यमराज को शाप (महाभारत की अनसुनी कहानियाँ -15)

 


बहुत पहले, मांडव्य नाम के एक महान ऋषि अपनी कुटिया में रहकर तपस्या करने में व्यस्त थे। उन्होंने कई सालों से मौनव्रत धारण करके रखा था। कुटिया के सामने अपने हाथ सिर के ऊपर उठा कर, एक विशिष्ट स्थिति में कई सालों से तप कर रहे थे।

एक दिन, कुछ चोर भारी सम्पत्ति की चोरी करके, उनके आश्रम के नज़दीक वाले रास्ते से भाग रहे थे। उन चोरों का पीछा राजा के सैनिक कर रहे थे। आश्रम में छुपने की जगह देखकर, वे चोर मांडव्य ऋषि के आश्रम में घुस गए। आश्रम में घुसने पर उन चोरों ने मांडव्य ऋषि को देखा, लेकिन मांडव्य ऋषि अपनी ध्यानसमाधि में मग्न थे। इसलिए, उन्होंने उन चोरों को अपने आश्रम में घुसते वक़्त नहीं देखा।


चोरों को ढूंढ़ते-ढूंढ़ते, राजा के सैनिक भी मांडव्य ऋषि के आश्रम आ गए। आश्रम में एक कुटिया के सामने, सैनिकों को मांडव्य ऋषि तपस्या करते हुए दिखाई दिए। फिर उन सैनिकों ने मांडव्य ऋषि से पूछा, ‘अरे साधु, क्या तुमने यहाँ से चोरों को भागते हुए देखा है?’

सैनिकों की आवाज़ से मांडव्य ऋषि की समाधि टूट गई। अपने मौन-व्रत के कारण, मांडव्य ऋषि ने सैनिकों को जवाब नहीं दिया। मांडव्य ऋषि के चुप्पी से सैनिक परेशान हो गए। उन्होंने फिर से एक बार, मांडव्य ऋषि को चोरों के बारे में पूछा, लेकिन मांडव्य ऋषि ने अपनी चुप्पी बनाकर रखी। मांडव्य ऋषि के जवाब न देने के कारण, सैनिक उनपर ग़ुस्सा हो गए। फिर सैनिकों ने आश्रम में चोरों को खोजना शुरू कर दिया। कुछ समय के बाद, सैनिकों को आश्रम में छुपे हुए चोर मिल गए। चोरों के पास उन्होंने चुराया हुआ धन भी मिल गया। सैनिकों ने सोचा कि मांडव्य ऋषि ने चोरों को ज़रूर देखा होगा, लेकिन इसके बावजूद, उन्होंने चोरों के बारे में सैनिकों को नहीं बताया। इससे सैनिकों को विश्वास हो गया कि मांडव्य ऋषि भी उन चोरों के साथ मिले हुए है।

ऐसा सोचकर, सैनिकों ने चोरों के साथ मांडव्य ऋषि को भी पकड़ लिया और उन्हें अपने साथ राजधानी लेकर आ गए। राजधानी पहुँचने के बाद, चोरों के साथ मांडव्य ऋषि को राजा के सामने पेश कर दिया गया। राजा से सारे गुनहगारों को मृत्युदंड की शिक्षा दे दी।

दुर्भाग्य से, उन गुनहगारों में मांडव्य ऋषि भी शामिल थे। मांडव्य ऋषि ने राजा के दरबार में भी अपना मौन-व्रत नहीं तोड़ा और मौन रहकर, उन्होंने राजा ने दी हुई शिक्षा सून ली।

उसके बाद, सैनिक मांडव्य ऋषि को अन्य चोरों के साथ मृत्युदंड देने के लिए ले गए। मृत्युदंड की शिक्षा नुकीले भालों को शरीर में भोंक कर दी जाने वाली थी। सैनिकों ने चोरों को और मांडव्य ऋषि को रस्सी से एक-एक स्तंभ को बांध दिया। फिर, सैनिकों ने पहले चोरों के शरीरों को अपने भालों से छेदकर उनको मृत्यूदंड दे दिया। सबसे आख़िर में, मांडव्य ऋषि को सज़ा देने की बारी आ गई।

सैनिकों ने उस महान ऋषि के शरीर में भी अपना भाला भोंक दिया। लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह देखकर सारे सैनिक चकित हो गए। मांडव्य ऋषि के शरीर में भाला जाते ही उनके शरीर से ख़ून बहने लगा, लेकिन उस महान ऋषि के मुख पर सैनिकों को क्लेश का कोई भी चिह्न नहीं दिखा।

सैनिकों ने सोचा की कुछ समय के बाद, इस साधु को मृत्यु निश्चित रूप से हो जाएगी। ऐसा सोचकर, सैनिकों ने राह देखना शुरू किया। ऐसे समय बितता चला गया और शाम हो गई, लेकिन तपस्या के बल के कारण मांडव्य ऋषि की मृत्यु नहीं हुई। शाम होने पर, सैनिकों ने सोचा की शायद दूसरे दिन तक साधु की मृत्यु हो जाए। ऐसा सोचकर, सैनिक उस स्थान से निकल गए।

उस रात, मांडव्य ऋषि ने दूसरे ऋषियों को अपने साथ मिलने के लिए बुलाया। तो बाकी ऋषि-मुनि पंछियों के रूप में मांडव्य ऋषि से मिलने के लिए आ गए। मांडव्य ऋषि की दयनीय हालत देखकर, दूसरे ऋषि-मुनियों का ह्रदय दुख से आक्रांत हो गया। उन्होंने मांडव्य ऋषि से पूछा हे, ‘हे ऋषिवर, आप तो अनेक सालों से तपस्या में लगे हुए थे, फिर भी नियति ने आपको ऐसा दंड क्यों दे दिया?’

तब मांडव्य ऋषि ने उनसे कहा, ‘लगता है कि मैंने भूतकाल में निश्चित रूप से कोई गंभीर पापकर्म किया हुआ है। उसी पाप के कारण मेरे तप के बावजूद, मुझे इतनी भयानक सजा मिल रही है।’ मांडव्य ऋषि का उत्तर सुनकर, बाक़ी ऋषि-मुनियों ने उनके स्वस्थ होने की कामना की और फिर वह वहाँ से चले गए।

दूसरे दिन, राजा के सैनिक मांडव्य ऋषि की हालत देखने के लिए उनसे मिलने चलने गए। सैनिकों को विश्वास था कि एक दिन के बाद, मांडव्य ऋषि जीवित नहीं बच पाएँगे।

लेकिन जैसे ही सैनिक उस जगह पर आ गए, सारे सैनिक चकित हो गए, क्योंकि मांडव्य ऋषि अभी तक जीवित थे। फिर सारे सैनिक राजा के पास चले गए और राजा को घटित घटना के बारे में बताया। सैनिकों की बातें सुनकर, राजा समझ गया कि जिस साधु को उसने मृत्युदंड दिया था, वह साधु जरूर कोई महान तपस्वी होगा।

अपनी भूल का एहसास होने के बाद, राजा ने अपने मंत्रियों के साथ बातचीत की और फिर सब लोग मिलकर, मांडव्य ऋषि के पास चले गए। मांडव्य ऋषि अभी भी स्तम्भ से बंधे हुए थे और उनके शरीर में भाला अभी भी घुसा हुआ था। जैसे ही राजा ने मांडव्य ऋषि को देखा, वह उनके चरणों में गिर पड़ा और उनसे क्षमा की भीख माँगने लगा। राजा ने मांडव्य ऋषि कहा, ‘हे तपस्वी, मैंने आपको चोर समझकर, चोरी के लिए आपको दंडित किया। मैंने यह बहुत बड़ा पाप किया है। इस महान अपराध के लिए मैं आपसे क्षमा याचना करता हूँ।’

सच्चे दिल से किया हुआ राजा का पछतावा देखकर, मांडव्य ऋषि ने उसको क्षमा कर दी। उसके बाद, राजा ने मांडव्य ऋषि के शरीर में गड़ा हुआ भाला निकालने की कोशिश की। खूब कोशिश करने के बावजूद, राजा उस भाले को मांडव्य ऋषि के शरीर से नहीं निकाल पाया। इस चीज को देखकर, राजा आश्चर्यचकित हो गया। राजा ने भाले का जो हिस्सा मांडव्य ऋषि के शरीर के बाहर था, उसको काट दिया। इस प्रकार, मांडव्य ऋषि के शरीर में उस भाले का एक टुकड़ा सदा के लिए अटक कर रह गया। इसके बाद, मांडव्य ऋषि उस राज्य से निकल कर अपनी कुटिया में वापस आ गए और उन्होंने अपनी तपस्या जारी रखीं।

मांडव्य ऋषि अपनी तपस्या करते हुए सोचते रहे कि किस पापकर्म के फलस्वरूप उनको इतनी बड़ी शिक्षा मिली। इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिए, एक दिन वे अपनी तपस्या का उपयोग करके यमराज के दरबार में जा पहुँचे। वहाँ पर उन्होंने देखा कि मृत्यु के देवता, यमराज, अपने सिंहासन पर विराजमान थे। जैसे ही मांडव्य ऋषि यमराज के समक्ष जा पहुँचे, वैसे उन्होंने यमराज से प्रश्न किया, ‘हे यमराज, मैंने ऐसा क्या दुर्गम पाप किया था, जिस के कारण, मुझे राजा ने दी हुई इतनी कठोर सजा झेलनी पड़ी?’

मांडव्य ऋषि का प्रश्न सुनकर, यमराज ने मांडव्य ऋषि को उत्तर दिया। यमराज ने कहा, ‘हे ऋषिवर, कुछ साल पहले, आप ने एक छोटे से कीड़े के शरीर में घास का एक नुकिला पत्ता भोंक दिया था। इस कारण, आप के शरीर को भी भाले से भोंका गया।’

यमराज का उत्तर सुनकर, मांडव्य ऋषि चकित हो गए। उन्होंने यमराज से पूछा, ‘मैंने किस उम्र में यह अपराध किया था?’ यमराज ने तब कहा, ‘जब आप एक छोटे बालक थे, तब आपने यह कर्म किया था।’

यमराज का उत्तर सुनने के बाद, मांडव्य ऋषि यमराज पर कोपित हो गए। उन्होंने यमराज से कहा, ‘हे यमराज, आपने जो सजा मुझे दी है, वह मेरे पापकर्म से कई गुना अधिक है। एक ब्राह्मण को मृत्यु के घाट उतारना, यह सब पापों में एक महान पाप माना जाता है। इसके बावजूद, आपने मुझे मृत्यूदंड दिलवाया। इसके अलावा, जब मैंने वह कर्म किया था, तो उस समय मैं केवल एक बालक था। बालकों को पुण्य और पाप की समझ नहीं होती। मेरे बाल्यकाल में किए गए अनुचित कर्म का तुमने इतना बड़ा दंड देकर मुझपर घोर अन्याय कर दिया है। इसलिए, मैं तुम्हें शाप देता हूँ कि तुम एक शूद्र के वर्ण में पृथ्वी पर जन्म लोगे। इसके अलावा, मैं दुनिया के लिए एक सूचना भी देना चाहता हूँ। चौदा साल से कम उम्र के बालक से जो भी पापकर्म होगा, उसे माफ कर देना चाहिए।’ इस प्रकार, मांडव्य ऋषि के शाप के कारण यमराज को पृथ्वी पर शूद्र के रूप में जन्म लेना पड़ा।

यमराज ने विदुर के रूप में पृथ्वी पर जन्म लिया। अपनी उच्च सोच और सूझबूझ के लिए विदुर ने समस्त विश्व में प्रसिद्धी हासिल की।