हिन्द स्वराज - (सुशोभित)

 

गाँधी ने अपनी पुस्तक ‘हिन्द स्वराज’ एक जहाज़ पर लिखी थी। वे लंदन से दक्षिण अफ्रीका लौट रहे थे। लंबी यात्रा थी और वे सोच में डूबे थे। दक्षिण अफ्रीका का सत्याग्रह अभी दो साल पुराना ही था, किंतु भारत में हो रही घटनाओं पर गाँधी की नज़रें बनी थीं। भारत में कांग्रेस के आंदोलन का स्वरूप कैसा हो, क्या सत्याग्रह का प्रयोग भारत जैसे व्यापक देश में भी सफल हो सकता है और भारत को किस तरह की आज़ादी अंग्रेज़ों से चाहिए, इन तीन प्रश्नों पर उनका ध्यान केंद्रित था। इसी पर उनकी स्वतंत्रता सेनानियों से बातें होती रहती थीं।

13 से 22 नवंबर 1909 को जहाज़ पर जब गाँधी ने गुजराती मूल में ‘हिन्द स्वराज’ लिखी तो इसके पीछे उनका अभिप्रेत उन वार्ताओं और उनके निष्कर्षों को एक क्रमवार स्वरूप देना ही था। यह पुस्तक प्रश्नोत्तर की अभिनव शैली में लिखी गई। गाँधी ने स्वयं से प्रश्न पूछे और स्वयं ही उत्तर दिए। प्रश्न पूछने वाले को उन्होंने वाचक और उत्तर देने वाले को अधिपति नाम दिया। हिन्दी में यह पाठक और संपादक और अंग्रेज़ी में रीडर और एडिटर की तरह अनूदित हुआ है। इतिहासकार एस.आर. मेहरोत्रा का मत है कि ‘हिन्द स्वराज’ में वाचक ने अधिपति से जो प्रश्न पूछे, वो मूलत: प्राणजीवन मेहता की जिज्ञासाएँ थीं, जिनका समाधान गाँधी ने किया था। ‘हिन्द स्वराज’ उन्हीं समाधानों को लिपिबद्ध करने के मक़सद से लिखी गई थी। गाँधी जानते थे कि ये प्रश्न और उनके उत्तर व्यापक और दीर्घकालिक महत्त्व के हैं, उन्हें केवल दो लोगों के बीच हुए संवाद तक सीमित नहीं रखा जा सकता।

हिन्द स्वराज कोई अस्सी पेज की पतली-सी किताब है, किंतु गाँधी-वांग्मय में उसका केंद्रीय महत्त्व है। इसे गाँधीवाद का घोषणा-पत्र कहा गया है। ग़ैरपरिष्कृत होने के बावजूद उसे गाँधी के चिंतन का सार माना जाता है। ग़ैरपरिष्कृत इसलिए क्योंकि गाँधी ने जब ‘हिन्द स्वराज’ लिखी, तब ना केवल दक्षिण अफ्रीका का सत्याग्रह ही अपनी प्रारंभिक अवस्था में था, बल्कि गाँधी का भारत-आगमन भी अभी छह वर्ष दूर था। किंतु ‘हिन्द स्वराज’ से स्पष्ट होता है कि गाँधी स्वयं को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका के लिए तैयार कर चुके थे। यह पुस्तक लिखे जाते समय उनकी अवस्था 40 वर्ष की थी और अभी उनका आधा जीवन शेष था। उनके जीवन की बहुतेरी महत्त्वपूर्ण घटनाएँ अभी घटित होना थीं। औपनिवेशिकता का उभार ही था। दोनों विश्वयुद्ध नहीं हुए थे। कांग्रेस संस्था अपने शैशवकाल में थी। भारत का स्वतंत्रता संग्राम भी असंगठित और दिशाहीन ही था, जिसका नेतृत्व आमजन से कटे हुए कुछ अंग्रेज़ीदाँ बुद्धिजीवी कर रहे थे। दूसरी तरफ़ अराजकतावादी थे, जो बम और पिस्तौल से हिंसा की छुटपुट घटनाओं को अंजाम दिया करते थे। इससे परिदृश्य में कोई बदलाव नहीं आता था। खुदीराम बोस भूलवश निर्दोष अंग्रेज़ महिलाओं की जान ले चुके थे। मदनलाल ढींगरा विलायत में पिस्तौल के धमाके कर चुके थे। गाँधी ना केवल इन्हें साधन-शुचिता के मानदंड पर खरा नहीं मानते थे, बल्कि उनका यह भी मत था कि इस तरह से ब्रिटिश साम्राज्य को परास्त नहीं किया जा सकता।

गाँधी ने ‘हिन्द स्वराज’ में कई विषयों पर बात रखी है। उनमें से कुछ तो आधुनिक सभ्यता के विरोध में इतने रैडिकल विचार थे कि गाँधी में अपना उत्तराधिकारी देखने वाले प्रो. गोपालकृष्ण गोखले भी इससे सहमत नहीं हो सके थे। गोखले ने कहा, गाँधी अपनी इस पुस्तक को एक वर्ष बाद ही नष्ट कर देंगे। किंतु ना केवल गाँधी ने एक वर्ष पश्चात स्वयं ‘हिन्द स्वराज’ का अंग्रेज़ी में अनुवाद किया, वर्ष 1921 में जब उसका हिन्दी संस्करण आया तो यंग इंडिया पत्र में उन्होंने लिखा कि इस पुस्तक में उनके द्वारा व्यक्त विचार आज भी जस के तस हैं। वर्ष 1938 में जब ‘द आर्यन पाथ’ ने अपना प्रतिष्ठित ‘हिन्द स्वराज’ विशेषांक निकाला, तो उसके लिए लिखे शुभकामना संदेश में भी गाँधी ने यही कहा कि वे कुछ शब्दों को छोड़कर ‘हिन्द स्वराज’ में व्यक्त विचारों में बदलाव नहीं करेंगे।

स्वराज को लेकर गाँधी का जो विचार था, वह उनके समकालीनों से बिलकुल भिन्न था। जहाँ शेष स्वाधीनता सेनानियों का लक्ष्य भारत को येनकेन प्रकारेण स्वतंत्रता दिलाना था, वहीं अंग्रेज़ों से आज़ादी मात्र कभी भी गाँधी का प्राथमिक लक्ष्य नहीं था। मैं गाँधी की तर्कणा का एक उदाहरण यहाँ ‘हिन्द स्वराज’ से प्रस्तुत करना चाहता हूँ, ताकि स्वराज को लेकर उनके जो विचार थे, वे सुस्पष्ट हो सकें। यहाँ पर अधिपति गाँधी हैं, और वाचक प्रश्नकर्ता हैं-

अधिपति : मान लीजिए कि जो हम माँगते हैं, उतना सब अंग्रेज़ हमें दे दें, तो फिर उन्हें यहाँ से निकाल देने की ज़रूरत आप समझते हैं?

वाचक : मैं तो उनसे एक ही चीज़ माँगूँगा कि मेहरबानी करके हमारे मुल्क से चले जाएँ।

अधिपति : अच्छा हम मान लें कि हमारी माँग के मुताबिक़ अंग्रेज़ चले गए, उसके बाद आप क्या करेंगे?

वाचक : इस सवाल का जवाब अभी से दिया नहीं जा सकता।

अधिपति : मैं आपसे पूछता हूँ कि हम अंग्रेज़ों को क्यों निकालना चाहते हैं?

वाचक : इसलिए कि उनके राज-कारोबार से देश कंगाल होता जा रहा है। वे हमें ग़ुलामी में रखते हैं और हमसे बेअदबी का बरताव करते हैं।

अधिपति : अगर वे धन बाहर न ले जाएँ, नम्र बन जाएँ और हमें बड़े ओहदे दें, तो उनके रहने से आपको कुछ हर्ज है?

वाचक : जो कभी होने वाला नहीं है, वह होगा ऐसा मानना मनुष्य की रीत ही नहीं है।

अधिपति : कैनेडा को जो राजसत्ता मिली है, बोअर लोगों को जो मिली है, वैसी ही हमें मिले तो?

वाचक : तब हम अपना ही झंडा रखेंगे। अपना जंगी बेड़ा, अपनी फ़ौज और अपनी जाहोजलाली। तब दुनिया में हिन्दुस्तान का बोलबाला होगा।

अधिपति : यह तो आपने अच्छी तस्वीर खींची। इसका अर्थ यह हुआ कि हमें अंग्रेज़ी राज्य तो चाहिए पर अंग्रेज़ शासक नहीं चाहिए। लेकिन हिन्दुस्तान अगर इंग्लिस्तान बन गया तो हिन्दुस्तान नहीं कहलाएगा। यह मेरी कल्पना का स्वराज नहीं है।”

[ हिन्द स्वराज, पृष्ठ 31-33 ]

पुस्तक के इस अंश पर पृथक से विवेचना करने की आवश्यकता नहीं, यह अपने मंतव्य में स्वयं प्रमाणभूत है।

गाँधी के स्वराज के बारे में सोचने पर मुझे बारंबार गीता का श्लोक याद आता है- स्वधर्मे निधनम् श्रेय: परधर्मो भयावह:। यह स्पष्ट है कि गाँधी की मूल चिंता यह नहीं थी कि अंग्रेज़ भारत में रहें या नहीं, उनकी मूल चिंता यह थी कि भारत का जो धर्म है, वह उसमें स्थिर रह पाएगा या नहीं। हर देश का एक राष्ट्रीय चरित्र होता है। भारत का भी एक राष्ट्रीय चरित्र है और गाँधी को इसकी बुनियादी समझ थी। वे मानते थे कि विद्वेष, रक्तपात, मशीनों के कारण निर्मित होने वाली विषमताएँ और आलस्य, रोगों से लाभान्वित होने वाला चिकित्सा-व्यापार, विवादों से लाभान्वित होने वाले क़ानूनदाँ, शहरीकरण, उपभोक्तावाद और लोभ और शोषण के सिद्धांत से संचालित होने वाली राज-व्यवस्था कभी भी स्वराज नहीं कहला सकती, फिर चाहे शासक भारतीय हों या फ़िरंगी।

गीता में जिसे स्वधर्म और परधर्म कहा गया है, भारत के संदर्भ में उसका विवेक जिसमें जाग्रत हो, वही गाँधी के ‘हिन्द स्वराज’ का निर्द्वंद्व होकर पाठ और पुनर्पाठ कर सकता है।