साबरमती से सेवाग्राम - (सुशोभित)

 

12 मार्च, 1930 को जब गाँधीजी नमक सत्याग्रह के लिए साबरमती से डांडी की ओर चले, तो उसके बाद फिर लौटकर साबरमती नहीं गए!

यह आश्चर्य की बात है, क्योंकि गाँधीजी ‘साबरमती के संत’ कहलाते हैं। साबरमती आश्रम भारत का सर्वप्रमुख गाँधीधाम है और इसे उन्होंने बहुत मनोयोग से अपनी कल्पना के आदर्श की तरह तैयार किया था। तब यह गाँधी के भीतर बसा सुपरिचित वीतरागी ही था, जो वे एक सुबह अपनी लकुठी उठाए साबरमती से जो चले तो फिर लौटकर नहीं देखा।

गाँधीजी के आश्रमों पर पृथक से एक पुस्तक लिखी जा सकती है।

दक्षिण अफ्रीका में गाँधीजी ने दो आश्रम बनाए थे- फ़ीनिक्स आश्रम और तॉल्सतॉय फ़ार्म। फिर जब वे 1915 में भारत पहुँचे तो दो साल अहमदाबाद के कोचरब आश्रम में रहे। फिर 1917 से 1930 तक साबरमती में। 1934 में वर्धा की मगनवाड़ी में रहे। 1936 में सेवाग्राम पहुँचे और कुल सात साल वहाँ रहे। इसके अलावा यरवडा जेल, पुणे का आग़ा ख़ाँ पैलेस, दिल्ली की प्रार्थना सभा आदि भी भारत के प्रमुख गाँधीधाम हैं। वैसे भी गाँधीजी कहते थे कि हर सत्याग्रही को एक चलता-फिरता आश्रम होना चाहिए।

जब गाँधीजी भारत पहुँचे तो वे चाहते थे कि वे एक ऐसा आश्रम बनाएँ, जहाँ पर न्यूनतम संसाधनों वाला, मितव्ययी जीवन बिता सकें, जहाँ प्राकृतिक और खुला परिवेश हो, साथ ही खेती-किसानी, पशुधन के लिए जगह भी हो। कोचरब इसके लिए उपयुक्त नहीं था। तब साबरमती नदी के किनारे एक उचित जगह का चयन किया गया और वर्ष 1917 में गाँधीजी वहाँ रहने पहुँचे। यह सत्याग्रह आश्रम कहलाया, जो कालांतर में साबरमती आश्रम के नाम से प्रसिद्ध हुआ। गाँधीजी कहते थे, साबरमती आश्रम के इस तरफ़ जेलख़ाना है और दूसरी तरफ़ मसान घाट। सत्याग्रही को इन दोनों ही जगहों पर जाने के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए।

प्रसंगवश, यह वही पौराणिक स्थल भी था, जहाँ वज्र के लिए अपनी अस्थियाँ देने वाले दधीचि का आश्रम हुआ करता था। कहना न होगा, गाँधीजी आधुनिक युग के दधीचि थे।

12 मार्च 1930 को गाँधीजी साबरमती से डांडी की ओर चले और प्रण लिया कि जब भारत को स्वाधीनता मिलेगी, तभी लौटकर आऊँगा। 6 अप्रैल को वे डांडी पहुँचे और नमक क़ानून तोड़ा। धारासणा सत्याग्रह से पहले उन्हें बंदी बना लिया गया। इरविन पैक्ट के बाद जब गाँधीजी गोलमेज़ सम्मेलन के लिए लंदन पहुँचे, तब वे अपनी कीर्ति के चरम पर थे और भारत ही नहीं, संपूर्ण विश्व के आकर्षण के केंद्र थे। भारत लौटकर गाँधीजी ने कुछ समय देशाटन में बिताया। 16 जुलाई 1933 को उन्होंने घोषणा की कि मैं साबरमती आश्रम का विसर्जन कर रहा हूँ, बम्बई सरकार चाहे तो उसे ग्रहण कर ले, और जैसे चाहे उसका उपयोग करे।

वर्ष 1934 में गाँधीजी जमनालाल बजाज के न्योते पर वर्धा पहुँचे और वहाँ मगनवाड़ी में रहे। 1936 में लखनऊ में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ, किंतु गाँधीजी की रुचि ग्रामोद्योग प्रदर्शनी में थी। वहाँ से जब वे नागपुर लौटे तो उनके मन में यह आ गया था कि स्वयं गाँवों में रहे बिना सत्याग्रह आंदोलन का सुचारु संचालन नहीं किया जा सकता। उन्होंने सरदार पटेल से कहा कि मुझे किसी गाँव में जाकर रहना है। पटेल ने कहा- बापू, स्वाधीनता आंदोलन के लिए आपकी आवश्यकता हमारे बीच है। किंतु गाँधीजी नहीं माने। उनका कहना था कि मैं जिस ग्राम स्वराज की बात करता हूँ, वह तब तक सुफल नहीं होगा, जब तक मैं स्वयं किसी गाँव में जाकर ना रहूँ।

इसके लिए उन्हें सबसे उपयुक्त लगा सेगाँव, जो कि वर्धा से कोई आठ किलोमीटर दूर था। उन्होंने मीराबेन को पहले वहाँ रहने भेजा। यह हरिजन बहुल, बहुत ही दीन और पिछड़ा गाँव था। गाँधीजी ने कहा, अब मेरे लिए ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, महार, चमार सब बराबर हैं, मैं उन्हीं के बीच रहना चाहता हूँ। छुआछूत को पूरी तरह मिटा देना चाहता हूँ। इस पर बात करना काफ़ी नहीं, निजी आचरण से इसे आपके सामने रखना होगा। दूसरे शब्दों में, गाँधीजी ने मन बना लिया था कि वे सेगाँव में अपना नया आश्रम बनाएँगे। और इसका नाम होगा- सेवाग्राम।

जब गाँधीजी भारत के सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति थे, तब 30 अप्रैल, 1936 को 67 वर्ष की अवस्था में उन्होंने फिर लकुठी उठाई और पैदल ही वर्धा से सेवाग्राम चल पड़े। उनके साथ मात्र चार कार्यकर्ता थे। वे सेगाँव पहुँचे और काम में लग गए। तब वहाँ उनके रहने की भी व्यवस्था नहीं थी, उनकी कुटी के निर्माण का काम चल ही रहा था। पूरा इलाक़ा खुला और विषैले साँपों से भरा हुआ था। गाँव में मलेरिया फैला था और स्वयं गाँधीजी इससे ग्रस्त हो गए। किंतु पूर्णतया स्वस्थ न होने के बावजूद वे बीमारों की तीमारदारी में जुट गए।

जब बापू साबरमती में थे, वहाँ विनोबा की एक कुटीर थी। जब बापू सेवाग्राम पहुँचे तो पीछे विनोबा भी वहाँ आए और समीप ही पवनार में अपना आश्रम बनाया। वह आश्रम भी आज भी है। जैसे नेहरू गाँधीजी के राजनीतिक उत्तराधिकारी थे, वैसे विनोबा उनके आध्यात्मिक उत्तराधिकारी माने गए हैं।

सेवाग्राम में आदि कुटी, बापू कुटी, कस्तूरबा कुटी, महादेव भाई आवास आदि हैं। एक कुटी परचुरे शास्त्री की भी है, जिन्हें कुष्ठरोग होने पर स्वयं बापू ने उनकी सेवा-सुश्रूषा की थी। बापू कहते थे, मैं बंद दीवारों के घर में नहीं रहना चाहता, जिसकी खिड़कियाँ भिड़ी हुई हों। मैं एक ऐसी खुली जगह पर लोगों के बीच रहना चाहता हूँ, जहाँ दुनिया की सभी संस्कृतियाँ मुझ तक पहुँचती रहें। अलबत्ता, मेरे पाँव तब भी धरती में मज़बूती से गड़े रहें।

जब गाँधीजी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे, तब कांग्रेस शहरी वकीलों की एक संस्था भर थी, जो अंग्रेज़ी में कार्यकलाप करती और प्रस्ताव-प्रतिवदेन वग़ैरा जारी करती रहती। गाँधीजी ने उसे जनचेतना से जोड़ा और ग्रामोन्मुख बनाया। भारतभूमि के लाखों गाँवों में रहने वाले लोगों को स्वतंत्रता संग्राम की भावना से जोड़कर उन्होंने इसे एक विशाल जनांदोलन में परिवर्तित कर दिया था। तब यह कैसे संभव हो सकता था कि वे स्वयं गाँव में देहातियों के बीच न रहें और उनके सुख-दु:ख न बाँटें।

गाँधीजी के सेगाँव पहुँचते ही विदर्भ का यह निर्जन कोना तुरंत ही राष्ट्रीय राजनीति की हलचलों का केंद्र बन गया। गाँधीजी के सेगाँव पहुँचने के अगले ही दिन आम्बेडकर और बालचंद हीराचंद उनसे भेंट करने पहुँचे। फिर नेहरू और पटेल आए। सेगाँव में तब डाक-तार व्यवस्था तो क्या, सड़क भी नहीं थी। वायसराय ने कहा गाँधीजी से बात किए बिना हमारा काम नहीं चल सकता, तब आश्रम में हॉटलाइन लगाई गई। सेगाँव में टेलीफ़ोन की घंटियाँ और गाड़ियों के हॉर्न गूँजने लगे। एक बार वायसराय स्वयं वहाँ पहुँचे तो उन्हें सेवाग्राम में खुले में सोने को मजबूर होना पड़ा। समूचे भारत की चिट्ठी-पत्रियों का रुख़ सेगाँव की तरफ़ हो गया। वर्धा के डाकघर की सक्रियता हज़ार गुना बढ़ गई। लोग चिट्ठी पर केवल ‘बापू को मिले’ या ‘गाँधी जहाँ हों वहाँ’ लिखते और पत्र सेवाग्राम पहुँच जाता।

एक बार नेहरू जी, सरदार पटेल और राजेंद्र प्रसाद सेवाग्राम आए। गाँधीजी बीमारों की सेवा कर रहे थे। तीनों को बैठकर प्रतीक्षा करना पड़ी। सरदार ने खीझकर कहा, बापू अगर आपके पास समय न हो तो हम जाएँ? बापू मुस्कराए और बोले, यहाँ के दीन-दु:खी जन बहुत पीड़ा में हैं। नेहरू जी ने कहा- सम्राट कैन्यूट ने समुद्र की लहरों को आदेश दिया था कि रुक जाओ, इससे आगे न बढ़ना। आपका काम भी ऐसा ही है। बापू बोले- अरे भाई, इसीलिए तो हमने तेरे सिर पर ताज रख दिया है। नेहरू जी बोले- पर बापू, क्या यह सब आपको ही करना चाहिए? कोई और नहीं है? बापू बोले- बताओ कौन है? गाँव जाकर देखो। छह सौ की आबादी में तीन सौ बिस्तरे पर पड़े हैं। इस समूचे प्रसंग का उल्लेख हरिभाऊ उपाध्याय की पुस्तक ‘बापू-कथा’ में किया गया है।

1936 से 1942 तक गाँधीजी सेवाग्राम में रहे। भारत छोड़ो आंदोलन के बाद उन्हें आग़ा ख़ाँ पैलेस में नज़रबंद कर दिया गया, जहाँ कस्तूरबा और महादेव भाई की मृत्यु हुई। बापू 1946 तक समय-समय पर सेवाग्राम आते रहे। फिर स्वयं को दिल्ली, नोआखाली, बिहार और कलकत्ता के हवाले कर दिया। 30 जनवरी 1948 को उनकी यह सतत सक्रिय जीवन-यात्रा रुकी, जिसमें विश्रांति का एक क्षण नहीं था।

सेवाग्राम किसी तीर्थ से कम नहीं है। अकारण ही परचुरे शास्त्री मरने के लिए काशी नहीं जाकर यहाँ पर नहीं आए थे। भोपाल से सेवाग्राम सीधे रेलगाड़ी जाती है। मेरा मन वहाँ जाने को अकुला रहा है। जब जीवन से अवकाश मिलेगा, सीधे वहीं जाऊँगा। वहाँ कुछ समय रहूँगा। जिस पेड़ को बापू ने रोपा था, उसकी छाँव में बैठूँगा। रामवृक्ष बेनीपुरी जब सेवाग्राम आए थे तो बापू की कुटिया देखकर रो पड़े थे। मैं भी उस जगह को मन भरके निहारूँगा, जहाँ बापू रहते, सेवा-प्रार्थना करते, चरखा चलाते, लाठी की कैंची से साँप पकड़ते और संध्या को टहलने जाया करते थे।

वह जगह, जहाँ आधुनिक भारत के दधीचि ने अपनी अस्थियाँ दान देने के व्रत को पूर्णाहुति की ओर थोड़ा और आगे बढ़ाया था।