कौरवों का जन्म (महाभारत की अनसुनी कहानियाँ -16)



 जब धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर यह तीन लड़के बड़े हो गए, तो हस्तिनापुर के सिंहासन पर पांडु को राजा के रूप में स्थापित कर दिया गया। धृतराष्ट्र बड़ा होने के बावजूद, दृष्टिहीन होने के कारण राजा नहीं बन सका।

एक दिन, भीष्म विदुर के पास गए गया और उसे कहा, ‘हे विदुर, अब तुम तीन लड़के विवाहयोग्य उम्र के हो चुके हो। तो तुम तीनों का विवाह करने के लिए हमें उचित कन्याओं को ढूंढना जरूरी है।’ फिर विदुर के साथ विचार-विमर्श करने के बाद, भीष्म ने धृतराष्ट्र की पत्नी रूप में गांधार राज्य के राजा ‘सुबल’ की कन्या को चुन लिया। सुबल की पुत्री और गांधार की राजकन्या, गांधारी, अतिसुन्दर और विद्वान कन्या थी। शिवजी की तपस्या करके उसने शिवाजी से एक सौ पुत्र होने का आशीर्वाद भी पा लिया था।

फिर भीष्म ने गांधार नरेश को संदेश भेजा। पहले तो, सुबल ने अपनी पुत्री को एक दृष्टिहीन मनुष्य को देने से मना कर दिया, लेकिन बाद में भरत वंश की गरिमा देखकर, गांधार नरेश ने अपनी पुत्री का विवाह धृतराष्ट्र के साथ करने के लिए सम्मति दे दी। जब गांधारी को पता चला कि उसका विवाह एक दृष्टिहीन पुरुष के साथ हो रहा है, तो उसने अपनी आँखों को जीवन भर पट्टी से बांध लेने की सौगंध ले ली। उसके बाद, गांधार नरेश का पुत्र, शकुनी, गांधारी को हस्तिनापुर ले कर आ गया। हस्तिनापुर में, भीष्म की देखरेख में धृतराष्ट्र और गांधारी का बड़े ही धूमधाम से विवाह हो गया। उस विवाह के लिए दूर-दूर से राजा-महाराजा और कई ऋषि-मुनि पधारे हुए थे।

गांधारी का विवाह होने के बाद, उसने अपनी सेवाभावी वृत्ति से सबका दिल जीत लिया। गांधारी एक सदाचारी पत्नी थी। वह अपने पति के सिवा किसी भी अन्य पुरुष के बारे में बात नहीं करती थी। एक दिन, वेद-व्यास घूमते-घूमते हस्तिनापुर आ गए। अपनी यात्रा के कारण, वह खूब थके-हारे थे। उनको जोरों की भूख भी लगी हुई थी। तब गांधारी ने उनका आदरपूर्वक स्वागत किया और उन्हें भरपेट खाना खिलाया। वेद-व्यास गांधारी की सेवा से प्रसन्न हो गए और उन्होंने गांधारी को एक सौ पुत्र होने का आशीर्वाद दे दिया।

उचित समय पर, गांधारी की धृतराष्ट्र से गर्भधारणा हो गई। उसने अपने गर्भ में भ्रूण को बढ़ाना शुरू कर दिया। ऐसे करते करते, दो साल बीत गए, लेकिन गांधारी को प्रसव का कोई चिह्न नहीं दिख रहे थे। इस कारण, गांधारी बहुत व्यथित हो गई थी। उस समय, गांधारी ने सुना कि कुंती ने एक तेजस्वी बालक को जन्म दे दिया है। इस समाचार ने जैसे आग में घी डाल दिया। अब गांधारी को कुंती के प्रति द्वेष की भावना उत्पन्न हो गई। द्वेष और क्रोध के कारण, गांधारी ने अपना धीरज खो दिया और एक दिन अधीर होकर, अपने पेट पर मुट्ठी से जोर से आघात कर दिया।

आघात के परिणाम स्वरूप, गांधारी के पेट से मांस का गोला बाहर निकलकर आ गया। जब गांधारी ने मांस का गोला देखा, तो वह दृश्य देखकर वह घृणा से भर गई। घृणित होकर, उसने वह मांस का गोला उठाकर कहीं दूर फेंकने का सोचा। जैसे ही उसने वह मांस का गोला उठाया, एकाएक वेद-व्यास उसके सामने प्रकट हो गए और उससे कहा, ‘पुत्र-वधू, ये तुम क्या करने जा रही हो?’

वेद-व्यास को देखकर, गांधारी ने उन्हें प्रणाम किया और उनसे कहा, ‘हे ऋषिवर, मुझे गर्भधारणा होकर अब दो साल बीत चुके है, लेकिन अभी तक मुझे प्रसव के कोई चिह्न नहीं दिखाई दे रहे। कुंती तो मेरे बाद में आई थी, फिर भी उसे एक पुत्र हो गया है। इस प्रकार, कुंती के प्रति द्वेष और अपने क्रोध के कारण, मैं बहुत व्यथित थी। इस वजह से, मैंने गुस्से में आकर अपनी ही पेट पर जोर से प्रहार कर दिया। उस प्रहार से क मेरे पेट से यह मांस का गोला निकलकर आया है। आपने तो मुझे एक सौ पुत्र होने का वरदान दिया था, लेकिन अब मुझे ऐसा लग रहा है कि मैं पुत्रहीन ही रहने वाली हूँ।’

गांधारी के शब्द सुनकर, वेद-व्यास ने कहा, ‘पुत्र-वधू, मेरे शब्द कभी झूठे नहीं हो सकते। मेरे पास मिट्टी के सौ घड़े लेकर आ जाओ। घड़े लाने के लिए जाने से पहले, तुम थोड़ा पानी भी लाकर मेरे पास रख दो।’

वेद-व्यास की आज्ञा मानकर, गांधारी ने उन्हें पानी लाकर दे दिया। फिर, वेद-व्यास ने उस मांस के गोले के ऊपर, पानी छिड़कना शुरू किया। उसके बाद, गांधारी के आँखों के सामने जो हुआ, वह देखकर वह चकित रह गई। पानी छिड़कते ही, उस मांस के गोले ने अपने आप को एक-सौ-एक हिस्सों में बाँटना शुरू कर दिया। हर एक हिस्से का आकार एक अंगूठे जितना बड़ा था।

फिर वेद-व्यास ने गांधारी से कहा कि वह एक-एक टुकड़ा उठाकर, एक-एक घड़े में रख दें और उन घड़ों के अंदर घी डालकर, उन्हें बंद करके किसी एकांत जगह पर रख दें। वेद-व्यास के आदेश के अनुसार गांधारी ने उन टुकड़ों को उठाकर, मिट्टी के घड़ों में डाल दिया और उन घड़ों के अंदर घी डालकर उन्हें बंद कर दिया। गांधारी ने फिर वह घड़े उठाकर एकांत जगह पर रख दिए।

अंत में, वेद-व्यास ने गांधारी से कहा, ‘इन घड़ों को पूरे दो साल गुजरने के बाद ही खोलना।’ ऐसा कहने के बाद, वेद-व्यास वहाँ से अंतर्धान हो गए।

दो साल होने के बाद, सबसे पहले उन घड़ों से दुर्योधन का जन्म हो गया। दुर्योधन जैसे ही मिट्टी के घड़े से बाहर निकलकर आ गया, उसने गधे की तरह रेंकना शुरू कर दिया। दुर्योधन की आवाज सुनकर सारे गधों ने, कौवों ने, गिद्धों ने और सियारों ने चिल्लाना शुरू कर दिया। इसके साथ, अचानक तेजी से हवा बहने लगी और राजमहल में बहुत सारे अपशकुन होने लगे।

दुर्योधन के जन्म होने से पहले ही कुंती की गर्भ से युधिष्ठिर पैदा हो चुका था। दुर्योधन के जन्म के बाद, सारे अपशकुन देख कर धृतराष्ट्र चिंतित हो गया। फिर धृतराष्ट्र ने अपने मंत्रियों और ज्ञानी ब्राह्मणों को बुलाया। उस सभा में भीष्म और विदुर भी उपस्थित थे।

धृतराष्ट्र ने सभा से उपस्थित लोगों से पूछा, ‘युधिष्ठिर का जन्म सारे राजकुमारों में सबसे पहले हो चुका है। इस प्रकार, इस सिंहासन पर उसका अधिकार है, लेकिन मैं जानना चाहता हूँ कि क्या दुर्योधन के नसीब में, युधिष्ठिर के बाद, राजा होने का भाग्य लिखा हुआ है?’ जैसे ही धृतराष्ट्र ने यह शब्द बोले, सियारों ने, कौवों ने और गिद्धों ने चिल्लाना शुरू कर दिया।

यह अपशकुन देखने के बाद, विदुर और दूसरे विद्वान ब्राह्मणों ने कहा, ‘महाराज, दुर्योधन का जन्म होने के बाद से, राजमहल में बहुत सारे अपशकुन दिखाई दे रहे हैं। इससे हमें यह पता चल रहा है की दुर्योधन आपके पूरे वंश का सर्वनाश करने वाला है। आपको आपके पुत्र, दुर्योधन का, किसी भी हिचकिचाहट के बिना त्याग कर देना चाहिए। एक पुत्र का त्याग करने के बाद भी आपके पास निन्यानवे पुत्र होंगे। ऐसा कहते है कि वंश को बचाने के लिए एक पुत्र का त्याग करना उचित है, एक गाँव को बचाने के लिए एक वंश का त्याग करना उचित है, एक देश को बचाने ने लिए एक गाँव का त्याग करना उचित है और अपने आत्मा को जानने के लिए, पुरे विश्व का त्याग करना उचित है।’

विदुर और विद्वान ब्राह्मणों का निर्देश सुनकर, धृतराष्ट्र अतिशय दु:खी हो गया, लेकिन अपने पित्रु-प्रेम के कारण, धृतराष्ट्र विदुर और ब्राह्मणों ने दीए हुए निर्देश को स्वीकार नहीं कर पाया।

इस घटना के एक महीने के भीतर, गांधारी के बाक़ी निन्यानवे पुत्रों का जन्म हो गया। उनके साथ गांधारी को एक पुत्री भी प्राप्त हो गई।

जब वेद-व्यास गांधारी के मांस के गोले के ऊपर पानी छिड़क रहे थे, तब उस मांस के गोले ने सौ हिस्सों में बँटना शुरू किया। तब गांधारी के अंदर एक पुत्री को पाने की इच्छा पैदा हो गई। उसके मन की यह बात वेद-व्यास ने जान ली और वेद-व्यास ने उसकी यह इच्छा पूरी करने की ठान ली। उसके बाद, उस मांस के गोले ने सौ हिस्सों की जगह, एक-सौ-एक हिस्सों में बँटना शुरू किया। फिर, वेद-व्यास ने गांधारी को बताया कि वह एक-सौ-एकवाँ हिस्सा, उचित समय के बाद उसकी पुत्री का रूप लेगा। ऐसा कहकर, वेद-व्यास ने गांधारी से एक और मिट्टी का घड़ा मंगाया और उसके अंदर वह हिस्सा डाल दिया। फिर उस घड़े में घी भर कर, उस घड़े को भी उन्होंने बंद कर दिया। इस प्रकार, उस आखरी घड़े से एक पुत्री का जन्म हुआ, जिसका नाम ‘दुशाला’ रखा गया। दुशाला घड़े से सबसे अंत में बाहर आई। वह अपने सारे भाइयों की छोटी बहन थी।

इसके अलावा, एक वैश्य स्त्री के साथ सम्बंध के कारण, धृतराष्ट्र को एक और पुत्र की प्राप्ति हो गई थी। जब गांधारी गर्भवती अवस्था में थी, तो अंध धृतराष्ट्र की सेवा एक वैश्य दासी करती थी। धृतराष्ट्र के साथ सम्बंध के कारण, उस दासी ने धृतराष्ट्र के एक पुत्र को जन्म दे दिया। उस पुत्र का नाम ‘युयुत्सु’ रखा गया।

इस प्रकार, धृतराष्ट्र को गांधारी से सौ और वैश्य दासी से एक, ऐसे एक-सौ-एक पुत्र हो गए और इन पुत्रों के अलावा, उसे गांधारी से एक पुत्री भी प्राप्त है।