एक बैले की तैयारी (व्यंग्य) : शरद जोशी | Ek baile ki taiyari : Sharad Joshi ke Vyangya

 

बड़े पैमाने पर सरकार और छोटे पैमाने पर जनता को मूर्ख बनाने के लिए मुझे ‘बैले’ की उपयोगिता स्पष्ट नजर आ रही है। ‘बैले’ अर्थात् नृत्य-नाटिका, मगर यह क्षेत्र भी ऐसा है जहाँ अँग्रेजी शब्द हिन्दी से ज़्यादा रोब रखता है। अत: उसका ही उपयोग करना आवश्यक है। मैं चाहे नृत्य नहीं जानता, मगर अँग्रेज़ी जानता हूँ। यदि सिर्फ अँग्रेज़ी से काम नहीं चले तो नृत्य भी कर सकता हूँ। पैसे के लिए कौन नहीं करता। आजकल मैं इस दिशा में गम्भीरता से विचार कर रहा हूँ। एक ऐसा कन्या-प्रधान दल बनाने की सोच रहा हूँ, जिनकी कमर मेरी भृकुटी के ‘रीमोट कण्ट्रोल’ से लचकने लगे। मैंने कुछ विषय खोजे हैं और कुछ अँग्रेज़ी शब्दों के व्यावसायिक अर्थ गहराई से समझे हैं। ‘बैले’ के लिए नृत्य नहीं, शब्द प्रमुख है। कुछ भी कीजिए मगर उसकी एक भावना-प्रधान, एक लहरदार कमेण्ट्री देना ज़रूरी है जिसमें भारी-भरकम से लेकर हल्के-फुल्के शब्दों तक की कसीदाकारी हो, क्रोशिया लेकर आठ-दस पंक्तियों को बुन दिया जाए और विश्वास रखा जाए कि अँग्रेज़ी को देववाणी माननेवाला वर्ग कचरे में से गूढ़ अर्थ निकाल लेगा। यदि शब्दों में शक्ति है तो आप रोब से कचरा प्रस्तुत कर सकते हैं। मैं करनेवाला हूँ। मुझे ‘बैले’ प्रस्तुत करने के लिए सरकारी मदद चाहिए। सरकार अपने को सुसंस्कृत दिखाने के लिए धन नष्ट करने को आतुर है, मेरे ‘बैले’ से श्रेष्ठ क्या माध्यम हो सकता है। आरम्भ के लिए एक लाख रुपया काफी होगा।

कला के क्षेत्र में सफलता की सबसे बड़ी ट्रिक है शहर में जाकर गाँव बेचिए। मैं इसी दिशा में सोच रहा हूँ। गाँव की महिलाओं के शरीर स्वस्थ होते हैं और देखने में सुन्दर। वे समूह में ठुमकते हुए काम करती हैं और यदि एक मुट्ठी-भर लड़कियाँ ग्रामीण वस्त्रों में मंच पर बिखेर दी जाएँ तो शहर का दर्शक आँखें फाड़े उन्हें देखता रहता है, जब तक पर्दा न गिरे। बस, काफी हद तक यही फार्मूला चलेगा। मगर सवाल आधुनिकता का भी है। अतः नए विषय खोजने होंगे। साहित्य के अतिरिक्त सभी क्षेत्रों में एक चम्मच-भर सृजनशीलता जो आर्थिक लाभ देती है, वह एक बाल्टी-भर के लेखन से प्राप्त नहीं होता। मैंने ‘बैले’ के लिए विषय खोजा है और उसके पूर्व के लिए कुछ छोटे-छोटे ‘आयटम’ मेरे पास हैं।

पहला ‘आयटम’ है—दि किसान ऑफ इण्डिया। परदा उठने पर एक किसान दिखाया जाएगा। वह किसान है, किसानी करता है जो देखने में अजीब चीज़ लगती है। चूँकि वह इस लकड़ी के मंच पर फसल उगाने में लगा है, अतः वह बड़े मज़े से नाच-नाचकर यह काम कर रहा है। वह कमर मटकाते हुए हाथ ऊपर-नीचे कर ज़मीन-आसमान एक करने में लगा ही था कि उसकी ‘किसाननी’ आ जाती है और फिर दोनों टुमकते हैं। फिर वह घर चली जाती है और यह मेरा बेटा परदा गिरने तक नाचता रहता है। नृत्य द्वारा यह साबित किया जाएगा कि भारत का किसान कितनी बड़ी मेहनत करता है। क्यों नहीं उसे काम करता देखने के लिए एक टिकट खरीदा जाए ? ‘बैले’ का दूसरा ‘आयटम’ है—वाक। अँग्रेज़ी कमेण्ट्री में बताया जाएगा कि होल मेनकाइण्ड वाक करती है। आदमी बर्थ के बाद वाक करना सीखता है और अल्टीमेट डेस्टिनी तक ‘वाक’ करता रहता है। गरीब-अमीर सब ‘वाक करते हैं, पुरुष-स्त्री सब ‘वाक करते हैं, घर-बाहर सब जगह ‘वाक होता है। परदा उठेगा और लोगों का समूह वाक करता दिखाया जाएगा। बस वे चल रहे हैं—दाएँ-बाएँ इधर-उधर, आगे-पीछे, आमने-सामने। नेपथ्य में सड़क-संगीत बज रहा है। फिर एक ट्रैफिक-पुलिस आता है। वह नृत्य करने लगता है और लोगों को साइड दे रहा है। लोग उसके इशारे से ‘वाक’ करने लगते हैं। वह एक को रोकता है दूसरे को जाने देता है, तीसरे को रोकता है चौथे को जाने देता है। भीड़ बढ़ती है। अलग-अलग वेशभूषा में विभिन्न प्रकार से लड़कियाँ चल रही हैं। दर्शक मुग्ध हैं। वास्तविकता लाने के लिए एक बुढ़िया भी चलती दिखाई है, एक लंगड़ा, एक अंधा। सब ‘वाक’ कर रहे हैं। फिर चले जाते हैं। एक शख्स रह जाता है वह भी घर लौटने की सुस्ती में ‘वाक करता चला जाता है। फिर एक परदा रह जाता है, जो गिर जाता है।

तीसरा ‘आयटम’ संगीत-प्रधान होगा मगर एक सिरे से मौलिक। ‘आयटम’ का नाम होगा ‘दि म्यूज़िक ऑफ पिंजरा’ और प्रमुख गीत के शब्द होंगे-’धुन रे धुनकिया धुन-धुन-धुन।’ परदा उठाने पर एक पिंजरा अपना वाद्य लिए रुई पोंजता दिखाई देता है। ठांय। ठिक। ठांय। ठिक ठांय ! ठांय ! ठिक ! शब्द सुनाई देते हैं, ‘लेडीज़ एण्ड जेन्टिलमेन, हीअर इज़ ए पिंजारा पींजिंग हिज़ कॉटन। सी ज़रा कि लाइफ में लेबर एण्ड म्यूज़िक का कैसा यूनिक कांबिनेशन है।’ और तभी पिंजारन आती है। पिंजारा अपना रुई पींजने का वाद्य बजा रहा है और वह धुनकी हुई रुई उड़ाती नृत्यु करती है। गाना आता है-’धुन रे धनुकिया, धुन-धुन-धुन।’ फिर पिंजारा भी नृत्य करने लगता है। ‘दि डांस ऑफ लाइफ एण्ड लेबर विद म्यूजिक एण्ड डांस। सी लेडीज़ एण्ड जेंटिलमेन ऑफ महानगर, हीअर आय एम टु चीट यू एण्ड यूअर गवर्नमेण्ट !’

उसके बाद एक छोटा-सा ‘आयटम’ है-’खुजली’ नृत्य। उसके मूल में दर्शन है कि आज मानवमात्र अपने शरीर को यहाँ-वहाँ से सहलाने में व्यस्त है। जो विचारक हैं वे अपनी टुड़ी सहला रहे हैं, जो श्रमिक हैं वे अपनी पीठ, और जो सम्पन्न है वे अपनी जाँघें। खुजली अतृप्त आकांक्षा की प्रतीक है अथवा एक एकाकी प्रयास जिसमें मानव स्वयं को टटोलता है। मंच पर जितने नर्तक-नर्तकियाँ आते हैं, वे कहीं न कहीं से अपना शहरी सहला रहे हैं। संगीत धीरे-धीरे जोर पकड़ता है और साथ ही यह क्रिया भी। पूरी रचना एक किस्म का ‘कॉमिक’ है, मगर जब अँग्रेजी में पूरी दार्शनिक गहराई के साथ इसे प्रस्तुत किया जाएगा, यह एक ग्रेट चीज़ बन जाएगी। इस ‘आयटम’ में नर्तक दर्शकों को भी पार्टीसिपेशन के लिए इनवाइट करेंगे कि वे भी अपना शरीर सहलाएँ, स्वयं को खुजलाएँ और धीरे-धीरे समूचा कार्यक्रम एक ‘हैपनिंग’ में बदल जाएगा।

उसके उपरान्त मैं अपना बटुआ सहलाते हुए दर्शकों के लिए पन्द्रह मिनट का इण्टरवल कर देता हूँ। इसमें वे कॉफी पीते या आइसक्रीम चाटते एक-दूसरे को मधुर ‘हाऊ-डू-यू-डू कर’ सकते हैं। परस्पर मुस्करा सकते हैं, इण्टरवल तक प्रस्तुत मेरी उच्च कला पर छोटे-मोटे कमेण्ट कर अपने कला-प्रेमी होने की हवा बाँध सकते हैं और जहाँ ‘जेण्ट्स’ लिखा हो उस कक्ष में घुसकर सफेद गोलियों पर आँखें गड़ा सकते हैं। महिलाएँ एक-दूसरे के साड़ी-जूड़े, हल्के-गहरे मेकअप तथा अन्य स्त्रियों के पतियों के स्वास्थ्य, सूट और स्वभाव पर गौर कर सकती हैं।

उसके उपरान्त मूल ‘बैले’ आरम्भ होता है, जिसके लिए टिकट बेचे गए हैं, पत्रकारों को बटोरा गया है और अफसरों को सादर कार्ड भेजे गए हैं। ‘बैले’ का कथानक एकदम ताजा है। पद के लिए छटपटाती मानव-आत्मा की कहानी। रेल जीवन की गति का प्रतीक है। परदा उठने पर लाइट, शेड और कार्डबोर्ड की मदद से एक रेल दिखाई गई है। लोग पत्नियों, कुलियों और सेण्ड-आफ करनेवालों सहित नृत्य करते हुए आ रहे हैं और रेल में बैठने का नाटक कर रहे हैं। चायवाला आवाज लगा रहा है, गार्ड घूम रहा है, कुली पैसे माँग रहा है। हर शख्स पैर फैलाने का इरादा लिए सिमटा बैठा है। एक अफसर आता है, वह रेल चेक करता है, पटरी चेक करता है, गार्ड की मूँछें चेक करता है और उसकी सलामी लेता हुआस्पेशल कम्पार्टमेण्ट में बैठ जाता है। सीटी बजती है, स्टीम छूटती है, गाड़ी बढ़ने की ध्वनि के साथ पिछले पर्दे के पास का दृश्य दाहिनी ओर खिंचता है। तभी एक व्यक्ति दौड़ता आता है, गार्ड को कुछ कहता है और गार्ड सीटी बजाकर रेल रोक देता है। पैसेन्जर खिड़की से झाँकते नाराज देखते हैं। आगन्तुक रेल के स्पेशल कम्पार्टमेण्ट में बैठे अफसर को दो-एक ज़रूरी पत्र देता है। अफसर पत्र पढ़ने के बाद क्रोध की मुद्रा में सीना फुलाकर नृत्य करने लगता है। पत्र में मन्त्री महोदय ने आदेश दिया है कि अफसर अपना दौरा समाप्त कर दे और लौट आए। यात्री हँस रहे हैं और नृत्य कर रहे हैं। अफसर पैर पटकता हुआ तांडव कर रहा है। यात्री गार्ड से गाड़ी बढ़ाने को कह रहे हैं, अफसर गाड़ी बढ़ने नहीं दे रहा। अन्ततः गार्ड अफसर का स्पेशल कम्पार्टमेण्ट काटकर रेल बढ़ा ले जाता है। यात्रीगण टुमकते हुए रेल के पाश्र्व-संगीत में आगे बढ़ जाते हैं। अब पृष्ठभूमि में करुण संगीत है। अफसर मंच पर अकेला है और एक खाली डिब्बा। वह कभी डिब्बे में घुसकर सीट पर बैठता है, कभी वहाँ से उठकर बाहर आकर नाचने लगता है। संगीत उभरता है। धीरे-धीरे अफसर नृत्यु करते हुए मात्र एक अकेला अफसर नहीं रहता। वह उन समस्त प्यासी भारतीय आत्माओं का प्रतीक बन जाता है जो अपनी कुर्सी से चिपके रहना चाहते हैं और उसके साथ गति के लिए आकुल हैं। गति के अभाव में कुर्सी और कुर्सी के अभाव में गति उन्हें व्यर्थ लगती है। ‘बैले’ का अन्त लम्बा और दिल को हिला देने वाला है। अकेला नर्तक एक सीट के आसपास नाच रहा है और वह नाचते-नाचते थककर गिर जाता है, वहीं पटरी पर। स्पेशल डिब्बा धीरे-धीरे हट जाता है। दूर से रेल का प्रकाश दिखाई देता है, सीटी सुनाई देती है और एक मानवीय चीख और रेल की घड़घड़ाहट के साथ परदा गिर जाता है।

आपका क्या ख्याल है ? यह एक खेलने लायक ‘बैल’ है ना। मुझे सरकारी मदद मिल जाएगी। मदद उसके पूर्व मुझे कुछ नर्तकों की मदद चाहिए। जो भली-भांति टुमकना जानते हों, कृपया मुझसे सम्पर्क करें।