समझौता (कहानी) : गजानन माधव मुक्तिबोध | Samjhauta

 

अँधेरे से भरा, धुँधला, सँकरा प्रदीर्घ कॉरिडोर और पत्थर की दीवारें। ऊँची छत की गहरी कॉर्निस पर एक जगह कबूतरों का घोंसला, और कभी-कभी गूँज उठनेवाली गुटरगूँ, जो शाम के छह बजे के सूने को और भी गहरा कर देती है। सूना कॉरिडोर घूमकर एक ज़ीने तक पहुँचता है। ज़ीना ऊपर चढ़ता है, बीच में रुकता है और फिर मुड़कर एक दूसरे प्रदीर्घ कॉरिडोर में समाप्त होता है।

सभी कमरे बन्द हैं। दरवाज़ों पर ताले लगे हैं। एक अजीब निर्जन, उदास सूनापन इस दूसरी मंज़िल के कॉरिडोर में फैला हुआ है। मैं तेज़ी से बढ़ रहा हूँ। मेरी चप्पलों की आवाज़ नहीं होती। नीचे मार्ग पर टाट का मैटिंग किया गया है।

दूर, सिर्फ़ एक कमरा खुला है। भीतर से कॉरिडोर में रोशनी का एक ख़याल फैला हुआ है। रोशनी नहीं, क्योंकि कमरे पर एक हरा परदा है। पहुँचने पर बाहर, धुँधले अँधेरे में एक आदमी बैठा हुआ दिखाई देता है। मैं उसकी परवाह नहीं करता। आगे बढ़ता हूँ और भीतर घुस पड़ता हूँ।

कमरा जगमगा रहा है। मेरी आँखों में रोशनी भर जाती है। एक व्यक्ति काला ऊनी कोट पहने, जिसके सामने टेबिल पर काग़ज़ बिखरे पड़े हैं, अलसाई-थकी आँखें पोंछता हुआ मुसकराकर मुझसे कहता है, ‘आइए, हुजूर, आइए!’

मेरा जी धड़ककर रह जाता है। ‘हुजूर’ शब्द पर मुझे आपत्ति है। उसमें गहरा व्यंग्य है। उसमें एक भीतरी मार है। मैं कन्धों पर फटी अपनी शर्ट के बारे में सचेत हो उठता हूँ। कमर की जगह पैंट तानने के लिए बेल्टनुमा पट्टी के लिए जो बटन लगाया गया था, उसकी ग़ैरहाज़िरी से मेरी आत्मा भड़क उठती है।

और मैं ईर्ष्या से उस व्यक्ति के नए फ़ैशनेबल कोट की ओर देखने लगता हूँ और जवान चेहरे की ओर सूखी मुसकान भरकर कहता हूँ, ‘आपका काम ख़त्म हुआ!’

मेरी बात में बनावटी मैत्री का रंग है। उसका काम ख़त्म हुआ या नहीं, इससे मुझे मतलब?

उसकी अलसाई थकान के दौर में वहाँ मेरा पहुँचना शायद उसे अच्छा लगा। शायद अपने काम से उसकी जो उकताहट थी, वह मेरे आने से भंग हुई। अकेलेपन से अपनी मुक्ति से प्रसन्न होकर उसने फैलते हुए कहा, ‘बैठो, कुरसी लो।’

उसका वचन सुनकर मैं धीरे-धीरे कुरसी पर बैठा। यदि कोई बड़ा अधिकारी छोटे को–बहुत छोटे को–कुरसी पर बैठने को कहे तो अनुशासन कैसे रहेगा। अनुशासन हमारे लिए, जो छोटे हैं और निर्बल हैं, जिन्हें दम घोंटकर मारा जाता है और जिनसे काम करवाया जाता है। मुझे एक लोहे का शिकंजा जकड़े हुए है, कब छूटूँगा मैं इस शिकंजे से! ख़ैर, शिकंजे को ढीला कर, ज़रा आराम ही कर लूँ।

मैं धीरे-धीरे कुरसी पर बैठता हूँ। वह अफ़सर फिर फ़ाइलों में डूब जाता है। दो पलों का वह विश्राम मुझे अच्छा लगता है। मैं कमरे का अध्ययन करने लगता हूँ। वही कमरा, मेरा जाना-पहचाना, जिसकी हर चीज़ मेरी जमाई है। मेरी देख-रेख में उनका पूरा इन्तज़ाम हुआ है। ख़ूबसूरत आरामकुरसियाँ, सुन्दर टेबिल परदे, आलमारियाँ, फ़ाइलें रखने के रैक आदि-आदि। इस समय वह कमरा अस्त-व्यस्त लगता है, और बेहद पराया। बिजली की रोशनी में, उसकी अस्त-व्यस्तता चमक रही है, उसका परायापन जगमगा रहा है।

मैं एक गहरी साँस भरता हूँ और उसे धीरे-धीरे छोड़ता हूँ। मुझे हृदय-रोग हो गया है–गुस्से का, क्षोभ का, खीझ का और अविवेकपूर्ण कुछ भी कर डालने की राक्षसी क्षमता का।

मेरे पास पिस्तौल है। और, मान लीजिए, मैं उस व्यक्ति का–जो मेरा अफ़सर है, मित्र है, बन्धु है–अब खून कर डालता हूँ। लेकिन पिस्तौल अच्छी है, गोली भी अच्छी है; पर काम बुरा है। उस बेचारे का क्या गुनाह? वह, मशीन का सिर्फ़ एक पुर्जा है। इस मशीन में ग़लत जगह हाथ आते ही वह कट जाएगा, आदमी उसमें फँसकर कुचल जाएगा, जैसे बैंगन! सबसे अच्छा है कि एकाएक आसमान में हवाई जहाज मँडराए, बमबारी हो और यह कमरा ढह पड़े, जिसमें मैं और वह दोनों ख़त्म हो जाएँ। अलबत्ता, भूकम्प भी यह काम कर सकता है!

फ़ाइल से सिर ऊँचा करके उसने कहा, ‘भाई, बड़ा मुश्किल है’ और उसने घंटी बजाई।

एक ढीला-ढीला, बेवकूफ़-सा प्रतीत होनेवाला स्थूलकाय व्यक्ति सामने आ खड़ा हुआ।

अफ़सर ने, जिसका नाम मेहरबान सिंह था, भौंहें ऊँची करके सप्रश्न भाव से कहा, ‘कैंटीन से दो कप गरम चाय ले आओ।’ मेरी तरफ़ ध्यान से देखकर फिर उससे कहा, ‘कुछ खाने को भी लेते आना।’

चपरासी की आवाज़ ऊँची थी। उसने गरजकर कहा, ‘कैंटीन बन्द हो गई।’

‘देखो, खुली होगी, अभी छह नहीं बजे होंगे।’

चाय और अल्पाहार के प्रस्ताव से मेरा दिमाग़ कुछ ठंडा हुआ। ज़रा दिल में रोशनी फैली। आदमीयत सब जगह है। इनसानियत का ठेका मैंने ही नहीं लिया। मेरा मस्तिष्क का चक्र घूमा। पावलोव ने ठीक कहा था, ‘कंडिशंड रिफ़्लैक्स!’ ख़याल भी रिफ़्लैक्स एक्शन है, लेकिन मुझे पावलोव की दाढ़ी अच्छी लगती है। उससे भी ज़्यादा प्रिय उसकी दयालु, ध्यान-भरी आँखें। उसका चित्र मेरे सामने तैर आता है।

मैं कुरसी पर बैठे-बैठे उकता जाता हूँ। कोई घटना होनेवाली है, कोई बहुत बुरी घटना। लेकिन मुझे उसका इन्तज़ार नहीं है। मैं उसके परे चला गया। कुछ भी कर लूँगा। मेहनत, मज़दूरी। फाँसी पर तो चढ़ा ही नहीं देंगे। लेकिन, एक दॉस्तॉएवस्की था, जो फाँसी पर चढ़ा और ज़िन्दा उतर आया। जी हाँ, ऐन मौक़े पर जार ने हुक्म दे दिया! देखिए, भाग्य ऐसा होता है।

मैं कॉरिडोर में जाता हूँ। वहाँ अब घुप अँधेरा हो गया है। मैं एक जगह ठिठक जाता हूँ, जहाँ से ज़ीना घूमकर नीचे उतरता है। यह एक सँकरी आँगननुमा जगह है। मैं रेलिंग के पास खड़ा हो जाता हूँ, नीचे कूद पड़ूँ तो! बस काम तमाम हो जाएगा! जान चली जाएगी, फिर सब ख़त्म, अपमान ख़त्म, भूख ख़त्म, लेकिन प्यार भी तो ख़त्म हो जाएगा, उसको सुरक्षित रखना चाहिए। और फिर चाय आ रही है! चाय पीकर ही न जान दी जाए, तृप्त होकर, सबसे पूछकर!

बिल्ली जैसे दूध की आलमारी की तरफ़ नज़र दौड़ाती है, उसी तरह मैंने बिजली के बटन के लिए अँधेरे-भरी पत्थर की दीवार पर नज़र दौड़ाई। हाँ, वो वहीं है। बटन दबाया। रोशनी ने आँख खोली। लेकिन प्रकाश नाराज़-नाराज़-सा, उकताया-उकतायासा फैला।

चऽलो, मैंने सोचा, चापरासी को रास्ता साफ़ दीखेगा।

मैंने एक ओर के दरवाज़े से प्रवेश किया। दूसरी ओर के दरवाज़े से चपरासी ने। मेरा चेहरा खुला। मेहरबानसिंह, नाटे-से काले-से, कभी फ़ीस की माफ़ी के लिए हरिजन, कभी गोंड-ठाकुर, अलमस्त और बेफ़िक्रे, जबान के तेज़, दिल से साफ़, अफ़सरी बू, और आदमीयत की गन्ध! और एक छोटा-सा चौकोर चेहरा!

उन्होंने हाथ ऊँचे कर, देह मोड़कर बदन से आलस मुक्त किया और एक लम्बी जमुहाई ली।

मेरा ध्यान चाय की ट्रे पर था। आँखें काग़ज़ पर गड़ाईं। भँवें सिकुड़ीं, और मैं पूरा का पूरा, काग़ज़ में समा गया।

मैंन चिढ़कर अँगरेज़ी में कहा, ‘यह क्या है?’

उन्होंने दृढ़ स्वर में जवाब दिया, ‘इससे ज़्यादा कुछ नहीं हो सकता।’

विरोध प्रदर्शित करने के लिए मैं बेचैनी से कुरसी से उठने लगा तो उन्होंने आवाज़ में नरमी लाकर कहा, ‘भाई मेरे, तुम्हीं बताओ, इससे ज़्यादा क्या हो सकता है! दिमाग़ हाजिर करो, रास्ता सुझाओ!’

‘लेकिन, मुझे ‘स्केपगोट’ बनाया जा रहा है, मैंने किया क्या!’

चाय के कप में शक्कर डालते हुए उन्होंने एक और काग़ज़ मेरे सामने सरका दिया और कहा, ‘पढ़ लीजिए!’

मुझे उस काग़ज़ को पढ़ने की कोई इच्छा नहीं थी। चाहे जो अफ़सर मुझे चाहे जो काम नहीं कह सकता। मेरा काम बँधा हुआ है।

नियम के विरुद्ध मैं नहीं था, वह था। लेकिन, उसने मुझे जब डाँटकर कहा तो मैंने पहले अदब से, फिर ठंडक से, फिर खीझकर, एक ज़ोरदार जवाब दिया। उस जवाब में ‘नासमझ’ और ‘ना वाँद’ जैसे शब्द ज़रूर थे। लेकिन, साइंटिफ़िकली स्पीकिंग, ग़लती उसकी थी, मेरी नहीं! फिर गुस्से में मैं नहीं, वह था। एक जूनियर आदमी मेरे सिर पर बैठा दिया गया, ज़रा देखो तो! इसीलिए कि वह फ़लाँ-फ़लाँ का ख़ास आदमी, वह ‘ख़ास-ख़ास’ काम करता था। उस शख़्स के साथ मेरी ‘ह्यूमन डिफ़िकल्टी’ थी!

मेहरबानसिंह ने कहा, ‘भाई, ग़लती मेरी थी, जो मैंने यह काम तुम्हारे सिपुर्द करने के बजाय, उसको सौंप दिया। लेकिन, चूँकि फ़ाइलें दौड़ गई हैं, इसलिए ऐक्शन तो लेना ही पड़ेगा। और उसमें है क्या! वार्निंग है, सिर्फ़ हिदायत!’

हम दोनों चाय पीने लगे, और बीच-बीच में खाते जाते।

एकाएक उन्हें ज़ोर की गगन-भेदी हँसी आई। मैं विस्मित होकर देखने लगा। वे ठठाकर हँस रहे थे, हँसी की लहरें फैल रही थीं। मानो पूरा कमरा ठठाकर हँस रहा हो। जब उनकी हँसी का आलोड़न ख़त्म होने को था कि उन्होंने कहा, ‘लो, मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ। तुम अच्छे, प्रसिद्ध लेखक हो। सुनो और गुनो!’

और, मेहरबानसिंह का छोटा-सा चेहरा गम्भीर होकर कहानी सुनाने लगा।

‘मुसीबत आती है तो चारों ओर से। ज़िन्दगी में अकेला, निस्संग और बी.ए. पास एक व्यक्ति। नाम नहीं बताऊँगा।

पेट। शरीर से कमज़ोर। ज़िन्दगी से निराश। काम नहीं मिलता। शनि का चक्कर। हर भले आदमी से काम माँगता है। लोग सहायता भी करते हैं। लेकिन उससे दो जून खाना भी नहीं मिलता, काम नहीं मिलता, नौकरी नहीं मिलती। चपरासीगीरी की तलाश है, लेकिन वह भी लापता। कपबशी धोने और चाय बनाने के काम से लगता है कि दो दिनों बाद अलग कर दिया जाता है। जेब में बी.ए. का सर्टिफ़िकेट है। लेकिन, किस काम का!’

मैंने सोचा, मेहरबानसिंह अपनी ज़िन्दगी की कथा कह रहे हैं। मुझे मालूम तो था कि मेरे मित्र के बचपन और नौजवानी के दिन अच्छे नहीं गए हैं। मैं और ध्यान से सुनने लगता हूँ।

मेहरबानसिंह का छोटा-सा काला चौकोर चेहरा भावना से विद्रूप हो जाता है। वह मुझसे देखा नहीं जाता। मेहरबानसिंह कहता है, ‘नौकरी भी कौन दे? नीचे की श्रेणी में बड़ी स्पर्धा है। चेहरे से वह व्यक्ति एकदम कुलीन, सुन्दर और रौबदार, किन्तु घिघियाया हुआ। नीचे की श्रेणी में जो अलफतियापन है, गाली-गलौज की जो प्रेम-पदावली है, फटेहाल ज़िन्दगी की जो कठोर, विद्रूप, भूखी, भयंकर सभ्यता है, वहाँ वह कैसे टिके! कमज़ोर आदमी, रिक्शा कैसे चलाए!

‘नीचे की श्रेणी उस पर विश्वास नहीं कर पाती। उसे मारने दौड़ती है। उसका वहाँ टिकना मुश्किल है। दरमियानी वर्ग में वह जा नहीं सकता। कैसे जाए, किसके पास जाए! जब तक उसकी जेब में एक रुपया न हो।’

मेहरबानसिंह के गले में आँसू का काँटा अटक गया। मैं सब समझता हूँ, मुझे खूब तजुरबा है, इस आशय से मैंने उनकी तरफ़ देखा और सिर हिला दिया।

उन्होंने सूने में, अजीब-से सूने में, निगाह गड़ाते हुए कहा (शायद उनका लक्ष्य आँखों ही आँखों में आँसू सोख लेने का था, जिन्हें वे बताना नहीं चाहते थे), ‘आत्महत्या करना आसान नहीं है। यह ठीक है कि नईशुक्रवारी तालाब में महीने में दो बार आत्महत्याएँ हो जाती हैं। लेकिन छह लाख की जनसंख्या में सिर्फ़ दो माहवार, यानी साल में चौबीस! दूसरी ज़दों से की गई आत्महत्याएँ मिलाई जाएँ तो सालाना पचास से ज़्यादा न होंगी। यह भी बहुत बड़ी संख्या है। आत्महत्या आसान नहीं है।’

उनके चेहरे पर काला बादल छा गया। अब वे पहचान में नहीं आते थे। अब वे मेरे अफ़सर भी न रहे, मेरे परिचित भी नहीं। सिर्फ़ एक अजनबी–एक भयानक अजनबी। मेरा भी दम घुटने लगा। मैंने सोचा, कहाँ का क़िस्सा उन्होंने छेड़ दिया! मेहरबानसिंह ने मेरी ओर कहानीकार की निगाह से देखा और कहा कि, ‘उन दिनों शहर में एक सर्कस आया हुआ था। बड़ी धूम-धाम थी। बड़ी चहल-पहल।

‘रोज़ सुबह-शाम सर्कस का प्रोसेशन निकलता, बाजे-गाजे के साथ, बैंडबाजे के साथ। जुलूस में एक मोटर का ठेला भी चलता, खुला ठेला, प्लेटफ़ार्मनुमा! उस पर रंग-बिरंगे, अजीबोग़रीब जोकर विचित्र हाव-भाव करते हुए नाचते रहते। लोगों का ध्यान आकर्षित करते।

‘जो एक लम्बे अरसे से बेघरबार और बेकार रहा है, उसकी इंस्टिक्ट (प्रवृत्ति) शायद आपको मालूम नहीं। वह व्यक्ति क्रान्तिकारी नहीं होता, वह ख़ासतौर से... घुमन्तु ‘जिप्सी’ होता है। उसे चाहे जो वस्तु, दृश्य, घटना, दुर्घटना, यात्रा, बारिश, दूसरों की बातचीत, कष्ट, दुख, सुन्दर चेहरा, बेवकूफ़ चेहरा, मलिनता, कोढ़। सब तमाशे-नुमा मालूम होता है। चाहे जो...खींचता है...आकर्षित करता है, और कभी-कभी पैर उधर चल पड़ते हैं।

‘एक आइडिया, एक ख़याल आँखों के सामने आया। जोकर होना क्या बुरा है! ज़िन्दगी–एक बड़ा भारी मज़ाक़ है; और तो और, जोकर अपनी भावनाएँ व्यक्त कर सकता है। चपत जड़ सकता है। एक दूसरे को लात मार सकता है, और, फिर भी, कोई दुर्भावना नहीं। वह हँस सकता है, हँसा सकता है। उसके हृदय में इतनी सामर्थ्य है।’

मेहरबानसिंह ने मेरी ओर अर्थ-भरी दृष्टि से देखकर कहा कि ‘इसमें कोई शक नहीं कि जोकर का काम करना एक परवर्शन (अस्वाभाविक प्रवृत्ति) है! मनुष्य की सारी सभ्यता के पूरे ढाँचे चरमराकर नीचे गिर पड़ते हैं, चूर-चूर हो जाते हैं। लेकिन असभ्यता इतनी बुरी चीज़ नहीं, जितना आप समझते हैं। उसमें इंस्टिक्ट का, प्रवृत्ति का खुला खेल है, आँख मिचौनी नहीं। लेकिन अलबत्ता, वह परवर्शन ज़रूर है। परवर्शन इसलिए नहीं कि मनुष्य परवर्ट है, वरन् इसलिए कि परवर्शन के प्रति उसका विशेष आकर्षण है, या कभी-कभी हो जाता है। अपने इंस्टिक्ट के खुले खेल के लिए असभ्य और बर्बर वृत्ति के सामर्थ्य और शक्ति के प्रति खिंचाव रहना, मैं तो एक ढंग का परवर्शन ही मानता हूँ।’

मेहरबानसिंह के इस वक्तव्य से मुझे लगा कि वह उनका एक आत्म-निवेदन मात्र है। मैं यह पहचान गया–इसे वे भाँप गए। उनकी आँखों में एकाएक प्रकट हुई और फिर वैसे ही तुरन्त लुप्त हुई रोशनी से मैं यह जान गया। लेकिन मेरे ख़याल की उन्होंने परवाह नहीं की। और उनकी कहानी आगे बढ़ी।

‘आख़िरकार, उसने जोकर बनने का बीड़ा उठाया। भूख ने उसे काफ़ी निर्लज्ज भी बना दिया था।

‘शाम को, जब खेल शुरू होने के लिए क़रीब दो घंटे बाकी थे, उसने सर्कस के द्वार से घुसना चाहा कि वह रोक दिया गया। वह अन्दर जाने के लिए गिड़गिड़ाया। दो मजबूत आदमियों ने उसकी दो बाँहें पकड़ लीं। वे गोआनीज़ मालूम होते थे।

‘कहाँ जा रहे हो?’

‘रौब ज़माने के लिए उसने अंग्रेज़ी में कहा, ‘मैनेजर साहब से मिलना है।’

‘अंग्रेज़ी में जवाब मिला, ‘वहाँ नहीं जा सकते! क्या काम है?’

‘हिन्दी में, ‘नौकरी चाहिए!’

‘अंग्रेज़ी में, ‘नौकरी नहीं है, गेट-आउट।’ और वह बाहर फेंक दिया गया।

‘दिल को धक्का लगा। बाहर, एक पत्थर पर बैठे-बैठे वह सोचने लगा कहीं भी जनतंत्र नहीं है। यहाँ भी नहीं। भीख नहीं माँग सकता, यह असम्भव है, इसलिए नौकरी की तलाश है। और वह मन ही मन न मालूम क्या-क्या बड़बड़ाने लगा।’

मेहरबानसिंह ने कहा कि, ‘यहाँ से कहानी एक नए और भयंकर तरीक़े से मुड़ जाती है। वह मैनेजर को देखने का प्रयत्न करे, या वापस हो! बताइए, आप बताइए!’ और, उन्होंने मेरी आँखों में आँखें डालीं।

उनके प्रश्न का मैं क्या जवाब देता! फिर भी, मैंने अपने तर्क से कहा कि, ‘स्वाभाविक यही है कि वह मैनेजर से मिलने की एक बार और कोशिश करे। जोकर की कमाई भी मेहनत की कमाई होती है! कोई धर्मादाय पर जीने की बात तो है नहीं।’

‘एक्जैक्टली!’ (ठीक बात है) उन्होंने कहा! ‘उसने भी यही निर्णय किया, लेकिन यह निर्णय उसके आगे आनेवाले भीषण दुर्भाग्य का एकमात्र कारण था। वह निर्णयात्मक क्षण था, जब उसने यह तय किया कि मैनेजर से मिलने के लिए सर्कस के सामने वह भूख-हड़ताल करेगा। उसने यह तय किया, संकल्प किया, प्रण किया। और, यह प्रण आगे चलकर उनके नाश का कारण बना! दिल की सच्चाई, और सही-सही निर्णय से दुर्भाग्य का कोई सम्बन्ध नहीं है। उसका चक्र स्वतंत्र है, उसके अपने नियम हैं।’

मेहरबानसिंह अपनी कुरसी से उठ पड़े। कोट की जेबों में माचिस की तलाश करने लगे। मैंने अपनी जेब से उन्हें दियासलाई दी, जिसमें कुछ ही कड़ियाँ शेष थीं। उन्होंने मुझे सिगरेट ऑफ़र की। मैंने ‘नहीं-नहीं’ कहा, ‘मेरे पास बीड़ी है।’

‘अरे लो! कामरेड! लाओ, मुझे बीड़ी दो! मैं बीड़ी पीऊँगा!’

कामरेड शब्द के प्रयोग पर मुझे ताज्जुब है। ऐसा उन्होंने क्यों कहा? मेरे लिए इस शब्द का आज तक किसी ने प्रयोग नहीं किया। मैं मेहरबानसिंह के अतीत के विषय में कुछ जिज्ञासु और सशंक हो उठा। मेरी कल्पना ने कहा–इनके भूतकाल में कोई भूत ज़रूर बैठा है! एक सेकंड क्लास गज़ेटेड अफ़सर की रैंक का आदमी इस शब्द का प्रयोग करता है, ज़रूर वह पुराने ज़माने में उचक्का रहा होगा!

मेहरबानसिंह ने भौंहों के परे देखते हुए, मानो आसमान की तरफ़ देख रहे हों, बीड़ी का एक कश खींचा, और कहा, ‘इसके आगे मैं ज़्यादा नहीं कह सकूँगा, कुछ इप्रेशंस ही कहूँगा।

‘भूख हड़ताल के आसपास लोगों के जमाव से घबराकर नौकरों ने शायद मैनेजर के सामने जाकर यह बात कही। थोड़े ही समय बाद, शामियाने के अन्दर ही बनाए गए एक कमरे में वह ले जाया गया। भीड़ बाहर रोक दी गई। थोड़ी देर बाद सर्कस शुरू हुआ।

‘एक काले पैंट पर सफ़ेद झक कोट पहने वह साढ़े छह फ़ुट का मोटा-ताजा आदमी था, जो बिलकुल गोरा, यहाँ तक कि लाल मालूम होता था। वह या तो ऐंग्लो-इंडियन होगा या गोआनीज़! आँखें कंजी, जिसमें हरी झाँक थी। वह एकदम चीता मालूम होता था। उतना ही ख़ूबसूरत, वैसा ही भयंकर!

‘उसने साफ़ हिन्दी में कहा, ‘क्या चाहते हो?’

‘उसे काटो तो खून नहीं। उसके राक्षसी भव्य सफ़ेद सौन्दर्य को देखकर वह इतना हत्प्रभ हो गया था।

‘मैनेजर ने फिर पूछा, ‘क्या चाहते हो?’

‘दिमाग़ सुन्न हो गया था। मैनेजर के आसपास ख़ूबसूरत औरतें आ-जा रही थीं। गुलाब-सी खिली हुईं, या ज़िन्दा लाल मांस-सी चमकती हुईं। लेकिन भयंकर आकर्षक।

‘उसने सोचा, यह एक नया तजुरबा है।

‘उसने शब्दों में दयनीयता लाते हुए कहा, ‘मुझे नौकरी चाहिए, कोई भी। चाहो तो झाड़ू दे सकता हूँ, कपड़े साफ़ कर सकता हूँ। मुझे नौकर रख लो। चाहो तो मुझे जोकर बना दो। कई दिन से, पेट में कुछ नहीं, कुछ नहीं! मैं आपके पाँव पड़ता हूँ।’

‘तो, साहब, वह गिड़गिड़ाहट जारी रही। शब्द, वाक्य बग़ैर कॉमा-फुलस्टाप के बहते गए, बहते गए। वहाँ के वातावरण के चमत्कारपूर्ण भयंकर आकर्षण ने उसे जकड़ लिया। उसने निश्चय कर लिया कि मैं जान दूँगा, लेकिन यहाँ से टलूँगा नहीं।

‘मैंनेजर ने ऐसा आदमी नहीं देखा था। पता नहीं, उसने क्या सोचा। लेकिन उसके चेहरे पर आश्चर्य और घृणा के भाव रहे होंगे।

‘उसने कठोर स्वर में कहा, ‘मेरे पास कोई नौकरी नहीं है। लेकिन तुम्हें रख सकता हूँ, सिर्फ़ एक शर्त पर।’

‘वह उसका चेहरा देखता खड़ा रह गया। इस आचानक दया से, उसके मुँह से एक शब्द भी न निकला। उसने केवल इतना सुना, ‘सिर्फ़ एक शर्त पर।’

‘उसने मौखिक व्यायाम-सा करते हुए कहा, ‘मैं हर शर्त मानने के लिए तैयार हूँ। मैं झाड़ू दूँगा। पानी भरूँगा। जो कहेंगे सो करूँगा’। (ज़िन्दगी का एक ढर्रा तो शुरू हो जाएगा)

‘मैनेजर ने घृणा, तिरस्कार और रौब से उसके सामने एक रुपया फेंकते हुए कहा, ‘जाओ, खा आओ, कल सुबह आना!’ और मुँह फिराकर वह दूसरी ओर चलता बना। एक सीन ख़त्म हुआ।

‘दुर्भाग्य के मारे इस व्यक्ति ने फिर उस मैनेजर का चेहरा कभी नहीं देखा।’

मेहरबानसिंह क़िस्सा कहते-कहते थक गए-से मालूम हुए। उन्होंने एक सिगरेट मेरे पास फेंकी, एक ख़ुद सुलगाई और कहने लगे, ‘किस्सा मुख़्तसर में यों है कि दूसरे दिन तड़के जब वह व्यक्ति सर्कस में दाख़िल हुआ तो दो अजनबी आदमियों ने उसकी बाँहें पकड़ लीं और उसे एक बन्द कोठे में ले गए। उसे कहा गया कि उसकी ड्यूटी सिर्फ़ कमरे में बैठे रहना है। उस दिन उसे खाना-पीना नहीं मिला। कोठे में किसी जंगली दरिन्दे की बास आ रही थी। उसके शरीर की उग्र दुर्गन्ध वहाँ वातावरण में फैली हुई थी। कमरा छोटा था। और बहुत ऊँचाई पर एक छोटा-सा सूराख था, जहाँ से हवा और प्रकाश आता था। लेकिन वह अँधेरे के सूनेपन को चीरने में असमर्थ था। वह व्यक्ति एक दिन और एक रात वहाँ पड़ा रहा। उसे सिर्फ़ दरिन्दों का ख़याल आता। उनके भयानक चेहरे उसे दिखाई देते, मानो वे उसे खा जाएँगे।

‘एक बड़े ही लम्बे और कष्टदायक अरसे बाद, जब एक चमकदार यहूदी औरत ने कोठे का दरवाज़ा खोला और उसे कहा, ‘गुड मार्निंग’, तब उसे समझ में आया कि वह स्वयं ज़िन्दगी का एक हिस्सा है, मौत का हिस्सा नहीं। औरत बेतकल्लुफ़ी से उसके पास बैठ गई और उसे नाश्ता कराया, जिसमें कम-से-कम तीन कप गरम-गरम चाय, ताजा भुना गोश्त, अंडा, सेंडविचेज और कुछ भारतीय मिठाई भी थी।

‘लेकिन इतना सब कुछ उससे खाया नहीं गया। मरे हुए की भाँति उसने पूछा, ‘मुझे कब तक कोठे में रखा जाएगा, मेरी ड्यूटी क्या है?’

‘यहूदी औरत सिर्फ़ मुसकराई। उसने कहा, ‘ईश्वर को धन्यवाद दो कि तुम्हारी तरक्क़ी का रास्ता खुल रहा है। ये तो बीच के इम्तिहानात हैं, जिन्हें पास करना निहायत ज़रूरी है।’

‘किन्तु, उस व्यक्ति का मन नहीं भरा। उसने फिर पूछा, ‘क्या मैं मैनेजर से मिल सकता हूँ?’

‘यहूदी औरत जब वापस जाने लगी तब उसने कहा, ‘कल फिर आओगी क्या?’

‘उसने पीछे की ओर देखा, मुसकराई और बग़ैर जवाब दिए वापस चली गई। कोठे का दरवाज़ा चरमराया और काली बॉस्कट पहने हुए दो काले व्यक्ति हंटर लिये हुए वहाँ पहुँचे।

‘वे न मालूम कैसी-कैसी भयंकर कसरतें करवाने लगे, जिनका वर्णन नहीं किया जा सकता। वे कसरतें नहीं थीं, शारीरिक अत्याचार था। ज़रा ग़लती होने पर वे हंटर मारते। इस दौरान में उस व्यक्ति की काफ़ी पिटाई हुई। उसके हाथ, पैर, ठोड़ी में घाव लग गए। वह कराहने लगा। कराह सुनते ही चाबुक का गुस्सा तेज़ होता। मतलब यह कि यह अधमरा हो गया। उसको ऐसी हालत में छोड़कर हंटर-धारी राक्षस चले गए।

‘क़रीब तीन घंटे बाद चाय आई, डॉक्टर आए, इंजेक्शन लगे, किन्तु किसी ने दरिन्दों की दुर्गन्ध से भरे हुए उस कोठे में से उसे नहीं निकाला।

‘समय ने हिलना-डुलना छोड़ दिया था। वह जड़ीभूत सूने में परिवर्तित हो गया था।

‘बाद में, दो-एक दिन तक, किसी ने उसकी ख़बर नहीं ली। उसे प्रतीत होने लगा कि वह किसी क़ब्र के भीतर के अन्तिम पत्थर के नीचे गड़ा हुआ सिर्फ़ एक अधमरा प्राण है।

‘एकाएक तीन-चार आदमियों ने प्रवेश किया और उसे उठाकर, मानो वह प्रेत हो, एक साफ़-सुथरे कमरे में ले गए। वहीं उसे दो-चार दिन रखा गया, अच्छा भोजन दिया गया।

‘कुछ दिनों बादर, ज्योंही उसके स्वास्थ्य में सुधार हुआ, उसे वहाँ से हटाकर रीछों के एक पिंजरे में दाख़िल कर दिया गया।

‘अब उसके दोस्त रीछ बनने लगे। वही उसका घर था, कम-से-कम वहाँ हवा और रोशनी तो थी।

‘लेकिन उसकी यह प्रसन्नता अत्यन्त क्षणिक थी। उसके शरीर पर अत्याचारों का नया दौर शुरू हुआ। उससे अजीबोग़रीब ढंग की क़वायदें कराई जातीं। रीछों के मुँह में हाथ डलवाए जाते, रीछ छाती पर चढ़वाया जाता और ज़रा ग़लती की कि हंटर। कुछ रीछ बड़े शैतान थे। उसके मुँह चाटते, कान काट लेते। उनके बालों में कीड़े रहा करते और हमेशा यह डर बना रहता कि कहीं रीछ उसे मार न डालें। शुरू-शुरू में व्यक्ति को भुना हुआ मांस मिलता। अब उसके सामने कच्चे मांस की थाली जाने लगी। अगर न खाए तो मौत, खाए तो मौत।

‘और हंटरों का तो हिसाब न पूछो। शायद ही कोई ऐसा दिन गया होगा, जब उस पर हंटर न पड़े हों, बाद में भले ही टिंक्चर आयोडिन और मरहम लगाया गया हो।

‘वह यह पहचान गया कि उसे जान-बूझकर पशु बनाया जा रहा है। पशु बन जाने की उसे ट्रेनिंग दी जा रही है। उसके शरीर के अन्दर नई सहन-शक्ति पैदा की जा रही है।

‘अब उसे कोठे से निकाल बाहर किया गया और एक दूसरे छोटे पिंजरे में बन्द कर दिया गया। वहाँ कोई नहीं था, और वह एक निर्द्वन्द्व अकेला जानवर था। अकेलेपन में वह पिछली ज़िन्दगी से नई ज़िन्दगी की तुलना करने लगता और उसे आत्महत्या करने की इच्छा हो जाती। इस नए क्षेत्र में, जीवन-यापन का एकमात्र स्टैंडर्ड यह था कि वह पशु-रूप बन जाए। उसने इसकी कोशिश भी की।

‘एक अति-भीषण क्षण में चार-पाँच आदमी पिंजरे में घुसे और उसे घेर लिया। उसकी भयभीत पुतलियाँ आँखों में मछली-सी तैर रही थीं। वह डर के मारे बर्फ़ हो रहा था। शायद, अब उसे बिजली के हंटर पड़ेंगे! पाँचों आदमियों ने उसे पकड़ लिया और उसके शरीर पर ज़बरदस्ती रीछ का चमड़ा मढ़ दिया गया और उससे कह दिया गया कि साले, अगर रीछ बनकर तुम नहीं रहोगे तो गोली से फ़ौरन से पेशतर उड़ा दिए जाओगे।

‘यहाँ से उस व्यक्ति का मानव-अवतार समाप्त होकर ऋक्षावतार शुरू होता है। उससे वे सभी क़वायदें करवाई जाती हैं जो एक रीछ करता है। उस सबकी प्रैक्टिस दी जाती है। और प्रैक्टिस भी कैसी? महाभीषण! और अगर नहीं की तो सभी आदमी एकदम उस पर हमला करते हैं। बिजली के हंटरों की फटकार, गाली-गलौज और मारपीट तो मानो रूटीन हो गई है। जलते हुए लोहे के पहिए के बीच से उसे निकल जाने को कहा जाता है। उसे खौफ़नाक ऊँचाई से कुदवाया जाता है, आदि-आदि।

‘फिर उसे कच्चा मांस, भुना मांस और शराब पिलाई जाती है और यह घोषित किया जाता है कि कल उसकी प्रैक्टिस अकेले-अकेले सिर्फ़ शेरों के साथ होगी।

‘शीघ्र ही इम्तिहान का चरम क्षण उपस्थित होता है।

‘वह रात-भर भयंकर दु:स्वप्न देखता रहा है। वैसे तो सर्कस की उसकी पूरी ज़िन्दगी एक भीषण दु:स्वप्न है, किन्तु कल रात का उसका सपना, दु:स्वप्न के भीतर का एक भीषण दु:स्वप्न है, जिसे वह कभी नहीं भूल सकता। वह सुबह उठता है तो विश्वास नहीं कर पाता है कि वह इनसान है। चले गए वे दिन जब वह किसी का मित्र तो किसी का पुत्र था। पेट भूखा ही क्यों न सही, आँखें तो सुन्दर दृश्य देख सकती थीं। और वह सुनहली धूप! आहा! कैसी ख़ूबसूरत! उतनी ही मनोहर जितनी सुशीला की त्वचा!!

‘लेकिन वह अपने पर ही विस्मित हो उठा। यह सब वह सह सका, ज़िन्दा रह सका, कच्चा मांस खा सका! मार खा सका और जीवित रह सका! क्या वह आदमी है? शायद, पशु बनने की प्रक्रिया पहले से ही शुरू हो गई थी।

‘नाश्ते का समय आया। किन्तु, नाश्ता गोल! राम-राम कहते-कहते भोजन का समय आया तो वह भी ग़ैर-हाजिर! पेट का भूखा! क्या करे! शायद, भोजन आता ही होगा!

‘लेकिन, उसे बिलकुल भूख नहीं है, जबान सूखी हुई है। अगर वह चिल्लाया तो, पहले की भाँति, मुँह में कपड़ा ठूँस दिया जाएगा और उससे और तकलीफ़ होगी। खैरियत इसी में है कि वह चुप रहे, और आराम से साँस ले।

‘एकाएक सामने का एक बड़ा भारी पिंज़रा खुला। अब तक उसमें कुछ नहीं था, लेकिन अब उसमें एक बड़ा-डरावना शेर हलचल करता हुआ दिखाई दे रहा था। एकाएक उसका भी पिंज़रा खुला और दोनों पिंजरों के दरवाज़े एक-दूसरे के सामने हो लिए। और, आदमियों की जो छायाएँ इधर-उधर दिखाई दे रही थीं, वे ग़ायब हो गईं।

‘एकाएक शेर चिंघाड़ा! ऋक्षावतार का रोम-रोम काँप उठा, कण-कण में भय की मर्मान्तक बिजली समा गई। रीछ को मालूम हुआ कि शेर ने ऐसी ज़ोरदार छलाँग मारी कि एकदम उसकी गरदन उस दुष्ट पशु के जबड़े में जकड़ी गई। हृदय से अनायास उठनेवाली ‘मरा-मरा’ की ध्वनि के बाद अँधेरा-सा फैलने लगा। शेर की साँस उसके आसपास फैल गई, शेर के चमड़े की दुर्गन्ध उसकी नाक में घुसी कि इतने में उसके कान में कुछ कम्पन हुआ, कुछ लहरें घुसीं जो कहने लगीं :

‘अबे डरता क्या है, मैं भी तेरे ही सरीखा हूँ, मुझे भी पशु बनाया गया है, सिर्फ़ मैं शेर की खाल पहने हूँ, तू रीछ की!’

‘इस बात पर रीछ को विश्वास करने या न करने की फ़ुरसत ही न देते हुए शेर ने कहा, ‘तुम पर चढ़ बैठने की सिर्फ़ मुझे कवायद करनी है, मैं तुझे खा डालने की कोशिश करूँगा, खाऊँगा नहीं। क़वायद नहीं की तो हंटर पड़ेंगे तुमको और मुझको भी! मैं तुझे खा नहीं सकता। आओ, हम दोस्त बन जाएँ। अगर पशु की ज़िन्दगी ही बितानी है तो ठाठ से बिताएँ, आपस में समझौता करके।’

मैं ठहाका मारकर हँस पड़ा। बात मुझ पर चस्पा हो गई। बड़ी देर तक बात का मज़ा लेता रहा। फिर मेरे मुँह से निकल पड़ा, ‘तो गोया आप शेर हैं और मैं रीछ।’

मुझ पर कहानी का जो असर हुआ उसकी ओर तनिक भी ध्यान न देते हुए, अत्यन्त दार्शनिक भाव से मेरे अफ़सर ने कहा, ‘भाई, समझौता करके चलना पड़ता है ज़िन्दगी में, कभी-कभी जान-बूझकर अपने सिर बुराई भी मोल लेनी पड़ती है। लेकिन उससे फ़ायदा भी होता है। सिर सलामत तो टोपी हज़ार।’

अफ़सर के चेहरे पर गहरा कड़वा काला ख़याल जम गया था। लगता था मानो वह स्वयं कोई रटी-रटाई बात बोल रहा हो। मुझे लगा कि ज़िन्दगी से समझौता करने में उसे अपने लम्बे-लम्बे पैर और हाथ काटने-छाँटने पड़े हैं। शायद मुझे देखकर उसे उस बैल की याद आई थी, जिसके सिर पर जुआ रखा तो गया है, लेकिन जो उससे भाग-भाग उठा है। शायद, उसे इस बात की खुशी भी हुई थी कि मुझमें वह जवान नासमझी है, जो ग़लत और फ़ालतू बातें एक मिनट गवारा नहीं कर सकती।

मैं उसकी साँवली हड्डीदार सूरत को देखता रहा। हाँ, उस पर ज़िन्दगी से समझौते के विरुद्ध एक क्षोभ की काली भावना छाई हुई थी।

मैंने पूछा, ‘तो मैं इस काग़ज़ पर दस्तख़त कर दूँ?’

उसने दबाब के साथ कहा, ‘बिला शक, वार्निंग देनेवाला मैं, लेनेवाले तुम, मैं शेर तुम रीछ।’

यह कहकर वह हँस पड़ा, मानो उसने अनोखी बात कही हो। मैंने मज़ाकिया ढंग से पूछा, ‘मैं देखना चाहता हूँ कि शेर के कहीं दाँत तो नहीं हैं।’

‘तुम भी अजीब आदमी हो, यह तो सर्विस है, सर्कस नहीं।’

मैंने गम्भीरतापूर्वक कहा, ‘देखो, आज पाँच साल की नौकरी हो गई। एक बार भी न ऐक्सप्लेनेशन दिया, न मुझे वार्निंग आई। मज़ा यह है कि मुझे वार्निंग उस बात के ख़िलाफ़ जो मैंने कभी की ही नहीं। यह कलंक है उस अपराध का जो मैंने कभी किया ही नहीं!’

उसने कहा, ‘तब तुमने भाड़ झोंका। अगर ऐक् सप्लेनेशन देने की कला तुमको नहीं आई तो फिर सर्विस क्या की! मैंने तीन सौ आठ ऐक्सप्लेनेशन दिए हैं। वार्निंग अलबत्ता मुझे नहीं मिली, इसलिए कि मुझे ऐक्सप्लेनेशन लिखना आता है, और इसलिए कि मैं शेर हूँ, रीछ नहीं। तुमसे पहले पशु बना हूँ। सीनियॉरिटी का मुझे फ़ायदा भी तो है। कभी आगे तुम भी शेर बन जाओगे।’

बात में गम्भीरता थी, मज़ाक़ भी। मज़ाक़ का मज़ा लिया, गम्भीरता दिल में छिपा ली।

इतने में मैंने उससे पूछा, ‘यह कहानी आपने कहाँ सुनी?’

वह हँस पड़ा। ‘यह एक लोककथा है। इसके कई रूप प्रचलित हैं। कुछ लोग कहते हैं कि वह रीछ बी.ए. नहीं था, एम.ए. हिन्दी था।’

भयानक व्यंग्य था उसके इन शब्दों में। मैंने उससे सहज जिज्ञासा के भोले भाव से पूछा, ‘तो क्या उसने सचमुच फिर से मैनेजर को नहीं देखा?’

वह मुसकराया। मुसकराता रह गया। उसके मुँह से सिर्फ़ इतना ही निकला ‘यह तो सोचो कि वह कौन मैनेजर है जो हमें-तुम्हें, सबको, रीछ-शेर-भालू-चीता-हाथी बनाए हुए है!’

मेरा सिर नीचे लटक गया। किसी सोच के समंदर में तैरने लगा।

तब तक चाय बिलकुल ठंडी हो चुकी थी और दिल भी।

(सम्भावित रचनाकाल 1959 के बाद। नई कहानी, अगस्त 1967 में प्रकाशित।)