अतृप्त आत्माओं की रेल-यात्रा (व्यंग्य) : शरद जोशी | Atripta Aatmao ki Railyatra : Sharad Joshi ke Vyangya

 

कम्बल ढकी पहाड़ियाँ, तीखी तेज़ हवा और लदी-लदी रेल चली जा रही थी। आत्माओं ने काँच की खिड़कियाँ बन्द कर दीं। कभी झाँककर देखते तो मठों की आबादियाँ, आवारा प्रेतों के भटकते झुण्ड, यज्ञ-हवन की बुझी हुई आग नज़र आ जाती। तारे ठिठुरे हुए थे और दिशा अनजानी। सब जा रहे थे, अज्ञात रास्ते को। बूढ़े पवन के घर आज फिर कोई औलाद हुई है कि मस्ता रहा है, झूम रहा है। डिब्बे भी गीले थे। कल मृत्युलोक के दरवाज़े पर इन्हें किसी पवित्र जल से धोया गया था, वह अभी तक सूखा नहीं। यह सब चर्चा की बातें थीं, परन्तु वे सब अवसादों से लदे थे, यादें बँधी हुई थीं और इसी कारण आपस में नहीं बोल रहे थे। सबको लग रहा था कि अब सूरज, जिन्हें इस ओर भगवान भास्कर कहते हैं, उग जाना चाहिए। कुछ गर्मी आए वातावरण में, ठिठुरती आत्माओं में।
हरदयाल जी सोच रहे थे, भाई घर आ गया होगा। तार समय से मिल गया हो, तो नौ बजे वाली पठानकोट से पहुँचा समझो। जाने लाश उठी हो या नहीं। बउआ बड़ी रो रही होगी। वे स्वयं यह सोच उदास हो गए। पड़ोस में एक साधु बैठा बार-बार ईश्वर का नाम ले रहा था। किसी गाँव की विधवा को भगाकर, चेली बनाकर ले गया था। एक दिन पकड़ा गया, तो बहुत पिटाई हुई। उसीमें मर गया। रेल में बैठा बड़ाबड़ा रहा था, ‘सब सालों को फाँसी लगेगी। साधु-सन्तन के प्राण लेना खेल नहीं है। इस साल फसल चौपट हो जाएगी, हैज़ा, प्लेग फैलेगा।” थोड़ी-थोड़ी देर में ईश्वर का नाम लेता। सामने एक नौजवान लड़का सिर लटकाए बैठा था। आत्महत्या करके आया था-बेकारी के कारण। कुछ समझ नहीं पा रहा था। मृत्यु-पूर्व का तनाव और उलझन अभी तक बनी हुई थी। वह मुक्त अनुभव करना चाहता था, पर हुआ नहीं।
“कै साल की उमर में चले आना पड़ा भाई ?” साधु ने पूछा। युवक ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा और धीरे-से बोला, ‘इक्कीस साल में।” ‘तभी इतने उदास हो रहे हो। जीवन का सुख नहीं भोगे, नारी के साथ रति नहीं किया, पकवान नहीं चखे, यत्र-यत्र प्रवास नहीं किया, बम्बई नहीं देखी। उदास होना स्वाभाविक है।”
इधर बम्बई के बूढ़े सेठ पूरी उमर जीकर आए थे। साधु से पूछने लगे, “आपका क्या बम्बई से आना हुआ महाराज ?”
“नहीं, हम तो हिमालयवासी हैं। पन्द्रह वर्ष तप किया। गृहस्थाश्रम में थे तब बम्बई गए थे।”
“एक्टर बनने ?” कहीं से आवाज़ आई।
साधु ने क्रोध से इधर-उधर देखा, ‘छि:, हम तो बालपन से ही जोगी जैसे रहे। भरथरी जी का माफक घर छोड़ दिया। बम्बई वर्ष-भर रहना हुआ। कई सुन्दरियों ने हमें खींचना चाहा, पर हम सदैव दूर हरे। जीवन-मृत्यु के रहस्य से वाकिफ थे। हमारे गुरु जी की एक पुस्तिका मथुरा से छपी, आपने पढ़ी होगी, ‘जन्म-मृत्यु-रहस्य’।”
सब ओर चुप्पी थी।
“बड़ी सुन्दर है। अब तो इस लोक में स्वयं गुरु जी के दर्शन होंगे, उनके मुख से सुनिएगा। बड़ा मधुर बोलते हैं, साथ में हरमुनिया पर गाते भी हैं। आप श्रीमान् कहाँ से आए हैं ?” साधु ने सेठ से पूछा।
“बम्बई से।”
“व्यापार-वाणिज्य में लगे रहे जीवन-भर ?”
“हाँ, हमारे तीन मिलें थीं। इधर इंदौर तक हमारा काटन का बिज़नेस चलता था।”
साधु घृणा से हँसा, “लक्ष्मी, तू बड़ी ठगनी है ! माया है।”
सेठ को क्रोध आने लगा, “इसी लक्ष्मी से बहुत साधुओं को चटाया-खिलाया है, हमने। दरवाज़ों पर घण्टों पड़े रहते थे। देश-भर के बड़े मन्दिरों को दान-खाते से रकम भेजी जाती थी।”
“धन्य है धन्य।” साधु यह सुनकर विभोर हो गया, “यही सच्चा मानव जीवन है। कीचड़ में कमल के माफक।”
पटरी पर बैठे प्रेतों के एक झुण्ड को भगाने के लिए रेल ने लम्बी सीटी दी और गति तेज़ कर दी। इधर सूरज का उजाला फैलने लगा। किसी ने कहा, ‘भगवान भास्कर उदित हुए।” सब उस उजाले की ओर उन्मुख हो गए। खिड़कियाँ खुलने लगीं और आत्माओं ने बाहर झाँकना शुरू किया। ‘आह, कैसा सुन्दर दृश्य है !” एक कवि की आत्मा ने कहा, ‘यदि पहले दिखा होता तो हमने कोई कविता गा दी होती।” फिर सोचने लगा, ‘बहुत लिखकर आए हैं, मित्रों को चाहिए कि अंतिम कविताओं का संकलन प्रकाशित करवाएं और सारी रॉयल्टी सुधा को दिलवा दें। स्मृति में अंक भी निकलना चाहिए। वातावरण बन गया तो साहित्य के इतिहास में नाम आया करेगा, नहीं सारी कृति अकारथ बह गई।”
कुछ देर बाद पास बैठी बुढ़िया से कवि ने पूछा, “कहाँ से आ रही हो ?”
“आगरे से।”
“पागलखाने में थी ?”
“तू होगा पागलखाने में। मेरा भरा हुआ घर है। सुहाग-भरी हूँ। तीन बेटे जूते की दुकान करते हैं। यहाँ होते, तेरा मुँह तोड़ देते।”
कवि-आत्मा यह सुन चुप हो गई।
“उन्हें काहे को यहाँ बुला रही है, बुढ़िया !” किसी ने कहा।
“याद आती है सब लोगों की।” वह सुबकने लगी।
“तू किया कर याद। वे तेरे बदन को फूँककर ठण्डी साँस लेंगे।” हलवाई सुन्दरलाल ने, जिनकी गाजियाबाद में बड़ी दुकान थी, कहा।
“दुनिया से बड़े नाराज़ हो भाई !”
सुन्दरलाल को उनके भतीजे ने ज़हर दिया था, जायदाद हड़पने के लिए। एक ही बात कही, ‘सब कमीने हैं। भाई हो या भतीजा।” और मुँह फेरकर बैठ गए।
कुछ देर बाद रेल रुकी। कोई बड़ा जंक्शन था। सवेरा हो गया था। रेल के दरवाज़े खुले। आत्माएँ चहलकदमी के लिए जिज्ञासाएँ लेकर उतरी। बड़ी भीड़ थी।
“स्वर्ग आ गया क्या ?”
“आहा, बड़ा पुण्य-अर्जन किया है न जीवन-भर ? मरे अभी समय नहीं हुआ और लगे चिल्लाने-स्वर्ग आ गया क्या ?” प्लेटफॉर्म पर खड़ी किसी वालंटियर-आत्मा ने चिढ़ाते हुए कहा।
दस मिनट में सबको पता लग गया कि गाड़ी यहाँ बड़े समय तक पड़ी रहेगी। इस जंक्शन से शिशु-आत्माएँ पृथ्वी पर जाने के लिए लदती हैं और आए हुए उतरकर नई गाड़ी में चढ़ते हैं। इसी बीच रजिस्ट्रेशन होता है। सबके नाम-पते नोट किए जाते हैं।
बीना-इटारसी लाइन के किसी स्टेशन के एक सहायक स्टेशन मास्टर की आत्मा से, घण्टों इस तरह रेल का पड़ा रहना सह्य नहीं हुआ। वहाँ के कर्मचारी को रोककर वह बहस में उलझ गया।
प्लेटफॉर्म पर उतरते ही आत्माओं ने छोटे-छोटे समूह बनाना प्रारम्भ कर दिया। कुछ आवारा, उदास एक ओर से दूसरी ओर भटकते रहे। कुछ परिचित एक-दूसरे से मिले।
“आ गए भाई !”
“आ गए।”
“सब छूट गया, अपना-पराया !”
“क्या बताएँ ! घर में इस समय कुहराम मचा होगा। छोटे-छोटे बच्चे हैं। क्या होगा उनका !”
“सब अपने जी लेंगे मित्र !”
“शायद सरकार कुछ करे।”
“जीते जी नहीं किया, मर गए तो क्या करेगी ! अब मेरा ही मामला लीजिए। तुम जानते हो, परसाल मेरा सुपरिण्टेण्डेण्ट बनने का चान्स था, पर नहीं होने दिया गया। ज़िन्दगी-भर भूखा रहकर सरकार के रुपए गिनता रहा, हिसाब मिलाता रहा। अब याद कर रहे होंगे।”
“छोड़ी जी चिन्ता।” तीसरी आत्मा बोली।
एक बाबू-आत्मा को दफ्तर का चपरासी नज़र आ गया, जिसे उन्होंने बीमारी के लिए तीन माह की छुट्टी दिलाई थी। वह यहाँ भी अहसान में झुका हुआ कह रहा था, “आपका कृपा रही साहब ! बेटे ने मेरा बड़ा इलाज कराया, पर हुजूर होनी को कौन रोक सकता है।” फिर नम्रता से पूछने लगा, “आपका कैसे आना हुआ साहब ?”
“जीप की टक्कर हो गई। ड्राइवर बदमाश बच गया और मुझे जान खोनी पड़ी।”
“ओह, बडी़ तेज़ चलाते हैं, खासकर वह जमनालाल...”
“उसीसे टक्कर हुई।”
“मैंने उसकी एक बार शिकायत भी बड़े साहब से की थी, पर कुछ नहीं हुआ।” फिर वे दोनों बड़े साहब की बुराइयाँ करने लगे।
“बड़े साहब ने ही उसे सिर चढ़ा रखा है। और चढ़ावेंगे क्यों नहीं, सारी गड़बड़ी से, जो साहब करते हैं, वह वाकिफ है। एक-दूसरे की मदद करते हैं। सालों ने दफ्तर को बनिए की दुकान बना रखा है।”
इधर एक इंजीनियर, जिसका कहना था कि उसके यहाँ आ जाने से दक्खन का सबसे बड़ा बाँध अधूरा रह जाएगा, आसपास खड़े लोगों से डॉक्टरों की बुराइयाँ कर रहा था, “सौ रुपया रोज़, फीस और दवाई में उड़ गया। आखिरी दिनों में तो तीन-तीन डॉक्टर आए पर उनका डायग्नोसिस ही गलत था। नौ बजे वह कमीना मुझे बोलकर गया कि घबराइए नहीं आप ! कल स्वस्थ हो जाएँगे और एक बजे मुझे हिचकी आई’ !”
“और टा-टा।” सब हँस पड़े।
एक होमियोपैथ ने जमे मजमे को देखकर कहा, ‘एलोपैथी पर जिसने विश्वास किया, उसने ज़िन्दगी चार साल पहले छोड़ दी है। रोग का समूल निदान डॉक्टरों के लिए असम्भव है। यह तो होमियोपैथी की ही करामात है, कि…।”
“अब रहने दीजिए। डॉक्टर वैद्य तो वे घाट के पण्डे हैं, जो मौत की नदी के किनारे बैठ मरने वालों से कमाई कर लेते हैं। मरने वाला मरता ही है।”
“अरे मरते को कौन रोक सकता है ? हम अपने बाप को नहीं रोक सके, तो हमारे बेटे क्या हमें रोक पाते ?”
एक चुप्पी-सी छा गई। काशी के एक मठाधीश स्वामी महाराज ने, जो अभी तक चुप थे, मुँह खोला, “जो अतीत है, उसपर सोचना तो मूर्खों का काम है। जो भावी है, आगामी है, उसपर विचारो। हम अपने प्रवचनों में सदा कहते आए हैं, जीवन क्षणिक है।”
“काहे का क्षणिक। अस्सी साल जूते घिसे हैं, बदन तोड़ा है। हमारी हम जानते हैं।”
“वह सत्य है, पर इस अनन्तकाल में अस्सी साल क्या हैं ? मैं तो डेढ़ सौ वर्ष संसार में रहा हूँ।”-सब चौंके-”गजब है।”
“अजी ज़िन्दगी तो रबड़ जैसी है, स्वामी जी ज़्यादा खींच गए। मज़बूत रबड़ होगा।”
“साधना और तपस्या से सब हो जाता है।”
“खाना-पीना भी अच्छा मिले तब बात है। स्वामी जी माल उड़ाते होंगे।”
“नहीं-नहीं, सदा फलाहार किया। अन्न को नहीं छुआ।”
तभी पास से एक नारी-आत्मा गुज़र गई। रेल के डिब्बों में झाँकती। स्वामी जी से नज़र हटा, सब उसे देखने लगे।
“बड़ी सुन्दर है।”
“शक्ल तो फिल्म एक्ट्रेस रत्ना सरीखी लगती है।”
“वही तो नहीं हो।”
“आओ देखें तो यार, है कौन !”
स्वामी जी अकेले रह गए।
रत्ना जैसी लगनेवाली के आसपास मंडराने वालों की संख्या काफी थी। एक ने साहस कर पूछा, ‘‘कौन हैं आप ?”
‘‘आपको मतलब ?”
वह सकपका गया, “मेरा मतलब यह कि क्या आप ही अभिनेत्री रत्ना हैं।”
“रत्ना, रत्ना ! वह भी यही कहता था। मर गई रत्ना भाड़ में।” वह पगली-सी ठठाकर हँसी, “मुझसे कहता था, अगर शादी नहीं हो सकी, तो प्राण दे देंगे। मैं तो मर भी गई, पर वह अभी तक नहीं आया।”
“उसे ही खोज रही हूँ डिब्बों में।”
“और किसे खोजेंगी, माशूक तलाशेगी आशिक का डिब्बा। कहिए, खंजर मारकर मरी थीं या हीरे की कनी चाटकर ?”
“दुखी आत्मा के साथ मज़ाक न करें, भाई साहब !”
“तुम्हें क्यों तकलीफ हो रही है ?”
“उस अकेली जान को परेशान कर रहे हैं। शरम नहीं आती।” आवाजें बढ़ने लगीं। गालियों के फव्वारे छूटे और फिर गुत्थमगुत्था हुई, जो जल्दी ही छुड़ा दी गई।
स्वामी जी, जो अब वहाँ आ गए थे, कहने लगे, “देवी, शरीर से ऐसा प्रेम तो धोखा ही है। उस युवक से प्रेम किया, बजाय यदि ईश्वर से प्रेम किया होता...।”
“तो आपके आश्रम में पड़ी रहती, और क्या ?” किसी ने टीका।
“दो व्यक्ति जब बातें करें तब बीच में...”
“चेली बना रहा है बिचारी को।”
स्वामी जी पैर पटकते आगे बढ़ गए, “इसीलिए हमने जीवन-भर कभी स्त्री को उपदेश नहीं दिया। समाज अपने चश्मे से देखता है।”
रत्ना की आत्मा ने चारों ओर देखा, लोग टुकुर-टुकुर उसे ताक रहे थे। वह मुँह ढककर बैठ गई।
एकाएक आकाशवाणी हुई–”“आप लोग मुख्य कार्यालय की खिड़की से लाइन लगाइए और अपना नाम-पता रजिस्टर करवा लीजिए।”
(फिर मराठी में, बंगला में, पंजाबी में, इस तरह चौदह भारतीय भाषाओं में यही सूचना मिली।) तब तक लाइन लग गई थी। करनाल के प्रसिद्ध हिन्दी-प्रचारक विरहानन्द काव्यालंकार ने सबसे पहले हिन्दी में अपना नाम लिखा। आयु, ठिकाना आदि सब लिखने के बाद विशेष जानकारी में लिखा–”हिन्दी-प्रचार में शहीद हुए।” इस पर रजिस्टर के पास बैठी अधिकारी-आत्मा ने कहा, “क्या वास्तव में ?”
“जी हाँ। जीवन-भर असत्य नहीं बोला, तो अब मृत्यु पर नहीं बोलेंगे।”
“जीवन-भर असत्य नहीं बोला, तो प्रचारक कैसे हो गए ?” अधिकारी ने चुटकी ली।
सब हँस पड़े।
“शायद इसी कारण शहीद होना पड़ा।”
सब फिर हँसे, न जाने क्यों ?
काव्यालंकार जी अपना नाम लिखने के बाद वहीं खड़े हो गए। चार-छ: आत्माओं के बाद जब आत्महत्या से मरकर आए युवक ने कलम ली और अंग्रेज़ी में एम. एल. श्रीवास्तव लिखने लगा, तो काव्यालंकार जी ने टोक दिया, “आंग्लभाषा अभी तक सिर पर लाद रखी है। राष्ट्रभाषा में नहीं लिख सकते क्या ? आपको शर्म आनी चाहिए, आप भारतीय हैं।”
युवक ने उन्हें क्रोध से देखा और फिर काटकर हिन्दी में लिख दिया, काव्यालंकार जी की बाछें खिल गईं।
‘‘वास्तव में आप सच्चे हिन्दी-प्रचारक हैं !” किसी ने कहा। वे मुस्करा दिए।
“शहादत केसे मिली पण्डित जी ?”
“क्या बताएँ ! चार वर्ष से हम प्रचार-सभा के अध्यक्ष थे। इस वर्ष हम पर अविश्वास का प्रस्ताव रख दिया और दूसरे को चुन लिया। हमसे यह पीड़ा सही नहीं गई और हमने देह त्याग दिया।”
“महापुरुषों के साथ अक्सर बुढ़ापे में जनता ऐसा मज़ाक कर बैठती है।”
काव्यालंकार जी आकाश की ओर देखने लगे।
प्लेटफॉर्म पर धूप बिखर आई थी। एक दरवाज़े से बच्चों के समूह आने लगे और बेंचों पर बैठने लगे।
“ये वे शिशु हैं बेचारे, जो जन्मते ही मर गए।”
“जी नहीं, ये अब पैदा होने दुनिया में जा रहे हैं।” एक वालंटियर ने बताया।
“ओ हो, कितने सुकोमल, जैसे फुलों के गुच्छे!”
“बढ़कर बुढ़े हो जावेंगे और खिसें निपोरेंगे !”
एक भीषण लट्ठबाजी के बाद दो महीने अस्पताल में रहकर मरे, कालू उस्ताद आत्माओं की भीड़ चीरते आगे आए और बच्चों से पूछने लगे, “क्यों बे छोकरो ! दुनिया में कहाँ-कहाँ जाओगे ?”
“अपने मोहल्ले का बच्चा खोज रहे हो उस्ताद !”
“अभी से गुरुमन्त्र दे दो।”
बच्चे चुप बैठे रहे, एक-दूसरे का मुँह देखते।
“अरे बोलो,गूँगे हो क्या ?”
“अभी भाषा-ज्ञान नहीं हुआ होगा।” काव्यालंकार जी ने कहा।
“दुनिया में जाएँगे।” एक बच्चा बोला।
“कौन-सी दुनिया ? गरीबों की दुनिया कि अमीरों की दुनिया ? दिलवालों की दुनिया कि मिलवालों की दुनिया ?”
सब कालू उस्ताद की आत्मा द्वारा रचित इस बेढब तुकबन्दी पर हँस पड़े।
“कालू उस्ताद, शायर रहे हो क्या ?”
“भई, क्या शायरी हुई, न इसमें रचना-कौशल है, न बिम्ब, न सम्प्रेषणीयता। निरी तुकबन्दी है।” कवि ने धीरे से काव्यालंकार जी से कहा।
काव्यालंकार जी की आत्मा ने इस साहित्यिक शब्दावली को सुन उनसे पूछा, “आप साहित्यिक रहे हैं शायद पृथ्वी पर !”
“अभी भी हूँ। मैंने देह त्यागा है, अपना कवि-स्वभाव तो नहीं त्यागा। मेरा नाम है विनय वर्मा ‘रसिकेश’, सुना होगा। मेरा संकलन ‘सयाना चांद और नीम की डाली’ की अभी बड़ी चर्चा रही। गत माह की “अमरावती’ के प्रथम पृष्ठ पर मेरी कविता...।”
“हाँ, हाँ, सुना है। आपकी पुस्तक हमारे पास समालोचनार्थ आई थी। बुरा नहीं मानें, हमें सारी कविताएँ घटिया लगीं, सो हमने उसे लौटा दिया।”
“आप शायद समझ नहीं पाए !” कवि ने मुँह टेढ़ा कर कहा।
“जी हाँ, साहित्य पढ़ते और हिन्दी का प्रचार करते हमारे बाल सफेद हो गए और आपकी कविता हमें समझ नहीं आई।” वे ज़ोर से हँसे।
“मैं आपसे इस विषय में बहस करना चाहूँगा।” कवि ने ज़ोर देकर कहा।
“अवश्य कीजिए, यहाँ इस लोक में साहित्य-चर्चा के लिए बड़ा समय मिलेगा। हम लोग कभी बैठेगे।” और काव्यालंकार जी की आत्मा मुँह फेर उन शिशु-आत्माओं की ओर देखने लगी, जिनके साथ कालू उस्ताद का पहलवान प्रेत हँसी-मज़ाक कर रहा था।
“अच्छा बच्चो, तुम यह बतला दो कि तुममें से बिना बाप का बच्चा कौन होनेवाला है ?”
“क्या मतलब आपका ?” एक ने डाँटा।
“यानी कुँवारी लड़की और के बच्चे कौन-कौन हैं ? हाथ उठाओं ।”
“छी-छी, आप इन नन्ही आत्माओं से मज़ाक करते हैं !” साधु की आत्मा नाराज़ हुई।
“और ऐसे बच्चे जन्म लेते हैं, तब आप जैसे साधु-सन्त थू-थू करते हैं-तब !”
“साधु पाप का समर्थन नहीं कर सकता। अनैतिकता का विरोध उसका धर्म है। हमने सदैव विरोध किया है-पाप का।” साधु की आत्मा ने भाषण देते हुए कहा, “विधवा स्त्री से शारीरिक सम्बन्ध घोर पाप है और ऐसे पापी को दण्ड मिलना ही चाहिए और ऐसी सन्तानों को समाज में स्थान नहीं दिया जाता है।”
तभी शिशु-आत्माओं के समूह में से किसी ने कहा, “मैं इन साधु जी का बच्चा हूँ।”
सब चौंक पड़े और फिर हँसने लगे।
कालू उस्ताद की आत्मा ने साधु की आत्मा का गला पकड़ते हुए कहा, “क्यों बे ढोंगी, ये बच्चा क्या कहता है ?”
“अखिल विश्व के बालक हमारे बालक हैं। हम साधु हैं न।”
“क्यों बच्चे, यह साधु तेरा बाप कैसे हुआ ?”
“इसने एक विधवा स्त्री को चेली बनाकर रखा था। मेरा जन्म उसी से हुआ है।”
“क्यों बे बदमाश ?”
“झूठ है, असत्य है, हमने कभी चेली नहीं रखी। नारी नरक की खान मानते रहे। इस विषय पर हम प्रवचन दे सकते हैं। सुनिए !”
पर तब तक सारी आत्माएँ साधु पर टूट चुकी थीं और उसे पीट रही थीं। साधु हाथ जोड़ रहा था स्वामी जी के-”“आप रक्षा कीजिए”-पर वे हँसते रहे और बोले, “हम इन जटाधारियों के सम्प्रदाय से परिचित हैं। सब पापी होते हैं, ये लोग। पिछले कुम्भ में, हमारे अखाड़े वालों ने इन जटाधारियों की पिटाई लगाई थी।”
ज़मीन पर गिरे हुए साधु ने हाथ-पैर मारते हुए कहा, “यह स्वामी बदमाश है। इसका गुरु विधवाश्रम चलाता है, अनारी है। यदि पीटना है, तो इसे भी पीटें।”
कालू उस्ताद इस प्रश्न पर भी विचार करते, पर तब तक वालंटियरों ने साधु को छुड़ाया और भीड़ को छाँट दिया। कालू उस्ताद और साधु की आत्माओं को पकड़कर वालंटियर एक ओर ले गए।
फिर चुप्पी छा गई। एक रेल आई जिसमें सारी शिशु-आत्माएँ चढ़ गईं।
“जा रहे हैं-पृथ्वी के दु:ख भोगने के लिए।”
“अरे काहे का दु:ख ? बड़े होकर यही मर्द-औरत बनकर ऐश करेंगे, दारू पीएँगे और खाँसते-खँखारते यहाँ लौट आएँगे।”
शिशु-आत्माओं की रेल ने प्लेटफॉर्म छोड़ दिया। खिड़की के पास गिड़गिड़ाती हुई बुढ़िया कहती रह गई-”“मुझे भी ले चल बेटा वापस। मुझे भी ले चल बेटा !”
स्वामी जी की आत्मा हँसी, “और माया-मोह छोड़ डोकरी। सब यहीं आने को है। पुण्य किया होगा तो सारा घर-बार यहीं बन जाएगा।”
“आगरा में हमारे तीन मकान थे। यहाँ मिलेंगे थोड़े वे, चाहे कितना ही पुण्य किया हो।” बुढ़िया की आत्मा सिसकने लगी।
फिर आकाशवाणी हुई-’’सारी आत्माएँ रेल में बैठे जाएँ।” सब डिब्बे में चढ़ गए।
एक भूत ने सीटी बजाई, दूसरे भूत ने झण्डी दिखाई और रेल चलने लगी। स्वामी नहीं बैठे। वे चहलकदमी करते रहे और रेल ने जब स्पीड ली, तब वे उस डिब्बे में चढ़ गए जहाँ अभिनेत्री रत्ना के समान रूपवती स्त्री की आत्मा बैठी थी।
पता नहीं अब यह रेल कहाँ जाकर रुकेगी, सब सोच रहे हैं। पर स्वामी जी, जो जन्म-मृत्यु के रहस्य को समझते हैं, निश्चिन्त भाव से चार उँगलियों से अँगूठा मिलाकर उस सुन्दरी को समझा रहे हैं, “अपने प्रेम-भाव को किसी नश्वर शरीर तक केन्द्रित नहीं करो सुन्दरी ! उसे सृष्टि के कण-कण में बिखरा दी ! उसका दान कर दो और देखो कि कैसे चरम सन्तोष की उपलब्धि तुम्हें होती है !”