रुरु और प्रमद्वरा (महाभारत की अनसुनी कहानियाँ - 2)

 


पिछली कहानी में हमने पढ़ा की च्यवन ऋषि का जन्म कैसे हुआ था।

इस कहानी का मुख्य नायक रुरु च्यवन ऋषि का पोता था।

रुरु के पिता का नाम प्रमति ऋषि था और उनका आश्रम स्थूलकेष नामक एक ऋषि के आश्रम के पास में था।

एक दिन, रुरु स्थूलकेष ऋषि से मिलने के लिए उनके आश्रम पहुँच गया। आश्रम का दौरा करते हुए, उसने वहाँ प्रमद्वरा नाम की एक सुंदर कन्या को देखा। रुरु को तुरंत उससे प्यार हो गया और उसने उससे शादी करने का फैसला कर लिया।

वह अपने पिता, प्रमति ऋषि के पास पहुँच गया। रुरु ने उन्हें बताया कि उसने अपना दिल प्रमद्वरा को दे दिया हे और वह अपना जीवन उसके साथ ही बिताना चाहता है।

प्रमति ऋषि फिर स्थूलकेष ऋषि के पास चले गए और उनसे अपनी बेटी का हाथ माँग लिया। स्थूलकेष ऋषिने अपनी बेटी को प्रमति ऋषि के घर देने से सहमत हो गए। उन्होंने रुरु को दामाद के रूप में स्वीकार कर लिया। दोनों परिवारों ने कुछ दिनो के बाद, एक शुभ दिन पर शादी की रस्में निभाने का फैसला कर लिया।

प्रमद्वरा भी अपने पिता के इस फ़ैसले से ख़ुश थी। वह अपने पिता से बहुत प्यार करती थी। स्थूलकेष ऋषि ने भी प्रमद्वरा की परवरिश काफ़ी लाड़-प्यार से की थी, लेकिन स्थूलकेष ऋषि प्रमद्वरा के वास्तविक पिता नहीं थे।

प्रमद्वरा गंधर्वों के राजा विश्ववसु और स्वर्ग की अप्सरा मेनका इनकी बेटी थी। प्रमद्वरा अनैतिक  सम्बंध से पैदा हुई थी, इसलिए मेनका ने उसे नदी के किनारे छोड़ दिया था। जब स्थूलकेष ऋषि नदी के किनारे टहल रहे थे, तो उन्होंने नदी के किनारे एक बच्चे को देखा था। एक अकेले बालिका को देखकर, उनका हृदय करुणा से भर गया और वह उसे घर लेके आ गए। उन्होंने उस बालिका को अपनी बेटी की तरह ही स्नेह किया। उन्होंने उसका नाम प्रमद्वरा रखा, क्योंकि वह केवल सुंदर ही नहीं थी, बल्कि सर्वगुणसंपन्न भी थी।

शादी के कुछ दिन पहले, प्रमद्वरा अपनी सहेलियों के साथ जंगल में खेल रही थी। सहेलियों के पिछे दौड़ते समय, उसने गलती से एक सोते हुए साँप की पूँछ पर पैर रख दिया। फिर साँप ने उसकी तरफ छलाँग लगाई और अपने जानलेवा नुकीले दातों से उसे काट लिया। प्रमद्वरा तुरंत बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ी और जल्द ही विषैले दंश के कारण उसकी मृत्यु हो गई।

इस अविश्वसनीय दुखद समाचार को सुनने के बाद स्थूलकेष ऋषि घटनास्थल पर पहुँच गए। आसपास के क्षेत्र में रहने वाले अन्य महान ऋषि-मुनि भी उस जगह पर आए। सभी ने प्रमद्वरा के निर्जीव शरीर को घेर लिया और स्थूलकेष ऋषि की भारी क्षति के लिए शोक व्यक्त किया।

जब रुरु ने यह समाचार सुना, तब उसे अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। वह भागता भागता उस स्थान पर आया, जहाँ प्रमद्वरा के निर्जीव शरीर रखा हुआ था। जब उसने प्रमद्वरा के मृत शरीर को देखा, तब उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। वह प्रमद्वरा से बहुत प्यार करता था और जीवन का हर एक पल उसके साथ बिताने का सपना देखता था। भयानक दुख से पीड़ित, रुरु उस स्थान से चल पड़ा और अकेले रोते हुए जंगल में चला गया।

चलते-चलते, वह रोते हुए भगवान को पुकारने लगा। फिर एक पेड़ नीचे बैठकर, उसने भगवान से व्याकुलता से प्रार्थना की, 'हे प्रभु, अगर मैंने अपने जीवन में अनेक पवित्र अनुष्ठानों को किया है और जन्म से ही अपने इंद्रियों को नियंत्रण में रखा है, तो प्रमद्वरा को आप जीवनदान दे दीजिए।’

उसकी व्याकुल प्रार्थना सुनकर, अचानक एक स्वर्गीय दूत उसके सामने आया और उससे कहने लगा, 'हे रुरु, जो पृथ्वी पर अपना समय पूरा करता है, उसे दूसरे लोक में प्रस्थान करना ही पड़ता है। प्रमद्वरा ने पृथ्वी वर अपना जीवन पूरा कर लिया था, इसलिए उसे यहाँ से दूसरे लोक जाना पड़ा। तुम्हें उसके मृत्यु का शोक नहीं करना चाहिए।'

लेकिन आत्यन्तिक दु:खी रुरु ने करुण स्वर में उस स्वर्गीय दूत से कहा, 'आप की बात सत्य है, लेकिन मैं प्रमद्वरा के बिना अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकता। क्या उसे फिर से जीवित करने का कोई तरीका नहीं है? मैं उसे पुनर्जीवित करने के लिए कुछ भी कर सकता हूँ।'

रुरु की दुखमय अवस्था देखकर, स्वर्गीय दूत का हृदय द्रवित हो गया। उसने कहा, 'हे रुरु, प्रमद्वरा को जीवित करने का केवल एक ही रास्ता है, लेकिन वह रास्ता बहुत ही कठिन है। यदि तुम अपना आधा जीवन प्रमद्वरा को दान करते हो, तो वह शायद पुनर्जीवित हो सकती है।'

प्रमद्वरा को पृथ्वी पर वापस लाने की आशा ने रुरु की आँखों में चमक ला दी। उसने स्वर्गीय दूत से कहा, 'मैं अपना आधा जीवन उसे दान करने के लिए तैयार हूँ। कृपया उसे जीवनदान दे दीजिए।'

स्वर्गीय दूत ने तब रुरु से वादा किया कि वह मृत्यु के देवता, यमराज, के साथ इस मामले पर चर्चा करेगा और प्रमद्वरा के पुनर्जीवन की संभावना के बारे में फिर से आकर उससे बात करेगा।

स्वर्गीय दूत जंगल से चला गया और उसने यमराज के साथ प्रमद्वरा पुनर्जीवन के बारे में चर्चा की। यमराज ने प्रमद्वरा को पुनर्जीवित करने के लिए अपनी अनुमति दे दी। यमराज की अनुमति मिलते ही, प्रमद्वरा ऐसे जाग गई, जैसे वह किसी बहुत गहरे नींद से जागी हो। स्वर्गीय दूत फिर से रुरु के पास आया और उसे यह खुशखबरी दे दी। प्रमद्वरा के पुनर्जीवन के बारे में सुनकर, रुरु अत्यंत खुश हो गया और भागते-भागते स्थूलकेष ऋषि के आश्रम पहुँच गया। वहाँ सब लोग प्रमद्वरा को जीवित देखकर अचंबित भी थे और प्रसन्न भी थे।

कुछ दिन के बाद, रुरु और प्रमद्वरा ने तय दिन पर शादी कर ली। शादी के बाद, वह एक-दूसरे के साथ खुशी-खुशी रहने लगे।

प्रमद्वरा पुनर्जीवित हो गई थी, लेकिन रुरु यह नहीं भूल पाया था कि एक घातक साँप के काटने की वजह से उसकी प्यारी पत्नी ने अपना जीवन खो दिया था। उसके मन में साँपों की पूरी नस्ल के खिलाफ अत्यधिक द्वेष भर गया था और अपने कष्ट का बदला साँपों से लेने का रुरु ने निश्चय कर लिया था। इस कारण, जब भी उसे कोई साँप उसे दिखाई देता था, वह किसी ना किसी हथियार से उसे मार डालता था।

एक दिन, जंगल में भटकते हुए, रुरु ने एक बुड्ढे साँप को जमीन पर पड़ा हुआ देखा। गुस्से से भरकर, रुरु ने अपनी चलने की छड़ी को उठाकर उसको मारना चाहा।

अचानक, उस साँप ने रुरु से बातें करना शुरू कर दिया, 'हे ब्राह्मण , मैंने तुम्हारा कोई नुकसान नहीं किया है। फिर भी, तुम मुझे क्यों मारना चाहते हो?'

रुरु ने जवाब दिया, 'हाँ। यह बात सच है कि तुमने मेरा कोई नुक़सान नहीं किया, लेकिन मेरी पत्नी को एक बार एक घातक साँप ने काटा था। इसलिए, जो भी साँप मुझे दिखाई देता है, में उसे मार डालता हूँ।’

फिर उस साँप ने उसे आश्वस्त करनेवाले स्वर में कहा, 'इंसानों को काटने वाले साँप अलग होते हैं। मैं डुण्डुभ प्रकार का साँप हूँ और हम किसी को काटते नहीं हैं। इसलिए, तुम मुझे मारकर बहुत बड़ा पाप करने जा रहे हो।'

मारकर बहुत बड़ा पाप करने जा रहे हो।'

रुरु ने तब देखा कि साँप डर के मारे काँप रहा था। करुणा से भरकर उसने अपनी छड़ी को नीचे कर दिया। उसने साँप से पूछा, 'तुम मुझसे बात कर रहे हो, इसका मतलब हे कि तुम कोई साधारण साँप नहीं हो। कृपया तुम मुझे अपना परिचय दो?'

साँप ने फिर उत्तर दिया, 'मैं सहस्त्रपाद नामक ब्राह्मण हूँ। एक ऋषि के शाप ने मेरे मानव शरीर को सर्परूप में परिवर्तित कर दिया है।'

रुरु ने सहस्त्रपाद को उसकी पूरी कहानी सुनाने का अनुरोध किया।

सहस्त्रपाद ने अपने दुर्भाग्य की कहानी सुनाना शुरू किया। उसने कहा, 'खगम नाम से मेरा एक दोस्त था। महान तपस्या करके उसने आध्यात्मिक शक्तियाँ प्राप्त की थी। एक दिन, वह एक यज्ञ कार्य में लगा हुआ था। मैंने कुछ खिलवाड़ करने का सोचा और उसे डराने के लिए घास के पत्तों का एक नकली साँप बनाया। फिर मैंने उसके शरीर पर नकली साँप फेंक दिया। नकली साँप से खगम डर गया। उसे डरते देख, मैं हँसने लगा। जब उसे पता चला कि वह एक नक़ली साँप है, तो वह क्रोधित हो गया। फिर उसने मुझे शाप दिया कि में एक विषहीन साँप में बदल जाऊँगा, क्योंकि मैंने उसे एक झूठे विषहीन साँप के साथ डरा दिया था। जब मैंने उसका शाप सुना, तो मैं भयभीत हो गया। मैंने उससे कहा कि मैंने यह केवल कुछ खिलवाड़ के लिए किया था और इसके पीछे और कोई बुरा इरादा नहीं था। मैंने उससे अपने शाप को वापस लेने की गुहार लगाई। मेरी विनती से उसकी करुणा जाग उठी और फिर उसने मुझसे कहा कि मैं साँप के शरीर में लंबे समय तक नहीं रहूँगा। एक दिन, मैं रुरु नाम के एक ब्राह्मण से मिलूँगा और फिर, मैं अपने मूल शरीर को प्राप्त करूँगा। मुझे खुशी है कि आज मैं तुमसे मिला हूँ और मेरा शाप हट गया है।'

जैसे ही सहस्त्रपाद ने अपनी कथा सुनाई, उसका साँप का शरीर छूट गया और उसे एक शानदार मानवी देह की प्राप्ति हो गई।

सहस्त्रपाद ने फिर रुरु से कहा, 'मैं तुम्हें कुछ महत्वपूर्ण बात बताऊँगा। किसी भी जीव के प्रति अहिंसा ये सबसे बड़ा गुण है। अहिंसा उन लोगों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं, जो तपस्या करने में लगे हुए हैं और आध्यात्मिक मार्ग पर चल रहे हैं। इस संबंध में, तुम्हें एक कहानी सुननी चाहिए कि किस प्रकार आस्तिक नामक एक तपस्वी ने राजा जनमेजय के सर्प-मेध यज्ञ में पूरी सर्प जाति को विनाश से बचाया था।'

तब रुरु ने सहस्त्रपाद से अनुरोध किया कि वह उसे आस्तिक की कहानी और राजा जनमेजय के सर्प-मेध यज्ञ के बारे में बताएँ।

लेकिन सहस्त्रपाद ने कहा, ‘तुम इस कहानी को उचित समय आने पर अपने आप सुन लोगे।'

ऐसा कहने के बाद, सहस्त्रपाद वहाँ से गायब हो गया।

रुरु ने जंगल में सहस्त्रपाद की तलाश की, लेकिन उसे वह नहीं मिला। निरर्थक खोज के कारण निराश होकर, वह घर लौट आया और उसने अपने पिता, प्रमति ऋषि से राजा जनमेजय के सर्प-मेध यज्ञ की कहानी सुनाने का अनुरोध किया। फिर प्रमति ऋषि ने रुरु को सर्प-मेध यज्ञ की कहानी सुनाई की कैसे राजा जनमेजय ने सर्प जाति का विनाश करने के सर्प-मेध यज्ञ का आयोजन किया और कैसे आस्तिक ऋषि ने उस महाविनाशक यज्ञ को रोककर सर्प-जाति की रक्षा की।