तिष्क का आभास हो गया था।’’

मैंने पूछा, ‘‘एक बात बताओ, तुमने यह कैसे अनुमान लगाया कि शरीर में काँटे का सरगना और ग्रामाफोन पिन का हत्यारा एक ही व्यक्ति है?’’

ब्योमकेश ने कहा, ‘‘पहले मैं यह जान नहीं पाया। लेकिन धीरे-धीरे मेरे मस्तिष्क में ये दोनों एक होते गए। देखो, शरीर में काँटेवाला क्या कह रहा है? वह स्पष्ट रूप से कहता है कि यदि आपके सुख और शांति में कोई व्यवधान है तो वह उससे छुटकारा दिला देगा। जाहिर है, इसके बदले में उसे एक मोटी रकम देनी होगी। यद्यपि इस रकम का कहीं जिक्र नहीं किया जाता, किंतु यह भी तय है कि वह यह काम कोई दया-पुण्य या परोपकारवश के खाते में नहीं करता। और अब, दूसरी ओर देखो, जितनेभी लोग मारे गए, वे सभी किसी के सुख में काँटा बने हुए थे। मैं मरनेवालों के रिश्तेदारों पर उँगली उठाना नहीं चाहता, क्योंकि जिस तथ्य को साबित नहीं किया जा सकता, उसका जिक्र भी फिजूल होता है। लेकिन कोई इस बात को नोट किए बिना नहीं रह सकता कि जितने लोगों की हत्या हुई, वे निस्संतान थे और उनके धन-संपत्ति को पानेवाला कुछ केसों में उनका भतीजा या दामाद था। क्या आशु बाबू और उनकी रखैल स्त्री का किस्सा हमें संकेत नहीं देता कि उन दोनों का दिमाग किस दिशा में काम कर रहा था?’’

‘‘तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यद्यपि ये दोनों केस शरीर में काँटा और ग्रामोफोन-पिन देखने में तो अलग-अलग दिखाई देते हैं, पर दोनों एक साथ फिट भी हो जाते हैं, जैसे गुलदस्ते के दो टुकड़े उसके गोल छेद में थोड़े प्रयास के बाद आसानी से फिट बैठ जाते हैं। एक दूसरी बात, जो शुरू में ही मेरे मस्तिष्क में खटकी थी, वह थी पहले के नाम और दूसरे के काम में समानता। एक ओर शरीर में काँटे का वर्गीकृत विज्ञापन और दूसरी ओर काँटे जैसी वस्तु के हृदय में घुसने से मरते लोग क्या तुम्हें अहसास नहीं होता कि दोनों में कहीं समानता है?’’

मैंने उत्तर दिया, ‘‘शायद लगा हो, पर मुझे उस समय कुछ सुझाई ही नहीं दिया।’’

ब्योमकेश ने व्यग्रता से सिर हिलाते हुए कहा, ‘‘यह सबकुछ जमा करके एक-एक घटाते जाने की प्रक्रिया से बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है। इसका अहसास मुझे आशु बाबू का केस लेने के बाद ही हो गया था। समस्या केवल अपराधी की पहचान की थी और यहीं आकर प्रफुल्ल रॉय का प्रखर मस्तिष्क सामने आ गया। उसकी चालाकी बेमिसाल थी। जिन लोगों ने हत्या के लिए पैसे दिए, वे तक नहीं जान पाए कि वह कौन है और यह काम वो कैसे करता है? उसकी तुरुप चाल यही थी कि वह कैसे अपने को परदे में छुपाए रखे? मैं नहीं जानता कि मैं कभी उसका पता लगा भी सकता था, जब तक कि वह खुद चलकर मेरे घर में नहीं आया।

‘‘देखो, इसको इस प्रकार समझो। जब तुम उसके आमंत्रण पर लैंपपोस्ट पर खड़े थे तो तुम्हारे आचरण से उसको कुछ संदेह जरूर हुआ था, फिर भी उसने जुआ खेला और वह पत्र तुम्हारे पॉकेट में पहुँचाया और अपना संदेह मिटाने के उद्देश्य से तुम्हारा पीछा भी किया। लेकिन जब तुम आधे कलकत्ता का चक्कर लगाकर घर में घुसे तो वह जान गया कि तुम मेरे ही दूत हो। वह पहले ही जान गया था कि आशु बाबू का केस मेरे हाथ में आ गया है। इसलिए उसे पूरा विश्वास हो गया कि मुझे सबकुछ पता चल गया है। उसकी जगह कोई और होता तो वह अपनी योजना छोड़कर भाग खड़ा होता।

‘‘किंतु प्रफुल्ल रॉय अपनी अतिशय जिद के कारण मेरे पास आया, ताकि वह पता कर सके कि मैं कितना कुछ जानता हूँ और शरीर में काँटे के केस में क्या करना चाहता हूँ? यह करके वह कोई जोखिम नहीं उठा रहा था, क्योंकि मेरे लिए यह पता करना असंभव था कि शरीर में काँटे के और ग्रामोफोन-पिन दोनों रहस्यों का प्रणेता वही है, और यदि मैं जान भी लेता तो भी मैं किसी भी सूरत में उसको अपराधी नहीं ठहरा सकता। लेकिन उसने यहाँ एक भूल कर दी।’’

‘‘वो क्या है?’’

‘‘वह यह कल्पना नहीं कर पाया कि उस सुबह मैं उसका ही इंतजार कर रहा था, क्योंकि मैं यह जान गया था कि इन सबकी जानकारी लेने के लिए वह मेरे पास जरूर आएगा।’’

‘‘तुम जान गए थे! तो तुमने पकड़वाया क्यों नहीं?’’

‘‘अब देखो! कर रहे हो न बौड़म जैसी बात! अजित, यदि उस समय मैं उसे पकड़वा देता तो मेरी सारी मेहनत बेकार जाती, क्योंकि मेरे पास ऐसा क्या कोई सबूत था, जिसके बल पर मैं उसे हत्या का अपराधी ठहरा सकता था? मेरे पास उसे पकड़ने का एक ही रास्ता था और वह था कि मैं उसे रँगे हाथ पकड़ूँ। और यही मैंने किया। जरा सोचो, हम लोग सीने पर प्लेट बाँधकर रात में क्या करने गए थे?

‘‘जो भी हो, मेरे से बात करके प्रफुल्ल रॉय जान गया कि मुझे अब सबकुछ पता लग चुका है। केवल यह नहीं जान पाया कि मैंने उसके मस्तिष्क को पढ़ लिया है। उसने फैसला कर लिया कि मुझे अब जिंदा छोड़ देना उसके लिए खतरनाक है। और इसीलिए उसने मुझे उस रात रेसकोर्स की सड़क पर चलने के लिए आमंत्रित किया। वह जान गया था, मैंने उस दिन तुम्हें भेजकर उसे गच्चा दिया था। इसलिए इस बार मैं स्वयं ही जाऊँगा। तो भी एक बात को लेकर उसके मन में अब भी संशय था कि मैं अपने साथ यदि पुलिस ले जाऊँ तो? इसलिए जाते समय उसने पुलिस का जिक्र किया था, पर जब उसने देखा कि पुलिस की बात को लेकर मैं क्रोधित हो गया, तब उसे इत्मिनान हो गया कि पुलिस नहीं आएगी और मन-ही-मन उसने मुझे मृत मान लिया।

बेचारा! नटवर लाल! एक छोटी सी चूक में फँस गया। इसका अफसोस उसने मरते समय प्रकट भी किया और माना कि उसे मेरी प्रखरता को कम नहीं आँकना चाहिए था।

एक अंतराल के बाद ब्योमकेश बोला, ‘‘क्या तुम्हें याद है, जब आशु बाबू पहली बार यहाँ आए थे। तब मैंने उनसे पूछा था कि उन्होंने अपने सीने में झटका लगने के समय क्या कोई ध्वनि या आवाज सुनी थी? उन्होंने कहा था कि साइकिल की घंटी। उस समय मैंने उस बात पर अधिक गौर नहीं किया। यही एक बड़ी पहेली थी, जो सुलझने का नाम ही नहीं ले रही थी। लेकिन जब मैंने शरीर में काँटे का पत्र पढ़ा, तो तुरंत उसका हल मिल गया। तुम्हारे प्रश्न के उत्तर में मैंने कहा था कि मुझे पत्र में केवल एक ही शब्द मिला है, वह है ‘बाइस्किल’।

‘‘आश्चर्य होता है कि मैंने साइकिल पर पहले क्यों नहीं ध्यान दिया?’’ दरअसल आज जब मैं सोचता हूँ तो मुझे साइकिल के अतिरिक्त कुछ दिखाई ही नहीं देता, क्योंकि इतनी आसानी से निशंक हत्या का अन्य कोई उपाय संभव ही नहीं है। आप सड़क पर चल रहे हैं, एक साइकिल सवार सामने से आता है। वह आपको एक ओर हो जाने के लिए घंटी बजाता है और चला जाता है। आप सड़क पर गिर जाते हैं या कहो मर जाते हैं। कोई भी व्यक्ति साइकिल सवार पर संदेह नहीं करता, क्योंकि उसके दोनों हाथ हेंडिल को पकड़े थे, वह हत्या कैसे कर सकता है? इसलिए दूसरी बार कोई उसे देखता भी नहीं कि वह कहाँ गया?

‘‘केवल एक बार! तुम्हें याद हो! पुलिस ने अपनी चौकसी दिखाई थी। पिछले शिकार—केदारनंदी की मृत्यु पुलिस मुखयालय के सामने लाल बाजार क्रॉसिंग पर हुई थी। जैसे ही वे सड़क पर गिरकर मरे, पुलिस ने सभी ट्रैफिक जाम कर दिया और घटनास्थल पर उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति की जाँच और तलाशी ली गई। लेकिन पुलिस को कुछ नहीं मिला, मैं समझता हूँ, प्रफुल्ल रॉय भी वहाँ भीड़ में मौजूद था और उसकी भी तलाशी ली गई। उसने मन-ही-मन ठहाका भी लगाया होगा, क्योंकि किसी पुलिस सिपाही के दिमाग में साइकिल की घंटी को जाँचने का प्रश्न ही नहीं उठा।’’ इतना कहकर ब्योमकेश घंटी को हाथ में लेकर बड़े चाव से निहारने लगा।

इतने में हवा का एक झोंका आया और मेज पर रखा लिफाफा उड़कर मेरे पाँव के पास गिर गया। मैंने उसे उठाकर मेज पर रखते हुए कहा, ‘‘तो अब पुलिस कमिश्नर महोदय का क्या कहना है?’’

‘‘और! बहुत कुछ,’’ ब्योमकेश बोला, ‘‘पहले तो उन्होंने पुलिस और सरकार की ओर से धन्यवाद दिया है और बाद में प्रफुल्ल रॉय की आत्महत्या पर शोक प्रकट किया है—यद्यपि उससे उन्हें तो खुशी ही होनी चाहिए थी, क्योंकि इससे सरकार का सारा श्रम व खर्च बच गया। जरा सोचो, उस पर मुकदमा चलाने और फाँसी चढ़ाने में कितना श्रम, शक्ति और खर्चा हो जाता? जो भी हो, एक बात पक्की हो गई है कि जल्दी ही सरकार की ओर से मुझे पुरस्कार मिल जाएगा। कमिश्नर साहब ने कहा है कि उन्होंने मेरे ‘पेटीशन’ को तुरंत काररवाई करके अनुमोदित करने की सारी व्यवस्था कर ली है। प्रफुल्ल रॉय की लाश की पहचान अभी नहीं हो पाई है। ‘ज्वैल इंश्योरेंस’ के कर्मचारियों ने लाश देखकर इनकार कर दिया कि यह व्यक्ति प्रफुल्ल रॉय है। उनका प्रफुल्ल रॉय इस समय काम के सिलसिले में जैस्सोर गया हुआ है। तो यह स्पष्ट है कि हत्यारा प्रफुल्ल रॉय का नाम प्रयोग में लाता था। उसका वास्तविक नाम क्या है, यह अभी पता नहीं चला है। खैर, मेरे लिए तो वही प्रफुल्ल रॉय है। और अंत में कमिश्नर ने एक दुःख का समाचार दिया है। यह घंटी मुझे पुलिस को दे देनी होगी, क्योंकि अब यह सरकार की संपत्ति हो गई है।’’

मैंने हँसकर कहा, ‘‘तुम तो मुझे लगता है, इस घंटी के दीवाने हो गए हो, तुम देना नहीं चाहते, क्यों है न यही बात?’’

ब्योमकेश ने भी हँसते हुए कहा, ‘‘यह सही है। यदि सरकार मुझे दो हजार के पुरस्कार के बदले में यह घंटी दे दे तो मुझे खुशी होगी। लेकिन फिर भी, मेरे पास प्रफुल्ल रॉय की एक यादगार है।’’

‘‘वो क्या है?’’

‘‘क्या तुम भूल गए? वह दस रुपए का नोट। मैं उसे जड़वाऊँगा। वे रुपए मेरे लिए अब हजार रुपए से भी ज्यादा का है।’’ ब्योमकेश ने जाकर घंटी को अपनी अलमारी में रखा और ताला लगा दिया।

वह जब वापस आया तो मैंने पूछा, ‘‘ब्योमकेश! अब तो बताओ, बिल्कुल सच-सच बताना, क्या तुम जानते थे कि पान में जहर था?’’

ब्योमकेश कुछ क्षणों तक चुप रहा। फिर बोला, ‘‘देखो जानकारी में और अज्ञान के बीच का कुछ भाग अनिश्चय का होता है, जिसे हम संभावना का क्षेत्र कह सकते हैं।’’ फिर कुछ ही देर बाद बोला, ‘‘क्या समझते हो, क्या यह उचित होता यदि प्रफुल्ल रॉय की मृत्यु एक साधारण अपराधी की तरह होती? मैं नहीं समझता? इसके विपरीत, उसका अंत बहुत मौजू था। उसने यह दिखा दिया कि हाथ-पैर बाँधे एक अपराधी के रूप में भी उसने कितने सहज रूप से मृत्यु का वरण किया! क्या वह कम कलाकार था?’’

मेरे पास इसका कोई उत्तर नहीं था, क्योंकि एक सत्यान्वेषी के मन में अपने अपराधी के लिए कब और कहाँ प्रशंसा और सहानुभूति पैदा होती है, इस दुर्गम मार्ग की कल्पना करना मेरे लिए आसान नहीं था।

‘‘पोस्टमैन!’’

आवाज सुनते ही हम दोनों ने उत्सुकता से आगंतुक को देखा। ब्योमकेश के नाम रजिस्टर्ड पत्र था। उसने पत्र लेकर खोला। उसके हाथ में एक रंगीन शीट दिखाई दी, जिसे उसने मुसकराते हुए मेरी ओर बढ़ा दिया। मैंने देखा, आशु बाबू की ओर से भेजा गया एक हजार रुपए का चेक था।