लघुशंका न करने की प्रतिष्ठा (व्यंग्य) : हरिशंकर परसाई

 


शे र जब जंगल के किसी कोने में आ जाए, तो चीता बकरी से पूछता है, “बहनजी, साहब के स्वागत के लिए और क्या-क्या इन्तजाम किया जाए?” बकरी सिवा इसके और क्या जवाब दे कि “साहब, बड़े शेर साहब को मेरे बच्चों का लजीज गोश्त पेश किया जाए। यदि शेर साहब को संगीत का शौक हो तो मैं ‘में-में’ की ध्वनि से उन्हें एंटरटेन कर सकती हूँ। यदि ‘क्लासिकल’ का शौक हो तो ‘भैंसा’ गा देगा। ‘भैंसा’ ध्रुपद बहुत अच्छा गाता है।”
बड़ा साहब ‘स्टीम रोलर’ होता है, जो डिपार्टमेंट के बड़े-छोटे का भेद मिटा देता है। सब समतल हो जाते हैं, क्योंकि सब डरे हुए होते हैं। डर भेद मिटाता है। प्रेम नहीं मिटता। डर खुद प्रेम पैदा करता है। डूबने से बचने के लिए साहब चपरासी के पैर इस तरह पकड़ लेता है, जैसे वे भगवान के चरण हों!
बड़ा साहब दिल्ली से आ रहा है।
स्थानीय ‘बॉस’, जिसके पास जाते मातहत काँपते हैं, खुद इस बाबू के पास से उस बाबू के पास जाकर सलाह करता है, “हार वगैरह सब बढ़िया हो गए हैं न? पार्टी का इन्तजाम ठीक हो गया न? मिसेज खन्ना के लिए गिफ्ट आ गया न?”
मिसेज खन्ना दिल्ली से आने वाले साहब की ‘तथाकथित’ धर्मपत्नी हैं—ऐसी डिपार्टमेंट में हवा है। हर डिपार्टमेंट में ऐसी स्वास्थ्यवर्द्धक हवा बहती रहती है। इससे हीनता और घुटन की बीमारी से बीमार कर्मचारियों के फेफड़े साफ होते हैं। वे कहते हैं, “साला हम लोगों को अकड़ दिखाता है, मगर अपनी बीवी पर कंट्रोल नहीं है। वह छिः…” (इसके आगे लिखे बिना भी विद्वान पाठक अपनी प्रतिभा से इस शुभ वाक्य को पूरा कर लेंगे।)
चीता बकरी और खरगोश के पास जाकर सलाह कर रहा है। बकरी चीते को शेर के ‘डिनर’ के लिए मेमने दे चुकी है—यानी बच्चों का पेट काट-काटकर साहब के स्वागत-खर्च के लिए तनखा में से चन्दा दे चुके हैं। सब सोचते हैं कि साहब क्वाँरा या रँडुआ होता तो कितना अच्छा होता। तब कम-से-कम मेम साहब के गिफ्ट के लिए पैसे न देने पड़ते। अभी भी चार दिन हैं। आदमी चाहे तो इतने में क्या रँडुआ नहीं हो सकता? सुना है, मेम साब एक बार नींद की ज्यादा दवाइयाँ खा चुकी हैं। सब भगवान के हाथ बात है। हे ईश्वर, उन्हें दुबारा नींद की ज्यादा गोलियाँ खिलवा दे! गिफ्ट के पैसे बचेंगे।
स्थानीय बॉस शर्मा साहब को फुरसत नहीं है। फाइलें तो ठीक हो ही गई हैं। जो कुछ भी गड़बड़ होगी, ठीक हो जाएगी, अगर बढ़िया पार्टी हो जाए। प्रोमोशन मेरा ड्‌यू है। चोपड़ा अड़ंगा लगा रहा है। कितनी बार वाइफ से कहा कि कोई संगीत-शाला चली जाया कर। कुछ सीख जाती तो आज स्वागत-गान गा देती। खन्ना साहब कितने खुश होते! यों खन्ना की नजर कुछ वैसी है। पर स्वागत-गान ही तो गाना था। कुछ और थोड़े ही था। खैर, इंट्रोड्‌यूस तो करवा ही दूँगा।
खन्ना साहब आ गए। दिन में मुआइना कर लिया। बहुत कुछ ठीक पाया। कुछ गड़बड़ भी पाया। पर शर्मा साहब आश्वस्त हैं। अभी साहब की पार्टी होने वाली है।
दफ्तर के विशाल अहाते में शामियाना, मंच, कुर्सियाँ और दरियाँ। मंच पर खन्ना साहब और मिसेज खन्ना। उनके दोनों तरफ शर्मा साहब और वर्मा साहब। सामने एक तरफ कुर्सियों पर छोटे अफसरों और क्लर्कों की बीवियों से घिरी मिसेज शर्मा।
शर्मा साहब हार और गुलदस्ते से खन्ना साहब का स्वागत करते हैं। फिर मिसेज शर्मा अपनी गोद का बच्चा बगल में बैठी बबुआइन को देकर मिसेज खन्ना का स्वागत करने पहुँचती हैं।
शर्मा साहब परिचय कराते हैं, “शी इज माई गुड वाइफ।”
खन्ना साहब थोड़ी मदिरा में डूबे हैं। कहते हैं, “यस, देअर आर ओनली टू टाइप्स ऑफ वाइव्ज—गुड वाइव्ज एंड बैड वाइव्ज। बट मिसेज शर्मा इज ए प्रेटी वूमेन!” (हाँ, पत्नियाँ दो ही तरह की होती हैं—अच्छी और बुरी। पर मिसेज शर्मा सुन्दर स्त्री हैं।)
मिसेज खन्ना कहती हैं, “मिस्टर शर्मा इज आल्सो एक हैंडसम मैन!”(शर्मा भी खूबसूरत आदमी हैं।)
खन्ना और मिसेज खन्ना ले-देकर बराबर हो गए। हिसाब चुकता।
मिसेज शर्मा जब लौटती हैं, तो उनका कद एक फुट बढ़ गया है। इतनी औरतों में इतने बड़े साहब ने उन्हें ‘प्रेटी’ कह दिया। एक तो यों ही स्थानीय ‘बॉस’ की पत्नी, उस पर यह गौरव जो अभी मिला। उन्हें और भी गरिमामय और भी विशिष्ट हो जाना चाहिए। और वे होने की योजना बना रही हैं।
उधर कर्मचारियों का परिचय खन्ना साहब से कराया जा रहा है। शर्मा नाम पुकारते हैं। एक ढीले कल-पुर्जे का रोबट मंच की तरफ बढ़ता है। उधर कल-पुर्जे से लैस एक तने हुए रोबट से लुजलुजे हाथ मिलाता है। शर्मा उसका नाम और पद बताता है।
तना हुआ रोबट पूछता है, “हाउ’र यू?”
ढीला रोबट जवाब देता है, “वैरी वैल, थैंक यू सर!”
यही परिचय है।
खन्ना साहब एक वृद्ध बाबू से पूछ लेते हैं, “कब रिटायर हो रहे हो?”
बाबू यह सुनकर दुनिया से ही रिटायर होने की हालत में आ जाता है। हाय, एक्सटेंशन नहीं मिलेगा? वह बेहोश होकर गिर पड़ता है।
चपरासियों से हाथ नहीं मिलवाए जाते, गो ऑर्डर निकल गया था कि चपरासी हाथ साफ करके आएँ।
तीन लड़कियों से स्वागत-गान करवाया गया। स्वागत-गान रेडीमेड होते हैं। काफिया तय रहता है। सिर्फ नाम ठूँसना पड़ता है।—‘स्वागत खन्ना साहब तुम्हारा!’ रेड्‌डी बड़े साहब हुए तो—‘स्वागत रेड्‌डी साहब तुम्हारा!’ और सूअर हुआ तो—‘स्वागत शूकर देव तुम्हारा!’
इसके बाद कुछ तारीफ के भाषण।
फिर किसी ने प्रस्ताव किया कि कुछ संगीत भी हो जाए। आदमियों और स्त्रियों में खुसफुस होने लगी, “तू जा न! तू ही क्यों नहीं चली जाती? शादियों में तो खूब गाती है।”
वह जवाब देती है, “और तू भी तो मन्दिर में कीर्तन गाती है—मर्दों से आँखें लड़ाते हुए।”
दोनों में पटती नहीं।
आखिर एक साहसी अधेड़ स्त्री माइक पर पहुँची और गाने लगी, ‘ए मालिक, तेरे बन्दे हम…’ खन्ना साहब समझे कि गाने में उन्हीं को ‘ए मालिक!’ कहा जा रहा है, वे सन्तुष्ट हुए—डिसिप्लिन सेटिस्फेक्टरी।
फिर किसी ने घोषणा कर दी, “अब यशोदा देवी एक क्लासिकल गीत गाएँगी।”
आम विश्वास है कि कृष्ण की छेड़छाड़ के गाने क्लासिकल संगीत में होते हैं। तो गाने लगी यशोदा देवी अपनी माँ से सुना हुआ क्लासिकल गीत—‘मुख से न बोले कान्हा, बाजूबन्द खोले!’
सब रस-विभोर हो गए। खन्ना साहब रस को स्थायी भाव बनाने के लिए कमरे में जाकर और दारू पी आए।
मैं मिसेज शर्मा को भूला जा रहा हूँ। खन्ना साहब ने उन्हें ‘प्रेटी’ कहा था। आसपास की औरतों में उनका रुतबा था। वे सब मातहत थीं।
मिसेज शर्मा एक से पूछती हैं, “आपका परिचय?”
दूसरी कहती हैं, “ये सावित्री बहन हैं—बड़े बाबू की पत्नी!”
मिसेज शर्मा कहती हैं, “आप हमारे घर नहीं आईं?”
सावित्री कहती हैं, “मैं जरूर आऊँगी बहनजी!”
यही बात गायत्री, सीता, रेखा, लेखा सबसे होती है।
“आप हमारे घर नहीं आईं?”
“अब जरूर आएँगी बहनजी!”
मातहतों की औरतें हैं तो उन्हें बड़े साहब की पत्नी के पास आना ही चाहिए। मिसेज शर्मा सब पर छाई हैं। उन सबको उनके घर आना चाहिए।
मिसेज शर्मा की गोद में बच्चा है। साहब का बच्चा है, इसलिए बबुआइनों को उसे खिलाना चाहिए। वे उसे खिलाती हैं, “अहा, कैसा अच्छा बेबी है! कितना खूबसूरत है!”
मिसेज शर्मा कहती हैं, “इसके ‘डेडी’ इसे बहुत चाहते हैं। और यह भी। देखो, बैठा यहाँ है, पर ध्यान डेडी की तरफ ही लगा है…तो आप हमारे घर कब आएँगी?”
“बस, इसी इतवार को आएँगी।”
“और तुम भी आओगी शोभा?”
“हाँ, बहनजी, मैं भी आऊँगी।”
मिसेज शर्मा अब बेटे को पुचकारती हैं। कहती हैं, “इसमें एक बात है। इसी छोटी उम्र से बहुत समझदार है। कभी गोद में या बिस्तर में पेशाब नहीं करता। पेशाब लगी हो, तो कोई इशारा कर देता है।”
बाकी औरतें हैरत में आ जाती हैं। क्यों न ऐसा लड़का हो! आखिर साहब का लड़का है। चाहे तो पेशाब करने के लिए ऋषि का कमंडल मँगवा सकता है।
बबुआइनें कहती हैं, “बहनजी, ऐसा बच्चा विरला ही होता है जो इस उमर में गोद में या बिस्तर में पेशाब न करे।”
मिसेज शर्मा बेहद खुश हैं। वे कितनी विशिष्ट हैं!
समारोह समाप्त हो रहा है। स्त्रियाँ उठने की तैयारी में हैं कि बच्चा गोद में पेशाब कर देता है।
बबुआइनें सन्न रह जाती हैं। कहें तो भी क्या? मिसेज शर्मा का चेहरा फक् हो जाता है। उनका पानी उतर गया है। झेंपते हुए कहती हैं, “ऐसा तो कभी नहीं हुआ। इतनी भीड़ देख घबरा गया होगा।”
बबुआइनें एक-दूसरे की तरफ देखती हैं। कहती हैं, “हो जाता है बहनजी! बच्चा ही तो है।”
मिसेज शर्मा इस समय चपरासिन से भी हीन अनुभव करती हैं। लड़के ने पेशाब करके उनकी सारी महत्ता खत्म कर दी।
उठते-उठते बबुआइनें कहती हैं, “हम आपके घर आएँगी बहनजी!”
मिसेश शर्मा कहती हैं, “नहीं, हम ही आएँगी आपके यहाँ। हम सब एक हैं। इसमें कोई छोटे-बड़े का सवाल थोड़े ही है।”
बच्चे ने पेशाब करके समाजवाद की प्रक्रिया शुरू कर दी।