चाँद पर (व्यंग्य) : शरद जोशी | Chand pr : Sharad Joshi ke Vyangya

 

भारत में विज्ञान के विकास के सरल और संक्षिप्त इतिहास में वह दिन स्वणक्षिरों अथवा ‘चौदह पाइंट बोल्ड’ में लिखा जाने योग्य था, जब दो भारतीय वैज्ञानिकों ने यह घोषणा की कि गोबर-गैस से अंतरिक्षयान बसूबी चलाए जा सकते हैं। घोषणा के साथ ही चाँद और मंगल पर जाने के आर्य इरादे बल पकड़ गए। धुआँधार वक्तव्य आरम्भ हुए और ठंडे तरीके से काम कर रही लोकसभा में गर्मी आ गई। सरकार का गला पकड़कर विरोधी दलों ने पूछा कि बताओ इस दिशा में क्या कर रहे हो ? और तब रिपोर्ट आने पर वक्तव्य देने का वादा कर सरकार ने अपना गला छुड़ाया।

रिपोर्ट दो माह बाद आई, जब सेशन खत्म हो चुका था। रिपोर्ट में जो वैज्ञानिक तथ्य दिए थे, उन्हें तो कैबिनेट की सब-कमेटी समझ नहीं पाई, पर इसके राजनीतिक महत्व को कांग्रेस हाई कमाण्ड ने समझ लिया। अगला चुनाव जीतने के लिए अन्तरिक्ष-यात्रा का नारा ज़ोरदार रहेगा। तय रहा कि बात आगे बढ़ाई जाए।

जिस दिन प्रधानमन्त्री ने पत्रकारों को बताया कि चाँद पर जाने के लिए अन्तरिक्षयान का निर्माण आरम्भ हो रहा है, उसी दिन राष्ट्रपति ने एक अध्यादेश निकाल गोबर को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर दिया। गाय का नए सिरे से सम्मान आरम्भ होने के कारण हिन्दू धर्म के नेताओं ने अध्यादेश की प्रशंसा की और कुछ महात्माओं ने बताया कि प्राचीन काल में भारतीय यान गोबर-गैस से ही चलते थे, इन्द्र, जो स्वर्ग का राजा था, उसके पास सर्वाधिक गोबर देनेवाली गायें थीं। पृथ्वी के किसी राजा के पास यदि गायों की संख्या बढ़ जाती और वह अन्तरिक्षयान उड़ाने के लिए सक्षम हो जाता तो इन्द्र तुरन्त ब्राह्मण का रूप धर उसकी गायें दान करवा लेता। बेचारे राजा के सारे अरमान धरे रह जाते। प्राचीन काल में भारत में दूध-दही की नदियाँ बहती थीं और गोबर के पहाड़ थे।

मतलब यह कि घोषणा का अच्छा स्वागत हुआ। सरकार ने कलक्टरों को आदेश दिए कि वे गोबर के दुरुपयोग को रोकें। कलक्टर कड़ी नज़र रखने लगे। कुछ ही दिनों में हर ज़िले में गोबर कट्रोलर के पद स्थापित किए गए। नियुक्तियाँ भी हुई। इधर मिलिटरी कारखाने में अन्तरिक्षयान बनाने का काम अपेक्षाकृत तेज़ी से चला। खुशी की बात थी कि सारे पुर्जे देशी थे। पर डर की भी यही बात थी कि कहीं इसी कारण अन्तरिक्षयान में रास्ते में गड़बड़ न हो जाए। सरकार के बार-बार निर्देश बदलते और उन्हींके अनसार डिज़ाइन बदलना पड़ता। मूल प्रस्ताव यह था कि अन्तरिक्षयान में पाइलट के अलावा एक वैज्ञानिक रहेगा। पहला डिज़ाइन उसीके अनुरूप बना। पर बाद में सचिवालय से आदेश आए कि एक अफसर के बैठने का भी इन्तज़ाम रखा जाए। जल्दी ही दूसरे आदेश आए कि अफसर के साथ एक चपरासी भी जाएगा। पर कांग्रेस के ऊपरी सरकल का ज़ोर था कि अन्तरिक्षयान में एक नेता भी बैठा होना चाहिए। यह अवसर किसे दिया जाए, इसे लेकर अन्दर ही अन्दर काफी खींचतान रही। श्री जगजीवनराम ज़ोर दे रहे थे कि किसी हरिजन को चाँद पर भेजा जाए ताकि इस देश से छुआछूत हमेशा के लिए सामाप्त हो जाए। उन्होंने भावपूर्ण शब्दों में कहा कि आज गांधी जी जीवित होते तो हरिजन को ही चाँद पर भेजते। धार्मिक नेताओं पर इसकी तीव्र प्रतिक्रिया हुई। उन्होंने नारा दिया-’चन्द्र को अपवित्र होने से बचाओ !’ इधर दक्षिणवालों का कहना था कि इस मामले में उनकी उपेक्षा हो रही है। धीरे-धीरे सभी राज्य सर उठाने लगे। मध्य प्रदेश से एक डेपुटेशन दिल्ली गया और उसने माँग की कि भारत का पहला अन्तरिक्ष स्टेशन मध्य प्रदेश में बनना चाहिए, क्योंकि हमारा राज्य भारत का हृदयस्थल है और अन्य राज्यों की तुलना में पिछड़ा हुआ है। केन्द्रवालों ने कहा कि अन्तरिक्ष स्टेशन तो नहीं, हम आपको तीन रेलवे स्टेशन दे सकते हैं। डेपुटेशन के सदस्य रेलवे स्टेशन लेकर सहर्ष लौट आए। पर अन्य राज्य डटे रहे। प्रधानमन्त्री उलझन बढ़ती देख तटस्थ हो गई और व्यक्ति तथा स्थान का चयन करने के लिए तीन बड़े नेताओं की कमेटी बना दी गई है, जिसका फैसला अन्तिम माना गया…।

जिस दिन अन्तरिक्षयान चाँद के लिए रवाना हुआ, उस दिन सार्वजनिक अवकाश घोषित कर दिया गया। डाक विभाग ने एक टिकट निकाला और प्रधानमन्त्री ने आकाशवाणी से यात्रियों के लिए शुभकामना व्यक्त की, जिसमें कहा गया कि आज हम नए युग में प्रवेश कर रहे हैं और हमें एकता की भावना बनाए रखनी चाहिए। एक और राष्ट्रीय स्तर के नेता ने कहा कि आज हम इस स्थिति में आए गए हैं कि अमरीका और रूस को मार्गदर्शन करा सकें। कांग्रेस-अध्यक्ष ने पत्रकारों से मज़ाक में कहा कि अगला कांग्रेस अधिवेशन चाँद पर होगा, जिसकी बॉक्स स्टोरी प्रकाशित हुई। इसका बाज़ार पर भी असर पड़ा कि एकाएक जाने कैसे तिलहन के भाव गिर गए। कुछ फिल्म प्रोड्यूसरों ने घोषणा कर दी कि उनकी अगली फिल्म चाँद पर होगी। अन्तरिक्ष-यात्रा के समय और मुहूर्त को लेकर ज्योतिषियों के अलग-अलग बयान छपे और यात्रियों की जन्म-पत्रिकाएँ छापी गई। अन्तरिक्ष-यात्रा की सफलता हेतु एक तीर्थस्थल पर विराट यज्ञ भी आरम्भ हो गया, जिसमें यान के रवाना होने से लौटने तक लगातार आहुतियाँ डालने का निर्णय लिया गया। आकाशवाणी ने घोषणा की कि अन्तरिक्षयान की रवानगी का आँखों देखा हाल सभी केन्द्रों से अँग्रेज़ी व हिन्दी में प्रसारित किया जाएगा। जूता उद्योगवालों ने अन्तरिक्ष-यात्रियों को मुफ्त जूते और बीड़ी उद्योगवालों ने मुफ्त बीड़ी के बण्डल दिए और उनसे वादा लिया गया कि जब वे चाँद पर उतरेंगे, देशी जूता पहनकर उतरेंगे और वहाँ खड़े होकर बीड़ी पीएँगे।

अन्तरिक्षयान में सबसे आगे पाइलट और उसके पास एक वैज्ञानिक महोदय बैठे थे। आप विज्ञान की जिस शाख से सम्बन्ध रखते थे, उसका अन्तरिक्ष से कोई वास्ता नहीं था, पर मिनिस्ट्रिी में इनकी पहुँच गहरी थी, इसीलिए इनका सिलसिला बैठ गया। वैज्ञानिक के पीछे नेता महादेय बैठे थे। आप खिड़की के पास सटकर बैठे थे और बाहर झाँक-झाँककर जनता को नमस्कार कर रहे थे। ऐसा आप तब तक करते रहे, जब तक अन्तरिक्षयान धरती के मीलों ऊपर न उठ गया। नेताजी के पीछे एक अफसर बैठा था, जिसके पास अन्तरिक्ष अभियान से सम्बन्धित सारे कागज़ात की फाइल थी, जो उन्होंने अपने पीछे अपने बैठे चपरासी को थमा दी थी।

“अब हमारा अगला मुकाम कौन-सा होगा ?” नेताजी ने अफसर से पूछा। अफसर ने वैज्ञानिक से पूछा। वैज्ञानिक ने पाइलट से पूछा।

“चाँद,” पाइलट ने वैज्ञानिक से कहा।

“चाँद,” वैज्ञानिक ने नेताजी से कहा।

नेताजी को सीधी जानकारी देने के अपराध पर अफसर ने वैज्ञानिक को घूरकर देखा। वैज्ञानिक सहमकर बैठ गया।

“क्यों नहीं रास्ता काटने के लिए हम सब मिलकर रघुपति राघव राजा राम गाएँ ?” नेताजी ने मुस्कराते हुए सुझाव दिया और स्वयं गाना आरम्भ कर दिया। चपरासी ने सुर मिलाया। फिर अफसर ने और फिर वैज्ञानिक ने। पाइलट कुछ देर चुप रहा। वह एयरफोर्स का सीनियर अधिकारी था। अन्तरिक्षयान में यह डिस्टरबेंस देख वह बिगड़ खड़ा हुआ। उसने अफसर से कहा कि अगर आप लोग खामोश नहीं बैठे तो किसी दुर्घटना के लिए मैं ज़िम्मेदार नहीं होऊँगा। फिर सब चुप हो गए।

“भाई, यह भजन तो शान्ति बढ़ाता है, दूर नहीं करता,” नेताजी ने कहा। पाइलट ने कोई जवाब नहीं दिया।

कुछ देर बाद नेताजी ने अफसर से पूछा, “क्या मैं अपने देश के भाइयों को सम्बोधित कर सकता हूँ ?”

“ज़रूर !” अफसर ने उनके सामने वह माइक लगा दिया, जो पृथ्वी के रेडियो स्टेशन से जुड़ा था। नेताजी की बाछे खिल गई। माइक हाथ में लेकर भाषण देने लगे अपने प्यारे देशवासियों के लिए। उन्होंने बताया कि किस प्रकार भारत आज़ाद हुआ, कैसे अँग्रेज़ गए, फिर कैसे योजनाएँ चलीं और कैसे आज देश विकास करता हुआ चन्द्रमा की ओर जा रहा है। नेताजी भाषण देते रहे, देते रहे और तब तक देते रहे जब तक कि अन्तरिक्षयान चाँद पर नहीं पहुँच गया।

स्वागत के लिए कोई भीड़ नहीं थी। मौसम ठण्डा नैनीतालनुमा था। वे लोग नीचे उतरे और चहलकदमी करने लगे। ज़मीन सपाट थी पर उपजाऊ बनाई जा सकती थी। कुछ फल के पेड़ थे-ऊँचे। चपरासी ऐसे वक्त काम आया। उसे चढ़ाया गया और फल तुड़वाए गए। मीठे थे। नेताजी ने कुछ खाए और कुछ अपने बच्चों के लिए झोले में डाल लिए। वहाँ से पृथ्वी नज़र आती थी। भारत भी दिखता था। अजब अखण्ड भारत क्योंकि पाक-सीमा दिखाई नहीं देती थी। वे लोग आधा मील क्षेत्र में भटके, फिर सूझा नहीं कि क्या करें।

“भाई, इतने विशाल क्षेत्र में बिना जीप के यात्रा असम्भव है,” नेताजी ने कहा ।

‘‘आप ठीक फरमा रहे हैं।”

“न रास्ते हैं, न खेत…”

“जी हाँ।”

“अगर यहाँ कुछ आदिवासी मिल जाते तो हम इसे पिछड़ा हुआ क्षेत्र घोषित कर देते।”

“जी हाँ, ऐसी जगह कमिश्नर नियुक्त किया जा सकता है, जो क्षेत्र का विकास करे तथा कानून-व्यवस्था बनाए रख सके। हमारे देश में प्रशासन की उच्च परम्परा रही है। उसका लाभ चाँद को मिलना चाहिए।” अफसर ने कहा।

पर इसी समय एक अठपहलू यान आया और इनके करीब उतरा, जैसे कोई हैलिकॉप्टर पूरे इत्मीनान से उतर रहा हो।

यान से तीन व्यक्ति नीचे उतरे। उनके बाल सुअरों की तरह कड़े और ब्रश की तरह खड़े थे। इनके पेट उठे हुए थे और वे पूरे शरीर पर एक कुरतेनुमा ढीला वस्त्र डाले थे।

“ये चाँद क्षेत्र के कोई बड़े नेता लोग हैं जो हमारे स्वागत को आ रहे हैं,” नेताजी ने पूरे विश्वास से कहा।

“कैसे कहा जा सकता है ?” पाइलट बोला।

“देख नहीं रहे, ये ढीला कुरता पहने हैं और इनके पेट उठे हुए हैं। ज़रूर ये कोई बड़े नेता हैं।” उन्होंने चाँदवासियों को हाथ जोड़कर नमस्कार कहा। इस शिष्टाचार का उन लोगों ने कोई जवाब नहीं दिया।

“कहाँ से आए हो ?” उन्होंने पूछा।

“पृथ्वी से, हम भारतवासी हैं, रूस, अमरीका के नहीं। समझे ! वे लोग भी यहाँ आने की कोशिश में हैं।”

“तुमने अपना यान जंगल में उतारा है। हमारे शहर इसके नीचे बसे हुए हैं। वहाँ चलिए।”

शुरू में भोले भारतवासियों को समझ नहीं आया। बाद में पता चला कि वे ज़मीन के अन्दर रहते हैं और ऊपरी सतह पर खेत और जंगल हैं। वे तीनों इन लोगों को अपने यान में बिठा ऊपर उड़े, फिर कुछ दूर धूल के एक सुराख में प्रवेश कर नगर में पहुँच गए। अच्छा, विकसित शहर।

“आपके यहाँ निर्माण-कार्य काफी हुआ है। टेण्डर सिस्टम है ? ठेकेदारों से कितना कमीशन मिल जाता है ?” नेता ने पूछा।

“हमारे दिमाग में अभी ऐसे विचार नहीं उठे हैं।”

“आपको अभी हमसे बहुत कुछ सीखना है,” नेता ने जवाब दिया। फिर पूछा, “शासन-व्यवस्था कौन-सी है ? ऐसा सुचारु रूप से काम तो डिक्टेटरशिप में ही चलता है।”

“प्रजातन्त्र है,” चाँदवासी ने उत्तर दिया।

“हूँ, समाजवाद का चक्कर भी है कि नहीं ? जनता को किस उम्मीद पर अटकाते हो ?”

“यहाँ जनता धोखे में नहीं आती।”

“फिर नेतागीरी केसे चलती है ?”

“जनता नेता चुनती है।”

नेता महोदय ने ठण्डी साँस ली और कहा, “अभी आपको हमसे काफी सीखना होगा।” फिर बोले, ‘‘यहाँ से हम कौन-सा माल सस्ता खरीद भारत में महँगा बेच सकते हैं ?”

‘‘हम माल नहीं बेचते।”

“खरीद तो सकते हैं ? अचार, चटनी, पापड़, तेन्दु पत्ते की बीड़ी, साड़ी, जूता वगैरा। एक बार आजमाकर खात्री करें।”

“हमें नहीं चाहिए। हमारे पास ज़रूरत की सब चीजें हैं।”

“आप हमें मदद दे सकते हैं ? अनाज, मशीनें, उपन्यास, ब्लेड।”

“नहीं।”

“फिर आपकी दोस्ती से हमें क्या लाभ ?”

“हम आपको आपके यान तक वापस छोड़ सकते हैं।”

“हम यहाँ आए हैं तो पूरे चाँद की सैर करके जाएँगे, ताकि अपने देशवासियों पर हम अपना रोब गाँठ सकें। हमारे कवियों ने चाँद पर बहुत-सी कविताएँ लिखी हैं, जिनका संकलन हम लाए हैं, हम आपको वह सुनाना चाहते हैं। हम यहाँ की जनता को भाषण देना चाहते हैं। आपको हमारा सम्मान वगैरा करना चाहिए। बदले में हम आपको भारत आने का निमन्त्रण देंगे। वहाँ आपका सम्मान करेंगे। हमारे यहाँ बहुत-से विश्वविद्यालय हैं, हम आपको किसी विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट दिलवा देंगे।”

तीनों चाँद वाले खूब हँसे। उन्होंने कहा, ““ठीक है, जैसा आप चाहते हैं हम आपको चाँद पर घुमा देंगे।”

भारत से गए इन महान् यात्रियों ने चाँद पर अजीब बातें देखीं। उन्होंने देखा की वहाँ लोगों को नहीं चलना पड़ता बल्कि सड़के चलती हैं। चुँकि सभी स्ञियों की शक्ल एक जैसी है, अतः पराई बीवी को घूरने का सवाल नहीं उठता। पीढ़ियों का संघर्ष नहीं है, क्योंकि हर व्यक्ति एक निश्चित आयु में निश्चित रूप से मर जाता है। स्नॉबरी एक मर्ज़ माना गया है, जिसे समाप्त करने के लिए इन्जेक्शन लगते हैं। आम आदमी अपने सेक्सुअल मामले, अतीत और भविष्य का कार्यक्रम छुपाकर नहीं रखता। लोग मौसम से नहीं डरते। चाँदवालों के हाथ में रेखाएँ नहीं होतीं और जन्मपत्री नहीं बनाई जाती। विशेषज्ञ निकृष्ट कोटि के व्यक्ति माने जाते हैं और बहुविद् व्यक्ति सम्मान पाता है। जनता भाषण देती है, जिसे नेता चुपचाप सुनता है और उसके अनुरूप कार्य करता है। मुखौटों, बैसाखियों और चमचों का चलन नहीं है। लोगों के चेहरों पर बाल नहीं उगते, अत: ब्लेड नहीं बिकते। उन लोगों के पास इतने बड़े यन्त्र हैं कि वे सभी ग्रहों के विषय में विस्तार से जानकारी प्राप्त कर लेते हैं। चाँदवालों ने बातचीत में नेताजी को बताया कि उनके भारत में शीघ्र ही आम चुनाव होनेवाले हैं, तो नेताजी सुनकर चौंक गए। फिर उन्होंने हिसाब लगाकर बताया कि अभी आम चुनाव में दो वर्ष की देर है। इस पर चाँद का एक वैज्ञानिक हँसा और बोला, “जी नहीं, शायद आप नहीं जानते कि चाँद का एक दिन पृथ्वी के एक वर्ष के बराबर होता है। अब तक पृथ्वी के कैलेण्डर में दो वर्ष बीत चुके।”

“ऐं !” सभी मानो आसमान से नीचे गिर पड़े।

“जी हाँ।”

“अरे भाई साहब, हम तो लुट गए ! आप क्या कह रहे हैं ! मुझे हमेशा के मुताबिक इस बार भी चुनाव में खड़ा होना है, कांग्रेस से टिकट लेना है, क्षेत्र का दौरा करना है। ऐसी-तैसी इस चाँद की ! चली भई, उठाओ सामान !”

अफसर भी चिन्तित था। अगर दो साल हो गए तो उसके प्रोमोशन का वक्त आ गया था। वैज्ञानिक ने एक अमरीकी विश्वविद्यालय में स्कॉलरशिप का डौल जमाया था, जो दो साल बीत जाने पर गल सकता था। चपरासी को अपनी बिटिया का ख्याल आया, जो अब पन्द्रह वर्ष की हो गई होगी। उसकी शादी करनी है।

वे सभी अन्तरिक्षयान की ओर भागे।

“तुम तो जानते ही मेरे चुनाव-क्षेत्र की हालत। राठौड़ का ग्रुप अपना असर जमाना चाहता है। इन दो सालों में उसे बड़ा मौका मिल गया होगा। मन्त्रिमण्डल में भी मेरे शत्रु कम नहीं, पता नहीं मेरा विभाग किसे दे दिया गया होगा। इन लोगों ने मुझे चाँद पर भेजकर मेरा पोलिटिकल कैरियर नष्ट करना चाहा है। अगर ऐसा हुआ तो मैं कांग्रेस छोड़ दूसरी पार्टी में चला जाऊँगा।”

“नहीं साहब, कैरियर तो अब आपका शुरू हुआ है। आपके तो बड़े चान्स हैं,” अफसर ने उन्हें मक्खन लगाते हुए कहा।

अन्तरिक्षयान तेज़ी से पृथ्वी की तरफ बढ़ रहा था। एकाएक नेताजी अफसर से बोले, “क्यों यार, अगर पृथ्वी पर हमारे दो वर्ष बीत चुके हैं तो हम अपनी यात्रा का भत्ता भी दो वर्ष का ही लेंगे। क्या ख्याल है ? ज़रा हिसाब तो लगाओ।”

अफसर हिसाब लगाने लगा। प्रति किलोमीटर यात्रा भत्ते की दर से पृथ्वी और चाँद के बीच दूरी का गुणा कर उसे डबल किया, जो 9,52,000 किलोमीटर निकला। फिर उसमें डेली भत्ते की दर से दो साल की रकम जोड़ी। काफी बड़ी रकम बन गई थी।

“अरे ! इससे तो पूरा चुनाव लड़ लूँगा।” नेता झूम उठे। फिर अफसर, वैज्ञानिक और चपरासी ने भी भत्ते का हिसाब लगाया ।

पृथ्वी पर, यानी अपने प्यारे और लाभदायक भारत की पवित्र भूमि पर उतरने के उपरान्त जब पत्रकारों के एक जिज्ञासु गुच्छे ने नेताजी से प्रश्न किए तब उन्होंने स्पष्ट कहा, “चाँद पर जाने से कोई फायदा नहीं। उन कम्बख्तों से न उधार मिल सकता है, और न किसी किस्म की मदद की उम्मीद है। ये तो बड़े देशों के चोंचले हैं ! अगर हम विकसित देश हो गए तो पिछड़े होने के सारे मुक्त लाभों से वंचित हो जाएँगे। मैं सरकार को स्पष्ट सलाह दूँगा कि वे बजाय चाँद के मुझे अमरीका भेजा करें।”

कहना न होगा कि नेता महोदय के इस ऐतिहासिक बयान के आधार पर ही बाद में भारत सरकार ने चाँद सम्बन्धी अपनी नीतियाँ घोषित कीं, जिनके अन्तर्गत चाँद पर कविताएँ लिखने के अलावा अन्य प्रयासों को राष्ट्रीय हित के विरुद्ध करार दिया गया।