स्वामी और महात्मा - (सुशोभित)

 

स्वामी विवेकानंद और महात्मा गाँधी की भेंट होते-होते रह गई थी। गाँधीजी उनके दर्शन करने पहुँचे थे, किंतु स्वामी जी अस्वस्थ होने के कारण मिल न सके।

यह साल 1901 की बात है। तब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन कलकत्ता में हुआ था। दीनशॉ वाच्छा कांग्रेस के अध्यक्ष थे। वह बम्बई के शेर कहलाने वाले सर फ़ीरोज़शाह मेहता का ज़माना था। कांग्रेस में वाच्छा, तैयबजी, नौरोजी का वर्चस्व था। संगठन में तिळक और गोखले की धाक थी। पुणे में दोनों के भिन्न गुट थे। गाँधीजी 32 साल के नौजवान थे और दक्षिण अफ्रीका में वकालत करते थे। साथ ही वहाँ बसे भारतवंशियों के अधिकारों की लड़ाई लड़ते थे। गोखले के निर्देश पर वे भारत आए। कांग्रेस का यह पहला ही अधिवेशन था, जिसमें सहभागिता करने का अवसर उन्हें मिला।

दिसंबर के जाड़े वाले उस दिन पूरे समय बड़े नेताओं के अंग्रेज़ी में भाषण होते रहे। आख़िर में रात ग्यारह बजे जब कार्यक्रम ख़त्म होने को आया, तब किसी ने कहा कि उस दक्षिण अफ्रीका वाले युवक को भी तो बोलना था। तब गाँधीजी को बोलने के लिए पाँच मिनट का समय दिया गया। उन्होंने परदेश में भारतीयों के दु:खों का बखान करना आरंभ ही किया था कि घंटी बज गई। यह घंटी इस बात का द्योतक थी कि प्रस्ताव के वाचन में दो मिनट और शेष हैं। किंतु गाँधीजी घंटी सुनते ही चुप होकर बैठ गए। वे अत्यंत संकोची थे। उन्होंने समझा समय समाप्त हो गया है। यह तीन मिनट का प्रस्ताव पढ़ने के लिए वे दक्षिण अफ्रीका से यहाँ आए थे।

अधिवेशन के बाद वे एक महीना गोखले के साथ रहे। इस समय का उपयोग उन्होंने कलकत्ता भ्रमण और महापुरुषों के दर्शन में किया। वे प्रतापचंद्र मजूमदार का व्याख्यान सुनने गए। ब्रह्मसमाज में पंडित विश्वनाथ शास्त्री के दर्शन किए। महर्षि देवेंद्रनाथ ठाकुर के यहाँ गए, किंतु भेंट न हो सकी। सबसे अंत में वे पैदल ही बेलुर मठ गए। स्वामी जी का दर्शन करने की उत्कंठा थी। आत्मकथा में उन्होंने लिखा है यह कैसे संभव था कि मैं स्वामी विवेकानंद के दर्शन नहीं करता? किंतु भेंट न हो सकी। गाँधीजी भगिनी निवेदिता से मिलकर ही लौट आए।

स्वामी जी पहले ही विश्ववंद्य हो चुके थे। गाँधीजी लगभग अज्ञात थे और कांग्रेस में भले कुछ उनसे परिचित हों किंतु भारत में उन्हें कोई नहीं जानता था। दक्षिण अफ्रीका में भी अभी उनका सत्याग्रह आरंभ नहीं हुआ था। जिस वर्ष यानी 1893 में स्वामी जी ने शिकागो की धर्म-संसद में अपना विश्वजयी व्याख्यान दिया, उसी वर्ष गाँधीजी वकालत के सिलसिले में दक्षिण अफ्रीका पहुँचे थे। उसी वर्ष पीतरमारित्ज़बर्ग में कुली कहकर उन्हें रेलगाड़ी से उतार दिया गया था। अगर 1901 में गाँधीजी की स्वामी जी से भेंट हो जाती तो वह एक अपूर्व अवसर होता।

स्वामी विवेकानंद और महात्मा गाँधी : इन दो महामानवों ने सकल-विश्व में भारत की आध्यात्मिक-चेतना के प्रसार का जो कार्य किया, वह अतुल्य था। ना इनसे पहले, ना इनके बाद में फिर भारत को वैसी कीर्ति किसी और ने दिलाई। विवेकानंद ज्ञानयोगी थे। गाँधीजी नैतिक शिक्षक थे। वे राजनेता भी थे किंतु उनकी राजनीति धर्म और नीति से संचालित होती थी। विवेकानंद के गुरु परमहंसदेव थे और गाँधीजी के आध्यात्मिक शिक्षक श्रीमद् राजचंद्र थे, और अलबत्ता गुरु गुड़ चेला शक्कर की उक्ति दोनों ही पर लागू नहीं होती थी, किंतु अथाह वैश्विक यश उनके भाग्य में लिखा था। विश्व में भारत की कीर्ति आध्यात्मिक-नैतिकता की पूँजी की बदौलत ही पहुँच सकती है, इसमें संशय नहीं हो सकता है। स्वामी जी और महात्मा विश्व में भारत के सबसे वंदनीय दूत थे, और आज भी हैं।

स्वामी जी उस दिन बेलुर मठ में नहीं थे, अस्वस्थ होने के कारण गौरमोहन मुकर्जी स्ट्रीट स्थित अपने निवास पर थे। कुछ ही महीनों का उनका जीवन शेष रह गया था। किंतु अगर उन्हें तनिक भी आभास होता कि उनसे मिलने आया व्यक्ति भविष्य में भारतीय-चेतना का संवाहक सिद्ध होगा तो वे समस्त यत्न करके गाँधीजी से अवश्य मिलते और उन्हें आशीर्वाद देते। अगर उस प्रसंग पर इन दोनों का कोई चित्र उतरवाया जाता तो वह आज हम सबों के लिए सुख, गौरव और कौतूहल का निमित्त बनता, इसमें संशय नहीं है।