साधना का फौजदारी अन्त (व्यंग्य) : हरिशंकर परसाई

 

पहले वह ठीक था। वह अपर डिविज़न क्लर्क है। बीवी है, दो बच्चे हैं। कविता वगैरह का शौक है। तीसरा बच्चा होने तक यू. डी. सी. का काव्य-प्रेम बराबर रहता है। इसके बाद वह भजन पर आ जाता है–दया करो हे दयालु भगवन! और दयालु भगवन दया करके उसे परिवार-नियोजन केन्द्र को भेज देते हैं, जहां लाल तिकोन में उसे ईश्वर की छवि दिखती है।

वह मेरे पास कभी-कभी आता। कविता सुनाता। कोई पुस्तक पढ़ने को ले जाता, जिसे नहीं लौटाता।

2-3 महीने वह लगातार नहीं आया। फिर एक दिन टपक पड़ा। पहले जिज्ञासु की तरह आता था। अब कुछ इस ठाठ से आया जैसे जिज्ञासा शांत करने आया हो। उसका कुर्सी पर बैठना, देखना, बोलना–सब बदल गया था। उसने कविता की बात नहीं की। सुबह के अखबार की खबरों की बात भी नहीं की थी।

बड़ी देर तो चुप ही बैठा रहा। फिर गम्भीर स्वर में बोला–मैं जीवन के सत्य की खोज कर रहा हूं।

मैं चौंका। सत्य की खोज करने वालों से मैं छड़कता हूं। वे अकसर सत्य की ही तरफ पीठ करके उसे खोजते रहते हैं।

मुझे उस पर सचमुच दया आई। इन गरीब क्लर्कों को सत्य की खोज करने के लिए कौन बहकाता है? सत्य की खोज कई लोगों के लिए ऐयाशी है। यह गरीब आदमी की हैसियत के बाहर है।

मैं कुछ नहीं बोला। यही बोला–जीवन-भर मैं जीवन के सत्य की खोज करूंगा। यही मेरा व्रत है।

मैंने कहा–रात-भर खटमल मारते रहोगे, तो सोओगे कब!

वह समझा नहीं। पूछा–क्या मतलब?

मैंने कहा–मतलब यह है कि जीवन-भर जीवन के सत्य की खोज करते रहोगे, जीओगे क्या मरने के बाद?

उसने कहा–जीना? जीना कैसा? पहले जीवन के उद्देश्य को तो मनुष्य जाने।

उसे रटाया गया था। मैंने फिर उसे पटरी पर लाने की कोशिश की। कहा–देख भाई, बहुत से बेवकूफ जीवन का उद्देश्य खोजते हुए निरुद्देश्य जीवन जीते रहते हैं। तू क्या उन्हीं में शामिल होना चाहता है?

उसे कुछ बुरा लगा। कहने लगा–आप हमेशा इसी तरह की बातें करते हैं। फिर भी मैं आपके पास आता हूं। क्योंकि मैं जानता हूं कि आप भी सत्य की खोज करते हैं। आप जो लिखते हैं, उससे यही मालूम होता है।

मैंने कहा–यह तुम्हारा ख़्याल गलत है। मैं तो हमेशा झूठ की तलाश में रहता हूं। कोने-कोने में झूठ को ढूंढ़ता फिरता हूं। झूठ मिल जाता है, तो बहुत खुश होता हूं।

न वह समझा, न उसे विश्वास हुआ। वह मुझे अपनी तरह ही सत्यान्वेषी, समझता रहा।

मैंने पूछा–तुम एकदम से सत्यान्वेषी कैसे हो गए? क्या दफ्तर में पैसों का कोई गोलमाल किया है?

उसने कहा–नहीं, मुझे गुरु मिल गए हैं। उन्हीं ने मुझे सत्य की खोज में लगाया है।

मैंने पूछा–कौन गुरु हैं वे?

उसने नाम बयाया। मैं उन्हें जानता था।

यू. डी. सी. बोला–गुरुदेव की वाणी में अमृत है। हृदय तक उनकी बात पहुँच जाती है।

मैंने पूछा–दिमाग तक बात पहुंचती है या नहीं?

उसने कहा–दिमाग? दिमाग को तो पलट देती है।

इसका नमूना तो वह खुद था।

वह मेरे पास कभी-कभी आता। उसकी साधना लगातार बढ़ रही थी।

एक दिन आते ही पूछने लगा–बताइए, मैं कौन हूं?

मैंने कहा–तुम बिहारीलाल हो, यू. डी. सी.।

उसने कहा–नहीं, यह भ्रम है। बिहारीलाल तो इस स्कूल-चोले का नाम है। मैं शुद्ध बुद्ध आत्मा हूँ।

मैंने कहा–यार, महीने-भर पहले ही तेरे यहां बच्चा हुआ है। क्या आत्मा बच्चा पैदा कर सकती है?

उसने कहा–आपका यह तर्क गलत है। गुरुदेव ने कहा है, ऐसे प्रश्नों का उत्तर मत दिया करो। कोई भी मेरे इस प्रश्न का ठीक जवाब नहीं देता। पत्नी से मैंने पूछा–मैं कौन हूं? तो वह कहती है तुम मेरे पति हो। बड़े लड़के से मैंने पूछा–मैं कौन हूं? तो वह कहता है–तुम हमारे पापा हो। दफ्तर के साहब से पूछा–सर, मैं कौन हूं? तो उन्होंने जवाब दिया–तुम पागल हो। पर मैं निराश नहीं होता। गुरुदेव ने कहा है, लगातार इस प्रश्न का उच्चारण किया करो–‘मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? एक दिन तुम इसका उत्तर पा जाओगे और अपने को जान जाओगे।

वह दो-तीन महीने नहीं आया। उसके साथियों ने बताया कि वह पार्क में शाम को ‘मैं कौन हूं? मैं कौन हूं?’ कहता हुआ नाचता रहता है। दफ्तर में भी दिन भर कहता रहता है–मैं कौन हूं? फाइलों पर लिख देता है। मैं कौन हूं? जहां उसे दस्तख़त करने होते हैं वहां लिख देता है–मैं कौन हूं?

एक दिन वह फिर आया। वही जीवन के सत्य की बातें करता रहा। गुरुदेव के गुणगान जब कर चुका तब मैंने उससे पूछा–तुम्हारे गुरु ने सत्य को पा लिया?

उसने कहा–बहुत पहले।

मैंने पूछा–वे कहां रहते हैं?

उसने कहा–उनका आलीशान आश्रम है। एयरकंडीशंड है पूरा।

मैंने पूछा–क्या गुरु की आत्मा को गर्मी लगती है?

उसने कहा–गुरुदेव ने ऐसे प्रश्नों का जवाब देने से मना किया है।

मैंने पूछा–तुम्हारे गुरुदेव के पास बढ़िया कार है न?

उसने कहा–हां, है।

फिर पूछा–वे बढ़िया भोजन भी करते होंगे।

उसने कहा–हां, करते हैं।

मैंने पूछा–क्या आत्मा को पकवानों की इतनी भूख लगती है?

उसने कहा–गुरुदेव ने ऐसे प्रश्नों का जवाब देने से मना किया है।

तब मैंने उससे कहा–तुम्हारे गुरु ने जीवन के सत्य को पा लिया है। इधर एअरकंडीशंड मकान और कार वगैरह भी पा लिए हैं। उनके पास पैसा भी है। उन्होंने पैसा भी पा लिया है। याने गुरु की दृष्टि में सत्य वह है, जो अपने को बंगला, कार और पैसे के रूप में प्रगट करता है। अच्छा, यह तो बताओ कि तुम्हारे गुरु को इतना पैसा कहां से मिलता है?

उसने कहा–गुरुदेव के बारे में यह प्रश्न उठता ही नहीं है। वे आलौकिक पुरुष हैं। वे तो भगवान की कोटि में आनेवाले हैं।

मैंने उससे पूछा–तुम यूनियन में हो?

उसने कहा–नहीं, गुरुदेव का आदेश है, कि भौतिक लाभ के इन संघर्षों में साधक को नहीं पड़ना चाहिए।

मैंने कहा–तो फिर गुरु का सत्य अलग है और तुम्हारा सत्य अलग है। दोनों के सत्य एक नहीं हैं। गुरु का सत्य वह है जिससे बंगला, कार और रुपया जैसी भौतिक प्राप्ति होती है। और तुम्हारे लिए वे कहते हैं कि भौतिक लाभ के संघर्ष में मत पड़ो। यह तुम्हारा सत्य है? इनमें कौन-सा सत्य अच्छा है? तुम्हारा या गुरु का?

वह मुश्किल में पड़ गया। जवाब उसे सूझा नहीं तो चिढ़ गया। कहने लगा–आप अश्रद्धालु हैं। ऊटपटांग बातें करते हैं। मैं आपके पास नहीं आऊंगा।

वह नहीं आया मगर मुझे समाचार मिलते रहते थे कि साधना उसकी लगातार बढ़ रही है। वह दफ्तर के काम में गफलत करता है। फाइलों पर नोट की जगह लिख देता है–मैं बिहारीलाल नहीं हूं। मैं नहीं जानता, मैं कौन हूं? मैं अपने को खोज रहा हूं।

और एक दिन मुझे खबर मिली कि वह सस्पेंड कर दिया गया है।

एक दिन उसका एक साथी मुझे मिला। मैंने उसके बारे में पूछा तो उसने बताया कि वह गुमसुम रहता है और कुछ सोचता रहता है।

मैंने पूछा–‘मैं कौन हूं? प्रश्न करता है या नहीं?

उसने बताया–अब ‘मैं कौन हूं?’ प्रश्न नहीं करता। शायद उसे उत्तर मिल गया है। साधना का मामला है।

काफी दिन बीत गए।

एक दिन वह अचानक आया। वह बदल गया था। दुखी था पर उसमें एक खास किस्म की दृढ़ता भी आ गई थी। उसने सस्पेंड होने और व्यक्तिगत मुसीबतों की बातें बताईं। सत्य-चर्चा उसने बिल्कुल नहीं की।

उसने कहा–मैं आपके पास इसलिए आया था कि कोई अच्छा फौजदारी वकील करा दीजिए। आप तो बहुत वकीलों को जानते हैं।

मैंने कहा–मामला क्या है?

उसने कहा–मैंने फौजदारी की है। केस चलेगा।

मैंने पूछा–कैसी फौजदारी?

उसने तब मुझे बताया–आप तो मुझे साल-भर से देख ही रहे हैं। मैं सत्य की खोज में लगा था। ‘मैं कौन हूं?’ के सिवा और कोई धुन मुझे नहीं थी। मैं इसमें बरबाद हो गया। जिन गुरुदेव ने मुझे इस रास्ते पर लगाया था, उनके पास मैं परसों गया। वे बोले-आओ साधक, बैठो! उस समय दो स्त्रियां उनके शरीर की मालिश कर रही थीं। मालिश निबटने के बाद उन्होंने मुझे अपनी पवित्र आंखों से देखा। पूछने लगे–साधना कैसी चल रही है? मैंने कहा–गुरुदेव, साधना तो सफल हो गई।

वे चौंके। पूछा–‘मैं कौन हूं?’ इस प्रश्न का उत्तर मिल गया?

मैंने कहा–नहीं, पर इस प्रश्न का ठीक उत्तर मिल गया कि तुम कौन हो?

और साहब, मैं गुरु पर टूट पड़ा। खूब पिटाई की। अब मुझे एक अच्छा वकील दिला दीजिए।