विपात्र (लघु उपन्यास) : गजानन माधव मुक्तिबोध

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लम्बे-लम्बे पत्तोंवाली घनी-घनी बड़ी इलायची की झाड़ी के पास जब हम खड़े हो गए तो पीछे से हँसी का ठहाका सुनाई दिया। हमने परवाह नहीं की, यद्यपि उस हँसी में एक हलका उपहास भी था। हम बड़ी इलायची के सफ़ेद पीले, कुछ लम्बे पंखुरियोंवाले फूलों को मुग्ध होकर देखते रहे। मैंने एक पँखुरी तोड़ी और मुँह में डाल ली। उसमें बड़ी इलायची का स्वाद था। मैं खुश हो गया। बड़ी इलायची की झाड़ी की पाँत में हींग की घनी हरी-भरी झाड़ी भी थी और उसके आगे, उसी पाँत में पारिजात खिल रहा था। मेरा साथी बड़ी ही गम्भीरता से प्रत्येक पेड़ के बॉटेनिकल नाम समझाता जा रहा था। लेकिन मेरा दिमाग़ अपनी मस्ती में कहीं और भटक रहा था। सभी तरफ़ हरियाला अँधेरा और हरियाला, उजाला छाया हुआ था और बीच-बीच में सुनहली चादरें बिछी हुई थीं। अजीब लहरें मेरे मन में दौड़ रही थीं। मैं अपने साथी को पीछे छोड़ते हुए, एक क्यारी पार कर, कटहल के बड़े पेड़ की छाया के नीचे आ गया और मुग्ध भाव से उसके उभरे रेशेवाले पत्तों पर हाथ फेरने लगा। उधर, कुछ लोग, सीधे-सीधे ऊँचे-उठे बूढ़े छरहरे बादाम के पेड़ के नीचे गिरे हुए कच्चे बादामों को हाथ से उठा-उठाकर टटोलते जा रहे थे। मैंने उनकी ओर देखा और मुँह फेर लिया। जेब में से दियासलाई निकालकर बीड़ी सुलगाई और उनके बारे में सोचने ही वाला था कि इतने में दूर से एक मोटे सज्जन आते दिखाई दिए। उनके हाथ में फूलों के कई गुच्छे थे। वे विलायती फूल थे, अलग डिजाइनों के, अलग रूप-रंग के, जो गुज़राती स्त्रियों की सादा किन्तु साफ़-सफ़ेद साड़ियों की किनारियों की याद दिलाते थे। जाने क्यों मुझे लगा कि वे फूल उनके हाथों में शोभा नहीं देते, क्योंकि वे हाथ उन फूलों के योग्य नहीं हैं। मैंने अपनी परीक्षा करनी चाही। आख़िर मैं उनके बारे में ऐसा क्यों सोचता हूँ? एक ख़याल तैर आया कि वे सज्जन किसी दूसरे की, किसी दूसरे, अपने ‘बड़े’ की हूबहू नक़ल कर रहे हैं; उन्होंने अपने जाने-अनजाने किसी बड़े आदमी के रास्ते पर चलना मंजूर किया है। उनके हाथ में फूल इसलिए नहीं कि उन्हें वे प्यारे हैं, बल्कि इसलिए कि उनका ‘आराध्य व्यक्ति’ बाग़वानी का शौक़ीन है और दूर अहाते के पास कहीं वह ख़ुद भी फूलों को डंठलों-सहित चुन रहा है। वे सज्जन मेरे पास आ जाते हैं। मुझे फूलों का एक गुच्छा देते हैं, कहते हैं, ‘कितना ख़ूबसूरत है!’ मैं उनके चेहरे की तरफ़ देखता रह जाता हूँ। तानपूरे पर गानेवाले किसी शास्त्रीय नौजवान संगीतकार की मुझे याद आ जाती है। हाँ, वैसा ही उसका रियाज़ है। लेकिन, काहे का? ‘आराध्य’ की उपासना का! अपने ख़याल पर मैं मुसकरा उठता हूँ, और उनके कन्धे पर हाथ रखकर कहता हूँ, ‘यार, इन फूलों में मज़ा नहीं आता। एक कप चाय पिलाओ।’ चाय की बात सुनकर वे ठठाकर हँस पड़ते हैं। बहुत सरगरमी से, और प्यार भरकर, अपने सफ़ेद झक कुरते में से एक रुपए का नोट निकालकर मुझे दे देते हैं, ‘जाइए, सिंग साहब के साथ पी आइए!’ मैं खुशी से उछल पड़ता हूँ। वे आगे बढ़ जाते हैं। मैं पीछे से चिल्लाकर कहता हूँ, ‘राव साहब की जय हो!’ मैं सोचता था, मेरी आवाज़ बग़ीचे में दूर-दूर तक जाएगी। लेकिन लोग अपने में डूबे हुए थे। सिर्फ़ सिंह साहब हींग की झाड़ी से एक पत्ता मुझे लाकर दे रहा था। मैंन कहा, ‘सिंग साहब, तुम्हारा हेमिंग्वे मर गया।’ जगत सिंह स्तब्ध हो गया। वह कुछ नहीं कह सका। उसने सिर्फ़ इतना ही पूछा, ‘कहाँ पढ़ा? कब मरा?’ मैंने उसे हेमिंग्वे की मृत्यु की पूरी परिस्थिति समझाई। समझाते-समझाते मुझे भी दु:ख होने लगा। मैंने कहा, ‘जान-बूझकर उसने किया ऐसा।’ जगत सिंह ने, जिसे हम सिंग साहब कहते थे, पूछा, ‘बन्दूक़ उसने ख़ुद अपने-आप पर चला ली?’ मैंने कहा, ‘नहीं, वह चल गई और फट पड़ी। मृत्यु आकस्मिक हुई।’ जगत सिंह ने कहा, ‘अजीब बात है!’ मैं आगे चलने लगा। मेरे मुँह से बात झरने लगी! ‘हेमिंग्वे कई दिनों से चुप और उदास था। सम्भव है अपनी ‘आत्महत्या’ के बारे में सोचता रहा हो, यद्यपि उसकी मृत्यु हुई आकस्मिक कारणों से ही।’ मेरे सामने एक लेखक-कलाकार की संवेदनाओं के, उसके जीवन के, स्वकल्पित चित्र तैरते जा रहे थे। इतने में मैंने देखा कि बग़ीचे के अहाते के पश्चिमी छोर पर खड़े हुए टूटे फ़व्वारे के पासवाली क्यारी के पास से राव साहब गुज़र रहे हैं। उनकी श्वेत धोती शरद् के आतप में झलमला रही है...कि इतने में वहाँ से घबराई हुई लेकिन संयमित आवाज़ आती है, ‘साँप-साँप!’ मैं और जगत सिंह ठिठक जाते हैं। मुझे लगता है कि जैसे अपशकुन हुआ हो। सब लोग एक उत्तेजना में उधर निकल पड़ते हैं। आम में पेड़ों के जमघट में खड़े एक बूढ़े युक्लिप्टस के पेड़ की ओट, हाथ-भर का मोटा साँप लहराता हुआ भागा जा रहा था। मैं स्तब्ध-मुग्ध रह गया। क्या मस्त, लहराती हुई चाल थी! बिलकुल काला, लेकिन साँवली-पीली डिज़ाइनों वाला! नौजवान माली हाथ में डंडा लेकर खड़ा था। उस पर वार नहीं कर रहा था। सबने कहा, ‘मारो, मारो।’ लेकिन वह अड़ा रहा। ‘मैं नहीं मारूँगा साहब। यह यहाँ का देवता है। रखवाली करता है।’ इतने में हमारे बीच खड़े हुए एक नौजवान ने उसके हाथ से डंडा छीन लिया। लेकिन तब तक साँप झाड़ियों में ग़ायब हो चुका था। एक विफलता और प्रतिक्रियाहीनता का भाव हम सबमें छा गया। साँप के क़िस्से चलने लगे। वह करेट था या कोबरा! वह पनियल था या अजगर! हमारे यहाँ का जुओलॉजिस्ट ज़्यादा नहीं जानता था। लेकिन हमारे डायरेक्टर साहब लगातार बताते जा रहे थे। आश्चर्य की बात है कि साँप सरदी के मौसम में निकला, ज़्यादातर वे बरसात और गरमी के मौसम में निकलते हैं। मैं और जगत सिंह उस भीड़ से हट गए और क्यारियों के बीच बनी हुई पगडंडियों पर चलने लगे। मैंने जगत सिंह से कहा, ‘लोग बातों में लगे हैं। जल्दी निकल चलो। नहीं तो वे जाने नहीं देंगे।’ हमको मालूम नहीं था कि हमारे पीछे ज़रा दूरी पर राव साहब चल रहे हैं। उन्होंने वहीं से कहा, ‘हाँ...हाँ, जल्दी निकल जाओ। नहीं तो, लोग अटका देंगे।’ वे हँस पड़े। उनकी हँसी में भी हमने हलके-से व्यंग्य की गूँज सुनी। अब वे हमारे बराबर-बराबर आए और कहने लगे, ‘साँप के बारे में तो सब लोग बात कर रहे हैं। कोई मुझे नहीं पूछता कि आख़िर मैंने उसे कैसे देखा, वह कैसे निकला, कैसे भागा।’ यह कहकर वे अपने पर ही हँसने लगे। मैंने कहा, ‘शायद माली ने उसे पहले-पहल देखा था। क्या यह सच है कि नाग यहाँ की रखवाली करता है?’ ‘कहते हैं कि इस बग़ीचे में कहीं धन गड़ा हुआ है और आज के मालिक के परदादे की आत्मा नाग बनकर उस धन की रखवाली करने यहाँ घूमा करती है। इसलिए, माली ने उसे मारा नहीं।’ जगत ने कहा, ‘अजीब अन्धविश्वास है!’ इस बीच हम गुलाब की फूलों-लदी बेल से छाए हुए कुंजद्वार से निकलकर लुकाट के पेड़ के पास आ गए। उधर, अमरक का घना पेड़ खड़ा हुआ था। बग़ीचा सचमुच महक रहा था। फूलों से लदा था। बहार में आया था। एक आम के नीचे डायरेक्टर साहब के आस-पास बहुत से लोग खड़े हुए थे, जिनके सिर पर आम की डालियाँ छाया कर रही थीं। सब ओर रोमैंटिक वातावरण छाया हुआ था। मैंने अपने-आपसे कहा, ‘क्या फूल-पेड़ महक रहे हैं! बग़ीचा लहक उठा है।’... ‘कुत्ते मारकर डाले हैं पेड़ों की जड़ों में।’ यह राव साहब थे। मैं विस्मित हो उठा। जगत स्तब्ध हो गया। मेरे मुँह से सिर्फ़ इतना फूटा, ‘ऐसा!’ लेकिन जगत ने कहा, ‘नाग को छोड़ देते हो और कुत्तों को मार डालते हो!’ राव साहब ने हँसते हुए कहा, ‘कुत्ते जनता हैं। नाग तो देवता हैं, अधिकारी हैं!’ कहकर राव साहब ने मुझे देखा। लेकिन, मेरा मुँह पीला पड़ चुका था। असल में उस आशय के वे मेरे शब्द थे, जिसका प्रयोग किसी दिन मैंने किया था। उसका सन्दर्भ जगत नहीं समझ सका। मैं तेज़ी से क़दम बढ़ाकर फ़ाटक की ओर जाने लगा। मैंने जगत से कहा, ‘एक बार मुझे बॉस पर गुस्सा आ गया था। शायद तुम भी तो थे उस वक़्त! जब दरबार बरख़ास्त हुआ तब बॉस की आलोचना करते हुए मैंने कहा कि ये लोग जनता को कुत्ता समझते हैं! राव साहब मेरे उसी वाक्य की ओर इशारा कर रहे थे।’ जगत मेरे दु:ख को समझ नहीं सका। लेकिन मेरे रुख़ को और बॉस के रुख़ को, बहुत-से मामलों में जैसा कि दिखाई दिया करता था, खूब समझता था। उसने सिर्फ़ यही कहा, ‘राव साहब से बचकर रहना, कहीं तुम्हें गड्ढे में न गिरा दें।’ <!--nextpage> [2] जगत के मन में राव साहब के सम्बन्ध में जो गुत्थी थी उसे मैं खूब समझता था। दोनों आदमी दुनिया के दो सिरों पर खड़े होकर एक-दूसरे को टोकते नज़र आ रहे थे। दोनों एक-दूसरे को अगर बुरा नहीं तो सिरफिरा ज़रूर समझते थे। अगर मन-ही-मन दी जानेवाली गालियों की छानबीन की जाए तो पता चलेगा कि राव साहब जगत को आधा पागल या दिमाग़ी फ़ितूर रखनेवाला ख़ब्ती ज़रूर समझते थे। इसके एवज़ में जगत राव साहब को कुंजी रट-रटकर एम.ए. पास करनेवाला कोई गँवार मिडिलची मानता था। राव साहब जगत के हेंमिंग्वे, फ़ॉकनर और फ़र्राटेदार अँगरेज़ी को अच्छी नज़रों से नहीं देखते थे और उधर जगत राव साहब की ग भीरता, अनुशासनप्रियता, श्रम करने की अपूर्व शक्ति और धैर्य के सामने पराजित हो गया था। राव साहब जब देखते कि विभिन्न नगरों से हर माह आनेवाले पुस्तकों के बंडल उठाते वक़्त जगत का चेहरा बाग़-बाग़ हो रहा है, तो वे ख़ुद अपने ऑफ़िस की टेबिल से उठकर दो गिलौरियाँ मुँह में डालते हुए इस तरह मुसकरा उठते मानो उन्होंने किसी बेवकूफ़ को कृपापूर्वक क्षमा कर दिया है। तब वे व्यंग्य-स्मित द्वारा अपने हृदय का समाधान कर लिया करते। और जब ‘स्पैन’ या ‘न्यूज़वीक’ के अंक जगत के नाम से आते तो वे केवल इस अप्रिय तथ्य को अपने लिए मूल्यहीन समझ, उन्हें अपने टेबिल की दूसरी ओर फेंक देते। यह नहीं कि उन्हें अमरीका से किसी भी प्रकार की कोई दुश्मनी थी, वरन् यह कि वे इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं थे कि नैस्फ़ील्ड ग्रामर और मेयर ऑफ कैस्टर ब्रिज से आगे भी कोई और चीज़ हो सकती है। ज्ञान, उनके लेखे, अगर मोक्ष का साधन नहीं है, मुक्ति का सोपान नहीं है, तो निस्सन्देह वह किसी भौतिक लक्ष्य की पूर्ति का ही एक साधन होना चाहिए–उसी प्रकार जैसे लकड़ी से कुत्ते को मार भगाया जा सकता है, या सँड़सी से जलती सिगड़ी पर से तवा नीचे उतारा जा सकता है, या कन्सेशन का रेल-टिकिट ख़रीदकर कश्मीर जाया जा सकता है। संक्षेप में, जो व्यक्ति ज्ञान की उपलब्धि का सौभाग्य प्राप्त करके भी यदि अपने जीवन में असफल रहा आया, अर्थात् कीर्ति, प्रतिष्ठा और ऊँचा पद न प्राप्त कर सका तो उस व्यक्ति को सिरफिरा या दिमाग़ी फ़ितूरवाला नहीं तो और क्या कहा जाएगा! अधिक-से-अधिक वह तिरस्करणीय, और कम-से-कम वह दयनीय है–उपेक्षणीय भले ही न हो। राव साहब इस वक़्त जिस सीढ़ी पर हैं उसकी अगली सीढ़ी का नक़्शा बराबर ध्यान में रखते थे। उस अगली सीढ़ी पर चढ़ने की तरक़ीबें भी जानते थे और अपना मुँह हमेशा उसी तरफ़ रखते। वे सिर्फ़ मौज़ूदा ज़रूरत के लायक पढ़ लिया करते। सामाजिक वार्तालाप में पिछड़ जाने के भय पर विजय प्राप्त करने के लिए वे दो-चार अख़बार भी रोज़ देख लिया करते। प्राय: चुप रहते और खूब मेहनत करते। महाकाव्य के धीरोदात्त नायक की भाँति ही धर्म, बुद्धि, कर्तव्यपरायणता और दयाशीलता की सुशिल्पित मूर्ति थे। लेकिन, काम पड़ने पर, अवसर के अनुसार पवित्र नियमों से इधर-उधर हटकर भी अपना मतलब साध ही लेते। इसीलिए, उनके लेखे जगत मूर्ख था। वह खूब पढ़ता। अकेले अँधेरे में पड़ा रहता। बाहर कम निकलता। बाहर की दुनिया में वह अजनबी महसूस करता। मानसिक रूप से वह कैलिफ़ोर्निया या हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटियों के इलाक़ों में घूमता। अमरीकी साहित्य में वह सचमुच रम चुका था, उसी तरह जैसे शक्कर में गुलाब की पंखुरियाँ, जिनसे गुलकंद बनता है। यह कोई ग़लत बात नहीं थी। कार्ल सैंडबर्ग इत्यादि प्रसिद्ध लेखकों के साहित्य ने उसे जीवन-स्वप्न प्रदान किए थे। वह एक भावुक स्वप्नशील व्यक्ति की भाँति उन बातों के अनुसार आचरण और जीवन बनाता जाता था। किन्तु वह यह भूल जाता था कि उन बातों ने जो साहित्य में प्रकट हुई, उनके ‘कर्ताओं’ को कुछ नहीं दिया। जिसने दिया, वह थी ‘उनकी रचना’ न कि उस रचना का सत्य...रचना का यथार्थ! जगत विद्वान् था लेकिन लेखक नहीं था। सिर्फ़ सच्चाई आदमी को कुछ नहीं दे पाती, सच्चाई को सामने लाने के लिए भी ज़ोर और ताक़त की ज़रूरत होती है। ऐसी सच्चाई जो आदमी में ज़ोर पैदा नहीं कर पाती, वह सिर्फ़ जानकारी बनकर रह जाती है। जगत को सच्चाई सिर्फ़ सपना दे जाती थी, और लेखक न होने के कारण तथा कार्यकर्ता न होने के कारण, या क्रियाशक्ति न होने के कारण, वह उन सपनों में डूबकर निस्संग, अन्तर्मुख जीवन व्यतीत करता था। कम-से-कम आज तो जगत की यही हालत थी। यह हो सकता है कि चन्द रोज़ बाद वह सुधर जाए, जिसकी सम्भावना पर किसी के लिए भी सन्देह की गुंजाइश नहीं। के इस एकान्तप्रिय जीवन से हमारे यहाँ कोई खुश नहीं था। लोग समझते कि वह बन रहा है, कि अपने को दूसरों से बड़ा समझने की उसकी आदत है, कि हम सब देहाती हैं और वह ख़ास हॉर्वर्ड या ऑक्सफ़ोर्ड से डॉक्टरेट लेकर यहाँ चला आया है। पहले-पहल लोग उसकी स्वच्छ, अस्खलित अँगरेज़ी भाषा-प्रवाह से दबते और घबराते। कुछ लोग, जैसे राव साहब, अब भी आतंकित रहते। किन्तु बाक़ी के लोग, जो ख़ुद डिग्रीवाले थे, उसकी अँगरेज़ी के कारण उसे या तो तावबाज, या देश-काल स्थिति को ध्यान में न रखकर बात करनेवाला बेवकूफ़ समझते। अगर वह सचमुच अमरीका से ऊँची डिग्री लेकर लौट आता तो, सम्भव है, लोग उसके रोब में रहते; लेकिन वह तो जा ही नहीं पा रहा था। उसके सामने अमरीका जाने की थाली भी परसी गई थी; लेकिन अपने माता-पिता (जो धनी तो थे किन्तु थे बहुत अव्यावहारिक) के कहने से और (उसका दुर्भाग्यपूर्ण ‘विवाह-संस्कार’ भी हो चुका था) अन्य कई झमेलों के आड़े आने से वह नहीं जा सका था। वह ग़रीब नहीं था। ऑक्सफ़ोर्ड या हॉर्वर्ड ख़ुद अपने पैसों से जा सकता था। वह वहाँ जाने और ‘बस जाने’ की इच्छा करता था; किन्तु उस इच्छा की पूर्ति के पूर्व घर के झमेलों से निपटने की कला उसके पास नहीं थी, असल में वह बच्चा था। ज़िन्दगी का उसके पास तजुर्बा नहीं था। दुर्भाग्य की बात यह थी कि रूढ़िवादी घराने में विवाहित होने के झमेलों की एक लम्बी दास्तान ने उसकी ज़िन्दगी का रस निचोड़ लिया था। इस प्रकार अपनी नौजवानी में ही उसके चेहरे पर असफलता की राख और विरक्ति की धूल का लेप लग गया था। किन्तु इसके विपरीत वह मानसिक लीला में डूबा रहता।...वह सैनफ्रांसिस्को के किसी कॉलेज में वाल्ट ह्विटमैन पर भाषण कर रहा है। सारे हॉल में श्रोताओं के झुंड-ही-झुंड दिखाई देते हैं।...उनमें एक संवेदनशील लड़की भी...जो किसी दूसरी या तीसरी बेंच पर बैठी है। वह उसकी ओर खिंच रही है।...भाषण समाप्त। परिचय। वैचारिक आदान-प्रदान, फिर ‘ब्ल्यू मून रेस्तराँ’। दोनों एक-दूसरे की सूरत देखना चाहते हैं, आँखें चुराकर वहाँ वह भारत के सम्बन्ध में पूछती है। वह झेंपते हुए, और बाद में खुलकर, अपना ज्ञान पहले प्रदर्शित और फिर समर्पित करता है।...दोनों का प्रेम हो जाता है, वे विवाहित होते हैं। दोनों अध्यापक हैं...अथवा इनमें से एक कोई पत्रकार है! वे सरल स्वच्छन्द उत्साहपूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं...फिर वह अपनी ‘उस स्त्री’ को भारत लाता है–उसका नाम रख लीजिए इरीना! इरीना और वह, ताज़ी-ताज़ी हवा खाते हुए दिल्ली जाते हैं। वहाँ से ट्रेन पकड़कर अपने घर-नगर।...अहाता, दरवाज़ा, घर, कमरा–साँवला सूनापन! दो आकृतियाँ–माता-पिता! दोनों आगन्तुक आँसू बरसाते हुए उनके पैर छूते हैं...स्वप्न टूट जाता है और जगत के मन में अचानक सवाल पैदा होता है–क्या इरीना भी उसके माता-पिता के पैर छुएगी? राव साहब इन सब बातों को नहीं जानते हैं। अगर जगत अपनी विशाल ज्ञानराशि के द्वारा कोई ठोस बड़ी चीज़ हासिल करता है, जिनसे चारों ओर सम्मान और ऊँची स्थिति तथा धन प्राप्त होता, तो वे नि:सन्देह उसकी सफलता पर श्रद्धांजलि चढ़ाते और पीठपीछे बुराई करते। लेकिन ज़िन्दगी में ऊँची सीढ़ी प्राप्त न करने के कारण, और उससे जुड़े हुए दूसरे कारणों से, मनुष्य को जो एक दुर्दशाग्रस्त स्थिति प्राप्त होती है वह उसकी कमज़ोर नस है। सभ्यता और शील के कारण अपने व्यक्तित्व के झूठे प्रतिबिम्ब गिराते हुए जो लोग उसकी दुर्दशाग्रस्त स्थिति से सहानुभूति प्रदर्शित तो करते हैं किन्तु सही-सही मूल्यांकन न करते हुए, हेय या नीचा समझते हैं–एेसे वे लोग, अपनी इस अवहेलना के भाव को हज़ार यत्न करने पर भी नहीं छिपा सकते, उसके प्रति जिसके माथे पर असफलता की धूल लगी हुई है। मेरे व्यक्तिगत इतिहास का यह एक सबसे विचित्र रहस्य है कि मुझे अपने जीवन में ऐसे ही लोग प्राप्त हुए, जो किसी-न-किसी प्रकार से आहत थे। इन आहतों को पहचानने में मुझे भी तकलीफ़ होती। आहतों का भी अपना एक अहंकार होता है जिसे मैं खूब पहचानता था और अहंकार बहुत आप्लावित और दृढ़ होता है। वह उस आवेग-उच्छल कबन्ध के समान है जो सिर कट जाने के बाद रणक्षेत्र में खून के फ़व्वारे छोड़ते हुए लड़ता रहता है। उसमें मात्र आवेग की ही गति होती है, लेकिन ‘सिर’ न होने के सबब वह शून्य में ही चारों ओर तलवार भाँजता रहता है और अन्तत:...! क्या जगत वैसा ही है? मेरा ख़याल है, वह ऐसा हो भी सकता है; वह ऐसा नहीं भी हो सकता है। दूसरी ओर, राव साहब किसी विश्व-विख्यात, विश्व-पूजित स्तूप के चपटे तल पर, हाँ, किसी प्राचीन गौरव-स्तूप पर, कोई चाय-पार्टी जमा रहे थे, अभिमान सहित शालीनतापूर्वक, नम्रता और गौरव के साथ, लोगों का अभिवादन करते हुए, एक-एक टुकड़ा और सैंडविच खाने का अनुरोध कर रहे थे। उनके गदबदे और पृथुल शरीर के श्यामल मुखमंडल पर प्राचीन गौरव की स मानपूर्ण आभा के साथ ही, स्वयं के प्रति गहरा सन्तोष व्यक्त हो रहा था। मैं इन दोनों को इसी रूप में अपनी आँखों के सामने पाता हूँ। जगत नि:सन्देह बेवकूफ़ था, लेकिन वह इसलिए बेवकूफ़ नहीं था कि उसके पास यूरोपीय साहित्य का ज्ञान था। यह सच है कि न हम, न हमारा शहर, न हमारा प्रान्त, उसके ज्ञान का उपयोग कर पाता था, न उसका मूल्य समझता था। लेकिन, इसमें जगत का स्वयं का दोष नहीं था। यदि वह ऐसा ज्ञान रखता है और उस ज्ञान में रमा रहता है, जिसका हम मूल्य नहीं समझते या जिसे प्राप्त करने की हममें इच्छा नहीं है, तो हमारे लेखे वह ज्ञान, जो निरर्थक है, उससे निर्मित और विकसित व्यक्तित्व को हम आदर प्रदान न भी करें, उपेक्षा ही हमसे बन पाए, लेकिन उस पर दया तो न दिखावें। सच बात तो यह है कि उनके अर्थात् हम नागरिकों के लेखे, जगत की भारी भूल यह थी कि वह उनके समान नहीं था, उनके ढाँचे में जमता नहीं था, और ऐसे ‘निरर्थक ज्ञान’ में व्यर्थ ही डूबा रहता था जिससे फ़िजूल ही वक़्त बरबाद होता है, ऊँचा ओहदा नहीं मिल पाता और, उनके लेखे, ज़िन्दगी अकारथ होकर बरबाद हो जाती है! जगत बेवकूफ़ इसलिए था कि वह ‘कैरियर’ नहीं बना सकता था (थाली में परसे लड्डू को उठाने की भाँति, भले ही वह ऑक्सफ़ोर्ड या हार्वर्ड से डिग्री ले आए), लेकिन उसके बारे में सोचा अवश्य करता था। उसमें सामाजिक क्षेत्र में घुसने और पैठने की शक्ति बिलकुल नहीं थी। उसे विभिन्न प्रकार के, विभिन्न स्वभाव और विभिन्न व्यक्तिगत इतिहास रखनेवाले लोगों का अनुभव नहीं था। वह अभी बच्चा था। उसकी उम्र तेईस-चौबीस साल की थी। उसके दिल और तजुर्बे की खाल अभी मजबूत नहीं थी। वह अब तक, ‘मनुष्यता’ पर सहज विश्वास कर जाता और उसे मालूम भी नहीं हो पाता कि आख़िर लोग उस पर क्यों हँस रहे हैं। जगत में बड़ी-बड़ी ख़ामियाँ थीं जिनमें से एक यह भी थी कि उसके अन्त:करण में, सादा लेकिन नफ़ीस और क़ीमती पोशाक पहननेवाले उन गम्भीर मुद्राओं के प्रोफ़ेसरों और अध्यापकों के प्रति रोब का आकर्षण था, जिनकी कॉलर में उच्चतर ज्ञान के हीरे-मोती टँके हुए थे, जो यूनिवर्सिटी और कॉलेजों की बड़ी बिल्डिंगों के कॉरिडोरों और कमरों में घूमते रहते हैं।...यह बिलकुल सही है कि हमारे यहाँ धन ही वह सुविधा उत्पन्न करता है, जिसके आधार पर लोग ऊँचा ज्ञान प्राप्त करते हैं और बड़ी सफ़ाई के साथ ‘ऊँची बातचीत’ करते हैं। लेकिन ज्ञान के आलोक को धन के आलोक में मिला करके, और फिर ज्ञान की उद्दीप्त मनोमूर्ति खड़ी करके, देखने में अपनी बौनी परिस्थितियों और उन परिस्थितियों में घूमनेवाले लोगों से अजीब फ़ासले पैदा हो जाते हैं। जगत अपने बचपन में ईसाई कॉनवेंट स्कूलों में पढ़ा था। इसीलिए उसकी अँगरेज़ी बड़ी सरल और स्वाभाविक हो गई थी। उसने ईसाइयत के उत्तमोत्तम नैतिक गुणों को आत्मसात् करना चाहा था और और साथ ही उन्हें अपनी निज की भारतीय संस्कृति से मिला लिया था। ‘सर्मन ऑफ़ द माउंट’ से लेकर ‘पृथ्वी सूक्त’ तक में वह रस लेता था। जगत बेवकूफ़ इसलिए भी था कि अमरीकी जनता की महान् उपलब्धियों को अमरीकी सरकार और उसकी विशेष नीति से मिलाकर देखता था। परिणामत:, जब डलेस कोई ग़लती करता, या आइज़नहॉवर कुछ गड़बड़ कर जाता तो उसे अपार दु:ख होता। उसके पास कोई राजनीतिक दृष्टिकोण नहीं था और उस अभाव के रिक्त स्थान पर अमरीका और यूरोप तथा भारत के भयानक दक्षिणपंथी राजनीतिज्ञ उसके हृदय में आसन जमाए बैठे थे। यहाँ तक कि बम्बई में अमरीका के भारतीय दोस्तों ने जितना काम किया वह काम आधे दिल से किया होगा। वह सा यवाद से और रूस-चीन से भयानक दुश्मनी रखता था और वह इस सम्भावना से भी डरता रहता था कि कहीं ऐसा न हो कि अमरीका से पहले रूस चाँद पर पहुँच जाए! हमारे बॉस जगत के इस राजनीतिक रुख़ से बहुत खुश थे। लेकिन, वे जनता से डरते थे। क्योंकि अमरीकापरस्ती, जनता में, न केवल लोकप्रिय नहीं थी, वरन् सामने का पानवाला और उसके आस-पासवाले गन्दे और बौने होटल में बैठे हुए मैले-कुचैले लोग भी अमरीका को गाली देते थे। अमरीका पर किसी का विश्वास नहीं था। इस भावना को जगत भी जानता था। इसलिए उड़ते-उड़ते ही वह मुझसे राजनीतिक बातचीत करता। और उस बातचीत के दौरान, भारतीय अख़बारों में प्रकाशित समाचारों का एक ढाँचा बनाते हुए लेकिन कोई आलोचना न करते हुए, मैं उसकी बात का खंडन कर देता था–किसी विरोधी तथ्य पर उसका ध्यान खींच लाता। यही कारण थे कि क्रमश: उसकी ज्ञान-ग्राही बुद्धि मेरी अवहेलना न कर सकी, और मेरी ओर खिंचती चली गई। इसका श्रेय मैं अवश्य लूँगा कि मैंने उसे किसी भी देश के शासक और जनता–इन दो के बीच की एकता और मित्रता पहचानने की युक्तियाँ बताईं। इसमें एक निश्चित ख़तरा भी था कि मैं और वह आपस में टकरा जाते। व्यक्तित्वों की टकराहट बहुत बुरी होती है; जहर पचने से फैलता है, कीचड़ उछालने से। उछालनेवाले के और झेलनेवाले के दोनों के चेहरे बदसूरत हो जाते हैं। मैं हमेशा दो प्रकार के परस्पर-विरोधों में भेद करता आया हूँ। एक वे जो सही हैं–जहाँ वे तेज़ होते रहने चाहिए; और एक वे जो ग़लत हैं–जहाँ वे होने ही नहीं चाहिए। जैसे राजनीति में वैसे ही मानव-सम्बन्धों के क्षेत्र में भी, हमें सही विरोधों को, उनके सही-सही अनुपात में, सही-सही जगह, और सही-सही ढंग से, ज़रूर बनाए रखना चाहिए–यहाँ तक कि तेज़ करना चाहिए। वहाँ झुकने की ज़रूरत नहीं है। लेकिन, कुछ ऐसे परस्पर विरोध होते हैं जो हमारी नासमझी, कम-समझी अथवा क्षुद्र अहंमूलक स्वार्थ से उत्पन्न होते हैं। मानव-सम्बन्ध उलझ इसीलिए जाते हैं कि हम ग़लत जगह झगड़ा कर लेते हैं और ग़लत जगह झुक जाते हैं। अगर कोई दूसरा शहर होता तो शायद जगत की और मेरी, यदि परिचय होता तो भी, पट नहीं सकती थी; जम नहीं सकती थी। लेकिन, परिस्थिति दोनों को एक साथ ले आई। मैं लोगों में उठता-बैठता। उनसे फ़िजूल टकराने की कोशिश न करता और सारे समाज में रहकर भी एक अत्यन्त तीव्र निस्संगता और अजनबी महसूस करता। लगभग दो वर्षों के क्रमश: बढ़ते हुए प्रारम्भिक परिचय के अनन्तर मैंने जगत की आपेक्षिक निकटता प्राप्त की। और ज्यों ही हमने एक-दूसरे से सामीप्य अनुभव किया और हम साथ रहने लगे, लोगों की नज़रों में भी आ गए और अखरने लगे, इस तरह कि मानो हममें से कोई-न-कोई व्यक्ति आपत्तिजनक हो और दूसरे को अपनी सोहबत से बिगाड़ रहा हो। एक बात साफ़ है कि हमें उस महफ़िल में मज़ा नहीं आता था, जिसमें विविध प्रकार के भोजनीय पदार्थों से लेकर कैंसर और ल्यूकीमिया तक, तथा भूतों से लेकर क यूनिस्टों तक की चर्चाएँ होतीं। ये महफ़िलें, जो शाम के पाँच बजे से लेकर रात के बारह-एक तक चलती रहतीं, उस अभाव का परिणाम थीं जिसे अकेलापन कहते हैं। हम जो यहाँ बीस थे, वे, चाहे परिवार में ही क्यों न रहें, अपने को अकेला, किसी शाखा से कटा हुआ और अधूरा महसूस करते थे और अपने अकेलेपन की वेदना से भागने के लिए, वक़्त काटने की एक तरक़ीब के तौर पर, सामूहिक भोजन, सामूहिक पार्टी, गपबाजी, महफ़िलबाजी का आसरा लिया करते। लोग भले ही उसका मज़ा लिया करें, मैं ऐसी बेढंगी, बे-जोड़ और बे-मेल सोसाइटी में फँसकर बड़ी घुटन महसूस करता। वही हाल जगत का भी था। फ़र्क़ यही था कि मुझे इस तरह अकेलेपन से भागने और वक़्त काटने की इच्छा नहीं रहती थी, न जगत को ही रहती थी। इसलिए, हम लोग ‘अनसोशल’ कहलाते। क्लब की ज़िन्दगी अगर सामाजिकता का लक्षण है तो मैं ऐसी सामाजिकता से बाज आया। लोगों को ताज्जुब होता कि आख़िर हम अपना वक़्त कैसे काटते हैं। और, जब उन्होंने यह देखा कि ब्रिज, साँपों और भूतों की चर्चा, एक-दूसरे की टाँग खींचने की होड़ और राजनीतिक गप की बजाय हम घूमने के लिए निकल जाते हैं, और कभी हेमिंग्वे या डिकेन्स अथवा एड्ना विंसेन्ट मिले की चर्चा करते हैं, तो उन्होंने अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की। एक बार जब हम तरह-तरह की चर्चाओं में विलीन रात को आठ बजे घर लौटने की बजाय साढ़े नौ बजे के क़रीब लौटे तो एक ने कहा, ‘क्यों भई! जानते नहीं, भले आदमी रात में नहीं घूमा करते।’ और, हम ताज़्जुब करने लगे कि आख़िर ये ऊँची डिग्रियोंवाले लोग जिन्होंने बड़ी उपाधियाँ प्राप्त की हैं, इतने जड़ और मूर्ख क्यों हैं। और, हम ताज़्जुब करने लगे कि आख़िर ये ऊँची डिग्रियोंवाले लोग जिन्होंने बड़ी उपाधियाँ प्राप्त की हैं, इतने जड़ और मूर्ख क्यों हैं। <!--nextpage> [3] दुबले ऊँचे इकहरे बादाम के पेड़ के नीचे अपने साथियों को झुका हुआ देखकर मैं समझ गया कि उनकी आँखें हरे-कच्चे बादामों को खोज रही हैं, जो या तो आसपास की क्यारियों की काली मिट्टी में जम गए, या क्यारियों के बीचोबीच जानेवाली खुशनुमा पगडंडी पर गिर पड़े हैं। बादाम के पेड़ के आगे पूरब-दक्षिण की तरफ़ ऊँची भूरी-भूरी दीवारें दिखाई दे रही हैं। उसकी इस तरफ़ और बादाम के पेड़ की उस तरफ़ मटर और टमाटर की हरियाली फैली हुई है और मैंने देखा कि कुछ लोग वहाँ भी पहुँच गए हैं। उधर बग़ीचे के दक्षिण की तरफ़ जो मुँडेर है उसके नीचे लाल कन्हेर की झाड़ियों के आगे दूर तक तालाब लहरा रहा है, जिसकी मटमैली नीली लहरें, सूरज की किरनों को वापस फेंक रही हैं, और इस तरह चाँदी और काँच के चमचमाते टुकड़ों की धारधार चमक पैदा कर रही हैं। तालाब के उस पार आम के दरख्तों के नीचे कोई साइकिल पर तेज़ चला जा रहा है। एक मन हुआ कि आख़िर हम अपने साथियों के पास बादाम के पेड़ के नीचे क्यों न पहुँच जाएँ और कुछ मटर जेेब में भर लें। लेकिन फिर सोचा कि फिर वे लोग हमारा पिंड नहीं छोड़ेंगे। यह ख़याल मेरे और जगतसिंह के मन में एक साथ आया। मैंने उससे कहा, ‘चलो, जल्दी चलो, नहीं तो अटक जाएँगे।’ यह बात हमारे मुँह से निकली ही थी कि पीछे से एक चोर-आवाज़ आई, ‘ऐसी भी क्या बात है, हम भी तो चल रहे हैं!’ तबीयत तो हुई, पीछे घूमकर न देखें, लेकिन हम जानते थे कि मोटे तल्लों के बूट हमारा पीछा नहीं छोड़ेंगे। बोगनविला के फूलों से लदे हुए मेहराबवाले बग़ीचे के फ़ाटक तक पहुँचते ही उसने हमें पकड़ लिया और जगत की पीठ पर धाप पड़ गई। एक गोरा सुनहरा चेहरा हमें चिढ़ाता हुआ बोल उठा, ‘बॉस तुम्हें बुला रहे हैं!’ शायद नवागन्तुक ने मेरी आँखों में क्रोध और घृणा की चिनगारी देखी होगी। तभी उसने एक साँस में कह डाला, ‘मैं कुछ नहीं कह रहा हूँ। मैं तो तु हें चाय पिलाना चाहता हूँ।’ हम लोग चुपचाप बाहर निकल गए। और पता नहीं क्यों हममें एक चुप्पी, एक फ़ासला और साथ-ही-साथ अपने-अपने अकेलेपन का घेराव बढ़ता गया। मशीन के पहियों की भाँति हमारे पैर दाहिनी ओर मुड़ गए जहाँ से रास्ता तालाब के किनारे-किनारे आम के दरख्तों के नीचे से चला जा रहा था। ज्यों ही हम बीस गज आगे बढ़े होंगे, हमारे सुनहले चेहरेवाले साथी ने कहा, ‘यार, नीचे उतर के चलें।’ अचानक टोके जाने से झुँझलाकर मैं स्तब्ध-सा रुका। मैंने जगत की ओर देखा। वह कटी डाल-सा निजत्वहीन और शिथिल दिख रहा था। मैंने सुनहरे चेहरेवाले साथी से पूछा, ‘क्यों?’ फिर कहा, ‘चलो!’ हम नीचे रास्ते को उतरे। उसने कहा, ‘यह नया रास्ता है!’ जिस रास्ते पर अब तक हम चल रहे थे वह तालाब के बाँध पर बना हुआ था। बाँध के बहुत नीचे एक छोटा-सा नाला बह रहा था, और इधर-उधर घने-घने पेड़ तितर-बितर दिखाई दे रहे थे। हम अपने को सँभालते हुए नीचे उतर गए और नाला फाँदकर उस ओर जा पहुँचे, जहाँ से एक पगडंडी शहर की ओर जा रही थी। फाँद करके मैं नाले की ओर क्षण-भर देखता रहा। वहाँ छोटी-मोटी मछलियाँ आनन्दपूर्वक क्रीड़ा कर रही थीं। ऐसा लगता था कि उनकी क्रीड़ा को घंटों तक देखा जा सकता है। पगडंडी पर दो ही क़दम आगे बढ़ा हूँगा कि सामने लाखों और करोड़ों लाल-लाल दियोंवाला गुलमोहर का महान वृक्ष मेरे सामने हो लिया। उसके तल में अध-सूखे, मुरझाए और सँवलाए फूल बिखरे हुए थे। और दो-चार फटी चड्डियोंवाले मैले-कुचैले लड़के वहाँ न मालूम क्या-क्या बीन-बटोर रहे थे। मैंने शहर का यह हिस्सा देखा ही नहीं था। बाईं ओर अस्पताल की पीली दीवार चली गई थी, जिसके ख़तम होते ही छोटे-छोट मक़ान, छोटे-छोटे घर–मिट्टी के घर–चले गए थे। निस्सन्देह, अस्पताल के पिछवाड़े की यह गली थी। दाहिनी ओर खुला मैदान था। जिसमें इमली और नीम के पेड़ों के अलावा छोटे-छोटे खेत थे। एक खेत के बाद दूसरा खेत। ये तरकारियों के खेत थे। छोटी-छोटी मेंड़ें बनी हुई थीं। उन खेतों पर खूब मेहनत की गई थी। ऐसा लगता था कि ये खेत नहीं वरन् कल्पनाशील चित्रकार द्वारा निकाले गए मानव-श्रम के हरे-भरे–चित्र हों। सबकुछ चित्रात्मक था। वे छोटे-छोटे खेत। वे इमली के दरख्त जिनके नीचे गाएँ चर रही थीं। और वे नीम के पेड़ जिनके तले की एक चट्टान पर कोई बेघर, बे-मकान आवारा अपनी मैली-कुचैली गठड़ी खोल रहा था। उसने हमारी तरफ़ देखा, हमने उसकी तरफ़। उसका चेहरा साँवला, अंडाकार था। उस पर भोलेपन से भरी हुई एक अजीब मुर्दनी छाई हुई थी। उसने मेरी कल्पना को उकसा दिया। वह कौन था? किसी ग़रीब का लड़का जो घर से भाग गया था और जो शहर में काम न मिलने से थका-हारा यहाँ बैठा था? अब खेत ख़तम हो गए। एक नई सड़क की पुलिया दूर से दिखाई देने लगी। बाईं तरफ़ के घर गाँव के ग़रीबों के थे। बाहर खाटों पर पेड़ों की छाया में माँएँ लेटी हुई थीं। कुछ लड़के ऊधम मचा रहे थे। लेकिन मेरी आँखें एक जगह जाकर ठिठक गईं। एक मैली-कुचैली खाट पर एक बूढ़े की ज़िन्दा ठटरी पड़ी हुई थी और उस ठटरी के दुबले चेहरे की आँखों में एक ज्योति थी। ऐसी ज्योति जो ममतापूर्वक एक और ठटरी को देख रही थी। वह दो साल के शिशु की ठटरी थी, जिसके सारे बदन पर सलवटें पड़ी हुई थीं और उसके सलवट-भरे बाल-मुख पर वेदना की चीख़ नि:शब्द होकर जड़ हो उठी थी। वह बूढ़ी ठटरी अपने हड़ियल हाथों से शिशुठटरी को खिला रही थी। प्यार करती-सी दिखाई दे रही थी। और वह शिशु इस अजनबी दुनिया को अपनी त्रस्त आँखों से देख रहा था। इस शिशु का चेहरा बिलकुल मैला था; यद्यपि मूलत: उसकी त्वचा गोरी रही होगी। मेरे अवचेतन में से, अपने अनजाने में ही, एक ज़बरदस्त हाय निकली–ऐसी कि सुनहरे चेहरेवाला साथी मुझे थोड़े विस्मय से देखने लगा। उसने कहा, ‘क्या हुआ?’ मैंने कहा, ‘कुछ नहीं।’ फिर मैं अपने ख़यालों में डूब गया। इतने में गली को पार करती हुई एक गटर दिखाई दी जो ठीक बीच में आकर फैलकर फूल गई थी। उसमें का कालापन भयानक था। उसके काले कीचड़ में एक मुर्गी फँस गई थी और पंख फडफ़ड़ाकर निकालने की कोशिश कर रही थी। सुनहरे चेहरेवाले ने मुझसे कहा, ‘अगर बॉस ने देखा कि हम इस गली में से जा रहे हैं तो समझ जाइए कि मौत आ गई।’ मैंने कहा, ‘क्यों?’ लेकिन यह कहते-कहते मेरी भवें तन गईं, शरीर में एक उत्तेजना समाने लगी, शायद मेरी आँखों में भी तेज़ी आ गई होगी। सुनहरे चेहरे ने फिर कहा, ‘बॉस के अनुसार न सिर्फ़ यहाँ कमीन लोग रहते हैं, वरन् ऐसे घर भी हैं जहाँ...’ मैं समझ गया। उसका मतलब था कि यहाँ व्यभिचार होता है। मैंने कहा, ‘खुलकर कहो! क्या तुम यह कहना चाहते हो कि यह वेश्याओं का मुहल्ला है?’ मेरे इस कथन से सुनहरे चेहरेवाले को एक धक्का लगा! उसने कहा, ‘कौन कहता है!’ मैंने उलटकर पूछा, ‘तो फिर क्या?’ उसने जवाब दिया,‘यहाँ ‘खुला व्यभिचार’ होता है।’ ‘होगा! हमसे क्या?’ ‘हमसे क्यों नहीं! हम इस विशाल सांस्कृतिक केन्द्र के सदस्य हैं और अगर हम इस गन्दी और कुप्रसिद्ध गली में पाए गए तो हमारा और हमारे केन्द्र का नाम बदनाम होगा।’ ‘तुम्हारी और तुम्हारे बॉस की ऐसी-तैसी!’ यह कहकर मैं चुप हो गया। मैं आगे कहता गया, ‘तुम्हारे बॉस का चाल-चलन भी तो प्रसिद्ध है।’ सुनहरे चेहरेवाला नवयुवक बड़ी षड्यंत्र-भरी मुसकान प्रकट करने लगा। जगत ने उसकी पीठ पर धाप जड़ दी और वह बोल उठा, ‘क्यों मार रहे हो, भाई!’ बात असल में यह थी कि हमारे बॉस, जो इस सांस्कृतिक केन्द्र के सर्वेसर्वा हैं, बड़ी फ़िक्र के साथ हम लोगों की देखभाल करते हैं। हमें खूब सहायता देते हैं। इस केन्द्र के वे प्रमुख हैं। एवज़ में उससे एक पैसा नहीं लेते। न केवल इस केन्द्र को, वरन् उसके कर्मचारियों को भी, यथाशक्ति सहायता देते रहते हैं। वे हम सबसे प्रेम रखते हैं। चाहते हैं कि हम अच्छे ढंग से रहें और यहाँ के सर्वोच्च वर्ग में गिने जाएँ। इसलिए वे हमारी चाल-ढाल, कपड़े-लत्ते, यहाँ तक कि हमारी गतिविधि पर भी नज़र रखते हैं। शहर में उनके बारे में यह कहा जाता है कि वे अपने पुराने पापों को धो रहे हैं। वे पाप क्या हैं? हम लोग नहीं जानते। क़िस्सा मुख्तसर यह है कि वे यहाँ की सूती मिल के असिस्टेंट मैनेजर थे। यह सूती मिल एक प्रसिद्ध अँगरेज़ कम्पनी की थी। इन अँगरेज़ों में से बहुतेरों के अपने परिवार न थे। वे अँगेरज़ अफ़सर नीची जाति की स्थानीय औरतों से प्रेम करते। नौकरानियों के रूप में वे उनके घर में रहतीं। मज़ा यह है कि (जैसा कि मुझे कई लोगों ने कहा) वे नौकरानियाँ जो उनके यहाँ पहुँच जातीं इस बात का अभिमान रखती थीं कि वे ‘बड़ों’ के ‘घर’ में हैं। स्वाधीनता के बाद यह मिल जब हिन्दुस्तानियों को बेच दी गई तो कई अँगेरज़ों ने अपनी प्यारी नौकरानियों के लिए बड़े-बड़े घर-मकान बना दिए और उनकी एक जायदाद खड़ी कर दी। यह क़िस्सा है। मनुष्य का चरित्र उसकी संगत से पहचाना जाता है। सम्भव है, हमारे बॉस की भी इसी तरह की प्रेमिकाएँ रही हों। कौन नहीं जानता कि इस प्रदेश के एक डिप्टी मिनिस्टर जिनका नाम मैं यहाँ लेना नहीं चाहता–की एक रखैल यहाँ आलीशान मकान में रहती है जिसे शहर के बाहर के एक मुहल्ले में बनाया गया है। शहर में किसी से भी पूछ लीजिए, उसके मकान का अता-पता आपको मिल जाएगा। बॉस के विरुद्ध तिरस्कार के कई कारण थे जिनमें एक यह भी था कि वे स्थानीय नरेश के एटर्नी रहे। वहाँ खूब आना-जाना रहा। और उसी की (वह अब मर गया है) सहायता से उन्होंने परिश्रम करके यह विद्या-केन्द्र खोला। वे एक बड़ी-सी ज़मीन के मालिक हैं और कई छोटे-मोटे धन्धों में उनका पैसा लगा हुआ है। लेकिन, चूँकि वे एक प्रसिद्ध विलायती मिल के असिस्टेंट मैनेजर रहे आए, इसलिए उन्होंने यहाँ के बहुत–से सेठ-साहूकारों पर उपकार किया। वे उपकार करने की शक्ति रखते थे। लोगों पर अहसान करके उन्हें अपनी कठपुतली बनाने में बड़ा मज़ा आता था। या यह कहिए कि लोगों को उनकी कठपुतली बनने में मज़ा आता था। बात दोनों ओर से थी। महत्त्व की बात यह है कि वे क़ायदे के पाबन्द थे। और कानून के अनुसार काम करने में हिचकिचाते नहीं थे। यूनियनों में संगठित मज़दूरव र्ग उनसे कभी खुश नहीं रह सकता था, क्योंकि वह अँगेरेजों के वफ़ादार नौकर थे। और इसीलिए उनकी चलती भी थी। स्वाधीनता के बाद भी कुछ दिनों तक वे मिल के असिस्टेंट मैनेजर रहे। लेकिन नए मारवाड़ी मालिक से उनकी नहीं पटी। उन्होंने नौकरी छोड़ दी। उधर भूतपूर्व मुख्यमंत्री (जो अब मर गए हैं) से उनकी खूब पटती थी। इसलिए अधिकारी-वर्ग पर भी उनका अच्छा ख़ासा असर था। संक्षेप में, वे इस शहर के बहुत प्रभावशाली और शक्तिशाली लोगों में से थे और पूरे सामाजिक सन्दर्भ को देखते हुए, उनके सम्बन्ध में बहुत-से लोगों की धारणाएँ बुरी होना स्वाभाविक ही थीं। यह एक तथ्य है। फिर भी दूसरा तथ्य है कि ‘विद्या-केन्द्र’ खोलने के साथ-ही-साथ उनका स्वभाव बदलने लगा। पहले वे बहुत तेज़ मिज़ाज के, ज़िद्दी लेकिन न्यायप्रिय, (प्रचलित ‘न्याय’ के सीमित अर्थ में) हालाँकि अपनी करके छोड़नेवाले लोगों में से थे। उनकी स्त्री बहुत जल्दी मर गई थी। इसलिए दो बच्चों के पिता होते हुए भी वे अकेले थे। अब जबसे उन्होंने यह विद्या-केन्द्र खोला, उनमें एक अजीब नरमी आ गई। उनकी संवेदनशीलता इतनी बढ़ी थी कि वे जो पहले आदमी को सूँघकर उसकी पहचान बता देते थे–अब केवल उसकी मुखमुद्रा को देखकर और उसके चेहरे की शिकन देखकर उसके दिल को ताड़ जाते, स्वभाव जान जाते। वे बहुत ज़्यादा अकेले थे और उनके सामने यह समस्या बनी रहती थी कि वक़्त कैसे काटें। इसलिए वे विद्या-केन्द्र के कर्मचारियों में बैठकर अपना समय व्यतीत करते थे। बस, इसी बिन्दु पर छुपे हुए संघर्ष की वह पृष्ठभूमि थी जिसके बिना यह क़िस्सा समझ में नहीं आ सकता। यह उनकी संवेदनशील मनुष्यता थी जिससे प्रेरित होकर वे अपने साथियों की सहायता के लिए दौड़ पड़ते और अपने नुक़सान की परवाह नहीं करते थे। वे राजा आदमी थे। वे प्रेम करते थे। और प्रेम की तानाशाही भी उनमें थी, जो शासक-वर्ग की तानाशाही मनोवृत्ति से घुल-मिलकर इतनी एकप्राण हो गई थी कि यह कहना कठिन था कि वह शासक-वर्ग की तानाशाही है या प्रेम का अधिनायकत्व! उनके हाथ से जितनी अधिक सेवा और सहायता होती जाती, उनकी मनोवैज्ञानिक रचना में परिवर्तन होता जाता, प्रेमभाव बढ़ता जाता, और प्रेम की तानाशाही बढ़ती जाती। उनका भोलापन भी बढ़ता जाता। उनकी खुशामद कर, उन्हें विश्वास में लेकर धोखा देना बड़ा ही सरल था, यद्यपि ऐसी कोई वारदात अभी तक हुई नहीं। लेकिन सबको यह बात साफ़ नज़र आ रही थी। लिहाज़ा, कुछ लोग इसी में जुटे रहते। इतना अच्छा था कि वे इस रहस्य को खूब अच्छी तरह समझते थे, क्योंकि अपने जीवनकाल में उन्हें ऐसों का खूब तज़ुर्बा मिल चुका था। और, जैसा कि होता है, वे प्रेम के अधिकार का प्रयोग करते, बहुत नि:स्वार्थ भाव से। लेकिन यही गड़बड़ भी थी; क्योंकि अब उन्हें अपने प्रेम के अधिकार से दूसरों का जीवन-निर्माण करने में मज़ा आने लगा था। और लोग इस बात के लिए तैयार नहीं थे कि उनके ढाँचे में अपनी ज़िन्दगी फ़िट करें। उनका ख़याल था कि खूब अच्छी ज़िन्दगी बनाई जाए, पैसा हो, ठाठ हो, समाज पर असर हो, और हो सके तो अपने हाथों कोई अच्छा काम भी हो जाए। उनके इस ख़याल से हमारे यहाँ लगभग सभी एकमत थे। लेकिन जीवन के विभिन्न विषयों पर लोगों के अलग-अलग आचार-विचार थे। एक तरह से देखा जाए तो वे अपनी ख़ुद की ज़िन्दगी से रिटायर हो चुके थे। ज़िन्दगी में ठाठ का मतलब क्या? घर, ज़मीन, जायदाद, ऐश और महफ़िल या दरबार में मसालेदार गपबाजी! सब लोग तो वैसा करने से रहे, क्योंकि उन्हें उतनी तन वाह ही नहीं मिलती थी। सिर्फ़ महफ़िल में बैठकर मसालेदार गपबाजी ही बच रही थी। सो, लोग करते ही थे। और घर, ज़मीन, जायदाद का मोह, उन्नति का मोह सबको था बशर्ते कि वह पूरा हो। और, फिर भी आदमी की पसन्दगी-नापसन्दगी, रहन-सहन आदि के तरीक़े अलग-अलग होते हैं। किसी दूसरे आदमी के ढाँचे में वे फ़िट नहीं किए जा सकते। अपनी-अपनी उन्नति की कल्पना भी अलग-अलग होती है। जो हो, एक ओर उनके अहसान और दूसरी ओर उनके प्रेम से दबकर हम लोग उन्हें अपना ‘साथ’ प्रदान करते, जिससे कि वे अपना वक़्त काट सकें। अपना साथ उन्हें प्रदान करना एक तरह से अनिवार्य कर्तव्य हो गया था। दूसरे, वे भी आज चाय के बहाने, कल पार्टी के बहाने, परसों आउटिंग के बहाने, उसके अगले दिन सिनेमा-फ़िल्म के प्रदर्शन के बहाने, सब लोगों को बुलाकर अपना दरबार लगा ही लिया करते। धीरे-धीरे लोगों को उनके दरबार में जाने की आदत पड़ गई। जो कर्मचारी उनके दरबार में न बैठता वह अपने को असुरक्षित अनुभव करता; जिन कर्मचारियों को कार्यवश वहाँ जाने को नहीं मिलता, उनके मन में एक गुत्थी पैदा हो जाती कि कहीं ऐसा न हो कि उसकी अनुपस्थिति में कुछ-का-कुछ हो जाए। इस तरह लोगों में एक अजीब दो-रुखी पैदा हो गई थी। एक ओर वे दरबार को छोड़कर जाने में हिचकिचाते, तो दूसरी ओर वे चाहते थे कि दरबार न हो तो उन्हें घूमने-फिरने की स्वतंत्रता रहे। दोनों बातें एक साथ नहीं हो सकती थीं। इस प्रकार कभी-कभी वे अपने ही पर झुँझला उठते, कभी नपुंसक क्रोध से भर जाते। लेकिन वे प्रकट रूप से यह न कहते कि हमें दरबार अच्छा नहीं लगता। उधर, लगभग रोज़ लंच, डिनर, पार्टी, फिल्म-शो आदि-आदि हुआ करते, और चूँकि सभी लोग निमंत्रित होते, ऐसा निमंत्रण अस्वीकार करना भी मुश्किल होता। ये लंच या डिनर कभी एक व्यक्ति देता ता कभी दूसरा व्यक्ति, कभी (अधिकांशत: वे ही) बॉस। हफ्ते में, कम-से-कम चार-पाँच बार इसी तरह खाना-पीना होता। यदि कोई हाज़िर न हो तो निमंत्रण देनेवाला ख़ुद बुरा मानता। मतलब यह कि कुल मिलाकर यह हालत थी कि कोई भी जान-बूझकर दरबार में जाना टाल नहीं सकता, भले ही वह इस लम्बे वक़्त से तंग आकर बाद में पीठ-पीछे चिड़चिड़ाए या कुछ करे। मज़ा यह कि हर आदमी किसी-न-किसी तरह से बॉस में अपने समान कोई-न- कोई गुण देख लेता, और भले ही वह उसे कहे या न कहे, इस बात पर ख़ुद फ़िदा हो जाता था। और हर एक को लगता कि बॉस उस पर व्यक्तिगत रूप से प्रसन्न हैं। शायद इस धारणा को बॉस ख़ुद अपने कर्मचारियों में बढ़ाते थे। वे अहसान, प्रेम और संग द्वारा दूसरों की गतिविधियों पर शासन कर अपना प्रभुत्व लोभ पूरा करते थे–एेसी मेरी अपनी कल्पना है। दूसरी तरफ़ उस दरबार का एक सदस्य दूसरे सदस्य से सिर्फ़ ऊपरी तौर पर मिलता था, क्योंकि हम सब लोग बेढंगे, बेजोड़ और बेमेल आदमी थे। ज़िन्दगी कैसी जी जाए, सब लोगों के अलग-अलग ख़याल थे। सब एक-दूसरे से अलग थे और हर एक में ऐसा गहरा अकेलापन था जिसे काटने के लिए मसालेदार गपबाजी के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं दिखाई दे रहा था। महफ़िलबाज़ी के बावज़ूद उनके अकेलेपन की गहराइयाँ बड़ी ही अँधेरी और निजी थीं। इस माहौल में लोग यदि एक-दूसरे की सहायता भी करते तो भी काटने के लिए दौड़ते। एक-दूसरे की टाँग खींचना एक मामूली बात थी। एक अजीब क़ैद थी जिसमें प्रत्येक व्यक्ति अपने-आपको विफल अनुभव कर रहा था। और फिर भी किसी में यह साहस नहीं था कि इस उलझी हुई गुत्थी को तोड़े। क्योंकि यह सम्भव था कि यदि कोई उसे तोड़ने की कोशिश करे तो दूसरा आदमी उसके विरुद्ध और अपने हित में नाजायज़ फ़ायदा उठा लेता और लोग अपना-अपना हित उसी प्रकार देखते जैसे चींटी गुड़ को। इस ‘विद्या-केन्द्र’ में किसी को भी विद्यानुराग नहीं था। यहाँ तक कि पढ़ाने का जो काम है उससे सम्बन्धित बातों को छोड़कर, जो व्यक्ति इधर-उधर किताबें टटोलता या अपने विषय में ही ‘रस’ लेने लगता, उस विषय में प्राय: रसमग्न होकर बातचीत करता, तो लोग बुरा मान जाते। समझते कि वह पढ़ाकू हो रहा है। हमारे यहाँ से जो लोग पी-एच.डी. या डी.एस-सी. होने गए वे अपने आँकड़े समझाकर गए थे। वे सिर्फ़ पी-एच. डी. चाहते थे जिससे कि वे अगली सीढ़ी पर चढ़ सकें। यही क्यों, हमारे यहाँ का जो सब-डिविजनल ऑफ़िसर था वह ख़ुद डी.एस-सी. था जबकि वह पढ़ा-पढ़ाया सब कुछ भूल चुका था। इस प्रकार ‘चाहे जैसे व्यक्तिगत उन्नति प्राप्त करना’ एक प्राकृतिक नियम का उच्च और अनिवार्य पद प्राप्त कर चुका था। इन तथ्यों को मैं ज़रा भी बढ़ा-चढ़ाकर नहीं कह रहा हूँ। विज्ञानवालों को यह मालूम नहीं था कि हाल ही में कौन-कौन महत्त्वपूर्ण आविष्कार हो रहे हैं, और हिन्दीवालों को यह ज्ञात नहीं था कि आजकल इस क्षेत्र में क्या चल रहा है! और जो मालूम भी था वह केवल सुना-सुनाया था, अस्पष्ट था, धुँधला और उलझा हुआ था। और इस बीच हमारे यहाँ के एक तरह-तरह के ‘गैस-पेपर्स’ निकालकर एक प्रकाशक से आठ-एक सौ रुपए कमा भी लिए थे। वैसे हम सब नौजवान थे, कई उपाधियों से विभूषित थे, अपने विषय के आचार्य माने जाते। एक तरह से हम भोले थे, सरल हृदय भी। हम किसी के दु:ख से पिघल भी सकते थे, सहायता भी करते थे। लेकिन हममें सामाजिक चेतना नहीं थी, क्योंकि असल में हम सब लोग हरामख़ोर थे। और मज़ा यह है कि वैसे व्यक्तिश: हम बुरे भी नहीं थे। भलेमानस थे, अच्छे आदमी कहलाते थे। अच्छा आदमी वह होता है, जिसकी बुराई ढँकी रह जाती है–चाहे आप ही आप, चाहे किए-कराए से। हम ऐसे ही भले मानस थे। <!--nextpage> [4] हमने उस गली के बीच में से गटर पार की ही थी कि एक साँवली औरत दिखाई दी जिसका नाक-नक्श संगमूसा की चट्टान में से काटा गया दिखाई देता था। वह इतनी मजबूत थी, उसका स्नायु-संस्थान इतना दृढ़ था कि लगता उसका चेहरा भी, जिसकी रेखाकृति सरल और निर्दोष थी, उसी शक्ति और दृढ़ता का परिचायक है। कोई भी कह देता कि उसके श्यामल मुखमंडल पर एक गौरवपूर्ण अभिमान, एक मज़बूत गुस्सा और एक थमी हुई रफ़्तार है! मुझ पर उसके सौन्दर्य का (यदि वह सौन्दर्य कहा जाए तो) एक हलका-सा आघात हुआ। और मुझे गोर्की की कहानियों के पात्र याद आने लगे। गुलमोहर के पेड़ के नीचे जाने क्या बीनते हुए फटे-हाल लड़के, पेड़ के नीचे पत्थर पर बैठा हुआ आवारा चेहरा, और अब यह स्त्री-मूर्ति जो मानो संगमूसा की चट्टान काट करके बनाई गई हो। सुनहरे चेहरेवाले ने कहा, ‘यह धोबिन है, मेहनत से उसका शरीर बना हुआ है।’ मेरे मुँह से निकल गया, ‘चंडीदास की प्रेमिका।’ जगत ने मुझे सुधारा, ‘शि:, चंडीदास की प्रेमिका के चेहरे पर इतने कठोर भाव नहीं हो सकते।’ तो तुरन्त ही अपने-आपको सुधारकर कहा, ‘चंडीदास की प्रेमिका की बहन तो हो ही सकती है। नहीं-नहीं। वह तो गोर्की की कोई पात्रा है।’ सुनहरे चेहरेवाला समाजशास्त्री और राजनीतिशास्त्री था। उसने कहा, ‘यह मिक्स्ड ब्लड (वर्ण-संकर) है, मेस्टिजो (दक्षिण अमरीका के वर्ण-संकर के समान) है।’ और मुझे देखकर वह हँस पड़ा। मैं उसका भाव समझ गया। इस शहर की समाजशास्त्रीय लोकप्रक्रिया की ओर इसका इशारा था। यहाँ के, इस क्षेत्र के, इस प्रदेश के मूल देशवासियों ने शायद ही कभी राज्य किया हो। साधारण जनता मूलत: किसान थी। वह निचली जातियों से बनी थी। राजस्थान के और पश्चिम उत्तर प्रदेश के, आन्ध्र के और महाराष्ट्र के, लोगों ने आकर, यहाँ ज़मीन-जायदाद बनाई। यहाँ का मध्यवर्ग इन्हीं लोगों से बना। और पुराने ज़माने से इन लोगों ने ज़मीन-जायदाद बढ़ाते हुए, यहाँ की निम्नवर्गीय स्त्रियों को अपने घर में रखा। और उससे जो वर्ण-संकर सन्तानें पैदा हुईं वे भी अन्तत: उसी निचली जनता में मिल गईं। निस्सन्देह इस जनता में भीतर-ही-भीतर उच्चवर्गीय हिन्दुओं के प्रति असन्तोष और विरोध का भाव पैदा होता गया और राजनीति के अभाव में उसने पुराने ज़माने में ही सामुदायिक रूप ग्रहण कर लिया। नतीज़ा यह हुआ कि निचली जातियों में, सुदूर अतीत में ही, सतनामियों और कबीरपंथियों का ज़ोर और प्रभाव बढ़ा; और आधुनिक काल में ईसाई मिशनरियों का। और अब तो बहुतेरे नव-बौद्ध भी हो गए। फिर भी उस निचली जनता में जो सनातनधर्मी बचे रहे, उन्होंने संस्कृतीकरण करते हुए जनेऊ पहनना शुरू कर दिया और अपने बच्चों को आधुनिक प्रकार की शिक्षा-दीक्षा दिलाने का प्रयत्न करने लगे। उनकी दुनिया ही अलग थी। वह एक अलग ही राष्ट्र था। वह श्यामल जनसमुदाय अपने ढंग से सोचता था। और उनके मुहल्लों-मुहल्लों में, और गाँव-गाँव में, उनके अपने-अपने लीडर हो रहे थे, जो सामने दिखाई नहीं देते थे। राजनीति में उनको दिलचस्पी नहीं थी। लेकिन राजनीतिक पार्टियाँ वोटों के लिए उन्हीं मुखियों के पास जाती थीं और जीतने के बाद फिर उस श्यामल जन-समुदाय को बड़े ठाठ से भूल जाया करती थीं। सुनहरे चेहरेवाला हमारा साथी बड़ा मज़ेदार आदमी था। वह था मारवाड़ी का बच्चा, जिसके कई मकान बीकानेर में थे, लेकिन उसका घर इसी शहर से बहत्तर मील दूर एक गाँव में था। वह बड़ा ही फक्कड़ था। उसे एक जगह चैन नहीं पड़ता था। वह अपने आचार-विचार में, समाज के छोटे और समाज के बड़ों में भेद नहीं करता था। उसकी निरीक्षण-शक्ति अद्भुत थी। वह इस प्रदेश की जनता से घुला-मिला था और यहाँ की लोक-भाषा में ही उनसे बातचीत करता। यह उसके लिए कठिन भी नहीं था क्योंकि बाहर से आया हुआ यहाँ का सारा मध्यवर्ग निचली जाति से व्यवहार करते समय उसी लोक-भाषा का प्रयोग करता। बहुत-से मध्यवर्गीय परिवारों की वह मातृभाषा भी हो गई थी। सुनहरे चेहरेवाला हमारा साथी इस जनता को खूब अच्छी तरह जानता था। उनके गन्दे और धुएँदार होटलों में चाय पीते उसे मज़ा आता। वह बहुत ही अपनेपन से उनसे पेश आता। अब मुझे समझ में आया कि वह मुझे कहाँ ले जा रहा है। वह हमें इसी प्रकार के एक होटल में ले जा रहा था। सुनहरे चेहरेवाले ने मुझसे कहा, ‘अब आप हेमिंग्वे भूल जाइए। मैं आपको इस गन्दी जगह में बहुत ही अच्छी चाय पिलाने ले जा रहा हूँ।’ अब सड़क आ गई थी। होटल सड़क पर ही था। पानवालों की भी तीन दुकानें वहाँ थीं। हम ज्यों ही होटल में घुसे, जगत ने अपनी फ़र्राटेदार अंग्रेज़ी में कहा, ‘अगर बॉस ने देख लिया तो वह तुरन्त ही हमें इन्स्टीट्यूशन से निकाल बाहर करेगा। मैं तो मिस्टर भनावत को आगे कर दूँगा। कहूँगा कि यह मुझे वहाँ ले गया था, मैं तो भोला-भाला आदमी हूँ, मैं क्या जानूँ कि वह मुझे किसी ‘डिसरेप्यूटेबिल जगह’ पर ले जा रहा है...’ यह कहकर जगत ज़ोर से हँस पड़ा। सुनहरे चेहरेवाले ने उसकी ओर आँखें गड़ाते हुए और गन्दी गाली देते हुए कहा, ‘जबान बन्द करो। ‘डिसरेप्यूटेबिल’ तुम हो। साले, तुम्हारा ये ‘डिसरेप्यूटेबिल’ है, और...और तुम्हारा बॉस...डिसरेप्यूटेबिल है और तुम्हारी जेब ‘डिसरेप्यूटेबिल’ है।’ जगत ने इन गालियों को प्यार के फूलों की बरसात के रूप में ग्रहण करके सुनहरे चेहरेवाले की पीठ थपथपाते हुए कहा, ‘मेरे उपन्यास का नया अध्याय तुम्हारे चरित्र से और इस होटल से शुरू होगा, मिस्टर भनावत!’ <!--nextpage> [5] मिस्टर भनावत एक अजीब शख्सियत रखता था। बॉस ने सबसे ज़्यादा अहसान उसी पर किए थे और आज इस ‘गन्दे होटल’ की ‘अच्छी चाय’ पीते हुए वह बॉस की कठोर निन्दा कर रहा था। मुझे कुछ ख़ास अच्छा नहीं लगा। मज़ेदार बात है कि मैं ख़ुद उनकी आलोचना कर जाता था। तब मुझे बुरा नहीं लगता था। लेकिन उसके मुँह से उनकी बुराई सुन मुझे आश्चर्य और दु:ख हुआ। मैंने गम्भीर होकर चाय की चुस्की लेते हुए उससे पूछा, ‘क्यों यार, तुम्हारा कानून क्या कहता है? जो व्यक्ति तुम्हारी सहायता करता है उसकी आलोचना की जाए या नहीं?’ मिस्टर भनावत को मेरे वाक्य की नोंक गड़ गई। उन्होंने भजिए का कौर मुँह में डालते हुए कहा, ‘देखो भाई! अपना बाप भी अच्छाइयों के साथ बहुत-सी बुराइयों का मालिक है। हम बाप की बुराइयों की, यानी बाप की, आलोचना अवश्य करेंगे। आख़िर क्यों न करें? लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम बाप से प्यार नहीं करते। उसके लिए दौड़ जाएँगे। लेकिन उसकी बहुत-सी बातों को देखकर आग-बबूला भी हो जाएँगे, भले ही शाइस्तगी के नाते हम कुछ कहें नहीं।’ मैं मुसकरा उठा। मिस्टर भनावत के पिता, जो एक दुकान पर मुनीम थे, लड़के के हाथ में तराजू पकड़वाना चाहते थे। उन्होंने अपने बेटे को तिजारत के सब ‘गुर’ बता दिए थे। लेकिन लड़के ने बगावत कर दी। अपने पैरों पर खड़े होकर राजनीतिशास्त्र में एम.ए. किया और लोअर-डिवीजन क्लर्क हो गया। और इस समय वह यहाँ हमारा साथी अध्यापक है। उसकी बात समझ में आने लायक़ थी। लेकिन उत्सुकतावश मैंने उससे पूछा, ‘मान लीजिए कि बॉस को पता चल जाए कि तुम उस गली में बैठे-बैठे उन्हें गाली दे रहे थे?’ उसने मुझसे कहा, ‘कोई मेरा दुश्मन ही वैसा करेगा।’ मैंने कहा, ‘लेकिन, तुम उस व्यक्ति की आलोचना करना बुरा नहीं समझते जिसने तुम पर बहुत-सारे उपकार किए हों?’ उसने साफ़-साफ़ कहा, ‘बिलकुल नहीं। आख़िर, तुम्हीं बतलाओ, मिस्टर जगत! किसी दूसरे में जो बुराइयाँ हमें महसूस होती रहती हैं, और काँटे-सी खटकती हैं, उनकी आलोचना क्यों न की जाए?’ जवाब मैंने दिया, ‘मनुष्यता यह कहती है कि उपकार का बदला अपकार से न दिया जाए।’ भनावत ने ज़िद करके कहा, ‘लेकिन आलोचना यदि ग़लत हो तो अपकार है। उसे उपकार का ही एक रूप क्यों न समझा जाए?’ मैंने बात और आगे बढ़ाई, ‘लेकिन बॉस तो वैसा नहीं समझता, दुनिया तो वैसा नहीं समझती, लोग तो वैसा नहीं समझते!’ भनावत ने अब जिद पकड़ ली। उसने कहा, ‘देखो भाई, यह साफ़-साफ़ बात है। यह हमारे-तुम्हारे बीच की बात है। जानते हो न कि हमारे बॉस साहब कौन हैं? इस शहर के नामी-गिरामी शैतान हैं। उनके ज़माने में मज़दूरों पर कितनी बार लाठी-चार्ज नहीं हुआ या गोलियाँ नहीं चलाई गईं! रियासत के ज़माने में अंग्रेज़ पोलिटिकल एजेंट के कहने से कितने ही कांग्रेसी जेल में सड़ा दिए गए और मार डाले गए। यह सब पुराना क़िस्सा है। लेकिन इस क़िस्से का एक प्रमुख पात्र कौन है–किसके ज़रिए यह सब किया जाता रहा है? हमारे बॉस के ज़रिए! ...आज भी देखो न बग़ीचे में से आँवले तोड़कर ले जानेवाले लड़कों को उस शख़्स ने जिसे दो क़दम चलने में भी तक़लीफ़ होती है, कितना नहीं पीटा! और हमारे दरबार के लोग ताकते रह गए। रिश्वत देना, रिश्वत लेना तो बुराई है न! उसका प्रयोग करते हुए कितने काम नहीं किए-कराए जाते! लेकिन चोरी, और वह भी खाने-पीने की चीज़ों की, ज़मीन-जायदाद की, उसके लेखे जघन्य अपराध हैं। सामने के तालाब में फटेहाल लड़के मछली चुराने आते हैं। उन्हें किस तरह ठोंका-पीटा जाता है! क्यों? इसलिए कि वे फटेहाल हैं, एकदम ग़रीब हैं और उसके लेखे जो फटेहाल हैं, उनके लड़के चोर और आवारा हो ही जाते हैं। यह एक मनोवैज्ञानिक ग्रन्थि है, उसे उसके दिमाग़ का ऑपरेशन करके भी नहीं निकाल सकते। ‘यही देखो न! मैं चाय पीने यहाँ कभी-कभी आता हूँ। मैं यहाँ इसलिए आता हूँ कि मुझे ‘यहाँ की चाय’ बहुत पसन्द है। लेकिन यहाँ इस गन्दे होटल में जो सब लोग आ-जा रहे हैं, ये उसके लेखे सब कमीन हैं। और कमीन लोग गुंडे होते ही हैं–यह सब उसकी मान्यताएँ हैं। इसलिए उसने अवन्तीलाल का मेरे साथ यहाँ आना बन्द करवा दिया। और अब वह तुम्हारेे भी पीछे पड़ा है। उसके विद्या-केन्द्र का व्यक्ति यहाँ आकर चाय पिए! राम-राम! यह तो उस विद्या-केन्द्र की बदनामी है। लेकिन, जानते हो, मैंने इस होटल का क्या नाम रखा है? ‘काफ़े-द-मज़दूर’। क्या बुरा नाम है यह? मैं मारवाड़ी का बच्चा हूँ और इन्हीं लोगों से ब्याजबट्टा करके, उनकी ज़मीन कुर्क कराके, हमने अपने घर भरे हैं–मैं साफ़-साफ़ कहता हूँ कि इस बुरे काम में हमारा भी हाथ है। हम शैतान के बच्चे हैं। और अब इस समय मैं शैतान का नौकर हूँ। शैतान इसीलिए दूसरे पर मेहरबानी करता है कि वह शैतानी ढाँचे में फ़िट हो। मैं इस ढाँचे में फ़िट होने से इनकार कर देता हूँ।’ मैंने उसके लम्बे व्याख्यान पर एक गहरी उसाँस लेते हुए कहा, ‘लेकिन जब तुम बॉस के सामने हो जाते हो तब तो अपने को तुच्छ समझते हुए उसे महान् मानकर काम करते हो।’ भनावत ने निर्लज्ज होकर जवाब दिया, ‘बिला शक! मुझे वैसा करना ही चाहिए।’ मैं अवाक् हो उठा, ‘भई, कैसे, क्यों, किस तरह?’ वह क्षण-भर चुप रहा। फिर उसने कहा, ‘कहा जाता है कि हममें ‘व्यक्ति स्वातंर्त्य’ है। लेकिन यह मान्यता झूठ है। हमें ख़रीदने और बेचने की, ख़रीदे जाने की और बेचे जाने की आज़ादी है। हमने अपना व्यक्ति-स्वातंर्त्य बेच दिया है, एक हद तक तो इसलिए...’ जगत झल्ला गया। उसने कहा,‘मैं इस बात से इनकार करता हूँ कि हमने अपनी स्वतंत्रता बेच दी है।’ भनावत अजीब-सा हँसा। मुझे किसी अघोरपंथी साधु की याद आ गई। उसने कहा,‘तुम क्या समझते हो और क्या नहीं समझते–इसका सवाल नहीं है। सवाल यह है कि क्या उस मजलिस में अपने दिमाग़ में उठनेवाले या पहले से उठे हुए ख़यालों को ज्यों-का-त्यों ज़ाहिर करने की आज़ादी है?’ यह कहकर भनावत जगत की तरफ़ आँख गड़ाकर देखने लगा। तो मैंने इस बात का जवाब दिया, ‘आख़िर किसी ने आपको अपने मन की बात कहने से रोका तो नहीं है!’ भनावत ने चाय पीने की समाप्ति का कार्यक्रम पान खाने से शुरू किया। पान खाते-खाते वह कहने लगा, ‘तो तुम क्या यह सोचते हो कि अपने मन की बातें साफ़-साफ़ कहने से आपकी नौकरी टिक पाएगी? अजी, दो दिन में लात मारकर निकाल दिए जाएँगे। जनाब, यह मेरी चौदहवीं नौकरी है। ज़्यादा ख़तरा अब मैं नहीं उठा सकता। सच कहता हूँ, इसलिए बदमाश कहा जाता हूँ। मैं अब तक व्यक्ति, स्थिति और परिस्थिति को न देखकर बातें करता था। मैं बदमाश था। अब मैं सोच-समझकर, अपने को भीतर छिपाकर, ‘मौक़ा’ देख करके बात करता हूँ, इसलिए लोग मुझे ‘अच्छा’ समझते हैं। सवाल लिखित कानून का नहीं है। लिखित नियम तो यह है कि व्यक्ति स्वतंत्र है। किन्तु वास्तविकता यह है कि व्यक्ति को ख़रीदने और बेचने की, ख़रीदे जाने और बेचे जाने की, दूसरों की स्वतंत्रता को ख़रीदने की या अपनी स्वतंत्रता को बेचने की, आज़ादी की मज़बूरी है। लिखित नियम और बात है, वास्तविकता दूसरी बात। खाने के दाँत दूसरे होते हैं दिखाने के दाँत दूसरे। पूरे यथार्थ को मिलाकर देखिए। मैं तो मारवाड़ी का बच्चा हूँ। आप कवि लोग हैं। सच्ची आज़ादी उन्हें है, जिनके पास पैसा है। वे पैसों के बल पर दूसरों की स्वतंत्रता ख़रीद सकते हैं...मैं ख़ुद ख़रीदता था।’ मिस्टर भनावत के वक्तव्य से हमारा समाधान नहीं हुआ। अगर मैं वही बात कहता तो दूसरे ढंग से कहता। ढंग बहुत ही महत्त्वपूर्ण होता है। सच है कि हम श्रम बेचकर पैसा कमाते हैं। लेकिन श्रम के साथ-ही-साथ हम न केवल श्रम के घंटों में, वरन् उसके बाहर भी, अपना-अपना संघर्ष-स्वातंर्त्य, विचार-स्वातंर्त्य और लिखित अभिव्यक्ति-स्वातंर्त्य भी बेच देते हैं। और यदि हम अपने इस स्वातंर्त्य का प्रयोग करने लगते हैं तो पेट पर लात मार दी जाती है। यह यथार्थ है। इस यथार्थ के नियमों को ध्यान में रखकर ही पेट पाला जा सकता है, अपना और बाल-बच्चों का। तो क्या, भनावत सचमुच ठीक कहता है? क्या मेरी अपनी उन्नति के लिए, समाज में मेरी बढ़ती के लिए, मुझे भी उसी तरह अपनी पूँछ हिलानी पड़ेगी? वास्तविकता यह है कि अलग-अलग लोग, अलग-अलग ढंग से पूँछ हिलाते हैं। मेरा भी पूँछ हिलाने का अपना तरीक़ा है। मैं पहले अपने पंजे मालिक की गोद में रख दूँगा, और फिर दाँत निकालकर मालिक के मुँह की तरफ़ देखते हुए पूँछ हिलाऊँगा। दूसरे कुत्ते, दरवाज़े में खड़े होकर पूँछ हिलाते हैं। कुछ कुत्ते पास आने की लगन बताते हुए बीच-बीच में भौंकते हैं, गुर्राते हैं, और पूँछ हिलाते रहते हैं। मतलब यह कि स्थिति-भेद और स्वभाव-भेद के अनुसार पूँछ हिलाने की अलग-अलग शैलियाँ हैं। तो मैं यह नहीं कह सकता कि मैं पूँछ नहीं हिलाता। लेकिन, यह ज़रूर है कि अपने को उनके सामने तुच्छ देखता हूँ। होना तो यह चाहिए कि साफ़-साफ़ कहूँ। लेकिन, सवाल यह है कि झगड़ा कौन मोल ले, हमें क्या मतलब, हमसे क्या काम है! लेकिन भनावत? भनावत बदमाश है। वह यह धोखा खड़ा करना चाहता है कि वह उनका है। लेकिन मैं ऐसा नहीं कर सकता। और, फिर भी भनावत ने जो बातें कहीं उनमें बहुत कुछ सार दिखाई दिया। हम ज्यों ही पान खाकर रास्ते पर चलने लगे, मैंने भनावत से कहा, ‘मिस्टर, हम ज़रा घूमते आएँगे, तुम इधर से निकल जाओ।’ उसने जवाब दिया, ‘क्यों, इंटरनेशनल बातें करनी हैं! खैर, जाओ। लेकिन वो लोग मुझे क्या कहेंगे! ख़ैर, जाओ, मैं कह दूँगा कि वे इंटरनेशनल बातें करने निकल गए हैं।’ भनावत डग बढ़ाता हुआ निकल गया और मैं वहीं दो-चार क़दम इधर-उधर हुआ। मैंने कहा, ‘तुम्हारे घर चलें?’ जगत स्तब्ध खड़ा रहा। कोई जवाब नहीं दिया। मैं ताड़ गया कि वह दरबार में जल्दी-से-जल्दी हाज़िर होना चाहता है, जिससे कि वह फ़िजूल की बातचीत का विषय न बने। <!--nextpage> [6] भनावत जब आगे के चौराहे पर पहुँच गया होगा तब हम बिजली के चार-खम्भे के पीछे धीरे-धीरे पैर बढ़ा रहे थे। मैं बहुत उदास हो गया था, दिल भारी हो उठा था, लगता था कि पैर आगे नहीं उठ रहे हैं, अगर वहीं कहीं कोई बैठने की जगह होती तो मैं अवश्य बैठ जाता। एक ग़मगीन सूना दिल में घिर रहा था, दिमाग़ में अँधेरे के पंख भन्ना रहे थे; भयानक व्यर्थता का भाव रह-रहकर मँडरा आता था और अपनी असमर्थता का भान घुटनों में दर्द और दिल में कचोट पैदा करता था। मुझे ग़ालिब के शेर याद आए–
‘कोई उम्मीद बर नहीं आती, कोई सूरत नज़र नहीं आती। मौत का एक दिन मुअय्यन है, नींद क्यों रात-भर नहीं आती।’
अपने बचपन और नौजवानी में ऐसे ही किन्हीं क्षणों में, मुझे मृत्यु के अँधेरे में चिरकाल के लिए समा जाने की इच्छा होती थी। लेकिन अब मैं इस प्रकार के कल्पना-विलास की सुविधा नहीं उठा पाता। मुझे इन जलते रेगिस्तानों पर पैर रखते हुए ही चलना है। ...लेकिन मुझे अब आगे चलना दूभर हो गया। सामने अँधेरे में एक सिन्धी की चाय की दुकान पड़ती थी। उसके भीतर के कमरे में एकान्त था। उस एकान्त के लिए मैं तड़प उठा। एकान्त मेरा रक्षक है। वह मुझे त्राण देता है और बहते हुए खून को अपने फावे से पोंछ देता है। जगत मेरी इच्छा समझ गया। अँधेरे भरे एकान्त कमरे में जिसके ऊपर एक रोशनदान से धुँधला प्रकाश आ रहा था, हम दोनों जाकर धप् से बैठ गए। और लगभग दस मिनट तक चुपचाप बैठे रहे। पानी पिया और उसके बाद एक-एक कप चाय। मैंने जगत से कहा, ‘हम कितने अकेले हैं! जीवन में कहीं कोई ‘मीनिंग,’ कोई अर्थ चाहते हैं, और वह भी मिल नहीं पाता।’ जगत ने अंग्रेज़ी में कहा, ‘यह इसलिए है कि हममें संकल्पशक्ति नहीं है। अगर हम इन्हें दुतकार दें तो ये हमारा क्या कर लेंगे?’ मैं पल-भर चुप रहा। फिर कहा, ‘दुतकारना आसान है। मेरी भी यह पन्द्रहवीं नौकरी है। लेकिन पेट पालना बहुत मुश्किल है। मेरे घर में सारे दुर्भाग्य मौज़ूद हैं–लम्बे-लम्बे रोग, भारी क़र्ज, कलह और मानसिक अशान्ति बीसियों साल से घर किए बैठे हैं। उन्होंने मुझे भी चुना है। बाल-बच्चों को सड़क पर फेंककर भले ही मैं कुछ कर जाऊँ, लेकिन मैं इतना कठोर नहीं हो पाता, शायद कोई भी नहीं हो सकता।’ मैंने जगत से कहा, ‘हमें अपने वर्ग में रहने का मोह है, निचले वर्ग में जाने से डर लगता है। लेकिन क्रमश: हमारी स्थिति गिरते-गिरते उन जैसी ही होती जाती है।...तो वहाँ सहर्ष ही क्यों न पहुँच जाएँ। लेकिन वहाँ भी मुक्ति नहीं है, क्योंकि उस स्थान पर उत्पीड़न घोरतर है।... ‘और फ़ासले? कितने फ़ासले हैं, हमारे और तुम्हारे बीच में, तुम्हारे और भनावत के बीच में, भनावत के और किसी के बीच में। ये दिल मिलने नहीं देते।’ और ठीक इसी क्षण में जगत न मालूम किस स्फूर्ति से चल-विचल हो गया। वह बीच में कूद पड़ा। उसने मेरे आत्म-निवेदन में हस्तक्षेप किया और कहने लगा, ‘अमरीकी लेखकों ने भी इसी तरह की परिस्थितियों का सामना किया है। यह कोई नई परिस्थिति नहीं है।’ मैं सिर्फ़ हँस दिया, यद्यपि जगत की बात में सत्य था। और फिर हम मशीन की भाँति वहाँ से उठ खड़े हुए। कोई निश्चय–अस्पष्ट और अधूरा–मेरे दिमाग़ में चल-विचल होने लगा। मैंने मुँह लटकाकर रास्ते में जगत से कहा, ‘आदमी-आदमी के बीच के फ़ासले दूर कैसे होंगे?’ जगत ने एक गहरी साँस ली। उसने कहा, ‘उनको बातचीत से दूर नहीं किया जा सकता, क्योंकि वहाँ तरह-तरह के भेदों के दलदल हैं।’ तब मैंने मानो ज़ोर से चीख़कर कहा, ‘हाँ, हमें इस दलदल को सुखाना होगा। लेकिन उसके लिए तो किसी ज्वालामुखी की ही आग चाहिए।’ बातचीत और भी थकाए डाल रही थी। एक अबूझ और बेपहचान दर्द भर रहा था। लगता था, हम किसी अँधेरी सुरंग में भटकते-भटकते अब यहाँ पहुँचकर एक दीवार का सामना कर रहे हैं, जिसके आगे रास्ता नहीं है। <!--nextpage> [7] ज्यों ही हम बग़ीचे में वापस पहुँचे, दूर से दिखलाई दिया, दरबार लगा हुआ है। एक गहरी झेंप हमारे चेहरे पर छाने का प्रयत्न करने लगी। केन्द्र में हमारे बॉस बैठे हुए थे। बॉस ठिगने क़द और चौरस-चिकनी पीठ के व्यक्ति थे, जिनके गोल चेहरे पर तिकोनापन था। एक छोटी संवेदनशील नाक थी और छोटी-सी ठुड्डी। आँखें बड़ी-बड़ी और गोल थीं। एक क्षण-भर में वे क्रोध में उत्तेजित हो सकते और दूसरे ही क्षण ठंडे होकर मुसकराकर कोई मज़ेदार क़िस्सा सुना सकते थे। उन्हें देखकर मेरे हृदय में अनायास प्यार उमड़ता। उनके व्यक्तित्व में एक चमत्कार अवश्य था। वैसे वह बहुत बुलन्द आदमी थे और किसी के आगे झुकना उनसे न हो पाता, यद्यपि किसी भावावेश में आकर वे नम्र-हृदय भी हो सकते थे। इस समय उनके चेहरे पर एक मुसकराता प्रेम-भाव और आँखों में आद्र तल्लीन दृष्टि थी, जो यह बताती थी कि उनमें सुकुमार कल्पना-चित्र उत्तेजित होकर नए-नए कोमल भाव तरंगित करते रहते हैं। उनके पास श्री भनावत बैठे हुए थे। ऐसा लगता था कि उन्होंने अपना बोलना अभी ही बन्द किया है और उनके मस्तिष्क में अब भी वाक्य-चित्र उभरते जा रहे हैं। जब ऐसा होता है तब वे साधारणत: अपनी एक जाँघ पर दूसरा पैर रखकर धड़ को आगे करके किसी उत्तेजित किन्तु गम्भीर भाव-प्रवण मुद्रा में सामने झुके हुए दिखाई देते हैं। इस समय भी उनकी मुद्रा इसी प्रकार की है। उनके पास अपने को अस्तित्वहीन बनाकर, नि:शेष बनाकर, एक नामहीन छाया बैठी हुई है, जो इतनी पीली है कि ऐसा लगता है, मरघट में से, चिता पर से अभी उठकर चली आई है। ये सज्जन गणितशास्त्री हैं। उनकी बग़ल में एक महोदय बैठे हुए हैं, जिनकी बैल की-सी मोटी गरदन पर एक नीला रूमाल लिपटा हुआ है। ये महोदय ठिगने और चौड़े तो हैं ही, उनके चेहरे जड़ी हुई आँखें बहुत बारीक हैं और एक आँख तो है भी नहीं। उनके माथे की ढाल ऊपर से नीचे की ओर जा रही है। माथा एकदम छोटा, तंग है; उसकी चौड़ाई तीन अंगुल से शायद ही बड़ी हो। सिर लगभग चपटा है और पीछे की तरफ़ एकदम समाप्त होता है, जिससे यह लगता है कि गरदन ही सिर पर चढ़ गई है। चेहरा खूब भरा हुआ, गोल और छोटा है। नाक, छोटी, तीखी और संवेदनशील है और होंठ छोटे-छोटे हैं। कुल मिलाकर लोग उनकी तरफ़ एकदम आकर्षित होते हैं, किन्तु उन पर उस व्यक्तित्व का प्रभाव बुरा पड़ता है। इस समय, उनके मुँह में चॉकलेट की गोलियाँ भरी हुई हैं–जेब में तो वे उन्हें हमेशा रखते ही हैं। उनके पास कुरसी पर एकदम दुर्बलकाय ऊँची लड़की बैठी हुई है जिसके लम्बे चेहरे पर चश्मा चढ़ा हुआ है। सारा चेहरा लम्बी सलवटों में बाँटा जा सकता है। और वह ऐसा बिगड़ा हुआ-सा लगता है मानो उन्होंने कोई निहायत कड़वी दवा अभी-अभी खाई हो और उसकी डकार ऊपर आ रही हो और आ न पाती हो। वे रसायन शास्त्री हैं। उनकी बग़ल में एक भीमकाय व्यक्ति बैठे हुए हैं जिनकी पीठ कम-से- कम ढाई फ़ीट ऊँची होगी और खूब चौड़ी। वे जब हँसते हैं तो ऐसा लगता है कि प्रतिध्वनि की लहरों से कहीं दरख्त ही न टूट पड़े। उनका चेहरा ऐसा भूरा-सफ़ेद है जैसे बैल का पुट्ठा हो; वह ऊपर से गोल, मांसल और नीचे से एकदम तिकोना और पुष्ट है। वे भी चश्मा पहने हुए हैं और ऐसा लगता है जैसे वे हर चीज़ को घूरकर देख रहे हों। वे भूरी नेहरू-जैकेट पहने हुए हैं और इस समय हाथ में रखे अपने डंडे को हिला-डुला रहे हैं। वे संस्कृत के विद्यावारिधि हैं। उन्होंने भारतीय संस्कृति पर एक शोध-ग्रन्थ भी लिखा है। वे यहाँ काफ़ी प्रतिष्ठित माने जाते हैं। सिर्फ़ मिस्टर भनावत उन्हें छेड़ते रहते हैं। उनकी बग़ल में कुरसी पर दो दुबले-पतले सज्जन सिमटे-सिमटे बैठे हैं, मानो उन्हें यह नज़ारा भयभीत कर रहा हो। दोनों सूट-बूट से लैस हैं और लगता है कि उनमें से हर एक का सूट कम-से-कम ढाई-सौ रुपयों का तो होगा। उनमें से एक की नेकटाई लाल और दूसरे की नीली है और वे सिर्फ़ इस डर में हैं कि कहीं उनके सम्बन्ध में चर्चा न छिड़ जाए। उनकी बग़ल में बड़ी ही गौरव-भावना और शालीनता के साथ कंजी आँखोंवाला एक गोरा नवयुवक बैठा हुआ है जिसके बारे में यह कहा जाता था कि कॉलेज के ज़माने में उस पर कई लड़कियाँ मरती थीं। वह इस समय सादी पोशाक में अपने प्रभावशाली व्यक्तित्व में खोया हुआ है, मुसकरा रहा है। वे दर्शनशास्त्री हैं। उनके पास कुरसी के एक हिस्से पर झुककर और तिरछे होकर राव साहब बैठे हुए हैं, जिनके मुख-मंडल पर श्रम की थकान के साथ-ही-साथ सन्तोष की स्निग्धता भी विराजमान है। उनके बाजू में चार-पाँच कुरसियाँ ख़ाली पड़ी हैं। इस सब मंडली पर मौलसिरी के ऊँचे-पूरे, भरे-पूरे वृक्षों का सघन छायाप्र काश गिर रहा है। हमने बॉस को नमस्कार किया और चुपचाप अपनी कुरसियों पर जाकर बैठ गए। तीन-चार मिनट में हमने नए वातावरण में अपने-आपको जमा लिया, और अपेक्षा के भाव से चारों ओर देखने लग गए। किन्तु वातावरण पूर्ण प्रशान्त था। और मुझे समझ में नहीं आया कि ऐसा क्यों है? इतने में राव साहब के पास बैठे हुए चमकदार दर्शनशास्त्री ने कहा, ‘सा’ब, पारा-साइकोलॉजी में यही पढ़ाया जाता है!’ मैं समझ गया कि कोई बात पहले हो चुकी है। मैं इसलिए चुप रहा कि संस्कृत के विद्यावारिधि महोदय अपनी गडग़ड़ाती आवाज़ में पारा-साइकोलॉजी का पुराना उदाहरण बताने लगे जो उन्हें किसी जगह पढ़ने को मिला था। असल में वह पिशाच-बोध का उदाहरण था। लोगों ने उनकी कहानी का अच्छा-ख़ासा रस लिया, साथ ही उनके व्यक्तित्व का भी। पता नहीं कैसे उनकी कहानी के सिलसिले में ही अपराधों की चर्चा चल पड़ी, जो एक ब बइया अँगरेज़ी साप्ताहिक में निकला करती थी। अपराधों पर होती हुई वह धारा महाराजा तुकोजीराव होलकर तक गई और वहाँ से बहती हुई वेश्याओं तक आई। फिर संस्कृत के विद्यावारिधि ने गणिका और वेश्या का भेद बताया और फिर उन शहरों पर चर्चा चल पड़ी जहाँ वेश्याओं के प्रसिद्ध मुहल्ले हैं। फिर उन शहरों की अन्य विशेषताओं पर दृष्टि जाते ही यूनिवर्सिटियों के प्रशासन पर चर्चा चल पड़ी और फिर विद्यार्थियों की अनुशासनहीनता की घाटी में बहती हुई वह राजनीतिज्ञों पर गई और वहाँ से बम्बई चुनाव तक आ गई। कृष्ण मेनन के चेहरे पर भी चर्चा चली और वहाँ से वह अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति का किनारा छूती हुई राजनीतिज्ञों द्वारा दी जानेवाली पार्टियों तक पहुँची। और उन पार्टियों से बहती हुई वह शराब के क़िस्सों तक आई और फिर वहाँ से अँगरेज़ों के खान-पान से होती हुई वह महाराष्ट्रीय ‘वरण’ और ‘पूरण पोली’ तक पहुँची। और फिर एक विस्फोट की भाँति मोटी गरदनवाले अर्थशास्त्री से प्रश्न पूछा गया, (पूछनेवाले स्वयं बॉस थे) ‘बताओ तुम कितने रसगुल्ले खा सकते हो?’ मिस्टर रामभोज ने कहा, ‘यही, लगभग दो सेर!’ बॉस ने कहा, ‘तीन सेर खाओगे?’ रामभोज ने कहा, ‘नहीं, इतना नहीं खा सकते।’ ‘अच्छा, तुम्हें पाँच रुपए दूँगा, अगर तुम इतना खा जाओ तो।’ ‘नहीं सा’ब, इतनी कम क़ीमत में इतनी तक़लीफ़ नहीं उठाई जा सकती।’ ‘अच्छा, दस रुपए दूँगा।’ मोटी गरदनवाले महोदय एकदम उठ खड़े हुए और कहने लगे, ‘एकदम तैयार हूँ, इतनी मिठाई तो बचपन में खा जाता था।’ और ठहाका मारकर हँसने लगे। मिस्टर रामभोज के लिए तीन सेर, हम सब लोगों के लिए दो सेर, मिठाई का ऑर्डर दिया गया। यद्यपि लोग उकताए हुए थे (क्योंकि इसी तरह की बातें ज़रा उलट-फेर के साथ रोज़ चलती थीं), मिठाई की प्रतीक्षा में बैठे रहे और उठ पड़ने के ज़बरदस्त मोह को दबा गए। कि इतने में... दूर से, एक चमकदार आदमी और उसके साथ दो-तीन आदमी और आते दिखाई दिए। वे अभी बोगनविला से लदे फ़ाटक के पास ही थे। चमकदार आदमी, काला महीन ऊनी पैंट और सफ़ेद बुश- कोट पहने हुए ऊँचा गोरा-चिट्टा व्यक्ति था। उसका चेहरा लम्बा था, जिस पर कुलीन आभिजात्य की आभा फैली हुई थी, जो उसकी आत्म-विश्वासपूर्ण चाल-ढाल, मज़ाक़-भरी मुसकराहट और उँगलियों में फँसी सिगरेट की राख झिड़कने की तरक़ीबों से प्रकट हो रही थी। काले फ्रेम के चश्मे के ऊपर, दो-चार रेखाओंवाले माथे के नीचे घनी-घनी भौंहे थीं और कान के ऊपर दो-चार लम्बे बाल ऊँचे उठे थे। वह इस तरह चल रहा था जैसे यहाँ का सारा इलाक़ा उसी का है। वह लम्बी आसान डगें बढ़ाता हुआ चला आ रहा था। उसके पीछे एक छोटे क़द का गोरे रंग का पचास-साला आदमी चल रहा था, जिसके आगे के दाँत टूटे हुए थे। उसका छोटा लम्बा चेहरा पान की पीक से भरा था। वह खद्दर की पोशाक में लैस यहाँ का कांग्रेसी एम.एल.ए. था। उसकी चाल-ढाल ऐसी थी कि लोगों को यह भय था कि कहीं फिर से यहाँ का चुनाव न हो। उसके पीछे एक लम्बा, काला पहाड़ी क़द का आदमी चल रहा था जिसका हर अंग सुडौल, मजबूत और भरा-पूरा था। उसके चेहरे पर चिकने पत्थर की कठोर स्निग्धता थी। साथ ही उसका मुख-मंडल चमचमा रहा था। यद्यपि वह मुँह पर तेल नहीं लगाता था, लेकिन चेहरा तेलिया दिखता था। वह पैंट और बुश-कोट पहने हुए था। उसकी पोशाक गन्दी थी। वह ईसाई मोटर-ड्राइवर था। नए आगन्तुकों को देखकर हममें से कुछ लोग बेचैन होने लगे, कुछ अपनी सीट छोड़कर बेचैन होना चाहने लगे। नीले रूमालवाली मोटी गरदन ने इधर-उधर ताकना शुरू किया। मैं सबसे पहले उठकर मीटिंग भंग करने की पहलक़दमी करते हुए एक पेड़ की छाया में चहलक़दमी करने लगा। धीरे-धीरे इधर-उधर देखकर किसी-न-किसी गुन्ताड़े या बहाने से लोगों ने उठना शुरू किया। मेरे पास जगत, भनावत और राव साहब आकर खड़े हो गए। राव साहब की चाँदी की डिबिया खुल गई। पान की लूट मची। हर आदमी ने दो-दो गिलौरियाँ मुँह में जमाईं– यहाँ तक कि जगत ने भी। डिब्बा ख़ाली होते देख हम सब प्रसन्न होकर हँसने लगे। मुझे राव साहब का लाड़ आ गया। मैंने उन्हें एकाएक छाती से चिपका लिया और उनके सामने उनका दिया एक रुपया वापस करते हुए कहा, ‘भनावत ने चाय पिला दी थी। मेरे पास भी चिल्लर थी। यह लीजिए, आपका एक रुपया वापस।’ ‘रखो न भई, रखो न भई! अभी तो बहुत ज़रूरत पड़ेगी।’ मिस्टर भनावत ने उद्दंडतापूर्वक उसे छीनना चाहा और कहा, ‘समझते नहीं होंगे! अभी तो भोजन भी नहीं हुआ है। इस समय साढ़े-बारह बजे हैं। महफ़िल चलेगी रात के कम-से-कम दस बजे तक। रुपया तो अपने को लगेगा ही–घूमने-घामने के लिए।’ राव साहब पान चबाते हुए प्रेम-पूर्वक भनावत के चिबिल्लेपन को देख रहे थे। उसकी नोक उन्हें कई बार गड़ चुकी थी। लेकिन वे अब उसका आनन्द भी लेते थे। असल चीज़ यह है कि मिस्टर भनावत लोगों के ऐब देखने में बहुत होशियार थे। अगर ये सिर्फ़ ऐबों को देखते रहते तब भी कोई बात नहीं थी; वे उन कमज़ोरियों को अपने क्रीड़ा-व्यवहार का विषय बनाते। यह बड़ी ख़तरनाक बात थी। ऐसे लोग दुश्मन पैदा कर लेते हैं। और अगर यहाँ उनके कई शत्रु नहीं हुए तो इसका कारण यही था कि यहाँ के लोग अत्यन्त सदाशय थे और किसी की चार बातें सह लेना जानते थे। भनावत ने बताया, ‘यह जो बॉस के पास बैठे हुए सुनहरे और ऊँचे-पूरे व्यक्ति हैं, जो बुश-कोट पहने हुए हैं और बड़ी अदा-ओ-अन्दाज़ के साथ सिगरेट पी रहे हैं, वे यहाँ के एक रईस हैं। अपने शहर के पास की ज़मींदार (विधवा स्त्री है वह) के दीवान के वे लड़के हैं। उनकी अपनी कोई कमाई नहीं, उनकी अपनी कोई मेहनत नहीं है। उन्होंने सिर्फ़ विधवा ज़मींदारिन के साथ मेहनत की है (हम सब लोग हँसते हैं) उसी का शुभ परिणाम वे भोग रहे हैं। शहर में पूछ लीजिए, उनके अपने घरवालों से पूछ लीजिए, वे सब वही कहानी बताएँगे, क्यों राव साहब?’ राव साहब को काटो तो खून नहीं। वे स्तब्ध हो उठे। और कुछ नहीं बोले। भनावत आगे कहता गया, ‘यहाँ के कई रईसों को बिगाड़ने और धूल में मिला देने का कार्यक्रम उन्होंने सफल करके दिखाया। कई रईस उनकी सोहबत में प्रसिद्ध शराबी और रंडीबाज होकर चौपट हो गए। अब वो अपने बॉस के साथ बिज़नेस करना चाह रहे हैं। हर तीसरे साल कार बदलते हैं और हर दूसरे साल प्रेमिका!’ राव साहब ने खँखारने की, गला साफ़ करने की चेष्टा की। नाक में से स्वर का एक विस्फोट किया और कहा, ‘अपने बॉस उनके चक्कर में नहीं आ सकते।’ भनावत ने कहा, ‘लेकिन, बिज़नेस तो कर ही रहे हैं।’ राव साहब बोले, ‘वो बॉस के सामने टिक नहीं सकते।...बिज़नेस बिज़नेस है!’ मुझे इस बातचीत से वितृष्णा हो उठी। मुझे बिज़नेस नहीं दीखता था, वरन् मानव-समुदाय दीखते थे जो विशेष-विशेष स्वार्थों और हितों की दिशा में कार्यशील थे। मुझे मानव-समुदायों में के ख़ास व्यक्ति और उनके व्यक्तित्व, उनके परस्पर-सम्बन्ध और उनकी जीवन-प्रणाली दीखती थी। मन में उत्पन्न वितृष्णाजनक जीवन-चित्रों से मुक्ति पाने के लिए मैं वहाँ से हट गया और दूर फ़व्वारे की तरफ़ देखने लगा, जिसके कुंड में सिर्फ़ गली मिट्टी और सड़ा हुआ पानी था, जिसकी भीतर गई सीढ़ियों पर हाँफते हुए मेढक अपनी भद्दी, खुली-खुली, चमकीली बटननुमा आँखों से दुनिया को देख रहे थे। मैंने कई बार कहा था कि इस फ़व्वारे को चालू कर दिया जाए और उसकी टोंटी सुधार दी जाए और कुंड साफ़ किया जाए। लेकिन किसी ने मेरी बात न सुनी। फ़व्वारे के कुंड से हटकर बॉस की खुशनुमा मेहराब पर चढ़ी गुलाब की बेल के नीेच गुज़रता हुआ मैं बूढ़े युक्लिप्ट्स के उस पेड़ की ओर जाने लगा जिसका तना, सिर्फ़ तना, आम के दरख्तों से ऊपर निकल आया था, और जिसकी शाखाएँ आकाशोन्मुख होती हुई फैल गई थीं। वहीं हरी चम्पा (मदनमस्त) के छोटे पेड़ थे, जिनकी घनी टहनियाँ प्रसन्न और शान्त दिखाई दे रही थीं। इस आशा से कि मैं उसका एकाध फूल तोड़ सकूँगा, वहाँ पहुँचा ही था कि उस पेड़ के पीछे से टेरिलिन की पैंट पहने हुए गठियल, ठिगने, कंजी आँखवाले दर्शनशास्त्री का चमकीला चेहरा सामने आया, जिस पर उदासी और उकताहट की मटमैली आभा फैली हुई थी। मुझे देखकर अपने शरीर को ढील दे वे एक पैर पर ज़ोर देकर खड़े हो गए और चिन्ताशील आँखों से मुझे देखने लगे। मैंने उनसे हाथ मिलाया और उस हाथ मिलाने में ही मुझे मालूम हो गया कि, पल-भर के लिए ही क्यों न सही, दिल मिल गया है। मैं क्षण-भर के लिए उन उदास शिथिल कंजी आँखों के कत्थई सितारे देखने लगा कि इतने में उसने अँगरेज़ी में कहा, ‘मान लीजिए कि यहाँ एक हत्या हो गई है...’ चौंकते हुए मैंने जवाब दिया, ‘कितना बुरा विचार है!’ उसने कह डाला, ‘लेकिन कितना मौज़ूँ है। हम तो सा’ब ख़यालों की मौज़ूनियत देखते हैं।’ मैं मुसकरा उठा। किसी की हत्या हो या न हो, हमारी तो हो रही थी। यह साफ़ था। और मुझे देवकीनन्दन खत्री के उस तिलिस्म की याद आई जिसमें से बाहर निकलना असम्भव था, लेकिन जिसके भीतर के प्रांगणों में बग़ीचे भी थे, तहख़ाने भी थे और जिसमें कई नवयुवतियाँ और किशोरियाँ गिरफ़्तार रहती थीं। वे घूम-फिर सकती थीं, तिलिस्मी पेड़ों के फल खा सकती थीं, लेकिन अपनी हद के बाहर नहीं निकल सकती थीं। ये हदें वे दीवारें थीं जो पहले से ही बनी हुई थीं और जिनको तोड़ पाना लगभग असम्भव था, अथवा जिन्हें तोड़ने के लिए अपरिसीम साहस, कष्ट सहन करने की अपार शक्ति, और धैर्य तथा वीरता के अतिरिक्त विशेष कार्य-कौशल और गहरे चातुर्य की ज़रूरत थी। मेरी आँखों में उस गहरे अँधेरे तिलिस्म के तहख़ानों और कोठरियों के बाहर के मैदानों में घूमती हुई लाल-पीली और नीली साड़ियाँ अब भी दीख रही हैं, उनके मुरझाए गोरे कपोल और ढीली बँधी वेणियों की लहराती लटें भी दीख रही हैं, और मन-ही-मन मैं कल्पना कर रहा हूँ कि क्या यहाँ फैले हुए बहुत-से लोगों की आत्माएँ इसी प्रकार की तो नहीं हो गई हैं।...लेकिन प्रश्न तो यह है कि यह तिलिस्म कैसे तोड़ा जाए! मुझे अपने में खोया जान दर्शनशास्त्री ने पूछा, ‘कहाँ गुम हो गए हो? लो, यह फूल लो!’ मदनमस्त का फूल सचमुच खूब महक रहा था। उसकी मीठी-मीठी महक दिल की राख पर फैल तो गई लेकिन ज़हरीली हो गई और उस ज़हर को मैं धीरे-धीरे सूँघता रहा। दर्शनशास्त्री मेरे सम्मुख उपस्थित हो गया और मेरा हाथ पकड़ बग़ीचे की उस मुँडेर की ओर जाने लगा जहाँ हमारे मकानों के पिछवाड़े में लगे हुए केले के लम्बे-लम्बे चमकदार पत्तोंवाले झाड़ झूम रहे थे। उसने मुझे अपने विश्वास में लेते हुए कहा, ‘सुनो, मैं जल्दी ही यहाँ से चला जाऊँगा!’ ‘सचमुच?’ ‘हाँ।’ मैं एकदम चुप रह गया। अपने अकेलेपन का दु:ख मुझे गड़ उठा। मुझे अभी से उस स्थिति की याद आने लगी, जब वह चला जाएगा और मैं निस्संग रह जाऊँगा। (यद्यपि मैं उसके साथ के बावज़ूद अकेला था!) मैंने दर्शनशास्त्री मिस्टर मिश्रा से कहा, ‘तुम जवान हो, तुम्हें तो ज़िन्दगी में ज़रूर साहस करना चाहिए और नई तलाश में जाना चाहिए। लेकिन...मैं? मैं कहाँ जाऊँगा! मेरे सात बच्चे हैं और माता-पिता की भी ज़िम्मेदारियाँ हैं। रोग, क़र्ज़ और तरह-तरह की उलझनें मुझ पर हैं!’ और मैं उसाँस लेकर चुप हो गया। दर्शनशास्त्री कुछ नहीं बोला। वह मेरे घर की हालत जानता था। और मेरे सामने अब यह सवाल था कि मैं कहीं अगले संघर्षों में ही टूट तो नहीं जाऊँगा! क्योंकि अब मेरा शरीर भी साथ नहीं देता। तो क्या मैं अब यहीं बैठा रहूँ? और मेरे सामने, आज के यथार्थ के काले भयानक अँधेरे चित्र आने लगे, मुझे वह आदमी याद आने लगा, जो परदेश में सालों से बीमार रहा, लेकिन अपने स्नेहियों से सिर्फ़ अपनी लाश उठवाने के लिए, अन्तिम क्षण में उनके स्पर्श के लिए, तरसता हुआ देश आ गया। और फिर उसी कुट्ठर में रहने लगा, जहाँ वह पहले रहता था, और अपने कुट्ठर-वास के दो दिन बाद ही उसकी मृत्यु हो गई। मैं आज से दस साल पहले अपने दफ़्तर जाते वक़्त उस रास्ते से गुज़रता जिस पर उस मिट्टी के अँधेरे कुट्ठर का दरवाज़ा खुलता था, और मेरी आँखें उस व्यक्ति की ओर आकर्षित हो चुकी थीं, क्योंकि वह एकदम पीला पड़ गया था और पाँव पसारे हुए हाथ के बल चलता था। कहीं ऐसी दशा मेरी भी न हो! हाय! ...कि इतने में किसी पेड़ से टूटा एक पत्ता मेरे शरीर पर आ गिरा। मैंने अनजाने ही उसे उठा लिया और उसके घने-हरे रंग में टहलती हुई नसों को देखने लगा। उसमें जवानी थी। नया रक्त था। मुझे उस पत्ते को चूमने की और अपने गालों पर उसे लगा लेने की तबीयत हुई गोकि मैंने संकोचवश वैसा किया नहीं। इतने में जगत पीछे से दौड़ता हुआ आया और उसने हाँफते हुए समाचार दिया,‘रूस ने एक और आदमी आसमान में छोड़ दिया! टिटोव! वह अब तक अठारह बार प्रदक्षिणा कर चुका है!’ दर्शनशास्त्री मिस्टर मिश्रा और जगत की होड़ लगा करती थी। मिश्रा ने पूछा, ‘तो तु हें तो बहुत बुरा लगा होगा, जगत। साला रूस क्यों आसमान में पहुँच रहा है! उसे तो नष्ट होना चाहिए था!’ मिश्रा ने जगत पर भद्दा अटैक किया था। मैं क्या कर सकता था? जगत चुप रहा। मिश्रा कहता गया, ‘लुमुम्बा की कविता जगत ने नहीं पढ़ी, पढ़ नहीं सका, उसके दोस्तों के विरुद्ध जाती थी। लोग क युनिस्टों को गालियाँ देते हैं कि वे रूस-चीन की ओर देखते हैं। लेकिन ये साले न सिर्फ़ ब्रिटेन-अमरीका की तरफ़ देखते हैं, उनके बैंकों में अपने रुपए रखते हैं। क्यों बे साले, तू ऑक्सफ़ोर्ड या हॉर्वर्ड जा रहा था न? तेरे पास इतना फ़ॉरेन एक्सचेंज कहाँ से आया? तेरा अन्तर्राष्ट्रीय पूँजीवाद (एक भद्दी गाली) साला, यहाँ से लेकर तो अमरीका तक एक ज़ंजीर में बाँधे हुए हैं, पैसों की ज़ंजीर में।’ बेचारा जगत! भूला-भटका जगत! ओफ! गुस्से से लाल हो उठा। उसे महसूस हुआ कि उस पर झूठा आरोप लगाया जा रहा है। वह तो अमरीकी ‘साहित्य’ का प्रेमी है। अकस्मात् जगत ने मिश्रा पर बुरी तरह अटैक कर दिया था। पीछे से उसकी मोटी कमर पकड़कर उसके सन्तुलन को बिगाड़ते हुए उसे नीचे गिरा दिया, कि इतने में मिश्रा ने उसे अपने आलिंगन में जकड़ लिया, इतनी ज़ोर से उसे कसा, और इतनी ज़ोर से हँस पड़ा कि जगत हक्का-बक्का रह गया! मिश्रा ने कहा, ‘हमारे-तुम्हारे बीच कोई झगड़ा नहीं है, जगत! तुम्हारा-हमारा प्राकृतिक सह-अस्तित्व है क्योंकि हम दोनों एबी लॉर्ड्स हैं!’ एबी लॉर्ड! मेरे दिमाग़ में एक बिजली कौंध उठी! एक अर्थ मुझ पर वज्र सा गिर पड़ा! एबी लॉर्ड! शिखंडी सन्त जिसने अपनी जननेन्द्रिय को चाकू से काट दिया था! सन्त बने रहने के लिए!* और मैंने एकाएक अपनी दिल की धड़कन सुनी कि निर्बल होकर सन्त और...बनने के बजाय सबल होकर सृजन-शक्ति को तेज़, और तेज़ करूँगा, भले ही लोग मुझे बदनाम करें,...मगर मुझे इसे तेज़ रखना ही पड़ेगा।

यहाँ तक का अंश ‘विपात्र’ कहानी के रूप में ज्ञानोदय 1965 में और फिर ‘काठ का सपना’ संग्रह प्रकाशित हुआ था। उपन्यास के रूप में प्रकाशित होने पर इस अंश के प्रभावी समापन के लिए अगली तीन पंक्तियाँ और जोड़ी गईं।–सं.।