भगवान और मुर्गा (व्यंग्य) : शरद जोशी | Bhagwan aur Murga : Sharad Joshi ke Vyangya

 

सुबह हुई। धूप चढ़ी कमर के बेल्ट तक !
और मियाँ अब्बास की दोनों बिटिया रामझरोखे बैठे ताकने-मुस्काने लगीं। कसे कपड़ों में ऐसी लगें जैसे कपड़ा चढ़ी बोतलें हों। आँखों में चमक है, शोखी भी और ठण्डी-ठण्डी यादें भी, आहें भी। अभी-अभी इनकी ओर देखता एक मुर्गा, धीरे-धीरे जमादार की चाल मोड़ से निकल गया।
अब्बास की बेटियों ने अपना शरीर सहलाया और मुर्गो ने पंख में चोंच गड़ाई। उनके दुपट्टे सँभले, इनकी कलगी ठुमकी। दोनों की हरकतों में कोई सम्बन्ध नहीं, पर ऐसा हो रहा था। मुर्गा मर्द होता आदमज़ात, मूँछे मरोड़ता और आँख मारता तो बस्ती में कुछ बात बनती। किस्से खिंचते, हँसियाँ आतीं। सतमहा बच्चा कूड़े पर पड़ा मिलता तो सार्वजनिक सहानुभूतियाँ ‘च्य-च्य करतीं। पर ऐसा नहीं है। मुर्गा मुर्गा है, अपनी जाति की परम्परा और निजी मस्ती में पाँच मुर्गियों पर भी पटेलाई करे तो सरकार दोष नहीं समझती, समाज बुरा नहीं मानता। अण्डे देना मुर्गी का नैतिक दायित्व है और लम्बे समय तक कुड़क रहना-समाजद्रोह, हड़ताल, अनुशासनहीनता ! मुर्गी इस बात को अच्छी तरह जानता है। उसकी मुर्गियाँ कर्तव्यपरायण हैं, उत्पादन गुणी हैं अत: वह सन्तुष्ट है। झरोखे से सदा झाँकती, अब्बास परिवार की मादाओं को वह देखता है तो मन में खेर मनाता है कि उसके दड़बेवालियों पर इनका प्रभाव नहीं है। कोई किसी अजीब हवलदार से गिलयारे में छेड़छाड़ करवा मन में नाचती नहीं। मियाँ अब्बास के तथाकथित साठ रुपए वाले चश्मे जैसी धूल की तहें उसकी आँखों पर नहीं चढ़ी हैं। अजी, छुपा क्या है मुर्गे से ! ज़रूर एक दिन बड़ी बेटी रब्बी अजीज़ हवलदार के घर में घुस जाएगी और अब्बास मियाँ ओटले पर बैठे ठण्डे पानी के छींटे मुँह पर मारते रहेंगे।
धन्य हो ! अभी भी वे यही कर रहे हैं।
मुर्गा कलगी चमकाता आगे बढ़ गया। जैसे दयाराम चपरासी नया साफा पहन कचहरी जा रहा हो !
आज सुबह से महल्ले का वातावरण बड़ा पावन है। तीज-त्यौहार पर बुआ जी को बड़े पैमाने पर पूजा करने की उचंग चढ़ती है। बड़े पैमाने से उनका अर्थ है ठाकुर जी के सामने डालडा ज़्यादा मात्रा में रखकर दीया जलाना, छ: पैसे के चिरोंजी दाने मैंगा लेना और बजाए रोटियाँ सेकने के पूरियाँ तलकर भक्तिभाव से ईश्वर के सामने रख खुद खा लेना। ऐसे दिन कोनेवाले हनुमान जी पर चोला चढ़ाने का संकल्प दुहराया जाता और पड़ोस की बेबी को स्नान के बाद शंख फूंकने की छूट मिल जाती।
आह ! जब शंख फुँकता है, घण्टी बजती है तो एकाएक इस महल्ले की हवाएँ पवित्र हो जाती हैं। ईशान्य कोण से देवताओं का ग्रुप गुपचुप खड़ा हो गया। पाण्डे भगत की तबियत करती है सरकारी नौकरी को सक्रिय रूप से लात मारें और लगे हाथ साधू हो जाएँ। जंगल में एकान्त आश्रम हो, सघन वृक्षों का कुंज हो। शुद्ध दूध और फल सामने रखे हों और भावना से प्रेमिका और क्रियाओं से सेविका चैंवर डुला रही हो। मन-मन में गाली दे रही हो, ‘हाय दैया, कैसा बेरहम ब्रह्मचारी है, किस अनजान से ली लगाए बैठा है !’
पर कितने ही शंख फूँकें, मुर्गा कभी एकान्तवास की नहीं सोचता। महल्ला ईट-चूने का यथार्थ है जहाँ उसे जीना है, भटकना है। ये मंज़िल की ओर जा रही नालियाँ, भंगी की प्रतीक्षा में बैठे कूड़े के ढेर, तटस्थ ओटले, फड़फड़ाती खिड़कियाँ, प्रौढ़ चिकें और दानेदार रास्ते ! सवेरा यों कि जमादार ड्यूटी पर आया, दोपहर यों कि जैसे बनिया हिसाब कर रहा हो और रात ऐसी कि कहीं बच्चा होनेवाला हो। इन सब रंगों, स्वरों और हरकतों के बीच मुर्गा ऐसा कि जैसे कुछ भी नहीं। मुर्गे का क्रोध लाला रणछोड़ का क्रोध नहीं कि बच्चों के कापड़े भीग जावें, उसकी वाणी जीवन जी की वाणी नहीं कि सुनकर तबियत वोट करने लगे। न उसकी बड़बड़ाहटें मियाँ अब्बास की तरह, जो नींद में भी समाप्त न हों।
मुर्गा जमादार की चाल मोड़ से निकला तो, पर अण्डेवाली को सामने देखकर सकपका गया। सोचने लगा बुढ़िया टर्राएगी सो उसकी भी सुन लो। वह नाली की ओर मुँह कर खड़ा हो गया। अण्डेवाली बिना बोले रह नहीं सकती, खासकर ऐसे वक्त जब अब्बास मियाँ ठण्डे पानी की अंजली से मुँह सींच रहे हों।
“सलामालेकुम गरीबपरवर ! क्यों मेहरबानगी की है क्या मालिक, के सुने कि अब्दुलगनी को नौकरी से अलग करें ये सरकार वाले, तो मेरा बेटा क्या के कस्टम की चौकीदारी से भारी पड़ गया, कि जुलम ये तो, खाँय क्या ?”
“गनी से बोल कि अण्डे बेचे !”-अब्बास कुल्ली करने के बाद बोले।
“वाह के, ये खूब फिरमाया मालिक, अरे मैं तो अण्डे बेचते-बेचते अधबूढ़ी हुई और छोकरा भी बेचे तो सोने के अण्डे हैं के चील के, जो बज़ार ढूँढो नीं मिलें, केसी बात करो ओ’ !”-वह बोली।
“चील के नहीं मगर मुर्गी के तो हैं, बेंच खा।”
“कैसे बात करो ! अरे हो तो बेचें, नी हो तो कहाँ से बेचें। राम जुलम करे तो मुर्गी-मुर्गे भी नी छोड़े कदी, ऐसी लगे बीमारी के यूँ के यूँ रह जाँय। मैं तो कहूँ दुश्मन को भी ऐसा नी हो।”
“सवेरे-सवेरे दाता को गाली दे रही है, डोकरी।”-अब्बास मियाँ ने टीका।
“इसमें गाली क्या कि ये तो उसकी माया। और कभी भगवान करे तो ऐसे अण्डे होंय रोज के रोज कि भरी-भरी जाऊँ और खाली-खाली आऊँ। तुम बोलोगे बढ़िया की जुबान कैसी चले कैंची सरकी, कतर-कतर; पर मैं तो सच्ची बोलूँ, मेरा मन जाने इस साल भगवान ने भारी की, ऐसे अण्डे दिलवाए इन मुर्गियों से कि बेटा-बेटी होंय तो ब्याह निपट जाए !”
“अरे सब अण्डे भगवान के दिए हैं, कम हों या ज़्यादा !”-अब्बास यो ही बोल गए।
“सच्ची बात मालिक, अण्डे तो सब भगवान के ! अच्छा जाऊँ नी तो सिन्धी सेठ दूसरे से ले लेगा और फिर मुझे कालानी भी जाना है कि सलामालेकुम।”
“मालेकुम सलाम !”
“एके देखो मेरे अब्दुलगनी की नौकरी नी छूटे कस्टम से,हाँ । पोरके साल तो ब्याह हुआ, बऊ को सातवाँ चले और तवालत में फाँके पड़ें, जीना की नी जीना।”
“हाँ भई,देख लेंगे।”
अण्डेवाली चली गई। अब्बास मियाँ ने तूतीदार लौटा उठाकर चिक हटाई, पर इस क्षण सदा की तरह मुर्गों ने ठण्डी साँस नहीं छोड़ी बल्कि स्तब्ध खड़ा रह गया जैसे धरती से टॉक दिया गया हो।
सिगरेट के अधजले टुकड़े की तरह यह वाक्य उस पर गिरा था-’सब भगवान के दिए अण्डे हैं।’
मुर्गे ने प्रश्नसूचक दृष्टि से शून्य की ओर देखा और सोचा-’कौन है यह भगवान !’
यह चिरन्तन अनुतरित प्रश्न तन-बदन में छुरी-सा घुप गया-कौन है भगवान ! कहाँ है भगवान !-’कहीं से खम्भा नहीं फटा, नरसिंह नहीं प्रकटे, आकाश से आवाज़ नहीं आई। सिर्फ हुआ यों कि किसी रेडियो का गला खरखराया, पिन चुभने की पीर-सा दर्द फूटा-मेरी आन भगवान अब रखनी पड़ेगी’… !’
जैसे कोई कुँवारी मुर्गी सिसक पड़ी हो। मुर्ग ने गर्दन घुमाकर खिड़की की ओर देखा और परेशान-सा हो गया। कौन है यह भगवान ! नन्हे मानस में प्रश्न उलझ गया। भगवान का सम्बन्ध उसकी मुर्गियों के अण्डों से है। लगा कि मियाँ अब्बास ने उसके मुर्गत्व को अपमानित किया है। यों तो हर अण्डे का मालिक भगवान है, पर धन्यवाद का पात्र कम से कम मुर्गा तो है ही। अब्बास यदि सब बोलते हैं, तो ज़रूर कोई भेद है जिसकी तहैं दुनिया जानती है, मुर्गियाँ जानती हैं, पर वह नहीं जानता। मुर्गा सोचने लगा, उसके साथ धोखा किया जा रहा है। सिर में दर्द छा गया। यदि दड़बे में पूछताछ करेगा तो हमेशमुजब मुर्गियाँ उसे शक्की करार देंगी। पता नहीं लगाएगा तो उसकी साहसी आत्मा उसे कचोटेगी। वह यही सोचता आगे बढ़ा। उसका हर पैर दबा-दबा पड़ रहा था, जैसे रूपवान बेवा की तरफ गुण्डा बढ़े।
वह भगवान जिसे, महेस, गनेस,दिनेस सुरस आदि साह्बन निरन्तर ध्याते हैं, अनादि, अनन्त, अखण्ड, अछेद, अभेद, सुवेद जैसे ग्रन्थ बताते हैं और नारद के शुक तोते पचपच कर पार नहीं पाते हैं, उसे यानी ताहि को, ये मुर्गा खोजने चला। बोधिवृक्ष-सी कलगी, दोनों में निमग्न आँखें और एकला चाली रे वाले पैर ! गुलमुहर के फूल-सा सुर्ख और कोमल शरीर, भोली सहज पर्सनलिटी-एम. ए. पास हो तो कालेजवालियाँ सपनों में देखें, डिप्टी कलेक्टर हो तो ससुरों की पांत आ जुड़े, पर केवल मुर्गा है तो ना कुछ है, आवारा है-’ए गमे दिल क्या करूं, वहशते दिल क्या करूं ?’
धूप कमर के बेल्ट से कालर तक पहुँची और अब्बास मियाँ उर्दू की ट्यूशनें करने चल दिए। जूतों की सदा सुहागन चर्रचूँ और बहू-बेटियों को सचेत रखनेवाली खंखारों के स्वर मोहल्ले से ‘फेड-आफ हो गए। टहलता-चुगता मुर्गा पीछे से घूम गलियारे में आया तब अजीज़ हवलदार अब्बास की लड़की रब्बी के साथ छेड़छाड़ कर रहा था।
“हमारी चीज़ लाए !”
“नहीं लाए,कल ज़रुर लाएँगे!”
“जाओ, हम नहीं बोलें तुमसे !”
हवलदार साहब ने तुरन्त रब्बो के गालों को अँगुलियों-अँगूठे के बीच दाब बिचारी की शक्ल को हुक्का बना दिया और मुँह से आती पान की पीक निगलकर बोला—हमसे नहीं बोलोगी तो बोलोगी किससे, ज़रा यह तो बताओ।
मुर्गा तिलमिला उठा ! जैसे रब्बी नहीं उसकी कोई मुर्गी हो और अजीज़ हवलदार वह भगवान हो जिसका मुर्गी से सम्बन्ध है। यही रब्बो दूध पीनेवाली बच्चे जनेगी, यदि हवलदार ने इसका नर बनना कुबूल किया। फिर हवलदार का फर्ज़ है, यदि किसी दूसरे को बच्चे का बाप घोषित किया जावे तो वह साले को हथकड़ी डाल दे, फाँसी चढ़ा दे ! और अगर मादा खुद छिनाला करे, इसकी-उसकी कोठरियाँ झाँकती फिरे, तो दारी की गरदन कतर दे। शौहर का बनना जी कोई मज़ाक नहीं है।
मुर्गा चौकस हुआ। आँखों में क्रोध, पंखों में तूफान और तनी हुई कलगी। पर शत्रु कौन है, पता नहीं। उसे मुर्गियों पर नज़र रखनी पड़ेगी, वे कहाँ भटकती हैं, किसके पास जाती हैं। उसकी ढील और लापरवाहियाँ जान पर आ गई हैं कि अण्डों के विषय में अधिकार से जानकारी देनेवाली बुढ़िया भी महल्ले में चिल्लाकर कहती है—सब अण्डे भगवान के हैं। अजीज़ हवलदार पर क्रूद्ध दृष्टि डाल वह गलियारे से घूमकर बुआ के घर की तरफ चल दिया। उनके ओटले के निकट चार दाने चुगने चाहे पर मन नहीं माना। वह सीधा दड़बे की तरफ चला।
दड़बे का दरवाज़ा खुला पड़ा था और करीब सारा कुनबा बाहर धूप में आ गया था। मोटी कल्लो धूल में गड्ढा बनाकर बैठने की सुविधा कर रही थी, छोटी ज़मीन पर पंजे मार धूल उड़ा रही थी और बाकी सब कुछ धीरे-धीरे बोल रही थीं। पीछे रस्सी पर कोई गीले कपड़े डाल गया था। सी धरती टपकती बूंदें चूस रही थी। मुर्गे को आता देख एकाएक सबकी चुहलबाज़ियाँ बन्द हो गई, चुप हो गई। और दिन होता तो इस रोब को देख वह प्रसन्न हो जाता, पर आज उसके अन्तर में सन्देह घुमड़ रहा था। सब मुर्गियों को चुप होती देख उसे सन्देह हुआ कि कोई महत्वपूर्ण बात उससे छुपाई जा रही है। पत्नियों के चेहरे पर पातिव्रत्य की जो टिकाऊ व चमकदार पालिश पाई जाती है, वह आज उसे हल्की जान पड़ी। मादा सन्तुष्ट है, यह प्रसन्नता की बात नहीं जब तक यह विश्वास न हो कि यह सन्तोष हमारी वजह से है। मुर्गे का विश्वास आज बिखर गया था। तबियत कहती थी है तेरे पास, छिनाल कहीं की ! क्या सम्बन्ध है भगवान से तेरा !
एक हमउम्र मुर्गी पास आई, “नेक मुर्गे, क्या सोच रहे हो ?” “
“सोच रहा हूँ तूफान आनेवाला है, जिसमें यह धरती काँप जाएगी, आकाश टूट जाएगा और धूल की परत दुनिया को ढक लेगी।”
“नहीं मुर्गे, मुझे तो ऐसे आसार नहीं लगते। कोई साधारण-सी आँधी लगती है।”
“साधारण-सी आँधी नहीं है ! इसने मुझे झकझोर डाला है। झूठ के तख्ते टूट जाएँगे, सच्चाई दड़बे से बाहर जा जाएगी। मैं चूज़ा नहीं हूँ। जान लो मुर्गियो कि मैं चूज़ा नहीं हूँ।”
मुर्गा बहुत बड़ी बात कह गया था पर जब तक समझ नहीं आए, कोई बात बड़ी नहीं होती। वह सोचता था कि वह इन दुराचारिणी मुर्गियों को पर्याप्त इशारा कर रहा है। पर अण्डेवती सुहागिनों को क्यों और क्या समझ आता। वे तेज़ी से जाते मुर्गे को हैरान देखती रहीं। कुछ क्षण सकते में बँध गए। दड़बे का वातावरण क्षुब्ध हो गया। कुछ देर बाद वे समवेत में कुड़कुड़ाने लगीं।
“आखिर मुर्गों को हो क्या गया यकायक ?”
“पता नहीं, कुछ देर पहले तो चंगा था। रात को आराम से रहा, सुबह भली-भली बाँग लगा रहा था।”
“और नहीं तो क्या ! आए और लगे चिल्लाने। अब देखो मैं ठीक कहूँ, बाहर का गुस्सा घर में निकालना बुरी बात है।”
“जाने क्या बोल गए, कुछ समझ नहीं आता।”
“हमसे कोई कसूर हुआ है तो साफ बोले ना। किसने तुमको चूज़ा समझा ! चूजे तुम्हारे दुश्मन !”
“हम लोग तो मारी फिकर मरी जाएँ कि मुर्गे हुजूर को कोई तकलीफ न हो और ऊपर से ऐसे बोल सुनो। एक दिन ज़हर दे दो सो मुसीबत टले जी, हमारा तो जीना हराम हो गया।”
“आज यह बोल गए, कल कुछ और बोल जाएँगे।”
“मादाओं की अच्छी मुसीबत। चुपचाप बैठी भी बुरी लगें।”
देखता, चुगता, बाँग देता मुर्गा भगवान से दो-दो चोंचें करने की सोचता रहता कि ऐसे ही चार-छे दिन बीत गए। कई रात वह उठा और इधर-उधर देखभाल कर आया। चुपके-चुपके प्राय: मुर्गियों को देखा भी किया पर निरर्थक सिद्ध हुआ। बल्कि लेने के देने पड़ जाते। दूर कहीं कचरे के ढेर या खण्डहरों की ओर जाती मुर्गी को देख वह सन्देह करने लगता और भगवान और मुर्गी को रंगे हाथ पकड़ने के चक्कर में पीछे जाता। हाथ लगता मुर्गी का मर्यादित पातिव्रत्य। एकान्त में आए मुर्गे को वह रोमान्टिक उलझनों में डाल देती। लाज में फूली-फूली और प्यार में खिली-खिली हो जाती। मुर्गा, जो शंकाग्रस्त स्थिति का परिचय नहीं देना चाहता था, मादा के पंखवान मोह में पैर से कलगी तक बँध जाता। भगवान खोजने जाता और प्यार गले गलता। भगवान की कायरता के विषय में जो धारणा उसने बना रखी थी, वह और मज़बूत होती गई। वह प्राय: कॉक-कॉक कर सारी मादाओं को समीप बुलाकर हाज़िरी लेता। सन्देह के कोई सुराख हाथ नहीं लगते।
एक सुबह मुर्गा रामदास की गुवाड़ी की ओर चुगता निकल गया। काफी देर तक इत्मीनान से चुगता, किल्लोल करता रहा। सामने दालान में मास्टर साहब पढ़ा रहे थे। अहसान के बोझ से दबे पाँच बच्चे घुटनों में गर्दन दबाए किताब का रहस्य समझने में लगे थे। मास्टर साहब ऊँची आवाज़ में बोले-”वे मानते थे कि हिन्दू और मुसलमान एक हैं। वे मानते थे कि हिन्दू और मुसलमान एक हैं। वे क्या मानते थे किशोर ?”
“हिन्दू और मुसलमान एक हैं।”-किशोर बोला।
ट्यूटर आगे बढ़ा।
“उन्होंने सबसे कहा कि भगवान मन्दिर और मस्जिद दोनों जगह रहता है। भगवान मन्दिर और मस्जिद दोनों जगह रहता है। कहाँ रहता है भगवान नत्थू ?”
“मन्दिर और मस्जिद में।”-नत्थू ने जवाब दिया।
मुर्गे ने सुना। क्रोध में उसने दुहराया, “भगवान मन्दिर और मस्जिद में रहता है। देख लूंगा ! खून पी जाऊँगा ! अब कहाँ जाएगा कम्बख्त बचकर ?” उसकी प्रतिहिंसा जाग उठी। वह क्रोध में पंजे पटकने लगा। उसकी गर्दन फूल गई, पंख फूल गए, जैसे मखमली तम्बू में तूफान समा गया हो। उसने दुश्मन के गढ़ का पता लगा लिया। वह लड़ेगा, वह भगवान से लड़ेगा। वह तेज़ी से मन्दिर की ओर चल पडा ।
अन्दर, गहरे अन्दर कहीं युद्ध का बाजा बजने लगा। वही बाजा हो हरमोनिया वाले पण्डित जी रामलीला में तब बजाते हैं, जब लक्ष्मण की मेघनाद से रूबरू होती है। मुर्गे की नसों में तेज़ी से खून दौड़ने लगा। क्रान्तिकी की मशाल की तरह कलगी तान वह मन्दिर में घुस गया। जिस तरह भगवान के रूप की कल्पना करते हुए मनुष्यों ने सिर के बाल, नाक, आँख, सीना और पेट सब अपने ही जैसे भगवान के भी माने हैं, उसी प्रकार मुर्गे को भी भ्रम था कि उसकी मुर्गियों से सम्बन्धित भगवान भी कोई पंख, कलगी और पूँछवाला ही होगा। अन्दर घुसकर मुर्ग ने पैर थपथपाए, चोंच को शस्त्र की तरह ताना और मन्दिर में चढ़ गया।
“कहाँ है भगवान ! निकल ! आ ! बाहर आ तेरी।”-मुर्ग चीखकर बोला, “जान ले लुंगा। कलेजा चीरकर खून पी जाऊँगा। कौन है भगवान ! अबे ओ, डरपोक ! कहाँ गया ? आज तू रहेगा या मैं। सारी मादाएँ तेरी होंगी या मेरी। अण्डे तेरे कहलाएँगे या मेरे। आ जा !”
कोई बाहर नहीं आया।
मुर्गा अन्दर बढ़ा, “दड़बे में क्यों घुसता है बे। बाहर मैदान में आ, बदमाश ! तू भी आ और अपने अच्छे-अच्छों को बुला ले। सबको देख लूँगा। किस हिम्मत से अण्डों का मालिक बनता है, मुर्गियों का नर बनता है। खून पी जाऊँगा।
कौन आता।
उसने फड़फड़ाते पंखों में एक वीर योद्धा की तरह चारों ओर चक्कर लगाए। हर कोने में लपका कि कहीं भगवान मिले। उसकी कॉक-कॉक-कुक-डू कॅ से मन्दिर का प्रांगण गूँज उठा। स्वर्ग से देवताओं का समूह काजू चबाता, बदन खुजलाता दर्शक गैलरी में आकर युद्ध देखने बैठ गया।
“बदमाश ! गुण्डे ! अबे कहाँ छुपा है ? कायर, बाहर निकल।”
पंजे मारकर उसने सभी फूल-पात बिखेर दिए। चारों ओर चक्कर लगाया। पंखों को खूब फड़फड़ाकर गर्दन तान ली और पैनी नज़र से सब ओर देखकर बोला, ‘कहाँ भगवान है ? कहीं नहीं है। न कभी दड़बों के पास आया, न भटकता हुआ दिखा, न इस मन्दिर में मिला। गैरतवाला होता तो इतनी गालियों पर बाहर न आता ? सब बेवकूफी है। अण्डे सब मेरे हैं, मेरी मादाओं के हैं। किसी साले के नहीं हैं। बुढ़िया झूठ बोलती है, अब्बास झूठ बोलता है। कमीना ! अण्डे मेरे हैं। भगवान-वगवान कुछ नहीं होता।”
“काँक-काँक-काँक!”-वह मन्दिर से बाहर आया।
“काँक-काँक-काँक !”-जैसे वह जीत गया।
सारे दिन मुर्गों ने मन्दिर पर नज़र रखी कि भगवान दिख जाए तो उससे भिड़ जाए, पर कोई प्राणी उसे नज़र नहीं आया, जिसकी शक्ल मुर्गे की हो और जिसे भगवान कहा जा सके। शाम तक उसका यह विश्वास मज़बूत हो चुका था कि अण्डे उसके हैं, और सिर्फ उसके।