सारी बहस से गुज़र कर (व्यंग्य) : शरद जोशी | Sari Bahas se gujar kar : Sharad Joshi ke Vyangya

मैं जीवित था और उसके सामने उपस्थित था। उसने मेरे अस्तित्व से इन्कार कर दिया। मैं हूँ और उसके सामने हूँ, वह यह कदापि मानने को तैयार नहीं था। उसे बिना विभाग के खज़ाने से रुपए नहीं मिल सकते थे।

“मैं आपके सामने साक्षात् खड़ा हूँ !” मैंने उसे संकेत किया।

“प्रमाण चाहिए !” उसने माँग की।

“मेरे खड़े होने का !”

“जी नहीं, आपके होने का। मैं क्या जानूँ कि जो खड़ा है, वह आप ही हैं। आप जीवित हैं, इस बात का प्रमाण !”

“क्या यह अफवाह है कि मैं ज़िन्दा हूँ ?”

“हो सकता है। मुझे प्रमाण चाहिए।”

“में अपनी पत्नी को ले आऊँ !”

“क्या कीजिएगा !”

“आप भारतीय संस्कृति पर भरोसा करते हैं ?”

“करता हूँ, बशर्ते उससे दफ्तर के काम में दखल न पड़े।”

“आप मेरी पत्नी के माथे पर बिन्दी और माँग में सिन्दूर पर गौर कीजिए। वह मेरे ज़िन्दा होने का प्रमाण है। मेरे होने का इससे बढ़कर और क्या सबूत होगा कि मेरी पत्नी अभी विधवा नहीं हुई है।”

“आश्चर्य है !”

“किस बात का आश्चर्य ?”

“आप भी पढ़े-लिखे होकर कैसी बातें करते हैं !”

“भारतीया संस्कृत जिसे बोलते हैं, उसके अनुसार सुहाग की बिन्दी पति नामक शख्स के जीवित होने का प्रमाण है।” मैंने एक न पूछे गए प्रश्न का उत्तर-सा दिया।

“आप पति हैं ?” उसने जिज्ञासा की।

“जी हाँ !” मैंने समाधान किया।

“क्या प्रमाण ?” उसने सन्देह व्यक्त किया।

“मैं कसम खा सकता हूँ। मेरी एक, और एकमात्र, पत्नी है। मैं एक शरीफ आदमी हूँ।”

“अच्छा।”

“जी हाँ।”

“अपने एरिया के सब-इन्सपेक्टर पुलिस से लिखा लाइए !”

“क्या ?”

“कि आप शरीफ हैं।”

“आप महल्ले में जाकर पूछ लीजिए।”

“बिलकुल नहीं।”

“फिर महल्ले का रोब किसे दे रहे हैं ?”

“मैंने कोई रोब नहीं दिया।”

“मैं यहाँ सरकारी काम करूंगा या महल्ले में पूछने जाऊँगा, आपके ?”

“आप मुझे शरीफ आदमी नहीं मानते तो आपको महल्ले में जाकर पूछना चाहिए।”

“मुझे सबूत टेबिल पर होना, इस टेबिल पर !”

“किस बात का ?”

“कि आप शरीफ हैं और जिस औरत का आप ज़िक्र कर रहे हैं, वह आपकी बीवी है, उसका सुहाग-सिन्दूर जिसके लिए है, वह आप ही श्रीमान हैं, जो ज़िन्दा हैं।”

“हम विवाहित हैं।”

“क्या सबूत ?”

“हमने अग्नि को साक्षी रखकर”

“अरे यार, हमने अग्नि को साक्षी रखकर बीसियों सिगरेटें जलाई हैं, होता क्या है उससे !” वह हँसकर बोला।

“देखिए, सिगरेट-बीड़ी तो मैं पीता नहीं और बेकार बहस करना नहीं चाहता !”

“अच्छी बात है। यहाँ कौन कम्बख्त चाहता है !”

“देखिए, मैं मैं हूँ। जो रुपया दिया जाना है, मुझे दिया जाना है। आवेदन मैंने किया है। मंजूरी मेरे लिए हुई है। आप मुझे दीजिए।”

“आप प्रमाण ला दीजिए !”

“महज़ ढाई सौ रुपयों के लिए आप मुझे परेशान कर रहे हैं !”

“मेरा फर्ज़ है।”

“यह इन्सानियत नहीं है।”

“आप इन्सानियत की बात करते हैं ! भाई साहब ,यह दफ्तर है, सरकारी दफ्तर। किराने की दुकान मत समझिए इसे।”

“मैं कहता हूँ, इससे तो वह अच्छी।”

“आप वहाँ शौक से तशरीफ ले जा सकते हैं।”

“रुपया दे दीजिए, मैं चला जाऊँगा।”

“आप प्रमाण ले आइए और रुपया ले जाइए।”

कुछ देर चुप्पी रही। फिर मैंने कहा, “देखो पण्डित, तुम मुझे अच्छी तरह से जानते हो कि मैं कौन हूँ और मैं तुम्हें अच्छी तरह से जानता हूँ।”

“में आपको नहीं जानता।”

“मैंने आपको दसियों बार चाय पिलाई है। आप मेरे घर जा चुके हैं।”

“ज़रूर पिलाई होगी साहब, हमारी तो ज़िन्दगी ही दूसरों से चाय पीते बीती है। मगर में आपको नहीं पहचानता।”

“आप झूठ बोल रहे हैं।”

“मेरा यह फर्ज़ है, मैं सरकारी नौकर हूँ।”

“सरकारी नौकर होने के अतिरिक्त भी आपके कुछ फर्ज़ हैं।”

“क्या मतलब ?”

“एक शख्स को जो आपका मित्र है, उसके रुपए निकलवाने में मदद करना आपका फर्ज़ है। मुझे रुपयों की सख्त ज़रूरत है, आप जानते हैं।”

“देखिए जनाब, इस कुर्सी पर बैठने के बाद हम अपने बाप को भी नहीं पहचानते। हम सिद्धान्त के पक्के हैं।”

“मैं जानता हूँ।” मैंने पराजित होकर कहा। मैं समझ गया था कि यह बहस अनन्त काल तक चल सकती है। इसका समापन कठिन था। पहले भी ऐसी बहसें मैंने की हैं और मैं पराजित हुआ हूँ। कोई रास्ता नहीं था। कोशिश करना मेरा फ़र्ज था, मैंने पूरा किया।

“अब मैं आपसे पूछना चाहता हूँ कि मुझे पहचानने का, यह स्वीकार करने का कि मैं मैं हूँ, आप क्या लेंगे ?” मैंने करुण स्वर में कहा।

“पाँच रुपए। हमारा यही रेट है।”

“ज़्यादा है।”

“में इससे कम में किसी को नहीं पहचानता। यह मेरा सिद्धान्त है।”

“पहले आप दो रुपए में पहचानते थे।”

वह मुस्कराया और उसने मेरी ओर देखा। फिर उसने मेरा हाथ थपथपाकर भावुक स्वरों में कहा, “वे दिन बीत गए भाई साहब, जब मैं आपको दो रुपए में पहचान लेता था। गुज़र गया ज़माना। सस्ते दिन थे वे, और सरकारी दफ्तरों में इन्सान की पहचान एक-दो रुपयों में हो जाया करती थी। अब आप भी तो वह नहीं रहे, जो पहले थे। अब आप बड़े आदमी हो गए हैं। आप मशहूर हैं, दुनिया आपको जानती है। कितनी खुशी की बात है। हर इन्सान को प्रगति करना चाहिए। आप पहले इस विभाग से क्या पाते थे ? 25-50 रुपया। मगर धीरे-धीरे आपने प्रगति की और आज आप यहाँ ढाई सौ रुपया प्रति माह खींच रहे हैं। इधर मैंने भी प्रगति की है। में भी पाँच रुपए से कम में किसीको नहीं पहचानता। मेरी तो यही कामना है कि आप और आगे बढ़ें। आप विभाग को और मूर्ख बनाएँ और यहाँ से हज़ारों रुपया ड्रॉ करें। और मुझ जैसा अदना आदमी जो आप जैसे व्यक्ति को आज सिर्फ पाँच रुपए में पहचान लेता है, कल पचास और सी रुपयों में पहचाने।”

वह चुप हो गया। मैं सिर झुकाए बैठा था और वह मेरी ओर देख रहा था। कमरे का आकाश शान्त था। मैंने महसूस किया कि जो व्यक्ति एक जीवन-दृष्टि को स्वीकार कर लेता है, वह सहज में नहीं डिगता। बहस उसे डिगा नहीं सकती। वह पराजित हो सकता है मगर वह टूटता नहीं। जो उसका है, वह लेगा। उसे लेना है, मुझे देना है। एक क्रम है, जिसे भंग करना कठिन है।

चुप्पी थी। एक बर्फ-सी जम रही थी जो अक्सर लम्बी चर्चा के बाद जम जाती है। इसे शब्दों से नहीं तोड़ा जा सकता। मैंने जेब में हाथ डाला और पाँच रुपए निकाले। यही उसका रेट था। उसने हाथ बढ़ाया और ले लिए।

“और कैसा चल रहा है ? बाल-बच्चे सब मज़े में हैं न ?” उसने पूर्ण अपनत्व से पूछा।

“आपकी कृपा है।” मैंने कहा।

उसने पास रखी सरकारी तिजोरी खोली और ढाई सी रुपए निकालकर गिनने लगा ।