मैत्री की माँग (कहानी) : मुक्तिबोध


सुशीला ने मोरी पर पड़ा हुआ गीला नीला लुगड़ा* उठाया और कुएँ पर चल दी। ग्यारह बजे की गरम धूप फैली हुई थी। कोठे की छत बुरी तरह से तप रही थी। उसके अन्दर सास रोटियाँ सेंक रही थी, जिनकी गरम गन्ध इधर फैल रही थी।

बाहर, ज़रा दूर चलकर, कुआँ लगता है। झंखड़ बिरवे, कँटीली झाड़ियाँ, जो ज़मीन से एक फुट भी ऊपर उठ नहीं पाती हैं, तपती पीली ज़मीन के नंगे विस्तार को ढाँकने के बजाय उग्र रूप से उघाड़ रही हैं। यह कुआँ और यह ज़मीन एक अहाते के अन्दर घिरे हैं जिसके कँटीले तारों के उस पार, दूर सरकारी कचहरी की गेरुई इकमंज़िल इमारतें लम्बी कतार में खड़ी हुई हैं।

सुशीला कुएँ के ओटले पर चढ़ी तो मालूम हुआ कि चबूतरे के पत्थर बेहद गरम हो चुके हैं। उसने प्रतिदिन की भाँति रस्सी कुएँ में डाली, और दूसरे ही क्षण चौड़ी लकड़ी की गिर्री की कठिन आवाज़ कुएँ की ठंडी साँवली दीवार से बालटी की टकराहट की आवाज़ के साथ मिल गई। गहरे पानी में बालटी की ज़ोरदार ‘धप्’ और फिर छलकते-गिरते पानी की गूँज।

आज कई सालों से सुशीला यह आवाज़ सुनती आ रही है। कान के अन्तराल में वह ऐसी समा चुकी है कि छूटे नहीं छूटती। दुनिया में, जीवन में, इर्द गिर्द, कई छोटे-बड़े परिवर्तन होते गए। उसके पुराने पड़ोसियों में बहुत-सों ने यह क़स्बानुमा शहर छोड़ दिया, रियासत छोड़ दी, प्रान्त छोड़ दिया; और न मालूम कहाँ, इधर- उधर बिखर गए। नए-नए चेहरे और नई-नई बातें लेकर कई परिवर्तन आए और चले गए। सुशीला का पहला बच्चा मरा, दूसरा अपने दो-साल के जीवन में अनेक कष्ट देकर स्वयं अनेक कष्टों के बीच से गुज़रता हुआ, स्वर्गधाम सिधार गया। परन्तु संक्रमणशील जीवन के नए और सुदूरगत पुराने दृश्यों में अटूट सम्बन्ध और एकता बनाए रखनेवाली इस कुएँ पर की चौड़ी लकड़ी की गिर्री, यह ऊँचा चबूतरा, और पानी निकालने, कपड़े धोने की आवाज़ सदा से ऐसी ही चली आ रही है।

सुशीला ने लुगड़ा वहीं पड़ा रहने दिया। भरी हुई बालटी लेकर वह घर की ओर चली। वह आम रास्ता नहीं था, परन्तु लोग वहीं से निकलते थे। कभी-कभी वहाँ से ऐसे लोग भी गुज़रते जो दिखने में गुंडे-से मालूम होते थे। सुशीला उनसे आतंकित थी। इसलिए वह, ऐसे लोगों को अबूझी दृष्टि से देख, अपने काम में लगे रहने का ढोंग भी कर लिया करती।

दुपहर के कारण घर का आँगन भयानक तप रहा था। बाहर से अन्दर घुसने पर उसे कुछ नहीं दिखाई दिया। डर लग रहा था कि कहीं ठोकर न लगे, हाथ से बालटी छूट जाएगी।

‘सुशीला, देख, वह आ गया है क्या।’

यह सास की आवाज़ थी, जिसे सुनकर वह बिना रुके अन्दर के कमरे में गई। वहाँ कोई नहीं था। उसने वहीं से उत्तर दिया, ‘यहाँ तो कोई नहीं है।’

कोठे से सास की आवाज़ आई, ‘चप्पल तो बजी थी।’

बिना इसका उत्तर दिए ही सुशीला ने कमरे की खिड़की खोल दी, और रास्ते की ओर देखने लगी कि ‘वे’ कहीं आते हुए तो दिखाई नहीं दे रहे हैं।

रास्ता, भूरी तपी घनी धूल से भरा, सूना अवसन्न पड़ा हुआ था। यह शहर के बाहर का रास्ता था, इसलिए इस पर बहुत थोड़े लोग दिखाई देते। पास के गाँव की ओर जानेवाली किसानों की बैलगाड़ियाँ, अथवा दूर की यात्रा करनेवाली उजड़े रंग की नीली मोटर लारियाँ और बसें, अपने पीछे धूल का बादल उठाती हुई इधर से निकल जाया करतीं। परन्तु बारह बजे की इस बेसब्र धूप से आदमी का कहीं चिह्न भी दिखाई नहीं दे रहा था।

सुशीला ने आँखें फैलाकर कचहरी की गेरुई इमारतों की ओर देखा। एक नि:संग एकस्वरता दूर काँप रही थी। आजकल सुशीला को अपना जीवन अलोना-अलोना-सा लग रहा है।

उन्नीस साल की इकहरी साँवली सुशीला उड़े हुए, फीके पड़े रंग की साड़ी पहनती है। सूरज की बेमुरव्वत धूप से उसके चेहरे का गेहुआँ रंग सँवला गया है। सुबह उठते ही वह काम में जो लग जाती है तो रात के दस बजे तक इसी तरह। उसके उपरान्त वह चुपचाप, पति के कमरे में घुसती है। किन्तु, न जाने क्यों, तब उसका हृदय अज्ञात भार से भर उठता है।

सुशीला अपने जीवन से प्रसन्न है। परन्तु एक बात की ज़रूर कमी है। चाहती है उसका पति रामराव इंटर पास होता। उसकी अंग्रेज़ी की प्रैक्टिस अच्छी है। सुशीला के लिए यह गुप्त गर्व का विषय है।

फिर भी ज़िन्दगी के झगड़े-टंटे और घर के बखेड़े पति-पत्नी पर इतने छा गए हैं कि रामराव की अंग्रेज़ी का गर्व अब उतना आह्लादकारक नहीं रहा। वह पूर्ति नहीं करता। सुशीला स्वयं कुछ पढ़-लिख लेती है। रामराव ने अपने वैवाहिक जीवन के प्रारम्भिक उल्लास में सुशीला के लिए कुछ पुस्तकें भी ख़रीदी थीं। आज भी छोटे-से स्थानीय पुस्तकालय से एकाध पुस्तक घर आ जाती है। किन्तु सुशीला उसको दूर से देख-भर लेती है। छू भी नहीं पाती। आले में वह किताब इस तरह धरी रहती है जैसे मन के कोने में एक मीठा अजाना स्वप्न छिपा रहता है। जिस प्रकार नया रास्ता सालों की आमद-रफ़्त के बाद घिसकर, उखड़कर, निर्जीव घनी धूल की एकरूपता में परिवर्तित हो जाता है, उसी तरह सुशीला का हृदय-पथ समय के नालदार जूतों और उसकी ठोकरों से घिसकर घनी निर्जीव धूल की एकरूपता में परिवर्तित हो गया है। अब उसके हृदय में कोई आनन्द, कोई मोह, कोई स्वप्न, ऐसा कि जिसको वह अपना कह सके, नहीं रहा। काल तथा परिस्थिति जिधर मोड़ दे, जैसी मोड़ दे, उधर ही वैसे ही मुड़ जाने के लिए सुशीला को अपना मन तैयार न करना पड़ता, वह आप ही आप, बिना कहे, किसी पुर्जे की भाँति, घूम जाता। फिर भी मन मन ही है। ननद का पोलका सीते हुए सुशीला के मन में साँवले सूनेपन में दिवास्वप्न तैर आते। सुई और धागे की गति से मानो उनकी गति बँधी होती। परन्तु खेत में घुस आनेवाली गाय अथवा बछड़े को जिस तरह मार भगाया जाता है, वैसे ही उसके साथ भी होता।

फिर भी सुशीला जीवन से प्रसन्न है। रामाराव बिलकुल बेदर्द नहीं हो गए हैं।

आसमान में पतले-साँवले मेघ घिर आए हैं। सरदी का मौसम। नदी की दिशा से हवा। रात। और खिड़की खुली हुई।

रामराव की छाती पर ठंडी वायु का फ़ौरन असर हो जाता है। इसका ख़याल आते ही रामराव के पास लेटी हुई सुशीला के सपने टूट गए। वह उठ बैठी और खिड़की के दरवाज़े बन्द कर लिए। फिर वहीं लेट गई और टूटे सपने जोड़ने लगी, अथवा आप ही आप वे जुड़ते चले। दिन-भर की अनुत्पादशील, बेकार मेहनत की थकान से रामराव बिस्तर पर लेटा कि आँख लग गई। घोर निद्रा। दिन-भर की थकान ने सुशीला की देह को शिथिल कर डाला था, फिर भी वह सो नहीं सकी। वह ख़ुद नहीं जानती थी कि क्यों।

लेकिन फिर भी मन में कुछ था, जो सोने नहीं देता था। वह ऐसे ही आधी जागती, आधी सोचती, आधी सोती रही। नींद के पाताली अँधियाले में वह डूबने ही वाली थी कि रामराव ने करवट बदली। उसकी आँखें खुलते ही सुशीला उठ पड़ी। आदत के अनुसार अपने खुले बाल हाथ से सँवारते हुए उसने कहा, ‘आज बड़ी जल्दी सो गए? अभी नौ ही तो बजे हैं।’

रामराव ने अपने दोनों हाथ सिर के ऊपर एक दूसरे में गूँथते हुए आलस छोड़ा और चुपचाप पड़ा रहा। और फिर कहने लगा, ‘सपना देख रहा था।’

सुशीला को सपनों पर बड़ा विश्वास है। उसने रामराव के होंठों पर मुसकान की रेखा देख, पूछा, ‘क्या बात है? मुझे सुनाओ।’

रामराव ने कुछ सोचा, फिर कहना शुरू किया। विचित्र, पाताली विकृतियों भरा, अद्भुत जगत सुशीला की आँखों में खिंचने लगा। मन की निबिड़ शक्तियाँ उसमें अजीब समाधान पाने लगीं। स्वप्न का अन्तिम चित्र मनोरंजक था। रामराव किसी अपरिचित नगर की अपरिचित, सूनी और अभी-अभी हुई थोड़ी, बूँदाबाँदी के कारण दबी हुई धूल से पीली-साँवली दिखनेवाली सड़क पर चल रहा है। आसमान में मेघों के कटे-छँटे धुन्ध के गीले, नील-श्यामल वातावरण के धुँधियाले में, सड़क ठंडी सूनी किन्तु प्रिय मालूम हो रही है। और घोर विस्मय की बात यह है कि...

...सड़क के तले नोट बिखरे हुए हैं, दस के, पाँच के। कुछ सौ के भी हैं। एक क्षण में सब ओर नज़र दौड़ाकर वह आनन्द के विक्षोभ में नीचे झुकता है और उन्हें असावधानी से जेब में भरता चलता है। उसे अपनी सारी फ़िक्रें याद आती हैं, और उनकी शान्ति का अवसर हाथ से नहीं जाने देना चाहता कि...

उसकी आँख खुल जाती है। जागते में अपने हाथ में नोटों का अनुभव करना चाहता है। उसके स्थान पर सुशीला की उँगलियाँ मिलती हैं।

स्वप्न सुनकर सुशीला खुश हो गई। लक्ष्मी आने की सम्भावना अत्यन्त मनोहर सिद्ध होते देख रामराव के मन की स्वाभाविक दार्शनिकता ने विद्रोह करना शुरू किया। परन्तु घर की स्थिति अत्यन्त दयनीय होने के कारण उस विद्रोह में कोई डंक न रहा। रामराव को सुशीला के सामने कबूल करना पड़ा कि वह भी नित्य आर्थिक चिन्ताओं में ही रहा करता है, इसीलिए उसे सुशीला से मन की दो बातें करने की सुविधा नहीं मिल पाती। वह क्षण ऐसा था कि जिसमें दोनों एक-दूसरे से कुछ भी छिपा न सकते थे। उस वक्त कोई दुराव या छिपाव का मौक़ा न था। रामराव अपने बचपन की बातें कहता रहा। उसमें लड़कियों की भी बातें आईं। रामराव के जीवन में कोई प्रेम-प्रसंग न थे। पर आकर्षण थे। रामराव और सुशीला ग़रीब, अर्द्ध-शिक्षित तथा अपूर्ण होते हुए भी आधुनिक वातावरण के सम्पर्क में आ चुके थे। उनके प्रलोभन से दब चुके थे। पर उनके प्रति वर्जना की भावना न थी। महीनों बाद पति-पत्नी में यह मैत्री का क्षण आया था, जिन क्षणों में मनुष्य हृदय को नग्न कर देना चाहता है। बातों में अनायास प्रवाहिता ऐसी थी कि सुशीला एकदम कह बैठी, ‘एक बात पूछूँ?’

अपनी बात को इस प्रकार कटते हुए देख रामराव विस्मित हुआ। सिवा साश्चर्य ‘हूँ’ के वह कुछ भी न कह सका।

‘नाराज़ तो नहीं होंगे?’ कहते हुए सुशीला उसके पास सरक आई। रामराव समझा कि यह प्रस्तावना है उस अध्याय की जिसे ‘नारी-हठ’ कहकार पुकारा जाता है। सुशीला के पास लुगड़े नहीं थे। इसीलिए अकसर वह बाहर निकलने से इनकार कर देती। यही नहीं, बल्कि परसाल ख़रीदी गई लुगड़े की जोड़ी भी बुरी तरह से फट गई थी। फिर भी उसे वह इस सिफ़त से पहनती थी कि उसमें की लम्बी-लम्बी दरारें गायब हो जातीं। पर लुगड़े का उड़ा हुआ रंग बहुत भद्दा हो गया था। वह कहाँ छिपता। बाहर की गरम धूल, घर के अन्दर की प्राण-भक्षी धनहीनता तथा वहाँ के समस्त वातावरण की भूरी अवसन्नता के साथ उसके कटे-फटे लुगड़े के उड़े हुए रंग का भद्दापन ठीक-ठीक जा बैठता। दोनों में एक मलिन सुसंगति की असली छाप थी। सुशीला के गुप्त-प्रार्थना-भरे स्वर से रामराव का शंकित होना स्वाभाविक था। फिर भी अपनी शंकाओं को ढाँककर रामराव ने कहा, ‘नाराज़ होने की क्या बात है? मैंने अपनी गहरी बातें तुमसे नहीं कहीं?’

सुशीला का साहस बँधा, परन्तु रामराव की विस्मयातुर दृष्टि से सकुचाकर उसने फिर कहा, ‘तो पूछूँ?’

रामराव को बात गड़बड़ मालूम हुई। पर उसके धीरज पर अभी तक चोट नहीं थी।

‘सामने देशपांडे के यहाँ कौन रहने आए हैं? ये ही तो अपने यहाँ कल थे!’

रामराव को आश्चर्य हुआ। इतनी ज़रा-सी बात मालूम नहीं।

‘बहुत भला आदमी है।’ मुक्त कंठ से प्रश्ंसा करते हुए उन्होंने कहा।

सुशीला को यह वाक्य अच्छा लगा। वे जो सामने के देशपांडे के घर आए हुए हैं, अच्छे आदमी ही मालूम होते हैं। निस्सन्देह! सुशीला के कल्पना-प्रिय मन ने उस व्यक्ति के आस-पास चक्कर काटा था। कारण?

कारण, कारण–सुशीला से यह न पूछो। वह स्वयं नहीं जानती। पर क्या वह रामराव के मूर्त सजीव आधार और आध्यात्मिक आश्रय को मात्र फूहड़पन में त्यागने का संकल्प कर सकती है? संकल्प क्या, कल्पना भी कर सकती है? अगर लेखक स्वयं सुशीला को यह जाकर पूछे तो एक जोरदार चाँटे के अलावा और कुछ न मिलेगा।

सुशीला को जीवन भर आत्मविश्लेषण का मौक़ा न आया था। वह न जान सकी थी कि उस व्यक्ति के प्रति उसका जो आकर्षण है वह रामराव के पतित्व और अपने पत्नीत्व के आधार को कहीं भी धक्का नहीं पहुँचाता। वह आकर्षण तो मात्र उस व्यक्ति की सज्जनता के चारों ओर, विद्या, सम्पन्नता और शिष्टता के तेजोवलय के प्रति था, उस स्वप्न के समान सुन्दर दीखनेवाले देश और नगर के प्रति था। (जहाँ से वह व्यक्ति आया है), जिसके बारे में सुशीला अनुभवशून्य थी। वह स्वर्ग है या नरक, यह भी न जानती थी।

‘तुमसे बातचीत की थी?’

‘हाँ, वह बहुत अच्छा आदमी है।’ मुक्त कंठ से रामराव बोला।

सुशीला उसकी लेटी देह पर एकदम लोट गई और उसके मुख पर अपना मुख रखते हुए भावुकता से बोली, ‘न, न, पर वह तुमसे अच्छा कैसे हो सकता है!’

‘अरे, मैं तो मूर्ख हूँ!’ (यह उनकी शालीनता थी; मूर्ख वे हरगिज न थे) ‘दुनिया में बड़े-बड़े बुद्धिमान भरे हैं। सुशीला, सिर्फ़ इंटर पास करने और अंग्रेज़ी अच्छी लिख-बोल लेने से होता क्या है? यदि मैं सचमुच बुद्धिमान होता तो पिताजी की बात भी रख लेता और पढ़ भी लेता।’

‘अब भी पढ़ सकते हो।’

‘अब?’

‘क्यों नहीं, ये सोने की चूड़ियाँ तुम्हारी ही तो हैं!’ सुशीला ने हाथों को ऊँचा कर चूड़ियाँ बतलाते हुए कहा।

‘न, भाई, वे मेरी माँ की तुम्हें दी हुई हैं, मुझसे यह नहीं हो सकता।’

सुशीला को लगा वह जैसे जीत गई। यह क्षण अब उसी का है। उसने कृत्रिम निरपेक्ष भाव से पूछा, ‘कहाँ तक पढ़े हैं?’

‘एम.ए., एल-एल.बी.–बड़े आदमी के लड़के हैं।’

उसका कुतूहल बढ़ता ही गया, ‘कहाँ से आए हैं?’

‘इलाहाबाद से।’

और सुशीला सोचने लगी कि इलाहाबाद कितना बड़ा शहर होगा। इसलिए वह चुप बैठी रही।

‘वहाँ क्या करते हैं?’

‘स पादक हैं।’

‘ये जो मासिक-पत्र निकालते हैं, न?’

सुशीला को विद्या पर और विद्वानों पर अत्यन्त श्रद्धा थी। मानो सुशीला को अब समझ में आया हो कि सम्पादक कैसा जानवर होता है, ऐसे स्वर में उसने उत्तर दिया, ‘अच्छा!’

सुशीला इलाहाबाद के और उस व्यक्ति के बारे में सोचती ही रही। नींद में डूबने से पहले वह एक रंगीन विस्मय में थी कि रामराव भावुकतावश नहीं, सिर्फ़ सज्जनता के कारण ही यह कह रहे थे। यद्यपि यह सच है कि रामराव मात्र अल्पसन्तोषी, दार्शनिक, उपदेशवादी, धैयवान प्राणी थे। परन्तु सुशीला के हृदय में सारी मायूसी, अवसन्नता तथा लानता के बावज़ूद, बहुत गहरे-गहरे, कहीं तो भी कुछ तो भी फडफ़ड़ाता रहता था, जो सारी दीवारें, सारी भीतें, सारे व्यवधान फोड़-तोड़कर मेहनत से, अथक उत्साह से, और नि:शेष आशा से, इस धनहीनता के निर्जीव, नि:स्पंद पीले-भूरे-मटियाले अभिशाप को किसी सागर में फेंक-फाँक दे!

वे दोनों बिना बोले वैसे ही पड़े रहे कुछ समय तक। फिर सुशीला बोली, ‘तुम भी कर लो बी. ए. जल्दी और कपड़े ठीक-ठाक बना लो, क्या बात है!’

रामराव ने बुजुर्गों की गम्भीरता से उसके चेहरे पर हाथ फेरा।

नींद ने दोनों को फ़ौरन ही सम्हाल लिया।

सुबह दस बजे कुएँ पर चम्पा और सुशीला हँस रही थीं, क्योंकि उनके सामने माधवराव बड़ी ही अनगढ़ रीति से धोती धो रहा था।

इतने में सुशीला ने ज़्यादा जानकारी के अभिमान से कहा, ‘एम.ए., एल-एल.बी. हैं।’

‘एम.ए., एल-एल.बी.? और एम.ए., एल-एल.बी. हुआ तो क्या? धोती धोना तो आता ही नहीं।’

सुशीला ने गम्भीरता से कहा, ‘ऐसा नहीं, चम्पा, बड़े आदमी के लड़के हैं, कहाँ काम पड़ा? ये देशपांडे उनके मामा होते हैं। यहीं उन्हें काम पड़ा।’

माधवराव उधर धोती धो रहा था। गम्भीर नौजवान, बाल उसके पीछे निकले हुए थे। निक्कर पहिने हुए था। और उसकी दीर्घ सकेश जाँघें धोंस मारती थीं। उसे कैसे मालूम होता कि बातें यों की जा रही हैं।

चम्पा चुप हो रही और अपनी साड़ी सड़ाड़-साड़ पत्थर पर पटककर धोने लगी। वह एक ग़रीब, मेहनती, तीक्ष्ण-जिह्व, दयालु महिला थी। सुशीला के दिल में क्या चल रहा है, इसका अनुमान होना उसे बड़ा ही कठिन था।

माधवराव ने साबुन लगाए कपड़ों पर और अधिक पानी बापरने के लिए गिर्री पर रस्सी को रक्खा और बालटी कुएँ में छोड़ दी। और वह क्या देखता है, दूसरी ओर सामने भी उसी तरह बालटी लटकती हुई नीचे शीघ्र उतर रही है। और गिर्री के दो खम्भों के बीचोबीच एक नारीमुख उसे देख रहा है। उसे एकाएक लगा जैसे यह परिचय की माँग करनेवाली सहज, सरल अनायास दृष्टि है। एक पूर्ण मुख जिसके स्तब्ध चेहरे पर आँखें एक विचित्र गम्भीर आलोक डाल रही हैं।

वह हतबुद्धि-सा खड़ा हो गया और फिर जल्दी में बालटी गर-गर-गर नीचे डाल दी। बालटी को ऊपर खींचते समय भी वह मुख दो खम्भों के बीच बार-बार दीख जाता था। परन्तु माधवराव को फिर अन्तिम बार उसे स्तब्ध पूर्ण मुख (पर) दो नारी-आँखें अपनी सहज मैत्री का भाव कह गईं।

माधवराव ने धोती धोना शुरू किया, परन्तु उसकी आँखें जानबूझकर इधर-उधर उसे देखना चाहती थीं। उसने पाया कि वह एक अत्यन्त फीके रंग की साड़ी पहने हुए है, जिससे मालूम होता है कि उसके पति को पन्द्रह रुपए से अधिक नहीं पड़ता होगा। उसके आस-पास एक मेहनती निर्धन स्थिति का वातावरण उग्र होकर रहता है, परन्तु उसके मुख से पता चलता है कि वह किसी उच्चवंशीय की कन्या है जो समय-परिवर्तन के कारण दैन्य-दशा को प्राप्त हुई है।

नहाकर जब माधवराव कन्धे पर सफ़ेद टॉवेल डाले चला आ रहा था, तब उसके हृदय में एक अनुपम निराकर दया हलके कुहरे की भाँति छा रही थी। उसकी आँखों के सामने यह विराट ग़रीबी और उसकी गर्मी से बफ़ी हुई हृदय की स्थितियाँ पूर्ण होकर आ रही थीं। कमर पर पानी का घड़ा सम्हाले और गर्दन में धुली हुई धोती और साड़ियों की माला डाले वे दोनों स्त्रियाँ अपने घर की ओर जा रही थीं। सुबह के ग्यारह बजे आसमान का सूरज अपनी पूरी तेज़ी के साथ रास्ते के पत्थरों को तपा रहा था, और इस सड़क के पार कँटीले तार के हिस्से में खड़ी कचेरी की लाल पुती हुई दीवारें निर्जन दुपहर की भीषणता को और भी बढ़ा रही थीं।

सुशीला जब घर पहुँची तो चौके से भोजन की बिखरी बास आ रही थी। वह समझ गई कि रामराव खा चुके हैं, और उसकी सास उसी की राह देख रही है।

उसने कमर से घड़ा उतारा और चुपचाप वस्त्रों को बाँस पर सुखाने के लिए डालने लगी। उसका चेहरा देखकर सास समझी कि रामराव ने आज ज़रूर कुछ कहा-सुना होना चाहिए, नहीं तो इतना मौन गम्भीर तो, भाई, किसी आदमी से नहीं [रहा] जाता।

उसी शाम कुछ ऐसी बात रही कि रामराव को अचानक हेडमास्टर ने अपने यहाँ रोटी खाने बुला लिया। सास शाम को कुछ न खाती थी। एक ही बार भोजन करती थी। और सुशीला के लिए सुबह का रक्खा हुआ काफ़ी था।

यह देख कि रसोई के काम की छुट्टी है, सास सन्तुष्ट होकर राम मन्दिर के पंडित की स्त्री के पास चली गई, कहती हुई, ‘मैं ज़रा देर से आऊँगी, सम्हालना।’

तब सुशीला घर को अबेर रही थी, और अबेरते ही अबेरते खुले आसमान में साँझ घिर आई थी। एक अजीब व्यथा से सुशीला का जी कु हला रहा था और उसका शरीर शिथिल हुआ जा रहा था।

तभी खिड़की में से दीख रहे खुले रंगीन आसमान से कुएँ के आस-पास के सघन वृक्ष रंगीन और अधिक श्याम-से दीख रहे थे। उधर ही से माधवराव केवल सफ़ेद शर्ट-पैंट में आता दिखलाई दिया। सुशीला ने गर्दन फेर ली और झटपट अपने काम में लग गई।

परन्तु पाँच मिनट बाद जब उसे फिर देखा तो पाया कि वह खिड़की की ओर ही आ रहा है। वह उस कमरे से चल दी और दूसरे कमरे के दरवाज़े के छेद से झाँकने लगी। उसने देखा कि वह खिड़की तक चला आया है। परन्तु उसके अन्दर न झाँकते हुए, दूर ही खड़ा रह वह चिल्ला रहा है, ‘देशपांडे साहब, देशपांडे साहब!’

दरवाज़े के पीछे वह मानो ‘खील से गड़ी’ हो गई थी, परन्तु फिर वह धैर्य करके खिड़की तक गई और कहा, ‘हेडमास्टर साहब के यहाँ गए हैं।’

‘कब?’ आश्चर्य से उस नवयुवक ने कहा।

‘चार बजे ही।’

माधवराव को उसके लाल चेहरे की तरफ़ देखकर लगा कि उसकी शंका ठीक है। उसे मालूम हुआ कि जैसे अनजाने ही वह काफ़ी दूर तक चल आई है। वह स्तब्ध वहीं खड़ा रहा, जैसे वहाँ से हटना न चाहता हो।

पूछा, ‘कब तक आएँगे?’

तब तक सुशीला स्थिर हो गई थी। अपने को समेट लिया था। ‘मुझे मालूम नहीं’ कहकर चुप हो गई।

माधवराव भी कीलित था। सोच रहा था कि ऐसी रंगीन शाम घूमने किधर चला जाए।

सुशीला ने निरपेक्ष भाव से पूछा, ‘उनसे क्या कहूँ, आपका नाम?’

माधवराव चुप हो रहा, सोचा कि बतला दूँ कि नहीं। फिर बोला, ‘माधवराव।’

सुशीला के मन की रोक जैसे ढह गई थी।

‘आप इलाहाबाद रहते हैं?’

माधवराव कुतूहलयुक्त आनन्द से बोला, ‘हाँ-हाँ।’

‘बहुत बड़ा शहर होगा।’

‘बहुत बड़ा, जी।’ कहकर माधवराव हँस पड़ा।

सुशीला जैसे नदी के समान बेरोक होकर पूछने लगी, ‘तो आप वहीं रहते हैं?’

‘जी।’

तब तक सुशीला घर के अन्दर खिड़की में और माधवराव घर के बाहर खिड़की में खड़े हो गए। साँझ आकाश में खिल रही थी।

‘वहाँ कब जाएँगे आप?’

‘पाँच दिन बाद।’

यह सुनकर सुशीला स्तब्ध हो गई। माधवराव ने पूछा,‘क्यों?’

छ नहीं, मुझे एक लॉवर पॉट चाहिए। बहुत दिनों से इसकी ख़ास ज़रूरत आ पड़ी है। इस समय घर में अड़चन है, नहीं तो मैं ख़ुद इन्दौर जाकर ले आती। वहाँ मेरे मामा रहते हैं। मुझे बहुत प्यार करते हैं, बी.ए. पास हैं, और बहुत ही अच्छे आदमी हैं। वहाँ लता, रश्मि बड़े घर दी हुई हैं, और मेरे मामा का बड़ा घर है...’

माधवराव ज़ोर से हँसना चाहता था। पर शायद उसे बुरा लगे, इसलिए मुसकरा दिया। सोचने लगा, कितना बचपन से भरा इसका मन है।

वह कहती चली, ‘वैसे मैं इन्दौर हो आती, मुझे किसी प्रकार की कमी नहीं है, लेकिन बड़े-बड़े शहर देखने की इच्छा है। इलाहाबाद [का] क्या लगता है?’

‘बहुत थोड़ा।’

‘तो तो ठीक है। अच्छा तो मैं उनसे क्या कह दूँ?’

‘पास के माधवराव आए थे, बस।’ माधवराव ने मज़ाक़ करते हुए पूछा, ‘मैंने सुना है कि स्त्रियाँ बहुत बातूनी होती हैं।’

सुशीला तड़ाक से बोली, ‘और मैंने एक काद बरी में पढ़ा है कि पुरुष बेरहम होते हैं।’

माधवराव झेंपते हुए बोला, ‘मैं तो नहीं हूँ।’

सुशीला क्षण-भर के लिए चुप रह गई, और उसकी तरफ़ देखा कि माधवराव की आँखें कुछ कह रही हैं। उसने गर्दन नीचे डाल दी और हृदय में अनुभव किया कि मीठे आँसू के सौ-सौ फव्वारे फूटना ही चाह रहे हैं।

माधवराव ने अपना हाथ खिड़की में डाल दिया। परन्तु सुशीला ने पीठ कर ली और अन्दर चली गई। तब साँझ बिलकुल झुकी थी।

खिड़की के बाहर खड़े हुए माधवराव ने देखा कि घर के सूने अँधेरे में सुशीला की आकृति खो गई है।

माधवराव को यह आशा कदापि न थी। कई सुन्दर, सुकुमार और शिक्षित नवयुवतियों को उसने देखा है। परन्तु सुशीला तो गज़ब कर गई। यह भी कोई बात है कि पहले ही मौक़े पर इतना कह दिया जाए! पहले झेंप, फिर लज्जा, फिर संकोच और फिर बातचीत– रोमांस का विकास कुछ इसी तरह होता है।

फिर भी माधवराव आश्चर्य न कर सका। सुशीला की आँखों में ऐसा कुछ न था जिसका लज्जा-लावण्य से कोई सम्बन्ध हो। फिर भी उसमें स्तब्ध माँग थी, एक बूझ थी कि तुम कौन हो जो यहाँ तक चले आए हो इलाहाबाद से। माधवराव एक ऐसे दूर–स्थित प्रान्त से आया था कि सुशीला की आँखों में कल्पनाएँ ही कल्पनाएँ छा जाती थीं।

रात को सुशीला रामराव के पास जब माधवराव के बारे में अधिक बात करना चाहने लगी, तो उसके पति को ताव आ गया। इसलिए नहीं कि माधवराव के बारे में वह संशयालु है, परन्तु स्त्री के मुँह से किसी की इतनी अधिक तारीफ़ अपनी शान के खिलाफ़ जाती है। सुशीला समझी कि रामराव उसे माधवराव से बात करने से मना कर रहे हैं, जो कि समाज-मर्यादानुकूल पति का कर्तव्य है। इसलिए बिना विरोध किए वह आँखें खोले लेटी ही रही, उसे बहुत देर तक नींद नहीं आई। रामराव सोने को होता तो खेल करके उसे जगा देती। फिर डाँट खाती और चुपचाप पड़ी रहती। आधे घंटे बाद जब बारह का गजर हुआ तो उसने ज़बरदस्ती मीठी नींद में सोए रामराव को सारी ताक़त लगा उठाकर बैठा दिया। मुँह फुलाकर कहा, ‘उठ जाओ, हमें नींद नहीं आती।’

रामराव ने झल्लाते हुए कहा, ‘मुझे गहरी आ रही है।’

सुशीला ने अड़कर कहा, ‘हमें माँ के पास पहुँचा दो।’

‘पागल हो गई हो?’ पर रामराव ने देखा कि वह रो रही है। वह और भी चिढ़ गया, ‘अरे यार, बड़ी आफ़त है!’ कहकर रामराव धड़ाम से बिस्तर पर गिर गया और सो गया। सुशीला के सामने केवल निरपेक्ष निर्वैयक्तिक अन्धकार छा रहा था।

सुबह उठकर ही सुशीला ने रामराव से कहा, ‘दो साल हो गए, माँ को नहीं देखा। वह अब बूढ़ी हो गई है, मर-बिर जाएगी। फिर बाद कौन जाता है! मुझे वहाँ पहुँचा दो। मैं कितनी जाना चाहती हूँ।’ और वह ज़िद पकड़ गई। दिन-भर खाना नहीं खाया और उदास बैठी रही।

तब रामराव समझा, बात ज़रा गम्भीर है। इसलिए सांसारिक ज्ञान की ज़िम्मेदार भव्यता, अपने गाल की हड्डी निकले हुए खड्डेदार मुँह पर लाकर बोला,‘इसी साल गेहूँ चार महीने के ख़रीद लिए हैं, और घासलेट पीपे के रुपए अभी तक बाक़ी धरे हैं। दूसरे, वहाँ तक के लिए भी तो सिर्फ़ जाने के चार लगेंगे, और चार लौटना और एक हाथ ख़र्च, इस तरह दस। इससे तो तुम्हें एक साड़ी आ सकती है जो दो साल तक आराम से चलेगी और कुछ ठीक दिखोगी। अच्छा, कहती हो तो दिवाली पर चलेंगे। तब तक कुछ ट्यूशन भी जमा हो जाएगी। दिवाली के सिर्फ़ चार महीने हैं।’

सुशीला का हृदय सुनते-सुनते फटा जा रहा था। उसने उँगलियों पर गिनकर देखा तो दिवाली के साढ़े पाँच महीने निकले।

चार दिन हो गए। सुशीला दिखी ही नहीं। माधवराव रामराव के भी घर गया था। परन्तु बैठक तक उसकी छाया भी नहीं आई। वह आश्चर्य करता हुआ सोच रहा था कि ऐसी क्या बात हो गई होगी। रामराव? संशय? रोक? डाँट? या वह मुझे भटकाना चाहती है।

परन्तु एक दिन सुबह ही वह कुएँ पर जाती दिखलाई दी, यह मौक़ा माधवराव कैसे चूक सकता था। पैर बढ़ाता हुआ वहाँ जा पहुँचा।

उसने देखा कि वह लान गम्भीर हैं। सिर के काले केश ढीले होने से हवा के कारण गालों पर मँडरा रहे हैं। उसके प्रथम दर्शन का वह स्तब्ध पूर्ण मुख किसी अभिव्यक्ति से आप्लावित होकर रक्तिम हो गया है। उसे बात समझ में नहीं आई। इसलिए वह और भी सुन्दर मालूम हुई।

उसने दूर से ही हल्की मीठी आवाज़ से कहा, ‘सुशीला।’

सुशीला चौंकी नहीं। उसने माधवराव को दूर से ही आते देख लिया था। केवल एक बार उसकी ओर देखा, और फिर कुएँ से पानी निकालने लगी। प्रातर्वायु की पुलक माधवराव के सर्वांग में छा रही थी। आसमान ताज़े प्रकाश से विहसित था।

सुशीला ने पानी की बालटी निकाली, और उसकी ओर देखती हुई खड़ी हो गई। फिर बोली, मुसकराने की कोशिश करते हुए जिससे कि उसके होंठ आकुंचित हो गए, ‘इलाहाबाद कब जानेवाले हैं?’

‘परसों।’

‘मैं भी माँ के पास जानेवाली थी, लेकिन अब नहीं जाती, फिर कभी सही।’

‘और क्या आज्ञा है?’ कहकर माधवराव ने अकस्मात् सुशीला का ठंडा गीला हाथ अपने हाथ में ले लिया। उस निर्जन में सूर्य की लाल किरणें उन दोनों के बीच में से कुएँ पर छा रही थीं।

सुशीला ने हाथ को तुरन्त खींच लिया। कहा, ‘दी हुई काद बरी पढ़ ली।’

‘अच्छी लगी?’ माधवराव ने पूछा।

‘अच्छी है, पर उस स्त्री के ‘इतने’ थे, पर मित्र तो एक भी नहीं था!’

सुशीला ने ‘मित्र’ शब्द इतने ज़ोर से कहा कि माधवराव समझते हुए भी कुछ नहीं समझा। सुशीला के चेहरे से उसे ऐसा लगा मानो वह पूछ रही हो, ‘तुम मेरे मित्र हो सकते हो?’

इतने में चम्पा सिर पर एक के ऊपर एक मटका लिये आ गई। वे दोनों चुपचाप अलग हट गए। सुशीला के हृदय में वही बात गूँज रही थी, ‘माधवराव, तुम मेरे मित्र हो सकते हो?’ परन्तु तीक्ष्ण-जिह्व चम्पा की ओर सबसे अधिक माधवराव का ध्यान था। वह स्थिति को बचा लेना चाहता था। उसका पिघला हुआ हृदय सहसा बर्फ़ हो गया। नीची गर्दन किए हुए सोचता हुआ आगे चलने लगा।

चम्पा का चेहरा उग्र हो गया था। परन्तु सुशीला ने परवाह नहीं की। उससे भी अधिक अपना चेहरा कठोर बनाकर वह चली गई।

रामराव ने सिर्फ़ इतना ही कहा कि माधवराव से इतना अधिक बोलना जन-लज्जा के कुछ प्रतिकूल है, कि सुशीला का मुँह एकदम फूल गया। तीन दिन तक वह पति से बोली नहीं। बिचारा रामराव आख़िर क्या करता? अब वह रोज़ से अधिक काम करती और अपने को बिलकुल फुर्सत या आराम न देती। उधर रामराव का जीवन ख़राब होने लगा। वह सुबह-शाम स्कूल के पहले और बाद सुशीला को अपने संस्पर्श में रखने का आदी हो गया था। परन्तु उसने इसलिए धैर्य रखा कि परसों तो माधवराव जानेवाला है। फिर भी उसके दिमाग़ पर अस्थिर बेचैनी बनी रहती। उसने भी, प्रतिक्रियास्वरूप, सुशीला से बोलना छोड़ दिया।

इस प्रकार ये दो ग्रह अपने अलग-अलग वृत्त-पथों पर घूमते, सिवा कुछ क्षणों के जबकि दोनों के पथ, कुछ दूर तक पास आ जाते। सुदूरतम श्याम में ये दोनों ग्रह अपनी-अपनी ज्योति में ढँके निकल जाते। सुशीला ने सुबह से शाम तक का कार्यक्रम निश्चित कर लिया, और एकाग्र होकर इसी तरह दिन और सुबह तै करती। सुबह सबसे जल्दी उठती, शाम को सबसे बाद थकी-माँदी बिस्तर पर पीठ टेकती।

कुएँ पर उषा का लाल विभास उसी तरह फैल जाता। स्त्रियों पर स्त्रियाँ आतीं। प्रतिदिन के अनुसार बालटियों और घड़ों की खडख़ड़ाहट वातावरण में गूँजती रहती। नीम के पेड़ की निरपेक्ष हिलडोलमई सरसर उसी तरह, झूमती रहती। दुपहर ग्यारह बजे से शुरू होती। क्लर्कों और मास्टरों का नहाना, सुबह के पाँच घंटे काम की क्षुधापूर्ण थकावट के उपरान्त, प्रतिदिन के अनुसार उनकी मुख-रेखाओं पर कुछ उत्साह का प्रवाह दौड़ा देता। और फिर टीन से उठता हुआ तपते आसमान में क्षुद्र लगनेवाला धुआँ, और उन्हीं छतों के नीचे दो क़ौर खाते ही गात-गात में थकावट का अनुभव प्राप्त करनेवाले तरुण क्लर्क और मास्टर, उनके बच्चों के दारिद्य की आभा से दमक उठनेवाले जिद्दी चेहरे। फिर शाम आती, रोज़ की भाँति चिन्ता-ज्वाला के समान श्यामारूण, नीम और कुएँ पर कुछ समय के लिए बुझती दृष्टि डाल, और फिर अपने विराट अँधेरे से सर्वत्र को मिलाकर लुप्त हो जाती। प्रत्येक क्षण अपने अन्तस्तल में अपना नक्शा लिये खिसकता चलता। दिवसानुदिवस सुशीला को मालूम हुआ कि माधवराव का विचार बदल गया है। वह कल न जाकर पँधरा दिन बाद जाएगा। उसने खेदमय आश्चर्य से गर्दन हिला दी कि पुरुष कैसे होते हैं जो अपना वचन नहीं रख सकते!

सुशीला ने उस समय पर कुएँ पर जाना छोड़ दिया जबकि माधवराव आता था। जो-जो माधवराव के फ़ुरसत के समय थे तब तक सुशीला जानबूझकर काम में अधिक व्यस्त हो जाती। घर के बाहर तपती सुनहली ज़मीन पर माधवराम की छाया घूमती हुई सुशीला को दिखलाई देती। उसके मन की गम्भीरता के सघन वातावरण को छेदता हुआ विह्वलता का एक किरण–सा जलता तीर उचककर ऊपर जा जाता, परन्तु फ़ौरन वातावरण के श्याम गाम्भीर्य में खो जाता। और फिर सुशीला का निर्विकार पूर्ण चेहरा नीचे झुककर अपने काम में डूब जाता।

माधवराव बिस्तर बाँधने लगा। सूटकेस तैयार हो गया था। और देशपांडे महोदय ताँगा लेने गौतमपुरे चले दिए। माधवराव का हृदय एक आशा में लीन था कि शायद सुशीला का पूर्णेन्दु मुख उसे जाते समय तो दिख ही जाएगा। इसलिए रामराव के यहाँ वह जाकर बैठ गया। इतनी दुपहर को उसने वहाँ चाय पी। परन्तु अन्दर से सुशीला की परिचित सरसराहट तक न आई। उसने आज सुबह कुएँ पर जाते समय सुशीला को देखा था, जब वह रोज़ के अनुसार कुएँ पर जा रही थी। उसका मुँह देखते ही माधवराव के हृदय में आशा का दीपक जग गया था।

ताँगा आते ही देशपांडे ने बैठने की जल्दी की, और ज्योंही माधवराव को लादे ताँगा पत्थरों पर खड़ाखड़ाता हुआ आगे चलने लगा कि यकायक रामराव के रसोईघर की काली खिड़की खुली, और वही स्तब्धपूर्ण मुख, आँखों में न्याय्य मैत्री की माँग करनेवाला करुण दुर्दम चेहरा, वहीं स्तब्ध मूत्र्त भाव।

माधवराव के हृदय की मानो खड़ाखड़-खड़ाखड़ (खिड़कियाँ) खुल गईं और एक बेरोक प्रकाश का तूफ़ान अन्दर घुस गया और छाने लगा।

ताँगा लुप्त हो गया एक मिनिट बाद ही, परन्तु तपते सूर्य के नीचे अवसन्न व्याकुल सड़क पर जी.एन.आइ.टी. की लाल बस धूल उड़ाती हुई चल दी। परन्तु सड़क के किनारे का पीपल वृक्ष सूने में ही उन यात्रियों को अपनी मूर्ख वृहद् शाखाएँ डुलाकर विदा का नमस्कार कर रहा था।

(रचनाकाल मूल सम्पूर्ण 3.9.1942, आंशिक संशोधन सम्भवत: 1947)

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* महाराष्ट्रीय साड़ी