हिटलर और आँचू तम्बाखूवाला (व्यंग्य) : शरद जोशी | Hitlar aur Aanchu Tambakhuwala : Sharad Joshi ke Vyangya

 

हिटलर कैसे मर गया, क्यों मर गया ?–यह इस सदी का सबसे बड़ा रहस्य है। शरीर नौ द्वारे का पिंजड़ा है और प्राण पंछी कब उड़ जाए, कह नहीं सकते। हर मिनट कोई पंछी कहीं से फुर्र हो जाता है। फिर भी इस सदी का सबसे बड़ा रहस्य यही है कि हिटलर कैसे मरा और क्यों मरा ? एक शान्त सामाजिक प्राणी के लिए उत्तर यही होता कि भैया, उसकी मौत आई थी, सो चला गया। नहीं, इससे काम नहीं चलेगा। वे जानना चाहते हैं, वह किस ढंग से मरा ? क्या उसने आत्महत्या कर ली ? क्या वह रूसी सिपाहियों की गोली का शिकार हो गया ? क्या वह अभी भी जीवित है और पृथ्वी से दूर किसी ग्रह पर बैठा नाजी सेना का गठन कर रहा है ?
संसार में केवल दो व्यक्ति ऐसे हैं, जो हिटलर की मृत्यु सम्बन्धी वास्तविकता जानते हैं। वे चुप हैं। आज तक शायद उन पर बर्लिन के पतन का सकता छाया हुआ है। हिटलर के उस विकराल विकृत चेहरे को वे भूल नहीं पाते और जाने क्या समझकर मौन रहते हैं। बर्लिन शहर के एक छोर पर बने चायघर में उनमें से एक व्यक्ति रोज़ शाम को बराबर आता है और अँधेरे कोने में अपनी निश्चित सीट पर आकर बैठ जाता है। दूसरे महायुद्ध के पहले से वह इसी तरह आता रहा है। तब तीन व्यक्ति आते थे। यह और इसके दो मित्र। कोने में बैठे कुछ खुस-फुस बातें किया करते थे। वे क्या बातें कर रहे हैं, कोई नहीं जान पाता था। होटल का मालिक सोचता था, ये लोग शराब, औरत या पार्टनरशिप में कारखाना खोलने के विषय में बातें करते होंगे। उन दिनों जर्मनी में कारखाना खोलने का बड़ा फैशन था। जगह-जगह छोटे-मोटे कारखाने खुल रहे थे। जिसके पास जितने रुपए होते, उससे वह कारखाना खोल देता था। जैसे किसी के पास सिर्फ एक रुपया ही है, तो भी वह किसी स्कूल के पास पेन्सिल छीलने का कारखाना खोल देगा और खुद उसका मैनेजिंग डाइरेक्टर बन जाएगा। लड़के दौड़-दौड़कर कारखाने में पेन्सिल छिलवाने आएँगे और उसे आमदनी होगी। उन दिनों बर्लिन के बाज़ार में नई-नई मशीनें आ रही थीं। चश्मा पोंछने, दाँत साफ करने और जेब काटने तक की सस्ती हल्की मशीनें बाज़ार में आ गई थीं।
सब समझते थे कि ये तीनों व्यक्ति यहाँ बैठकर साझे में कारखाना खोलने के विषय में बातें करते होंगे। ये क्या बातें करते थे, यह बताने के पहले ज़रूरी होगा कि ये लोग कौन हैं, यह बताया जाए।
इन तीनों व्यक्तियों में से एक तो कारखानेदार था ही। इसे बस ‘आँचू तम्बाखूवाला’ या केवल ‘आँचू’ कहकर पुकारते थे। इसका काम था बाज़ार से बढ़िया बेचना। बर्लिन की हर छोटी-मोटी दुकान पर इसकी सिगरेटें रखी रहती थीं। यों वह स्वयं सिगरेट से सख्त नफरत करता था। कारखानेदार होने के नाते नमूने के बतौर पन्द्रह-बीस सिगरेट दिन में पीनी पड़ती हों, वह बात अलग है। दूसरा व्यक्ति था बादमेर, जो पियानो सुधारने में बर्लिन का सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति माना जाता था। आप पियानो को दस हिस्सों में बाँटकर बर्लिन शहर के दस भागों में डाल दीजिए और वह एक घण्टे में सबको बटोरकर यों जोड़ देगा कि आप पियानो बजा सकते हैं। बादमेर का यह कहना था कि बलिन से उसका अपहरण कर पेरिस ले जाने का निश्चय फ्रांस की सरकार कैबिनेट स्तर पर कर चुकी है, ताकि पेरिस के पियानो ठीक रहें और वहाँ संगीत-कला का विकास हो सके। इसी कारण बादमेर जब किसी फ्रांसीसी को देखता, भागने लगता था। इसी बादमेर की एक प्रेमिका थी-मारिया रिल्के, जिससे उसका विवाह भी निश्चित हो चुका था। एक नाजी अफसर काल ह्यूगो हाफ्टमैन भी मारिया से शादी करना चाहता था।
एक दिन नाजी अफसर, जिसे हिटलर ने बागों से बच्चे भगाने की ड्यूटी पर लगा रखा था, मारिया को एकाएक बाग में मिल गया और बोला, ‘ए महिला, मैं तुमसे शादी करना चाहता हूँ।” जर्मनी के लोग नाजियों का हुक्म मानने के इतने आदी हो गए थे कि मारिया घबराहट में कह बैठी, “मैं तैयार हूँ।” हाफ्टमैन और मारिया की शादी हो जाने से बादमेर के दिल के पियानो को गहरा धक्का लगा। (बादमेर के अनुसार उसके दिल में एक पियानो है।) उसने हिटलर से जाकर नाजी अफसर की शिकायत की, पर हिटलर ने उसे डाँटकर भगा दिया कि मैं प्रेम-व्रेम के मामले सुलझाने के लिये डिक्टेटर नहीं बन हूँ; एसे झगड़े फ्रांस क़े राजनीतिज्ञ सुलझाते हैं।
तीसरा व्यक्ति फ्रेंज गिट्सबर्ग, जो आज भी बर्लिन की उस रेस्तराँ के अँधेरे कोने में रोज़ शाम आकर बैठता है ! यह कौन है, क्या करता है, इस विषय में किसी को पता नहीं। जिस प्रकार हिटलर की मृत्यु रहस्य है, उसी प्रकार फ्रेंज का जीवन भी एक रहस्य है।
फ्रेज गिट्सबर्ग की बादमेर से पहली मुलाकात इसी होटल में हुई। जिस शाम कार्ल हाफ्टमैन की मारिया से शादी हो रही थी, बादमेर इस रेस्तराँ में बैठा नाजी शासन को, नाजी नैतिकता को और नाजी अत्याचारियों को गालियाँ बक रहा था। होटल के सब लोग उसकी बड़बड़ाहट सुन रहे थे और बोर हो रहे थे। तभी फ्रेंज उठा और उसने बादमेर से हाथ मिलाते हुए कहा, “मैं तुमसे सहमत हूँ। सचमुच तुमपर बहुत बड़ा अत्याचार हुआ है।”
बादमरे ने कहा, “मैं इन नाजी लोगों के पियानो तोड़ दूँगा। ये समझते क्या हैं अपने को !”
फ्रेंज ने उत्तर दिया, “तुम सचमुच पियानो तोड़ सकते हो। तुममें बड़ी शक्ति है। आओ, दोस्त, हम-तुम मिलकर कुछ सोचें।”
तब से रोज़ शाम को उसी रेस्तराँ में फ्रेंज और बादमेर आ मिलते। कुछ दिनों बाद आँचू तम्बाखूवाला भी इनके साथ आने लगा। आँचू तम्बाखूवाला भी हिटलर से सख्त नाराज़ था और नाजी शासन को उलट देने के पक्ष में था। बात यह हुई कि सिगरेट के कुछ पैकेट लेकर उसने हिटलर से मुलाकात की और अपना परिचय देकर उसने निवेदन किया कि वह यह घोषणा कर दे कि आँचू के कारखाने की सिगरेटें विश्व में सबसे अच्छी होती हैं और जर्मनी के नवयुवकों को आँचू के कारखाने की ही सिगरेट पीनी चाहिए।
यह सुनकर हिटलर खिलखिलाकर हँसा। (इतिहासकार कृपया इस बात को नोट करें कि हिटलर एक बार खिलखिलाकर हँसा भी था।) उसने आँचू से पूछा, “क्या आर्य लोग तुम्हारे कारखाने की सिगरेट पीते थे ?”
आँचू ने उत्तर दिया, “नहीं, वे लोग सिगरेट नहीं, चिलम पीते थे।”
“तो फिर मैं क्यों तुम्हारे कारखाने की सिगरेट पीऊँ ? मैं जर्मनी के नवयुवकों को गलत रास्ता नहीं बता सकता। तुम मेरे नाम से फायदा उठाना चाहते हो; यह असम्भव है। भाग जाओ और आगे कभी मुझे परेशान न करना।”
“आँचू भागने लगा। हिटलर ने उसे फिर बुलाया।
“सुनो, मुझे एक विचार आया। तुम सिगरेट बनाने के लिए कागज़ का उपयोग क्यों करते हो ?”
‘कागज़ की नली बनाए बिना तम्बाखू कैसे रखी जा सकती है, जनाब ?” आँचू ने उत्तर दिया।
“क्या तुम लोहे की नली में तम्बाखू भरकर सिगरेटें नहीं बना सकते ? वे मज़बूत होंगी और एक ही नली का फिर से उपयोग भी किया जा सकेगा। ऐसी कागज़ी सिगरेटें तो ब्रिटेन और फ्रांस भी बना सकते हैं। मैं चाहता हूँ, जर्मनी के कारखानों में मज़बूत सिगरेटें बनें-लोहे की सिगरेटें-जिन्हें हम विदेशों में बेच सकें। समझे ? तुम एक कारखाना खोलो, जहाँ लोहे की नलियों में तम्बाखू भरकर सिगरेटें बनाई जाएँ और मुझे आकर रिपोर्ट दो। जाओ, भाग जाओ।”
आँचू ने गरदन झुकाई और भाग गया।
उस दिन जब वह अपनी दुकान पर बैठा हिटलर को गालियाँ बक रहा था और नाजी शासन को उलट देने की बातें कह रहा था, पियानो दुरुस्त करनेवाला बादमेर और वह रहस्यमय व्यक्ति फ्रेंज गिट्सबर्ग सड़क से जा रहे थे। आँचू की बातें सुन वे दोनों रुक गए। फिर फ्रेंज गिट्सबर्ग दुकान पर चढ़ा और आँचू से बोला, “तुम बिलकुल ठीक कहते हो; मैं तुमसे सहमत हूँ। सचमुच तुम पर बहुत बड़ा अत्याचार हुआ है।”
आँचू ने कहा, “मैं इन नाजियों को सिगरेट सप्लाई करना बन्द कर दूँगा। ये समझते क्या हैं अपने को !”
फ्रेंज ने कहा, “तुम सचमुच उनकी सिगरेट बन्द कर सकते हो। तुम में बड़ी शक्ति है। आओ दोस्त हम-तुम मिलकर कुछ सोचें।”
तभी बर्लिन में उस गुप्त क्लब की स्थापना हुई, जिसका उद्देश्य था हिटलर को मारना। इस क्लब का अध्यक्ष था फ्रेंज गिट्सबर्ग। आँचू और बादमेर उसके सदस्य थे। क्लब का मोटी या ध्येय-वाक्य था-’हम संसार से पापियों का नाश कर देंगे।’ वास्तव में इस क्लब की स्थापना नेपोलियन बोनापार्ट के समय पेरिस में हुई थी और फ्रेंज गिट्सबर्ग के पुरखा उसके अध्यक्ष थे। क्लब का ध्येय था नेपोलियन बोनापार्ट को मारना, पर वह पूरा नहीं हो पाया। पेरिस में क्लब की इस सिलसिले में सैकड़ों बैठकें हुई थीं कि नेपोलियन को कैसे मारा जाए। क्लब की कार्रवाई के सारे कागज़ फ्रेंज गिट्सबर्ग के पास आज भी हैं। उन्हीं कागज़ों और दादाजान की डायरी पढ़कर फ्रेंज को यह प्रेरणा प्राप्त हुई कि क्लब की पुनः स्थापना की जाए और हिटलर को मारा जाए। यों फ्रेंज की हिटलर से कोई दुश्मनी नहीं थी, पर काफी विचार करने पर भी उसे योरोप में कोई दूसरा पापी नज़र नहीं आया, जिसे क्लब का लक्ष्य बनाया जाए। यों पापी कई थे, पर हिटलर को पापी मानने में सुभीता यह था कि वह जर्मनी में ही था और उसके लिए परदेस जाने की ज़रूरत नहीं थी। अत: जल्दी-जल्दी में उसने हिटलर को ही मारने का तय कर लिया और क्लब की मीटिंग बुलाने की सोचने लगा।
क्लब के पुराने सदस्य सब बूढ़े दादा के साथ फ्रांस में ही मर चुके थे। नए खून को लाना ज़रूरी था। गिट्सबर्ग की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। इतने बड़े जर्मनी में वह हिटलर के विरोधियों को कैसे खोजे ? रेस्तरॉ में बैठा वह चुपचाप इस विषय में सोचता रहता। बाद में अचानक उसकी मुलाकात बादमेर और आँचू तम्बाखूवाले से हो गई। ये तीनों मित्र बन गए और पापियों का नाश करनेवाला पेरिस का पुराना गुप्त क्लब फिर सक्रिय हो गया।
फ्रेंज गिट्सबर्ग ठिगने कद का आदमी है और छोटी-छोटी मूंछे रखता है। उसका पिता भी ठिगना था और उसके पिता के पिता भी ठिगने ही थे। वास्तव में गिट्सबर्ग परिवार ही ठिगनों का परिवार है। नेपोलियन का विरोधी फ्रेंज का पुरखा गिट्सबर्ग भी ठिगना ही था। सदैव ये लोग हीन भाव से पीड़ित रहते थे, पर नेपोलियन की सफलता ने इन्हें प्ररेणा दी कि कोशिश करने पर ठिगना आदमी भी संसार का नेता हो सकता है। गिट्सबर्ग के ठिगने पुरखे की आशा यही थी कि वह नेपोलियन को खत्म कर संसार का नेतृत्व करेगा। फ्रेंज भी यही सोचता था कि हिटलर को समाप्त कर वह जर्मनी का नेता बन जाए और संसार की रक्षा करे। उसकी एक बाधा यही भी थी कि हिटलर ठिगना नहीं था।
गुप्त क्लब की पहली बैठक भी गिट्सबर्ग के घर में ही हुई। शराब के गिलास और आँचू के कारखाने की सिगरेट हाथ में ले तीनों ने प्रतिज्ञा की कि वे हिटलर को खत्म करेंगे। फ्रेंज ने खड़े होकर कहा, “हम संसार के पापियों का नाश कर देंगे...”
बादमेर खड़ा हुआ और बीच में बोला, “ताकि दुनिया का पियानो ठीक रहे...”
“...और सब शान्ति से सिगरेट पी सकें !” आँचू ने जोड़ दिया। फिर वे तीनों बैठ गए।
कमरा बहुत छोटा था। सारे खिड़की, दरवाज़े और रोशनदान बन्द कर दिए गए थे ताकि इनकी बातचीत नाजी गुप्तचरों तक न पहुँचे। अत: गर्मी के कारण मीटिंग ज़्यादा देर तक नहीं चल सकी। यह तय हुआ कि हिटलर को मारने के सरल तरीकों पर सब सदस्य अलग-अलग विचार करें और अगली मीटिंग में प्रस्ताव रखें। फिर सिगरेट का पूरा पैकेट खत्म कर मीटिंग समाप्त घोषित की गई।
क्लब के तीनों सदस्य हिटलर को मारने की समस्या पर बड़े परेशान रहे। फ्रेंज गिट्सबर्ग क्लब के खर्चे से जासूसी उपन्यास पढ़ने लगा और फिल्में देखने लगा ताकि उसे कोई आइडिया मिले। बादमेर बर्लिन की सूनी जगहों पर पियानो बजाने लगा ताकि वह शान्तिपूर्वक विचार कर सके। आँचू तम्बाखूवाला तो इस प्रश्न पर इतना चिन्तित हो गया कि उसने ग्राहकों से राय लेना आरम्भ कर दिया। अपने ग्राहकों से वह प्रायः पूछ बैठता- ‘कहिए साहब, आपका क्या ख्याल है, हिटलर को कैसे मारा जा सकता है ?’ कोई ग्राहक इसपर हँस देता, कोई घूरता और कोई उसे मुक्का बताता। फ्रेंज ने उसे रोका और डाँटा कि अगर खुले आम यह चर्चा करते रहे, तो हिटलर के गुप्तचरों को पता लग जाएगा और तुम जेल में डाल दिए जाओगे। आँचू डर गया और फिर खुद ही हिटलर को मारने के तरीकों पर विचार करने लगा।
गुप्त क्लब की दूसरी मीटिंग पहली मीटिंग के छः महीने बाद हुई। सबसे पहले बादमेर ने प्रस्ताव रखा, “क्यों न हम लोग ऐसा पियानो बनाएँ जिसे बजाने से ही हिटलर मर जाए !”
“क्या मतलब ?”
“मतलब यह कि हम ऐसा पियानो बनाएँ, जिसमें ज़हरीला तीर लगा हो। पियानो पर हाथ रखते ही वह तीर निकले और हिटलर का गला काट दे।”
“मगर ऐसा पियानो बनेगा कैसे ?”
“मैं कोशिश करूँगा।” बादमेर ने कहा, “वास्तव में मैं ऐसे दो पियानो बनाना चाहता हूँ। एक मारिया के तथाकथित पति कार्ल हाफ्टमैन को भेंट में दूँगा ताकि वह मर जाए और मारिया मुझसे विवाह कर सके और दूसरा क्लब की ओर से हिटलर को दूँगा।”
“पर क्या यह ज़रूरी है कि हिटलर पियानो बजाए ही। वह पियानो बजाना पसन्द भी करता है ?” फ्रेंज ने पूछा।
“उसे बजाना चाहिए। जर्मनी जैसे महान् राष्ट्र के महान् नेता को पियानो बजाना आना ही चाहिए। हम पियानी भेंट करने के बाद उससे प्रार्थना करें कि एक बार पियानो अवश्य बजाए। वह बजाएगा और जैसा कि क्लब का ध्येय है, मर जाएगा।”
“ठीक है, इस सुझाव पर बाद में विचार होगा। आँचू, तुमने कोई तरीका खोजा है ?”
आँचू खड़ा हो गया और बोला, “जी हाँ, अध्यक्ष महोदय। मेरे पास हिटलर को मारने का जो तरीका है, वह बहुत ही सीधा और सरल है। पियानो वाले तरीके की तरह उसमें कोई उलझन नहीं। जैसा कि आप लोग जानते हैं, हमारे क्लब का ध्येय पापियों का और पापियों में भी खास हिटलर का नाश करना है। अच्छा तो यह होता कि शुरुआत में हम कुछ छोटे-छोटे पापियों को मारते और बाद में उन अनुभवों के आधार पर हिटलर जैसे बड़े पापी पर प्रयोग करते। खैर, अब नीति बन चुकी है और उसमें हेर-फेर असम्भव है। इस समय तो हिटलर को मारने का ही काम बहुत ज़रूरी है और शीघ्र ही इसे निपटाना है, क्योंकि यदि हिटलर की मौत किसी और ढंग से हो गई, तो इससे हमारे क्लब की बड़ी बदनामी होगी। नेपोलियन को हमारे क्लब के पुरखा सदस्य (ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति दे) नहीं मार पाए, यह कलंक हमारे चेहरे पर है और हिटलर को मारकर ही इसे धोया जा सकता है। हमारे मानव समाज में…’’
“आँचू, तरीका सुझाओ, भाषण मत करो।” फ्रेंज ने कहा।
आँचू ने नम्रता से कहा, “में विषय पर ही आ रहा हूँ, अध्यक्ष महोदय ! तो हमारे मानव समाज में हिटलर जैसे व्यक्ति का नेता होना, जो मेरे कारखाने की सिगरेट तक नहीं पीता, अत्यन्त खेद और दु:ख का विषय है। उसका सिगरेट न पीना सारे जर्मनी का अपमान है। मुझे यह जानकर प्रसन्नता है और गर्व भी कि हमारा यह क्लब, जो हिटलर को मारना चाहता है, किसी राजनीतिक गुटबन्दी से परे है, ऊपर है। संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थों के कारण ही नहीं, वरन् पवित्र व्यक्तिगत भावनाओं के कारण हमने हिटलर को मारने की ज़िम्मेदारी ली है, जिसे हमें मिल-जुलकर निभाना है…।”
“आँचू, भाषण नहीं।”
“मैं विषय पर ही आ रहा हूँ, अध्यक्ष महोदय ! तो मैं यह कहना चाहता था कि हिटलर को मारने के लिए हमें अत्यन्त व्यवस्थित और सुसंघटित तरीके से काम करना होगा। यदि हममें एकता बनी रहे और यदि हम अपने ध्येय पर दृढ़ रहें, तो कोई कारण नहीं कि हम हिटलर को न मार सकें। मुझे आशा है, आशा ही नहीं बल्कि विश्वास है कि यदि हम इसी प्रकार मिलते-जुलते रहे, किसी राजनीतिक दलबन्दी में नहीं पड़े और क्लब अपने ध्येय पर दृढ़ रहा, तो एक न एक रोज़ ईश्वर ने चाहा तो हिटलर अवश्य मर जाएगा। इतना कहकर मैं अपना स्थान ग्रहण करता हूँ।” और आँचू झुककर बैठ गया।
“मगर तुमने कोई तरीका नहीं बताया, आँचू,” फ्रेंज ने कहा।
“अध्यक्ष महोदय, मैं पूछता चाहता हूँ, राजनीतिक गुटबन्दी से ऊपर उठकर ध्येय की एकता का निर्माण कर व्यवस्थित और सुसंघटित प्रयासों द्वारा मज़िल को प्राप्त करना, क्या यह हिटलर को मारने का तरीका नहीं होगा ?”
“हाँ, यह तरीका तो है, मगर...”
“बस, क्लब के लिए मेरी यही सलाह है और मैं सोचता हूँ, क्लब इस पर अमल करेगा।”
“ठीक है।” फ्रेंज ने खड़े होकर कहा, “मेरे मित्रो, पिछले छ: महीनों में इस क्लब के इरादे को कैसे पूरा किया जाए, इस विषय पर हम लोगों ने खूब सोचा है और बड़े अच्छे नतीजे सामने आए हैं। इस क्लब के सबसे पहले जो अध्यक्ष बने थे—यानी मेरे परदादा गिट्सबर्ग—उनका कहना था कि कमेटी में ईश्वर होता है। यानी जब हर व्यक्ति में ईश्वर का अंश होता है और जब अनेक व्यक्ति इकट्ठे होते हैं, तो थोड़े-थोड़े होकर एक पूरा ईश्वर बन जाता है। आप समझे मेरी बात ? ईश्वर-तत्व जो व्यक्तियों में विभाजित अवस्था में रहता है, कमेटी में एक हो जाता है। हमारा विश्वास है कि इस क्लब में भी, जिसके तीन सदस्य हैं, ईश्वर का वास है। (तालियाँ) तो मेरे मित्रो, ईश्वर की इच्छा यही है कि हिटलर की मृत्यु हो। मैंने भी इन दिनों हिटलर को मारने के तरीकों की खोजबीन की है। कई पुरानी और नई किताबें पढ़ी हैं,फिल्में देखी हैं। हिटलर को मारने के कई तरीका हैं, जैसे हम उसे तलवार से मार सकते हैं; पिस्तौल से मार सकते हैं; गला घोंट सकते सकते हैं; फाँसी लगा सकते हैं;ज़हर दे सकते हैं; नदी में डुबो सकते हैं; पहाड़ से गिरा सकते हैं। और तो और, हम उसे ऐसी चुभती हुई बात कह सकते हैं कि वह स्वयं शर्मिन्दा होकर आत्महत्या कर ले। मेरा मतलब इसके कई तरीके हैं, जिस पर मैंने विचार किया है, पुस्तकें पढ़ी हैं और फिल्में देखी हैं। मगर इसके लिए ज़रूरी है कि हिटलर हमारे कब्ज़े में हो। हमारा उद्देश्य है किसी तरह हिटलर को प्राप्त करना और फिर उसे ऐसे तरीके से, जो क्लब को मंजूर हो, मार डालना। मेरी एक राय यह भी है कि हिटलर को मारने का काम हम एक अनुभवी व्यक्ति को सौंप दें जैसे जान माकिस को यह काम हम दे दें। आप जानते हैं और आपने फिल्मों में देखा होगा कि जान माकिस की पिस्तौल की एक गोली किसी आदमी का सफाया करने को काफी है। कई फिल्मों में तो उसने तीन-तीन खून एक साथ किए हैं। मैंने फिल्मों में देखा है, वह बहुत स्वस्थ है और निर्ममता से हत्या करना जानता है। क्यों नहीं हम उससे हिटलर को मारने के लिए कहें ? बल्कि हम उसे इसका ठेका दे दें। हम चाहें तो कुछ अच्छे हत्यारों के टेण्डर बुलवा सकते हैं और जिसका टेण्डर सस्ता हो, उसे यह ऐतिहासिक काम सौंप सकते हैं।”
“बिल्कुल ठीक है, फ्रेंज।” आँचू ने कहा, “जान मार्किस इस सदी का सबसे खतरनाक विलेन है और सारी फिल्मों में मिलाकर कुल खून जितने उसने किए, मेरे ख्याल से किसी पेशेवर अपराधी ने भी नहीं किए होंगे।”
“मैं जान मार्किस का जानता हूँ। उसका पियानो एक-दो बार ठीक कर चुका हूँ।” बादमेर ने कहा, जिसे नींद आने लगी थी।
“मैं क्या नहीं जानता ! वह मेरे कारखाने की सिगरेट पीता है !” आँचू गर्व से बोला ।
जान माकिस से मिलने का निर्णय करने के बाद क्लब की मीटिंग समाप्त हुई।
फ्रेंज, बादमेर और आँचू पूरे एक सप्ताह तक तलाश करने के बाद बर्लिन के प्रसिद्ध फिल्म-स्टार जान माकिस से, जो विलेन का अभिनय करने में योरोप में सर्वश्रेष्ठ माना जाता था, मिल पाए। उस वक्त वह बर्लिन के सबसे ठाठदार शराबघर में बैठा हुआ था। इन तीनों के पास इतने रुपए नहीं थे कि उस शराबघर में घुस पाते, पर कुछ नहीं पीने का तय कर ये तीनों अन्दर गए।
बादमेर ने इशारे से बताया कि वे रहे जान मार्किस।
फ्रेंज आगे बढ़ा और मार्किस से हाथ मिलाते हुए बोला, “हम लोग आपसे कुछ बातचीत करना चाहते हैं।”
“गुप्त बाचतीत,” आँचू ने स्पष्ट किया।
मार्किस मुस्कराया और बोला, “आप कोई फिल्म बनाने की सोच रहे हैं क्या?”
“फिल्म नहीं, हम लोग इतिहास बना रहे हैं !” फ्रेंज ने जवाब दिया।
“बहुत अच्छे !” मार्किस ने इन तीनों के लिए एक-एक पेग का ऑर्डर दिया और कहा, “मैं आप लोगों का परिचय चाहता हूँ।”
“मुझे बादमेर कहते हैं। मैं बर्लिन ही नहीं, पूरे योरोप का सबसे अच्छा पियानो सुधारनेवाला हूँ। आपके यहाँ इस काम से एक बार आ भी चुका हूँ।”
“हाँ...हाँ, मुझे याद आया। मगर यार, तुम सुधारकर गए और वह पियानो आठ रोज़ में फिर बिगड़ गया ! मैंने अपने एक मित्र नाजी ऑफिसर काल हाफ्टमैन और उनकी पत्नी मारिया हाफ्टमैन को घर में पार्टी दी थी। जब मारिया पियानो बजाने बैठी, तो वह काम नहीं कर रहा था। मुझे बड़ा शर्मिन्दा होना पड़ा। मैंने कहा, ‘मारिया मैडम ! मैं शर्मिन्दा हूँ, मगर पियानो अभी कुछ ही दिन हुए बादमेर सुधार चुका है जो बर्लिन का सबसे अच्छा कारीगर है। इस पर मारिया हँसी और कहने लगी, ‘उस मनहूस को अभी तक पियानो सुधारना आया कहाँ है !’ क्यों भाई, क्या तुम उसका भी पियानो बिगाड़ आए थे ?”
बादमेर यह सुनकर उदास हो गया। उसका मुँह लटक गया और आँखें भीग गईं।
“इसने मारिया का पियानो नही बिगाड़ा है, मारिया ने इसका पियानो बिगाड़ रखा है,” आँचू बोला।
तीनों हँस पड़े।
“आपकी तारीफ ?”
“मुझे आँचू कहते हैं और यह सिगरेट, जो आप पी रहे हैं, मेरे ही कारखाने की बनी है।”
“आप अमेरिका से आए हैं ?”
“जी नहीं, मैं शुद्ध जर्मन हूँ।”
“यह सिगरेट तो अमेरिका की बनी है। हॉलीवुड के मेरे एक दोस्त फिल्म-स्टार ने इस क्रिसमिस पर भेजी थी। आपका क्या अमेरिका में सिगरेट का कारखाना है ?” मार्किस ने पूछा।
“जी नहीं।” आँचू ने धीरे से कहा, “मेरा यहीं सिगरेट का एक कारखाना है। मैं समझा, यह सिगरेट मेरे ही कारखाने की बनी है।”
“खैर, कोई बात नहीं। सारी सिगरेटें सफेद रंग की होती हैं और हर कारखानेदार उसे अपनी बनाई समझता है। आपसे मिलकर बड़ी खुशी हुई। आप मिस्टर कौन हैं ?”
“यह हैं फ्रेंज गिट्सबर्ग-हमारे क्लब के अध्यक्ष।”
“आपका क्लब ? कौन-सा ?”
“पापियों का नाश करने के लिए एक क्लब हमने खोला है, मिस्टर माकिस,” फ्रेंज ने बताया ।
“अच्छा, कोई रजिस्टर्ड बॉडी है ?”
“फिलहाल तो रजिस्टर्ड नहीं, पर जल्दी ही हम इसे रजिस्टर्ड कराने की सोच रहे हैं,” आँचू ने कहा।
“आप क्लब से फिल्म बनवाना चाहते हैं ?”
“हम कह चुके हैं, हम फिल्म नहीं, इतिहास बनाना चाहते हैं !” फ्रेंज ने कड़ककर उत्तर दिया।
“बहुत अच्छे ! आप लोग शराब लीजिए न ! शरमा क्यों रहे हैं !” मार्किस ने पेग उठाते हुए कहा, “इतिहास के विषय में मैं भी कई दिनों से सोच रहा था। जर्मनी में फिल्म-इण्डस्ट्री इतनी प्रगति कर चुकी है कि उसका इतिहास लिखा जाना ज़रूरी है। खासकर हिटलर के आने के बाद से फिल्म-इण्डस्ट्री बहुत आगे बढ़ी है। ईश्वर हमारे महान् नेता हिटलर को दीर्घायु करे कि आगे जर्मन फिल्मों का सारे संसार में आदर हो। आप यदि इतिहास लिखें तो इस बात की ज़रूर चर्चा करें कि हिटलर महान् ने हमारी फिल्मों की प्रगति के लिए बड़ी प्रेरणा और सहायता दी है। क्या ख्याल है, आँचू ?”
“आप बिलकुल ठीक कहते हैं, जहाँ तक फिल्मों का सम्बन्ध है। काश, यह हिटलर महान् सिगरेट-इण्डस्ट्री को भी अपनी प्रेरणा और सहायता देता !”
मार्किस हँसने लगा।
“आपने कई फिल्मों में कई आदमियों की जानें ली हैं और हर वक्त आपने नया ढंग अपनाया है। आप इस सिफत से आदमी को मारते हैं कि पुलिस पता नहीं लगा पाती कि किसने मारा है। आपकी फिल्में देखकर लगता है कि आपके लिए आदमी की जान लेना हँसी-खेल है। हमारा क्लब चाहता है कि हमारी ओर से भी आप एक आदमी को मार डालने की कृपा करें।”
“कया कहा… ? एँ !”
“फ्रेंज का मतलब है कि हिटलर को मारने का जो पवित्र लक्ष्य इस क्लब ने बनाया है, उसे आप पूरा करने का ठेका ले लें,” आँचू ने स्पष्ट कर दिया।
“आप लोग इस रेस्तराँ में आने के पहले भी कहीं से पीकर आए थे ?” मार्किस ने तीनों के चेहरे देखते हुए कहा।
“हमें गलत न समझिए। गुप्त क्लब ने हिटलर को पापी घोषित किया है और हम क्लब की ओर से आपको आज्ञा देते हैं कि आप उसका नाश करें,” फ्रेंज कड़ककर बोला। मार्किस इन तीनों के चेहरे देखकर काँपने लगा।
“आप लोग मुझे क्या समझ रहे हैं ? अजीब बात है। मैं हिटलर को कैसे मार सकता हूँ? मैं किसी भी आदमी को कैसे मार सकता हूँ ?”
“जिस तरह फिल्म में मारते हैं। कार में जाइए, पिस्तौल निकालिए और उसे शूट कर दीजिए।”
“क्या कहते हैं…क्या कहते हैं ?” मार्किस की आँखों में आँसू आ गए। उसकी आवाज़ भर्राने लगी। “मैंने कभी किसी आदमी को नहीं मारा। मुझसे ईश्वर की कसम ले लो; मैंने कभी किसीको नहीं मारा।”
“हमने आँखों से देखा है आपको मारते हुए।”
“फिल्म में देखा होगा। फिल्म की बात और है। यों में क्या किसी को मारूंगा ! प्रोड्यूसर लोग मेरे रुपए नहीं देते, पर मैं उनको तमाचा तक नहीं मार पाता। आप मुझे खूनी समझते हैं ! मैं हर सप्ताह चर्च जानेवाला इस जर्मनी का सबसे धर्मात्मा आदमी हूँ।”
“इसका मतलब तुम बुज़दिल हो !”
“बिलकुल ठीक समझा आपने, बिलकुल ठीक समझा।”
“इसका मतलब तुम इतिहास नहीं बना सकते !”
“मैं सिवा फिल्म में काम करने के कुछ नहीं कर सकता।” और मार्किस टेबल से सिर टिकाकर रोने लगा।
तीनों मार्किस को इस हाल में देखते रहे। फिर आँचू ने कहा, “छोड़ो यार, फ्रेंज। ये अमेरिकी सिगरेट पीनेवाला मार्किस का बच्चा क्या किसी का खून करेगा !”
“यह उस बदमाश नाजी अफसर हाफ्टमैन का दोस्त है। यह हिटलर को क्या मारेगा !” बादमेर बोला ।
तीनों उठ खड़े हुए। मार्किस वैसे ही सिर टिकाए बैठा रहा। फ्रेंज ने उसके कान में कहा, “अगर आज की बातचीत का हवाला किसी को दिया, तो अपनी मौत सिर पर समझो।”
“आप लोग जाइए। मैं किसी से नहीं कहूँगा।”
ये तीनों शराबघर के बाहर आ गए।
उसी रात दूसरे महायुद्ध की घोषणा हुई। सारे जर्मनी में सैनिक हलचल शुरू हो गई। हवाई जहाज़ सर पर मँडराने लगे। सौभाग्य से आँचू का सिगरेट का कारखाना दिन-रात चलने लगा और वह व्यस्त हो गया। इधर मिलिटरी की कम्पलसरी भरती शुरू हुई और बादमेर को फौज में जाना पड़ा। उसने मिलिटरी ऑफिसर से कहा कि वह सिर्फ पियानो बजाने और सुधारने के सिवा कुछ नहीं कर सकता। ऑफिसर ने ठहाका लगाया, “खैर, यार, जंग जीत लें, फिर तेरा पियोना सुनेंगे !”
अकेला फ्रेंज बर्लिन में छुपता हुआ घूमता रहा, ताकि वह नाजियों के उपयोग में न आ सके। हिटलर दिन पर दिन आगे बढ़ रहा था और नए शहरों पर जीत हासिल करता जा रहा था। सारे जर्मनी में उसकी जयजयकार हो रही थी। बर्लिन में चौबीसों घण्टे चहल-पहल रहती। फ्रेंज इसी रेस्तराँ में, जहाँ आजकल बैठा रहता है, शाम को आता और बैठा रहता। सब लोग नई जीत की चर्चा करते और वह सिर लटकाए रहता। क्लब का काम ठप हो गया था। कभी-कभी वह आँचू से मिलने आता और कहता, “भाई, अब क्या करें ? क्लब तो ठण्डा पड़ गया।”
“हिटलर को तो मरने की भी फुरसत नहीं है। क्लब क्या कर सकता है !” आँचू उत्तर देता।
“जिस तरह नेपोलियन के मामले में क्लब असफल रहा, उसी तरह कहीं हिटलर के मामले में भी हमें निराश न होना पड़े।”
“निराश होने की क्या बात है। हम लोग अगर अपने निश्चय पर दृढ़ रहे, तो सफलता अवश्य मिलेगी।”
“बादमेर की क्या खबर है ?”
“बुरे हाल हैं बेचारे के ! वह जिस डिवीज़न में भरती किया गया, उसका कैप्टन हाफ्टमैन है। बेचारा बादमेर उसी के हुक्म पर कवायद करता है और मारिया कुरसी पर बैठी देखती है।”
“पुराने घाव पर रोज़ नमक पड़ता होगा बेचारे के !”
“मुझे उम्मीद है कि एक रोज़ बादमेर मारिया को फिर प्राप्त कर लेगा।”
“उम्मीदें तो बहुत हैं। हम हिटलर को खत्म करने की उम्मीद किए हैं। मेरे पुरखे मुझे रोज़ सपना देते हैं, मुझ पर हँसते हैं, चिढ़ाते हैं।”
“क्या कहते हैं?”
“कहते हैं, अध्यक्ष महोदय, मार लिया हिटलर को ?”
“अपने पुरखों से कहो न, जल्दी क्यों करते हैं !” आँचू ने उसे समझाया।
“पुरखों को तो मैं जवाब दे दूँगा, मगर इतिहासकारों को क्या जवाब दूँगा, आंचू ?”
“अरे, इतिहासकार कौन तुमसे पूछने आते हैं ! और फिर यार, तुम समझते हो, मैं सिगरेट का यह कारखाना छोड़कर पिस्तौल लेकर उस हिटलर के पीछे घूमता रहूँगा ? मुझसे यह होने से रहा। मेरा इस्तीफा ले लो क्लब से।”
“नहीं आँचू, मुझे गलत न समझो। मैं यही सोचता हूँ कि कहीं इस युद्ध की हलचल में हम अपना ध्येय न भूल जाएँ।”
“मुझे याद है भई, हमें हिटलर को मारना है। हम लोग किसी राजनीतिक गुटबन्दी में तो हैं ही नहीं। जब मौका लगेगा, मार देंगे। उस रोज़ वह मार्किस का बच्चा तैयार हो जाता, तो अभी तक हिटलर मर चुका होता।”
“उस गधे का नाम मत ली। मैंने तो उसकी फिल्में तक देखना बन्द कर दिया।” फ्रेंज ने कहा, “उस घटना के बाद से मेरा फिल्म-एक्टरों पर से विश्वास उठ गया।”
गरज यह कि इसी तरह ये लोग बातें करते रहते। युद्ध की ज्वालाओं में सभी लिपटे हुए थे। कभी ऐसा अवसर नहीं आता कि इनके हाथ में पिस्तौल हो और हिटलर अकेला सामने हो। फिर जर्मनी की हार होने लगी। एक-एक देश हाथ से छूटते चले गए, बर्लिन तक दुश्मनों के हवाई जहाज़ आने लगे। रूसी फौजों ने जर्मनी के बड़े हिस्से पर अधिकार जमा लिया और वे बर्लिन की तरफ बढ़ने लगीं। आँचू के सिगरेट कारखाने पर एक बम गिर चुका था और उसका सारा काम ठप हो गया था। वह और फ्रेंज बर्लिन में एक जगह से दूसरी जगह घूमते और हिटलर को मारने का उनका मनसूबा और दृढ़ होता जाता। आँचू का क्रोध हिटलर के प्रति अब और बढ़ गया था। न वह युद्ध करता और न आँचू का सिगरेट का कारखाना बरबाद होता। कारखाना बरबाद होने से आँचू को फ्रेंज के समान क्लब का काम करने की पूरी फुरसत थी।
उसी रात रूसी सेना बर्लिन में घुस आई। शाम आँचू और बादमेर हिटलर के पैलेस में गए। फ्रेंज बाहर खड़ा रहा। बादमेर ने देखा, सीढ़ियों पर हाफ्टमैन की लाश पड़ी है। उसने आँचू से कहा, “हाफ्टमैन मर गया।”
“अच्छा हुआ। अब हिटलर भी मरेगा।”
“मारिया रिल्के के पास मुझे जाना चाहिए।”
“क्यों, सहानुभूति जताने जा रहे हो ?”
“नहीं, उससे कहूँगा, अब तो हाफ्टमैन मर गया, मुझसे शादी कर ले।”
“फिर कह देना। पहले क्लब की ओर से हिटलर का खात्मा करना ज़रूरी है।”
“यदि इतनी देर में कोई दूसरा व्यक्ति मारिया को ले गया, तो मेरे हाथ में आया यह सुनहरा मौका भी निकल जाएगा।”
“तो तुम जा रहे हो ?”
“हाँ। तुम जल्दी अपना काम खत्म कर मेरी शादी की पार्टी में आओ। ओह ! आज की रात कितनी सुहानी होगी !”
और बादमेर चला गया। बाहर फ्रेंज ने भी उसे रोकने की कोशिश की, पर वह नहीं माना।
अब सारा खेल आँचू तम्बाखूवाले के हाथ में आ गया। उसने अपने झोले से सिगरेट के पैकेट निकाले और हिटलर के पहरे में खड़े जर्मन सिपाहियों को बाँटने लगा, “वाह बहादुर सिपाहियो, पिछले कई सालों से तुम इस जंग के पीछे बेवकूफ बनते रहे और अच्छे किस्म की सिगरेट नहीं पी पाए। लानत है ऐसी ज़िन्दगी पर ! चारों ओर धुआँ है और मुँह में धुआँ नहीं। हिटलर अजीब आदमी है, न खुद सिगरेट पीता है न दूसरों को पीने देता है। लो भाइयो, आँचू के बरबाद कारखाने की आखिरी सिगरेटें अपनी ज़िन्दगी के आखिरी दिनों में पी लो।”
सिगरेट, शराब और लड़की सिपाही की कमज़ोरी होती है। नाजी सिपाही आँचू के दिए पैकेट लेकर सिगरेट पीने लगे। वह कहता रहा, “हमारे क्लब ने, जिसका उद्देश्य पापियों का नाश करना है और जिसके अध्यक्ष जर्मनी के महान् इतिहास-निर्माता फ्रेंज गिट्सबर्ग हैं, यह तय किया है कि सिगरेट पीनेवालों को आज के रोज़ मुफ्त सिगरेटें बाँटी जाएँ और जो सिगरेट नहीं पीता, उसको गोली मार दी जाए।”
यह कहता हुआ आँचू हिटलर के महल के अन्दर घुसता गया। सिपाही लोग रूस के आगे बढ़ने से इतने घबराए हुए थे कि वे यह सुन भी नहीं रहे थे कि आँचू क्या बोल रहा है। अब आँचू हिटलर के कमरे के पास गया। तब तक रूसी फौजें हिटलर का पैलेस घेर चुकी थीं और सिपाही अन्दर घुस रहे थे। आँचू की दी सिगरेटें फ्रेंकते हुए नाजी सिपाही गोली चलाने लगे। फ्रेज गिट्बसर्ग, जो अभी तक पैलेस के बाहर खड़ा हुआ आँचू की प्रतीक्षा कर रहा था, गोलियाँ चलती देख चल दिया। इधर आँचू हिटलर के कमरे में घुस गया। हिटलर उस समय एक नक्शा देख रहा था। आर्यावर्त का और जाने क्या सोचकर हँस रहा था। आँचू को देख उसने पूछा, “कौन हो तुम ?”
“नहीं पहचाने मुझे ? मैं हूँ आँचू तम्बाखूवाला। याद है, एक बार मैं तुम्हारे पास आया था सिगरेट के मामले में बात करने ?”
“हूँ, समझ गया। कहाँ हैं वे लोहे की सिगरेटें, जिन्हें बनाने के लिए मैंने तुम्हें आज्ञा दी थी ?” हिटलर ने उससे पूछा।
“हें हें…लोहे की सिगरेटें ! उन्हें पीना चाहते हो ? वे मेरी इस पिस्तौल में हैं।”
“बहुत अच्छे। एक पिस्तौल में कितनी सिगरेटें आती हैं ?”
“तेरी जान लेने के लिए एक काफी है।”
“क्या मतलब ?”
“मतलब बताऊँ ! मैं एक गुप्त क्लब का सम्माननीय सदस्य हूँ जिसका अध्यक्ष संसार का इतिहास-निर्माता फ्रेंज गिट्सबर्ग है। इस क्लब का उद्देश्य पापियों का नाश करना है। इसके अन्तर्गत आज मैं तुझे मारने आया हूँ।”
“क्लब को रजिस्टर्ड करवाया या नहीं ?”
“नहीं। तेरे मरने पर करवाएँगे।”
“तुम बड़े बदतमीज़ हो। क्या तुम कम्युनिस्ट हो ?”
“जी नहीं। हम किसी राजनीतिक गुटबन्दी या दलबन्दी में नहीं हैं। हमारा क्लब इससे परे है और संसार से पापियों के नाश के हमारे प्रयास वैयक्तिक एवं स्वतन्त्र रूप से किए जा रहे हैं। कम्युनिस्ट तुम्हें मारें उसके पहले हम तुम्हें मारकर सारा क्रेडिट लूट लेंगे।”
“तो तुम मुझे मारने आए हो ?”
“हाँ। “ अब समझे !”
“मैं तुम्हारे कारखाने की सिगरेट पीने को तैयार हूँ। उसके विज्ञापन में अपना फोटो दे सकता हूँ।” हिटलर गिड़गिड़ाया।
“अरे, अब तो कारखाना भी बरबाद हो गया, भाई ! जब बोला था, तब तू तैयार नहीं हुआ। अब क्या फायदा ?”
इसी समय रूसी लोगों ने कमरे के बाहर नारा लगाया। आँचू ने तुरन्त हिटलर को गोली मार दी। हिटलर वहीं ढेर हो गया। फिर इस प्रकार पापियों का नाश करनेवाले पेरिस के पुराने गुप्त क्लब का उद्देश्य पूरा हुआ।