लोकदेव और महात्मा - (सुशोभित)

 

पण्डित जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के उपरांत राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर द्वारा लिखी पुस्तक ‘लोकदेव नेहरू’ भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के अंतर्मन की झाँकी देने वाली है।

लोकदेव : पण्डितजी के लिए इस शब्द का उपयोग विनोबा भावे ने किया था। वे पण्डितजी के देहावसान के बाद उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे थे, तब उन्होंने यह कहा। विनोबा में पारिभाषिक शब्द, बिम्ब, रूपक रचने की अनूठी प्रतिभा थी। उनके वांग्मय में ऐसे बहुतेरे शब्द हैं। आपातकाल को ‘अनुशासन-पर्व’ उन्होंने कहा, नहीं कहा, कहा तो किस मंतव्य से कहा, इस पर बहुत चर्चा हो चुकी है, उसमें अब नहीं जाऊँगा, किंतु गाँधीजी के सर्वोदय को उन्होंने ‘साम्ययोग’ अवश्य कहा था, फिर इसे आगे लेकर ‘पारमार्थिक-साम्य’ तक ले गए थे, न्यासिता के सिद्धांत को उन्होंने ‘विश्वस्त-वृत्ति’ कहा था, जय हिन्द के नारे को बदलकर उन्होंने ‘जय जगत’ कर दिया था, स्वराज्य को वो ‘सर्वायतन’ कहते थे। श्रमदान, अन्नदान, गोदान इत्यादि को वे ‘भूदान’ और ‘ग्रामदान’ तक ले गए थे।

विनोबा ने पण्डितजी को लोकदेव कुछ सोचकर ही कहा होगा। दिनकर ने अपनी पुस्तक का शीर्षक भी उसे कुछ सोचकर ही बनाया होगा। पण्डितजी और दिनकर में मैत्री थी, किंतु पण्डितजी की ओर से इसमें कृपाभाव अधिक था। ‘संस्कृति के चार अध्याय’ की भूमिका उन्होंने लिखी थी और वे दिनकर को केंद्र सरकार में मंत्री भी बनाना चाहते थे। दिनकर 1952 से ही राज्यसभा में थे और जब-तब, विशेषकर हिन्दी भाषा की अस्मिता के परिप्रेक्ष्य में, प्रधानमंत्री की बातों का प्रतिकार कर बैठते थे। चीन युद्ध के बाद लिखी गई ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ में भारत के पराभव का रोष है।

1964 में जब विनोबा ने पण्डितजी को लोकदेव कहा और 1965 में लिखी अपनी इस पुस्तक का शीर्षक जब दिनकर ने ‘लोकदेव नेहरू’ रखा, तब उन्हें अनुमान नहीं होगा कि एक दशक के बाद ‘लोकनायक’ और ‘लोकबंधु’ के रूपक उभरकर सामने आएँगे। 1974 में संपूर्ण क्रांति के प्रणेता जयप्रकाश नारायण लोकनायक कहलाए थे और 1977 में सम्राज्ञी प्रियदर्शिनी को लोकतांत्रिक चुनाव में परास्त करने वाले राज नारायण को लोकबंधु की उपाधि दी गई थी। अगर कोई यह स्थापना सामने रखे कि 1975 का ‘अनुशासन-पर्व’ नेहरूवादी-एकाधिकार की स्वाभाविक परिणति थी, तब देवता और नायक का द्वैत सहज ही उपस्थित हो आता है। देवता वह है, जो प्रतिष्ठित हो! नायक वह है, जो लोक का नेतृत्व करता हो! और बहुधा नायक प्रतिमाभंजक होता है। वह देवताओं के विरुद्ध विद्रोह करता है और विद्रोह का नेतृत्व भी करता है। विनोबा और दिनकर के द्वारा प्रयुक्त लोकदेव विशेषण कालांतर में ऐसी राजनीतिक अर्थछटा ग्रहण कर लेगा, यह उन्होंने सोचा नहीं होगा।

हमें एक बात समझना चाहिए कि जिस स्वातंत्र्योत्तर भारत को हमने ‘इनहेरिट’ किया था, वह गाँधी का नहीं नेहरू का भारत था। नेहरू ने इसे अपने आभामंडल के अनुरूप रचा था। हम अक्सर भूल जाते हैं कि जब हम किसी मानदंड को सामने रखते हैं, तब वह एब्सोल्यूट नहीं होता है, बल्कि संदर्भ-विशेष में उसकी स्वीकार्यता होती है। दुनिया के हर देश के पास भिन्न मानदंड हैं। भारत के पास साल 1947 के बाद से एक नेहरूवादी-निकष था। आधुनिक भारत के सभी मूल्य और निर्णय इसी कसौटी पर कसे जाते रहे हैं। वर्ष 2014 के बाद से देश में नेहरूवादी-निकष का तीखा प्रतिकार किया जा रहा है और इस विरोध को लोकचेतना में भीतर तक प्रविष्ट कराया जा रहा है। इतिहास की दूसरी गतियों की तरह यह भी एक गति है। कालांतर में क्या नेहरूवादी-निकष का स्थान कोई और मानदंड लेगा और भारत का विचार बदलेगा, यह देखने जैसी बात होगी। किंतु आज जो भारत का स्थापित विचार है, वह एक नेहरूवादी-प्रवर्तन ही है।

हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि गाँधी को आज के भारत ने इनहेरिट नहीं किया है, नेहरू को किया है। गाँधी इस भारत के लिए अनन्य, अलभ्य और अव्याख्येय हैं। इसीलिए वो पूजे भी जाते हैं और भारतीय-समाज की मुख्यधारा के साथ ही वाम और दक्षिण की उपधाराएँ भी समय-समय पर उन्हें स्वीकारने का स्वांग करती हैं। किंतु इतिहास के तर्क से संचालित ताक़तों का संघर्ष एक तरफ़ नेहरू और दूसरी तरफ़ आम्बेडकर से जितना तीव्र है, उतना गाँधी से नहीं है, यह स्पष्ट है। जब हम आधुनिक भारत के विचार की बात करते हैं तो हमें जानना चाहिए कि लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, व्यक्तिगत-स्वतंत्रता, औद्योगीकरण, वैज्ञानिक चेतना, समाजवाद, नगरीकरण, विश्व-नागरिकता और गुटनिरपेक्षता- ये सब नेहरूवादी मानदंड हैं। इसके समक्ष गाँधीवादी मूल्य हैं- सत्य, अहिंसा, इंद्रिय-निग्रह, आहार-संयम, अपरिग्रह, ग्राम-स्वराज, साधन-शुचिता, धर्मनिष्ठा, आत्मनिरीक्षण और सत्याग्रह। आप स्वयं ही तुलना करके देख सकते हैं कि आधुनिक भारत का निर्माण गाँधीवादी ख़ाके में हुआ है या नेहरूवादी ख़ाके में।

गाँधीजी ने विनोबा को अपने आध्यात्मिक उत्तराधिकारी (प्रथम सत्याग्रही) और नेहरू को अपने राजनीतिक उत्तराधिकारी (प्रथम नेता) के रूप में क्यों चुना था, इस पर भी पर्याप्त विमर्श हुआ है, किंतु नेहरू सदैव ही गाँधी के आज्ञाकारी अनुयायी नहीं थे और ‘हिन्द स्वराज’ की स्थापनाओं से तो उनकी घोर असहमति थी। गाँधी-नेहरू के बीच तीखे मतभेदों और वाद-विवादों का अपना एक पृथक इतिहास है। नेहरू जी गाँधीजी की धर्मभीरूता का मखौल भी उड़ाते थे।

गाँधी और नेहरू के द्वैत में आधुनिक भारतीय नियति की अनेक कुंजियाँ भले छुपी हों, आधुनिक भारत को नेहरू ने अपने अनुरूप रचा था, इसमें किसी को संदेह नहीं है। किंतु क्या वह नेहरूवादी-प्रवर्तन भारत-नियति के अनुकूल था, क्या गाँधीवादी-विचार उसकी तुलना में भारत-भावना के प्रति अधिक संश्लिष्ट था, और क्या इन दोनों के ही विपरीत एक तीसरी ऐतिहासिक धारा नए भारत की नियति के सूत्र सम्हालेगी, ये सरल प्रश्न नहीं हैं और ना ही इनके कोई सरल उत्तर संभव हैं। किंतु एक टेक्स्ट के रूप में गाँधी और नेहरू का जीवन और विचार हमारे सामने प्रस्तुत है। उसकी विवेचना में हमें प्रमाद नहीं करना चाहिए।

दिनकर ने अपनी पुस्तक में गाँधी और नेहरू दोनों को ही ‘पराजित पुण्य के प्रतीक’ कहा है। यह एक सुंदर और अर्थगर्भी व्यंजना है। इसका अर्थ यह है कि एक सुदीर्घ जीवन-उद्यम के बावजूद इनकी नियति में कुछ ऐसा बदा था कि अंतकाल आते-आते उनकी पुण्यई गल गई। ‘लोकदेव’ के परिप्रेक्ष्य में अगर आप इसे समझें तो कह सकते हैं कि देवता की प्रतिमा खंडित हो गई थी। किंतु इस खंडन की विवेचना का अधिकारी भी वही हो सकता है, जिसमें स्वयं में देवत्व का अंश हो, राक्षसत्व की चेष्टा से इसके तात्पर्यों को नहीं बूझा जा सकता- इतिहास की शक्तियों को यह भी सदैव स्मरण रखना चाहिए।