पुलिया पर बैठा आदमी (व्यंग्य) : शरद जोशी | Puliya pr baitha Aadmi : Sharad Joshi ke Vyangya

 

वह एक पुलिया पर बैठा हुआ था। इस पूरे क्षेत्र में यही एक जगह उसे बैठने लायक लगती है और वह अक्सर ही यहाँ आकर बैठ जाता था। शुरू-शुरू में वह पुलिया से गुज़रती कारों, साइकिलों या लड़कियों को गौर से देखता था पर अब वह ऐसा नहीं करता था। यहाँ बैठे-बैठे वह इस शहर की सब कारों, साइकिलों और लड़कियों को देख चुका था और अब उसके लिए देखने को कुछ नहीं रह गया था। फिर भी वह इस पुलिया पर बैठा रहता था। वह कोई नौकरी नहीं करता था। वह सारी उन नौकरियों को, जो नहीं मिलतीं, खोज चुका था। वह अब भी उन नौकरियों को खोज सकता था, जो नहीं मिलतीं, पर ऐसा न कर वह पुलिया पर बैठा रहता था।

एक सुबह एक नेता किस्म का व्यक्ति उसके पास आया और बोला, “क्या तुम मुझसे सवाल पूछ सकते हो ?”

“मुझे कोई सवाल नहीं पूछना।” उसने कहा।

“मैं तुम्हें सवाल बताऊँगा जो तुम मुझसे पूछोगे।”

“उससे क्या होगा ?”

“मैं जवाब दूँगा।”

“तुम खुद अपने से सवाल क्यों नहीं पूछते ?”

‘‘ऐसा नहीं होता। सवाल किसी और को करना पड़ता है। मैं जवाब दूँगा।”

“मगर मैं जवाब नहीं सुनना चाहता।”

“तुम चाहे मत सुनना। तुम सिर्फ सवाल करना।”

“मगर इस सबका मतलब क्या है ?”

“तुम्हें इससे मतलब !”

“मैं तुमसे सवाल करूँगा, जो मेरे पास नहीं है और जो मैं नहीं करना चाहता। फिर तुम मुझे जवाब दोगे जिसे मैं नहीं सुनना चाहता और जिसे सुनना ज़रूरी भी नहीं है। क्या तुम पागल हो ?”

“नहीं, मैं नेता हूँ।”

पुलिया पर बैठा शख्स नेता की ओर ताज्जुब से देखने लगा।

“तुम मेरे साथ आओ। तुम्हें सिर्फ सवाल पूछना है। इसके बदले में मैं तुम्हें रुपए दूँगा।” नेता ने उससे कहा।

“यह हुई बात !” पुलिया पर बैठा आदमी मुस्कराया, “तुम मुझे सवाल भी दोगे और वे ही सवाल करने के बदले रुपया दोगे। ऐसी हालत में हो सकता है मैं जवाब सुनना पसन्द भी करूँ। लाओ, एक रुपया दो, मैं सिगरेट की डिब्बी खरीढूँगा।”

नेता ने उसे रुपया निकालकर दिया। वह पुलिया से उठा और एक डिबिया सिगरेट और माचिस खरीद कश खींचता नेता के पीछे चल पड़ा। कुछ कदम चलने के बाद उसने नेता को रोका और कहा, “देखिए, चूँकि रुपया आप दे रहे हैं सो चाहें तो आप सवाल कर सकते हैं, जवाब मैं दे दूँगा। मैंने सुना है कि नौकरी में यही होता है कि जो रुपया देता है उसे सवाल करने का हक होता है और जिसे रुपया मिलता है उसे जवाब देना होता है ।’

“नहीं। ऐसा नहीं होगा। तुम अपना कर्तव्य मत भूलो। सवाल तुम्हें ही करना है।” और वह आगे-आगे चलने लगा।

कुछ देर बाद शहर में एक भीड़ के सामने वही नेता भाषण दे रहा था और पुलिया से उठकर आया आदमी उसी भीड़ में खड़ा था। भाषण लम्बा था और वह व्यक्ति खड़े-खड़े ऊबने लगा था। फिर भी वह बार-बार सिगरेट जलाता हुआ चुप खड़ा था। नेता ने अपना भाषण खत्म कर पूछा, “आप लोगों में से कोई व्यक्ति मुझसे कोई सवाल पूछना चाहता है ?”

सवाल करने के लिए खड़े शख्स ने समझा कि नेता उसे भीड़ में देख नहीं पा रहा है। उसने हाथ उठाकर कहा, “मैं हूँ, मैं हूँ। मैं यहाँ खड़ा हूँ। सवाल मुझे पूछना है।”

नेता अपनी खास नेतावाली अदा से मुस्कराया, “हाँ-हाँ, पूछिए, पूछिए क्या सवाल है ?”

सवाल करनेवाले शख्स ने पूछा, “पहला सवाल यह है श्रीमान कि आज़ादी के बाद हमारा देश प्रगति नहीं कर सका, हम ज्यों के त्यों बने रहे, इसका क्या कारण है ?”

नेता अपनी खास नेतावाली अदा से विचार करने लगा और फिर जैसे सोचकर बोला, “इसका कारण है कि इस देश को काबिल नेता नहीं मिले। जैसे मुझे ही लीजिए। आज़ादी के वक्त मैं एक फर्म में सेक्रेटरी था और काफी वर्ष रहा। हमारी फर्म के मालिक समझते थे कि इन नेताओं से काम चल जाएगा और देश आगे बढ़ेगा मगर इधर कुछ सालों से हमें अनुभव हुआ कि हम गलत सोच रहे थे। सेठ साहब ने मुझको बोला कि तुम नेता बनी तो उनकी आज्ञा से मैं पॉलिटिक्स में आया। और भी ऐसे नए-नए नेता आ रहे हैं। कुछ ठेकेदारी छोड़कर आ रहे हैं, कुछ कारखाना छोड़कर। इससे देश का उत्थान होगा और देश आगे बढ़ेगा। पुराने नेताओं की वजह से प्रगति नहीं हो सकी थी। अब ज़रूर होगी।”

“आप ठीक कह रहे हैं, बिलकुल ठीक कह रहे हैं, वाह वाह !”-भीड़ में से दो-तीन व्यक्ति चिल्लाए। फिर भीड़ भी नेता के इस उत्तर की प्रशंसा करने लगी।

भीड़ में खड़ा सवाल करनेवाला एकाएक चौंका और बोला,”हाँ,दूसरा सवाल यह है कि आपकी नज़र में आज देश की सबसे बड़ी ज़रूरत क्या है ?”

‘‘छोटी कार, छोटी कार !” नेता ने एकदम कहा, “उस बारे में हमारे सेठ साहब अक्सर बोलते थे कि इस देश में छोटी कार का कारखाना होना चाहिए। सबसे बड़ी ज़रूरत है। टेलीविज़न का काम फैलना चाहिए, रेफ्रीजरेटर अभी घर-घर नहीं पहुँचा, बहुत कमी है इस देश में। पब्लिक प्रोग्रेस नहीं कर रही है।”

“सच है, सच है !” भीड़ में से दो-तीन व्यक्ति चिल्लाए, “आपके विचार बिलकुल ठीक हैं।”

पुलिया से उठकर आए व्यक्ति की जेब में सिर्फ एक सिगरेट बची थी और उसने वह निकाल जला ली। तभी नेता ज़ोर-ज़ोर से पूछने लगा, “कोई और सवाल, कोई और सवाल ?”

उसने सिगरेट पीते हुए हिसाब लगाया कि वह अभी तक दो ही सवाल पूछ सका है जबकि उसने तीन सवाल दिए गए थे। वह भूल गया कि तीसरा सवाल क्या है ? नेता इधर बार-बार चिल्ला रहा था। एकाएक उसे याद आया और वह बोल उठा, “सिर्फ एक सवाल, अब सिर्फ एक सवाल रहा है कि इस समय देश में फैली बेकारी दूर करने के क्या तरीके हैं ?”

नेता ने फिर नेतावाला चिन्तक का पोज़ बनाया और बोला, “कारखानेदार को लायसेन्स देना। सेठ लोग कारखाना खोलने को लायसेन्स माँगते हैं मगर सरकार खुले हाथ नहीं देती। हमारे सेठ साहब के साथ भी यह जुलुम हुआ है। उनने लायसेन्स माँगा, सरकार ने नहीं दिया। वो बोले, कारखाना नहीं खुलेगा तो लोगों को रोज़गार कैसे मिलेगा। सच बात बोले वो । मेरा भी यही कहना है कि जब तक कारखानादार को लायसेन्स नहीं मिलेगा, देश की बेकारी दूर नहीं होगी।”

“क्या कहने, आपने समस्या को जड़ से पकड़ा है।” भीड़ में दो-तीन व्यक्ति चिल्लाए और बाद में सभी लोग बेकारी दूर करने के इस सुझाव पर विचार करने लगे।

उस शख्स के सारे सवाल खत्म हो गए थे और सिगरेटें भी खत्म हो गई थीं। नेता अभी भी पूछ रहा था, “कोई और सवाल, कोई और सवाल ?” वह शख्स चुप खड़ा नई सिगरेट की ज़रूरत अनुभव कर रहा था और उसे समझ नहीं आया कि वह अब क्या करे। इधर नेता ने उससे सीधे पूछा, “कहिए जनाब, आपको कोई और सवाल तो नहीं पूछना ?”

जेब में से खाली सिगरेट की डिबिया निकालकर उसने फेंक दी और कहा, “हाँ, सिर्फ एक सवाल है।”

“पूछिए, पूछिए, ज़रूर पूछिए।” नेता ने कहा।

“मैं सारे सवाल पूछ चुका, अब मुझे रुपया कब मिलेगा ? मुझे सिगरेटें खरीदनी हैं।”

नेता उसे नाराज़ आँखों से देखने लगा। भीड़ में लोग हँसने लगे। एकाएक नेता ने गम्भीर होकर कहा, “यह व्यक्तिगत प्रश्न है, यह एकदम व्यक्तिगत प्रश्न है। यहाँ मैं सिर्फ उन्हीं प्रश्नों के उत्तर दूँगा जो समाज और राष्ट्र की समस्याओं से सम्बन्धित हैं।”

भीड़ में से दो-तीन व्यक्ति बोले, “आप ठीक कह रहे हैं, व्यक्तिगत प्रश्न यहाँ नहीं पूछे जाने चाहिए। यह बेहूदा बात है। नेता से सामाजिक और राष्ट्रीय महत्व के प्रश्न ही पूछे जाने चाहिए।” तब भीड़ के सभी लोग कहने लगे कि यह सचमुच व्यक्तिगत प्रश्न है और नहीं पूछा जाना चाहिए था।

कुछ देर बाद वह फिर पुलिया पर आ बैठा। उसी तरह जैसे कुछ देर पहले बैठा था। वह कुछ देख नहीं रहा था, न कार, न साइकिलें, न लड़कियाँ। उसे सिगरेटें खत्म हो जाने का कुछ अफसोस था जो अब नहीं रहा। तभी दो-तीन व्यक्ति उसके पास से गुज़रे और उसे देख रुक गए।

“भीड़ में सवाल तुम ही पूछ रहे थे ?” एक ने पूछा।

“हाँ।”

वे उसे देख हँसने लगे।

“तुमने गलती की। तुम्हें रुपए का सवाल वहाँ नहीं करना चाहिए था। रुपया सभा के बाद मिलता है। देखो, हम तीनों लोग जो सवालों पर दिए जवाबों की तरीफ करने के लिए, सपोर्ट करने के लिए भीड़ में खड़े थे, अब अपना रुपया लेने नेता के घर जा रहे हैं। तुमने गलती की।”

और वे तीनों व्यक्ति तेज़ी से पैर बढ़ाते एक ओर चले गए।

पुलिया पर बैठा आदमी उन्हें जाते हुए देखता रहा। उसे समझ नहीं आया कि उसकी गलती क्या थी ? आखिर उसकी सारी सिगरेटें खत्म हो चुकी थीं और नई सिगरेटें खरीदने के लिए उसे पैसों की ज़रूरत थी। उसे समझ नहीं आया कि आखिर उसकी गलती क्या थी ?

पुलिया पर बैठा काफी देर से वह यही सोच रहा है। सामने से कारें, साइकिलें और लड़कियाँ गुज़र रही हैं।