क्लॉड ईथरली (कहानी) : गजानन माधव मुक्तिबोध | Claude Eatherly

 

पीली धूप से चमकती हुई ऊँची भीत जिसके नीले फ्रेम में काँचवाले रोशनदान दूर सड़क से दीखते हैं।

मैं सड़क पार कर लेता हूँ। जंगली, बेमहक लेकिन ख़ूबसूरत विदेशी फूलों के नीचे ठहर-सा जाता हूँ कि जो फूल, भीत के पासवाले अहाते की आदमक़द दीवार के ऊपर फैल, सड़क के बाजू पर बाँहें बिछाकर झुक गए हैं। पता नहीं कैसे, किस साहस से व क्यों, उसी अहाते के पास बिजली का ऊँचा ख भा–जो पाँच-छह दिशाओं में जानेवाली सूनी सड़कों पर तारों की सीधी लकीरें भेज रहा है–मुझे दीखता है और एकाएक ख़याल आता है कि दुमंज़िला मकानों पर चढ़ने की एक ऊँची निसैनी उसी से टिकी हुई है। शायद, ऐसे मकानों की लम्ब-तड़ंग भीतों की रचना अभी भी पुराने ढंग से होती है।

सहज जिज्ञासावश, देखें, कहाँ क्या होता है, दृश्य कौन-से कोण से दिखाई देता है, मैं उस निसैनी पर चढ़ जाता हूँ और सामनेवाली पीली ऊँची भीत के नीली फ़ेमवाले रोशनदान में से मेरी निगाहें पार निकल जाती हैं।

और, मैं स्तब्ध हो उठता हूँ।

छत से टँगे ढिलाई से गोल-गोल घूमते पंखे के नीचे, दो पीली स्फटिक-सी तेज़ आँखें और लम्बी सलवटों-भरा तंग मोतिया चेहरा है जो ठीक उन्हीं ऊँचे रोशनदानों में से, भीतर से बाहर, पार जाने के लिए ही मानो अपनी दृष्टि केन्द्रित कर रहा है। आँखों से आँखें लड़ पड़ती हैं। ध्यान से एक दूसरे की ओर देखती हैं। स्तब्ध, एकाग्र!

आश्चर्य!

साँस के साथ शब्द निकले। ऐसी ही कोई आवाज़ उसने भी की होगी।

चेहरा बुरा नहीं है, अच्छा है, भला आदमी मालूम होता है। पैंट पर शर्ट ढीली पड़ गई है। लेकिन यह क्या!

मैं नीचे उतर पड़ता हूँ। चुपचाप रास्ता चलने लगता हूँ। कम-से-कम दो फ़र्लांग दूरी पर एक आदमी मिलता है। सिर्फ़ एक आदमी! इतनी बड़ी सड़क होने पर भी लोग नहीं! क्यों नहीं?

पूछने पर वह शख़्स कहता है, ‘शहर तो इस पार है, उस ओर है; वहीं कहीं इस सड़क पर बिल्डिंग का पिछवाड़ा पड़ता है। देखते नहीं हो!’

मैंने उसका चेहरा देखा ध्यान से। बाईं और दाहिनी भौंहें नाक के शुरू पर मिल गई थीं। खुरदुरा चेहरा, पंजाबी कहला सकता था। पूरा जिस्म लचकदार था। वह नि:सन्देह जनाना आदमी होने की सम्भावना रखता है! नारीतुल्य पुरुष, जिनका विकास किशोर काल में ही रुक जाता है। यह विशेषज्ञों का विषय है।

इतने में, मैंने उससे स्वाभाविक रूप से, अति सहज बनकर पूछा, ‘यह पीली बिल्डिंग कौन-सी है।’

उसने मुझ पर अविश्वास करते हुए कहा, ‘जानते नहीं हो? यह पागलख़ाना है–प्रसिद्ध पागलख़ाना!’ ‘अच्छा–!’ का एक लहरदार डैश लगाकर मैं चुप हो गया और नीची निगाह किए आगे चलने लगा।

और फिर हम दोनों के बीच दूरियाँ चौड़ी होकर गोल होने लगीं। हमारे साथ हमारे सिफ़र भी चलने लगे।

अपने-अपने शून्यों की खिड़कियाँ खोलकर मैंने–हम दोनों ने–एक दूसरे की तरफ़ देखा कि आपस में बात कर सकते हैं या नहीं। कि इतने में उसने मुझसे पूछा, ‘आप क्या काम करते हैं?’

मैंने झेंपकर कहा, ‘मैं? उठाईगीरा समझिए।’

‘समझें क्यों? जो हैं सो बताइए!’

‘पता नहीं क्यों, मैं बहुत ईमानदारी की ज़िन्दगी जीता हूँ; झूठ नहीं बोला करता, परस्त्री को नहीं देखता; रिश्वत नहीं लेता; भ्रष्टाचारी नहीं हूँ; दया या फ़रेब नहीं करता; अलबत्ता क़र्ज़ मुझ पर ज़रूर है जो मैं चुका नहीं पाता। फिर भी कमाई की एक रक़म क़र्ज़ में ही जाती है। इस पर भी मैं यह सोचता हूँ कि बुनियादी तौर से बेईमान हूँ। इसीलिए, मैंने अपने को पुलिस की ज़बान में उठाईगीरा कहा। मैं लेखक हूँ, अब बताइए आप क्या हैं?’

वह सिर्फ़ हँस दिया। कहा कुछ नहीं। ज़रा देर से उसका मुँह खुला। उसने कहा, ‘मैं सी. आई. डी. हूँ।’

एकदम दबकर मैंने उससे शेकहैंड किया। (दिल में भीतर से किसी ने कचोट लिया। हाल ही में निसैनी पर चढ़कर मैंने उस रोशनदान में से एक आदमी की सूरत देखी थी; वह चोरी नहीं तो क्या थी। सन्दिग्धावस्था में उस साले ने मुझे देख लिया!)

‘बड़ी अच्छी बात है। मुझे भी इस धन्धेे में दिलचस्पी है, हम लेखकों का पेशा इससे कुछ मिलता-जुलता है।’

इतने में भीमाकार पत्थरों की विक्टोरियन बिल्डिंगों के दृश्य दूर से झलकने लगे थे। हम खड़े हो गए। एक बड़े से पेड़ के नीचे पान की दुकान थी, वहाँ एक सिलेटी रंग की औरत मिस्सी और काज़ल लगाए बैठी हुई थी।

मेरे मुँह से अचानक निकल पड़ा, ‘तो यहाँ भी पान की दुकान है!

उसने सिर्फ़ इतना ही कहा, ‘हाँ, यहाँ भी।’

और मैं उन अध-नंगी विलायती औरतों की तसवीरें देखने लगा जो उस दुकान की शौकत को बढ़ा रही थीं।

दुकान में आईना लगा था। लहरें थीं धुँधली, पीछे के मसाले के दोष से। ज्यों ही उसमें मैं अपना मुँह देखता, बिगड़ा नज़र आता। कभी लम्बा, तो कभी चौड़ा। कभी नाक एकदम छोटी, तो कभी एकदम लम्बी और मोटी! मन में बड़ी वितृष्णा भर उठी। रास्ता लम्बा था, सूनी दुपहर। कपड़े पसीने से भीतर चिपचिपा रहे थे। ऐसे मौक़े पर दो बातें करनेवाला आदमी मिल जाना समय और रास्ता कटने का साधन होता है।

हम दोनों ने अपने-अपने और एक-दूसरे के चेहरे देखे। दोनों ख़राब नज़र आए। दोनों रूप बदलने लगे! दोनों हँस पड़े और यही मज़ाक़ चलता रहा।

उससे वह औरत भी छेड़छाड़ करती रही। इतने में चार-पाँच आदमी और आ गए–उसी तरह बेमानी, गरम और उकतानेवाले, जैसे टीन की तपती हुई चद्दर या लोहे के डंडे। वे सब घेरे खड़े रहे। चुपचाप उन सबमें कुछ बातें होती रहीं। मुझे बिलकुल मज़ा नहीं आया। उनकी आवाज़ें सिर पर से निकल जाती थीं।

मैंने ग़ौर नहीं किया। मैं इन सब बातों से दूर रहता हूँ। जो सुनाई दिया उससे यह ज़ाहिर हुआ कि वे या तो निचले तबके में पुलिस के इनफ़ॉर्मर्स हैं या ऐसे ही कुछ!

पान खाकर हम लोग आगे बढ़े। पता नहीं क्यों मुझे अपने अजनबी साथी के ज़नानेपन में कोई ईश्वरीय अर्थ दिखाई दिया। जो आदमी आत्मा की आवाज़ दाब देता है, विवेक-चेतना को अटाले में डाल देता है, उसे क्या कहा जाए! वैसे, वह शख़्स भला मालूम होता था। फिर, क्या कारण है कि उसने यह पेशा इख़्तियार किया! साहस? हाँ, कुछ साहसिक लोग पत्रकार या गुप्तचर या ऐसे ही कुछ हो जाते हैं, अपनी आँखों में महत्त्वपूर्ण बनने के लिए, अस्तित्व की तीखी संवेदनाएँ अनुभव करने और करते रहने के लिए।

लेकिन, प्रश्न यह है कि वे वैसा क्यों करते हैं! किसी भीतरी न्यूनता के भाव पर विजय प्राप्त करने का यह एक तरीक़ा भी हो सकता है। फिर भी, उसके दूसरे रास्ते भी हो सकते हैं! यही पेशा क्यों? इसलिए, उसमें पेट और प्रवृत्ति का समन्वय है! जो हो, इस शख़्स का ज़नानापन ख़ास मानी रखता है!

हमने वह रास्ता पार कर लिया और अब हम फिर से फ़ैशनेबल रास्ते पर आ गए, जिसके दोनों ओर युकलिप्टस के पेड़ क़तार बाँधे खड़े थे। मैंने पूछा, ‘यह रास्ता कहाँ जाता है?’ उसने कहा, ‘पागलख़ाने की ओर।’ मैं जाने क्यों सन्नाटे में आ गया।

विषय बदलने के लिए मैंने कहा, ‘तुम यह धन्धा कब से कर रहे हो?’

उसने मेरी तरफ़ इस तरह देखा मानो यह सवाल उसे नागवार गुज़रा हो। मैं कुछ नहीं बोला। चुपचाप चला, चलता रहा। लगभग पाँच मिनट बाद जब हम उस भैरों के गेरुए, सुनहली पन्नी-जड़े पत्थर तक पहुँच गए, जो इस अत्याधुनिक मुहल्ले में एक तार के खम्भे के पास श्रद्धापूर्वक स्थापित किया गया था, उसने कहा, ‘मेरा क़िस्सा मुख्तसर यों है। लाज-शरम दिखावे की चीज़ें हैं। तुम मेरे दोस्त हो, इसलिए कह रहा हूँ, मैं एक बहुत बड़े करोड़पति सेठ का लड़का हूँ। उनके घर में जो काम करनेवालियाँ हुआ करती थीं, उनमें से एक मेरी माँ है, जो अभी भी वहीं है। मैं घर से दूर पाला-पोसा गया, मेरे पिता के ख़र्चे से। माँ मिलने आती। उसी के कहने से मैंने बमुश्किल तमाम मैट्रिक किया। फिर, किसी सिफारिश से सी.आई. डी. की ट्रेनिंग में चला गया। तब से यही काम कर रहा हूँ। बाद में पता चला कि वहाँ का ख़र्च भी वही सेठ देता रहा। उसका हाथ मुझ पर अभी तक है। तुम उठाईगीरे हो, इसलिए कहा! अरे! वैसे तो तुम लेखक-वेखक भी हो। बहुत-से लेखक और पत्रकार इनफ़ॉर्मर हैं! तो, इसलिए, मैंने सोचा, चलो अच्छा हुआ। एक साथी मिल गया।’

उस आदमी में मेरी दिलचस्पी बहुत बढ़ गई। डर भी लगा। घृणा भी हुई। किस आदमी से पाला पड़ा। फिर भी, उस अहाते पर चढ़कर मैं झाँक चुका था। इसलिए, एक अनदिखती जंजीर से बँध तो गया ही था।

उस जनाने ने कहना जारी रखा, ‘उस पागलख़ाने में कई ऐसे लोग डाल दिए गए हैं जो सचमुच आज की निगाह से बड़े पागल हैं। लेकिन उन्हें पागल कहने की इच्छा रखने के लिए आज की निगाह होना ज़रूरी है।’

मैंने उकताते हुए कहा, ‘आज की निगाह से क्या मतलब?’

उसने भौंहें समेट लीं। मेरी आँखों में आँखें डालकर उसने कहना शुरू किया, ‘जो आदमी आत्मा की आवाज़ कभी-कभी सुन लिया करता है और उसे बयान करके उससे छुट्टी पा लेता है, वह लेखक हो जाता है। आत्मा की आवाज़ जो लगातार सुनता है, और कहता कुछ नहीं है, वह भोला-भाला सीधा-सादा बेवक़ूफ है। जो उसकी आवाज़ बहुत ज़्यादा सुना करता है और वैसा करने लगता है, वह समाज-विरोधी तत्त्वों में यों ही शामिल हो जाया करता है। लेकिन जो आदमी आत्मा की आवाज़ ज़रूरत से ज़्यादा सुन करके हमेशा बेचैन रहा करता है और उस बेचैनी में भीतर के हुक्म का पालन करता है, वह निहायत पागल है। पुराने ज़माने में सन्त हो सकता था। आजकल उसे पागलख़ाने में डाल दिया जाता है।’

मुझे शक हुआ कि मैं किसी फ़ैंटेसी में रह रहा हूँ। यह कोई ऐसा-वैसा गुप्तचर नहीं है। या तो यह ख़ुद पागल है या कोई पहुँचा हुआ आदमी! लेकिन, वह पागल भी नहीं है, न वह पहुँचा हुआ है। वह तो सिर्फ़ जनाना आदमी है या, वैज्ञानिक शब्दावली प्रयोग करूँ तो, यह कहना होगा कि वह है तो जवानपट्ठा, लेकिन उसमें जो लचक है वह औरत के चलने की याद दिलाती है।

मैंने उससे पूछा, ‘तुमने कहीं ट्रेनिंग पाई है?’

‘सिर्फ़ तजुर्बे से सीखा है। मुझे इनाम भी मिला है।’

मैंने कहा, ‘अच्छा!’

और मैं जिज्ञासा और कुतूहल से प्रेरित होकर उसकी अन्धकारपूर्ण थाहों में डूबने का प्रयत्न करने लगा।

किन्तु उसने सिर्फ़ मुसकरा दिया! तब मुझे वह ऐसा लगा मानो वह अज्ञात साइंस के गणितिक सूत्र की अंक-राशि हो जिसका मतलब तो कुछ ज़रूर होता है लेकिन समझ में नहीं आता।

मन में विचारों की पंक्तियाँ-पंक्तियाँ बनती गईं। पंक्तियों पर पंक्तियाँ! शायद उसे भी महसूस हुआ होगा! और जब दोनों के मन में चार-चार पंक्तियाँ बन गईं कि इस बीच उसने कहा, ‘तुम क्यों नहीं यह धन्धा करते?’

मैं हतप्रभ हो गया। यह एक विलक्षण विचार था! मुझे मालूम था कि धन्धा पैसों के लिए किया जाता है। आजकल बड़े-बड़े शहरों के मामूली होटलों में जहाँ दस-पाँच आदमी तरह-तरह की गप लड़ाते हुए बैठते हैं, उनकी बातें सुनकर, अपना अन्दाज़ ज़माने के लिए, कई भीतरी सूची-भेद्य-तम-प्रवेशक आँखें भी सुनती बैठी रहती हैं। यह मैं सब जानता हूँ। ख़ुद के तजुर्बे से बता सकता हूँ। लेकिन, फिर भी, उस आदमी की हि मत तो देखिए कि उसने कैसा पेचीदा सवाल किया!

आज तक किसी आदमी ने मुझसे इस तरह का सवाल न किया था। ज़रूर मुझमें ऐसा कुछ है कि जिसे मैं विशेष योग्यता कह सकता हूँ। मैंने अपने जीवन में जो शिक्षा और अशिक्षा प्राप्त की, स्कूलों-कॉलेजों में जो विद्या और अविद्या उपलब्ध की, जो कौशल और अकौशल प्राप्त किया, उसने मुझे–मैं मानूँ या न मानूँ–भद्र वर्ग का ही अंग बना दिया है। हाँ, मैं उस भद्र वर्ग का अंग हूँ कि जिसे अपनी भद्रता के निर्वाह के लिए अब आर्थिक कष्ट का सामना करना पड़ता है, और यह भाव मन में जमा रहता है कि नाश सन्निकट है। संक्षेप में, मैं सचेत व्यक्ति हूँ, अतिशिक्षित हूँ, अतिसंस्कृत हूँ। लेकिन चूँकि अपनी इस अतिशिक्षा और अतिसंस्कृति के सौष्ठव को उद्घाटित करते रहने के लिए, जो स्निग्ध-प्रसन्न मुख चाहिए, वह न होने से मैं उठाईगिरा भी लगता हूँ–अपने-आपको!

तो मेरी इस महक को पहचान उस अद्भुत व्यक्ति ने मेरे सामने जो प्रस्ताव रखा उससे मैं अपने-आपसे एकदम सचेत हो उठा! क्या हर्ज़ है? इनकम का एक ख़ासा ज़रिया यह भी तो हो सकता है।

मैंने बात पलटकर उससे पूछा, ‘तो हाँ, तुम उस पागलख़ाने की बात कह रहे थे। उसका क्या?’

मैंने गदरन नीचे डाल ली। कानों में अविराम शब्द-प्रवाह गतिमान हुआ है। मैं सुनता गया। शायद; वह उसके वक्तव्य की भूमिका रही होगी। इस बीच मैंने उससे टोककर पूछा, ‘तो उसका नाम क्या है?’

‘क्लॉड ईथरली!’

‘क्या वह रोमन कैथलिक है–आदिवासी ईसाई है?’

उसने नाराज़ होकर कहा, ‘तो अब तक तुम मेरी बात ही नहीं सुन रहे थे?’

मैंने उसे विश्वास दिलाया कि उसकी एक-एक बात दिल में उतर रही थी। फिर भी उसके चेहरे के भाव से पता चला कि उसे मेरी बात पर यकीन नहीं हुआ। उसने कहा, ‘क्लॉड ईथरली वह अमरीकी विमान चालक है, जिसने हिरोशिमा पर बम गिराया था।’

मुझे आश्चर्य का एक धक्का लगा। या तो वह पागल है, या मैं! मैंने उससे पूछा ‘तो इससे क्या होता है?’

अब उसने बहुत ही नाराज़ होकर कहा, ‘अबे बेवकूफ़! नेस्तानाबूद हुए हिरोशिमा की बदरंग और बदसूरत, उदास और ग़मगीन ज़िन्दगी की सदारत करनेवाले मेयर को वह हर माह चैक भेजता रहा जिससे कि उन पैसों से दीनहीनों को सहायता तो पहुँचे ही, उसने जो भयानक पाप किया है वह भी कुछ कम हो!’

मैंने उसके चेहरे का अध्ययन करना शुरू किया। उसकी वे खुरदुरी घनी मोटी भौंहें नाक के पास आ मिलती थीं। कड़े बालों की तेज़ रेजर से हजामत किया हुआ उसका वह हरा-गोरा चेहरा, सीधी-मोटी नाक और मज़ाक़िया होंठ और ग़मगीन आँखें, जिस्म की ज़नाना लचक, डबल ठुड्डी, जिसके बीच में हल्का-सा गड्ढा।

यह कौन शख़्स है, जो मुझसे इस तरह बात कर रहा है? लगा कि मैं सचमुच इस दुनिया में नहीं रह रहा हूँ, उससे कोई दो सौ मील ऊपर आ गया हूँ जहाँ आकाश, चाँद-तारे, सूरज सभी दिखाई देते हैं। रॉकेट उड़ रहे हैं। आते हैं, जाते हैं, और पृथ्वी एक चौड़े नीले गोल जगत-सी दिखाई दे रही है, जहाँ हम किसी एक देश के नहीं हैं, सभी देशों के हैं। मन में एक भयानक उद्वेगपूर्ण भारहीन चंचलता है। कुल मिलाकर, पल-भर यही हालत रही। लेकिन वह पल बहुत ही घनघोर था। भयावह और सन्दिग्ध! और उसी पल से अभिभूत होकर मैंने उससे पूछा, ‘तो क्या हिरोशिमा वाला क्लॉड ईथरली इस पागलख़ाने में है?’

मेरा हाथ फैलकर उँगलियों से उस पीली बिल्डिंग की ओर इशारा कर रहा था जिसके अहाते की दीवार पर चढ़कर मेरी आँखों ने रोशनदान पार करके उन तेज़ आँखों को देखा था जो उसी रोशनदान में से गुज़रकर बाहर जाना चाहती हैं। तो, अगर मैं इस ज़नाने लचकदार शख़्स पर यक़ीन करूँ तो इसका मतलब यह हुआ कि मेरी देखी वे आँखें और किसी की नहीं, ख़ास क्लॉड ईथरली की ही थीं। लेकिन यह कैसे हो सकता है?

उसने मेरी बात ताड़कर कहा, ‘हाँ, वह क्लॉड ईथरली ही था।’

मैंने चिढ़कर कहा, ‘तो क्या यह हिन्दुस्तान नहीं है? हम अमरीका में ही रह रहे हैं?’

उसने मानो मेरी बेवकूफ़ी पर हँसी का ठहाका मारा, कहा, ‘भारत के हर बड़े नगर में एक-एक अमरीका है। तुमने लाल ओंठवाली चमकदार, गोरी-सुनहली औरतें नहीं देखीं, उनके कीमती कपड़े नहीं देखे? शानदार मोटरों में घूमनेवाले अतिशिक्षित लोग नहीं देखे? नफ़ीस किस्म की वेश्यावृत्ति नहीं देखी? सेमिनार नहीं देखे? एक ज़माने में हम लन्दन जाते थे और इंग्लैंड-रिटंर्ड कहलाते थे। और आज वाशिंगटन जाते हैं। अगर हमारा बस चले और आज हम सचमुच उतने ही धनी हों और हमारे पास उतने ही एटम बम और हाइड्रोजन बम हों और रॉकेट हों तो फिर क्या पूछना! अख़बार पढ़ते हो कि नहीं?’

मैंने कहा, ‘हाँ।’

‘तो तुमने मैकमिलन की वह तक़रीर भी पढ़ी होगी जो उसने...को दी थी। उसने क्या कहा था? यह देश, हमारे सैनिक गुट में तो नहीं है, किन्तु संस्कृति और आत्मा से हमारे साथ है। क्या मैकमिलन सफ़ेद झूठ कह रहा था? कतई नहीं। वह एक महत्त्वपूर्ण तथ्य पर प्रकाश डाल रहा था।

‘और अगर यह सच है तो यह भी सही है कि उनकी संस्कृति और आत्मा का संकट हमारी संस्कृति और आत्मा का संकट है। यही कारण है कि आजकल के लेखक और कवि अमरीकी, ब्रिटिश तथा पश्चिम यूरोपीय साहित्य तथा विचारधाराओं में गोते लगाते हैं और वहाँ से अपनी आत्मा को शिक्षा और संस्कृति प्रदान करते हैं! क्या यह झूठ है? बोलो कि झूठ है? और हमारे तथाकथित राष्ट्रीय अख़बार और प्रकाशन–केन्द्र! वे अपनी विचारधारा और दृष्टिकोण कहाँ से लेते हैं?’

यह कहकर वह ज़ोर से हँस पड़ा और हँसी की लहरों में उसका जिस्म लचकने लगा।

उसने कहना ज़ारी रखा, ‘क्या हमने इंडोनेशियाई या चीनी या अफ्रीकी साहित्य से प्रेरणा ली है या लुमुम्बा के काव्य से? छि: छि:! वह जानवरों का, चौपायों का, साहित्य है! और रूस का! अरे यह तो स्वार्थ की बात है! इसका राज और ही है। रूस से हम मदद चाहते हैं, लेकिन डरते भी हैं।

‘छोड़ो! तो मतलब यह है कि अगर उनकी संस्कृति हमारी संस्कृति है, उनकी आत्मा हमारी आत्मा और उनका संकट हमारा संकट है–जैसा कि सिद्ध है कि है–ज़रा पढ़ो अख़बार, करो बातचीत अँगरेज़ीदाँ फ़र्राटेबाज लोगों से–तो हमारे यहाँ भी हिरोशिमा पर बम गिरानेवाला विमानचालक क्यों नहीं हो सकता और हमारे यहाँ भी साम्राज्यवादी, युद्धवादी लोग क्यों नहीं हो सकते! मुख्तसर क़िस्सा यह है कि हिन्दुस्तान भी अमरीका ही है।’

मुझे पसीना छूटने लगा। फिर भी, मन यह स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था कि भारत अमरीका ही है, और यह कि क्लॉड ईथरली उसी पागलख़ाने में रहते हैं–मेरी आँखों में सन्देह, अविश्वास, भय और आशंका की मिली-जुली चमक ज़रूर रही होगी, जिसको देखकर वह बुरी तरह हँस पड़ा। और उसने मुझे एक सिगरेट दी।

एक पेड़ के नीचे खड़े होकर हम दोनों बात करते हुए नीचे एक पत्थर पर बैठ गए। उसने कहा, ‘देखा नहीं! ब्रिटिश-अमरीकी या फ्रांसीसी कविता में जो मूड्स, जो मन:स्थितियाँ रहती हैं–बस वे ही हमारे यहाँ भी हैं, लाई जाती हैं। सुरुचि और आधुनिक भावबोध का तक़ाजा है कि उन्हें लाया जाए। क्यों? इसलिए कि वहाँ औद्योगिक सभ्यता है, हमारे यहाँ भी। मानो कि कल-कारख़ाने खोले जाने से आदर्श और कर्तव्य बदल जाते हों।’

मैंने नाराज़ होकर सिगरेट फेंक दी। उसके सामने हो लिया। शायद, उस समय मैं उसे मारना चाहता था। हाथापाई करना चाहता था। लेकिन, वह व्यंग्यभरे चेहरे से हँस पड़ा और उसकी आँखें ज़्यादा ग़मगीन हो गईं।

उसने कहा, ‘क्लॉड ईथरली एक विमान-चालक था! उसके एटम बम से हिरोशिमा नष्ट हुआ। वह अपनी कारगुज़ारी देखने उस शहर गया। उस भयानक बदरंग, बदसूरत कटी लोथों के शहर को देखकर उसका दिल टुकड़े-टुकड़े हो गया। उसको पता नहीं था कि उसके पास ऐसा हथियार है और उस हथियार का यह अंजाम होगा। उसके दिल में निरपराध जनों के प्रेतों, शवों, लोथों, लाशों के कटे-पिटे चेहरे तैरने लगे। उसके हृदय में करुणा उमड़ आई। उधर, अमरीकी सरकार ने उसे इनाम दिया। वह ‘वार हीरो’ हो गया। लेकिन उसकी आत्मा कहती थी कि उसने पाप किया, जघन्य पाप किया है। उसे दंड मिलना ही चाहिए। नहीं! लेकिन, उसका देश तो उसे हीरो मानता था। अब क्या किया जाए! उसने सरकारी नौकरी छोड़ दी। मामूली काम किया। लेकिन, फिर भी वह ‘वार हीरो’ था, महान था, क्लॉड ईथरली महानता नहीं, दंड चाहता था, दंड!

‘उसने वारदातें शुरू कीं जिससे कि वह गिरफ़्तार हो सके और जेल में डाला जा सके। किन्तु प्रमाण के अभाव में वह हर बार छोड़ दिया गया। उसने घोषित किया कि वह पापी है, पापी है, उस दंड मिलना चाहिए, उसने निरपराध जनों की हत्या की है, उसे दंड दो। हे ईश्वर! लेकिन, अमरीकी व्यवस्था उसे पाप नहीं, महान कार्य मानती थी। देश-भक्ति मानती थी। जब उसने ईथरली की ये हरकतें देखीं तो उसे पागलख़ाने में डाल दिया। टेक्सॉस प्रान्त में वाको नाम की एक जगह है–वहाँ उसका दिमाग़ दुरुस्त नहीं हो सका।

‘चार साल बाद वह वहाँ से छूटा तो उसे रॉय एल, मैनटूथ नाम का एक गुंडा मिला। उसकी मदद से उसने डाकघरों पर धावा मारा। आख़िर मय-साथी के वह पकड़ लिया गया। मुक़दमा चला। कोई फ़ायदा नहीं। जब यह मालूम हुआ कि वह कौन है और क्या चाहता है तो उसे तुरन्त छोड़ दिया गया। उसके बाद, उसने डैल्लास नाम की एक जगह के कैशियर पर सशस्त्र आक्रमण किया। परिणाम कुछ नहीं निकला, क्योंकि बड़े सैनिक अधिकारियों को यह महसूस हुआ कि ऐसे ‘प्रख्यात युद्ध वीर’ को मामूली उचक्का और चोर कहकर उसकी बदनामी न हो। इसलिए, उसके उस प्राप्त पद की रक्षा करने के लिए, उसे फिर से पागलख़ाने में डाल दिया गया।

‘यह है क्लॉड ईथरली! ईथरली की ईमानदारी पर अविश्वास करने की किसी को शंका ही नहीं रही! उसकी जीवन-कथा की फ़िल्म बनाने का अधिकार ख़रीदने के लिए एक कम्पनी ने उसे एक लाख रुपए देने का प्रस्ताव रखा। उसने क़तई इनकार कर दिया। उसके इस अस्वीकार से सबके सामने यह ज़ाहिर हो गया कि वह झूठा और फ़रेबी नहीं है। वह बन नहीं रहा है।

‘कौन नहीं जानता कि क्लॉड ईथरली अणुयुद्ध का विरोध करनेवाली आत्मा की आवाज़ का दूसरा नाम है। हाँ! ईथरली मानसिक रोगी नहीं है। आध्यात्मिक अशान्ति का, आध्यात्मिक उद्विग्नता का ज्वलन्त प्रतीक है। क्या इससे तुम इनकार करते हो?’

उसके हाथ की सिगरेट कभी की नीचे गिर चुकी थी। वह ज़नाना आदमी तमतमा उठा था। चेहरे पर बेचैनी की मलिनता छाई थी।

वह कहता गया, ‘इस आध्यात्मिक अशान्ति, इस आध्यात्मिक उद्विग्नता को समझनेवाले लोग कितने हैं? उन्हें विचित्र, विलक्षण; विक्षिप्त कहकर पागलख़ाने में डालने की इच्छा रखनेवाले लोग न जाने कितने हैं! इसीलिए पुराने ज़माने में हमारे बहुतेरे विद्रोही सन्तों को भी पागल कहा गया। आज भी बहुतों को पागल कहा जाता है। अगर वह बहुत तुच्छ हुए तो सिर्फ़ उनकी उपेक्षा की जाती है, जिससे कि उनकी बात प्रकट न हो और फैल न जाए।

‘हमारे अपने-अपने मन-हृदय-मस्तिष्क में ऐसा ही एक पागलख़ाना है, जहाँ हम उन उच्च, पवित्र और विद्रोही विचारों और भावों को फेंक देते हैं जिससे कि धीरे-धीरे या तो वे ख़ुद बदलकर समझौतावादी पोशाक पहन सभ्य, भद्र हो जाएँ, यानी दुरुस्त हो जाएँ या उसी पागलख़ाने में पड़े रहें!’

मैं हतप्रभ हो ही गया! साथ ही साथ, उसकी इस कहानी पर मुग्ध भी। उस जीवन-कथा से अत्यधिक प्रभावित होकर मैंने पूछा, ‘तो क्या यह कहानी सच्ची है?’

उसने जवाब दिया, ‘भई वाह! अमरीकी साहित्य पढ़ते हो कि नहीं? अमरीकी अख़बार भी नहीं? ब्रिटिश भी नहीं? तो क्या पढ़ते हो ख़ाक!...अरे भाई, उस पर तो अनेक भाषाओं में कई पुस्तकें निकल गई हैं। तो क्या पत्थर जानकारी रखते हो! विश्वास न हो, तो खंडन करो, जाओ टटोलो। और, इस बीच मैं इसी पागलख़ाने की सैर करवा लाता हूँ।’

मैंने हाथ हिलाकर इनकार करते हुए कहा, ‘नहीं, मुझे नहीं जाना।’

‘क्यों नहीं?’ उसने झिड़ककर कहा, ‘आजकल हमारे अवचेतन में हमारी आत्मा आ गई है, चेतन में स्व-हित और अधिचेतन में समाज से सामंजस्य का आदर्श–भले ही वह बुरा समाज क्यों न हो! यही आज के जीवन-विवेक का रहस्य है।...

‘तुमको वहाँ की सैर करनी होगी। मैं तुम्हें पागलख़ाने ले चल रहा हूँ, लेकिन पिछले दरवाज़े से नहीं, खुले अगले से।’

रास्ते में मैंने उससे कहा, ‘मैं यह मानने के लिए तैयार नहीं हूँ कि भारत अमरीका है! तुम कुछ भी कहो! न वह कभी हो ही सकता है, न वह कभी होगा ही।’

इस बात को उसने उड़ा दिया। उसे चाहिए था कि वह इस बात का जवाब देता। उसने सिर्फ़ इतना कहा, ‘मुश्किल यह है कि तुम मेरी बात नहीं समझते।’

मैंने कहा, ‘कैसे?’

‘क्लॉड ईथरली हमारे यहाँ भले ही देह-रूप में न रहे, लेकिन आत्मा की वैसी बेचैनी रखनेवाले लोग तो यहाँ रह ही सकते हैं।’

मैंने अविश्वास प्रकट करके उसके प्रति घृणाभाव व्यक्त करते हुए कहा, ‘यह भी ठीक नहीं मालूम होता।’

उसने कहा, ‘क्यों नहीं! देश के प्रति ईमानदारी रखनेवाले लोगों के मन में, व्यापक पापाचारों के प्रति कोई व्यक्तिगत भावना नहीं रहती क्या?’

‘समझा नहीं।’

‘मतलब यह कि ऐसे बहुतेरे लोग हैं जो पापाचाररूपी, शोषणरूपी डाकुओं को अपनी छाती पर बैठा समझते हैं। वह डाकू न केवल बाहर का व्यक्ति है, वह उनके घर का आदमी भी है। समझने की कोशिश करो!’

मैंने भौंहें उलझाकर कहा, ‘तो क्या हुआ?’

‘यह कि उस व्यापक अन्याय का अनुभव करनेवाले किन्तु उसका विरोध न करनेवाले लोगों के अन्त:करण में व्यक्तिगत पाप-भावना रहती ही है, रहनी चाहिए। ईथरली में और उनमें यह बुनियादी एकता और अभेद है।’

‘इससे यह सिद्ध हुआ कि तुम-सरीखे सचेत जागरूक संवेदनशील जन क्लॉड ईथरली हैं।’

उसने मेरे दिल में ख़ंजर मार दिया। हाँ, यह सच था! बिलकुल सच! अवचेतन के अँधेरे तहखाने में पड़ी हुई आत्मा विद्रोह करती है। समस्त आत्मा पापाचारों के लिए, अपने-आपको ज़िम्मेदार समझती है। हाय रे! यह मेरा भी तो रोग रहा है।

मैंने अपने चेहरे को सख़्त बना लिया। गम्भीर होकर कहा, ‘लेकिन, ये सब बातें तुम मुझसे क्यों कह रहे हो?’

‘इसलिए कि मैं सी. आई. डी. हूँ और मैं तुम्हारी स्क्रीनिंग कर रहा हूँ। मैं चाहता हूँ कि तुम मेरे विभाग से सम्बद्ध रहो। तुम इनकार क्यों करते हो! कहो कि यह तुम्हारी अन्तरात्मा के अनुकूल नहीं है।’

‘तो क्या मुझे टटोलने के लिए तुम ये बातें कर रहे थे? और, तुम्हारी ये सब बातें बनावटी थीं? मेरे दिल का भेद लेने के लिए थीं? बदमाश!’

‘मैं तो सिर्फ़ तुम्हारे अनुकूल प्रसंगों की, जो हो सकती थीं वही (बातें) तो कर रहा था।’

(सम्भावित रचनाकाल 1959 के बाद)