कैसा जादू डाला (व्यंग्य) : शरद जोशी | Kaisa Jadoo dala : Sharad Joshi ke Vyangya

 

‘बैरन ने ए ए ए !’ गायक ने एक हाथ उठा लम्बा सुर खींचा और झटके से नीचे हाथ ला आगे गाया-’कैसाआ जादू डाला’, और उसीके साथ तबलेवाले की उँगलियाँ चेतन हो चलने लगीं। श्रोता झूमने लगे।

मैं स्वयंसेवक की नम्रता लिए पीछे की सीट पर बैठा था। टॉर्च मेरे हाथ में थी। यदि कोई प्रवेश करता तो मैं उसी समय टिकट नम्बर देख उसे सीट बता देता। मगर अब आनेवालों की संख्या कम हो रही थी। गायक अभोगी कान्हड़ा में एक चीज़ पहले सुना चुका था, जिसे श्रोताओं ने बहुत पसन्द किया था। तभी विश्वास हो गया था कि कार्यक्रम सफल होगा और संस्था को लाभ के साथ प्रतिष्ठा भी मिलेगी। बड़े-बड़े नेता कार्यक्रम में आए थे, जिनमें कुछ विरोधी दल के भी थे।

‘बैरन ने ए ए, होओ, बैरन ने ए ए ए...!’ गायक ने अपेक्षाकृत लम्बी तान ली और किसी ऊँचाई पर जाकर अटक-सा गया। मगर तुरन्त वहाँ से लोप हो वह एकदम नीचे के सुरों में उतरा और उसने वही शिकायत प्रस्तुत की-’कैसाआ जादू डाला !’ इसमें ‘कैसा’ थोड़ा बारीक था, मगर ‘जादू डाला’ एकदम स्पष्ट था। फिर जल्दी ही वह सिर्फ ‘कैसा’ पर आकर ठिठक गया और बार-बार, अलग-अलग तानों में ‘कैसा-कैसा” करने लगा। जैसे-के एएसा, कैसाआआ, केएसाआ, आआकैसा, कैकै सासा, कैसा-कैसा और इसी प्रकार से अन्य वैरायटियाँ। कुछ मिलाकर उसका तात्पर्य था कैसा ? हाऊ ? उसके स्वरों में बैरन के जादू की पीड़ा अत्यन्त गहराई से व्यक्त हो रही थी। वह ‘कैसा’ कहता और लोग सहज ही उस जादू को समझ जाते। वह प्रश्न-भर कर रहा था, मगर जिस गहराई से प्रश्न कर रहा था, उत्तर स्पष्ट था ।

मुझे लगा कि किसी छोटे-से आँगन में एक उपेक्षित नायिका विलाप कर रही है। वह घर की कुण्डी लगाकर महल्ले की तीन-चार सखियों को जमा कर रो रही है, बिलख रही है और बता रही है कि बैरन ने कैसा जादू डाला है ? जाने कैसा ? गायक कैसा के ‘सा’ को ज्यों ही खींचता, उपेक्षित नायिका की पीड़ा आँगन की सीमा तोड़ती हुई सारे मोहल्ले में फैल जाती। मैं सोच रहा था कि बाई को इसमें रोने-चिल्लाने की क्या बात है ? यह तो होता ही है। जब तक तेरा बस चला, तूने क्या कम जादू डाला ! तूने तो उस बेचारे को यों बाँध लिया था कि न दाएँ हिल सकता था न बाएँ। बरसों वह सिर्फ तेरी खातिर अटका रहा और उसने इधर-उधर ताक-झाँक तक नहीं की, जो पुरुषों का जन्मसिद्ध अधिकार है। यदि आज वह किसी दूसरी के जादूपाश में बँध गया है, तो खिलाड़ी भावना से काम ले। वह उपेक्षित नायिका मेरे सामने होती, तो में उसे विस्तार से समझाता, पर वह नहीं थी। सामने एक पक्का गायक था, जो अपने गाने में मगन था ।

हॉल के पिछले द्वार से एक जोड़ा प्रविष्ट हुआ। मैंने आगे बढ़ टॉर्च से उनका सीट नम्बर देखा। वही था जिस पर मैं बैठा था। अर्थात् मेरी सीट गई। वे अपनी जादूगरनी को लिए बैठ गए। मैं स्वयंसेवक की नम्रता से दरवाज़े के पास खड़ा हो गया। हाउस फुल हो चुका था। स्पष्ट था कि जब तक पक्का गाना चले, संस्था की सेवा के नाम पर मुझे खड़ा रहना होगा। मैंने चारों तरफ नज़र दौड़ाई। नेताओं की प्रतिष्ठित पंक्ति के पीछे एक सीट खाली थी। में धीरे से वहाँ बैठ गया। मेरे सामने विरोधी दल के कुछ भारी-भरकम नेता बैठे थे।

‘जादू डालाआआ जादू ! आ आ आ आ जादू जादू ऊ ऊ ऊ ऊ !’ गायक का स्वर फिर अपने मूल स्थान से काफी दूर निकल गया था और लौटकर नहीं आ रहा था। इधर की तानों में ज़ोर ‘जादू’ पर था। बार-बार वही किया जा रहा था। जाजा…दूदू चल रहा था। लोग मोहित भाव से सुन रहे थे। गायक का गला मीठा था और तानों में लोच। उसमें महज़ शास्त्रीयता के प्रदर्शन की पक्की ज़िद नहीं थी। वह राग के विस्तार के साथ शब्दों की आन्तरिक पीड़ा पर बल दे रहा था। इसी कारण धीरे-धीरे समा बँध गया था। सब मगन थे।

मैं उन विरोधी दल के नेताओं की ओर देख रहा था, जो मेरे आगे की पंक्ति में बैठे थे। सोच रहा था कि इन पर भी संगीत का प्रभाव होता है या नहीं ? मुझे हँसी आई। जब पेड़-पौधों पर होता है, तो इन पर क्यों नहीं होता होगा ? और वाकई उन पर गहरा प्रभाव हो रहा था। मैंने दूसरी ओर बैठे मन्त्रियों की ओर भी देखा। वे खुश थे, तानों पर यों गर्दन हिला सहमति प्रकट कर रहे थे मानो उनका सचिव प्रस्तुत कर रहा हो। सम पर हाथ भी मार देते थे। विरोधी दल के नेता चुप-से बैठे थे। कभी-कभी सिर झुका विचारों में डूब जाते थे। मैंने एक मोटे-से विरोधी नेता को चश्मा उतार ऑखें पोंछते भी देखा।

‘कैसा जादू डाला, हो ओ ओ ओ, कैसा जादू डाला आ आ !’ गायक अपने मज़े में हाथ और गर्दन को धीरे-धीरे हिलाता हुआ गा रहा था। तानपूरे पर उँगलियाँ फेरनेवाला और तबलेवाला उसके साथ खो-से गए थे। ‘कैसा जादू डाला आ, बैरन ने कैसा जादू डाला आ !’

मेरे सामने की सीट पर बैठे विरोधी दल के एक नेता धीरे से उठे और बाहर जाने लगे। वे वृद्ध थे। मैं टॉर्च से उन्हें रास्ता बताता बाहर ले आया।

“आप जल्दी जा रहे हैं ?” मैंने नम्रता से पूछा।

“हूँ।” दुखी स्वर से उन्होंने कहा, फिर चश्मा निकालकर आँखें पोंछीं। कुछ संयत-से हुए और धीरे-धीरे चले गए। मैं फिर अन्दर आकर बैठ गया।

‘कैसा जादू डाला आ आ, बैरन ने कैसा जादू डाला आ आ आआ !’ गायक उसी स्थिति को बार-बार स्पष्ट कर रहा था और उसके स्वरों की करुणा सारे हॉल में फैल रही थी। ‘डाला आआ, डाआआला, डाआआआ,लाआआआ, डाला, जादू डाला, कैसा जादू डाला, बैरन ने एएए कैसा, नेए कैसाआआ !’

“बड़ी पोलीटिकल चीज़ सुना रहा है मेरा यार !” विरोधी दल के एक नेता ने अपने पास बैठे दूसरे नेता से कहा।

“सोचा था संगीत सुनेंगे, कुछ देर को गम गलत करेंगे, मगर यहाँ भी वही किस्सा छिड़ गया।” दूसरे ने लम्बी साँस ली।

‘कैसा जादू डाला आआ !’ गायक गा रहा था,

“अरे हाँ भाई, सुन लिया। अब तक तक दुहराओगे वही बात !” विरोधी दल का एक नेता बड़बड़ाया-’’हमारे बस में है क्या कुछ, जो तुम्हें समझा दें कि कैसा जादू डाला। वह तो एक हवा थी, जो चल गई देश-भर में। उसे कुछ कहिए, उसका जादू कहिए या हमारी कमज़ोरी। अब क्या किया जा सकता है, प्रजातन्त्र है यहाँ तो, जो पब्लिक करे सो सही।”

‘जाआआ दूऊऊऊऊ !’ गायक ने स्वर को उठाया और हॉल की छत पर लटका दिया। फिर वहाँ से उतारा और गमककर हॉल की अगली पंक्ति की ओर फेंक दिया। वहाँ से समेट तबलेवाले को सौंप दिया। और जब तबलेवाले ने ठुमके से गर्दन हिला दी, तो गायक ने ‘जादू डाला’ को लम्बा हाथ फेंक दाहिने दरवाज़े से बाहर कर दिया। फिर कुछ क्षण चुप रहा। तब वह स्वर शायद लम्बा चक्कर काट वापस उसके पास आ गया था। इस बार गायक ने उसे कन्धे से उतारा और मुट्ठी खोल सामने रख लिया।

मेरे सामने की पंक्ति में बैठे विरोधी नेताओं से सहन नहीं हुआ कि बार-बार वे ही शब्द सारे हॉल में चक्कर काटें। वे उठ खड़े हुए। मैंने टॉर्च से रास्ता दिखाया और उन्हें बाहर ले आया।

“कौन है तुम्हारी संस्था का मन्त्री, अध्यक्ष, वगैरह ?” एक नेता ने मुझसे डाँटकर पूछा।

“कहिए ?” मैंने पूछा।

“तुम हो ?”

“नहीं, मैं नहीं हूँ। मगर कोई सेवा हो तो आज्ञा दीजिए।”

“देखो भैया, शास्त्रीय संगीत के प्रोग्राम में पोलिटिक्स नहीं आनी चाहिए। उन गायक महोदय को हमारी तरफ से बता देना कि यह सही है कि आज इन्दिरा जी ने जादू डाला है, मगर इसका मतलब यह नहीं कि गा-गाकर कोई जले पर नमक छिड़के। संगीत में राजनीति नहीं आनी चाहिए। आजकल हमारे दुर्दिन चल रहे हैं, तो ये गाने-बजानेवाले भी जो तबीयत चाहा कहने लगे-’जादू डाला, जादू डाला’ ।”

“मगर मैं नहीं समझता कि उसमें कोई राजनीति है।” मैंने उनसे कहा, “वह तो एक पद है जिसमें गोकुलवालियाँ कोस रही हैं कुब्जा को, जिसके चक्कर में कृष्ण मथुरा अटक गए हैं। ‘बैरन ने जादू डाला’।”

“अरे, अब हमें मत चलाओ उल्टा-सीधा। हुंह !” उन्होंने क्रोध से मुझे देखा और बड़बड़ाते चल दिए, “हमें उल्लू बनाने की कोशिश कर रहे हैं !”

‘कैसा आ आ आ आ आ !’ हॉल के दरवाजे से गायक का स्वर बाहर आ गया और बरामदे का लम्बा चक्कर काट फिर अन्दर घुस गया। मैंने जब पर्दा हटाया, तब वह गायक की हथेली पर था, जिसे उसने फिर धकेल दिया था बाई और !

‘जादू डाला आ आ आ आ आ आ !’

और मैंने देखा, हाल में शेष बचा अन्तिम विरोधी नेता भी उठकर धीरे-धीरे बाहर आ रहा है।