यमदूत और नर्स (व्यंग्य) : शरद जोशी | Yamdoot aur Nurse : Sharad Joshi ke Vyangya

 

यमदूतों की हालत में इधर काफी सुधार हुआ है। अब पुराने दिनों जैसी बात नहीं रही। पहले जब वे किसी के प्राण हरने नक से पृथ्वी पर आते थे, उन्हें बैठने के लिए काले भैंसे दिए जाते थे, जिसका स्वरूप आपने सावित्री-सत्यवान वाले कैलेण्डर में देखा होगा। प्राण को शरीर से अलग कर बाँधने के लिए उनके पास मोटी सन की रस्सियाँ रहती थीं। वे एक टीन की पेटी लादकर लाते, जैसी आपने अक्सर पुराने नाइयों के पास देखी होगी, और उसी में प्रांणों को बन्द कर, मोटा ताला डाल, चाबी कमर में खोंस, ‘जय यमराज की’ बोलते, प्रकृति की शोभा निहारते, तीर्थस्थलों को आकाश से प्रणाम करते यमलोक लौट जाते। वायुमण्डल पार कर उन्हें सीधा खुला रास्ता मिलता तो वे ‘हुर्र हुर्र’ करते, भैंसे को चाबुक मार उसकी गति बढ़ाते और पैर हिलाते सरपट चल देते। कई बार इस दौड़ में किसी और भैंसे से कम्पटीशन हो जाता, तो आनन्द आ जाता। नथुनों से साँस फेंकता उनका भैंसा वैतरणी के किनारे पहुँचता तो ये उतर अपनी कमर सीधी करते, प्राण का बक्सा ज़मीन पर रख भैंसे की पीठ थपकाकर उसे खुला छोड़ देते। भैंसा वैतरणी की तरफ पानी पीने और किल्लोल करने निकल जाता और वे बक्सा डिपाज़िट कर, रजिस्टर पर लौटने का समय और दस्तखत डाल, दोस्तों में चिलम फूँकने आ बैठते।

पर इधर यमदूतों की स्थिति में काफी सुधार हुआ है। उन्हें आने-जाने के लिए छोटे-छोटे स्कूटर किस्म के वाहन मिल गए हैं और प्राण रखने के लिए सुन्दर-सी प्लास्टिक की थैलियाँ, जो आसानी से ओवरकोट की जेब में रखी जा सकती हैं। वे आते हैं, एकाध सिगरेट सुलगा कुछ देर खड़े रहते हैं और फिर शरीर से प्राण निकाल थैली में बन्दकर हौले से चल देते हैं।

यमदूतों की हालत में जब इतना सुधार हुआ है, तब नसौं की दशा वही है, जो बरसों से चली आई है। कम वेतन, दुबला-पतला शरीर और पुराने ढंग के सफेद बाने। वही बड़े डॉक्टरों का भय, जवान डॉक्टरों की अर्थहीन सहानुभूतियाँ, मोटी मैट्रनों की धौंस-डपट और वार्ड बॉय और मेहतरानियों से तू तू मैं-मैं। कोई फर्क नहीं आया है। आज भी विवाह के प्रस्ताव कम्पाउण्डरों, बस-कण्डक्टरों, ड्राइवरों, सिनेमा के गेटकीपरों से बड़े ओहदे के लोगों की ओर से नहीं आते। आज भी मेडिकल कॉलेज के लड़के बेवफाई करते हैं। आज भी नाइट ड्यूटी के डॉक्टर्स...! यानी हाल वही है, जो सौ साल पूर्व था। होस्टलों का सड़ा खाना, गरीबी के हाल बयान करते गाँव से माँ के पत्र, छोटे भाई का पैसे के लिए उन्हें कातर दृष्टि से देखना, सब कुछ वैसा ही है। कभी-कभी पैसेवाले मरीज़ पाँच-दस रुपया इनाम के बतौर दे जाते हैं तो कुछ रुपए अपने वेतन से मिला वे नायलॉन की सस्ती भड़कीली साड़ी खरीद लेती हैं। सफेद रंग से प्रतिक्रिया बड़े-बड़े रंगीन फूल-पत्तों में प्रकट होती और वे खुशी-खुशी सारा शहर घूम लेतीं। चार-छह सम्भ्रान्त व्यक्ति घूर लेते, दो-एक शोहदे आवाज़ें कस देते और एकाध भावुक पीछे-पीछे चलता अस्पताल तक आ जाता तो शाम सफल हो जाती। पर फिर वही ढर्रा, वही यहाँ-वहाँ दौड़ना, वार्ड बॉय से चखचख और मैट्रन की डॉटें। उन्हें नहीं पता कब उनका जीवन बदलेगा ! कब इन आनेवाले मरीज़ों में कोई ऐसा परेशान हाल आएगा, जिसे इनका कोमल स्पर्श वरदान लगेगा। चार माह प्लरिसी, टी. बी. या पेट दर्द का शिकार हो, मुँह में थर्मामीटर लगाए वह फटी-फटी आँखों इन्हें देखता रहेगा। बदन में थोड़ी शक्ति आने पर इनका हाथ पकड़ सुबकने लगेगा। कौन होगा वह, ये नहीं जानतीं ! ज़िन्दगी एक लम्बे इन्तज़ार का पर्यायवाची बन गई है।

उस शाम कोई पाँच बज रहे होंगे, जब यमदूत नम्बर चार सौ नौ पृथ्वी पर उतरा। वह सीधा आया रायबहादुर सेठ जंगीराम के बँगले के सामने। शहर में रायबहादुर के दो निवास हैं। एक तो बीच बाज़ार की पुरानी हवेली, जहाँ कभी जंगीराम के पुरखे रहते थे और दूसरा यह बंगला, जो उन्होंने सात-आठ वर्ष पूर्व शहर से दूर बनवाया था। वे दिन चाँदी-सोने के व्यापार में रायबहादुर को फायदे के रहे थे, इसी कारण उन्हें वह पुरानी हवेली, उसके छोटे-छोटे दरवाज़े, सँकरी सीढ़ियाँ और भोंडे कामोत्तेजक चित्रों से मढ़ी दीवारें सभी कुछ बुरा लगने लगा था। उन्होंने तुरन्त शहर के बाहर ज़मीन खरीदी और बंगला खेंचकर वहीं जा बसे। उन्हीं दिनों रायबहादुर ने यह आनन्द टाकीज़ बनाया, जहाँ आजकल ‘चार दरवेश’ फिल्म चल रही है। आनन्द उनके बड़े लड़के का नाम है, जो आजकल कलकत्ता में व्यवसाय करता है और लड़कियों के मामले में अपनी ऊँची पसन्द के कारण वहाँ के सभी क्लबों में प्रसिद्ध है। यमदूत को सन्देह था कि कहीं रायबहादुर अस्पताल में भर्ती न हो गया हो या अन्त समय उसी पुरानी हवेली में न चला गया हो, जहाँ से उसके पुरखों की लाश निकली। पर बंगले के सामने पहुँचने पर जब उसने अन्दर से डॉक्टर चटर्जी की कार निकलती देखी, तो उसे विश्वास हो गया कि बूढ़ा यहीं बिराजे है। यमदूत डॉक्टरों की कारों से अच्छी तरह परिचित हैं। प्रायः ही जब वे प्राण लेने जाते हैं, ऐसी कोई कार उन्हें घर के बाहर खड़ी मिलती और अन्तिम इंजेक्शन की तैयारियाँ करता डॉक्टर मरीज़ के पास खड़ा दिखता।

‘कर ली वसूल फीस मेरे यार ने !’ यमदूत कार देखकर हँसा और बंगले में घुस गया।

रायबहादुर के बंगले को यदि आपने अन्दर से देखा है तो गेट से पोर्च तक गुलाब के पौधों की कतार आपको अच्छी लगी होगी। रायबहादुर के बंगले के गुलाब ज़िला-पुष्प-प्रतियोगिता में सदैव प्रथम आए हैं और कमिश्नर साहब स्वयं उसकी कलमें माँगकर ले गए हैं। यमदूत उन गुलाबों की ओर देख ही रहा था कि पोर्च से एक नर्स बाहर निकली। उस गुलाबी माहौल, ज़मीन पर बिछी सुख बजरी के सन्दर्भ में एक सफेद नर्स का यों उभरकर आना यमदूत को बहुत भाया। नर्स उसे अच्छी लगी, खास तौर से बड़ी-बड़ी आँखों में झलक रहा वह बेकसूर भाव, जो अक्सर नसों में रहता है। बड़ी भली लगती हैं, जैसे नई छतरी, जिसकी हर तान दुरुस्त, कपड़ा तना हुआ, उँगलियों से इन्हें गोल-गोल नचाओ तो रीढ़ में मीठा कम्पन हो आए और अन्दर दायरे बनने-टूटने लगें।

यमदूत का दायरा उसे देख टूट गया और गुलाबी गर्मी में उसका सारा अनुशासन पिघलने लगा। वह कुछ पुराने किसम का व्यक्ति था और सौन्दर्य सम्बन्धी उसके मापदण्ड भी परम्परागत थे। यानी पहले तो चितवन, फिर बदन का उभार और तीसरे कमर का पतला होना, बस यहीं तक। बालों की काली रेशमियत, कालर बोन के पास का नाजुक प्रदेश, हथेलियों पर खिले गुलाब, कलाइयों की सफेद कोमलता, पिण्डलियों का भराव और खुली गर्दन से दिखती सुघड़ पीठ आदि सब उसे ध्यान नहीं आए। वह नई नर्स पर बिलकुल पुराने कारणों से मर गया था।

ओवरकोट पर मफलर डाल और लम्बे होल्डर में सिगरेट लगाकर पीता यमदूत कोई पुराना रईस लगता था। नर्स जब तक पोर्च से निकल फाटक तक आई यमदूत ने उसे रोक लिया।

“ठहरिए।” वह जितना कोमल हो सकता था, हुआ।

“जी।” वह जितनी मीठी हो सकती थी, हुई।

“अभी आपने टेम्परेचर लिया था, कितना था ?”

“ज़्यादा था पर डॉक्टर ने इंजेक्शन दिया है, कम हो जाएगा और नींद भी आ जाएगी।”

“आप जा रही हैं ?”

“हाँ। आप क्या बाहर से आ रहे हैं ?”

“जी, मैं कलकत्ता से आया हूँ। क्या खयाल है आपका ? तबीयत कब तक ठीक हो जाएगी ?”

“आठ-दस रोज़, कम से कम।” वह बोली।

“आप-सी नर्स इलाज करे तो फायदा ज़रूर होगा।” उसने कहा और साथ ही नर्स के पूरे शरीर का मुआयना किया।

नर्स के चेहरे पर तुरन्त छोटे-छोटे गुलाब खिल आए। उसने यमदूत को देख उन अपरिचित आँखों से कुछ समेटने की कोशिश की, वर्तमान और भविष्य।

“मैं शहर जा रहा हूँ, आप क्यों नहीं मेरा स्कूटर पवित्र करती हैं ? आइए, छोड़ दूँ।”

नर्स इस बार कुछ ज़रूरत से ज़्यादा मुस्कराई और प्लास्टिक की थैली हिलाती स्कूटर पर बैठ गई। पीछे बैठ उसने यमदूत की चौड़ी पीठ पर हाथ रखा तो यमदूत को लगा जैसे उसकी रीढ़ की हड़ी गुलाब की टहनी में बदल गई हो और सारे शरीर में फूल झरने लगे हों। वह अन्दर-अन्दर महकता चल दिया।

विजय और मैं कुछ दिनों से सुबह-शाम घूमने जाया करते हैं। उसे डॉक्टर ने सलाह दी थी और मुझे उसके आग्रह पर जाना पड़ता था। पिछले दिनों लगातार खुली हवा और शहर से दूर जाते रहने के कारण हम अपने को बड़ा वर्ड्सवर्थ समझने लगे थे। लम्बी बीमारी से उठने के कारण हल्की कमज़ोरी और भावुकता विजय में बराबर बनी रहती थी। खुली हवा, सूरज का उगना-डूबना और फूल-पत्ते उसे अच्छे लगते थे। हमारी राह लगभग निश्चित थी, रोज़ उसीसे जाते और एक लम्बा चक्कर लगाकर लौट आते। पर शायद इसलिए कि हमारा कोई दार्शनिक स्तर नहीं था, वर्ड्सवर्थ पर हम सदैव नहीं टिकते और हमारा ध्यान प्रकृति से हटकर लड़कियों पर चला जाता। रायबहादुर के बंगले के पास से गुज़रते तब दरवाज़े पर या उसी राह में एक सुन्दर-सी नर्स दिख जाया करती। इच्छा होती उससे पूछे कि रायबहादुर अब तक मरे या नहीं, पर चुप रह जाते। शरीफज़ादों की तरह उसे सिर्फ कनखी से देख आगे चल देते। विजय के चेहरे पर कभी नर्स को दूर से देख एक कोमल मुस्कराहट भी आ जाती। मैं नहीं टोकता। डॉक्टर ने उसे प्रसन्न रहने को कहा है। रायबहादुर जब तक बीमार रहेंगे, नर्स बंगले पर सेवार्थ जाती रहेगी और तब तक हमें दिखेगी भी। इसीलिए हम लोग मनाते कि रायबहादुर ज़्यादा से ज़्यादा बीमार रहें। न मरें, न स्वस्थ हों।

उस शाम हमने देखा कि ओवरकोट पर मफलर डाले एक शख्स रायबहादुर के बंगले के सामने खड़ा नर्स से बातें कर रहा था। जब तक मैं और विजय शरीफज़ादों की चाल से चलते पास पहुँचते वह नर्स को स्कूटर पर बैठा चुका था। उसकी पीठ पर हाथ रखे जाती नर्स हमें बड़ी प्रसन्न लगी।

“शक्ल कैसी है साले की, यमदूत जैसी !” अपने रकीब की शान में विजय ने एक वाक्य कहा।

“तैने देखे हैं यमदूत ?” मैंने पूछा।

“हाँ।”

“कब ?”

“अभी गया न वह ।”

हम फिर हँस दिए। छोटी-छोटी-सी बातों पर हँसना अच्छा होता है। डॉक्टर ने कहा है खुश रहा करो।

“मैंने यमदूत देखा है। सावित्री-सत्यवान वाले कैलेण्डर पर।” विजय बोला।

“यह मफलरवाला बिलकुल वैसा ही है ना !”

“बिलकुल।”

“अब यह नर्स गई काम से। बहुत बनती थी। वह फूहड़ उसका ऑपरेशन कर देगा।”

उस शाम हम बहुत दुखी रहे। प्राकृतिक वातावरण में जाकर भी ज़रा वर्ड्सवर्थ न हो पाए। जल्दी से लौट गए। बंगले के सामने से गुज़रे, तो मनाने लगे कि रायबहादुर जल्दी मर जाए, जिससे हमें नर्स उस मफलर वाले के साथ वहाँ न दिखे। शहर आने पर देखा कि क्वालिटी के बाहर वही स्कूटर खड़ा है। बात स्पष्ट थी। इस समय एक नए प्रेम के प्रारम्भिक बिल चुकाए जा रहे होंगे। विजय उदास हो गया।

“नर्स और यमदूत।” मैं बोला।

“तुम्हें कोई कहानी सूझ रही है।”

“हाँ।” मैंने कड़ककर कहा, जैसे कहानी नहीं लिखना है किसीकी बेवफाई का बदला लेना है। बेवफाई विजय से की गई है, बदला मुझे लेना है, लेखक के कुछ सामाजिक दायित्व भी होते हैं।

रात को हमने टाउनहॉल में सितार का कार्यक्रम सुना, जो मेरे मन पर तो असर कर रहा था, पर विजय चूँकि बोर हो रहा था सो हम अधूरे में उठकर आ गए। लौटने पर उसके घर के पास कॉरिडर में, मैंने विजय से कहा, “देख, नर्स की बात ही सोचता रहेगा, तो तेरी हेल्थ का क्या होगा ?”

उसने कोई उत्तर नहीं दिया। फिर अपनी सहज कोमलता से कहने लगा, “तैने नस के हाथों में वह प्लास्टिक की थेली देखी है ?”

“देखी है। उसी यमदूत ने भेंट की होगी।”

“उसी थैली में मेरे प्राण बन्द हैं।” वियज गम्भीर हो रहा था, “नर्स जाएगी तो वह थेली जाएगी और थैली जाएगी तो मेरे प्राण !”

“चुगद, ऐसी पागलों जैसी बातें नहीं करते। एक अच्छे मरीज़ की ज़िन्दगी में कितनी नर्सं आती हैं, पर उसका टेम्परेचर सदैव नॉर्मल रहता है। मैं तुम्हें कह चुका हूँ कि प्रोफेसरों और पुलिसवालों से घिरे इस समाज में हमारी सब इच्छाएँ पूरी नहीं हो सकतीं। फिर सिवाय उस नर्स को आते-जाते ताकने के तूने आखिर कौन-से पेड़ बोए ? आज तुझे क्या हक है, दहाड़ मारकर रोने का।”

“अपने स्वास्थ्य की स्थिति देखते हुए सिवाय घूरने के मैं क्या कर सकता हूँ। जानते हो कि मैं एक लम्बी बीमारी से उठा हूँ।” विजय ने स्पष्टीकरण दिया।

“खैर मना कि तू दूसरी लम्बी बीमारी में नहीं पड़ा। इसके पहले कि तू अपनी जान देता, नर्स को यमदूत ने भगा।”

“अब क्या करना चाहिए मुझे ?” वह कुछ सोचकर बोला।

“तुझे अपनी हेल्थ की तरफ ध्यान देना चाहिए। तुझमें विटामिन ‘बी’ की कमी भी है, ‘ए’ का तो सवाल ही नहीं उठता। तू हरी सब्ज़ी खा और हर कौर को बत्तीस बार चबाया कर। टमाटर इन दिनों सस्ते हैं।”

मेरी बात के जवाब में उसने क्रोध से देखा और अपने घर की ओर चल दिया।

मैं लौट आया।

आज की रात ज़रा भी चाँदनी नहीं थी। बड़ा बेरहम वातावरण, जो नर्सों के साथ ठीक सुलूक नहीं करता। ऐसी रात सिर्फ यमदूतों के लिए अच्छी रहती है। इस समय एक प्लास्टिक की थैली विजय की आँखों में झूल रही थी। थैली, जिसमें उसके प्राण बन्द हैं। वही थेली आज की रात एक पलंग के पैतान पड़ी रही। एक स्कूटर नर्सेज़ क्वार्टर्स के बाहर खड़ा है और दूर बंगले में एक रायबहादुर पलंग पर पड़ा खाँस रहा है।

कोई दो बज रहे होंगे। एक अपूर्ण कथानक मेरी नींद तोड़े है।

नर्सेज़ क्वार्टर के बाहर दूसरा स्कूटर रुका। किसी ने दरवाज़ा खटखटाया।

“कोई है।” नर्स ने धीरे से पास लेटे यमदूत से कहा।

“मैं खोलता हूँ दरवाज़ा।” वह बोला।

“नहीं, नहीं, शायद वार्ड बॉय होगा। मैं उठती हूँ।”

“वार्ड बॉय नहीं, मेरा दोस्त है। स्कूटर रुकने की आवाज़ आई थी।”

“दोस्त को कैसे मालूम,तुम यहाँ हो?”

“कोई ज़रूरी काम होगा। ठहरो, मैं आया।”

यमदूत उठा और दरवाज़ा खोल बाहर निकला। सामने एक दूसरा यमदूत खड़ा था। उसका साथी, जो रायबहादुर की आत्मा समय पर न पहुँच पाने के कारण तलाश में भेजा गया था।

“कौन, सात सौ दस ?”

“जी हाँ।”

“कैसे आए थे ?”

“रात को यमराज ने राउण्ड पर आकर चेकिंग किया और रजिस्टर देखकर पूछा, रायबहादुर की आत्मा अभी तक जमा क्यों नहीं हुई? बताया कि हुजूर चार सी नौ नम्बर लेने गया है। बोले, लौटा क्यों नहीं, कहाँ अटका है ? हमें हुक्म दिया है तुम्हें लाने को। कहा है, हाज़िर करो और रायबहादुर के प्राण भी साथ लाओ।”

यमदूत नम्बर चार सौ नौ सुनता रहा और फिर क्रोध में दाँत पीसने लगा, “सुसरी यह भी कोई ज़िन्दगी है। अरे, एक दिन रायबहादुर और जी लिया तो क्या फरक पड़ जाएगा। कई केस पेडिंग पड़े हैं, उन पर तो कोई ध्यान नहीं देता। ठीक है, तुम चलो हम आते हैं।”

“हम जवाब क्या देंगे वहाँ जाकर ?”

“तो सुबह तक ठहरो, दोनों साथ चलेंगे।”

सात सौ दस ने चार सौ नौ को देखा और कनखी से मुस्कराया।

“नर्स के फेर में पड़ गए गुरू।”

चार सौ नौ हँसा।

“यह तीसरा मामला है ! बहुत लोभी न बनो !”

“अरे, सब ठीक है, हम सब की जानते हैं। तो जाओ, तुम ज़रा घूम फिर आओ। थोड़ी देर मसान ताप ली। सुबह हम तुम्हें वहीं रायबहादुर के बंगले पर मिलेंगे।”

चार सौ नौ फिर क्वार्टर में घुस गया।

“कौन था ?” नर्स ने पूछा।

“सुबह हमें बिज़नेस के काम से जाना है, ज़रूरी। अब कुछ दिन मिल नहीं सकेंगे।”

“अरे !”

“उदास न हो, मैं जल्दी आऊँगा।” यमदूत ने उसे थपथपाया।

सितार फिर बजने लगा। फिर रीढ़ की हड्डी गुलाब की टहनी में बदली और नस-नस में फूल झरने लगे पर दरवाज़े की खटखट से गत टूट गई। इस बार वार्ड बॉय था। नर्स क्रोध में उठी और बोली, “क्यों रे, क्या बात है ?”

“डॉक्टर साहब ने बुलाया है।”

“क्या काम है ?”

“रायबहादुर की तबीयत खराब है। फोन आया है। बड़े डॉक्टर साहब जा रहे हैं। तुमको भी बुलाया है।”

“तू चल, मैं आती हूँ।” वह अन्दर आई और यमदूत से बोली, “मुझे जाना है, ड्यूटी है, रायबहादुर की हालत फिर बिगड़ी।”

“अरे, कहाँ जाती हो छोड़ो, रायबहादुर नहीं मरने का।” यमदूत ने उसे रोका।

“चलो, रहने दो। सुबह तुमको भी तो जाना है।”

“एक रात चैन से नहीं बीती।” यमदूत ने नर्स से शिकायत की, “सुसरे सबको आज ही दरवाज़ा खटखटाना था।”

“नर्सों की ज़िन्दगी में चैन कहाँ ?”

“हमारी ज़िन्दगी में भी सुख कहाँ ?” वह बोला और बाहर जाने के लिए तैयार होती नस को अपलक देखता रहा।

“तुम चलो, मैं भी वहीं आता हूँ।” यमदूत उठकर ओवरकोट पहनने लगा। कर्तव्यपरायण नर्स बिना उत्तर दिए तेज़-तेज़ बाहर निकल गई।

रात दो बजे डॉक्टर ने रायबहादुर को एक और इंजेक्शन लगाया और गोलियाँ दीं। नर्स को रात-भर वहीं रहने का आदेश दे वे चले गए। सारा कोर्स बता गए और कहा, ज़रूरी हो तो फोन पर खबर देना।

नर्स ने हुक्म में सिर हिला दिया। वे कार में बैठते तक नर्स को समझाते रहे और वह सिर झुकाए यस् करती रही।

यह सच है, पेशेण्ट सीरियस था, पर यह रात भी कोई कम सीरियस नहीं थी।

यमदूत कुछ देर बाद आकर पोर्च के पास सीढ़ियों पर बैठ गया। रायबहादुर इंजेक्शन के असर में सो रहे थे। उसने नर्स को इशारा करके बुलाया। वह बाहर पोर्च में आ गई। रायबहादुर के कमरे की खिड़की से आता प्रकाश पोर्च के पास उन सीढ़ियों पर गिर रहा था। सीढ़ियाँ ठण्डी थीं और पोर्च के पास लगी रातरानी महक रही थी। खिड़की से आती जिस महक ने जीवन-भर रायबहादुर को प्रसन्न किया उससे आज यमदूत भी प्रसन्न था। नर्स पास बैठी थी, खामोश। सितार फिर बजने लगा, रीढ़ की हड्डी फिर गुलाब में बदलने लगी-यों ही एक घण्टा बीत गया, दो से तीन बज गए। रायबहादुर के बंगले की खामोशी में तीन के घण्टों का यों टपटप टूटना किसीको पता न लगा। यह खबर पोर्च पर भी न लगी और न शहर में कोई जान सका। रोज़ ही ऐसा होता है इस बड़े शहर में कि रात-भर सॉसें और करों की लाहट परस्पर टकराया करती हैं और तीन कब बज जाते हैं, पता नहीं लगता।

तीन बजे के कुछ बाद रायबहादुर की आँखें खुलीं। प्रकाशमय कमरे में उन्होंने सब ओर देखा और उन्हें लगा कि एक बड़ी लम्बी नींद के बाद वे जागे हैं। वे लेटे-लेटे खुद की बीमारी के बारे में सोचने लगे और उससे जो बिज़नेस पर नुकसान हो रहा है, उसकी चिन्ता उन्हें सताने लगी। उन्होंने सोचा कि यदि वे ठीक न हो पाए ! वे काफी उमर जी चुके हैं। इस उमर में उन्होंने बहुत किया है। अपने व्यवसाय को कलकत्ता तक फैलाया, दो नई फैक्टरियाँ डालीं, एक फार्म खरीदा, एक सिनेमा हाउस बनवाया और यह नया बंगला। उन्होंने सब सुख देखे हैं। लड़कियाँ, शराब और विदेश-यात्रा। खूब नेक काम किए हैं, चन्दा दिया है, दान में रकम निकाली है और यश पाया है। उनका हिसाब हमेशा ठीक रहा, सरकार उनके कमाए ब्लैक-मनी का कभी पता नहीं लगा सकी। वे बराबर टैक्स देते थे और अफसर उनसे हमेशा खुश रहे थे। उन्होंने सन्तोष की साँस ली और उस खिड़की की ओर देखा, जिससे रातरानी की महक आ रही थी। पर कुछ देर बाद उन्हें लगा कि आज खिड़की से सिर्फ महक ही नहीं आ रही, साथ में कुछ मीठे स्वर भी हैं, हँसी और चुलबुलाहट भी है, कुछ पीड़ामय चुम्बन भी हैं। उन्हें आश्चर्य हुआ, इतनी रात पोर्च में कौन होगा ?वे उठे और धीरे-धीरे खिड़की के पास गए। सीढ़ियों पर उन्हें ओवरकोट वाली एक पीठ दिखी और मफलर और उससे सटी हुई एक लड़की, वह नर्स ! यह कौन है, उन्होंने सोचा। उनका लड़का आनन्द, हाँ और कौन हो सकता है उस नस के साथ जो यहाँ सेवा में रहती है ! मेरी बीमारी का यह फायदा मिला बेटे को। कुल कलंकी, नीच। इसकी वे इस वर्ष शादी करना चाहते थे, दुष्ट। रायबहादुर काँपने लगे। उनका शरीर क्रोध में ज़ोर-ज़ोर से हिलने लगा। उन्हें एक क्षण को ख्याल आया कि वे दिल के रोगी हैं और उन्हें गम्भीर रहना चाहिए, पर वे अपने क्रोध को रोक नहीं सके। वे ज़ोर से चिल्लाना चाहते थे और वे चिल्लाए भी, पर आवाज़ फूट नहीं पाई। वे गिरने लगे और उन्होंने टेबुल पकड़नी चाही, पर वे बजाय टेबुल के टेबुल-क्लाथ पकड़ पाए, जो उनके वज़न के साथ स्याही की बोतल लिए नीचे आ गिरा। बोतल टूट गई और उनके चेहरे व कमीज़ पर काली स्याही फैल गई।

नर्स दौड़कर अन्दर गई।

दूसरा यमदूत, जो रात-भर इधर-उधर भटक अब रायबहादुर के बंगले में आ गया था, पोर्च के पास पहुँचा और बोला, “बहुत हो गया गुरू, अब चलो। नहीं हमारा भी एक्सप्लेनेशन कराओगे।”

“हाँ, उषा काल हुआ जाता है, फिर ही चलते हैं।” पोर्च पर बैठे यमदूत ने उत्तर दिया।

जब मैं और विजय घूमने निकले, सूरज पूरी तौर से नहीं निकला था और गिनने लायक एक-दो तारे डूबने से बच गए थे। इसे ही उषाकाल कहते हैं। विजय सुस्त था, क्योंकि रात-भर जागा था। मैं भी सुस्त था, क्योंकि काफी रात तक मैं सितार की गूँज में यमदूत और नर्स के रोमांस की व्यर्थ कल्पनाएँ कर कोई कहानी बनाता रहा था। रात-भर मेरा मन भटका, कभी में नर्सेज़ क्वार्टर जाता और वहाँ एक स्कूटर खड़ा देखता। कभी रायबहादुर के बंगले जाता और पोर्च पर किसी जोड़े को बैठे देखता। मैं सोचता कि क्या ऐसा हो सकता है कि कोई यमदूत पृथ्वी पर आए किसी के प्राण लेने, मानो रायबहादुर के ही, और इलाज करती किसी नर्स की सेवा या सौन्दर्य पर मुग्ध होकर यहीं रहने लगे। वह शख्स मर न सके, जिसकी बारी हो। तब क्या होगा ? उस काल्पनिक दुनिया में, जहाँ स्वर्ग और नर्क हैं, ज़रूर हलचल मच जाएगी। पहले भी तो हलचल मची थी, जब सत्यवान जीवित रह गया था। ऐसा क्यों नहीं होता ? नर्सें भी तो बहुत ज़िम्मेदार हैं। कोई भी मरीज़ सत्यवान या असत्यवान, जिनकी सेवा में वे तैनात हों, उन्हें बचाने के लिए वे क्या कम कोशिश करती हैं। पर यमदूत पत्थर के होते हैं, उन्हें नर्सें रोक नहीं पातीं। वे आते हैं और चले जाते हैं। वे उन्हें रोक नहीं पातीं।

मैं विजय को एक कथानक सुनाना चाहता था पर मैंने नहीं सुनाया, क्योंकि मुझे डर था कि वह हँसेगा। शायद उसे यह भी अच्छा न लगे कि मैं नर्स और यमदूत के रोमांस को सहानुभूति से विचारता हूँ और विजय के बारे में कुछ नहीं सोचता, जो अभी लम्बी बीमारी से उठा है। प्रेम करने में असमर्थ है और राह चलती नर्स को सिर्फ देखकर रह जाता है। हम इसीलिए खामोश जा रहे थे। रायबहादुर के बंगले के पास पहुँचे, तब तक सूरज की किरण फूट गई थी। उसी हल्के उजाले में हमने देखा कि दो स्कूटर उस बंगले से निकले और तेज़ी से हमारे पास से गुज़र गए।

“सुबह-सुबह यमदूत के दर्शन हो गए !” मैंने कहा।

“एक नहीं दी। दूसरा भी उतना ही बदशक्ल है।” विजय बोला, फिर वह हँसा और कहने लगा, “उसके पास प्लास्टिक की थैली भी है।”

“हाँ, मगर अब शायद इसमें रायबहादुर के प्राण बन्द होंगे।”

इस पर हम फिर हँसे पर हमारा हँसना एक अपशकुन ही था। जब हम उस लम्बी सड़क पर काफी दूर तक वर्ड्सवर्थी करने के बाद डेढ़-दो घण्टे में वापस आए, हमने देखा कि रायबहादुर के बंगले के बाहर बहुत भीड़ है। उनका देहान्त हो चुका था। मैं और विजय वहीं खड़े हो गए। भीड़ में हमारे कुछ परिचित थे, उनसे बातें करने लगे। लोगों की चर्चाएँ सुनने लगे।

“बीमार तो बहुत दिन से थे।”

“अब उम्र भी काफी हो गई थी।”

“यों भी एक दिन सबको जाना है, भैया ! क्या बड़ा क्या छोटा।”

“हुआ कैसे एकाएक, रात को तो ठीक थे।”

“दो बजे तबीयत बहुत बिगड़ गई थी। डॉक्टर चटर्जी आए थे और इंजेक्शन दिया। नर्स की ड्यूटी लगा गए थे। तीन बजे तक आराम से सोए। आनन्द बाबू जाग रहे थे, नर्स भी जाग रही थी। पता नहीं रात को कब वे उठे। शायद कुछ लिखना चाहते थे, टेबुल तक गए, पर गिर गए।”

“खुद उठ पड़े। आनन्द बाबू कहाँ थे ? नर्स तो थी ना ?”

“वहीं पोर्च के पास। रायबहादुर को नींद में देख सोचा, अब आराम करने दो। पर पता नहीं वे कब उठ गए और टेबुल तक पहुँचे। नर्स ने उनके गिरने की आवाज़ सुनी तो दौड़ी।”

“अब साहब, होनी को कौन रोक सकता है ?”

“यह तो है ही।”

फिर चुप्पी हो गई।

“आपको किसने खबर दी ?”

“सुबह आनन्द बाबू और उनके दोस्त स्कूटर पर शहर आए थे कहने। मैंने सुना तो सीधा भागा आ रहा हूँ। बुरा हुआ।”

“कलकत्ता से कब आए, आनन्द बाबू ?”

“परसों।”

“चलो, मरने के पहले रायबहादुर ने बेटे का मुँह देख लिया।”

मैं और विजय आगे बढ़ गए। जिसे हम शक्ल-सूरत के कारण यमदूत कह रहे थे, वह रायबहादुर का लड़का आनन्द है, जो कलकत्ता में व्यापार करता है और जिसके नाम से रायबहादुर ने आनन्द टाकीज़ बनवाया, जहाँ आजकल ‘चार दरवेश’ फिल्म चल रही है।

विजय चुप था। मैं सोच रहा था कि क्या कोई कहानी बन सकेगी इन सब बातों पर !