बुद्ध के दाँत (व्यंग्य) : शरद जोशी | Buddha ke Dant : Sharad Joshi ke Vyangya

 

पेकिंग के बाज़ार में वैसी मन्दी कभी नहीं आई। दुकानदारों को समझ नहीं आता था कि क्या करें ? सब गाँठ की पूँजी खाने में लगे थे। नए माल के ऑर्डर दिए जाने लगभग बन्द हो चुके थे। असर कारखानों तक फैल रहा था, जहाँ गोदाम भरे थे और मशीनें रुक गई थीं। च्यांग की सरकार समझ नहीं पाती थी कि क्या करे ! मन्त्रियों की रोज़ बैठकें होतीं और आर्थिक प्रश्नों पर बहस चलती। वे बहसें और वायदे चीन के अखबारों में छपते पर उनका कोई असर नहीं पड़ता। लोगों की अखबार खरीदने की इच्छा मर गई थी। मन्दी का यह वातावरण लम्बे समय तक बना रहा। पेकिंग के एक पुराने पत्रकार च्याऊँ पाँऊ के शब्दों में कहा जाए, तो पेकिंग के बाज़ारों को मानो अफीम पिला दी गई थी। चहल-पहल-भरे वे बाज़ार शाम को भी यों ही बने रहते, जैसे दोपहर या रात की। फटी-फटी आँखों से दुकानदार आते-जाते इक्के-दुक्के व्यक्तियों को घूरा करते और प्राय: रोक-रोककर पूछते कि आपको क्या लेना है ?

मुसीबत थी छोटे दुकानदारों की, जो थोड़ी-सी पूँजी लेकर अपना काम चलाते थे। फैन्सी सामान की खरीद तो बन्द हो गई थी। कपड़ा, आइने, गुब्बारे, जेवर या रेशम जैसी चीज़ लेना लोग पाप समझ रहे थे। सिनेमा और नाटकों की कुर्सियाँ दस प्रतिशत भी नहीं भरतीं और सारी कमाई विज्ञापनबाज़ी में खर्च हो जाती। ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए दुकानदार नित नए तरीके खोजते। जैसे,कोई सुंदरियों के बड़े–बड़े अर्धनग्न चित्र टॉंगता, बाजा बजाता, हुमकता हुआ जोकर खड़ा करता और कन्सेशनों और इनामों की घोषणा करता। जैसे एक धार्मिक पुस्तक खरीदने पर किसी स्त्री का सुन्दर उत्तेजक चित्र मुफ्त भेंट किया जाता था, इससे कुछ धार्मिक पुस्तकें बिक जातीं। लड़के खरीदते, चित्र अपने कमरें में टाँग लेते और पुस्तक बाप को भेंट कर देते। ठीक उसी तरह नृत्यघरों में जाने पर भगवान बुद्ध का एक चित्र भेंट किया जाता। इससे नृत्यघरों को कुछ धार्मिक प्रकृति के ग्राहक मिल जाते। हर दुकानदार कोई नया स्टण्ट खोजता, जिससे उसकी दुकान चर्चा का विषय बन जाए। दुकानों में सामान बेचनेवाली लड़कियों से दुकान के मालिक और मैनेजर प्रार्थना करते कि वे ज़्यादा से ज़्यादा युवकों को प्रेमजाल में बाँधे, जिससे वे प्रेमी उनकी दुकानों से ही खरीदने आया करें। यहाँ तक कि इन लड़कियों के प्रेमपत्रों का डाक-व्यय भी बूढ़े मालिक और मैनेजर अपनी गाँठ से लगाते थे। कहने का मतलब यह कि पेंकिग की वह मन्दी ऐतिहासिक थी, जिसने अच्छे-अच्छे धन्धा करनेवालों को पतला कर दिया था।

उन्हीं दिनों पेकिंग की एक छोटी-सी गली में दाँत के डॉक्टर ल्यू च्यांग पांग की भी दुकान थी, जो सब दुकानों की तरह खस्ता हाल चल रही थी। माह-भर से एक भी ग्राहक नहीं आया था, जिसके हिलते दाँतों को झटका दे वह कम से कम दुकान का किराया तो वसूल कर लेता। उसके सामने एक नाई की दुकान थी, जो उसकी ही दुकान की तरह खाली बनी रहती थी। दिन-भर न्यू च्यांग पांग और वह नाई निराश बैठे सामने से धीरे-धीरे गुज़रते लोगों को देखते रहते। नाई अक्सर छोटे-छोटे लड़कों को रोककर उन्हें भद्दे गाने और चुटकुले सुनाता ओर बाद में उनके बाल पकड़ नोंचते हुए कहता–”इन्हें कटवाओ ना, क्या बढ़ा रखे हैं सुअरों जैसे।” ल्यू च्यांग पांग खुद को प्रतिष्ठित डॉक्टर समझता था और ऐसी स्तरहीन हरकतें नहीं कर सकता था। उसकी दुकान बाप-दादों से चली आई थी और उसका खानदान बिना दर्द के दाँत उखाड़ने के काम में प्रसिद्ध था। ल्यू च्यांग पांग गम्भीर व्यक्ति था और बड़े बूढ़ों से इज़्ज़त से बात करता था। अक्सर वह किसी प्रौढ़ व्यक्ति को दुकान पर बुलाकर बिठा लेता और दर्शन, काव्य और चित्रकला आदि पर बातें करता, धीरे-धीरे पायिरया के खतरे पर आ जाता और उस प्रौढ़ व्यक्ति को सलाह देता कि दाँत की मज़बूती पर ध्यान दे और एकाध दाँत कमज़ोर हो तो उखड़वा ले। बूढ़े उसे आश्वासन देते और विदा हो जाते। बाज़ार में मन्दी थी और किसी के पास दाँत उखड़वाने को पैसा न था।

एक सुबह ल्यू च्यांग पांग ने देखा कि सामने वाला नाई अपनी दुकान के बाहर यह नोटिस टाँग रहा है-’बाल कटवाइए और तेल की एक शीशी मुफ्त लीजिए।’ नोटिस लगाने के बाद नाई ल्यू च्यांग पांग की और देखकर मुस्कराया और बोला, “भई दुकान चलाने के लिए कोई स्टण्ट करना पड़ेगा, नहीं भूखों मर जाएँगे।”

डॉक्टर ल्यू च्यांग पांग दिन-भर बैठा उस बोर्ड को देखता रहा और सोचता रहा कि वह अपनी दुकान पर क्या आकर्षण बढ़ाए कि लोग उससे दाँत तुड़वाने लगें। इसी ख्याल में डूबे हुए ल्यू च्यांग पांग को उन चायघरों का ध्यान आया, जो अपनी दुकान के विषय में यह प्रसिद्ध करते हैं कि फलाँ-फलाँ महापुरुष उनके यहाँ चाय पीते रहे हैं। प्रसिद्ध राजनीतिक, चित्रकार और लेखकों के नाम हर चायघर और उनकी टेबलों के साथ जुड़े रहते। ल्यू च्यांग पांग ने सोचा कि वह अपनी दुकान के बारे में भी यह मशहूर कर दे कि वहाँ अनेक महापुरुषों ने दाँत उखड़वाए हैं। वह महापुरुषों की सूची बनाने लगा, तो सबसे पहले उसे भगवान बुद्ध का ध्यान आया। उसने सोचा, क्यों नहीं वह यह प्रचारित कर दे कि उसकी दुकान पर महात्मा बुद्ध ने कभी दाँत उखड़वाए थे। ल्यू च्यांग पांग को इतिहास के विषय में अधिक जानकारी नहीं थी। पर इतना उसे पता था कि महात्मा बुद्ध चीन में नहीं, भारत में जन्मे थे। अत: प्रचार यों होना चाहिए कि यू च्यांग पांग के एक पुरखे ने भारत जाकर भगवान बुद्ध के दाँत उखाड़े थे और वहाँ से लौटकर उस पुरखे ने यह दुकान खोली, जो आज भी चल रही है।

पूरे सप्ताह-भर डॉक्टर ल्यू च्यांग पांग इस योजना की उधेड़बुन में लगा रहा। उसने इतिहास और धर्म सम्बन्धी पुराणी किताबें पढ़ीं और भगवान बुद्ध और चीन में बौद्ध धर्म के विकास की कथा का अध्ययन कर उसने अपने पुरखों के नामों से उसे जोड़ा। डिब्बों में बन्द पुराने दाँतों के ढेर से उसने बहुत पुराने दो दाँत खोजे, जिन्हें वह बुद्ध के दाँत बता सके।

दस रोज़ बाद पेकिंग के अखबार में एक विज्ञापन निकला-’दाँत का प्रसिद्ध डॉक्टर ल्यू च्यांग पांग, जिसके पुरखा पो च्यांग पांग ने वर्षों पूर्व भारत जाकर श्रावस्ती में भगवान बुद्ध के दाँत उखाड़े थे। आज भी भगवान बुद्ध के पवित्र दाँत उसके पास सुरक्षित हैं और देखे जा सकते हैं। उसी सुप्रसिद्ध खानदान के वंशज के अनुभवी हाथों से अपने दाँत उखड़वाइए। एक बार अवश्य पधारिए। ल्यू च्यांग पांग का दवाखाना। कम दाम में ज़्यादा से ज़्यादा दाँत उखड़वाने का एकमात्र स्थान।’ पेकिंग के दूसरे अखबर में भी डॉक्टर ल्यू च्यांग पांग का बड़ा विज्ञापन था, जिसमें उसकी तसवीर भी दी गई थी और यह वक्तव्य कि ‘दाँत उखाड़ना हमारे खानदान के लिए व्यवसाय ही नहीं, धर्म भी है। जिस खानदान के महान् डॉक्टर ने कभी भगवान बुद्ध के दाँत उखाड़े थे, वही आज आपके दाँत उखाड़ने को प्रस्तुत है। ल्यू च्यांग पांग का दवाखाना, कम दामों में ज़्यादा से ज़्यादा दाँत उखड़वाने के लिए एकमात्र स्थान ।’

इन विज्ञापनों ने सारे पेकिंग में हलचल मचा दी। शहर के लोग डॉक्टर ल्यू च्यांग पांग के दवाखाने की ओर आने लगे जहाँ भगवान बुद्ध के दो दाँत मखमल की गादी पर फूलों से ढके हुए रखे थे। धर्मप्राण जनता की ऐसी भीड़ की कल्पना स्वयं ल्यू च्यांग पांग ने नहीं की थी। शुरू में तो वह घबराया, पर बाद में उसने साहस बटोरा और जिज्ञासुओं को बुद्ध के दाँतों की कहानी सुनाने लगा। सारे दिन भीड़ बनी रही और फूल व नकद पैसा समर्पित होता रहा। ल्यू का सारा दिन स्वागत में बीता।

दूसरे दिन अखबारों में डॉक्टर ल्यू च्यांग पांग और भगवान बुद्ध के दाँतों की तसवींरे प्रकाशित हुई और इतिहास का वह अनजान पृष्ठ उद्घाटित किया गया,जिसके अन्तर्गत पो च्यांग पांग प्रथम चीनी डॉक्टर था, जो भारत गया और श्रावस्ती में जब भगवान बुद्ध के दाँत बहुत दर्द कर रहे थे, तब उसे दो दाँत उखाड़ने का सौभाग्य मिला। स्मृति स्वरूप वह दोनों दाँत चीन ले आया। पर तब चूँकि चीन की जनता बुद्ध धर्म अपनाने के मूड में नहीं थी, इस कारण उन दाँतों का अपेक्षित सम्मान नहीं हो सकता। वे दाँत पो च्यांग पांग के यहाँ एक पुराने डिब्बे में पड़े रहे और बाद में वे भुला दिए गए। उन्हीं पो च्यांग पांग के वंशज दाँत के सुप्रसिद्ध डॉक्टर ल्यू च्यांग पांग, जो प्राचीन संस्कृति और परिवार के इतिहास में घनघोर रुचि रखते हैं, परिवार में प्रचलित श्रुतियों के अनुसार इन पवित्र दाँतों को तलघर में से खोजने में समर्थ हुए हैं।

दूसरे दिन जनता की उमड़ती भीड़ को व्यवस्थित करने के लिए पुलिस आ गई। स्वयं च्यांग काई शेक और उनकी श्रीमती ने आकर पवित्र दाँतों के दर्शन किए और स्वयं एक दाँत उखड़वाकर डॉक्टर ल्यू च्यांग पांग को सम्मानित किया। खबर पेकिंग के बाहर तक फैल गई थी और दूर-दूर से लोग आने लगे थे। दाँतों के पास सिक्कों का इतना बड़ा ढेर लगने लगा कि डॉक्टर को एक पुजारी और एक नौकर की नियुक्ति करनी पड़ी। दाँत उखाड़ने का काम भी तेज़ी से बढ़ गया। पेकिंग के सभ्य समाज में दाँत उखड़वाना एक फैशन बन गया। क्लबों और रेस्तरॉओं में दाँतों के विषय में अक्सर चर्चाएँ चलती रहतीं और स्वयं ल्यू च्यांग पांग एक फैशन पत्रिका में दाँत सम्बन्धी प्रश्नों के उत्तर देने लगा था।

यह सच है कि ल्यू च्यांग द्वारा घोषित दाँत बुद्ध के ही हैं या नहीं, इस सम्बन्ध में अनेक व्यक्तियों के मन में सन्देह था और हो सकता था कि वक्तव्य आदि दिए जाते पर तब पेकिंग नगर और पूरे चीन की स्थिति ऐसी थी कि दाँतों पर सन्देह करना गलत माना जाता। शासकीय दृष्टि से लाभप्रद यह था कि जनता का ध्यान एक बार आर्थिक प्रश्नों से हटकर धार्मिक समस्याओं की ओर केन्द्रित हो गया था। शहर के बाहर से आ रही भीड़ के कारण पेकिंग में मन्दी का वातावरण नहीं रहा था। रिक्शे चलने लगे थे, होटल और लाज भरे हुए थे और सामान बिकने लगा था। बाज़ार में आए इस महत्वपूर्ण परिवर्तन के कारण पेकिंग के धर्मप्राण अमीर, (अमीर अक्सर धर्मप्राण ही होते हैं) दाँत की पवित्रता और उनके बुद्ध के दाँत होने पर बड़ी आस्था रखते थे। यहाँ तक कि कम्युनिस्ट पार्टी ने भी काफी विचार-विमर्श के बाद दाँतों को बुद्ध का ही माना। वास्तव में वे जनता की भावना से दूर नहीं रह सकते थे और ऐसी सब बातों से सहमत थे, जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से चीन का गौरव बढ़ाती हैं। उस समय अंडर ग्राउण्ड रहकर जीवन बिताने वाले कम्युनिस्ट नेता माओ-त्से तुंग ने भी एक पत्र डॉक्टर ल्यू च्यांग पांग को भेजते हुए उसकी ऐतिहासिक खोज के लिए बधाई दी।

माओ-त्से तुंग ने लिखा था कि च्यांग की प्रतिक्रियावादी सरकार के राज्य में आप व्यक्तिगत प्रयत्नों से बुद्ध के दो दाँत खोजने में समर्थ हो सके हैं, यह सचमुच एक सुखद आश्चर्य है। मगर कामरेड, इतना मैं कहूँगा कि अगर आज चीन में साम्यवाद होता, तो शासन और जनता की मदद से आप बुद्ध के दो दाँत ही नहीं, पूरी बत्तिसी खोज निकालते। विश्वास रखिए, यह अवसर आएगा। अपने पत्र में आगे माओ ने सभी दाँत के डॉक्टरों का संगठन बनाने पर ज़ोर दिया था, जिससे सर्वहारा आन्दोलन को, जिसका उद्देश्य अन्ततः पूँजीवाद के दाँत तोड़ना है, बल प्राप्त हो। निम्न वर्ग को आज यह सुविधा नहीं है कि वे अपने दाँत भी साफ कर सकें क्योंकि उच्च वर्ग ने टुथ पेस्ट और टुथ ब्रश के दाम बढ़ा रखे हैं। इसी प्रकार विज्ञान की सभी उपलब्धियाँ सिर्फ उच्च वर्ग को ही लाभ पहुँचा रही हैं। इस महत्वपूर्ण आर्थिक प्रश्न का विस्तार से विवेचन करते हुए कामरेड माओ ने अपने लम्बे पत्र में डॉक्टर ल्यू च्यांग पांग को आश्वासन दिया कि जब साम्यवाद आएगा, तब चीन की सारी जनता के दाँत न केवल चमकीले और मज़बूत होंगे, पर वे अधिक तीखे और लम्बे भी होंगे। यह भी प्रयास किया जाएगा कि दाँतों की जो परंपरागत संख्या बतीस सामन्तवादी और पूँजीवादी युग से चली आ रही है उसे बढ़ाया जाए और कम से कम चालीस दाँत प्रति व्यक्ति हों। अन्त में उन्होंने पुनः कामरेड डॉक्टर ल्यू च्यांग पांग को बुद्ध के दो दाँत खोजने पर बधाई दी और उसे सर्वहारा की विजय बताया ।

ल्यू च्यांग पांग ने यह पत्र पढ़ा तो वह गम्भीर हो गया, फिर हँसने लगा और फिर नारे लगाने लगा।

कहना न होगा कि इस सिलसिले में ल्यू च्यांग पांग की दाँत की दुकान तेज़ी से चलने लगी। ग्राहक वहाँ दाँत उखड़वाना अपना कर्तव्य और सौभाग्य मानने लगे। च्यांग काई शेक के दो मन्त्री, तीन राजदूत और तिब्बत से आए कुछ लामाओं ने भी डॉक्टर ल्यू च्यांग पांग से अपने दाँत उखड़वाए। दुकान के आधे भाग में मन्दिर-सा चलता, जहाँ लोग बुद्ध के पवित्र दाँतों पर पैसा चढ़ाते और आधे भाग में दवाखाना चलता, जहाँ बेंचों पर दाँत उखड़वाने को उत्सुक व्यक्ति बैठे रहते।

पर इतिहास साक्षी है कि न बुद्ध के दाँत और न पेकिंग के बाज़ार में अस्थाई रूप से समाप्त मन्दी ही च्यांग काई शेक का पतन रोक सकी। माओ-त्से तुंग की लाल सेना ने सारे चीन पर कब्ज़ा जमा लिया और च्यांग काई शेक समन्दर लाँघ एक टापू पर जा बसा। उच्च वर्ग के पतन की इन घड़ियों में पेकिंग में यदि कोई अमीर बन सका, तो वह ल्यू च्यांग था। उसके पास इतना रुपया जुट गया था कि उसने नया मकान बनवाया, नया फर्नीचर खरीदा, एक वेश्या के घर जाने लगा, रेशमी कपड़े खरीदे और एक नई शादी भी की। ज़िन्दगी की कई हसरतें उसने इस काल में पूरी कीं, जैसे रेशम के मोजे पहनना, ऊँचे रेस्तरॉ में जाकर खाना खाना और अफीम चाटकर मौज में पड़े रहना। यह सब बुद्ध के दो दाँतों की कृपा से हुआ।

पर माओ की सरकार बनने के बाद से हालत बदल गई और ल्यू च्यांग पांग नए कपड़े ट्रंक में छुपा, पुनः साधारण कपड़े पहनने लगा। उसने दुकान पर लाल झण्डा लगाया और कामरेड माओ की तसवीर।

एक दिन डॉक्टर ल्यू च्यांग पांग को नई सरकार का एक पत्र मिला, जिसमें यह आदेश थे कि वह दूसरे दिन ग्यारह बजे तीन व्यक्तियों की कमेटी के सामने उपस्थित हो और प्रश्नों के उत्तर दे। यह कमेटी पेकिंग के हर व्यक्ति के विषय में विस्तृत जाँच-पड़ताल के लिए बनाई गई थी। दूसरे दिन निश्चित समय पर ल्यू च्यांग पांग कमेटी के दफ्तर पहुँच गया क्योंकी इसके अलावा कोई रास्ता नहीं था ।

कमेटी के अध्यक्ष ने, जो पतली फ्रेम का सस्ता-सा चश्मा लगाए था, ल्यू च्यांग से प्रश्न करना शुरू किया, “कामरेड ल्यू च्यांग पांग, क्या आप मानते हैं कि चीन में जो महान् ऐतिहासिक क्रान्ति कामरेड माओ-त्से तुंग के नेतृत्व में माओ-त्से तुंग के रास्ते पर चलकर हुई है, वह चीन की जनता के लिए शुभ है ? क्या आपकी इस आंदोलन से सहानुभूति रही है ?”

“जी हाँ, कामरेड, मैं मानता हूँ कि यह क्रान्ति चीन की जनता और उसके नेताओं के लिए बड़ी फायदेमन्द साबित होगी। मैं हमेशा इस आन्दोलन का समर्थन करता रहा हूँ तथा मेरी सारी ज़िन्दगी पूँजीपतियों के दाँत उखाड़ने में गुज़री है।”

“शाबास कामरेड, मगर क्या आप बताएँगे कि पूँजीपतियों के दाँत आपने कैसे उखाड़े और क्रान्ति के लिए मददगार हुए ?”

“मैंने इसके लिए दुकान खोली,जहाँ मैं पेकिंग के रईसों के दाँत उखाड़ता था और उन्हें पीड़ित करता था।”

“शाबास कामरेड, मगर जहाँ तक हमारी जानकारी है, दाँत उखड़ने से तो उच्च वर्ग के व्यक्तियों की तकलीफ कम हो जाती होगी।”

इस पर ल्यू च्यांग पांग ज़ोर से हँसा, “सभी ऐसा समझते हैं कि दाँत उखड़ने से तकलीफ कम हो जाती है, पर ऐसा नहीं होता। एक दाँत उखड़ा और आदमी पस्त हो जाता है, अपने को बूढा़ और कमज़ोर महसूस करने लगता है,उसे मौत करीब दिखाई देने लगती है। आदमी जीवन से निराश हो जाता है, उसका जोश ठण्डा पड़ जाता है। कामरेड साहब, मैंने तो पेकिंग के पूँजीपतियों का सारा जोश उनके दाँत उखाड़कर ठण्डा कर दिया।”

“क्या यह काम आप माओ-त्से तुंग के बताए मार्ग पर चलकर कर रहे थे ?”

“जी, बिलकुल। मैं गुरिल्ला तरीके से दाँत उखाड़ता था। खुद उसे, जिसका दाँत उखड़ रहा है, यह पता नहीं लग पाता कि दाँत उखाड़ा जा रहा है। यह मेरी खानदानी खूबी है। मेरे पुरखा ने हिन्दुस्तान जाकर बुद्ध के दाँत उखाड़े थे। मैं अपनी सफलता में कामरेड माओ का शुक्रगुज़ार हूँ। उन्होंने मेरी हमेशा तारीफ की है और मेरी प्रशंसा करते हुए पत्र भी लिखा है। उनकी उम्र बड़ी हो और जब तक चाँद-सूरज कायम हैं वे चीन पर शासन करें। अगर आप कहें तो वह पत्र में आपको दिखा सकता हूँ।”

माओ-त्से तुंग का नाम सुनकर कमेटी के तीनों सदस्य कामरेड उठ खड़े हुए। जब पत्र उनके हाथों में सौंपा गया तो उनके हाथ हर्ष और भय से कॉप उठे। तीनों ने खड़े होकर उस पत्र को पढ़ा।

“बधाई कामरेड ल्यू च्यांग पांग, आप चीन के सितारे हैं। हमें आपसे अब कोई सवाल नहीं करना। कामरेड माओ-त्से तुंग का यह पत्र आप सँभालकर रखें। जब दाँत के डॉक्टरों का संघ बनेगा, यह पत्र उसका मेनिफेस्टो होगा। क्या शानदार विचार ज़ाहिर किए हैं हमारे महान् नेता कामरेड माओ ने। हर डॉक्टर को इस पर अमल करना चाहिए। जो अमल न करे, उसे सज़ा मिलनी चाहिए। अब आप जा सकते हैं।”

ल्यू च्यांग पांग झुका, “धन्यवाद कामरेड हुजूर, बहुत-बहुत धन्यवाद। कभी मेरी दुकान में पधारें। वहाँ मैं आपको वे बुद्ध के दाँत दिखाऊँगा, जिसे मेरे पुरखा ने उखाड़ा था।”

तीनों कामरेड उत्तर स्वरूप मुस्कराए और ल्यू च्यांग पांग उनके हाथों में अपनी दुकान का विज्ञापन थमा बाहर आ गया था। तीनों कामरेड विज्ञापन पढ़ते रहे-जिस खानदान ने बुद्ध के दाँत उखाड़े थे, वह खानदान आपके भी दाँत उखाड़ने को उत्सुक है। एक बार पधार कर खातरी करें। रेट वाजबी। ज़्यादा दाँत उखड़वाने पर कन्सेशन।

चीन में नई सरकार की स्थापना के प्रारम्भिक वर्षों में ल्यू च्यांग पांग के लिए कामरेड माओ द्वारा भेजा गया पुराना पत्र झण्डा साबित हुआ, जिसे वह हर मुसीबत के मौके पर लहरा देता। जब दाँत के डॉक्टरों का संघ पेकिंग में बना तब ल्यू च्यांग पांग उसका अध्यक्ष बन गया। बुद्ध के दाँत का खानदानी सन्दर्भ और माओ के पत्र का नया संदर्भ उसकी जीत में सहायक हुए। उसे चुननेवाले दाँत के डॉक्टरों में यह भय समा गया कि स्वयं माओ ने ल्यू च्यांग पांग को खड़ा किया है और जो व्यक्ति उसे वोट नहीं देगा उसकी मिट्टी कानूनी रूप से पलीत कर दी जाएगी। अत: तालियों की गड़गड़ाहट के साथ ल्यू च्यांग पांग अध्यक्ष बन गया। उसने झुक-झुककर सबका आभार माना और एक संक्षिप्त-सा भाषण दिया, “डॉक्टर कामरेडो, मुझे अपना अध्यक्ष चुनकर आपने जो मुझे चीन की महान् जनता की सेवा का मौका दिया है, उसके लिए मैं आपका आभारी हूँ। कामरेड माओ ने कहा है कि सैकड़ों पुष्पों को एक साथ खिलने दो। मैं उसीका अनुसरण करते हुए कहूँगा कि सारे दाँतों को एक साथ चमकने दी। शायद आप जानते हैं कि मेरे पुरखा पो च्यांग पांग ने भारत जाकर वर्षों पहले महात्मा बुद्ध के दाँत उखाड़े थे। वे वहाँ से लौटे और चीनी जनता की सेवा में जुट गए। पर उनसे प्रेरणा पाकर अनेक चीनी नौजवान भारत जाकर बसने लगे और वहाँ की जनता के दाँत उखाड़, चीन का सम्मान बढ़ाने लगे। आज स्थिति यह है कि हर हिन्दुस्तानी के दाँत पर कोई चीनी डॉक्टर बादशाहत करता है और दिलों की एकता बढ़ाता है। इस तरह हमारे संगठन का ऐतिहासिक और अन्तरराष्ट्रीय महत्व है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि चीन की जनवादी क्रान्ति दाँत के डॉक्टर के लिए वरदान साबित होगी, क्योंकि जैसा महान् नेता कामरेड माओ ने लिखा है, चीन की नई सरकार दाँतों की संख्या बढ़ाने की ओर ध्यान देगी। सामान्य तौर पर एक चीनी आदमी के चालीस दाँत होना ज़रूरी है, ताकि हम उसे खा सकें, जिसे खाना चाहते हैं। पूँजीवादी और साम्राज्यवादी देशों में यह प्रचार किया जाता है कि आदमी के बतीस दाँत होते हैं, जो गलत है, क्योंकि अब यह पोल खुल चुकी है कि वास्तव में वहाँ एक आदमी के पीछे दाँतों का औसत पच्चीस और अट्ठाईस से अधिक नहीं आता। धीरे-धीरे यह औसत गिरेगा। इधर चीन में जो हम लीप-फारवर्ड मूवमेन्ट चलाएँगे, उसका मकसद दाँतों की गिनती बढ़ाना ही होगा। और हमें इस महान् कार्य में सफलता मिलेगी, क्योंकि हमें माओ-त्से तुंग जैसा नेता प्राप्त है, जिनके दाँत बड़े पैने और मज़बूत हैं तथा आवश्यकता पड़ने पर बाहर निकाले जा सकते हैं।”

इस पर दाँत के डॉक्टरों के संगठन में खूब तालियाँ बजीं और सब माओ ज़िन्दाबाद के नारे लगाने लगे।

पर कुछ दिनों बाद चीन की जनवादी सरकार ने बुद्ध के दाँतों पर ल्यू च्यांग पांग का एकाधिकार समाप्त कर दिया। माओ-त्से तुंग के दस्तखत से आदेश निकले, जिसके अनुसार जनवादी चीन के अधिकार में बसनेवाले हर नागरिक को यह अधिकार दे दिया कि वे जीवन-भर अपने दाँतों को निजी सम्पति समझें तथा भोजन चबाने, मांस तोड़ने आदि कार्यों में, जो दाँत से सम्बन्धित हैं, उसे उपयोग में लाएँ। पर साथ ही जनवादी सरकार ने यह भी घोषणा की कि भविष्य में पुरखों, मुर्दों के दाँत तथा जीवित व्यक्तियों के उखाड़े हुए दाँत जनता की सम्पति रहेंगे तथा सरकार जनता और देश के हित में उनका उपयोग कर सकती है।

आदेश से ल्यू च्यांग पांग के हृदय को चोट पहुँची। यद्यपि वे दाँत बुद्ध के नहीं थे, पर पिछले दिनों ल्यू च्यांग पांग की लगातार सफलता और यश में वृद्धि के कारण वह स्वयं यह मानने लगा था कि वे दाँत बुद्ध के दाँत हैं। उसे वे दाँत बुद्ध के ही लगते थे और चीन की जनता और समाज द्वारा उन दाँतों को दिया मान एक ठोस सच्चाई बन चुकी थी, जो उसके दिमाग में जम गई थी। उसकी ज़िन्दगी का हिस्सा थी। आदेश से उसे सचमुच पीड़ा हुई पर उसने मन को समझा लिया। उसी समय विदेश जानेवाले एक चीनी डॉक्टरों के मण्डल में उसका नाम प्रस्तावित हो चुका था और पेकिंग में बन रहे दाँतों को डॉक्टर तैयार करनेवाले कॉलेज में प्रमुख रूप में उसे ही लिए जाने की सम्भावना थी। ल्यू च्यांग पांग ने मन को समझाया कि इन दाँतों से जो फायदा लिया जाना था, लिया जा चुका और अब इस कल्पना को इतिहास की गोद में फेंक, आगे बढ़ जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं है। सो दूसरे दिन जब दाँतों को ले जाने के लिए एक सरकारी मोटर रुकी, उसने एक भाव भीनी विदाई के साथ वे दाँत सौंप दिए और एक ऐसे आदमी का चेहरा बना लिया, जिसने देश के लिए सब कुछ लुटा दिया हो।

पर इस बात की तारीफ की जानी चाहिए कि बुद्ध के उन पवित्र दाँतों को ससम्मान प्रतिष्ठित किए जाने के मामले में चीन की सरकार ने तुरन्त कदम उठाए। पेकिंग में एक छोटा-सा सुन्दर भवन खाली करवाया गया, जिसके मुख्य कक्ष में एक शीशे के केस में वे दाँत रखे गए। दर्शन करनेवालों के आने और निकलने के रास्ते बनाए गए और सारे भवन को खूब सजाया गया। ल्यू चयांग पांग की गली की तुलना में यह निश्चित ही सुन्दर था। देखनेवालों की भीड़ भी काफी रहती थी। सब कुछ पुराने बुद्ध और नए चीन के सम्मान के अनुकूल था।

पर ये वह दिन थे जब चीन में सांस्कृतिक क्रान्ति नहीं हुई थी। माओ ने हर विषय पर अपने अन्तिम विचार प्रकट नहीं किए थे। लाल रक्षकों की ऐसी भीड़ पेंकिग की सड़कों पर नहीं फैली थी और पूरे चीन को आमूल बदलने के लिए यह भाग-दौड़ और मार-पीट आरम्भ नहीं हुई थी। पर एक दिन माओ ने कहा कि हम सब पुराने धार्मिक प्रतीकों को तोड़ेंगे, जो हमें बरसों से निकम्मा बनाए रहे और उनकी जगह नए प्रतीक खड़े करेंगे। माओ के भाषण के बाद हज़ारों छोटे-बड़े लाल झण्डे लहराए जाने लगे और नारे लगे। लोग रुके हुए थे क्योंकि माओ के भाषण पर अमल करते हुए लाल रक्षकों का कार्यक्रम घोषित किया जानेवाला था। और कुछ देर बाद कार्यक्रम घोषित हुआ। बहुत छोटा-सा और प्रतीकात्मक। वह यह था कि लाल रक्षकों की रैली दूसरे दिन दस बजे चौक से जुलूस में रवाना होगी और बुद्ध के दाँत के मन्दिर के सामने जाकर प्रदर्शन करेगी और बुद्ध के दाँतों को वहाँ से हटाएगी और चीनी जनता को दाँतों के इस विनाशकारी प्रभाव से मुक्ति दिलाएगी। ध्येय वाक्य बना कि नया चीन बुद्ध के दाँत उखाड़ता है और क्रान्ति का रास्ता प्रशस्त बनाता है।

सुबह पेकिंग के अखबार माओ के भाषण से भरे पड़े थे और लाल रक्षकों का पूरा कार्यक्रम दिया था। माओ ने सुबह नाश्ते के समय उन अखबारों को पढ़ा और एक मुस्कान उनके चेहरे पर तैर गई।

“क्या नाम है उसका, जिसके पुरखे ने बुद्ध के दाँत उखाड़े थे ?”-माओ ने पूछा।

“डॉक्टर ल्यू च्यांग पांग।” पास खड़े सहायक ने जवाब दिया।

“उसको बुलाओ।”

कुछ देर बाद ल्यू च्यांग पांग को माओ के सामने हाज़िर किया गया। माओ काफी देर चुप रहे और फिर उन्होंने भय और नम्रता की प्रतिमूर्ति बने ल्यू से सवाल किया—”बुद्ध के बाद अब चीन को रास्ता दिखानेवाला कौन है ?”

“आप हैं, माओ-त्से तुंग, हमारे प्यारे नेता।”

“अब बुद्ध के नहीं, मेरे दाँतों से चीन के युवकों को प्रेरणा मिलेगी।”

“आप ठीक कहते हैं कामरेड, आप ठीक कहते हैं।”

“तो उखाड़ो मेरे दो दाँत।” और माओ ने ल्यू च्यांग पांग के सामने अपना पूरा मुँह खोल दिया।

कुछ घण्टों बाद जब लाल रक्षकों के जुलूस ने बुद्ध के दाँत के मन्दिर पर हमला किया और दाँत को अन्दर से निकालकर बाहर ले आए, तभी चीन की जनवादी सरकार के एक मन्त्री गाड़ी में बैठकर आए। उनके पास माओ के दो दाँत थे। उन्होंने माओ-त्से तुंग का नया सूत्र वाक्य सुनाया, “जहाँ से बुद्ध के दाँत उखड़ेंगे, वहाँ माओ के जमेंगे।” और माओ के दाँतों को उसी स्थान पर प्रतिष्ठित कर दिया गया, जहाँ बुद्ध के दाँत रखे गए थे।

माओ के इस महान् कदम की प्रशंसा के काफी देर तक लाल रक्षक नारे लगाते रहे और माओ के दाँतों के दर्शन करनेवालों का क्यू लम्बा होता गया।