लेखकों के लेखक - (सुशोभित)

 

दिल्ली में प्रतिवर्ष होने वाले विश्व पुस्तक मेले में वर्ष 2020 के आयोजन की थीम थी- गाँधी : द राइटर्स राइटर। यानी गाँधीजी लेखकों के लेखक हैं। निश्चय ही यह थीम गाँधीजी की 150वीं जयंती के अवसर पर रखी गई, किंतु यह इतनी भी अकारण नहीं है। इसे यों ही सौजन्यवश नहीं निश्चित कर दिया गया। गाँधीजी का हिन्दी भाषा और साहित्य से एक गहरा संबंध रहा है।

वर्ष 1918 में श्रीमध्यभारत हिन्दी साहित्य समिति के सम्मेलन में गाँधीजी ने इंदौर में कहा था कि हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा होना चाहिए। तब तक वे स्वयं हिन्दी बहुत अच्छी तरह से नहीं जानते थे। वे गुजराती भाषी थे और अंग्रेज़ी पर उनका सिद्धहस्त अधिकार था। चंपारण आंदोलन के दौरान उन्होंने हिन्दी सीखने पर ध्यान केंद्रित किया, किंतु उनकी हिन्दी अंत तक गुजराती-फ़ारसी लहजे वाली ही रही। उनकी अपनी एक निजी भाषा विकसित हुई है। किंतु उन्होंने हिन्दी के प्रसार के लिए दक्षिण में हिन्दी दूत भेजे थे। 1935 में उन्होंने हिन्दी साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता भी की।

जब गाँधीजी एक जननेता के रूप में भारत में उभरे, तब साहित्य की दुनिया में छायावाद का उदय हो रहा था। छायावाद की निजी रागात्मक शैली के प्रगतिवाद के युगबोध और राष्ट्रीय स्वर तक परिणत होने में गाँधीजी की केंद्रीय प्रेरणा रही थी। 1930 के दशक के बाद शायद ही हिन्दी का कोई ऐसा बड़ा साहित्यकार रहा हो, जो गाँधीजी से प्रेरित नहीं था। हिन्दी के अनेक लेखक तो स्वयं को सगर्व गाँधीवादी कहते थे। यशपाल जैसे लेखक गाँधीजी का घोर विरोध भी करते थे। अज्ञेय का झुकाव गाँधीजी से अधिक मानवेन्द्र नाथ राय के वैज्ञानिक मानववाद की तरफ़ था, किंतु वे गाँधीजी के रास्ते से होकर ही वहाँ तक पहुँचे थे।

जैनेंद्र ने गाँधीजी पर एक बहुत सुंदर पुस्तक लिखी है- ‘अकाल पुरुष गाँधी’। उनकी कहानियों में भी यदा-कदा गाँधीजी की प्रेरणा नक्षत्र की तरह चमक उठती थी। श्रीनरेश मेहता ने गाँधीजी पर एक खंडकाव्य ‘प्रार्थना-पुरुष’ लिखा है। अकबर इलाहाबादी ने ‘गाँधीनामा’ लिखा है। माखनलाल चतुर्वेदी से लेकर सियारामशरण गुप्त तक के काव्य-नायक गाँधीजी रहे हैं। भवानी बाबू का नाम तो ख़ैर इस सूची में आना ही है। उन्होंने ‘गाँधी पंचशती’ लिखी है। उनके सुपुत्र अनुपम मिश्र भी फिर आजीवन गाँधीवादी रहे। बच्चन ने ‘सूत की माला’ लिखी है। सुमित्रानंदन पंत ‘युगांत’ के बाद गाँधीजी की ओर झुके। उन्होंने वैसी कविताएँ भी लिखीं, जिसमें गाँधीवाद की तुक अविवाद से मिलाई जाती थी। निराला और उग्र से गाँधीजी का संवाद रहा है। बालकृष्ण शर्मा नवीन भी गाँधीवाद से प्रेरित थे। गाँधीजी पर उनका एक सुंदर निबंध इधर पढ़ा। रामवृक्ष बेनीपुरी, काका कालेलकर और दादा धर्माधिकारी का गाँधी-अनुराग किसी से छिपा नहीं है। कुबेरनाथ राय का गाँधी-चिंतन प्रणम्य है। यह उनकी पुस्तक ‘पत्र मणिपुतुल के नाम’ में व्यक्त हुआ है। गाँधीजी की सबसे गहरी प्रेरणा तो प्रेमचंद पर रही है। प्रेमचंद को सामाजिक यथार्थवाद से आदर्शवादी यथार्थवाद तक लेकर आने वाले गाँधीजी ही थे। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने गाँधीजी पर भावविभोर होकर लिखा है। वे उन्हें महात्माजी के अलावा और किसी नाम से नहीं पुकारते थे। पं. विद्यानिवास मिश्र ने ‘गाँधीजी का करुण रस’ नामक निबंध लिखा है।

स्वयं गाँधीजी ने कभी कोई कविता या कहानी लिखने का प्रयास भी नहीं किया होगा। उनका लेखन राजकोट में क़ानून की अर्ज़ियाँ लिखने से शुरू हुआ। दक्षिण अफ्रीका में यह प्रतिवेदन और हलफ़नामा लिखने के रूप में विकसित हुआ। वहीं से ‘इंडियन ओपिनियन’ के माध्यम से गुजराती पत्रकारिता का आरंभ भी उन्होंने किया। भारत में गाँधीजी ने ‘हरिजन सेवक’ नामक पत्र हिन्दी में निकाला। उन्हीं के द्वारा स्थापित ‘नवजीवन प्रकाशन मंदिर’ को मैं हिन्दी के अग्रणी प्रकाशकों में से एक मानता हूँ। नवजीवन के द्वारा प्रकाशित पुस्तकें लाखों की संख्या में बिकती हैं। इसी प्रकाशन से आई ‘गाँधीजी की आत्मकथा’ का जो संस्करण मेरे पास है, अकेले उसी की ढाई लाख से अधिक प्रतियाँ बिकने की सूचना है।

गाँधीजी के भारत-आगमन से पूर्व ही रबींद्रनाथ ठाकुर ने ‘घोरे बाइरे’ लिख दिया था, जिसमें गाँधी जैसे किसी राष्ट्रीय नायक के उदय की सूचना थी। वास्तव में बांग्ला में एक पुस्तक ही इस विषय पर लिखी गई है। पुस्तक के लेखक रबींद्रनाथ ठाकुर के शिष्य प्रमथनाथ बिशी हैं और उसका शीर्षक है- ‘रबींद्रनाथेर गाँधीचरितेर पूर्वाभ्यास।’

विश्व पुस्तक मेले की थीम को गाँधीजी पर एकाग्र करना मात्र सौजन्यवश नहीं है। गाँधीजी की एक लंबी छाया भारतीय साहित्य पर पड़ी है। वास्तव में यह संभव ही नहीं है कि हिन्दी का कोई लेखक, जो इस महादेश की नियति के बारे में मननशील हो, गाँधीजी को दरकिनार कर आगे बढ़ जाए। गाँधीजी से मुठभेड़ अनिवार्य है। ये और बात है कि अनेक लेखक इस विषय पर अपने मत को सार्वजनिक रूप से व्यक्त करें या ना करें। किंतु गाँधीजी पर चिंतन और उनके दृष्टांत को आधुनिक भारत के रूपक के साथ जोड़कर देखना हिन्दी के किसी भी लेखक के लिए अपरिहार्य है। इधर के लेखकों में बनवारी और नंदकिशोर आचार्य, गुजराती में नारायणभाई देसाई और अंग्रेज़ी में धर्मपाल ने गाँधीजी पर सुंदर और सुदीर्घ लेखन किया है। निर्मल वर्मा ने सदैव ही गाँधीजी को भारत के वृहत मनीषियों में से एक गिना और जयप्रकाश नारायण की ओर झुकाव रखने के कारण वे गाँधीवादी-मूल्यों के प्रति निरंतर आस्थावान और आशान्वित रहे।

आशा की जानी चाहिए कि ऐसे आयोजन युवाओं को गाँधीजी के चिंतन और जीवन-मूल्यों के प्रति सजग बनाने के अपने अभिप्रायों में सफल हो सकेंगे। गाँधीजी को उचित ही लेखकों के लेखक कहा जाता है।