प्रेम-कथा :प्रपत्र शैली (व्यंग्य) : शरद जोशी | Prem-Katha Praptra shaili : Sharad Joshi ke Vyangya

 

नायक का नाम -श्यामबिहारी शर्मा। कॉलेज में-श्याम शर्मा। (चुनाव के समय नारा था-श्याम प्यारे को वोट दी !) ताऊजी के क्रोधित स्वरों में-श्याआआम। माताजी की बीमार आवाज़-श्यामू। पड़ोस की लड़की बिन्नी के शब्दों में (बिन्नी के विवाह के पूर्व जिससे एकाध प्रेमपत्र का आदान-प्रदान हुआ था)-श्याम भाई साहब ! परम मित्र वह पतली मूंछों वाला दुबे नाम नहीं लेता, सिर्फ कहता है-श्रीमान या माननीय, गुरु, भाई साहब आदि।

नायक के पिता का नाम -पिता पिता होते हैं, नाम कुछ भी हो, इससे फर्क नहीं पड़ता। श्याम शर्मा के पिता भी एक रुटीन किस्म के पिता हैं। शर्माजी के नाम से मुहल्ला परिचित है।

नायक का हुलिया -(बतर्ज : गुमशुदा की तलाश)-गेहुँआ रंग (अमरीकी गेहूँ नहीं), ठोड़ी पर एक हाय दैया किस्म का मस्सा, समय पर नाई न मिल पाने के दबी हुई। प्रायः नीले पैण्ट में। उम्र बाईस वर्ष (गवाह के रूप में मैट्रिक का प्रमाण-पत्र)।

कद-4 फुट 11 इंच।

सीना-34 इंच (जब सड़क पर निकलते हैं)। 33½ इंच (जब देर रात घर में घुसते हैं)

कमर-32 इंच।

वज़न-126 पौण्ड (इन्दौर प्लेटफार्म पर रखी मशीन के अनुसार। टिकट के पीछे लिखा था-आप सौभाग्यशाली व्यक्ति हैं, क्योंकि आप आत्मनिर्भर रहना पसन्द करते हैं)।

आँखें-सामान्यत: तेज़। प्रेमिका को एक फलांग से और अन्य लड़कियों को साठ गज़ से पहचान लेते हैं।

शैक्षणिक योग्यता -बी. ए. (फाइनल)। अक्सर कहा करते हैं, यार, हम तो हिस्ट्री लेकर पछताए। पास हो जाने के प्रति आश्वस्त। प्रथम श्रेणी लाने के सिद्धान्त: विरोधी। मूल पुस्तक के बजाय नोट्स पढ़ने में विश्वास करते हैं। कबीर के कुछ दोहे, तुलसी की कुछ चौपाइयाँ मुखाग्र हैं। जब मौका लगता है, उपयोग करते हैं। जिस कक्षा में लड़कियाँ होती हैं, अपने इण्टेलिजेण्ट होने का आभास देते हैं। लड़कियों के पीछे बैठकर सुघड़ पीठ कटे हुए ब्लाउज़ से दिखनेवाला गर्दन के नीचे का भाग देखते हुए मार्शल की थियरी समझने की चेष्टा करते हैं।

नायिका का नाम -सुश्री सुषमारानी भाटिया। सहेलियों में सुरी या सुषमा चुड़ैल (बड़ी अपने को माला सिन्हा समझती है)। विशारद की परीक्षा के दिनोंप्राचीन पद्य पढ़ानेवाले ‘दुखित’ जी ने कहा था-सुषी.सूऊ.पीई (‘ष’ षट्कोण का)।

नायिका का हुलिया -थोड़ी समझ आ जाए तो राजेन्द्र यादव की कहानी की हीरोइन हो सकती है। यों वर्तमान स्थिति में कृश्न चन्दर के लिए उपयोगी। गली में कुल दस-गयारह घर हैं, जिनमें सबसे सुन्दर। (गली का पता नहीं बताऊँगा)। बदन भरा-भरा, यानी उभरा-उभरा।

कद-4 फुट 4 इंच।

सीना-36 इंच (लेखक का उदार अन्दाज़)।

कमर-35 इंच (जो भी स्थिति है, प्रस्तुत है)।

आयु-सतरह बसन्त और सोलह पतझड़ गुज़र गए। प्रमाण मैट्रिक का सर्टिफिकेट और गली के नुक्कड़ पर खड़े लड़कों की आहें।

केश-बीसियों तेल डाले पर कमर तक नहीं पहुँच गए। आजकल रूखे।

आँखें-प्रत्येक सवा इंच लम्बी। पड़ोस के लड़के जब गाते थे-’तेरे नैना मतवाले’-जाने क्यों सुषमा जी को लगता था, मुझपर ही गा रहे हैं।

शैक्षणिक योग्यता -बी. ए. (द्वितीय वर्ष)। अभी तक फेल नहीं हुई। विशारद कर चुकीं। साहित्य से प्रेम। मीरा, साहिर लुधियानवी और नीरज की भक्त।

कहानी का स्थल -इन्दौर, मध्य प्रदेश।

नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित हिन्दी विश्वकोश, प्रथम भाग, पृष्ठ 454 पर दी जानकारी के अनुसार-यह नगर खान (शिप्रा की सहायक) तथा सरस्वती नदियों के संगम पर बम्बई से 440 मील दूर उत्तर-पूर्व में स्थित है। अक्षांश 22 डिग्री उत्तर और देशान्तर 75 डिग्री 54” पूर्व। समुद्र की सतह से 1738 फुट की ऊँचाई पर 5 वर्गमील में बसा है। (प्रेम की खेती के लिए इतने एकड़ ज़मीन काफी हैं)।

मिलन का समय -सवा गयारह, तीखा (‘शाप’ का अनुवाद)।

वातावरण -लिखी हुई धूप।

मूड -अभी सिगरेट पी लेने के कारण ठीक। और सुषमारानी नए खन के ब्लाउज़ के फिटिंग पर स्वयं मुग्ध (पीन वार का टुकड़ा सवा तीन रुपए।

मिलन की प्रतिक्रिया -नरवस सिस्टम पर हल्के मीठे प्रभाव !

प्रथम उद्गार -हलोऽऽ !

उद्गार करनेवाला -श्यामबिहारी शर्मा।

अन्य वार्तालाप -(यहाँ लेखक प्रेमचन्द जी की सलाह मानता है। ‘राम-नमस्ते’, ‘श्याम-नमस्ते’, ‘तुम कहाँ जा रहे हो ?’ ‘

मैं मन्दिर जा रहा हूँ।’ ‘तुम कहाँ जा रहे हो ?’

‘मैं मन्दिर जा रहा हूँ।’-के स्थान पर यह कहना उचित है कि ‘परस्पर अभिवादन कर राम और श्याम ने मन्दिर की राह ली’)।

परस्पर आँखें मिला सुषमा और श्याम शर्मा ने रेस्तरॉ की राह ली।

वार्तालाप के समय मनस्थितियाँ -पहले पाप के रोमांचक भाव दोनों के मन में। तथाकथित लज्जा से लोफरपन का मधुर मिलन। ‘लोक लाज खोयी किस्म के शहीदाना विचार। मात्र ढाई फुट की दूरी से नज़रें मिलना अपने-आपमें उपलब्धि, अतः क्षण की ऐतिहासिक महत्ता का पूरा-पूरा एहसास। अकारण हँसी और अर्थहीन वाक्य। किसी परभिाषा से बौद्धिक नहीं।

खाली स्पेस के बाद कहानी में नया वातावरण।

समय -उसी शाम ।

स्थान -छावनी की सड़क।

पात्र -श्याम शर्मा और पतली मूंछोंवाला दुबे।

प्रसंग -सुबह (सवा ग्यारह, तीखा) वाली घटना। लहजा इन्दौरी-तत्व कम, वार्तालाप अधिक।

श्याम शर्मा -मैं तो जा रहा था कि कोई नाई की दुकान मिले तो कटिंग कराऊँ पर वह कहते हैं ना कि ‘कर्ता के मन कछु और है और दाता के कछु और’ तो भाई साहब महात्मा गांधी रोड पर, अग्रवाल स्टोर के बाजू में सुषमारानी भाटिया खड़ी थी। पहले तो मैंने सोचा कि कट मारकर जेल रोड से निकल जाऊँ, मगर ‘विनाशकाले विपरीत बुद्धि ! क्या करें ! बढ़ गए सीधे। हुआ यह कि मैं अपनी पॉलिसी तय करूं उसके पहले उसने मुझे देख लिया। मैंने सोचा, यार जब ज़ालिम ने देख ही लिया है तो रिस्पॉन्स’ देना पड़ेगा। सो मैं मुस्कराया। अब डर यह कि मैं मुस्कराऊँ और वो नहीं मुस्कराए तो श्रीमान अपनी पोज़ीशन खराब होती है। मगर आपकी कृपा और गुरुजनों के आशीर्वाद से वह भी मुस्कराई।

दुबे -(विद्वतापूर्ण चिन्तन की मुद्रा में)-ज्ञानियों ने ठीक ही कहा है, ‘हँसी सो फंसी ।’

श्याम शर्मा -और गयारह बजे का वक्त भाई साहब ! लड़की की जात तब यों ही शबाब पर रहती है, क्योंकि नल साढ़े दस तक बन्द हो जाते हैं और तब तक वह नहा लेती है। मैंने आव देखा न ताव और फौरन मन ही मन में शे’र दुहराया ‘हाय तेरी काफिर जवानी जोश पर आई हुई वाला। हालाँकि शेर पुराना है, मगर मज़ा दे गया। वक्त की बात है श्रीमान।

दुबे -बड़े अफसोस की बात है, आपको वह शेर क्यों नहीं याद आया जो मैंने सुनाया था ‘यही कोई पन्दह या सोलह का सिन, जवानी की रातें मुरादों के दिन’ वाला।

श्याम शर्मा -उसकी एनाटॉमी पर फिट नहीं बैठता यह शे”र आपका । याद करने का सवाल ही नहीं।

(पाठकों के लिए उचित होगा कि एनाटॉमी के सन्दर्भ में प्रारम्भ में दिए हुलिया सम्बन्धी आँकड़े फिर से देख लें।)

दुबे -मैं सहमत नहीं श्रीमान, परिप्रेक्ष्य बदलिए तो शेर बराबर फिट बैठेगा। साहित्य स्वयं दृष्टि देता है।

श्याम शर्मा -साहित्य अवश्य दृष्टि देता है, मगर शाम के पाँच बजे के बाद देता है। दिन को गयारह बजे भाई साहब आपकी अपनी दृष्टि से काम चलाना पड़ता है।

दुबे -खेर, फिर क्या हुआ ?

श्याम शर्मा -फिर क्या, मुस्कराई। अब मुस्कराई तो मैंने सोचा, यार मुस्करा तो रही है मगर पास जाएँ और पलटी मार दे, ‘हलो’ कहो और जवाब बोल के नहीं दे तो इन्सान ने क्या करना ? और कैसा करना ? रिस्क आ गई सामने । सोचा, यार ज़रा इसे ‘हली’ बोल के तो देखा। फिर क्या, मैंने रिस्क ले ली श्रीमान।

दुबे -ठीक किया अपने। इन्सान मौका चूकता है, तो बाद में खामोखाह विलाप करता है और सीन बिगड़ता है।

श्याम शर्मा -मैंने ‘हली’ कहा। और जवाब में उसने क्या कहा, पता है ? उसने भी कहा ‘हलो।’

दुबे -यही उम्मीद भी थी।

श्याम शर्मा -और वह हलो कोई ऐसा-वैसा ‘हलो’ नहीं था, जो मैंने कहा।

दुबे -मतलब नहीं समझा श्रीमान का।

श्याम शर्मा -दुबे जी, आप मौके की नज़ाकत को समझिए। आप ऐसे वक्त मुझसे यह उम्मीद तो नहीं करते कि मैं एक साधारण टेलीफोन वाला ‘हलो बोलूंगा। नहीं। मैंने ‘ह’ को थोड़ा दाबा और ‘लो’ को लम्बा खींचकर ले गया। ‘लो’ में थोड़ा माधुर्य और थोड़ा प्रेम मिलाना आवश्यक था। लड़की पहन-ओढ़कर घर से निकली है और प्रभावित करना माँगती है। भाई साहब, में प्रभावित हो लिया। और कहना न होगा कि अभी तक हूँ।

दुबे -भई, इस हाथ दे उस हाथ ले की मसल है। लड़की उसीका रोब मानती है, जो उसका रोब मानता है। तू मुझको परी बोल, मैं तुझको राजकुमार बोलूं।

श्याम शर्मा -आपको पता नहीं, आप बहुत अच्छा वाक्य बोल गए।

दुबे -मुझे पता है। इस सप्ताह में मैंने पाँच-छह अच्छे वाक्य बोले हैं। कभी अवसर मिला और आपने समय दिया तो आपको सुनाऊँगा।

श्याम शर्मा -मेरा सौभाग्य होगा श्रीमान।

दुबे -अब विषयवस्तु को आगे बढ़ाइए।

श्याम शर्मा -जी हाँ। तो मैंने हलो के ‘ली’ में माधुर्य मिला के खींचा और उसका असर भी हुआ। असर यह कि उसने जवाब दिया। मगर मैंने माधुर्य की पॉलिसी को बदलना उचित समझा। चाय के लिए प्रस्ताव साधारण रूप से मार दिया। कुछ यों कि पीती हो तो पी और नहीं पिए तो छुट्टी कर। पीछे-पीछे चली आई श्रीमान आपके सेवक के।

दुबे -एकान्तवास होना। थोड़ा एकान्तवास ज़रूर होना। बगीचे में हो, कॉफी हाउस में हो, कहीं हो, पर प्रेम के मामले में थोड़ा एकान्तवास होना।

श्याम शर्मा -कलेजे पर पत्थर रखकर और सुनो एक खुशखबर।

दुबे -शर्मा जी, आपके नाम का एक स्थायी पत्थर कलेजे पर रख रखा है मैंने। आप कहें एक और रख लूँ।

श्याम शर्मा -घर आने का निमन्त्रण दे गई है।

दुबे -इष्ट मित्रों सहित…!

श्याम शर्मा -जी नहीं। सिर्फ मुझे जाना है।

दुबे -कब जा रहे हैं आप ?

श्याम शर्मा -नीला पेण्ट ड्रायक्लीन हो जाए।

प्रकृति वर्णन -साँझ गहरा गई है। दिन-भर उमस-सी थी। शाम एक बदली ने सब कुछ ढक-सा दिया। अच्छा-सा लगने लगा। मन करता था, बदली बरस जाए।

किसका मन करता था -सुषमारानी भाटिया का।

कारण एवं मनोदशा -वह छत पर चढ़ी हुई बड़ी देर तक कुछ न कुछ देखती रही। नीचे जाना चाहकर भी नहीं जा रही थी। बार-बार श्याम (बाबू) याद आ रहे थे। वह भुलाने का यत्न करती, पर भुला नहीं पाती। इधर कुछ दिनों से दिखे नहीं। घर पर भी नहीं आए। कुछ खोये-खोये रहते हैं। आज लायब्रेरी से निकल रही थी तो सहसा सामने पड़ गए। वह चौंक-सी गई थी। वह कुछ नहीं बोला। वह भी नहीं बोल सकी। अभी लगता है कि वह कहीं आ जाए। उसकी सायकिल की घण्टी की आवाज़ वह पहचान जाती है। पर अभी घर के नीचे कोई घण्टी नहीं बज रही। वह नीला पैण्ट ! वह याद करने लगी। आसमान इस गहराती हुई शाम में कुछ ज़्यादा नीला लग रहा था।

रोमांस के क्षण -कुल 4225 क्षण अर्थात् एक घण्टा दस मिनट पच्चीस सेकण्ड।

स्थान -सुषमा जी का स्टडीरूम।

वातावरण -परिवार के जन अनुपस्थित। छोटे भाई की उपस्थिति नगण्य। ‘तुम्हारी परीक्षाएँ आ रही हैं, पढ़ते क्यों नहीं-इतनी डॉट पर सम्पूर्ण गतिविधियों पर विराम ।

(1)

वार्तालाप -आज तुम बहुत अच्छी लग रही हो !

हिश् !

कसम से।

(2)

हाथ छोड़िए !

नहीं छोडूँगा।

मैं रो दूँगी।

रो दो। एक बार रो दो।

मैं रोऊँगी तो क्या आपको अच्छा लगेगा ?

सुषी ! (ष षट्कोण का)

(3)

मैं तुम्हारा हूँ

.......................!

मैं तुम्हारा हूँ सुषमा।

श्याम !

सुषी ई ! (ई, ईश्वर का)

प्रतिक्रिया- (नायक पर)

दुबे जी, बस यह समझो कि जितने भी उपन्यास, कहानियाँ, कविताएँ बाँचने का मौका पड़ा, सब एक घण्टे में काम आ गए। बिलकुल अँग्रेज़ी पिक्चर का सीन खड़ा कर दिया श्रीमान।

(नायिका पर)

सब सो गए हैं और मैं तुम्हें पत्र लिख रही हूँ। क्यों लिख रही हूँ, नहीं जानती। उस शाम तुम आए और चले गए, पर इस एक घण्टे में मेरा जीवन कितना बदल गया ! तब से अब तक मैं उसीकी याद में खोई हुई हूँ। क्या वह सब सपना था ? नहीं, वह सपना नहीं था।…आदि-आदि इत्यादि।

एक वक्तव्य हीरो के बाप का-

इसलिए पढ़ाया-लिखाना था कि बड़े होकर अपने बाप की नाक कटवाएँ। हम समझते थे कि साहबज़ादे पढ़ने जा रहे हैं, मगर नहीं, वे तो ऐश फरमाने जा रहे थे। शादी करेंगे तो सुषमा से करेंगे, कहते हुए शर्म नहीं आई। अरे, अभी तो हम ज़िन्दा हैं। हम मर जाएँ, फिर घर में नाच नचवाना। कोई कहने-सुननेवाला नहीं रहेगा। जब तक हम हैं, यह सब नहीं चलेगा। खबरदार जो उस लड़की का नाम आगे से लिया। इस घर में पैर नहीं रखने दूँगा।

और एक वक्तव्य हीरोइन की माँ का-

मैं यही तो कहूँ कि ये शाम को बन-सँवर के जाती कहाँ है ! उस गुण्डे के पास। घर पर आता था तो कैसा शरीफ बनता था ! और यह चुड़ैल भी कहती थी, माताजी बहुत भला है। इसे क्यों नहीं भला लगेगा ! ब्याह रचाने की जो सोच रखी थी। मैं कहती हूँ, तू पैदा होते से क्यों नहीं मर गई। आज मुँह दिखाने लायक नहीं रखा।

आवाज़ हीरो की- अब तुम बताओ दुबे, मैं क्या करूँ ? यह निष्ठुर समाज…।

आवाज़ दुबे की - आप अपना स्वास्थ्य ठीक रखें श्रीमान।

शर्मा की- मगर क्यों ! जब सारा समाज अस्वस्थ है तो में ही क्यों स्वस्थ रहूँ।

दुबे की- इसलिए कि वे ही अच्छे प्रेमी अन्ततः सिद्ध होते हैं, जिनका स्वास्थ्य अच्छा हो।

शर्मा की- आप दुबे जी फिर अच्छा वाक्य बोल गए।

दुबे की- यह अच्छे वाक्यों का युग है।

ये अच्छे वाक्य कहाँ बोले जा रहे थे- दुबे जी के घर पर।

बोलनेवालों की हालत क्या थी- गरम भजिए खा रहे थे।

बोलनेवालों का मूड कैसा था- जैसा प्राय: भजिए खाते समय लोगों का रहता है ।

शर्मा- आप मुझे मार्गदर्शन नहीं दे रहे, दुबे जी ?

दुबे- मार्ग आपने स्वयं चुना है, स्मरण करें।

शर्मा- समाज मुझे उस मार्ग पर जाने नहीं देता।

दुबे- समाज से आपका तात्पर्य अपने पिताजी से है ?

शर्मा- जी हाँ। और सुषमा की माताजी से भी।

दुबे- बस, तो आप नए समाज की रचना में जुट जाइए। शर्मा-कैसे ?

शर्मा- कैसे

दुबे- स्वास्थ्य अच्छा रखिए।

शर्मा- में क्या करूँ?

दुबे- और भजिए लीजिए।

शर्मा- उफ् !

दुबे- तो शादी क्यों नहीं कर लेते श्रीमान ?

शर्मा- जानते हैं, शादी का क्या नतीजा होगा ?

दुबे- नई पीढ़ी।

शर्मा- यह बाद की बात है। शादी का अर्थ होगा परिवार से सम्बन्ध- विच्छेद।

दुबे- शादी से परिवार बनता है श्रीमान, टूटता नहीं।

शर्मा- आप पुन: अच्छा वाक्य बोल गए।

(पर समस्याएँ अच्छे वाक्य बोलने से सुलझतीं तो डायलॉग लिखने- वाले मसीहा हो जाते। ऐसा नहीं होता। यह प्रपत्र एक कहानी का है, किसी रेडियो नाटक की बात होती तो हीरो के लम्बे भावावेश भरे वक्तव्य के बाद दो मिनट तक काष्ठ-तरंग बजा लेखक समस्या को सुलझा देता। ऐसा नहीं है।

यह कहानी है जिसमें रुहीन हीरो, ठेठ हिन्दी के ठाठवाली हीरोइन और साहित्य की अमर परम्परा से प्राप्त पिताजी हैं। इस कहानी का कोई भी अन्त हो सकता है, क्योंकि ऐसी घटनाओं के अलग-अलग तरह के अन्त होते हैं। अत: लेखक अपने पाठकों के लिए निम्नलिखित अन्त इस कहानी के सुझा रहा है। जिस पाठक को जो अन्त रुचे उसपर निशान लगाकर शेष को छाँट दे।- लेखक)

(1) नगर में किसी सन्त-नेता का आगमन। हीरो के पिता और हीरोइन की माता का हृदय परिवर्तन। विवाह के लिए स्वीकृति।

(2) किसी विदेशी राज्य द्वारा भारत के पवित्र सीमान्त पर आक्रमण। हीरो का फौज में सेकण्ड लेफ्टिनेण्ट बनना। घायल अथवा शहीद हो जाना। हीरोइन द्वारा अन्त में आसमान का देखा जाना।

(3) हीरो की किसी फर्म में बड़ी नौकरी। शादी कर लेना। बाद में यह देख कि बेटा काफी कमा रहा है, पिताजी की नाराज़ी दूर करना। हीराइन का पक्की बहू हो जाना।

(4) हीरोइन का किसी लखपती से शादी कर हीरो को भुला देना। हीरो द्वारा सामान्य क्लर्की कर लेना। कभी-कभी याद करना।

(5) ‘इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में अवश्य मिलेंगे’-यह कार्यक्रम निश्चित कर दोनों का ज़हर खा लेना।

(6) दोनों का बम्बई भाग जाना और शादी कर लेना। दोनों को फिल्म में नौकरी। फ्लैट, कार आदि।

(7) दोनों का विवाह कर लेना और घर से निकाले जाना। बाद में पिताजी द्वारा यह समाचार सुनने पर कि उन्हें पोता हुआ है, क्रोध शान्त होना और बेटे-बहू को स्वीकार कर लेना।

[कहानी के सात अन्तों में जिन पाठकों ने जिस क्रमांक पर निशान लगाया है, उन पाठकों की प्रवृत्तियाँ निम्न अनुसार हैं- (1) आदर्शवादी, (2) राष्ट्रवादी, (3) दक्षिणपन्थी, (4) वामपन्थी, (5) आस्तिक, (6) नास्तिक, (7) मानवतावादी।]