सतह से उठता आदमी (कहानी) : गजानन माधव मुक्तिबोध

 

अजीब घर है जिसके पिछले छज्जे में बैठकर लगता है, चारों ओर सटे हुए मकानों की दीवारें, छतें, जीने, खिड़कियाँ सिर्फ़ ज्यामितिक आकृतियाँ बना रही हैं।

कन्हैया धूल से भरी टेबिल के पास कुरसी पर बैठा हुआ एक रद्दी काग़ज़ पर उन सटे हुए मकानों की ज्यामितिक आकृतियाँ बनाता जा रहा है।

खूब धूप खिली हुई है, जिससे वे मकान नहाए हुए-से हैं, और उनके कत्थई, सफ़ेद, राख-जैसे, काले साँवले रंग उभरकर निखर उठे हैं। कन्हैया को लगा कि हाँ, इन मकानों की आकृतियों में पलनेवाला आदमी अरूप चित्रकार होगा, नहीं तो क्या।

इतने में एक पीले, दुबले, लम्बे चेहरेवाली लड़की चाय ले आती है। चाय से भाप उठ रही है। ऐसे सुनहले समय ऐसी बढ़िया चाय!

वह प्रसन्न हो जाता है। लड़की का जम्पर फटा हुआ है, और फ्रॉक भी। लेकिन, कन्हैया को उससे कुछ महसूस नहीं होता। क्योंकि वह जानता है कि यद्यपि यह एक प्राइमरी टीचर का घर है, फिर भी उसका यह अपना मकान है, पास के गाँव में सड़क से लगकर उसके खेत हैं, और घर में छह महीने का गेहूँ चावल, दाल और गुड़ भरा हुआ है। हाँ, यह ज़रूर है कि ये लोग क़ीमती शहराती कपड़े नहीं पहनते, या कम पहनते हैं। लेकिन, उनका भोजन अच्छा और रुचिकर होता है।

उसका अपना ख़याल है कि कुछ रोज़ में वह मास्टर साहब के पास पाँच सौ रुपए उधार लेने का प्रस्ताव भी रखेगा। (क्योंकि आख़िर ये लोग ब्याज-बट्टा भी तो करते हैं)

चाय पीने के बाद कन्हैया ने अपनी क़ीमती पैंट पर टैरीलिन की बुश्शर्ट चढ़ाई, जल्दी-जल्दी कंघी की। तेज़ उतारवाले ज़ीने पर सँभलकर पैर जमाते हुए नीचे के आँगन में पहुँचा, जो बहुत गीला था, क्योंकि वहाँ बरतन मले जाते और वहीं नहाया जाता था। एक पुराने ढंग के ठिगने दरवाज़े को पार कर वह तंग गली में घुसा। यह गली मकानों की पीठों को देखती हुई बढ़ रही थी। वह किसी दूसरी गली से जाकर मिली–एक टूटी-फूटी सड़क से, जिसकी छाती पर की गिट्टी उखड़ रही थी।

कन्हैया खुश था। खूब धूप छाई थी। नौ का वक़्त था। वह लम्बे डग बढ़ाता हुआ आगे बढ़ने लगा।

लगभग चार फ़र्लांग पर, पूरब की ओर, उसे एक बँगलानुमा घर मिला। वह खड़ा हुआ और पुकारने लगा, ‘कृष्णस्वरूप साहब, कृष्णस्वरूप!’

बहुत पुकारने के बाद, पैंट पहने हुए बड़े पेटवाला एक आदमी दरवाज़े पर दिखाई दिया। उसके हाथ में फूलों का गुलदस्ता था। और पास में पन्द्रह साल की लड़की। दोनों कोई बातचीत करते हुए दरवाज़ा खोलने आए थे।

कन्हैया ने उन्हें नहीं पहचाना। उसने सड़क पर से ही कहना चाहा, मैं कृष्णस्वरूप साहब से मिलना चाहता हूँ। लेकिन, वह उस लड़की की ओर ही देखता रहा। वह लड़की ख़ूबसूरत नहीं थी। उसके लाल टमाटर जैसे गाल बुरे लगते थे। बाल उलझे हुए और अस्त-व्यस्त थे। पंजाबी ढंग की पोशाक किए हुए थी, लेकिन वह उसे सजती नहीं थी।

क्षण-भर लगा कि यह कृष्णस्वरूप का घर नहीं हो सकता, ये लोग कोई और हैं। कि इतने में एक जोरदार हँसी के साथ आवाज़ फूट पड़ी, ‘ओफ़्फो, तुम कब आए? भई, वाह!’

तब कन्हैया को लगा कि वह कृष्णस्वरूप ही है। वह मारे खुशी के आगे बढ़ा और दोनों दोस्त चमकती हुई आँखें एक-दूसरे पर गड़ा-गड़ाकर देखने लगे। और एक दूसरे के बग़ल में पहुँच गए।

कन्हैयालाल के चेहरे पर खुशी आई हुई थी। बढ़िया चाय और नाश्ता कर चुकने के बाद, उसका बदन हलका-सा हो गया था। उसे इस कमरे का वातावरण बहुत अच्छा मालूम हुआ। दीवारें नीली थीं, खिड़कियों पर नीले परदे लगे हुए थे। एक छोटे-से खुशनुमा स्टूल पर रेडियो रखा हुआ था और रेडियो पर भी परदा था। एक ओर नीले रंग का उषा फ़ैन रखा हुआ था। खिड़कियों और दरवाज़ों से, बावज़ूद परदों के, धूप आ रही थी। वह स्वयं गद्देदार बढ़िया कोच पर बैठा था और सामने एक छोटी टेबिल रखी हुई, जिस पर एक सुन्दर ऐशट्रे थी, और वह सिगरेट पीता हुआ वहाँ बैठा था।

कन्हैया जहाँ बैठा था वहाँ से ठीक सामने के दरवाज़े में से आँगन का एक हिस्सा दिखता था। हाँ, यह सही है कि दाएँ ओर के बाजू से जो आँगन का हिस्सा दीखता है, उसमें एक टूटी खाट पड़ी है, और एक पुरानी अलमारी भी है जिसकी लकड़ियाँ सड़कर झूल गई हैं। साथ ही, एक पुरानी सिगड़ी जंग लगी हुई पड़ी है। एक अजीब अस्त-व्यस्तता और टूटे-फूटेपन का भान वहाँ हो रहा है।

कन्हैया को लगता है कि पिछली ज़िन्दगी का वह हिस्सा है, उस पिछली ज़िन्दगी का, जब कृष्णस्वरूप बिलकुल ग़रीब था। वह अस्त-व्यस्त दृश्य उस पुरानी ग़रीबी और पिछड़ेपन का ही तो प्रतीक है! पुराने और सामने दीखनेवाले इस नए का योग कन्हैया को भला मालूम हुआ।

कृष्णस्वरूप काम से ज़रा बाहर चला गया था। कन्हैया उस नीले एकान्त में सपनों में खो गया। लगभग बीस साल पहले कृष्णस्वरूप की कैसी दुर्दशा थी! कन्हैया ने उसे एक बार पाँच रुपए उधार दिए थे, जिन्हें कृष्णस्वरूप ने कभी वापस नहीं किया। आज उसी कृष्णस्वरूप के घर में सोफ़ा-सेट है, ऊषा फ़ैन है, रेडियो है। भई वाह! उन दिनों कृष्णस्वरूप रोज़ गीता पढ़ता था। और, आत्म-नियत्रंण के अनेक उपाय किया करता था।

घर में उसके झगड़ा रहता था। बीवी उससे चिढ़ती थी। इससे अनबन, उससे बेबनाव, हरेक अपने दुख का कारण दूसरे में ढॅूँढ़ता था। और, कृष्णस्वरूप कहता था कि हरेक का अपना व्यक्तिगत इतिहास है, और हरेक के व्यवहार का अपना-अपना औचित्य है। हर आदमी एक दूसरे की परिस्थिति है, एक-दूसरे का परिवेश है। हरेक आदमी फ़ासलों में खोया रहता है। कौन ग़लत है, कौन सही–इसका निर्णय नहीं हो सकता। यानी ऐसे निर्णय में बौद्धिक कल्पना की आवश्यकता होती है।

यह वही कृष्णस्वरूप है जो कहता था कि त्याग और आत्मदान ही जीने का एकमात्र उपाय है। क्यों? इसलिए कि ‘पैर उतने ही पसारो, जितनी चादर है’–यह सिद्धान्त था उसका। सिद्धान्त अपनी जगह सही था। लेकिन इसके औचित्य के लिए वह फ़िलॉसफ़ी लाता था। वह कहा करता था, ‘चाहिए, चाहिए, चाहिए’ ने सभ्यता को विकृत कर डाला है, मनुष्य-सम्बन्ध विकृत कर दिए हैं। तृष्णा बुरी चीज़ है। हमारा जीवन कुरुक्षेत्र है। वह धर्मक्षेत्र है। हर एक को योद्धा होना चाहिए। आसक्ति बुरी चीज़ है।

लेकिन, कभी-कभी कृष्णस्वरूप अपने आध्यात्मिक उच्चता-भाव को छोड़कर नीचे आ जाता। वह कन्हैया से चुपचाप कहा करता कि उससे मनोनिग्रह नहीं हो पाता। होटल में चाय पीता है, और बीवी की आँख चुराकर, किसी कोने में छिपाकर रखे पैसे झटक लेता है। यह बुरी चीज़ है। लेकिन, वह क्या करे! केवल ज्ञान काम में नहीं आता। उन दिनों कृष्णस्वरूप कन्हैया को यह कहा करता :

जानामि धर्मं न च मे प्रवत्ति:

जाना यधर्मं न च मे निवृत्ति:।

केनापि देवेन हृदिस्थिेतन

यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोस्मि।। 

हाँ, उन दिनों कृष्णस्वरूप यह भी कहता था कि उसके स्वप्न में शंकराचार्य, महात्मा गाँधी और जवाहरलाल भी आते हैं। कृष्णस्वरूप सचमुच कन्हैया को प्रभावित करता था। लेकिन, किस ढंग से?

हाँ, यही तो बात है, उसको फ़िलॉसफ़ी की ज़रूरत थी, इसलिए कि उसका जीवन दुर्दशाग्रस्त था। अपने मन को मजबूत बनाने के लिए फ़िलॉसफ़ी के पलस्तर की ज़रूरत थी। ऐसी फ़िलॉसफ़ी कन्हैया को हमेशा अप्राकृतिक मालूम हुई।

क्यों मालूम हुई? इसलिए कि कृष्णस्वरूप बड़ा ही हिसाबी आदमी था। खाने का तेल, सेर-भर, अगर नियत समय के पहले खर्च हो जाए तो वह बड़ी कड़ाई से पेश आता था। हर चीज़ घर में वह गिनकर और तौलकर रखता था। यहाँ तक कि अगर उसके किसी बालक ने घी ले लिया तो वह डाँट देता था। अचार की एक फाँक अगर किसी ने ज़्यादा ले ली, तो वह भड़कता था। अपने बच्चों का खाना उसकी आँखों में आ जाता था।

ऐसा था वह कृष्णस्वरूप! लेकिन, आज? वह खुशहाल तो है ही, खुशहाली से कुछ ज़्यादा है। उसकी चाल-ढाल बदल गई है। वह मोटा हो गया है। पेट निकल आया है। ढाई सौ रुपए का सूट पहनता है। सम्भवत: उसके पास इस तरह के कई सूट होंगे।

इनकम टैक्स की नौकरी सचमुच बड़ी अच्छी होती है। काश, कन्हैया भी उसी ऑफ़िस में काम करता!

इतने में कृष्णस्वरूप बाज़ार से बहुत-सी चीज़ें लाकर सीधे रसोईघर में घुस गया। वहाँ स्त्री से उसकी कुछ बक-झक सुनाई दी। वह वहाँ से फ़ौरन लौट पड़ा और ड्राइंगरूम में आकर कन्हैया से कहने लगा, ‘लीजिए, वह आपके सामने आती ही नहीं, उसे अभी भी शर्म मालूम होती है।’

‘तुम क्यों आधुनिक बनाने पर तुले हुए हो।–’ यह कहना चाहता था कन्हैया लेकिन, कहा नहीं। सिर्फ़ मुसकराकर रह गया।

इसके बाद कृष्णस्वरूप ने बड़े उत्साह और उत्कंठा से कन्हैया को अपने पूरे मकान में घुमाया। एक रसोईघर और आँगन छोड़कर वे सब कमरों में घूम आए। कृष्णस्वरूप उत्साह से सब बताता गया। कन्हैया भद्र सज्जन की भाँति तारीफ़ करता रहा। और अन्त में वे ड्राइंगरूम में चले आए। उससे लगे हुए एक कमरे में रेफ्रीजरेटर था, और वार्डरोब था। ड्राइंगरूम में कोच पर बैठने ही जा रहा था कन्हैया, कि उसने कहा, ‘नहीं, नहीं, यह कमरा भी देख लो!’

शालीनतावश, कन्हैया उठा और उस छोटे कमरे में भी गया। वहाँ बिलकुल सफ़ेद रेफ़रीजरेटर भी रखा था। और उसके पास ही वार्डरोब खड़ा था। वार्डरोब सचमुच बहुत अच्छा था। कृष्णस्वरूप ने कहा कि उसने उसे सेकेंडहैंड ख़रीदा है सिर्फ़ डेढ़ सौ में, जब कि उसकी आज क़ीमत आठ-एक सौ रुपए है! यहाँ की रियासत की भूतपूर्व रानी ने जब अपने महल का फ़र्नीचर बेचा तब हमें किफ़ायत से बहुत-सी चीज़ें मिल गईं। उसके काम भी तो बहुत-से किए थे। लेकिन उसके दीवान की कृपा से सस्ते में सब चीज़ें पा गए।

कृष्णस्वरूप ने वार्डरोब खोलकर बतलाया। सचमुच उसके अन्दर कई ऊनी और सादे–लेकिन सब क़ीमती, कोट और टाई और पैंट लटक रहे थे। लेकिन उसमें उसकी बीवी की कोई साड़ी न थी।

कन्हैया वार्डरोब के भीतर के कपड़े देखकर सचमुच प्रसन्न हो गया। एक ज़माना था जब कृष्णस्वरूप फटेहाल घूमता था। सर्दी में ठिठुरता था, सिर्फ़ जाँघिया पहने घर में घूमता था, और फटी सतरंजी ओढ़कर ठंड निकालता था। आज उसके पास पहनने का इतना सामान देखकर कन्हैया को सचमुच खुशी हुई। कम-से-कम उसने अपने बच्चों का तो भाग्य बनाया।

उसके उत्साह को देखकर कन्हैया ने कहा, ‘यार, एक रेडियोग्राम और ख़रीद लो। ज़रूरी है।’

कृष्णस्वरूप ने कहा, ‘नहीं यार, पहले मैं एक कार ख़रीदूँगा। सरकार ने ऐसा कुछ झमेला लगा रखा है कि नई कार के लिए बड़ा इन्तज़ार करना पड़ता है!’

कन्हैया ने कृष्णस्वरूप की पीठ थपथपाई, और फिर वह ड्राइंगरूम में पहुँचा कि इतने में एक घटना हो गई।

एकदम बहुत क़ीमती और बढ़िया सूट पहने हुए एक भयानक आदमी ने ड्राइंगरूम में प्रवेश किया। उसकी सूरत देखते ही कृष्णस्वरूप को काठ मार गया। वह ज्यों- का-त्यों बुतनुमा खड़ा हो गया। उसकी आँखें फटी-सी रह गईं और होंठ कुछ बुदबुदाने-से लगे।

कन्हैया ने उस आदमी की शकल देखी और फिर वह कृष्णस्वरूप की हालत देखने लगा, किन्तु उसका अनुमान नहीं कर सका। उसने सोचा कृष्णस्वरूप का मूड बिगड़ गया है। बस, इतना ही।

लेकिन, ज्यों ही उस भयानक आदमी ने कन्हैया को देखा, वह उससे मारे खुशी के झूल गया, ‘अरे वाह, कब आए, हमें मालूम ही नहीं था! यार, दुबले हो गए!’ कन्हैया को उसने बोलने ही नहीं दिया और खुशी का बेहद शोर करता चला गया। और फिर उसने कृष्णस्वरूप का हाथ पकड़ लिया और उसे भी ज़बरदस्ती कोच पर बैठा दिया। और फिर वह ख़ुद ही बात करता गया।

कन्हैया को इतना-भर लगा कि वह कृष्णस्वरूप का मज़ाक़ उड़ाता है। बीच-बीच में कुछ ऐसी फबती कस देता है कि कृष्णस्वरूप गुमसुम हो जाता है। और लगातार बात करता जाता है।

हाँ, उसकी बात में मज़ा आता है। भाषा पर उसका प्रचंड अधिकार है। और ऐसा लगता है, जैसे–दुनिया की हर चीज़ से उसका निजी सम्बन्ध हो। उसकी बात जायक़ेदार और मज़ेदार है। बात में उसकी उद्दंडता और तीखापन भी झलकता है। और एक बात साफ़ होती है कि उसके हृदय में कृष्णस्वरूप के प्रति असम्मान के भाव हैं। लेकिन मज़ा यह है कि उसके आगे कृष्णस्वरूप की तूती बन्द हो जाती है। वह हकलाने-सा लगता है। हाँ, एक बात साफ़ है, और वह यह कि वह कृष्णस्वरूप का गहरा दोस्त है, अगर ऐसा न होता तो कृष्णस्वरूप के अन्तर्मन की उसे इतनी ज़्यादा जानकारी न होती। उसके सामने कृष्णस्वरूप दब्बू बनकर बैठा है। वह लगातार बोलता जा रहा है, बोलता जा रहा है!

इतने में फिर चाय आई, नाश्ता आया।

कृष्णस्वरूप ने गला साफ़ कर सिर्फ़ इतना कहा, ‘लीजिए, साहब, इनकी भाभी ने (कृष्णस्वरूप की स्त्री ने) इन्हें देखते ही नाश्ता भिजवा दिया।’

‘जी हाँ, और तुम होते तो मुझे घर से बाहर निकलवा देते, अबे साले!’ और वह हँस पड़ा।

कृष्णस्वरूप ने अब हि मत करके, और साथ ही आगन्तुक की खुशामद करके उसके विरोधी रुख को कम करने के लिए कहा, ‘भाई साहब, आज मैं जो कुछ हूँ, सिर्फ़ इनके कारण हूँ, सिर्फ़ इनके कारण!’

आगन्तुक ने कृष्णस्वरूप द्वारा अपनी प्रशंसा को सम्भवत: अपने लिए अपमानजनक समझ, या क्या, ईश्वर जाने! वह भभक उठा। उसने तेज़ी से कहा, ‘क्या बात करते हो, तुम मेरी कब से तारीफ़ करने लगे!’

इस घुड़की को सुनने के बावज़ूद, कृष्णस्वरूप ने गम्भीर भाव से कहा, ‘नहीं, मैं तुम्हारी खुशामद नहीं कर रहा हूँ। यह एक वाक़या है। आज जो मैं इस हालत में पहुँचा हूँ, इसका कारण तुम हो।’

कन्हैया बारी-बारी से इन दोनों को देखता जा रहा था। उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था। एक बात साफ़ थी और वह यह कि इन दोनों के रिश्ते ग़ैरमामूली हैं। लेकिन क्या हैं, इसे समझना टेढ़ी खीर थी।

आगन्तुक सचमुच हतप्रभ था। शायद उसे भी यह बात नई मालूम हुई। वह घड़ी–भर चुप रहा और उसने गरदन नीची कर ली। और कहा, ‘लीजिए, चाय ठंडी हो रही है।’

एकाएक शान्ति छा गई। शोरगुल ख़त्म हो गया। कन्हैया सिर्फ़ चाय पी रहा था। उसका ध्यान सिर्फ़ पीने में था। कृष्णस्वरूप रामनारायण के बारे में–हाँ, उस भयानक आगुन्तक का नाम रामनारायण ही था–सोच रहा होगा। किन्तु आगन्तुक क्या सोच रहा था?

एकदम बैठक बरख़ास्त हो गई। आगुन्तक दरवाज़े के सामने नज़र आया। उसने बड़े अदब से कन्हैया को सलाम किया और कहा, ‘जी हाँ! फिर मुलाकात होगी। आपसे तो ज़रूर! शाम को मिलूँगा।’

और, तब कन्हैया ने देखा कि यद्यपि रामनारायण क़ीमती सूट पहने है, फिर भी वह मैला-कुचैला है, उस पर पान के दाग पड़े हैं। शायद, वह उसे पहनकर ही सोया होगा। कोट के नीचे कुरते का कॉलर फटा हुआ है और कोट के नीचे की जेब में एक काग़ज़ बाहर निकला जा रहा है।

सचमुच वह भयानक लगता था! चेहरे पर कम-से-कम दो महीने की घनी लम्बी दाढ़ी बढ़ी हुई थी। किसी बैरागी की दाढ़ी को भाँति ही वह थी। एक आँख इतनी लाल थी, मानो उसमें खून आकर जम गया हो। लेकिन आँखें बड़ी-बड़ी थीं। चेहरा बड़ा था, और माथा भी। लेकिन सिर पर बाल कम थे–जो थे, बिखरे हुए थे और काले थे। और सिर के बीचोबीच साँवली चाँद थी। और उस चाँद के बीचोबीच, खजूर की भाँति लम्बा गोल, एक बड़ा मस्सा था, जो किसी छोटे-से स्तूप की भाँति दिखाई देता था। सारे चेहरे पर एक भयानक अनगढ़पन, एक विचित्र विद्रूपता थी। और ऐसा लगता था कि शायद कोई इसके साथ घूमना पसन्द न करता होगा, क्योंकि विस्मय और कौतूहल के अतिरिक्त एक विद्रूप जिज्ञासा का वह विषय बन जाता होगा। उस आदमी के बारे में कन्हैया की राय बहुत ख़राब हो गई, यद्यपि उसने उसे प्रकट नहीं होने दिया।

जब वह मकान के बाहर सड़क पर साइकिल से रफ़ूचक्कर हो गया, तब कहीं कृष्णस्वरूप ने आराम की साँस ली। उसके मुँह से निकल पड़ा, ‘ही इज ए जीनियस, यस, जीनियस!’

कन्हैयालाल विस्मय से देखता रहा। वह कुछ नहीं बोला, चुप रहा, मन ही मन गुनता रहा।

ज्यों ही कन्हैया घर वापस आया, उसे ऐसा लगा जैसा वह किसी शून्य में आ पहुँचा है। उसे यहाँ नहीं आना चाहिए था। सभी कुछ दूर-दूर सा लगने लगा उसे। क्यों न वह सिविल लाइन्स तक हो आए। ज़रा तफ़रीह रहेगी।

लेकिन यह ख़याल उठते ही डूब गया। जो कमरा अब तक उसका इन्तज़ार कर रहा था, अब मानो उसका कोई मूल्य ही न रहा। फिर भी उसका मूल्य था, क्योंकि उसमें एक खाट थी, जिस पर वह बैठ सकता था, लेट सकता था। कन्हैया ने उसे देखा, उस पर बिखरी पड़ी किताबें देखीं। उन्हें ज़रा एक ओर करके वह टाँग पसारकर लेट गया। और रामनारायण के बारे में सोचने लगा, कृष्णस्वरूप के बारे में सोचने लगा। कल्पना तेज़ हो गई। उसे लगा कि रामनारायण में अजीब रहस्य है, एक अजीब भुतहापन है, बाबापन है। उसे देखकर श्मशान की याद आती है, श्मशान की राख नंगी देह पर मलनेवाले तांत्रिक योगियों की-सी झलक दिखाई देती है। लेकिन उसके सामने कृष्णस्वरूप क्यों इतना पीला पड़ जाता है, इतना थका-थका-सा, ऊबा-सा, हतबुद्धि-सा घबराया-सा, क्यों दिखाई देता है? इन दोनों के बीच कोई रहस्य है। कोई गुप्त षड्यंत्र है, जिसके ये दोनों साझीदार हैं। नहीं तो भला कृष्णस्वरूप क्यों कहता कि रामनारायण के कारण उसे बरक़्कत हुई है। स भव है, किसी अनुचित और ग़लत क़िस्म के मामले में दोनों हिस्सा लेते हों और पैसा कमाते हों। हिकमत कृष्णस्वरूप की हो, असली काम रामनारायण करता हो। ज़रूर इन दोनों के बीच में कोई ख़ास बात है।

यह सब वह सोच ही रहा था कि जीने पर भारी धप-धप की आवाज़ शुरू हुई। और वह देखता क्या है कि छोटे-से कमरे के उस भूरे दरवाज़े में ख़ुद कृष्णस्वरूप खड़ा है।

जीना चढ़ने के कारण कृष्णस्वरूप कुछ हाँफ-सा रहा था। कोट के बटन उलटे-सीधे लगे हुए थे। लगभग बदहवास था। दरवाज़े से ही उसने एक मनीबैग फेंककर कहा, ‘इसे मेरे यहाँ भूल आए थे।’

मनीबैग खाट पर धप से गिर पड़ा। कन्हैया आश्चर्य से उसे देखता रहा। हाँ, सचमुच वह उसी का था, उसका नाम भी तो उस पर था। कन्हैया को खोई चीज़ वापस पाकर खुशी हुई। अपने भुलक्कड़पन पर उसे आश्चर्य हुआ।

‘लेकिन, तुम फ़ोन कर देते, यहाँ तक आने की तकलीफ़ क्यों की!’ उसने कहा।

‘मैं नहीं जानता था कि तुम यहाँ तक पहुँच गए हो। सोचा, मनीबैग की तलाश में इधर-उधर घूम रहे होगे। इसलिए, सोचा कि मनीबैग दे आऊँ और एक चिट्ठी भी वहीं रख दूँ।’ कहकर कृष्णस्वरूप धीरे-धीरे खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया।

कन्हैया ने कुरसी आगे सरकाकर कहा, ‘नहीं, नहीं, ऐसे बैठो।’

और अकस्मात् कन्हैया को लगा, कृष्णस्वरूप मनीबैग देने नहीं, किसी और काम से आया है। वह काम क्या है?

कृष्णस्वरूप खिड़की के पास खड़े-खड़े ही कहता गया, ‘साले ने सारा मज़ा किरकिरा कर दिया। मैं तो तुम पर अपना रोब जमा रहा था। लेकिन उसने आकर फुग्गे को फोड़ दिया। मेरे लिए एकदम ऐंटीक्लाइमेक्स कर डाला।’

कन्हैया क्या कहता, वह सहानुभूति से सुनने की चेष्टा कर रहा था। फिर भी उसने कहा, ‘तुम तो उसे जीनियस कहते थे।’

‘बिलकुल ठीक कहता हूँ।’

मानो कि इसी का उदाहरण देने के लिए स्वयं कन्हैया ने अपनी ओर से कहा, ‘इसीलिए, शायद उसने मुझे एकदम पहचान लिया और लपककर गले मिला। मैं उसे नहीं पहचानता। भावना का नाट्य करनेवाले लोग मुझे पसन्द नहीं।’

कृष्णस्वरूप ने अत्यन्त गम्भीर और सार्थक वाणी से धीरे-धीरे कहा, ‘नहीं, वह तु हें अवश्य पहचानता होगा, और तुम्हारे बारे में उसके ख़याल होंगे। नहीं तो वह देखते ही गाली से बात करता!’

उस समय कन्हैया को लगा जैसे कृष्णस्वरूप आगे आनेवाली बात की भूमिका बाँध रहा है, कि मानो रामनारायण के सम्बन्ध में वह कोई रहस्य खोलने के लिए आतुर है, और उसका सम्बन्ध कृष्णस्वरूप के किसी मर्म से है। कन्हैया को लगा कि वह धीरे-धीरे कृष्णस्वरूप के जीवन में फिर से प्रवेश कर रहा है। बीस साल पहले एक बार कन्हैया उसके जीवन का एक अंग था। लेकिन तब परिस्थितिवश वह उसके बाहर निकल आया। और अब शायद फिर से उसे प्रवेश करना होगा।

और, धीरे-धीरे, क्रमश:, जो कहानी उसके मन में अपना विस्तार करने लगी वह न सिर्फ़ अजीब थी, वरन् मनुष्य की असंगतियों की संगति उसमें कुछ इस तरह थी कि दार्शनिक होना पड़ता था। कन्हैया के मन में एक के बाद एक नए-नए सवाल खड़े होने लगे। और वे सवाल भी इतने कुछ तीखे थे कि उनमें मन घुलता था। हाँ, कन्हैया का मन कहानी की शुरुआत से ही तसवीरें बनाने लगा।

कन्हैया ग़रीबी को, उसकी विद्रूपता को, और उसकी पशु-तुल्य नग्नता को जानता है। साथ ही उसके धर्म और दर्शन को भी जानता है। गाँधीवादी दर्शन ग़रीबों के लिए बड़े काम का है। वैराग्य भाव, अनासक्ति और कर्मयोग सचमुच एक लौह-कवच है, जिसको धारण करके मनुष्य आधा नंगापन और आधा भूखापन सह सकता है। सिर्फ़ सहने की ही बात नहीं, वह उसके आधार पर आत्मगौरव, आत्मनियंत्रण और आत्मदृढ़ता का वरदान पा सकता है। और, भयानक प्रसंगों और परिस्थितियों का निर्लिप्त भाव से सामना कर सकता है। मृत्यु उसके लिए केवल एक विशेष अनुभव है। ग़रीबी एक अनुभवात्मक जीवन है। कठोर से कठोर यथार्थ चारों तरफ़ से घेरे हुए है, एक विराट् नकार, एक विराट् शून्य-सा छाया हुआ है। लेकिन, इस शून्य के जबड़े में मांसाशी दाँत और रक्तपायी जीभ है! कन्हैया इसे जानता है!

और ठीक इसी आर्थिक और दार्शनिक स्थिति में कृष्णस्वरूप घूमता है। घर काटने को दौड़ता है, क्योंकि उसकी दीवार एक सवाल लेकर खड़ी हो जाती है, हर चेहरा एक प्रश्न उपस्थित करता है, और वह यह कि तुम मेरे लिए क्या कर रहे हो!

यह सवाल, जिसे घर की हर चीज़ और हर व्यक्ति उपस्थित करता है, कृष्णस्वरूप के हृदय में भी खटकता रहता है। इस प्रश्न का एकमात्र उत्तर है–पैसों की कमाई!

कृष्णस्वरूप को नौकरी के अलावा और कोई आसरा नहीं। यद्यपि वह बी.ए. है, तब भी उसे कुछ नहीं होता। सवा सौ रुपए में खाना-दाना भी नहीं चलता। वह हिसाब से काम करता है। लेकिन हिसाब पेट तो नहीं भर सकता और घर का हर आदमी उसे आँखों- आँखों ही से पूछता है–तुम मेरे लिए क्या कर रहे हो!

कृष्णस्वरूप नि:संज्ञ है, उसको रास्ता दिखानेवाला कोई नहीं। हाँ, समय काटने के लिए वह शाम को लायब्रेरी चला जाता है। अख़बार पढ़ता है। पत्र-पत्रिकाएँ पढ़ता है। और वहीं बैठकर किताबें भी पढ़ता है। लायब्रेरी के हॉल में भाषण भी होते हैं। शरद-व्या यानमाला चलती है। अन्य अवसरों पर भी विद्वानों के भाषण होते हैं।

कृष्णस्वरूप हॉल के पीछे की कुरसियों पर चुपचाप भाषण सुनता है। कभी नोट्स भी लेता है। और मन-ही-मन गुनता रहता है। उसमें इतना साहस नहीं है कि वह विद्वानों से दो सवाल पूछे। वे बड़े लोग वह छोटा आदमी है। फिर, उसके कपड़े भी अच्छे नहीं रहते, जिन्हें देखकर लोग समझते हैं कि वह कोई चपरासी या डाकिया या ऐसा ही कोई आदमी होगा। हाँ, कृष्णस्वरूप ख़ुद जानता है कि उसमें हीनताग्रन्थि है। लेकिन उसकी अवस्था सचमुच हीन है, यह एक प्रकट सत्य है। ऐसी ही उसकी अवस्था देखकर साधारण खाते-पीते लोग भी अपने को उससे ऊँचा समझते हैं। यही क्यों, अपमान भी कर जाते हैं। दुनिया में अपमान जैसा और कोई दुख नहीं होता। कृष्णस्वरूप पलटकर जवाब नहीं दे पाता, लेकिन अपमानकर्ता का शत्रु ज़रूर बन जाता है। उसे वह माफ़ नहीं कर सकता। इसीलिए, वह सबसे बचकर रहता है। दबना, कतराना और दूर खड़े होकर बात गाँठ से बाँध लेना, उसका मानसिक जीवन है।

उसकी इस मनोवृत्ति के कारण ही लायब्रेरी में उसके ख़ास दोस्त नहीं बन पाते। वहाँ या तो पेन्शनर बूढ़े आते हैं, या नवयुवक विद्यार्थी। और कोई नहीं। ऐसे नि:संग, उद्विग्न और चिन्तापूर्ण जीवन में, एक अजीबोग़रीब शख़्स सामने आता है। उसकी सूरत भयानक है। एक आँख लाल है, चेहरे पर दाढ़ी है, मानो बैरागी हो, गंजे सिर पर एक मोटा मस्सा है–मानो कोई छोटा स्तूप हो। वह एक अजीब ढंग का मटमैला तंग पाजामा पहनता है। कुरते के ऊपर एक फटा स्वेटर, कभी ऊनी तो कभी सूती। स्वेटर से वह कोट का काम लेता है।

हाँ, कृष्णस्वरूप को पहले-पहले उससे डर गया। उस डर का बयान नहीं हो सकता। अज्ञात अप्राकृतिक विचित्रता का वह भय था। कृष्णस्वरूप के कपड़े अत्यन्त साधारण और मैले रहते, लेकिन उनसे कोई विचित्रता नहीं झलकती। लेकिन, उस अजनबी की पोशाक भी उसे विचित्र बना देती थी। चेहरा तो भयानक और बदसूरत था ही।

बातचीत लायब्रेरी में हुई। उसे अजनबी ने ही शुरू किया। कैसे शुरू हुई, राम जाने। वह किसी किताब पर से शुरू हुई। और, वह अजनबी कृष्णस्वरूप को लायब्रेरी के नीचे के रेस्तराँ में ले गया। कृष्णस्वरूप वहाँ पहली बार पहुँचा था।

अजनबी धारा-प्रवाह अँगरेज़ी और हिन्दी बोलता था। सही-सही और ज़ोरदार लफ़्जों में वह बात करता था। ऐसा लगता था कि जो बातें वह कह रहा है, उन पर उसने बरसों मनन-चिन्तन किया है। वह एक दबंग और पुरज़ोर शख्सियत रखता था।

उसकी जेबों में कई नोट थे–पाँच के, दस के। वह ग़रीब नहीं था। सिर्फ़ उसका वेश विरक्तिजनक था। वह बेतहाशा पैसा ख़र्च करता था। पैदल नहीं, बल्कि रिक्शा में घूमता। अठन्नी उसके लिए दो पैसों के बराबर थी।

तंग हालत की तंग दीवारों के बीच घिरे हुए कृष्णस्वरूप को वह केवल भयानक ही नहीं मालूम हुआ। उस आदमी में मैदान का फैलाव था, अजीबोग़रीब भयानक बरगद की ऊँचाई और घनापन था। कृष्णस्वरूप के उद्विग्न, नि:संग एकान्त जीवन का शून्य उससे टूट गया।

वह उसे रात को मेट्रो सिनेमा में ले जाता। अँगरेज़ी फ़िल्में देखने जाते। दोनों रात को देर से लौटते। और विनोबा भावे के सर्वोदयवाद और एम.एन.राय के रैडिकल ह्यूमैनिज़्म से लेकर सार्त्र के एक्जिस्टैंशिलिज़्म तक की बातें होतीं। नई कविता और ऐब्स्ट्रैक्ट पेंटिंग की भी चर्चा होती। उस अजनबी ने, जिसका नाम रामनारायण था, कृष्णस्वरूप के सामने नई दुनिया ही खोल दी।

कृष्णस्वरूप के सारे ध्यान, कार्य और अनुराग का केन्द्र अब वह व्यक्ति हो गया। यह भी सही है कि रामनारायण ने समय-समय पर कृष्णस्वरूप को आर्थिक मदद भी की। दोनों एक-दूसरे के घनिष्ठ हो गए। उसकी संगत में रहकर कृष्णस्वरूप का दिल खुलने लगा, मन में विस्तार उत्पन्न हुआ।

लेकिन, बावज़ूद इसके, दोनों व्यक्ति एक-दूसरे की जीवन-परिधि के आसपास ही घूमते रहे। किसी ने एक-दूसरे के वैयक्तिक जीवन में प्रवेश करने का प्रयत्न नहीं किया।

किन्तु, क्या यह सम्भव था कि कृष्णस्वरूप सचमुच रामनारायण के जीवन से अनभिज्ञ रहता? वैसे उसे बहुत-सी उड़ती-उड़ती जानकारी थी। लेकिन, उससे मन तृप्त न होता। हाँ, यह सही कि ख़ाली वक़्त में कृष्णस्वरूप रामनारायण के व्यक्तित्व की एक रूपरेखा तैयार कर लेता।

सबसे पहली बात जो उसके ख़याल में आती वह यह कि रामनारायण को यह मालूम नहीं है कि उसे क्या चाहिए। हाँ, यह ज़रूर मालूम है कि उसे क्या नहीं चाहिए। परिणामत: वह हर बात में दोष निकालता। उसकी आलोचनात्मक दृष्टि में मार्मिकता और प्रखरता थी, उद्दंडता और निर्भयता थी। साथ ही, एक खारापन, एक बेसहारापन, एक मारा-मारापन, एक मरा-मरापन था। चक्करदार राहों पर गोल-गोल घूमते रहने-जैसी कोई मानसिक स्थिति वह थी। उसने न मालूम कितने ही दर्शनों और विचारधाराओं, व्यक्तियों और व्यक्तित्वों में दोष निकाले। उन दोषों को वह इतनी कड़वाहट के साथ कहता मानो उसकी कोई निजी हानि हुई हो। वह बात इस तरह करता मानो उन चीज़ों का उससे कोई आत्मीय रहस्यमय सम्बन्ध हो। निषेध, निषेध, निषेध! कृष्णस्वरूप को यह पहचानने में देर न लगी कि निषेध का उसका स्रोत बौद्धिक नहीं है, वही कहीं तो भी भीतर है।

वह सारे भद्र समाज से चिढ़ता। वह नगर के एक-एक बड़े आदमी से परिचित था। अनगिनत छोटे आदमियों से उसकी अच्छी पहचान थी। निर्भीक और उद्दंड होने के कारण बहुत-से अच्छे आदमी उसके पास खिंच जाते। उनमें से कई उसकी मार्मिक वाक्-धारा से प्रभावित थे। असल में, वह खूब अच्छी और सही-सही गालियाँ देना जानता था। और, कुछ लोग इस तरह के औघड़ आदमी के खुरदुरेपन को बेहद पसन्द करते।

भद्र समाज का वह बेशक दुश्मन हो गया था। वह उनके दम्भ और अहंकार के तरह-तरह के क़िस्से बताया करता और वह भी इस तरह के कि सचमुच श्रोता का मन दुख और अवसाद, ग्लानि और विरक्ति में डूब जाता। एक आ यन्तर तिक्त-आ ल अनुभव से भर उठता। बड़े-बड़े अख़बारों के मालिक, महत्त्वाकांक्षी राजनैतिक नेता, मंत्री और उपमंत्री, डायरेक्टर और सेक्रेटरी, यहाँ तक कि साहित्यिक भी, उसकी कथाओं के पात्र रहते। उनका वह एकदम सही-सही विश्ेलषण करता। इन लोगों के बारे में उसके पास इतनी जानकारी थी कि कुछ पूछो मत। व्या यान-सभाओं में वह स्वयं बोलने खड़ा हो जाता तो शहर के जितने बुद्धिमान पढ़ने-लिखनेवाले, लेकिन आवारा लोग थे, उनके हृदय का वह हार हो जाता था। वे खूब ताली पीटते। धीरे-धीरे उसकी सोहबत से, शहर में उसके जैसे और कई निकल आए। उनके सबके सम्मलित प्रयत्नों से, एक के बाद एक कई साप्ताहिक पत्र धूम-धड़ाके से निकले। बड़े-बड़े लोगों पर, प्रमाण सहित, कीचड़ उछाला गया। सरकारी फ़ाइलों के अंश भी प्रमाणरूप छापे जाने लगे।

यद्यपि वह स्वयं भद्र-समाज का भयानक विरोधी था, वह ख़ुद गुंडा नहीं था। उसका व्यवसाय तो जी भरकर आलोचना करना था, सफ़ाईदार भाषा में। किन्तु, उसके आस-पास जो ‘स्वतंत्रचेता’ व्यक्ति इकट्ठे हो गए थे, उन्हें वह खूब प्ररेणा देता रहा। ये सब ‘स्वतंत्रचेता’ लोग अपने-अपने समाज, वर्ग और परिवार से कटे हुए लोग थे। उनमें से लगभग सभी जोशीले और पढ़ने-लिखनेवाले, और (साथ ही) कुचक्री थे।

कृष्णस्वरूप सरकारी नौकर था। उसमें बुद्धि थी लेकिन दम नहीं था, ऊधम नहीं था। और इन ऊधमियों के बीच में रहने से बिजली के मीठे-मीठे धक्के लगे। वह उनका आदर्शीकरण करने लगा, जबकि असल में, वे सारे-के-सारे बिकने के लिए तैयार बैठे थे। सिर्फ़ क़ीमत का सवाल था। कम क़ीमत में बिकने के लिए कोई राजी नहीं था। और, सबसे बड़ी चीज़ तो यह थी कि वे सब प्रतिभावान और साहसी नौजवान अख़बारनवीस थे।

फिर भी, कृष्णस्वरूप यह सोचने को तैयार नहीं था कि वह ‘विद्रोह’ केवल बुद्धि का या जीवन-नीति का विद्रोह है। क्योंकि अगर वैसा विद्रोह होता तो आलोचना के साथ-ही-साथ रचना–ये दोनों बातें चलतीं। सब अन्वेषी थे, सब खोजी थे। यानी, ‘मन चाहे जिधर भटको और अन्वेषण का नाम दो’ वाली नीति सबकी अपनी कार्यनीति थी। अद्वैतवाद का अध्ययन करते-करते कृष्णस्वरूप को इतना तो मालूम हो गया था कि अन्य दर्शनों की आलोचना करते-करते नए दर्शन की रचना होती है, नई जीवन-नीति की रचना होती है। लेकिन, व्यवहार तथा बुद्धि दोनों के क्षेत्र में, यहाँ केवल निषेध था। यानी, उन्हें क्या नहीं चाहिए–यह खूब मालूम था; लेकिन क्या चाहिए–इसकी कोई ख़ास रूपरेखा उनके पास न थी, क्योंकि उनमें से कोई वस्तुत: गम्भीर नहीं था।

कृष्णस्वरूप उन सब पर मंत्र-मुग्ध था; फिर भी, कभी-कभी उसकी बुद्धि और हृदय उनकी वाचालता और दुर्व्यवहार के प्रति विद्रोह कर उठते। फिर भी, स्वभावत: दब्बू होने से उनका विरोध करने का उसने कभी साहस नहीं किया। साहस करता भी तो पिट जाता।

लेकिन उसकी आस्था तो रामनारायण पर थी। वह रामनारायण की छाया बन गया था। वह रामनारायण के अन्तर्जीवन में प्रवेश करना चाहता था, उसके चारों कोने छू लेना चाहता था।

एक दिन रामनारायण कृष्णस्वरूप को अपने घर ले गया। उस मकान को देखकर कृष्णस्वरूप को विस्मित हो जाना पड़ा। वह आलीशान मकान था। वह कोठी थी जिसके अब पलस्तर गिर रहे थे। ठीक सड़क से लगे हुए उस मकान की सात मंज़िलें बड़ी दूर से दीखती थीं। दूर से वह मकान बहुत सुन्दर मालूम होता था, उसकी सबसे ऊँची छतों पर मेहराबदार मंडप थे और मन्दिर-नुमा शिखर थे।

लेकिन, सबसे आकर्षक वस्तु थी रामनारायण की माँ। वह यद्यपि बूढ़ी थी और चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ी थीं, फिर भी उसका रंग एकदम चम्पई था। वह अब भी ख़ूबसूरत थी। उसका नाक-नक्श मानो स्फटिक से गढ़ा हुआ था। उसको देखकर किसी को भी नम्र और शालीन हो जाना पड़ता। उस परिवार में अब केवल दो ही व्यक्ति थे–माता और पुत्र। और दो नौकर। दो भैंसें भी थीं, जो आँगन में बँधी हुई थीं।

रामनारायण के कमरे तक पहुँचने के लिए ज़ीना चढ़कर हॉल पार करके जाना पड़ता। हॉल सजा हुआ था। उसकी छत से अभी भी फ़ानूस लटक रहे थे। सबमें पुरानापन था। पुराने काँच लगे हुए थे, टेबिल लगी हुई थी, आदमक़द आईने दीवारों से सटे थे, छत और दीवारों से तनकर एक कोण बनाते हुए अजीबोग़रीब पुरखों की रंगीन तसवीरें लगी हुई थीं। और सब पर सूनेपन की साँस जमी हुई थी।

फिर भी एक बात साफ़ थी। हर चीज़ पुरानी होते हुए भी क़रीने से लगी थी। इसके विपरीत रामनारायण का कमरा था। वह अस्त-व्यस्त था। वहाँ भी टेबिल कुरसी, फ़ैन और एक फ़ोटो लगा हुआ था।

कृष्णस्वरूप ने पूछा, ‘यह फ़ोटो किसका है?’

रामनारायण ने कहा, ‘मेरा!’

‘नहीं जी!’ कृष्णस्वरूप के मुँह से निकल गया।

रामनारायण ने कुछ नहीं कहा। सचमुच वह फ़ोटो ख़ूबसूरत जवान का था। वह उसी का था। अपने बीसवें साल में वह इतना ख़ूबसूरत था। फिर, क्या कारण है कि उसने अपना चेहरा इस तरह बिगाड़ लिया? आख़िर रामनारायण ने अपने को इतना विद्रूप क्यों बना लिया? कृष्णस्वरूप कुछ क्षण सोचता रहा।

माँ से भेंट हुई। माँ ने बड़ी आवभगत की। कृष्णस्वरूप अब रामनारायण के यहाँ माँ से मिलने के लिए जाने लगा। धीरे-धीरे उसे पता लगा कि माता और पुत्र में अगर वैर नहीं तो मनोमालिन्य अवश्य है।

कृष्णस्वरूप ने रामनारायण के सामने माँ की बातचीत करना चाही, दोहराना चाही। लेकिन रामनारायण ने कोई दिलचस्पी नहीं ली। जब भी बात निकलती वह उसे उड़ा देता। और उदास हो जाता।

ऐसा तो हो नहीं सकता कि कृष्णस्वरूप से दोनों के सम्बन्ध छिपे रहें। असलियत यह थी कि रामनारायण के पिता बड़े ही मस्त और फक्कड़ आदमी थे। ऊँच-नीच का उन्हें कोई ख़याल नहीं था। चपरासी के साथ गाँजे का दम लगाने बैठ जाते। हाथ में लुटिया और कान में जनेऊ लपेटे किसी भी पड़ोसी से घंटों गप लड़ाते रहते। वे कलाप्रेमी थे। संगीत और साहित्य के शौक़ीन। ख़ुद भी अच्छे गायक थे, भजन बनाते और शेर भी गढ़ लेते। नामी संगीतज्ञों, चालू शायरों की संगत में उठते-बैठते और उन्हीं के समान कुछ-कुछ सनकी भी थे। महफ़िलबाज़ थे। उनकी महफिल प्रसिद्ध थी। उसमें बनारस की रंडियाँ और लखनऊ के शायर भी हिस्सा लेते। अपनी इस धुन में उन्होंने बाप-दादों से चली आई हुई जायदाद का बड़ा हिस्सा ख़त्म कर दिया।

शायद, इसीलिए उनकी पत्नी से नहीं बनती थी। उनकी पत्नी एक शानदार और ख़ूबसूरत औरत थी जिसकी मुख्य अभिरुचि थी प्रबन्ध और व्यवस्था करना। यह साम्राज्ञी थी, जिसे अपनी जायदाद के काम-काज को ठीक ढंग से चलाने, उसे बढ़ाने का शौक़ था। वह हुकूमत करना जानती थी। उसके पति उसके सौन्दर्य पर मुग्ध एक बालक थे। बालक-स्वभाव के अनुसार ही, उसके पति महोदय जिद्दी और चंचल, कर्तव्य-कर्म के नितान्त अयोग्य और अव्यवस्थित थे, जबकि पत्नी स्वयं दृढ़-बुद्धि और लक्ष्य-परायण थी। इस प्रकार दोनों के स्वभाव-वैष य के कारण, पति-पत्नी में कई घटना-प्रधान दुखान्त नाटक हो जाते। नौजवानी में वे दुखान्त नाटक सुखान्त नाटक में भी बदल जाते। लेकिन, ज्यों-ज्यों उम्र बढ़ती गई, भावना कम होती गई और अहंकार की बाढ़ आती गई, त्यों-त्यों परस्पर आकर्षण के अभाव में एक-दूसरे के प्रति कठोरता उत्पन्न होती गई।

माता-पिता के इस झगड़े को कोमल मनवाले छोटे-से बालक रामनारायण ने खूब देखा है। उसने कभी पाया कि उसकी माँ शान से पलंग पर बैठी हुई है और उसके पिता पलंग के नीचे बैठ स्त्री की गोद में मुँह दुबकाए रो-से रहे हैं। कभी उसने देखा कि माँ कह रही है, ‘तुम्हें अपनी इज्जत का ख़याल नहीं है, घराने का ख़याल नहीं है, चपरासी के साथ गाँजा पीते हो, उस साले ओछे धोबी के घर जाकर शराब पीते हो। तुम्हें अपने घर में शायद कुछ भी नहीं मिलता–खाने को भी नहीं मिलता! इसीलिए कमीनों की सोहबत में रहते हो। उनके यहाँ जाकर खाते हो!’

और पिता ये बातें सुनकर मुसकराकर कह रहे हैं :

‘जाति–पाँति पूछै नहिं कोई,

हरि को भजै सो हरि का होई।’ 

इस पर माँ कहती है, ‘अरे, तुम क्या हरिभजन करोगे! जाओ, उस रंडी के पास जाकर बैठो!’

और पिताजी ज़ोर से हँस पड़ते हैं और कहते हैं कि सचमुच उन्हें हरि से उतना प्रेम नहीं है जितना ख़ुद से है। और एक ग़ज़ल सुनाने लगते हैं। वह ग़ज़ल क्या थी, रामनारायण को याद नहीं है।

इस तरह की कुछ धुँधली-धुँधली तसवीरें रामनारायण को याद हैं। रामनारायण ने बहुत चाहा था कि ये तमाम बातें वह कृष्णस्वरूप को न बताए लेकिन जब कृष्णस्वरूप रामनारायण की माँ का लाड़ला बन गया, तब रामनारायण ने अपनी उभरती भावना को दबा-दबाकर रुकते-रुकते, उखड़ते-उखड़ते, ये बातें कृष्णस्वरूप से कहीं।

क़िस्सा मुख्तसर यह है कि पिताजी जायदाद लुटाने लगे और मॉर्फिया का इन्जेकशन लेकर दिन गुज़ारने लगे। माताजी की इच्छा थी कि उन्हें रायबहादुरी का ख़िताब मिले, वे समाज में नाम कमाएँ, बड़े राष्ट्रीय नेता बन जाएँ। और हुआ यह कि वे एक दिन अपनी पत्नी से बुरी तरह झगड़कर एक दूरदराज़ शहर में चले गए, और वहीं एक दिन आकस्मिक कारणों से मृत्यु हो गई।

इधर, पिता की मृत्यु पर, माताजी खूब रोईं-धोईं, लेकिन रामनारायण को लगा कि उनके आँसू बनावटी हैं, दिखावे के हैं। उसने प्रण कर लिया कि वह अपनी माँ से कभी प्यार नहीं करेगा, कि पिता की मृत्यु का कारण स्वयं उसकी (रामनारायण की) माता है।

पिता की मृत्यु होने पर रामनारायण अकेला पड़ गया। इस डर से कि कहीं लड़का पिता की भाँति ही बिगड़ न जाए, माँ ने उस नौकर को छुड़वा दिया जो बालक रामनारायण का रक्षक और सेवक था। इस प्रकार रामनारायण और भी अकेला और अनाथ हो गया।

माता उसे कभी भी यथावत् मातृत्व प्रदान न कर सकीं। उसको ट्यूटर लगाए गए। राजकुमार कॉलेज में भरती किया गया। ज्यों-त्यों उसने कैम्ब्रिज किया। वहाँ के अत्यन्त अनुशासनबद्ध जीवन से तंग आकर वह भाग निकला। कुछेक साल बेकार रहा। फिर बी.ए. की तैयारी करने लगा। लेकिन उसे भी पास नहीं कर सका। शहर-भर घूमना, और किताबें पढ़ना, यही उसका मुख्य व्यवसाय था। माता ने उसका विवाह कर देना चाहा, वह भी उसने नहीं किया। तब तक वह एक ख़ूबसूरत नौजवान था।

लेकिन ज्यों ही वह शहर में घूमने लगा, माता ने जिन-जिन बातों का निषेध करके रखा था, उन-उन बातों को गिन-गिन कर उसने किया।

माता उसे भद्र परिवार के भद्र और सौजन्यपूर्ण पुत्र के रूप में देखना चाहती थी। ठीक इसके विपरीत उसने अपना वेश बना लिया। कपड़ों की उसने परवाह नहीं की–यह बताने के लिए कि वह भद्र परिवार का नहीं है। यह सब लगभग अनजाने ढंग से हुआ (किसी आ यन्तर ग्रन्थि ने एक विचित्र प्रकार के मानवतावाद का रूप धारण कर लिया था)। वह भयानक मैले-कुचैलेपन में आनन्द लेने लगा। भद्र परिवारों से उसने फ़ासले खड़े कर लिए। और इन फ़ासलों में उसकी गालियाँ गूँजने लगीं। वह ‘कमीनों’ के घर जाकर अब गाँजे और चरस का भी दम लगाता और कभी-कभी वहीं पड़ा रहता। उसने इस प्रकार उनसे खूब अच्छा सम्बन्ध बना लिया। धीरे-धीरे उसकी ज़िन्दगी ने एक ढर्रा अख्तियार कर लिया। यहाँ तक कि वह अब निचली जातियों की लड़कियों से सम्बन्ध भी रखने लगा। पैसों की उसके पास कमी नहीं थी। फलत: गाँजा, चरस और स्त्री-सम्बन्ध उसके लिए बहुत मामूली बातें थीं।

इसी बीच वह एक पूजनीय नेता के चक्कर में आ गया। उनका उस पर बहुत प्रभाव पड़ा। चुनावों के दौरान में वह उनका खूब काम करता। अगर वे कांग्रेस न छोड़ते तो वे मुख्यमंत्री होते। उन्हीं के सम्पर्क के कारण, वह बड़े-बड़े नेताओं और साहित्यिकों और सेठों के सम्पर्क में भी आया। निर्भीकता, वाणी की स्वच्छता, भाषा-प्रवाह आदि के फलस्वरूप वह नितान्त उपेक्षणीय नहीं रहा। उन पूजनीय नेता की मृत्यु के बाद (जिसका उसे बहुत धक्का लगा), अनेक पार्टियों के नेताओं ने उसे गूँथना शुरू किया, क्योंकि वही एक ऐसा था जो ग़रीबों की गन्दी बस्ती में महीनों और सालों छिपा रह सकता था। लेकिन उसकी आलोचनात्मक दृष्टि, जो पहले श्रद्धावान थी, अब वह देखने लगी कि बुजुर्ग नेता एक के बाद एक स्वार्थबद्ध हो चुके हैं। उनमें कुलीनता का वही अभिमान, धन-सत्ता का वही गर्व, दीनहीन के प्रति वही उपेक्षा-भाव, और दम्भ तथा अहंकार के अतिरिक्त, शासन की वही तृष्णा है, जिसका साकार रूप उसे अपनी माँ में दिखाई पड़ता था।

माँ, माँ, माँ! जो भी उसने पुत्र से चाहा, ठीक उसके विपरीत उसके पुत्र ने किया–ठीक उसके विपरीत उसका पुत्र बना। लगातार नशे से और अव्यवस्थित, उत्तेजनापूर्ण और असंयत जीवन से उसका चेहरा बिगड़ गया, आकृति बिगड़ गई, और वह इस बिगाड़ को अच्छा समझने लगा। दाढ़ी बढ़ा ली, जैसे कोई बैरागी हो, शरीर दुर्बल हो गया। और यदि कोई व्यक्ति उसके इस विद्रूप व्यक्तित्व के विरुद्ध मज़ाक़ करता या आलोचना करता तो वह उसका शत्रु हो जाता। माँ ने चाहा कि वह बड़ा आदमी बने, अच्छे ढंग से रहे, समाज में प्रभाव और दवाब रखे, इंग्लैंड से डिग्री लेकर आए, जायदाद बनाए और बढ़ाए, लेकिन लड़का तो बाप से सवाया बनने ही की कोशिश करता रहा।

प्रश्न यह है कि पूँजीवाद के विरुद्ध, धन-सत्ता के विरुद्ध, उसकी अपनी माता के विरुद्ध, उसकी यह प्रतिक्रिया क्या सचमुच सिद्धान्त और आदर्श के अनुसार है? निषेध और निषेध करके वह क्या सचमुच शोषितों का उपकार कर रहा है?

इसी बीच क़िस्सा यों बढ़ता है कि कृष्णस्वरूप को उसकी माँ अच्छी लगती है। कृष्णस्वरूप ने उसे बुढ़ापे में देखा है, जबकि उसकी पुरानी शान और अहंमन्यता का थोड़ा-सा भी लेश नहीं है। उसके पुत्र ने उसे कठोर यातनाएँ दीं। वह माँ अपने पुत्र के रूप और जीवन-चर्या की शिकायत कृष्णस्वरूप से करने लगी, यह सोचकर कि सम्भव है कि कृष्णस्वरूप के प्रभाव से उसका लड़का पटरी पर चलने लगे। उसका दुखपूर्ण मातृ-हृदय कातर होकर कृष्णस्वरूप के सामने अपना रोना रोता। कृष्णस्वरूप को वह दुख सात्विक लगा। उसमें माता की स्वाभाविक चीत्कार और करुण पुकार थी। धीरे-धीरे कृष्णस्वरूप उसकी माता का दुलारा बन गया। और अब जो भी काम वह करना चाहती, करवाना चाहती, वह कृष्णस्वरूप से कहती। और कृष्णस्वरूप उसे सहर्ष करता, दौड़कर करता।

किन्तु यह भी सच है कि कृष्णस्वरूप नि:स्वार्थ भाव से ऐसे काम न करता। उसके हृदय में एक लोभ था, लालच था। वह सोचता कि बड़े और धनी आदमियों के समाज में अगर उसका किसी से परिचय है तो उसी बूढ़ी औरत से। इसलिए वह परिचय उसके लिए अत्यन्त महत्त्चपूर्ण है।

कृष्णस्वरूप ग़रीब था। उसे आश्रय की आवश्यकता थी। संकटपूर्ण परिस्थिति हमेशा ही रहती थी। इसलिए उस बूढ़ी औरत को वह माता या देवी के समान मानने लगा। साथ ही, उस बूढ़ी माँ को एक ऐसे आदमी की ज़रूरत थी जो अपनी ज़िम्मेदारी समझता हो, जो पैसे की वक़त करता हो, जिसे ज़िन्दगी बनाने का शौक हो। संक्षेप में, रामनारायण की माँ कृष्णस्वरूप को अपना मातृ-तुल्य प्रेम और साथ ही सम्मान प्रदान करने लगी। यहाँ उसकी पुरानी धार्मिक दृष्टि भी उसके काम आई। उसकी धार्मिक दृष्टि को देखकर, रामनारायण की माँ उसकी और भी इज्जत करने लगी। इसका नतीजा यह हुआ कि बहुत-सी बातों में रामनारायण की माँ कृष्णस्वरूप पर निर्भर रहने लगी। उसे लगता कि अगर कृष्णस्वरूप जैसा उसका बेटा होता तो कितना अच्छा होता! उसी की सहायता से कृष्णस्वरूप ने, नौकरी करते हुए भी लॉ कर लिया और बाद में एम.ए. भी कर डाला। और क्रमश: वह रामनारायण की माँ की बची-खुची जायदाद भी सँभालने लगा, जायदाद सँभालने के दौरान में कई अफ़सरों से उसका साबिक़ा पड़ा। वैसे भी गम्भीर और कर्तव्य-परायण होने के कारण, उसका प्रभाव अच्छा पड़ता। माँ को तसल्ली हुई कि कृष्णस्वरूप के सहयोग से ही क्यों न सही, उसकी जायदाद बढ़ रही है।

हाँ, यह सही है कि इस जायदाद पर कृष्णस्वरूप की आँख नहीं थी। वह ईमानदारी से काम करके पैसा कमाना चाहता था। जायदाद अपनी आँखों से बढ़ती हुई देखकर रामनारायण की माँ बहुत प्रसन्न थी ही, उसने भी अब कृष्णस्वरूप के जीवन के लिए स्थाई प्रबन्ध करने का प्रयत्न किया।

रामनारायण की माँ, अपने पिता और पति दोनों के सम्बन्ध सूत्रों द्वारा नगर और प्रान्त के बड़े आदमियों से जुड़ी हुई थी। एक बार सक्रिय होने की ही तो बात थी। उसने कोई बात उठा नहीं रखी। आख़िर कृष्णस्वरूप को सेंट्रल गवर्नमेंट की नौकरी दिला ही दी। और वहाँ से बदलकर वह इनकम टैक्स विभाग का एक ऊँचा अधिकारी बन गया।

और, इस प्रकार क्रमश: कृष्णस्वरूप का सारा दारिर्द्य निकल गया। घर भर गया और कुछ पूँजी इकट्ठी हो गई। यहाँ तक कि बहुत-से ठेकेदार लोग अब उससे रुपया उधार लेकर नए काम हाथ में लेने लगे।

कृष्णस्वरूप सामने बैठा है। यह कहानी कहते हुए, बीच-बीच में वह भावना के उद्रेक के कारण हाँफता जाता है, रुक-रुककर कहता है। कन्हैया तन्मय होकर यह कहानी सुनता जाता है।

‘अब मुझे बताओ, पूँजीवाद के विरुद्ध, धन-सत्ता के विरुद्ध, अपनी माता के विरुद्ध, रामनारायण की यह प्रतिक्रिया क्या सचमुच सिद्धान्त और आदर्श के अनुसार है? और, कन्हैया, अब तुम यह भी बताओ कि मैं जो पहले अनासक्ति, निष्काम कर्म और आत्म-वश रहने की बात करता था, अद्वैतवाद की बात करता था, तो क्या मेरी इस भौतिक, आर्थिक उन्नति में मेरा व्यक्तिश: अध: पतन नहीं हुआ है? इसका निर्णय तुम करो।

‘जब-जब मैं रामनारायण को देखता हूँ, तब-तब मैं अपने आपको ओछा और नीचा पाता हूँ। लेकिन जब उसके बारे में सोचता हूँ तो लगता है कि वह मुझसे भी गया-बीता और निकम्मा है। फ़र्क़ यही है कि उसने अपने गए-बीतेपन और निक मेपन पर किसी विरोधशील दार्शनिक धारा का आवरण चढ़ा लिया है। इससे ज़्यादा मुझे उसमें तन्त नहीं दीखता। उसके सब अख़बारनवीस साथी अब या तो बड़े लीडर हो गए हैं और पैसे कमाने की भूमिगत मशीन में फँस गए हैं, या पैसे कमाने की खुली मशीन में मज़े में अड़े हुए हैं। उनमें से आज कई ऊँचे पदों पर हैं। तो बताओ, मेरे प्रश्न का उत्तर दो।’

कन्हैया इस सवाल का क्या जवाब दे! वह शून्य में देखता है। सुनहली किरणों से चमक रही खिड़की की सिल पर बैठी हुई चिड़िया को देखता है, जो दाने चुग रही है।

एकाएक कन्हैया पूछ बैठा, ‘लेकिन, यार, तुम्हारे यहाँ जब सुबह रामनारायण आया था तो क़ीमती सूट पहने हुए था। हाँ, वह गन्दा ज़रूर था। लेकिन सूट क्यों? उसे तो तुम्हारी कहानी के अनुसार फटे कपड़े पहनने चाहिए थे।’

कृष्णस्वरूप मार्मिक भाव से मुसकराया। उसने कहा, ‘अब क्या बताऊँ! मेरे यहाँ जान-बूझकर सूट पहनकर आता है। उसका मुझ पर यह आरोप है कि यदि वह दलिद्दर पोशाक में आएगा तो मैं उसे घर के बाहर निकाल दूँगा। मुझे जानबूझ कर चिढ़ाने के लिए वह वैसा कहता है और सूट पहनकर आता है।

कन्हैया हँस पड़ा। उसके मुँह से अनायास निकल पड़ा, ‘स्साला बड़ा बदमाश है!’

‘परवर्टेड जीनियस’, कृष्णस्वरूप ने कुत्सा के भाव से कहा। फिर भी तुरन्त ही जोड़ दिया, ‘लेकिन, आज मैं जो कुछ हूँ, उसके कारण हूँ, इसीलिए आज भी मैं उससे दबता हूँ, और आगे चलकर न भी दबूँ तब भी दबने का नाट्य करूँगा।’ और यह कहकर कृष्णस्वरूप हँस पड़ा।

फिर उठते हुए बोला, ‘तुमने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया।’

कन्हैया ने एक उसाँस छोड़ी और कहा, ‘मुझे सोचना पड़ेगा। मेरे ख़याल से तुम दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हो। खैऱ, जो भी हो, आज रामनारायण ने तुम्हें चिढ़ाने के लिए सूट पहना है, कल वह तुम्हें नीचा दिखाने के लिए अपनी जायदाद ख़ुद सँभालेगा। और तब चक्र पूरा घूम जाएगा। अगले दस साल के बाद मुझे रिपोर्ट देना। समझे!’

कृष्णस्वरूप को विदा करने जब कन्हैया नीचे पहुँचा तब न मालूम क्यों उसने गटर में थूक दिया। क्यों? पता नहीं।

(सम्भावित रचनाकाल 1963-64)