जलना (कहानी) : गजानन माधव मुक्तिबोध

  

ज्यों ही उसकी आँख खुली, उसने पाया कि छाती पर का उसका दवाब अभी तक दूर नहीं हुआ है। सपने में न मालूम वह किस-किस पर चिड़चिड़ा रही थी, न मालूम कौन-कौन सामने-सामने या छिपे तौर पर मुँह चिढ़ा रहा था। सारी दुनिया कई टन वज़न का टीला बनकर उसकी छाती पर बैठी हुई थी, वह अभी भी बैठी हुई है।

उसने आँखें खोलकर सामने के दरवाज़े की तरफ़ देखा। वह अभी तक मुँदा हुआ था। उस दरवाज़े के भीतर से खाँसने-खँखारने की आवाज़ें आ रही थीं। वे उसके बूढ़े सास-ससुर की थीं। दूसरे कमरे में शान्ति थी। इसका मतलब यह था कि कोई चाय बनाने नहीं उठा है। धीरे-धीरे उस दूसरे कमरे में से कप-बशियों की आवाज़ टिनटिनाने लगी। उसे अच्छा लगा। बेहतर मालूम हुआ। लेकिन ज्यों ही उसे ख़याल आया कि उसका पति चाय बना रहा है, उसके मन में तेज़ाबी काला गटर बहने लगा।

काले सल्फ़्यूरिक एसिड की भयानक बू-बासवाला वह गटर उसके भीतर-भीतर बहता ही गया, और वह वहाँ जा मिला जहाँ एक घटना का चित्र, एक व्यक्ति की मूर्ति खड़ी हुई थी।

यह वह आदमी था, जिस पर वह एक ज़माने में जान देती थी। लेकिन अब वह बदल गया है। वह उसका पति है।

वह तड़ से एकदम उठी। दिल में ज़हर भरकर उसने अपनी बगल में सोए हुए बच्चे को इस तरह झकझोरकर जगा दिया जिससे वह खूब रो उठे, खूब चीखे, इतना तीखा शोर करे कि जिससे सब लोग, सास-ससुर, पति, बड़ा लड़का (जो बी. एस-सी, में पढ़ता है, और उसका कहना नहीं मानता), छोटे चिल्लर-पिल्लर, सब उस कर्कश क्रन्दन को सुनकर अशान्त और बेचैन हो उठें, हाय-हाय करने लगें। घर-भर पर यह उसका प्रतिशोध था। वह सबसे बदला लेना चाहती थी, उस आक्रोश के द्वारा कि जो उसका ख़ुद का नहीं था।

पानी बरस रहा था, आड़ा-तिरछा। दो बच्चे, जिनमें से एक को दमे का रोग था, बग़ैर छाता लिये, बिना स्वेटर पहने, स्कूल चले गए थे। ख़ुद उसको भी ब्रांकाइटिस की शिकायत रहती थी। लेकिन बिना ख़ुद की या बच्चों की परवाह किए, उसने रसोईघर की मजबूती से बन्द की गई खिड़की को खोल दिया।

दूर दिखती हुई नीली पहाड़ी और सलेटी रंग के फैले हुए तालाब के कई फ़र्लांग फैले हुए तेज़ लहरदार पानी को पार कर, पेड़ों को अपने सामने झुकाती हुई तूफ़ानी हवा रसोईघर में घुस पड़ी। और उसके साथ आए हुए छीटें कमरे को गीला करने लगे।

उबलती चाय को देखती हुई पति की आँखों ने अस्त-व्यस्त बालोंवाली अपनी स्त्री को देखा। और सन्न रह गया। उसने जान लिया कि आज उसे किन्हीं पेचीदा हालतों से मुक़ाबला करना है। और उसका मन अपनी ज़िन्दगी के पिछले वरक़ उलटने लगा। वैसे वह चुपचाप कप-बशियों में चाय उड़ेलता जा रहा था, बच्चों को हुक्म देता जा रहा था कि यह कप नाना को दे आओ, वह कप नानी को दे आओ।

सकी नंगी पीठ पर पानी के बारीक छींटे पड़ रहे थे, धोती का एक पल्ला भी अधगीला महसूस हो रहा था। उसने बाहर से आते हुए छींटे बन्द करने के लिए खिड़की बन्द करनी चाही।

ज्यों ही वह पुरानी चौखट पर नए ठुँके पल्लों को बन्द करने के लिए मुड़ा, उसकी आँखें दूर के बादलों में उस पार क्षितिज पर टिक गईं, जिसमें पूर्व दिशा की किरणें टूटकर धुँधले-भस्मीले बादलों पर आक्रमण कर रही थीं। तालाब का कुहरे में खोया हुआ किनारा नीले-सलेटी रंग में डूबा दिखाई देता था, लेकिन पानी में चमकते हुए हरे-हरे वृक्षों के शिखर पर ललाई की सम्भावना प्रकट हो रही थी।

उस आरपार फैले हुए विस्तृत दृश्य को देख वह एकबारगी स्तब्ध हो गया। उस दृश्य में इतनी ठंडक और ताज़गी थी कि दिल की मनहूसियत हवा हो गई और एक अजीब-सी थिरकन नाचने के अन्दाज़ में उभर उठी।

और फिर भी वह गम्भीर ही रहा। उसने खिड़की के पल्ले ज़बरदस्ती बन्द कर दिए। बच्चों को रसोईघर से भगा दिया। और ख़ुद चाय का कप हाथ में ले टेबिल के पास टीन की कुरसी पर जा बैठा। एक-एक घूँट चाय पीते हुए वह मन ही मन उस दृश्य का अवलोकन और पुनरवलोकन करने लगा।

और अकस्मात् उसे भान हुआ कि मनुष्य अपने इतिहास से जुदा नहीं है, वह कभी भी अपने इतिहास से जुदा नहीं हो सकता। न अपने बाह्य जीवन के इतिहास से, न अपने अन्तर्जीवन के इतिहास से। उसका अन्तर्जीवन अपने स्वप्नों में, अपने तर्कों और विश्लेषणों में, डूबता आ रहा है। उसे अधिकार है कि वह उसमें डूबता रहे, अपने से बाहर निकलने की उसे ज़रूरत नहीं है। अपने से बाहर वे निकलें जिनका बाह्य से कोई विरोध हो।

क्या यह सच नहीं है कि गणितशास्त्र में, जिसका उसने एम.एस-सी. तक अध्ययन किया था, एक काल्पनिक संख्या भी होती है? क्या यह काल्पनिक सं या फ़िजूल है? क्या प्रकृति की सूक्ष्म क्रियाएँ इसी संख्या का अनुसरण नहीं करतीं। क्या ऋण-एक राशि का वर्गमूल एक भ्रामक वस्तुम्है? क्या सीधी रेखा वक्र रेखा ही एक विशिष्ट रूप नहीं है? क्या यह झूठ है कि एक समय वह भी आएगा, जब वैज्ञानिक विधि-शिल्प इतना बढ़ जाएगा कि मानव-जीवन प्रकृति की शक्तियों का आज से अधिक दोहन करके, अधिक विकसित होते हुए, अपने आपको बदल डालेगा! कि आज के प्रश्न और समस्याएँ इतिहास की वस्तुम्होकर बहुत बार हास्यास्पद भी प्रतीत होती होंगी, उसी प्रकार हास्यास्पद जिस प्रकार बुंदेला नरेश राणा धंग के युद्ध! क्या यह सच नहीं है कि आज से सौ साल बाद सामान्य मनुष्य इतना सुविज्ञ हो जाएगा कि विज्ञान-प्राप्त नई सुविधाओं के कारण, वह फ़िलॉसफ़ी और पोयट्री के प्रश्नों पर बहस करने लगेगा? अजी, दुनिया और समाज की ज़िन्दगी में सौ साल बहुत थोड़े होते हैं। इतिहास की एक पलक उठती है और गिरती है कि एक सौ साल हो जाते हैं। उसमें धरा क्या है! मेरे बच्चे के बच्चे उस नई आभा को अवश्य देखेंगे। अजी, उसके पहले भी यह सम्भव है। आई डोंट केयर। आई विल लिव इन माई ड्रीम्स, दिस इज माई प्रायवेट वर्ल्ड, एंड आई एम एंटाइटिल्ड टु लिव इन इट, आई एम नॉट प्रिपेयर्ड टु लेट अदर्स डिस्ट्रॉय इट!

उसको पता ही नहीं चला कि कब उसने चाय पी डाली और कब उसने कुरता पहना। उसे एक कप गरम-गरम चाय की और प्यास लगी कि इतने में सफ़ेद बालों का उलझा हुआ जंगल लिए हुए माँ का खाँसता-हाँफता बदन, जो रक्तहीनता के कारण कोयले से काला और विद्रूप हो रहा था, उसके पास झुककर खड़ा हो गया। उसने दयनीय भाव से गिड़गिड़ाकर कहा–मुझे एक गरम चाय और दे, चुन्नू!

चुन्नू का हृदय उस आ वाणी को सुनकर दुखी हो गया। कहाँ गई माँ की वह पुरानी शान, जब वह घर-भर पर शासन करती थी! किन्तु आज वह निश्चित संख्या से अधिक एक कप चाय के लिए गिड़गिड़ा रही है। नहीं, उसका यह कर्तव्य है कि दमे से जर्जर इस देह के लिए व्यवस्था की जाए। अवश्य अवश्य!

पर कैसे? उसने स्वयं ही देखा था कि चाय के पहले दौर में दूध ख़त्म हो गया है, सिर्फ़ दो च मच दूध गिना-गिनाया उसकी स्त्री के लिए रखा है। अब क्या किया जाए!

उसने माँ की तरफ़ देखा, और एकाएक ज़ोर से हँस पड़ा। माँ को अपनी बाँहों में भर लिया। उसके ज़ोर से माँ की देह को तकलीफ़ होने लगी। उसे जगह-जगह दर्द होने लगा। वह चीख़ उठी–अरे छोड़, अरे छोड़! चुन्नू, छोड़!

उसने माँ को ज़बरदस्ती हाथों में उठा लिया और उसको लेकर लगा नाचने गोल-गोल! पास खड़े हुए आठ साल के बबुआ को मज़ा आ गया। वह ताली पीटने लगा। तीन साल का बुन्दू यह दृश्य देखता हुआ खड़ा हो गया और आठ साल का एक ‘उल्लू’ अपनी माँ को (उसकी चिड़चिड़ी स्त्री को) इस नाटक का समाचार देने के लिए पहुँच गया। रसोईघर के पासवाली छत से चिड़चिड़ाते गुस्से के धमाके फूटने लगे।

और, अकस्मात, यह नज़ारा सामने दिखाई दिया कि चुन्नू कमरे में काग़ज़ पर काग़ज़ निकालकर फेंकता जा रहा है। वे काग़ज़, जो उसने अबेर के रखे थे, सँभाल के रखे थे। कमरा बिखरे हुए काग़ज़ों से अजीब हो उठा है। उस बच्चे को, जिसे वह ‘उल्लू’ कहता है, बिखरे हुए काग़ज़ों को फिर से ज़माने के लिए कहा गया है। वह बड़ी मुस्तैदी से और फ़िक्र के साथ उन्हें छाँट-छाँटकर जमा करता जा रहा है। और एक समय वह आया, जब वे काग़ज़ छोटे-छोटे गट्ठों में बँध गए और एक बड़ी थैली में समा गए। वे काग़ज़ क्या थे? अख़बारों के टुकड़े, बच्चों की पुरानी बेकाम कापियाँ, अमरीकन और रूसी एजेंसियों के सरकारी समाचारों के वरक़, पुराने न्यू टाइ स, पुराने न्यूज़वीक (जिनको अब तक उसने बहुत सँभालकर रखा था, लेकिन जो अब एकाएक निरुपयोगी प्रतीत हुए)।

कन्धे पर थैली लटकाए ज्यों ही चुन्नू या चुन्नीलाल शर्मा, एम.एस-सी., असिस्टैंट टीचर, ज़ीने से उतरकर नीचे के कमरे में आया, उसे लगा कि कहीं उसे इस सुबह-सुबह भयानक दुर्घटना का सामना न करना पड़े, यानी कि कहीं अपनी औरत से मुठभेड़ न हो जाए!

लेकिन नहीं, उसका यह भय निराधार था। रास्ता साफ़ था। उसके अपने स्वभाव के अनुसार, सुबह की रोशनी की ताज़गी में उसकी आँखों के सामने स्वप्न तैरने लगे। उसके बच्चे बड़े हो गए हैं। वे खूब मेहतनी निकले हैं। वे बहुत होशियार हैं। हाँ, सही है कि उनके कपड़े फटे हुए हैं, लेकिन वे कांट और मार्क्स, सार्त्र और नेहरू के वचन अपने भाषणों में सहज रूप से गूँथ जाते हैं। वे किसी सुनहले लक्ष्य के लिए लड़ रहे हैं। उनके हृदय में उत्साह है। ज़माना बदल गया है, अब बड़ा परिवर्तन होने को है। मौज़ूदा पीढ़ी, अपनी बुढ़भस में, हास्यास्प्द प्रतीत हो रही है, इत्यादि-इत्यादि।

उधर बच्चों की माँ ने चाय बना ली थी। वह काली थी, दो च मच दूध ने चाय के रंग में विशेष परिवर्तन नहीं किया था। लेकिन उसका गरम-गरम घूँट हलक़ के नीचे उतरते ही उसे अच्छा लगा। जान में जान आई। तब उसने देखा कि रसोई-घर की जो खिड़की उसने खोल दी थी, वह फिर बन्द कर दी गई है। वह एकदम उठी और उसके पल्लों को ज़ोर से खोल डाला।

बादल हट चुके थे और उसकी विपरीत दिशा में–पश्चिम में–दौड़ते जा रहे थे। नवोदित सूर्य की गुलाबी, सुनहली, नांरगी किरणें एक केन्द्र से चारों ओर दौड़ रही थीं। तालाब के पानी में उनके प्रतिबिम्ब डूब गए थे। हरियाला मैदान लाल-सुनहला हो गया था। और दूर तिकोनी पहाड़ी एकदम नीली दिखाई दे रही थी।

वह उस दृश्य को देखती खड़ी रही। उस सौन्दर्याभ का जल उसके चेहरे पर छा गया। उसे अच्छा लगा। पास ही कमरे में, नल से उसने बालटियाँ लगा दीं।

फिर वह चूल्हे के पास आ बैठी। जिसके लाल अंगारों पर उसकी दृष्टि स्थिर हो गई। उसमें लाल चट्टानें दिखाई दीं, उनके भीतर से सुनहली ज्योति निकल रही थी। चट्टानों के पास महीन-गरम सफ़ेद राख की गलियाँ बन रही थीं। कहीं ज्वाला की हलकी लता हिलती हुई अपने किसी को बुला रही थी।

उसने दो छोटी-छोटी लकड़ियाँ और लगा दीं। चूल्हें में प्रकाश नाच उठा। एक गति, एक आवेग, सूर्य का वंशधर बनने लगा। अब उसे और अच्छा लगा। उसने रसोईघर के चारों ओर नज़र दौड़ाई। भीत पर लगी हुई लकड़ी की पट्टियों पर पीतल के बरतन चमचम चमक रहे थे। उनके पीले रंग में खिड़की में से आई हुई सूर्य की कान्ति ललाई घोल रही थी।

एकाएक उसकी नज़र अपनी चूड़ियों पर गई। वे नीली थीं। उनकी नीलिमा की गोल प्रकाश-रेखा उसकी कलाई को घेरे हुई थी। अकस्मात् किसी अवचेतन प्रेरणा से उसने हाथों की चूड़ियों से माथे को छू लिया, मानो कि वह किसी अदृश्य शक्ति के सामने नतमस्तक हो गई हों। और, तब न मालूम कौन-सा स्वप्न उसकी पलकों में उभर आया। उसके होंठों पर एक हलकी-सी मुसकान तैर गई।

चूल्हें में आग तेज़ हो गई। लाल और गेरुई, सिन्दूरी ओर सुनहली ज्वालाएँ ऊँची उठीं, नाचने और लहराने लगीं।

चूल्हा ख़ाली था। उसने उस पर कुछ भी नहीं रखा था।

वह लकड़ियों को आगे सरकाती जा रही थी। उनका प्रकाश बढ़ता जा रहा था। उनकी गरमी बढ़ती जा रही थी। उसका मन पीछे की ओर दौड़ता जा रहा था। कल क्या हुआ था? हाँ, कल क्या हुआ था! वह घटना, जिसने उसके दिमाग़ को धो दिया था; जिसने उसको पागल बना दिया था।

और लाख कोशिश करने पर भी उसे उस घटना की याद नहीं आई। सम्भवत: ऐसी कोई घटना हुई ही नहीं थी। शरीर के अस्वास्थ्यजनित विषों ने उसकी नस-नस में घुसकर उसे कमज़ोर और विक्षुब्ध कर दिया था। और उस विक्षोभ ने उसके मन में आत्मनाशक सपने और भाव तैरा दिए थे। यही वे घटनाएँ थीं, जो पकड़ में आती नहीं थीं, जो सिर्फ़ एक मानसिक वातावरण बनकर उसे खाए जा रही थीं।

किन्तु उस समय जब चूल्हे की अंगारी लाल घाटियों में सुनहली लताएँ और फूल खिल रहे थे, उसे अपने बचपन और जवानी के दृश्य दिखाई देने लगे, और उसे अफ़सोस होने लगा कि अगर वह पढ़-लिख जाती और नौकरी करने लगती तो उसकी इतनी दुर्दशा न होती, तो उसके घर में पिछवाड़े से चुपचाप वह औरत न आती जो पठान से भी अधिक सूद लेती है, तो उसको इतना अपमानित न होना पड़ता।

उसके सामने क्रमश: वे दृश्य तैरने लगे जब उसकी साथिनें पढ़-लिख गईं, जिनमें से एक प्राइमरी स्कूल की टीचर है, दूसरी किसी दफ़्तर में क्लर्क है, तीसरी नर्स हो गई है। यकायक उसके हृदय में अभाव का, हानि का, दुख भरता गया। हर तीसरे साल बच्चे, जन्म और मृत्यु, क़र्ज़ और अपमान, बढ़ती हुई ज़िम्मेदारियाँ और पेट में अन्न डालने की मुश्किलें, और काम, काम, काम!

आश्चर्य की बात है कि इन सारे ख़यालों में पति का ख़याल उसे नहीं आया। पति के विरुद्ध विक्षोभ उसके मन में नहीं था, सो भी बात नहीं। परन्तु यह सच है कि वह उससे बहुत ही अधिक प्रेम करती थी। वह यह क्षण मात्र भी नहीं सोच सकती थी कि उसके दुख उसके पति के कारण हैं, यद्यपि वह अपने दुखों का ठीकरा पति के सिर पर ही फोड़ती है। मनुष्य का मन विचित्र है। और आज जब कि वह पति पर ही अत्यन्त क्रुद्ध है, पति के विरुद्ध विचार उसके मन में आने चाहिए थे। सम्भवत: इसका एक कारण यह भी था कि वह पढ़ने-लिखने के प्रति अपनी उदासीनता को ही सर्वाधिक दोष देती थी।

यदि वह शिक्षित होती, तो शायद अधिक सुखी होती। वह यह समझती थी कि वह स्वयं कार्यकुशल है, न कि उसका पति। वह अपने भोले हृदय को भी भोला आनन्द प्रदान कर सकता था। लेकिन ज़िन्दगी की छोटी-छोटी बातों के लिए वह जद्दो-जहद करने की ताक़त और ताव नहीं रखता था। उसके अनुसार उसका पति सन्त था, सन्त। मूर्ख उसे न कह सकती थी, न सोच सकती थी।

और इसी तरह के ख़यालों में गिरफ़्तार वह स्त्री जब अपने बाल फैलाए हुए चुपचाप सोचती जा रही थी, कि उसके अनजाने में चूल्हे में की एक तड़ाक् से उठी हुई चिनगारी उसकी साड़ी के एक कोण में दुबककर बैठ गई।

ठीक उसी वक़्त उसका पति चुन्नीलाल एक मैले-कुचैले पंसारी की आलमारी में रखे हुए किसी कम्पनी की चाय के पीले पूड़े में बनी हुई औरत की तसवीर को देख रहा था। उस औरत का चेहरा नीला-साँवला था और हाथ में उसके एक फूलों-भरी डाली थी। लेकिन आँखें फटी-फटी-सी और काली थीं। उसे समझ में नहीं आया कि आख़िर औरत की तसवीर क्यों बना दी गई।

वह एक चिपचिपे स्टूल पर नीचे पड़ा हुआ पुराना अख़बारी काग़ज़ रखकर बैठ गया। चुपचाप अपनी झोली में से रद्दी काग़ज़ निकालने लगा।

उन काग़ज़ों में उसके बच्चों की लिखावट थी। टूटे-फूटे बाँके-तिरछे अक्षरों में गणित के आँकड़े, देश के विभिन्न राज्यों की राजधानियों के नाम, और संस्कृत की क्रियाओं के रूप लिखे हुए थे।

वह फिर भविष्य की तरफ़ देखने लगा। उसके बच्चे बड़े होंगे। कॉलेज एजुकेशन तो क्या ले सकेंगे। इतना पैसा ही नहीं कि उनके लिए किताबें ख़रीदे! लेकिन हाँ, मैं अपने सारे विचार, मेरी अपनी सारी कल्पनाएँ और धारणाएँ उन्हें बता दूँगा। उनका बिलकुल सिस्टमैटिकली अध्ययन करा दूँगा। मैं उन्हें बड़े आदमियों की बैठकों से दूर रखूँगा और इस तरह घुट्टी दूँगा कि वे उनके तौर-तरीक़ों से घृणा करें, कि अपने–जैसे ग़रीबों में ही रहें, उनकी जगत-चेतना को विस्तृत और यथार्थवादी बना दें, और उनमें मरे और जिएँ। मैं उन्हें क्रान्तिकारी बनाऊँगा। मैं उन्हें समाज की तलछट बनने के लिए प्रेरित करूँगा, वे वहाँ बैठे बैठे किताबें लिखेंगे, पैम्फ़लेट छापेंगे, और जो मिलेगा उसे सबके साथ खाकर उन सब भड़कीले दम्भों से घृणा करेंगे कि जो शिक्षा और संस्कृति के नाम पर चलते हैं...।

पंसारी को यह मालूम नहीं था। वह तो सिर्फ़ इतना जानता था कि इस तरह की रद्दी छह आने सेर से ज़्यादा नहीं बिकती। चुन्नीलाल ने जब अपने हाथ में पन्द्रह आने देखे तो वह बहुत खुश हो गया और पास ही के चायघर में दूध लेने के लिए पहुँच गया।

जब वह घर पहुँचा, तो पाया कि वहाँ कुहराम मचा हुआ है। बच्चे रो रहे हैं। बूढ़ी माँ रोती हुई काँप रही है, उसकी साँवली झुर्रियाँ गीली हैं। और बूढ़े बाप के चेहरे पर श्मशान की छाया है। वह बालटी-पर-बालटी डाल रहा है। नीचे चुन्नू की स्त्री औंधी पड़ी हुई है, पानी में तर है। सारा फ़र्श गीला है। उस पर मिट्टी के फफोले उभर आए हैं। बच्चों के रोने की आवाज़ें छत को फाड़कर खिड़की के बाहर निकल रही हैं। और इस सारे शोर में एक गहरा शून्य है, और उस शून्य में उसकी स्त्री है।

वह स्त्री चुप है। उसकी खीझ गायब है, उसकी चिढ़ गोल हो गई है। वह स्तब्ध है। उस घटना से उसके दिमाग़ को धक्का लगा था। आग ने उस पर चढ़ाई की, क्यों की, क्यों की?

और फिर आग बुझाई गई, बालटियाँ डालकर। पीठ पर का आँचल, और आँचल के नीचे का जम्पर जल गया था। इस वक़्त जले हुए हिस्से पर नीली सियाही लगाई जा रही है। बहुत-सी जगहों पर फफोले उठ गए हैं, कहीं चमड़ी खिंच आई है।

ख़ैरियत हुई, आग ज़्यादा फैल नहीं पाई। बाल-बच्चों के भाग्य अच्छे थे। स्त्री अब भी चुप थी, वह निश्चेष्ट थी। वह अभी भी फटी-फटी आँखों से न जाने क्या सोच रही थी। बूढ़े पिता और माता अपने-आपको दोषी अनुभव कर रहे थे। वे चुन्नू के दारिद्र को और भी भयावह कर देते थे। उनकी स्थिति दयनीय रहती थी। अब उनका मन भी दयनीय हो गया था।

लेकिन चुन्नू अपने-आपको दोषी समझते हुए आगे बढ़ा। उसने लज्जा छोड़ दी। निश्चेष्ट पड़ी हुई औरत का सिर हिलाया। उसे बिठा देने की कोशिश की।

वह उठ बैठी। अधिक सचेत हुई और पति को सामने पाकर आँखें कुछ संकोच से दूसरी ओर कर लीं, वहाँ सभी लोग खड़े थे, इसलिए। और अकस्मात, चुन्नीलाल को लगा कि अब वह अपने एकान्त की रक्षा नहीं कर सकेगा। उसे लड़ाई में कूद पड़ना होगा, उसे मुठभेड़ करनी ही होगी। उसे अपने सपने भूल जाने होंगे, परिस्थितियों को वश में करने के कार्य में उसे दक्ष और समर्थ होना पड़ेगा।

बर्नोल...वैद्य...डॉक्टर ये शब्द उसके मन में गूँज गए। पैसा–यह शब्द उसकी अन्तर्गुहा में चीख़ उठा। यह स्त्री-लिंगी ध्वनि उसके हृदय में दुन्दुभि बजाने लगी।

उसने अपनी स्त्री की पीठ पर के घाव देखे–वे छह थे। उनमें तीन कुछ बड़े थे, बाकी छोटे–पैसे के आकार के। और तब उसके मस्तिष्क ने तुरन्त सोच डाला कि उसके लिए बर्नोल काफ़ी है। वैद्य और डॉक्टर बुलाने की ज़रूरत नहीं है।

उसने बीवी को छोड़ दिया। पड़ोसी की साइकिल उठाई और तुरन्त ही बर्नोल के लिए निकल पड़ा।

तब तक वातावरण बदल गया था। स्त्री वैसी ही शान्त और चुप पड़ी थी। पर अब उसके फैले हुए पैरों पर नन्हा खेल रहा था, बड़ा बच्चा उसकी पीठ के दाग़ों पर नीली सियाही लगा रहा था। बूढ़ी माँ रसोईघर में घुस गई थी।

जब वह बर्नोल लेकर लौटा तो वह बीवी के पास जा बैठा, उसकी अपलक, न देखती हुई आँखों में उसने आँखें डाल दीं। उसके गाल छुए। और तब उसने पाया कि उसकी आँखों में चेतना मुसकरा उठी। उसके होंठ भी किसी नम्र, दीन दयनीय स्मित में तिरछे हो रहे हैं। चुन्नू के हृदय में एकाएक अपने स्वयं के ही भाग्य पर बड़ी ही दया उत्पन्न हुई। दया इसलिए कि उसके भाग्य में यह बदा था कि उसके आसपास के लोग किसी उपन्यास के केवल पात्र हों, जो लेखक के अत्यन्त निकट होते हैं, और फिर भी दूर, वे उसके अपने होते हुए भी केवल छायात्मक होते हैं।

किन्तु इस विचार के उत्पन्न होते ही, उस विचार के लगभग विपरीत, चुन्नी लाल ने अपनी स्त्री को बग़ल में खींच लिया।

और तब एक क्षण के बाद, उसकी स्त्री के गले से आवाज़ निकली। क्षीण, दुर्बल और प्रार्थना करती हुई आवाज़ थी वह। स्त्री ने कहा, ‘तुम मुझे छोड़कर मत जाया करो।’ वह आवाज़ बहुत ही क्षीण और करुणापूर्ण थी। किन्तु चुन्नीलाल को लगा कि वह आवाज़ किसी पार के परली तरफ़ के परे से आ रही है, इतनी दूर से कि वह उसी कारण तीखी़ हो उठी है और हृदय-विदारक भी।

चुन्नीलाल ने अपनी पत्नी को वहीं ज़मीन पर लिटा दिया। सिरहाने लकड़ी का पटा रख दिया और किसी उत्तेजित अवस्था में रसोईघर की खिड़की खोलकर वह बाहर देखने लगा।

वहाँ उसे शहर ही शहर और गाँव ही गाँव, सड़कें ही सड़कें, गलियाँ ही गलियाँ दिखाई दीं, जिनके भीतर से उठती हुई गूँज उसके पास आकर कहने लगी, ‘तुम मुझे छोड़कर मत जाया करो।’

माता रसोईघर में एक ओर दुबकी बैठी थी। वह स्तब्ध और निश्चेष्ट थी। चुन्नीलाल ने चूल्हे पर चाय का पानी चढ़ा दिया। चूल्हे में आग अभी भी दहक रही थी। चाय भरे प्याले जब वह एक-एक को देने लगा तो बच्चों के पीले उतरे चेहरों में से, बाप की बूढ़ी शिकनों में से, माँ की आँखों के सफ़ेद पड़ रहे कोयों में से, उसे साफ़ झलक उठा कि मानो वे भी कह रहे हों–तुम मुझे छोड़कर मत जाया करो।

और जब वह एक कप चाय लेकर बीवी को देने गया, तब पाया कि उसकी आँख लग गई है। चुन्नीलाल ने जगाने की कोशिश करनी चाही, पर वह एक दृश्य देखता ही रहा। नन्हा बालक अभी भी उसके फैले हुए पैरों के बीच में खेल रहा था। तीन साल का बच्चा अपनी जेब में से चाक के टुकड़े गिन रहा था। आठ साल का बड़ा लड़का घर की हालत और स्कूल–दफ़्तर का समय सोचकर थाली में अरहर की दाल बीन रहा था। उसके हाथ में अभी भी नीली सियाही लगी थी, मानो दावात से खिलवाड़ किया हो।

चुन्नी का दिल इस दृश्य को देख पिघल गया। वह उसे अत्यन्त सुन्दर प्रतीत हुआ। उसका मन बेहद के मैदान में चला गया। इन सब लोगों का प्यार वह अपने में नहीं सँभाल सकता। उसका दिल मिट्टी का घड़ा है, उसमें ज़्यादा भरोगे तो वह टूट जाएगा।

एकबारगी उसने अपने सारे घर पर दृष्टि डाली। यह उसका जगत् है, उसे सबकी सेवा करनी है। वह ज़रूर-ज़रूर करेगा। नहीं तो ज़िन्दगी का कोई मतलब नहीं।

उसने अपनी बीवी को जगाया नहीं। पिताजी को चाय का कप दे दिया। और फिर रसोईघर में आ गया। और ख़ुद गरम-गरम चाय पीने लगा।

ज्यों ही उसने एक घूँट अपने होंठों से लगाया कि एकाएक उसे ख़याल आया कि उसने बर्नोल का प्रयोग अभी तक नहीं किया, उसके घावों पर बर्नोल लगाना भूल गया।

उसने चाय-भरी बशी नीचे धर दी, और आसमान फाड़कर एक तसवीर उसके सामने आ गई। वह उसकी अपनी समस्या थी।

वह बर्नोल लगाना क्यों भूल गया?

वह अपने कामों से, दुनिया से रिश्ते जोड़े, न कि सिर्फ़ दिल के उड़ते हुए टुकड़ों से। कि इतने में बड़े बच्चे ने आकर सूचना दी, ‘माँ चाय माँगती हैं।’

चुन्नू को खुशी हुई। वह तुरन्त गरम चाय लेकर स्त्री के पास जा बैठा। बच्चों ने देखा कि उनके बूढ़े, झुकी-झुकी कमरवाले नाना के हाथ में बर्नोल है, और वे चुन्नीलाल के हाथ में उसे दे रहे हैं।

(सम्भावित रचनाकाल 1960 के आसपास। धर्मयुग, अप्रैल 1968 में प्रकाशित)