मुद्रिका-रहस्य (व्यंग्य) : शरद जोशी | Mudrika-Rahasya : Sharad Joshi ke Vyangya

 

उन दिनों विक्रमादित्य के दरबार में ले-देकर कवि कालिदास की ही चर्चा होती थी। ‘शाकुंतल’ के प्रदर्शन की तैयारियाँ सरकारी तौर पर चल रही थीं और श्लोकों के उच्चारण, अर्थ एवं रस को लेकर सारा दिन कर्मचारियों में चखचख चलती रहती। राजा विक्रम को उन दिनों कोई काम नहीं था। परम शत्रु शक पराजित हो चुके थे और सातवाहन का उदय नहीं हुआ था। इधर-उधर सेनाएँ भेजकर वह काफी हद तक चक्रवर्ती हो चुके थे और सभी ओर पृथ्वी के स्वामी के नाम से बजते थे। राजाओं के लिए ऐसा समय कला और साहित्य की चर्चा और कामशास्त्र के निर्णयों पर अपने अनुभवों के आधार पर विवेचन करने के लिए उपयुक्त रहता है। नृत्य के मज़े लिए जाते और पद्मिनी की तलाश में सिंहल जाने के मनसूबे बनते। हरामखोर विदूषकों को ऐसे दिनों अक्सर ओवरटाइम करना पड़ता, क्योंकि राजा उन्हें छोड़ता नहीं। सिंहल न भी जाएँ, आसपास के क्षेत्रों में विहार को तो जाते ही। कवि कालिदास ऐसे सभी समय साथ चिपके रहते। उनकी प्रतिभा का बड़ा हल्ला था। संस्कृत सिखाने के बहाने विक्रम की बेटी प्रियंगुमंजरी से उनका रोमांस चल रहा था। कुल मिलाकर सुखद घटनाओं वाले वे अच्छे दिन थे। उज्जयिनी नगरी फल-फूल रही थी। व्यापार एवं आवागमन बढ़ गया था। तिकड़मी आदमी थोड़ी कोशिश कर रास्ता निकाल लेता था।

तब ‘अभिज्ञानशाकुंतल’ की मात्र दो प्रतियाँ पाई जाती थीं। एक कालिदास की अपनी प्रति और इसकी वह सुसज्जित प्रति, जो उन्होंने राजा विक्रमादित्य को भेंट की थी। और प्रतियाँ कराने के आदेश दे दिए गए थे। भोजपत्रों का ढेर एक कमरे में इकट्ठा कर दिया गया था। काम चालू था।

ठीक उन्हीं दिनों क्षीरसागर से महाकाल मन्दिर तक जानेवाले उज्जयिनी के व्यस्त मार्ग पर एक पुस्तक-विक्रेता हर शाम बैठता था, जिसके आसपास सदैव ग्राहकों की भीड़ लगी रहती। उसके पास कामशास्त्र, सती नारियों के चरित्र, दुर्गा स्तोत्र, राजा गर्दमिल की कथा के अतिरिक्त घुंडीराज जासूस के कारनामों की विभिन्न पुस्तकों की माँग बढ़-चढ़कर रहती थी। दिन-भर दरबार में बैठे कालिदास की कविताओं का गुणगान करनेवाले दरबारी भी जब घर लौटते, तो फुटपाथ से ऐसी एक जासूसी पोथी खरीद लेते और वस्त्रों में छुपाए घर ले आते। विक्रम की रानियाँ भी चुपके से वे पुस्तकें मँगवातीं और तकियों के नीचे छुपाकर रखतीं। जब राजा आखेट को जाते, रनिवास में इन किताबों का सामूहिक पाठ होता।

इन जासूसी पुस्तकों का रचयिता कालिदास की तरह सम्मानित नहीं था। एक गरीब ब्राह्मण, जो प्रतिमाह अपनी बुद्धि से एक ऐसी जासूसी पुस्तक लिख देता और बदले में फुटपाथ के दुकानदार से कुछ मुद्राएँ प्राप्त कर लेता। कहा जाता था कि लेखक को गुरु का शाप है कि तेरी विद्या ख्यातनाम होगी, पर अमर नहीं हो सकेगी। इसके पीछे एक घटना थी-जब वह आश्रम में पढ़ता था, तब गुरु को प्रात: पुष्पहार लाकर देनेवाली क्षुद्र जाति की युवती के साथ उसने कुकर्म किया था, जिसकी शिकायत कुछ दिलजले ब्राह्मणों ने गुरु से कर दी थी। गुरु ने शाप देकर उसे आश्रम से निकाल दिया। बिचारा युवक जानता था कि आश्रम से निकाले जाने के कारण अब उसे राजपक्ष से तो सम्मान मिलेगा नहीं। वह छोटी-छोटी पुस्तकें लिखकर कमाने लगा। उसके लिखे घुंडीराज जासूस के कारनामे चल निकले और पब्लिक में उसकी माँग होने लगी।

इन जासूसी पुस्तकों के पात्र होते थे राजा, मन्त्री, नगर के जुआरी, शराबी, राजा का लंपट साला, भैरवनाथ के पुजारी, जौहरी के बेटे, सराय की छबीली भटियारिनें, दासियाँ, तंबोलनें, गणिकाएँ, विषकन्याएँ और शत्रु-राज्य में रूप धरकर आए व्यापारी। सारा घटनाक्रम सनसनी-खेज़, हैरतअंगेज़, यानी रोम-रोम को केंपा देनेवाला होता था। अन्त बताया नहीं जाता था, प्रारम्भ समझ नहीं आता था, यानी जब तक पुस्तक समाप्त न हो, चैन नहीं मिलता था।

वास्तव में इन कृतियों का नायक घुंडीराज जासूस अपने-आपमें एक अद्भुत चरित्र था। कुशल ऐयारों की तरह अनेक प्रकार से वेश बदलना जानता था, कभी जोगी, कभी सामन्त, कभी बहेलिया और कभी अभिसार हेतु जाती कड़े-छड़े बजाती सुन्दर युवती। उसके पास एक अद्भुत मणि थी, जो अन्धकार में प्रकाश करती थी। उसकी तलवार आवश्यकता न होने पर तह की जा सकती थी। वह पशु-पक्षी और कीड़ों की आवाज़ें मुँह से निकाल लेता था। अनेक भाषाएँ जानता था। साँप-बिच्छू काटे का मन्त्र उसे सिद्ध था और पक्षियों की परस्पर बातचीत समझ लेता था। वह अपनी कमर में हमेशा एक पतली रस्सी बाँधे रहता, जिसमें फन्दे लगाकर कभी वह भागते अपराधी को पकड़ता, ऊँचे झरोखों पर चढ़ जाता या कुएँ में लोटा डाल पानी खींच लेता। सारे छलछिद्रों और खटकरम में परम आचार्य होने पर भी वह जासूस घुंडीराज स्वभाव से धार्मिक था। ऐसे ही कामों में मदद करता, जिससे न्याय की रक्षा हो और राजा उसे पुरस्कार दे। उसका हर काम सफल होता था, जैसाकि किताबी जासूसों का होता है।

लेखक के अनुसार जब घुंडीराज जासूसी चक्कर में जाता, एक काष्ठ का सन्दूक साथ लिए रहता था, जिसमें एक ऐसी अद्भुत कल लगी थी कि सिवाय घुंडीराज के उसे कोई नहीं खोल सकता था। निश्चय ही लेखक का तात्पर्य ताले से होगा। इस सन्दूक में वक्त-ज़रूरत लगनेवाला सभी सामान रहता था, जैसे चेहरा रंगने का रंग-रोगन,ताँबे का अष्टकोणी प्रतिबिंब, नकली दाढ़ी-मूँछें, प्रेत-बौतालों का स्वरूप बनाने के लिए मुखौटे, तेज़ फलक का चाकू, बेहोशी दूर करने के लखलखे, गोरोचन,तुलसी की पत्ती, कुँआरी कन्या का काता सूत, नील कमल की जड़, तिरफला पाउडर, शेर की चरबी, गाय का असली घी, ततौया का डंग, पंचांग, कस्तूरी, मयूर की शिखा, हिरन के सींग का बाजा, सत्तू, गुड़, गंगाजल, चूना, सुपारी, केश काढ़ने की कंघी, रुद्राक्ष की माला, संखिया, चकमक, व्याघ्रचर्म, पानी पीने का लोटा, कौड़ियाँ, मुद्राएँ, पूजन का सामान और ओढ़ने की चादर। इन सारे सामानों से लैस जासूस उस ज़माने में किसी भी समय कुछ भी कर सकता था। घुंडीराज हृष्ट-पुष्ट और सुन्दर व्यक्ति था। वह गले में ताज़ा फूलों की माला डाले रहता। सुन्दर मोटा जनेऊ धारण करता और बाँह में स्वर्ण का कंकण बाँधता। वह रतिकला में कुशल और स्तम्भन में प्रवीण था। गणिकाएँ उससे सहवास के लिए वर माँगती और टोटके करती थीं। वह भी अनेक स्त्रियों से सम्पर्क रखता था। कुल मिलाकर वह अपने समय का जेम्स बांड था। यदि वह गण्डासे से किसी की हत्या करता तो अपराधी नहीं माना जाता था। राजा ने प्रसन्न होकर उसे अभयमुद्रिका दे रखी थी।

सो उन दिनों जब विक्रमादित्य के दरबार में कालिदास के ‘अभिज्ञानशाकुन्तल’ की बड़ी चर्चा थी, तब घुंडीराज जासूस के कारनामों की सिरीज़ का एक नया प्रकाशन हुआ-’मुद्रिका-रहस्य उर्फ असली किस्सा कुमारी शकुन्तला का’। जिसने बिक्री के सभी पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए। भोजपत्र पर जितनी नकलें तैयार होतीं, शाम को बिक जातीं। चालू भाषा में लिखी इस पुस्तक का आरम्भ कुछ यों था–

श्री गणेशाय नमः । अथ ‘मुद्रिका-रहस्य’ की कथा लिखता हूँ सो सुनो। प्रात:काल की मनोरम बेला थी। ब्राह्मणजन पवित्र सरिताओं में स्नान कर नित्य के अनुसार भीख माँगने निकल गए थे। क्षत्रियजन अपनी तलवारें चमका रहे थे और विचार कर रहे थे, आज किस दिशा में जाकर किस शत्रु से लड़ा जाए। वैश्यजन अपनी तराजू का सन्तुलन गड़बड़ कर रहे थे। शूद्रजन शासन को कोसते हुए सफाई कार्य में व्यस्त थे। केवल रात्रि के श्रम से थकी गणिकाएँ एवं चोर ही इस समय तक बेखबर सो रहे थे। ऐसे समय नित्य की भाँति चतुरों में चतुर शिरोमणि जासूस घुंडीराज प्रात:कर्म से निवृत हो अपने कक्ष में आ विराजे थे। रेशम के परिधान धारे, गले में श्वेत पुष्पों की माला पहने तथा अपनी स्वस्थ भुजाओं में कंकण बाँधे वे ऐसे सुन्दर दृष्टिगोचर हो रहे थे मानो कामदेव और इन्द्र के मिले-जुले अवतार हों।

कोमल शुभ्र आसन पर विराजने के तुरन्त उपरान्त उन्होंने अपने प्रिय सहचर चतुराक्ष को बुलाकर कहा–”ओ चतुराक्ष, कल दिन नगर में कौन-कौन-सी विशेष घटनाएँ घटीं, सो सुना।”

चतुराक्ष उतावला हो रहा था। हाथ जोड़ कहने लगा–”“स्वामी, कल महाराजा दुष्यन्त के दरबार में विचित्र घटना घटी।”

“क्या, क्या, जल्दी कह, मैं जिज्ञासु हुआ जाता हूँ।”

“एक युवती, जिसका नाम शकुन्तला बताते हैं, जो कण्व के आश्रम में पली है, कल कुछ निगोड़े साधुओं के साथ दरबार में आई और राजा से बोली कि तुम मेरे पति हो सो मुझे ग्रहण करो।”

“सो केसे ?”

“कहती थी, तुमने कण्व ऋषि के आश्रम में आकर मेरे साथ गन्धर्व विवाह किया है।”

“इस पर राजा ने क्या कहा?”

“राजा ने कहा– ‘हे देवी, गन्धर्व विवाह की भली चलाई, मैं तो तेरे दर्शन ही पहली बार कर रहा हूँ। तू है कौन ?’”

“फिर क्या हुआ ?”

“तिस पर वह रूपगर्विता आश्चर्य व्यक्त कर अपने भाग्य को कोसती प्रलाप करने लगी कि हाय-हाय, देखो, आज मेरा पति ही मुझसे विमुख हुआ जाता है !”

“राजा ने युवती से प्रमाण नहीं माँगा ?”

“माँगा, पर युवती शकुन्तला ने कहा, ‘अब तो मेरे पेट का गर्भ ही प्रमाण है, क्योंकि जो मुद्रिका तैने दी थी, वह खो गई। ’ ”

“गर्भ तो कोई प्रमाण नहीं हुआ !”

“यही तो राजा ने कहा।”

घुंडीराज और चतुराक्ष परस्पर बातचीत कर रहे थे कि सेवक ने आकर निवेदन किया कि वल्कल वस्त्र धारे एक युवती आपसे मिलना चाहती है।

“लो चतुराक्ष, लगता है वही आई है जिसकी हम चर्चा कर रहे हैं। अब शेष कथा उसीसे सुनूँगा। तू टोह में रहना कि अब राजा क्या करता है एवं नगर में क्या प्रवाद फैल रहा है ?”

“जो आज्ञा।”

उपरान्त घुंडीराज ने सेवक को कहा कि युवती को कक्ष में बुलाए एवं आसन दे।

शकुन्तला आई और प्रणाम कर बैठ गई। घुंडीराज शकुन्तला का सौन्दर्य देख ठगे-से रह गए और विचारने लगे कि यदि कण्व के आश्रम में ऐसा माल भरा है तो वहाँ एक बार अवश्य जाना चाहिए।

“आप आश्रमवासिनी प्रतीत होती हैं।” घुंडीराज ने शकुन्तला से कहा।

“सचमुच, जैसा मैंने सुना था, आप बड़े चतुर हैं। आपने कैसे अनुमान किया कि मैं आश्रमवासिनी हूँ ?”

“कोई कठिन नहीं। वल्कल वस्त्र पहनने और कान में कुण्डल डालने का चाव अब नगर की स्त्रियों में नहीं रहा, परन्तु आश्रम-कन्याओं एवं भीलनियों में अभी ऐसा रिवाज शेष है। मैंने इसी से पहचाना।”

“आश्चर्य है।”

“आप दक्षिण दिशा से आई हैं ?”

“हाँ, हाँ, पर यह आपने कैसे पहचाना ?”

“कोई कठिन नहीं,” घुंडीराज ने कहा, “पवन का वेग इन दिनों दक्षिण से उत्तर की ओर है तथा आपके केश उड़-उड़कर कपाल और कपोल पर जम गए हैं। आप चिन्तित प्रतीत होती हैं।”

‘‘आप ठीक कह रहे हैं। में अपनी चिन्ता के कारण ही आपसे सहायता लेने आई हूँ।”

“निर्भय होकर मुझे सच-सच बताइए।”

“मेरा नाम शकुन्तला है और मैं कण्व ऋषि के आश्रम में…”

“माता-पिता ?”

“माता मेनका है, जो इन्द्र के अखाड़े में नाच करती है। पिता ऋषि विश्वामित्र हैं। जब वह तपस्या कर रहे थे, तब इन्द्र ने मेरी माँ…”

“अच्छा-अच्छा, वह काण्ड, हाँ, मैंने सुना है। तो तुम मेनका की पुत्री हो। तुम्हारी अम्माँ के तो बड़े चर्चे हैं। खैर, अपनी कहो।”

“कण्व के आश्रम में ही मैं पली हूँ। कुछ माह पूर्व आश्रम में राजा दुश्यन्त का आगमन हुआ। उन्होंने मुझसे गन्धर्व विवाह का प्रस्ताव किया। ऋषि थे नहीं और प्रतीक्षा के लिए समय नहीं था, सो मैंने स्वीकार कर लिया।”

“इस आयु में प्राय: ऐसा हो जाता है।”

“जो भी हो, हमारा विवाह हो गया। पर कल जब कण्व के घर से विदा होकर यहाँ आई, तो मेरे पति राजा दुष्यन्त ने मुझे पहचानने से इनकार कर दिया।”

‘‘आपने याद नहीं दिलाई। राजा लोग यात्रा में यहाँ-वहाँ विवाह कर लेते हैं और राजधानी आकर भूल जाते हैं। पर आप जैसी सुन्दरी को एक बार देखकर कोई भूल जाए, सहसा विश्वास नहीं होता !”

“सिर्फ देखा ही नहीं, मैं उनकी विवाहिता हूँ, उनके होने वाले शिशु की माता।”

“यह तो दुखद प्रसंग है। आपके पास कोई प्रमाण नहीं ?”

“एक मुद्रिका राजा ने दी थी, सो खो गई।”

कुछ देर चुप विचार करने के बाद घुंडीराज ने कहा, “बताइए, मैं आपकी क्या सेवा करूं ?”

“आप बड़े जासूस हैं। आपने कई मामलों को सुलझाया है। कण्व-आश्रम के ब्रह्मचारी लड़के वेदपाठ को छोड़ आपके किस्से सुनाते रहते हैं। यदि आप इस रहस्य का पता लगा सकें कि राजा दुष्यन्त मुझे क्यों भुला रहे हैं और किसी तरह इस विपत्ती से निकाल मुझे रानी बनवा दें, तो मैं आपको मुँहमाँगा धन दूँगी।”

घुंडीराज ने इस हेतु पूरा उद्योग करने का वचन शकुन्लता को दिया और विदा कर दिया।

शकुन्तला के जाने के बाद धुंडीराज ने अपने सहचर चतुराक्ष को आवाज़ दी। वह तुरन्त आ खड़ा हुआ।

“मामला कुछ समझ नहीं आ रहा। शकुन्तला का बयान सच है या राजा को फँसाने के लिए तिरिया चरित्र कर रही है ? यदि ऐसा है, तो पता नहीं, इसमें किसका हाथ है ?कण्व का तो नहीं ?यह अजीब बात है कि दुष्यन्त को शकुन्तला का स्मरण क्यों नहीं ?वह सचमुच भूल रहा है या नाटक कर रहा है ?क्या यह वही शकुन्तला नहीं, जिससे वह आश्रम में मिला था ? अथवा यह वह दुष्यन्त नहीं ? फिर वह व्यक्ति कौन था, जो कण्व की अनुपस्थिति में आश्रम में गया-दुष्यन्त राजा का रूप धरे, और कुमारी शकुन्तला का कौमार्य भंग कर चला आया ? पर वह ‘छल्ला निशानी’ के बतौर राज-मुद्रिका भी तो दे आया था। वह कहाँ गई ? हो सकता है, शकुन्तला को दुष्यन्त के यहाँ जाता देखकर उसी व्यक्ति ने राज-मुद्रिका गायब करवा दी हो, जो आश्रम में दुष्यन्त का रूप धरे गया था। समझ नहीं आता।”घुंडीराज जासूस इतना कहकर कक्ष में घूमते हुए विचार करने लगे।

कुछ देर बाद वे चतुराक्ष से बोले, “सुनो, इस मामले की हर कोण से छानबीन करनी पड़ेगी। तुम जाओ और राजा के भवन पर जाकर किसी तरह इस सत्य का पता लगाओ कि क्या कुछ माह पूर्व वास्तव में राजा दुष्यन्त कण्व के आश्रम गया था ?”

“जो आज्ञा,” कहकर चतुराक्ष चला गया।

चतुराक्ष ने रथ लिया और राजा के महल की ओर चल पड़ा। राजा का सारथी उसका परिचित था। यों ही नमस्कार-चमत्कार के संबंध । उस समय वह रथ पर बैठा तांबूल चर्वण कर रहा था। चतुराक्ष ने अपना रथ समीप ही रोका और सहज रूप से सारथी से पूछा, “कहो मित्र, कहीं गए नहीं, यहीं हो ?”

“कहाँ जाएँ, हम तो राजा के अनुचर हैं। वह जहाँ जाना चाहेगा, वहीं जाएँगे।”

“सो तो ठीक है, पर तुम राजा को हमेशा शिकार के लिए ही ले जाते हो। कभी ऋषियों के आश्रम की भी सैर करा लाया करो।”

“क्यों कया बात हैं ?”

“कल कुछ साधू व्यर्थ ही राजा के विरुद्ध बक रहे थे कि सदैव मृगया को ही जाता है। कभी सन्तों-ऋषियों के दर्शन को नहीं जाता।”

“गलत बकते हैं। राजा प्राय: साधुओं के आश्रम पर जाते हैं। सिद्धजोगी के मठ पर तो पन्द्रह दिनों में एक बार जाते ही हैं।”

“कहाँ है यह मठ ?”

“कण्व आश्रम के मार्ग में ही है। तीन-चार माह हुए, राजा कण्व आश्रम भी गए थे। पर तब ऋषि वहाँ नहीं थे। राजा कुछ प्रहर रुके और चले आए। रात हो गई थी। हमें लौटती बेला सिद्धजोगी के आश्रम में रुकना पड़ा। राजा को यह आश्रम पसन्द आया। तभी से वहाँ प्राय: जाते हैं। झूठ बकते हैं साधू लोग।”

“दुष्ट हैं। बताओ, ऐसे प्रतापी राजा ऋषियों के दर्शन नहीं करेंगे, तो उनका यश कैसे फैलेगा ?” चतुराक्ष ने तुरन्त रथ बढ़ाया और इधर-उधर का चक्कर मारकर घर आ गया ।

यह निश्चित हो जाने पर कि दुष्यन्त वास्तव में कण्व के आश्रम गया था, घुंडीराज को शकुन्तला के बयान में सन्देह नहीं रह गया था। पर उन्होंने सोचा कि एक बार कण्व के आश्रम में चक्कर लगाना व्यर्थ नहीं होगा। हो सकता है, वहाँ कोई सुराग मिले। यों भी जब से शकुन्तला को देखा, घुंडीराज कण्व ऋषि के आश्रम जाना चाहते थे, अतः जल्दी ही वे आश्रम की ओर चल पड़े। चतुराक्ष रथ चला रहा था।

आश्रम के बाहर रथ रोक घुंडीराज अन्दर घुसे। दोपहर हो गई थी। कुछ लड़कियाँ आश्रम के द्वार के पास वाले वृक्षों को सींच रही थीं और आपस में इतरा-इतराकर बातें कर रही थीं। वास्तव में यह इन लोगों की पुरानी आदत थी कि दूर से किसी पुरुष को आता देख ये पेड़ों को पानी देने के बहाने आश्रम-द्वार के पास आ जातीं और ऐसे सहज बनी रहतीं, जैसे किसी को देखा ही नहीं हो। घुंडीराज कुछ देर इन्हें ताकते रहे, फिर आगे बढ़े।

“सुन्दरियो, क्या यही कण्व ऋषि का आश्रम है ?”

“इस भीषण जंगल में और किसका आश्रम होगा ?”–प्रियंवदा नामक आश्रम-कन्या ने ठण्डी साँस लेकर और बिलकुल शास्त्रीय अंदाज़ से चितवन के तीर चलाते हुए कहा, “आप कौन हैं, महाशय ?”

“मैं घुंडीराज हूँ। कण्व ऋषि से मिलने आया हूँ।”

“हाय, हाय, आप घुंडीराज हैं ! मर गई मैं तो ! आपके विषय में बहुत सुना है। चलिए, उधर लता-गुल्मों में चलें। विहार करेंगे।” प्रियंवदा ने अपना घड़ा एक ओर फेंका और पास आ गई।

“मुझे अभी गन्धर्व विवाह का समय नहीं है,” घुंडीराज ने कहा।

“गन्धर्व विवाह नहीं, कोई और शैली सही, चलिए तो। क्या आप विवाह की राक्षस शैली पर विश्वास करते हैं कि कन्या की मज़ीं भी नहीं पूछी और बलात्...एँ ?”

“नहीं-नहीं, मैं यहाँ ऋषि से मिलने आया हूँ।”

“यदि ऐसा है तो प्रतीक्षा करनी होगी। ऋषि बाहर गए हैं।”

“ये तुम्हारे कण्व ऋषि हमेशा बाहर ही रहते हैं। जब राजा दुष्यन्त आया तब भी बाहर थे ?” घुंडीराज ने पूछा।

“शकुन्तला के सौभाग्य से, नहीं तो यह बुड्ढा तो हमें किसी से नहीं मिलने देता।”

“सौभाग्य या दुर्भाग्य ? जानती नहीं, दुष्यंत ने शकुंतला को स्वीकार नहीं किया।”

“अरे दुष्यन्त का बाप स्वीकार करेगा, शकुन्तला उसके धुर्रे बिखरे देगी। कण्व के आश्रम की लड़की है, मज़ाक है ! दुष्यन्त जैसे बहुत आए यहाँ गन्धर्व विवाह कर बाद में इनकार करने वाले, मगर कोई नहीं बच सका। एक बार गले में झूल गई, तो ज़िन्दगी-भर नहीं छोड़ेगी। दुष्यन्त समझता क्या है अपने को ?”

घुंडीराज लड़कियों का मुँह देखने लगे। भगवे और पीले रंग के कछौटे कसे, कान में कुण्डल डाले, आश्रम में पली वे स्वस्थ लड़कियाँ गोल बनाए खड़ी थीं। उन्हें देखकर यह सोचना कठिन था कि एक बार गन्धर्व विवाह कर इनसे पीछा छुड़ाया जा सकता है !

इतने में कण्व आते नज़र आए। अब सब लड़कियाँ भागकर यहाँ-वहाँ छुप गईं।

कण्व पुराने ऋषि थे, खुर्राट। बीस-पच्चीस सालों से आश्रम चलाते थे और अच्छी रकम बना लेते थे। शिक्षा देने के बदले शिष्यों से आस-पास के जंगल की लकड़ियाँ कटवाना, खेती करवाना,गाय–ढोर पलवाने,सब्जी-फल उगवाने के कार्य लिए जाते थे। ज़मीन आश्रम के नाम पर मुफ्त थी। परिश्रम भी मुफ्त हो जाता, सो सालाना रकम अच्छी बन जाती थी। राजा और धनाढ्य लोगों से रकम दान में मिल जाती थी। शिष्यों को गुरु-दक्षिणा देनी पड़ती। यदि वे गरीब होते, तो बाद में नौकरी कर चुकाते।

कण्व से जब घुंडीराज ने बातचीत की, तो वह बड़बड़ाने लगे–”क्या बताएँ, हमारे आश्रम में ऐसे मामले साल में एक-दो हो ही जाते हैं ! आप ही सोचिए, मैं क्या कर सकता हूँ ! क्या आठों पहर निगरानी रखूँ ? नगर के छोकरे आकर आश्रम के चक्कर काटते हैं, सीटी बजाते हैं, गुण्डे कहीं के ! आज के ज़माने में शान्ति से आश्रम चलाना मुश्किल हो गया है। पहले ऐसा नहीं था। और किसीको क्या कहें, खुद राजा दुष्यन्त को लीजिए। यहाँ आया और उस छोकरी के साथ, क्या नाम है उसका...?”

“शकुन्तला।”

“हाँ, शकुन्तला, वही, जिसे मेनका छोड़ गई थी और मैंने पाल-पोसकर बड़ा किया। पाखण्डी विश्वामित्र, बड़े ऋषि बनते हैं, राजाओं के यहाँ जाकर बड़ी रकम मारते हैं, एक लड़की को नहीं पाल सकते ! अभी एक यज्ञ में मिल गए थे। मैंने शकुन्तला वाला मामला उठाया। मैंने कहा, छोकरी का ब्याह करना है, रुपया दो। सोलह साल से तुम्हारी बच्ची पाल रहे हैं, क्या मतलब होता है ? तो बोले, मैं तो उस प्रसंग को भुला चुका हूँ। वह मेरी बच्ची नहीं, अब तुम्हारी बच्ची है। मैंने कहा, बुड्ढ़े, ऋषि होकर तुझे शरम नहीं आती। मेनका के साथ मज़े मारने के लिए आप, और औलादें पालने के लिए हम ! धूर्त तपस्या का ढोंग करता है ! एक औरत सामने आ गई, तो लँगोटी खुल गई ! यहाँ बरसों से आश्रम चला रहे हैं, कोई किस्सा नहीं हुआ। पर आप बताइए घुंडीराज जी, मैं इन बाहर से आने वालों का क्या करूं ? मैं राजा दुष्यन्त की बात कर रहा था। वह शकुन्तला से गन्धर्व विवाह कर चला गया। में थोड़ी देर को बाहर गया था, लौटकर आया तो पता लगा।”

“इससे आश्रम की बदनामी होती है,” घुंडीराज ने कहा।

“अरे छोड़िए।लोग पैदा करके यहाँ-वहाँ बच्चे छोड़ जाते हैं। उनकी बदनामी नहीं होती और मैं उन्हें आश्रम में पाल-पोसकर बड़ा करता हूँ, तो बदनामी होती हैं क्या कहने !”–कण्व गुर्राए, “इसलिए इस बार मैंने शकुन्तला को छोड़ने जानेवाले शिष्यों को कह दिया था कि अगर राजा स्वीकार न करे, तो इसे यहाँ वापस मत लाना, वहीं छोड़ आना। आप सोचिए घुंडीराज, मैं ऋषि हूँ। आखिर मुझे दुनिया में और भी काम हैं।”

“वह मुद्रिका नहीं मिल रही, जो राजा दुष्यन्त ने शकुन्तला को दी थी ?” घुंडीराज ने पूछा।

“अरे, इन बातों में क्या रखा है ! पाँच हाथ की औरत सामने खड़ी है, उसे तो पहचाना नहीं, मुद्रिका पहचान लेगा ! कैसी बात करते हैं !” कण्व बोले, “फिर भी हम इतना बता दें कि अँगूठी यहाँ नहीं खोई है, रास्ते में गायब हुई है। मुझे तो लगता है, शकुन्तला के साथ गए इन साधुओं ने वह राज-मुद्रिका चुरा ली और नगर में बेच दी। आज प्रातः वे लोग आए हैं। मैं इन दुष्टों से पूछ रहा हूँ कि शकुन्तला को दरबार में तुम लोगों ने भी उसी दिन छोड़ दिया फिर चार दिनों से कहाँ गायब थे ? साले जवाब नहीं दे रहे !”

कुछ समय बाद, जब कण्व से बातें कर घुंडीराज आश्रम से निकलने लगे, तो द्वार के पास एकाएक किसी ने उनका मुँह कसकर दाब दिया और आँख पर पट्टी बाँधी दी। पीछे से किसी ने कटार-सी चुभोकर कहा, “चुपचाप चले चलिए, जासूस महोदय !”

कुछ दूर इसी तरह ले जाने के बाद उन्हें एक स्थल पर बिठा दिया गया। तब पट्टी खोली गई। चारों तरफ आश्रम-कन्याएँ खड़ी हँस रही थीं।

कहना न होगा कि उस दिन बिना गन्धर्व विवाह किए जासूस धुंडीराज कण्व आश्रम से बाहर नहीं आ सके।

कण्व आश्रम में धुंडीराज का काम नहीं बना। सिवाय प्रियंवदा के कोई विशेष उपलब्धि नहीं हुई। रथ में बैठे धुंडीराज यही सोच रहे थे। चतुराक्ष रथ चला रहा था। धुंडीराज जो भी काम हाथ में लेते थे, सफल होते थे। पर उन्हें लगा, इस बार वह सफल नहीं होंगे। शकुन्तला को अस्वीकार करने में सिवाय राजा की अनिच्छा के कोई कारण नज़र नहीं आता। जिस तरह कण्व आश्रम में लड़कियाँ घेरकर पकड़ती हैं, हो सकता है, दुष्यन्त भी इस तरह शकुन्तला के घेराव में आ गए हों और स्वाभाविक है, वह अब शकुन्तला से पीछा छुड़ाने के चक्कर में हों। पर राजा की उपस्थिति में लड़कियों ने ऐसा दुस्साहस नहीं किया होगा। घुंडीराज यही सोचते हुए जा रहे थे कि उनका रथ सिद्धजोगी के प्रसिद्ध आश्रम पर जा पहुँचा और तभी चतुराक्ष को दूर से आते राजा के रथ की ध्वजा दिखाई दी।

“शायद राजा दुष्यन्त आ रहे हैं,” चतुराक्ष ने कहा।

“इधर कैसे ? क्या कण्व आश्रम ?”

“कण्व आश्रम नहीं, सिद्धजोगी आश्रम। उस दिन सारथी ने बताया कि पन्द्रह-बीस दिनों में एक बार राजा सिद्धजोगी आश्रम अवश्य जाते हैं।”

‘‘ऐसा कितने दिनों से चल रहा है ?”

“तीन-चार माह से।”

“आश्चर्य है। कण्व आश्रम, जहाँ शकुन्तला थी, वहाँ जाने का समय दुष्यन्त नहीं निकाल पाए, पर उसी के समीप सिद्धजोगी आश्रम वे प्राय: जाते रहे। यह चक्कर क्या है ? लगता है, चतुराक्ष, इसमें कुछ रहस्य है। तू रथ को लता-वृक्षों की ओर में ले ले।”

राजा दुष्यन्त का रथ आया और सिद्धजोगी के आश्रम के मार्ग पर चला गया। सन्दूक से कतिपय आवश्यक वस्तुएँ ले हमारे घुंडीराज भी वृक्षों में छुपते आश्रम की ओर बढ़े।

यहाँ हम अपने प्यारे पाठकों को बता दें कि सिद्धजोगी का मठ पुराना है। घने वृक्षों की ओट में बने इस विशाल मठ के चारों ओर मज़बूत परकोट है, जिसपर यहाँ-वहाँ त्रिशूल गाड़े साधू चिलम पीते दिखाई देते हैं। मठ में सर्व साधारण का प्रवेश निषिद्ध है। अन्दर शिष्यों तथा साधुओं का बड़ा समूह रहता है। मठ के पास अपार सम्पति है और दूर-दूर तक प्रभाव। अनेक स्त्रियाँ भी वहाँ रहती हैं, जो विभिन्न योग क्रियाओं में साथ देती हैं। जासूस धुंडीराज जब अपनी प्रिय तलवार, जिसे वह जब चाहें तह कर सकते थे, वस्त्रों में छिपाए आश्रम के परकोटे के पास पहुँचे, तब तीसरा प्रहर हो चुका था। वह लुकते-छिपते परकोटे के चारों ओर घूमने लगे। वास्तव में वह एक ऐसे स्थान की तलाश में थे, जहाँ से वह मठ में सरलता से प्रवेश पा सकें। काफी खोजबीन करने पर उन्हें एक ऐसा स्थान मिल हो गया। घुंडीराज ने तुरन्त अपनी कमर में बँधी पतली रस्सी को खोला और फन्दा बनाकर परकोटे पर फेंका, जो एक बुर्जी से अटक गया। घुंडीराज फुर्ती से ऊपर चढ़ गए। अब वह एक ऐसी जगह पहुँच चुके थे, जहाँ से मठ के अन्दर का नज़ारा साफ-साफ दिखाई देता था। उन्होंने चारों तरफ नज़रें घुमाकर स्थिति का मुआयना किया। उन्होंने रस्सी समेटी और परकोटे से धीरे-धीरे चलते हुए उस स्थान पर पहुँच गए, जहाँ मठ की छत थी। छत पर वह सम्भलकर पैर रख रहे थे। घुंडीराज जानते थे कि यदि कोई खतरा हुआ, तो वह नीचे कूद सकते हैं।

छत पर एक स्थान से धुआँ निकल रहा था। शायद मठ का रसोई घर होगा, घुंडीराज ने सोचा, पर झाँकने पर कुछ और ही नज़ारा दिखाई दिया। धुआँ एक कक्ष के बीच बने कुण्ड से आ रहा था। पास ही व्याघ्र चर्म पर लम्बी दाढ़ी में शोभित एक योगीराज बैठे थे। पास ही एक सुन्दरी पंखा झलकर ठण्डक पहुँचा रही थी। योगीराज के सामने हाथ जोड़े राजा दुष्यन्त बैठे थे। घुंडीराज समझ गए कि यही दिव्य व्यक्तित्व वह सिद्धजोगी हैं, जिनके नाम पर मठ चलता है। राजा दुष्यन्त आजकल इनका ही भक्त हो रहा है।

“सुना, कण्व के आश्रम से कोई छोकरी आई थी तुम्हारी रानी बनने,” योगीराज एकाएक गम्भीर स्वरों में बोले।

“हाँ, पर मैंने पहचानने से इनकार कर दिया,” दुष्यन्त ने कहा।

“शाबास !” और पंखा झलनेवाली लड़की की ओर देखकर बोले, “वह स्थान तो हमारी माया के लिए सुरक्षित है।”

दुष्यन्त के चेहरे पर मुस्कराहट आ गई। उसने माया की ओर देखा। अब घुंडीराज का ध्यान भी माया की ओर गया। निश्चित ही वह शकुन्तला से सुन्दर थी। घुंडीराज के सामने एकाएक सारी स्थिति स्पष्ट हो गई। चूँकि राजा दुष्यन्त माया को रानी बनाना चाह रहे थे, इसी कारण शकुन्तला को टाल गए हैं।

“राजकोष में कितना धन है ?”“ सहसा योगी ने पूछा।

“बड़े परिमाण में है, मैं अनुमान नहीं लगा सका,” दुष्यन्त ने उत्तर दिया।

“नवमी को तुम जितना अधिक धन सम्भव हो, लेकर यहाँ आ जाओ। उसी रात्रि बलि होगी, फिर तुम निष्कंटक राज करो। तभी हमारी माया रानी बनेगी।” योगी ने आदेश के स्वरों में कहा।

“जैसी आज्ञा,” दुष्यन्त ने उत्तर दिया।

“अब तुम जाओ। पंचमी को हमसे आकर मिल लेना। यदि हमें लौटने में देर हो, तो प्रतीक्षा करना।”

दुष्यन्त प्रणाम कर उठ खड़ा हुआ। घुंडीराज झाँकना बन्द कर हटे। पर तभी छत से पैर हटाने के कारण खटका हुआ।

“कौन है छत पर ?”-योगीराज का स्वर सुनाई दिया।

“वही होगा, घुंडीराज !”“-माया ने कहा और उसकी हँसी के स्वर आए।

घुंडीराज के हाथ-पैर फूल गए। क्या उनका छुपकर आना माया को पता लग गया ? पर वह तो तब से पंखा झल रही है। फिर वह कैसे जान गई ? कुछ भी हो, अब यह स्थान जल्दी छोड़ देने में ही खैर है। तुरन्त एक जगह रस्सी का फन्दा अटका, वह दीवार के सहारे नीचे उतरने लगे। तभी एकाएक उतरते समय घुंडीराज को एक कराह सुनाई दी। किसी व्यक्ति की करुण कराह-’शकुन्तले’...शकुन्तले !’ घुंडीराज ने प्रयत्न किया कि यह आवाज़ कहाँ से आ रही है, पता लगाए, पर वह नहीं जान सके। फिर से मठ में घुसना तत्काल सम्भव नहीं था।

रथ नगर की ओर लौटने लगा। मामले को पूरी तरह समझकर भी वह नहीं समझे थे। कई गुल खिलने बकाया हैं। अनेक गुत्थियाँ हैं। योगीराज राजा दुष्यन्त से राजकोष के विषय में क्यों पूछ रहे थे ? दुष्यन्त ने कहा कि वह धन का अनुमान नहीं लगा सके ! राजा को पता रहता है, धन कितना है। यह धन क्या माया नामक सुन्दरी को प्राप्त करने के लिए दिया जा रहा है ? यह माया कौन है ? उसे घुंडीराज के छत पर होने का पता कैसे लगा ? योगीराज ने कहा, नवमी की रात बलि होगी। किसकी बलि होगी, जिसके बाद राजा दुष्यन्त निष्कंटक राज करेंगे ? और वह शकुन्तला का नाम लेकर कराहता हुआ स्वर किसका था ?

चतुराक्ष ने बताया कि पीछे से राजा का रथ आ रहा है। उनके आगे अपना रथ दौड़ना असम्मानजनक होता। चतुराक्ष ने रथ एक ओर खड़ा कर दिया। राजा दुष्यन्त उनका मित्र है। वे दोनों एक ही आश्रम में पढ़े हैं। राजा ने प्राय: घुंडीराज को बुलाकर गूढ़ मामलों में सलाहें ली हैं। कई बार वह राजा से पुरस्कार पा चुके हैं। वह घुंडीराज के साहस और जासूसी प्रतिभा के प्रशंसक रहे हैं। जब भी राजा से वह मिलते, वह कुशल-क्षेम के दो वचन अवश्य पूछता।

पर इस बार कुछ विचित्र हुआ। राजा को देख घुंडीराज ने झुककर प्रणाम किया। राजा ने प्रणाम का उत्तर दिया, वैसे ही जैसे सामान्य प्रजाजनों को दिया जाता है और आगे बढ़ गए-अपरिचित-से। राजा के जाने के बाद घुंडीराज ने चतुराक्ष से कहा, “इस राजा को क्या अपने सभी प्रियजनों को भुला देने की बीमारी हो गई है ?”

चतुराक्ष हँस दिया।

जासूसों में आदत होती है कि किसी भी मामले को हाथ में लेने के बाद शुरू में कुछ अर्थहीन तरीके से हाथ-पैर मारते हैं और दिग्भ्रमित-सा अनुभव करने लगते हैं पर बाद में एकाएक किसी तार्किक निर्णय पर पहुँचकर या महज़ साहस से एक ऐसी हरकत कर बैठते हैं, जो उन्हें मामले की उस गहराई तक पहुँचा देती है, जहाँ से उनका और पाठक का वापस लौटना कठिन होता है। ‘मुद्रिका-रहस्य उर्फ असली किस्सा कुमारी शकुन्तला का’ में भी यही हुआ।

दोपहर का समय। महाराज दुष्यन्त अपने कक्ष में बैठे अंगूर खा रहे हैं। तभी एक अनुचर आकर निवेदन करता है कि प्रतिष्ठानपुर से उनके व्यापारी मित्र और बालसखा आनंदवर्धन आए हैं और दर्शनों को उत्सुक हैं।

“आने दो...”“ राजा ने एक क्षण सोचकर उत्तर दिया।

कुछ समय बाद कीमती वस्त्र धारे एक हँसमुख युवक राजा के कक्ष में आया। उसके हाथ में एक छोटी-सी गठरी थी। राजा दुष्यन्त उठे और आदर से उसे अपने पास बिठाया।

“कहो मित्र, कब आना हुआ ?” -राजा ने पूछा।

“मैं कल ही आया,”-युवक आनन्दवर्धन ने उत्तर दिया।

“और कहो, सब ठीक है ?”

“हाँ, इस बार मैं वह वस्तु ले आया हूँ, जिसके लिए आपने मुझसे कहा था।”

राजा ने आश्चर्य से देखा। इच्छा हुई कि पूछे, कौन-सी वस्तु है ? पर अपने मनोभावों को रोकते हुए वह बोले, “अच्छा, यह तो प्रसन्नता की बात है। बताओ कहाँ है ?”

युवक ने राजा के कान के पास मुँह लाकर धीरे से कहा, “असली शिलाजीत है। दस घोड़ों की शक्ति आ जाएगी। पर यहाँ नहीं, उद्यान में चलो। उपयोग की विधि भी समझानी होगी।”

असली शिलाजीत का नाम सुन राजा की आँखों में चमक आ गई। हाय, हाय, कहाँ मिलता है असली शिलाजीत ! दस घोड़ों का बल और माया जैसी रानी ! राजा तुरन्त उठे।

यहाँ हम पाठकों को बता दें कि राजा दुष्यन्त का उद्यान किसी भी भाँति स्वर्ग के उद्यान से कम नहीं। अनेक स्थलों पर ऐसे शीतल कुंज बने हैं, जिनमें छुपे प्रेमियों को बाहर से कोई नहीं देख सकता। राजा और उसके पूर्वजों ने अनेक बार इन कुंजों में रानियों, दासियों और नगर की कुमारिकाओं के साथ विभिन्न लीलाएँ की हैं। ऐसे ही एक कुंज में जाकर आनन्दवर्धन ने कहा, “कई बार आपने कहा, यार, असली शिलाजीत दिलवाओ…पर मैं बहुत यत्न करने पर भी नहीं पा सका। पर इधर सौभाग्य से मुझे यह मिल गया।” यह कहते हुए आनन्दवर्धन ने छोटी-सी गठरी खोली और एक सफेद बुकनी हाथ में लेकर कहा, “देखो, कैसी सुगन्ध है।” राजा ने बुकनी को सूँघा कि एकदम उसका सिर चक्कर खाने लगा और वह गिर पड़ा।

कुछ समय बाद उद्यान के एक कुंज से किसी पक्षी की आवाज़ आई उत्तर में उद्यान की दीवार के पार से दूसरे पक्षी की आवाज़। कुछ देर बाद दीवार फाँदकर एक युवक अन्दर आया, जिसे हम चतुराक्ष के नाम से जानते हैं। उसे देखकर आनन्दवर्धन नामक युवक ने, जो और कोई नहीं, हमारे प्रिय जासूस घुडीराज ही हैं, कहा, “मुझे निश्चय हो गया था कि राजा का रूप बनाए यह कोई दुष्ट ही है। राजा का प्रतिष्ठानपुर में आनन्दवर्धन नामक कोई मित्र नहीं, पर यह, जो दुष्यन्त का नाटक कर रहा था, असली शिलाजीत के नाम पर यहाँ तक चला आया, मूर्ख !”

“अब मुझे क्या आदेश है ?” -चतुराक्ष ने पूछा।

“इसे गठरी में बाँध घर ले जाओ और नीचे कोठरी में कैद कर सख्ती से पहरे में रखो।”

“और आप?”“

“मैं तब तक राजा का वेश बनाकर प्रयत्न करूंगा कि असली दुष्यन्त का पता लगे। तुम पंचमी को राजा के सारथी का वेश बना, सिद्धजोगी मठ के मार्ग में मिलना।”

पंचमी के दिन घुंडीराज, जो अब दुष्यन्त का वेश रखे थे, रथ लेकर प्रात: ही सिद्धजोगी के मठ चले गए। सारथी साथ नहीं लिया। मार्ग में चतुराक्ष सारथी का वेश बनाए खड़ा ही था। उसने अपना पद सम्भाल लिया। सिद्धजोगी नहीं थे। घुंडीराज को ऐसे ही अवसर की प्रतीक्षा थी। वह कक्ष में चले गए और सोचने लगे कि रहस्य तक पहुँचने के लिए क्या किया जाए ? वह इस उधेड़बुन में लगे ही थे कि पास के कक्ष में उसी लड़की माया का स्वर सुनाई दिया, “कही धुंडीराज, क्या हाल है ?”

दुष्यन्त का वेश रखे घुंडीराज का चेहरा फक हो गया। यानी यह देवी उसका रहस्य जानती है। तो ठीक है, ओखली में सिर दिया, तो मूसलों का क्या डर। पहले इस स्त्री से ही सुलझ लिया जाए। वह साहस के साथ धड़धड़ाते हुए पास के कक्ष में घुस गए।

“अरे, तुम कब आए ?”“–माया ने, जो बैठी हुई एक काले रंग का बिल्ले को सहला रही थी, पूछा।

“अभी चला आ रहा हूँ।”

माया ने तभी बिल्ले को हाथों से छोड़ दिया और बोली, “जाओ घुंडीराज, आश्रम के चूहे पकड़ो।”

दुष्यन्त का वेश रखे घुंडीराज की जान में जान आई। तो इन दुष्टों ने अपने बिल्ले का नाम घुंडीराज रख रखा है ! इसी कारण उस दिन भी उन्हें पोल खुलने का डर लगा था ।”

“तुम तो सचमुच राजा लगने लगे !” माया ने कहा।

“पता नहीं, यह राजयोग कब तक रहेगा !”“

“अरे, तुम्हें क्या सन्देह ? अजीब हो ! आज से चार दिन बाद तो राजा दुष्यन्त की देवी के सामने बलि दी जाएगी, फिर तुम ही राजा हो। किसी को पता भी नहीं लगेगा।”

“राजा दुष्यन्त ?”–वह हँसे।

“दिन-भर पड़ा हुआ ‘शकुन्तले-शकुन्तले’ चिल्लाया करता है। मूर्ख, यह भी नहीं जानता कि मौत उसके सिर पर है।”

“उसे देखा जाए।”

“आओ, अभी सिद्धजोगी के आने में देर है।” माया ने योगीराज के कक्ष से चाबी निकाल एक गुप्त द्वार खोला। दुष्यन्त का रूप धरे घुंडीराज माया के पीछे कुछ अँधेरी सीढ़ियों से उतरे और लम्बे गलियारे से चलते हुए एक कोठरी में पहुँचे, जहाँ एक कैदी बँधा हुआ था।

“कहो राजा दुष्यन्त, क्या हाल है ?”–माया ने कैदी को ठोकर मारते हुए कहा। तभी उसने अनुभव किया कि उसकी पीठ में एक कटार चुभ रही है और साथ में आए दुष्यन्त ने उसका मुँह कसकर पकड़ रखा है। घुंडीराज ने माया के हाथ-पैर बाँध उसे कोने में पटक दिया। फिर कैदी के बन्धन काटते हुए कहा, “मैं हूँ घुंडीराज, आप निश्चिन्त रहें, मैं आपको छुड़ाने आया हूँ।”

मुद्रिका-रहस्य उर्फ असली किस्सा कुमारी शकुन्तला का’ नामक घुंडीराज जासूस के कारनामों की सिरीज़ के सोलहवें पुष्प का अन्तिम अध्याय वैसा ही सुखान्त था जैसाकि इस क्रम की सभी कथाओं का रहा था। घुंडीराज और चतुराक्ष द्वारा सिद्धजोगी के मठ से असली राजा दुष्यन्त को लेकर भागना, राजा के सैनिकों द्वारा मठ घेरा जाना, त्रिशूल और तलवारों की लड़ाई, खून, गिरफ्तारियाँ, प्राण-दण्ड और अन्त में सही किस्से का राजा दुष्यन्त द्वारा उद्घघाटन, कि जब वह शकुन्तला से प्रथम बार मिलकर नगर लौट रहे थे, तब मार्ग में सिद्धजोगी आश्रम में रात्रि में ठहरे। तभी जोगी ने उन्हें गिरफ्तार कर अपने शिष्य को दुष्यन्त बनाकर भेज दिया, जिससे धीरे-धीरे राजकोष पर कब्ज़ा कर सकें।

और अन्त में एक छोटी-सी घटना। राजा द्वारा सम्मानित होकर जब हमारे प्यारे जासूस घुंडीराज अपने निवास पर पहुँचे, तभी उनके प्रिय अनुचर चतुराक्ष ने आकर बताया, “स्वामी, वल्कल वस्त्र धारे एक युवती, जो कण्व आश्रम से आई है और अपना नाम प्रियंवदा बताती है, शयन-कक्ष में आपकी प्रतीक्षा कर रही है। उसका कहना है कि मैं जासूस घुंडीराज की भार्या हूँ, क्योंकि मुझसे कण्व आश्रम में उनका गन्धर्व विवाह हुआ है।”

यह सुनकर हमारे हीरो पर क्या गुज़री इसका अनुमान लगाने का कार्य पाठकों पर सौंप ‘अभिज्ञानशाकुन्तल’ की टक्कर में फुटपाथ पर खड़ा अपने ज़माने का ‘बेस्ट सेलर’ ‘मुद्रिका-रहस्य उर्फ असली किस्सा कुमारी शकुन्तला का समाप्त हुआ।