काठ का सपना (कहानी) : गजानन माधव मुक्तिबोध

 

थके हुए कन्धे आगे बढ़ रहे हैं, जिन पर पीली मिट्टी का-सा चौड़ा चेहरा। उस पर काले कोयले के-से दाग़। कोई घूरा जलाती हुई, बू-भरी, धुँआती मैली आग जो मन में है और कभी-कभी सुनहली आँच भी देती है, पूरा शनिश्चरी रूप।

वे एक बालिका के पिता हैं, और वह बालिका एक घर के बरामदे की गली में निकली मुँडेर पर बैठी है, अपने को देखती हुई। उन्हें देख उसके दुबले पीले चेहरे पर मुसकराहट खिलती है। और वह अपने दोनों हाथ आगे कर देती है जिससे कि उसके काका उसे अपने कन्धों पर ले लें।

उसके पिता अपनी बालिका को देख प्रसन्न नहीं होते हैं। विक्षुब्ध हो जाता है उनका मन। नन्ही बालिका सरोज का पीला चेहरा, तन में फटा हुआ सिर्फ़ एक ‘फ्रॉक’ और उसके दुबले हाथ उन्हें बालिका के प्रति अपने कर्तव्य की याद दिलाते हैं; ऐसे कर्तव्य की जिसे वे पूरा नहीं कर सके, कर भी नहीं सकेंगे, नहीं कर सकते थे। अपनी अक्षमता के बोध से वे चिढ़ जाते हैं। और वे उस नन्ही बालिका को डाँटकर पूछते हैं, ‘यहाँ क्यों बैठी है? अन्दर क्यों नहीं जाती?’

बालिका सरोज, गम्भीर, वृद्ध दार्शनिक-सी बैठी रहती है। अपने क्रोध पर पिता को लज्जा आती है। उनका मन गलने लगता है। उनके हृदय में बच्ची के प्रति प्यार उमड़ता है। वे उसे अपने कन्धे पर ले लेते हैं। ऊँचे उठने का सुख अनुभव कर बच्ची मुसकरा उठती है।

पिता बच्ची को लिये घर में प्रवेश करते हैं, तो एक ठंडा, सूना, मटियाली बास-भरा अँधेरा प्रस्तुत होता है, जिसके पिछवाड़े के अन्तिम छोर में आसमान की नीलाई का एक छोटा चौकोर टुकड़ा खड़ा हुआ है। वह दरवाज़ा है।

घर में कोई नहीं है।

सिर्फ़ दो साँसें हैं।

एक पिता की।

दूसरी पुत्री की।

वे एक अँधेरे कोने में बैठ जाते हैं और उनके घुटनों में वह बालिका है। उसका चेहरा पिता को दिखाई नहीं देता। फिर भी, वह पूरा का पूरा महसूस होता है। वे चुपचाप उसके गाल पर हाथ फेरते हैं। हाथ फेरते जाते हैं और सोचते हैं कि यह लड़की मेरे समान ही धैर्यवान है, सबकुछ समझती है, सबकुछ पहचानती है। बड़ी प्यारी लड़की है। उन्हें लगता है कि उनकी आँखें तर हो रही हैं।

एकाएक ख़याल आता है कि अगर घर में बड़ा आईना होता तो अच्छा होता; अपनी बड़ी आँसू-भरी सूरत की बदसूरती देख लेते। उन्हें उमररसीदा आदमियों का रोना अच्छा नहीं लगता।

सामने, अँधेरे में, रंग-बिरंगी पर धुँधली आकृतियाँ तैर जाती हैं। सुन्दर चेहरेवाली एक लड़की है, वह उनकी सरोज है। नारंगी साड़ी है, सुनहली किनारी है, सफ़ेद चम्पई ब्लाउज़ है। गले में हार है। हाथों में रंग-बिरंगी चूड़ियाँ–एक-एक दर्जन। पति के घर से वापस लौटी है। खुश है, दामाद मैकेनिकल इंजीनियर है। जिसकी ग़रीब सूरत है। और वह बाहर बरामदे में कुरसी पर बैठा है; क्या करे सूझता नहीं।

घर में उनकी स्त्री पूड़ी बना रही है; पकौड़ियाँ बन रही हैं। बहुत-बहुत सी चीज़ें हैं। भाग-दौड़ है। हल्ला-गुल्ला है। शोर-शराबा है। लोग आकर बैठ रहे हैं–आ रहे हैं, जा रहे हैं। पास-पड़ोस की लुगाइयाँ चौके में मदद कर रही हैं। और उनके दिल में...क्या करें, क्या न करें, सब कुछ कर डालें! क्या ही अच्छा होता कि उनमें यह ताक़त होती कि वे सबको प्रसन्न कर सकते और सारी दुनिया को खुश देख सकते!...कि इतने में सपना टूट जाता है।

बरामदे का दरवाज़ा बज उठता है। पैरों की आवाज़ से साफ़ ज़ाहिर है कि स्त्री, जो कहीं गई थी, लौट आई है।

अन्दर आकर देखती है। उसे अचम्भा होता है। ‘यहाँ क्या कर रहे हो?’

उसकी आवाज़ गूँजती है, जैसे लोहे की साँकल बजती है, जैसे ईमान बजता है!

‘सरोज कहाँ है?’

कोई आवाज़ नहीं। सरोज और उसके पिता स्तब्ध बैठे हैं।

पिता बोलते हैं मानो छाती के कफ़ को चीरती हुई घरघराती आवाज़ आ रही हो। कहते हैं, ‘कहाँ गई थी? घर बड़ा सूना लग रहा था।’

स्त्री कोई जवाब न देकर वहाँ से चली जाती है। आँगन में पहुँचकर, ज़मीन में गड़ा हुआ एक पुराना पेड़ जो कट चुका है और जिसकी झिल्लियाँ बिखरी हैं, उस पर पैर रखकर खड़ी होती है। ज़मीन में उस कटे पेड़ में से ज़मीन की तहें छूते हुए, नए अंकुर निकले हैं। बाद में, उन पर से उतरकर, वह झिल्लियाँ बीनती है। पड़ोस से लाई हुई कुल्हाड़ी चलाकर, उन अधकटे ठूँठों से लकड़ी निकालने का ख़याल आता है। लेकिन काटने का जी नहीं होता। इसलिए झिल्लियाँ बीनकर, वह उनका एक ढेर बना देती है और फिर आँगन की दीवाल की मुँडेर पर चढ़ जाती है, क्योंकि उस मुँडेर के एक ओर नीम की एक सूखी डाल निकल आई है।

उसे वह तोड़ती है। ऊँची मुँडेर पर चढ़कर नीम की सूखी डाल तोड़ लाने का जो साहस है, उस साहस से दीप्त होकर वह प्रफुल्ल हो जाती है। सारी लकड़ी ठंडे चूल्हे के पास लाती है, जमा कर देती है।

सरोज पिता की गोद से उठ आई है। वह देखती है कि चूल्हे में सुनहली ज्वाला निकल रही है! वह देखती है, और देखती रह जाती है। उसे उस ज्वाला का रंग अच्छा लगता है। वह चूल्हे के पास जाकर बैठ गई है। उसकी रीढ़ की हड्डी दुख रही है, पर चूल्हे में जलती हुई ज्वाला उसे अच्छी लग रही है।

सारा चौका सुहाना हो उठता है–भूरा-मटियाला, साफ़-सुथरा। भीत की पटिया पर रखी पीतल की एक भगोनी, छोटे-छोटे दो गिलास और दो कटोरियाँ, कैसी चमचमा रही हैं, कितनी सुन्दर! उन पर माँ का हाथ फिरा है। तभी तो...तभी तो...।

सुबह के पकाए भात में पानी डाला जाता है और नमक। चूल्हे पर चढ़ गया है भात। सुबह का बेसन भी है। उसमें पानी मिला दिया जाता है। उसे भी चूल्हे के दूसरे मुँह पर रख दिया गया है, सीझता रहेगा।

सरोज बोलती नहीं, माँ बोलती नहीं, पिता बोलते नहीं।

जब वह नन्ही बालिका भोजन कर चुकी तो उसकी जान में जान आई। बोरे पर बिछे, माँ के चिथड़े से बने, अपने मुलायम बिस्तर पर वह सो गई। उसे नींद आ गई। पिताजी के बिस्तर से सटा हुआ उसका बिस्तर है। वे उसे अपने पास नहीं लेते। रात को वह बिस्तर गीला करती है, इसीलिए।

वे तथाकथित बिस्तरों पर लेट गए हैं। दोनों को नींद नहीं। दोनों एक-दूसरे से कुछ कहना चाहते हैं; कहना अवश्यक है। किन्तु वे जानते हैं कि दोनों को मालूम है कि उन्हें एक-दूसरे से क्या कहना है। उस पूर्व-ज्ञान को वे कहना-सुनना नहीं चाहते। वह पूर्व-ज्ञान वेदनाकारक है, इसलिए उसे न कहना ही अच्छा। फिर भी, न कहने से काम नहीं बनता, क्योंकि कह-सुन लेने से अपने-अपने निवेदनों पर सील लग जाती है, व्यक्तिगत मुहर लग जाती है। वह व्यक्तिगत मुहर अभी लगी नहीं है। हर एक उत्तर हर एक ज्ञान है। फिर भी, बहुत कुछ अज्ञात छूट जाता हैै!

वे नहीं चाहते थे कि रात में नींद के पहले के ये कुछ क्षण खराब हो जाएँ मन:स्थिति विकृत हो, और दुर्दमनीय चिन्ता से ग्रस्त होकर वे रातभर जागते-कराहते रहें, नहीं ऐसा नहीं! चिन्ता सुबह उठकर करेंगे। रात है। यह रात अपनी है। कल की कल देखी जाएगी।

किन्तु इन ख़यालों से माथे का दुखना नहीं थमता, देह की थकन दूर नहीं होती, असन्तोष की आग, बेबसी का धुआँ दूर नहीं होता।

नहीं, उसका एक उपाय है। ज़बरदस्ती नींद लाने के लिए आप एक से सौ तक गिनते जाइए! इस तरह, जब आप कई बार गिनेंगे, दिमाग़ थक जाएगा और आप ही आप भीतर अँधेरा छा जाएगा। एक दूसरा तरीक़ा भी है। रेखागणित की एक समस्य ले लीजिए। मन-ही-मन चित्र तैयार कीजिए। उसके कोणों को नाम दीजिए और आगे बढ़ते जाइए। अन्त तक आने के पहले ही, नींद घेर लेगी। एक और भी मार्ग है, जिसे इस लेख का लेखक अकसर अपनाया करता है। मस्तिष्क की सारी नसें ढीली कर दीजिए। आँखें मूँदकर पलकें बिलकुल बन्द करके, सिर्फ़ अँधेरे को एकाग्र देखते रहिए। तरह-तरह की तसवीरें बनेंगी। पेड़दार रास्ते और उस पर चलती हुई भीड़, अथवा पहाड़ और नदियाँ जिनको पार करती हुई रेलगाड़ी...भक-भक...भक।

अँधेरा जड़ हो गया और छाती पर बैठ गया। नहीं, उसे हटाना पड़ेगा ही–सरोज के पिता सोच रहे हैं। और उनकी आँखें, बगल में पड़े हुए बिस्तर की ओर गईं।

वहाँ भी हलचल है। वहाँ भी बेचैनी है। लेकिन कैसी?

...लेकिन उन दोनों में न स्वीकार है, न अस्वीकार! सिर्फ़ एक सन्देह है, यह सन्देह साधार है कि इस निष्क्रियता में एक अलगाव है–एक भीतरी अलगाव है। अलगाव में विरोध है, विरोध में आलोचना है, आलोचना में करुणा है। आलोचना पूर्णत: स्वीकारणीय है, क्योंकि उसका संकेत कर्तव्य-कर्म की ओर है, जिसे इस पुरुष ने कभी पूरा नहीं किया। वह पूरा नहीं कर सकता।

कर्तव्य-कर्म को पूरा करना केवल उसके संकल्प द्वारा ही नहीं हो सकता। उसके लिए और भी कुछ चाहिए। फिर भी, वह पुरुष मन-ही-मन यह वचन देता है, यह प्रतिज्ञा करता है कि कल ज़रूर वह कुछ न कुछ करेगा, विजयी होकर लौटेगा।

पुरुष में भी आवेश नहीं है। वह भी ठंडा है, सिर्फ़ गरमी लाने की कोशिश कर रहा है।

वह उसकी बाँहों में थी। निश्चेष्ट शरीर! फिर भी, उसमें एक ऊष्मा है, जो मानो सौ नेत्रों से अपने पुरुष को देख रही हो, निर्णय प्रदान करने के लिए प्रमाण एकत्र कर रही हो। फिर भी निश्चेष्ट और सक्रिय!

पुरुष संवेदनाओं के जाल में खो गया। उसे स्त्री के होंठ गुलाब की सूखी पंखुड़ियों से लगे, जिनमें उसे सूरज की गरमी की याद आई। उसके कपोल मिट्टी से थे–भुसभुसी, नमकीन, शुष्क मृत्तिका! उसका हृदय एक अनजानी गूढ़ करुणा की सूचना से भर उठा।...हाँ, उसके पेट, उसकी त्वचा में तो घरेलू बास थीं। उसने उसे अपनी बाँहों में भर लिया और वह, मन ही मन, उस पूरी गरम चिलकती हुई पृथ्वी की याद करने लगा जिस पर वह बेसहारा मारा-मारा फिरता है। क्या यह पृथ्वी उतनी ही दु:खी रही है जितना कि वह स्वयं है!

एक ऊर्जा उठी और गिर गई। पुरुष निश्चेष्ट पड़ा रहा। पर मन जाग्रत था।

...दोनों स्त्री-पुरुष के जीवन पर विराम का पूर्ण चिह्न लग गया है, काठ हो गए हैं। बाढ़ आती है। किनारे पर पड़े हुए काठों को बहाकर ले जाती है। जल-विप्लव है। काठ कहते जाते हैं, फिर भी वे प्राणहीन काठ, आपस में गुँथे हुए बहे जा रहे हैं। बादल-तूफ़ान के कारण, पेड़ तिरछे हो रहे हैं। पर वे गुँथे-बँधे बहे जा रहे हैं,

बहे जा रहे हैं...और, हाँ, गुँथे-बँधे काठ खाली नहीं हैं। उन पर एक बालिका बैठी हुई है। हाँ, वह सरोज है। अपने नन्हे दो हाथ उसने दोनों काठों पर टेक दिए हैं, जिनके सहारे वह स्वयं चली जा रही है।

सरोज की उस बाल मूर्ति की रक्षा करनी ही होगी। उन दो निष्प्राण काठ लट्ठों का यही कर्तव्य है।

पुरुष इस स्वप्न को देखता ही रहता है। बारह का गजर होता है। रात और आगे बढ़ती है। सप्तर्षि जो अब तक एक कोने में थे, सामने आकर साफ़ दिखाई देते हैं।

(कल्पना, अप्रैल 1963 में प्रकाशित)