राजनीति का बंटवारा (व्यंग्य) : हरिशंकर परसाई

 


Rajniti ka Batwara - Harishankar Parsai ke vyangya

राजनीति का बँटवारा

से ठजी का परिवार सलाह करने बैठा है। समस्या राष्ट्रीय है। आखिर इस राष्ट्र का होगा क्या?

नगर निगम के चुनाव होने वाले थे और समस्या यह थी कि किस पार्टी के हाथ में निगम जाता है।

सेठजी का परिवार कई करोड़ वाला है। सब देशभक्त हैं। परिवार के वयोवृद्ध भैयाजी पाँच साल स्वाधीनता-संग्राम में जेल हो आए थे। वे ‘राष्ट्रपिता’ बनना चाहते थे, पर गांधीजी ने उन्हें नहीं बनने दिया। इस कारण वे गांधीजी से नाराज हो गए हैं। कहते हैं, “एक बनिए ने दूसरे बनिए को राष्ट्रपिता नहीं बनने दिया। खैर, चौराहे पर मेरी मूर्ति की स्थापना तो हो ही रही है।”

अब कई एजेंसियाँ परिवार ने ले रखी हैं। कई चीजों के स्टाकिस्ट हैं। इस कारण देशभक्ति और बढ़ गई है। आखिर देश के धन की रक्षा भी तो करनी है। राष्ट्र-प्रेम में कमी नहीं है। पर बिजनेस की भी एक नैतिकता होती है। यह नैतिकता है—चुंगी चोरी, स्टाक दबाना, मुनाफाखोरी करना, ब्लैक से देश का माल बेचना। अभी चन्दा करके वयोवृद्ध देशभक्त भैयाजी ने शहीदों की स्मृति में कई लाख का ‘बलिदान मन्दिर’ बनवाया है, जिसमें से काफी चन्दा खा गए। लोगों ने शक की आवाज उठाई तो भैयाजी ने कहा, “हर धन्धे में कमीशन मिलता है। जब शहीदों ने खून दिया तो मैंने, जिसने खून नहीं दिया, यदि चन्दे में से कमीशन नहीं खाया, तो स्वर्ग में शहीदों की आत्मा को कितना कष्ट होगा? वे तो मर गए। पर मैं जीवित हूँ। तो ‘अमर शहीद’ तो मैं ही हुआ न! वे तो ‘अमर शहीद’ नहीं हुए।”

तो परिवार राष्ट्रीय समस्या पर विचार कर रहा है : किस पार्टी का निगम बनेगा? चुंगी की चोरी कैसे होगी?

भैया जी बड़े होशियार हैं। जब आखिरी बार जेल जाने लगे तो छोटे भाई से कह गए, “दस हजार रुपया अंग्रेज कलेक्टर को ब्रिटिश वार फंड में दे देना। बहुत करके इस लड़ाई के खत्म होते-होते स्वराज्य मिल जाएगा। तब मैं तो हूँ ही। पर मान लो, अंग्रेज कुछ साल नहीं गए, तो तुम्हारे नाम की ‘वार फंड’ की रसीद है ही। दोनों पक्ष सँभालना चाहिए। स्वराज्य हुआ तो मैं—अंग्रेज रहे तो तुम!”

भैयाजी फिर बोले, “यदि नगर निगम कांग्रेस के हाथ में आया तो मैं तो हूँ ही। मैं अपने त्याग और वयोवृद्ध सम्मान से चुंगी-चोरी प्रतिष्ठापूर्वक करवा दूँगा। वैसे यह घोर अन्तर्राष्ट्रीय कर्म है कि जो जेल गए, वहाँ ‘सी’ में नहीं ‘ए’ क्लास में रहे, उनके परिवार के माल पर चुंगी लगे। यह राष्ट्र-विरोधी आचरण है। मैं संसद में इस सवाल को उठवाऊँगा। इन ‘सी’ क्लासियों की हरकत नहीं चलने पाएगी।”

एक भतीजा पढ़ा-लिखा था। जवान था। राजनीति में वंश-परम्परा के प्रतिकूल एम.ए. करके शोध कर रहा था। वाचाल था।

कहने लगा, “पर काकाजी, जेल में ‘ए’ क्लास में मजे-ही-मजे हैं। जो भी ‘ए’ क्लास में गए, उनमें से कई ने किताबें लिखीं। आपने भी तो हजारों पृष्ठ लिखे थे!”

भैयाजी विनम्रता से बोले, “मैं तो निमित्त हूँ। देवी सरस्वती ने लिखवाया, तो मैंने लिख दिया।”

भतीजे ने कहा, “पर काकाजी, लोग कहते हैं कि यह सब आपने नहीं लिखा। किसी से लिखवाया है।”

भैयाजी ने कहा, “बेटा, किसी कवि ने कहा है :

कारागार-निवास स्वयं ही काव्य है,

कोई कवि बन जाए सहज सम्भाव्य है।”

यह भतीजा परिवार में विद्रोही माना जाता है। कहता है, “मैं इस धन और प्रतिष्ठा के मलबे के नीचे दबकर नहीं मरूँगा। मैं शोध करके नौकरी करूँगा। पर जब लोग यह कहते हैं कि आपने नहीं लिखा, दूसरे से लिखवाया है तो मुझे बड़ी शर्म आती है।”

भैयाजी ने कहा, “तू जवाब दे दिया कर।”

लड़के ने कहा, “जवाब तो मैं दे लेता हूँ। मैं कह देता हूँ—मैं निश्चित रूप से कह देता हूँ कि यह आपने ही लिखा है; क्योंकि हिन्दी में इतना घटिया लिखने की प्रतिभा किसी और में नहीं है।”

भैयाजी लाल हो गए। छोटे भाई से कहा, “तुम्हारा लड़का नक्सलवादी हो गया है। वही लोग बुजुर्गों से ऐसी बदतमीजी करते हैं। इस लड़के को कहीं दूर होस्टल में रखो।”

तीसरे भाई ने कहा, “भाईजी, पर राष्ट्रीय समस्या तो छूटी जा रही है। चुंगी-चोरी कैसे होगी? अभी तो हम निगम की सीमा के बाहर डिपो बनाए हुए हैं और रात को चोरी से स्टाक ले आते हैं। कुछ खिला-पिला देते हैं। दारू की एक बोतल में नाके का मुंशी मान जाता है। वह बेहोश हो जाता है और हम काम कर लेते हैं।”

भैयाजी ने कहा, “यह मार्ग उचित नहीं है। गांधीजी ने सत्य पर जोर दिया है। जो हो, सत्य के मार्ग से हो। दिन में हो, उजाले में हो। यदि कांग्रेस का कब्जा निगम पर हो गया तो मैं तो हूँ ही। सत्य के मार्ग पर ही चलूँगा।”

बड़े भतीजे ने, जिसने परिवार की नैतिकता मान ली थी, कहा, “पर यदि जनसंघ का कब्जा हो गया, तो?”

भैयाजी बोले, “जनसंघ से मेरी पट जाती है। वे भी गौ-भक्त, मैं भी गौ-भक्त। पिछली बार जब मैंने गौ-रक्षा के लिए अनशन किया था तो उन्होंने मेरे खिलाफ उम्मीदवार खड़ा नहीं किया था। वे भी हिन्दी-प्रेमी, मैं भी। वे भी राष्ट्रीय, मैं भी राष्ट्रीय। उनका निगम हो गया, तो गांधीजी के सत्य के अनुसार मैं दिन में ही ट्रक बुलवा दूँगा।”

वही वाचाल युवक भतीजा बोला। भैयाजी गुस्से से देखने लगे। उसने कहा, “पर कहीं ये कम्युनिस्ट जोड़-तोड़ करके निगम पर हावी हो गए तो?”

भैया साब गर्म हो गए, “ये कम्युनिस्ट? गद्‌दार, साले हरामजादों को देख लूँगा। सबको जेल भेज दूँगा।”

वाचाल भतीजा, जो मलबे के नीचे दबकर नहीं मरना चाहता था, बोल उठा, “काकाजी, गांधीजी ने बार-बार कहा था कि कटु मत खोलो। मीठा बोलो। आप गांधीवादी हैं, पर ‘साले’ और ‘हरामजादे’ शब्दों का प्रयोग करते हैं।”

भैयाजी ने कहा, “तू बच्चा है। गांधीजी ने वह बात पंडित नेहरू और सरदार पटेल के लिए कही थी कि मीठी बातें आपस में किया करो। हम लोगों के लिए नहीं कही थी। हम लोग तो अपने विरोधी की माँ-बहन पर भी उतर सकते हैं। गांधी-मार्ग बड़ा विराट मार्ग है। ये कम्युनिस्ट देशद्रोही हैं।”

वाचाल लड़का चुप नहीं रहा। बोला, “काकाजी, ये कम्युनिस्ट जब रूस, चेकोस्लोवाकिया, क्यूबा वगैरह में देशद्रोही नहीं हैं, तो अपने देश में ही देशद्रोही क्यों हैं?”

भैयाजी ने कहा, “यह इस देश की विशिष्ट संस्कृति के कारण है।”

लड़का बोला, “तो काकाजी, अपनी देशद्रोह की संस्कृति है?”

अब भैयाजी को बरदाश्त नहीं हुआ। उन्होंने लड़के को डाँटा, “तू मूर्ख है। इसी वक्त यहाँ से उठ और कमरे में जाकर उस कचरे को पढ़ जिसे तू ‘पोलिटिकल साइंस’ कहता है। हमने भी जीवन-भर राजनीति की है। चालीस साल हो गए, पर राजनीति को हमने कभी विज्ञान नहीं, ‘कला’ कहा। फिर आजादी के बाद राजनीति को कलाबाजी कहने लगे। अब तू इसी उम्र में राजनीति को विज्ञान कहने लगा? जा, भाग यहाँ से!”

अब राष्ट्रीय समस्या आगे बढ़ी।

एक भाई ने कहा, “यदि निगम पर सोशलिस्ट पार्टी का कब्जा हो गया तो?”

भैयाजी ने कहा, “ये समाजवादी हुल्लड़ करते हैं। मैं निगम भंग करवा दूँगा।”

भाई ने कहा, “मान लो, भंग नहीं हुई तो?”

भैयाजी ने कहा, “मैं सोचता हूँ।”

बड़े भतीजे ने कहा, “मान लो, चीन ने हमला करके निगम कर कब्जा कर लिया तो?”

भैयाजी ने कहा, “मुझे सोचने दो।”

तभी भाई ने कहा, “मान लो, संगठन कांग्रेस का शासन हो गया तो?”

भैयाजी ने कहा, “उसकी चिन्ता मत करो। आखिर मैं भी तो संगठन कांग्रेसी ही हूँ। यह अलग बात है कि इंदिरा गांधी के वोट खींचने की ताकत के कारण इधर हूँ और समाजवाद में विश्वास बतलाता हूँ।”

सारी राष्ट्रीय समस्याएँ सामने आ गईं।

अब वयोवृद्ध देशभक्त आँखें बन्द करके चिन्तन में लग गए।

फिर आँखें खोलीं। आँखों में दैवी ज्योति थी।

भैयाजी ने कहा, “मेरी पवित्र आत्मा से समस्या का समाधान निकल आया। तुममें से हर एक एक-एक पार्टी के सदस्य हो जाओ।”

“मैं कांग्रेस में हूँ और संगठन कांग्रेस में भी।”

“तुम छोटे, जनसंघ के सदस्य हो जाओ।”

फिर बड़े भतीजे से कहा, “तुम समाजवादी पार्टी के सदस्य हो जाओ।”

फिर छोटे भतीजे से कहा, “तुम कम्युनिस्ट हो जाओ।”

सबसे छोटे भाई से कहा, “तुम मार्क्सवादी पार्टी में शामिल हो जाओ। और वह बिगड़ा लौंडा जो है, वह नक्सलवादी हो ही गया है।”

परिवार ने सन्तोष की साँस ली।

भैयाजी खुश थे। कहने लगे, “देखा तुमने? राजनीतिक ज्ञान इसे कहते हैं। अब अपने घर में सब पार्टियाँ हो गईं। किसी का भी नगर निगम हो, चुंगी-चोरी पक्की। हमने सारी पार्टियों को तिजोरी में बन्द कर लिया है।”