धोबिन को नहिं दीन्हीं चदरिया (व्यंग्य) : हरिशंकर परसाई


  Dhobin ko nhi Dinhi Chadriya ~ Harishankar Parsai ke Vyangya

पता नहीं, क्यों भक्तों की चादर मैली होती है! जितना बड़ा भक्त, उतनी ही मैली चादर। शायद कबीरदास की तरह ‘जतन’ से ओढ़कर चदरिया को ‘जस की तस’ धर देते हैं :

दास कबीर जतन से ओढ़ी

धोबिन को नहिं दीन्हीं चदरिया!

अभी जो भक्त किस्म के वयोवृद्ध मेरे पास आए थे, उनकी चादर भी बेहद मैली थी। उनसे मेरा दो-चार बार का परिचय था। अचानक वे आ गए। मुझे अटपटा लगा—ये मेरे पास क्यों आ गए?

मुझे उनके परिचितों ने बताया था कि ये पहले सरकारी नौकरी में थे। ड्‌यूटी पर दुर्घटना में इनको चोट पहुँची। विभाग ने इलाज करवाया और छह हजार रुपया हरजाना दिया। अब ये रिटायर हो गए हैं। लाख रुपये से कम सम्पत्ति नहीं है। जमीन भी है। मकान है। एक किराये पर है। पेंशन भी मिलती है। घर में दो प्राणी हैं—पति-पत्नी। कोई कष्ट नहीं है। भजन-पूजन में लगे रहते हैं। भगवान से लौ लगी है। आदमी तुच्छ हैं। पड़ोस में कोई मर रहा हो तो देखने भी नहीं जाएँगे। बड़े शान्तिमय, निर्मल आदमी हैं, क्योंकि लौ दुनिया से नहीं, परमेश्वर से लगी है।

घर में खाने-पीने का सुभीता हो, जिम्मेदारी न हो, तो सन्त और भक्त होने में सुभीता होता है। अभी साईं बाबा की मृत्यु की वर्षगाँठ पर सात दिनों तक यहाँ समारोह हुआ। दिन-रात चौबीसों घंटे लगातार लाउडस्पीकर पर ऊँचे स्वर पर भजन और ‘जै’ होती रही थी। मोहल्ले के छात्र-छात्राएँ पीड़ित। बीमार लोग मौत का इन्तजार करते थे। दिन-रात कोलाहल। पढ़ें कब? नींद कब आए?

साईं बाबा मानव-कल्याण के आकांक्षी थे। उनकी आत्मा स्वर्ग में बहुत तड़प रही होगी।

हजारों—यानी पचास-साठ हजार तो खर्च हुए ही होंगे। ये आए कहाँ से, पूछना फालतू है। अन्तिम दिन भंडारे में ही तीन हजार लोगों ने भोजन किया होगा। यह सब चन्दे का पैसा। एक भजन बार-बार बजता :

दर्शन दे दे अम्बे मैया

जियरा दर्शन को तड़पे।

मैंने सोचा, इसे ऐसा भी गा सकते हैं :

दर्शन दे दे चन्दा मैया

जियरा खाने को तड़पे।

मैं एक दिन गया, यह देखने कि इस पतित समाज में ऐसे भक्त कौन हो गए हैं। पर मुझे जो कुछ प्रमुख ‘साईं-भक्त’ मिले, वे महान थे। किसी पर गबन का मुकदमा चल रहा है। कोई सस्पेंड अफसर है। किसी की विभागीय जाँच हो रही है। मुनाफाखोर, मिलावटी। आदमी का खून उसके ‘कल्याण’ के लिए चूसने वाले। अफसरों को घूस खिलाने का धन्धा करने वाले। पीले पत्रकार। राजनीति में वनवास भोगने वाले आधुनिक ‘राम’ जो दशरथ की आज्ञा से नहीं, जनता के खदेड़ देने से वनवास भुगत रहे हैं। फिर वे लोग जिनका धन्धा ही है चन्दा उगाहना किसी बहाने से और उसे पेट में डाल लेना।

मैंने सोचा—एक मैं पापी और इतने ये भक्त! मैं भक्तों के सामने से झेंपकर भाग आया।

फिर सोचा—साईं बाबा जीवित होते और ये उनके पास जाते। वे सन्त थे, ज्ञानी थे, अन्तर के रहस्य को, चरित्र को समझ लेते थे। वे इन्हें समझ लेते। ये आशीर्वाद माँगते, तो साईं बाबा कहते, ‘परम पापी, देह के लिए बहुत कर चुके। अब देह-त्याग करो और नर्क के लिए बिस्तर बाँधो। वहाँ रिजर्वेशन मैं करा देता हूँ।’

तो मुझे भक्त से बड़ा डर लगता है। पर ये भक्त घर में आ गए। कबीर की ‘धोबिन को नहिं दीन्हीं चदरिया’ की गन्ध लेकर।

बैठते ही ‘रामधुन’ गाने लगे। फिर कहने लगे, “आप तो स्वयं ज्ञानी हैं। ब्रह्म ही सत्य है। जगत मिथ्या है। माया शत्रु है। किसी को माया के जाल में नहीं फँसाना चाहिए। मैंने माया त्याग दी है। अब बस, प्रभु हैं और मैं हूँ। लोभ, मोह, स्वार्थ—सबसे मुक्त।”

फिर वे ‘हरे राम, हरे कृष्ण’ गाने लगे।

मुझे परेशानी तो हुई, पर अच्छा भी लगा कि एक विरागी भक्त की चरण-रज मेरे घर में पड़ रही है।

मैंने उन्हें भोजन कराया। बड़ी रुचि से उन्होंने इस असार देह में काफी भोजन डाला।

फिर सो गए।

शाम को बात शुरू हुई।

भजन और हरि-स्मरण स्थगित हो गया। बीच-बीच में वे ‘हे राम’ कह लेते थे।

कहने लगे, “ड्‌यूटी पर घायल होने का मुआवजा मुझे सिर्फ छह हजार रुपए दिया गया।”

मैं चौंका—माया सन्त के भीतर से कैसे निकल पड़ी? कहाँ छिपी थी? दिनभर ये माया को कोसते रहे और अब छह हजार के मुआवजे की बात कर रहे हैं! माया सचमुच बड़ी ठगनी होती है।

फिर बोले, “मैंने पन्द्रह हजार का मुकदमा दायर किया था, पर अभी मैं हाई कोर्ट से केस हार गया।”

फिर उन्होंने एक कागज निकाला। बोले, “यह मैंने राष्ट्रपति को पत्र लिखा है। इसे देखिए।”

मैंने पत्र पढ़ा। तमाम अनर्गल बातें थीं। मुख्य बात जो लिखी थी, वह यह थी, ‘मैं ईश्वरभक्त हूँ। मनुष्य मेरे साथ न्याय नहीं कर सकता। मैं पन्द्रह हजार रुपए चाहता था, पर हाई कोर्ट ने मेरी माँग नामंजूर कर दी। जज लोग भी मनुष्य होते हैं। राष्ट्रपति महोदय, मेरा बयान ब्रह्मा, विष्णु, महेश के सामने होगा। अब इसका प्रबन्ध कीजिए।’

मैंने कहा, “जब माया आपने त्याग दी है, तो इतनी माया आप और क्यों चाहते हैं?”

उनका जवाब था, “मैंने माया त्याग दी, पर माया मुझे फँसाए है। वह कहती है—पन्द्रह हजार लो।”

मैंने कहा, “आप खुद माया के फन्दे में पड़ रहे हैं। इसे काट डालो निर्लोभ के चाकू से।”

वे कहने लगे, “कुछ भी हो, मैं राष्ट्रपति से न्याय करवाऊँगा। ब्रह्मा, विष्णु, महेश न्यायाधीश होंगे। तीनों को राष्ट्रपति बुलाएँ। मैं अपना केस उनके सामने ही रखूँगा।”

मैंने कहा, “पृथ्वी और स्वर्ग में डाक-तार सम्बन्ध अभी नहीं है। राष्ट्रपति ब्रह्मा, विष्णु, महेश को ‘सम्मन’ कैसे भेजेंगे? वे देव यहाँ नहीं आ सकते। एक ही रास्ता है।”

वे बोले, “क्या?”

मैंने कहा, “आपको साथ लेकर राष्ट्रपति स्वर्ग जाएँ और ब्रह्मा, विष्णु, महेश के सामने आपका केस रखें।”

वे बोले, “मुझे भी जाना पड़ेगा?”

मैंने कहा, “हाँ। फिर वहाँ से कोई वापस नहीं लौटता। फिर पन्द्रह हजार का ‘क्लेम’ मान भी लिया गया तो ‘पेमेंट’ पृथ्वी पर होगा या वहाँ होगा? पुनर्जन्म अगर होता हो तो कोई कुत्ता, कोई सूअर बना दिया जाता है। कोई ठिकाना है, आप क्या बना दिए जाएँ! तब वे पन्द्रह हजार किस काम के?”

वे कहने लगे, “यानी मुझे भी जाना पड़ेगा?” (घबराहट)

मैंने कहा, “हाँ, वरना बयान कौन देगा? फिर स्वर्ग में सुख-ही-सुख है। आप तो विरागी हैं! वहीं रहिए।”

वे चिन्तित हुए। भजन बन्द हो गए। ‘हरे राम, हरे कृष्ण’ बन्द। कहने लगे, “बात यह है कि इस पृथ्वी पर कुछ साल रहना है। कुछ काम भी करने हैं। देह छोड़ने की इच्छा नहीं है।”

मैंने कहा, “बहुत रह लिये। देह तो पाप की खान है। पाप छूट जाए तो क्या हर्ज है? पर एक बात है।”

उन्होंने पूछा, “क्या?”

मैंने कहा, “राष्ट्रपति आपके साथ ब्रह्मा, विष्णु, महेश के पास नहीं जाएँगे। मैं भी नहीं चाहता। कोई भी नहीं चाहता। आपको अकेले ही जाना होगा। राष्ट्रपति चिट्‌ठी शायद लिख दें।”

वे बोले, “मेरा खयाल था कि मेरी इस चिट्‌ठी से राष्ट्रपति का दिल पिघल जाएगा और वे बाकी नौ हजार मुझे दिलवा देंगे। मेरा आग्रह यह नहीं है कि वे ब्रह्मा, विष्णु, महेश के पास जाएँ। बस, नौ हजार और दिलवा दें।”

मैंने कहा, “इस चिट्‌ठी को राष्ट्रपति का सचिव फाड़कर फेंक देगा और कलेक्टर को सूचित करेगा कि इस आदमी का दिमाग खराब हो गया है। इस पर निगरानी रखी जाए। कहीं कोई अपराध न कर बैठे।”

वे घबराए। कहने लगे, “अरे बाप रे, ऐसा होगा? मेरे पीछे पुलिस पड़ जाएगी?”

मैंने कहा, “ऐसा ही होता है। कानून है।”

भक्ति उतर गई। परमेश्वर उनके अपरिचित हो गए। ब्रह्मा, विष्णु, महेश कोई हैं, यह वे भूल चुके थे।

मेरा खयाल था, ये अध्यात्म में चले गए हैं और इनका दिमाग भी गड़बड़ हो गया है।

पर मेरा अन्दाज गलत था। वे सामान्य ही थे।

उन्होंने कहा, “तो यह पत्र राष्ट्रपति को न भेजूँ?”

मैंने कहा, “कतई नहीं।”

वे बोले, “आप कहते हैं, तो न भेजूँगा। पर आपसे बात करनी है। बहुत प्राइवेट है।”

भजन बन्द। राम, कृष्ण कोई नहीं। ब्रह्मा, विष्णु, महेश को वे भूल चुके थे। नर्क में भी हों तो कोई मतलब नहीं। मैंने कहा, “कमरे में मैं और आप दोनों हैं। जो बात करनी है, बेखटके करें।”

अब उनका ईश्वर कहीं खो गया था। मिल नहीं रहा था। नौ हजार चेतना में ईश्वर की खाली ‘सीट’ पर बैठ गया था।

वे भक्त जरूर रहे, पर चादर में से बदबू कम आने लगी थी।

कहने लगे, “अब तो यह मामला दिल्ली में ही तय होगा। आप दिल्ली जाते ही रहते हैं। कई संसद-सदस्यों से आपके अच्छे सम्बन्ध हैं। सुना है, मंत्रियों से भी आपके सम्बन्ध हैं। आप कोशिश करें तो मामला तय हो सकता है। मुझे बाकी नौ हजार मिल सकते हैं।”

मैंने कहा, “मैं कोशिश करूँगा, जरूर कहूँगा कि आपका नौ हजार, जिसे आप अपना ‘क्लेम’ कहते हैं, आपको मिल जाए।”

वे कहने लगे, “बस, मुझे सिर्फ आपका भरोसा है। इसीलिए मैं आया था। मैं ईश्वर को और आपको—दो को मानता हूँ। आप भी करुणासागर हैं।”

चादर की बदबू और कम हो गई थी।

मैंने कहा, “मगर आपके परम हितैषी ब्रह्मा, विष्णु, महेश कुछ नहीं कर पाएँगे नौ हजार दिलवाने में?”

वे बोले, “उसे छोड़िए। आप ही मेरे ब्रह्मा, विष्णु, महेश हैं। आप ही यह काम करवाइए।”

चन्दन पुँछ गया था।

जो हर क्षण ईश्वर का नाम लेते थे, वे अब एक बार भी ईश्वर की याद नहीं कर रहे थे।

कहने लगे, “बस, मामला मैंने आप पर छोड़ दिया। आपके बड़े-बड़े ‘सोर्स’ हैं। आप यह काम करवा ही देंगे। अब मेरी गाड़ी का समय हो रहा है। मैं चलता हूँ।”

मैंने पूछा, “भोजन?”

वे बोले, “भोजन तो मैं स्वास्थ्य के खयाल से एक ही बार करता हूँ।”

मैंने भानजे से कहा, “इनके लिए स्टेशन तक का रिक्शा करा दो। रिक्शे वाले को किराया तुम ही देना।”

वे बोले, “अरे, आप कैसी बात करते हैं? आप रिक्शे का किराया देंगे?”

मैंने कहा, “हाँ, आप मेरे घर आए। कृपा की। आप मेरे मेहमान हैं। मेरा कर्तव्य है यह।”

रिक्शे में बैठे थे। भानजे से कहा, “बेटा, तुम जरा यहाँ से चले जाओ।”

भानजा चला गया।

तब उन्होंने मेरे कान में कहा, “अगर आपने नौ हजार दिलवा दिये, तो तीन हजार मैं आपको दे दूँगा। वन थर्ड।”

मुझे बिजली का झटका लगा। इनके मन में मेरी क्या छवि है!

भक्ति, सन्तत्व, निर्लोभ, मायाहीनता, विराग, मिथ्या जीवन से हम कहाँ तक आ गए थे!

मैंने उन्हें जवाब नहीं दिया।

रिक्शे वाले से कहा, “तुम्हें किराया मिल गया। गाड़ी का टाइम हो रहा है। फौरन स्टेशन पहुँचाओ।”

मैंने उनकी ‘नमस्कार’ का जवाब भी नहीं दिया। मुझे होश नहीं था। फिर कमरे में बैठकर सोचता रहा कि ये भक्त, सन्त मुझे कैसा समझते हैं?

ये मुझे नहीं, जमाने के चरित्र को समझते हैं।

चदरिया गन्दी ओढ़ते हैं।

जस-की-तस रखना चाहते हैं। जीवन-भर वही चदरिया, उसी ढंग से ओढ़ गए। पर जाते वक्त बदबू काफी कम थी :

दास कबीर जतन से ओढ़ी

धोबिन को नहिं दीन्हीं चदरिया!