अकाल-उत्सव (व्यंग्य) : हरिशंकर परसाई

 


आकाल उत्सव / Aakal Utsav - Harishankar Parsai ke vyangya


दरारों वाली सपाट सूखी भूमि नपुंसक पति की सन्तानेच्छु पत्नी की तरह बेकल नंगी पड़ी है।

अकाल पड़ा है।

पास ही एक गाय अकाल के समाचार वाले अखबार को खाकर पेट भर रही है। कोई सर्वे वाला अफसर छोड़ गया होगा। आदमी इस मामले में गाय-बैल से भी गया-बीता है। गाय तो इस अखबार को भी खा लेती है, मगर आदमी उस अखबार को भी नहीं खा सकता जिसमें छपा है कि अमेरिका से अनाज के जहाज चल चुके हैं। एक बार मैं खा गया था। एक कालम का 6 पंक्तियों का समाचार था। मैंने उसे काटा और पानी के साथ निगल गया। दिन-भर भूख नहीं लगी। आजकल अखबारों में आधे पृष्ठों पर सिर्फ अकाल और भुखमरी के समाचार छपते हैं। अगर अकालग्रस्त आदमी सड़क पर पड़ा अखबार उठाकर उतने पन्ने खा ले, तो महीने-भर भूख नहीं लगे। पर इस देश का आदमी मूर्ख है। अन्न खाना चाहता है। भुखमरी के समाचार नहीं खाना चाहता।

हर साल वसन्त आता है। हर साल मंगलवर्षा आती है। हर साल शारदोत्सव आता है।

हर साल अकाल आता है, जैसे हर साल स्वाधीनता दिवस और गणतंत्र दिवस आते हैं। ये मंगल-उत्सव अपने-आप आते हैं। शरद में कोई चाँद की प्रार्थना नहीं करता कि हे अमृतघट, उत्सव के लिए अमृत बरसा!

मगर अकाल के लिए बड़ी प्रार्थनाएँ, बड़े अनुष्ठान करते हैं। अकाल के लिए इन्द्र-पूजा होती है। पहले इन्द्र-पूजा वर्षा के लिए होती थी। मगर अब अवर्षा के लिए इन्द्र-पूजा होती है। कृष्ण का गोवर्द्धन पर्वत कुछ दिनों में धूल होकर बिखर जाएगा। इन्द्र का कोप अब भीषण वर्षा में नहीं, अवर्षा में प्रकट होता है। गोवर्द्धन को तस्कर यूरोप में बेच आएँगे।

बड़ी प्रार्थना होती है। जमाखोर और मुनाफाखोर साल-भर अनुष्ठान कराते हैं। स्मगलर महाकाल को नरमुंड भेंट करता है। इंजीनियर की पत्नी भजन गाती है—‘प्रभु, कष्ट हरो सबका!’ भगवन, पिछले साल अकाल पड़ा था तब सक्सेना और राठौर को आपने राहतकार्य दिलवा दिया था। प्रभो, इस साल भी इधर अकाल कर दो और ‘इनको’ राहत-कार्य का इंचार्ज बना दो। तहसीलदारिन, नायबिन, ओवरसीअरन सब प्रार्थना करती हैं। सुना है, विधायक—भार्या और मंत्री-प्रिया भी अनुष्ठान कराती हैं। जाँच कमीशन के बावजूद मैं ऐसा पापमय विचार नहीं रखता। इतने अनुष्ठानों के बाद इन्द्रदेव प्रसन्न होते हैं और इलाके की तरफ के नल का कनेक्शन काट देते हैं।

हर साल वसन्त!

हर साल शरद!

हर साल अकाल!

फिर अकाल-उत्सव क्यों न हो जाए? इसे मनाने की एक निश्चित विधि होती है, जैसे दूसरे उत्सवों की होती है। गणतंत्र दिवस पर परेड होती है। अकाल में सस्ते गल्ले की राशन-दुकान पर भी परेड होती है और ज्यादा जोश से होती है। गणतंत्रपरेड कुछ घंटे होती है, अकाल-परेड महीने में हर रोज होती है। राशन-दुकान पर खाली झोला लिये खड़ी फौज में उन फौजियों से ज्यादा जोश होता है।

साल में दस महीने पहलवान ऐलान करता है—इस साल वो रियाज किया है कि कोई अखाड़े में मुकाबले में नहीं उतर सकता। चुनौती देता हूँ—कोई अप्रैल-मई में लड़ ले। मगर पहलवान को अप्रैल में टाइकाइड हो जाता है और वह कहता है, “अब मैं लाचार हूँ। टाइफाइड ने सारी बादाम उतार दी।”

मंत्री लोग ऐसे ही पहलवान हैं—नौ महीने ताल ठोंकते हैं—अन्न का अभाव सामने आने की हिम्मत नहीं कर सकता। इतने लाख क्विंटल का स्टाक होगा। ‘लेव्ही’ ली जाएगी। लड़ ले कोई जमाखोर—पछाड़ दिया जाएगा।

मगर मई आते ही उसे भी टाइफाइड हो जाता है। कहता है—“क्या करूँ? जमाखोरी का ‘टाइफाइड’ सरकार को हो गया। विरोधी तो विरोधी, अपनी पार्टी के लोग भी रोग के कीटाणु लिये हैं। दवा लेने अमेरिका भेजा है आदमी।”

मई में वीर मंत्रियों की भी बादाम उतर जाती है।

इधर मैंने देखा, उलटी ‘लेव्ही’ ली जाने लगी है। एक शहर में भारतीय निगम के गोदाम से गलत नम्बर प्लेट के ट्रक में लदकर एक सौ पचास बोरे गेहूँ जा रहा था कि फाटक पर चौकीदार ने पकड़-लिया। उसने पूछा, “यह ‘लेव्ही’ का गेहूँ कहाँ जा रहा है?” विभाग के आदमी ने कहा, “तुम्हें नया कानून नहीं मालूम? नए कानून के मुताबिक खाद्य निगम खुद लेव्ही देगा। वही लेव्ही है यह, जो जमाखोर को दी जा रही है। नए ऑर्डर पूछ लिया करो।”

मैं एक विधायक से पूछता हूँ, “अकाल की स्थिति कैसी है?”

वह चिन्तित होता है। मैं समझता हूँ, यह अकाल से चिन्तित है। मुझे बड़ा सन्तोष होता है।

वह जवाब देता है, “हाँ, अकाल तो है, पर ज्यादा नहीं है। कोशिश करने से जीता जा सकता है। सिर्फ ग्यारह विधायक हमारी तरफ आ जाएँ, तो हमारी मिनिस्ट्री बन सकती है।”

हर आदमी का अपना अकाल होता है। इनका अकाल दूसरा है। इन्हें सिर्फ ग्यारह क्विंटल विधायक मिल जाएँ, तो अकाल-समस्या हल हो जाए—सत्ता की।

दि न में यह सब सोचता हूँ और रात को मुझे विचित्र सपने आते हैं।

एक रात सपना आया—राष्ट्र ने अकाल-उत्सव मनाना तय कर लिया है। कई क्षेत्रों में हो रहा है। एक क्षेत्र में अकाल-उत्सव मैंने सपने में देखा।

आसपास के चार-पाँच गाँवों के किसान, स्त्रियाँ, बच्चे, इकट्‌ठे थे।

पंडाल सजाया गया था। मंत्री अकाल-समारोह का उद्‌घाटन करने आने वाले थे। पटवारी ने भूखों से चन्दा करके गुलाबों की मालाएँ कस्बे से मँगवा ली थीं।

स्त्रियाँ खाली मंगल-घटों में सूखे नाले के किनारे की घास रखकर कतार में चल रही थीं। वे गा रही थीं :

‘अबके बरस मेघा फिर से न बरसो, मंगल पड़े अकाल रे।’

ओवरसीयर और मेट उनमें से अपने लिए छाँट रहे थे :

“सा’ब, उसे देखो, कैसी मटकती है!”

“अरे, मगर इस सामने वाली को तो देख! दो बार पूरी रोटी खा ले तो परी हो जाए!”

“मगर सा’ब, सुना है, तहसीलदार सा’ब भी तबियत फेंक देते हैं।”

“अरे, तो ‘थ्रू प्रापर चेनल’! सरकारी नियम हम थोड़े ही तोड़ेंगे।”

हड्‌डी-ही-हड्‌डी। पता नहीं, किस गोंद से इन हडि्डयों को जोड़कर आदमी के पुतले बनाकर खड़े कर दिये गए हैं।

यह जीवित रहने की इच्छा की गोंद है। यह हड्‌डी जोड़ देती है। आँतें जोड़ देती है।

सिर मील-भर दूर पड़ा हो तो जुड़ जाता है।

जीने की इच्छा की गोंद बड़ी ताकतवर होती है।

पर सोचता हूँ, ये जीवित क्यों हैं?

ये मरने की इच्छा को खाकर जीवित हैं। ये रोज कहते हैं—इससे तो मौत आ जाए तो अच्छा!

पर मरने की इच्छा को खा जाते हैं। मरने की इच्छा में पोषक तत्त्व होते हैं।

जीने की इच्छा गोंद होती है, जो शरीर जोड़े रखती है।

मरने की इच्छा में पोषक तत्त्व होते हैं।

अकाल-उत्सव शुरू हुआ।

उत्सव में कवि जरूरी होते हैं। वे उत्सव का ‘मूड’ बनाते हैं। वहाँ दो कवि भी थे जो समयानुकूल कविता बना लाए थे।

विधायक ने संक्षिप्त भाषण दिया, “बड़े सौभाग्य का विषय है कि मंत्री महोदय हमारे बीच पधारे हैं। उन्हें कई उत्सवों का निमंत्रण था, पर इस क्षेत्र के अकाल से उन्हें विशेष प्रेम है, इसलिए वे यहीं पधारे। हम उनका स्वागत करते हैं।”

माला पड़ी और तालियाँ पिटीं।

सबसे खूबसूरत तालियाँ पीटीं मंत्रीजी के आसपास बैठे जमाखोर, मुनाफाखोर, चोरबाजारिए और इनके सरकारी मौसेरे भाइयों ने।

तब मंत्रीजी ने भाषण दिया, “मैं आपका आभारी हूँ कि इस अकाल-उत्सव में उद्‌घाटन के लिए आपने मुझे आमंत्रित किया। अकाल भारत की पुरानी परम्परा है। आप जानते हैं कि भगवान राम के राज में भी अकाल पड़ा था। हमारे राज में भी अकाल पड़ता है। हम गांधीजी के आदेश के अनुसार राम-राज ला रहे हैं। अकाल राम-राज का आधार है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम राम-राज का स्वर्ग नहीं ला सकते थे, यदि अकाल न पड़ता। इसलिए अकाल का स्वागत करना चाहिए। अकाल के बिना राम-राज नहीं आ सकता। मेरे विपक्षी मित्र जो भारतीय संस्कृति के पूजक हैं, मुझसे सहमत होंगे कि अकाल हमारी महान भारतीय संस्कृति का एक प्रमुख तत्त्व है। द्रोणाचार्य जैसे वीर तक भूखे मरते थे।

“मेरी इच्छा है, आप खूब खुशी के साथ अकाल-उत्सव मनाएँ। हम घोर संकट में भी प्रसन्न रहते हैं। आप जानते हैं, प्रियजन की मौत के बाद हम श्राद्ध करते हैं तब हाथ पर मलकर शुद्ध घी की परीक्षा करते हैं और उसका लड्‌डू खाते हैं।

“मैं अधिक समय नहीं लूँगा, क्योंकि रेस्ट हाउस में मेरा मुर्गा पक गया होगा। मेरी कामना है कि उत्सव सफल हो।”

वे बैठ गए।

इसके बाद दो कविताएँ हुईं—एक गम्भीर और दूसरी हास्य रस की।

गम्भीर कवि ने पढ़ा :

स्वागत अकाल! स्वागत अकाल!

भारत के गौरव के प्रतीक,

गांधी के सपने के प्रतीक

गोदामों में रखी सुरक्षित

हरित क्रान्ति के प्रिय प्रतीक

मनु भी करते बैठे जुगाल!

स्वागत अकाल! स्वागत अकाल!

फिर हास्य रस की कविता कवि मामा ने पढ़ी :

मामी बोली मामा से देखो

रोटी तो बिल्ली निगल गई

मामा बोले रोटी वापस लेने को

तुम निगलो बिल्ली को तुरन्त!

इसके बाद थोड़ी और औपचारिकता के बाद समारोह समाप्त हुआ क्योंकि रेस्ट हाउस में मुर्गे पककर बाँग देने लगे थे! दूसरे दिन से राहत कार्य शुरू हो गए।

मु झे सपने बहुत आते हैं।

मैं देखता हूँ—भूखे बिलबिला रहे हैं। मजदूरी पूरी नहीं मिलती। मिलती है तो दाना नहीं मिलता। मिलता है तो महँगा मिलता है। महँगा मिलता है, तो उसमें न जाने क्या-क्या कचरा मिला रहता है।

भूखे और अधमरे चिल्लाते हैं—रोटि नहीं तो उत्सव काहे का! उत्सव फेल हो गया।

मु झे एक सपना और आता है। कुछ दूसरी पार्टियों के लोग सेठों, जमाखोरों, सूदखोरों, मुनाफाखोरों को लेकर जाते हैं और लोगों से कहते हैं :

“तुम्हें रोटी नहीं मिलती रोटी नहीं मिलती क्योंकि गल्ला नहीं मिलता। गल्ला क्यों नहीं मिलता, क्योंकि ये लोग जो आए हैं, इनका गल्ला सरकार ने दबा लिया है। जबरदस्ती दबा लिया है।”

“आप लोग बताओ—पीढ़ियों से गल्ला तुम किन्हें बेचते थे?”

लोग बोले, “इन आपके साथ के लोगों को। मगर ये लोग…।”

नेता लोग बोले, “यह ‘मगर’ बन्द करो अब। इस सरकार ने इनका खरीदना बन्द कर दिया है। फिर बताओ—गल्ला तुम किनसे लेते थे?”

लोग बोले, “इन्हीं से, मगर…”

नेता बोले, “पर सरकार ने इनका बेचना भी बन्द कर दिया है।”

लोगों ने कहा, “तो हम लोग क्या करें? किसके ईमान पर भरोसा करें?”

नेता बोले, “अब हमारी बात मानो। इस सरकार का अकाल-उत्सव तुम लोग भुगत चुके। इस सरकार को बदलो। अब हमें वोट दो। हमें विधान सभा और संसद में भेजो। हमारी सरकार बनवाओ। तुम देखोगे कि तुम सब सुखी हो जाओगे। खरीदने वाले खरीदेंगे और बेचने वाले बेचेंगे। यही आदिकाल से चला आ रहा है। यही सनातन धर्म है। हमारे अकाल-उत्सव से तुम्हें कोई शिकायत नहीं होगी।”

लोग बोले, “मगर…”

नेता बोले, “तुम बार-बार ‘मगर’ क्यों बोलते हो? मगरमच्छ बोलो न!”

मु झे फिर सपना आता है। मैं सपनों से परेशान हूँ। वे कितने सुखी हैं, जिन्हें सपने नहीं आते! मुझे लगने लगा है कि वही सुख की गहरी नींद सोता है, जिसे सपने नहीं आते। मेरा पहले खयाल था कि सूअर और कुत्ता ऐसे प्राणी हैं जिन्हें सपने नहीं आते। पर अब अन्न का दाना न मिलने से चूहे को भी सपने आते हैं।

सपने में देखता हूँ कि भूखे लोग तरह-तरह की सरकारें बनाते हैं। अकाल-उत्सव भी मनाते हैं। बड़ा आनन्द है। पर रोटी नहीं मिलती। अन्न नहीं मिलता।

मैं दार्शनिक हो जाता हूँ।

‘अथातो ब्रह्म जिज्ञासा!’ ऋषि शिष्य से ब्रह्म के रूप के बारे में चिन्तन करने को कहता है। जिज्ञासु शिष्य उपवास करके चिन्तन करता है और भूखा ब्रह्मचारी आकर कहता है, “गुरु, अन्नं ब्रह्म। अन्न ही ब्रह्म है, गुरु! अन्न! अन्न! इसके बाद ही ‘आनन्द ब्रह्म’ है।”

इधर हलचल बढ़ रही है।

न जाने कौन इन लोगों को समझाते हैं कि जो सरकार अकाल को उत्सव मानेगी, रोटी नहीं देगी।

मगर लोगों को उत्सव मनाने की आदत पड़ गई है।

उत्सव का रूप चाहे बदले, उत्सव मनाएँगे।

मु झे भयंकर सपना आता है।

देखता हूँ कि अकाल-उत्सव के मूड में ढोलक बजाकर नाचते-गाते भूखे, अधमरे राजधानी में आ गए हैं और बड़ा भयंकारी दृश्य मुझे दिखता है।

एक विधायक पहचान का मिलता है। उसका एक हाथ ही नहीं है। आस्तीन से खून टपक रहा है।

मैं पूछता हूँ, “यह क्या हो गया?”

वह कहता है, “वही अकाल-उत्सव वाले लोग मेरा हाथ खा गए।”

किसी विधायक की टाँग खा ली गई है। किसी मंत्री की नाक चबा ली गई है, किसी का कान!

भीड़ बढ़ती जाती है।

विधायक और मंत्रिगण भाग रहे हैं।

एकाएक सैकड़ों जमाखोरों और मुनाफाखोरों को लोग पकड़ लाते हैं और उन्हें भून रहे हैं। कहते हैं, “तुम्हारी भूख इतनी विकट है कि अपना ही भुना गोश्त खाए बिना तुम्हारा पेट नहीं भरेगा।”

“हमें खाओगे तो भूखे रह जाओगे। हममें खाने लायक कितना कम है।”

अब वे पुलिस और रायफल की राह देख रहे हैं।

सारे विधान भवनों में सन्नाटा!

संसद और उसके अहाते में सन्नाटा!

अब ये भूखे क्या खाएँ? भाग्य-विधाताओं और जीवन के थोक ठेकेदारों की नाक खा गए, कान खा गए, हाथ खा गए, टाँग खा गए। वे सब भाग गए। अब क्या खाएँ?

अब क्या खाएँ? आखिर वे विधान सभा और संसद की इमारतों के पत्थर और ईंटें काट-काटकर खाने लगे।

भयंकर सपना! मेरी नींद टूट गई। मैं पसीने से लथपथ हो जाता हूँ। घबड़ाहट होती है। क्या करूँ? सपना ही तो है—यह सोचकर शान्त होना चाहता हूँ।

म गर चैन नहीं मिलता। मानस चतुश्शती वर्ष है, इसलिए मैं ‘रामचरितमानस’ श्रद्धापूर्वक फिर से पढ़ रहा हूँ। मैं ‘रामचिरतमानस’ उठा लेता हूँ। इससे शान्ति मिलेगी।

यों ही कोई पृष्ठ खोल लेता हूँ।

संयोग से ‘लंका कांड’ निकल पड़ता है।

मैं पढ़ता हूँ। अशोक वाटिका में त्रिजटा सीताजी को धीरज बँधाती है।

त्रिजटा को भी मेरी तरह सपना आया था।

त्रिजटा मुझसे अधिक देखती और थी। उसे बहुत आगे दिखता था। वह कहती है :

यह सपना मैं कहौं विचारी ।

हुइहै सत्य गए दिन चारी ।।