गाँधीवादी कल्पनाशीलता - (सुशोभित)

 

समाजशास्त्री शिव विश्वनाथन ने गाँधीजी पर बात करते हुए एक बहुत सुंदर शब्द का उपयोग किया था- गाँधियन इमेजिनेशन। या गाँधीवादी कल्पनाशीलता। इमेजिनेशन शिव विश्वनाथन का प्रिय शब्द है, फ़ोकलोर, एथॉस, नॉस्टेल्जिया की तरह। जैसे आशीष नंदी सेल्फ़, आइडेंटिटी, लॉस, एग्ज़ाइल, नार्सिसिज़्म जैसे प्रत्यय निरंतर दुहराते रहते हैं।

यह कल्पनाशीलता गाँधी-विमर्श का महत्त्वपूर्ण आयाम है! गाँधी-चिंतन के नवनीत को आत्मसात करना होता है। वह कोई आचार-संहिता नहीं है, जिसे आपने अपनाना है। वे सत्य के सजीव प्रयोग हैं। हर व्यक्ति का अपना सत्य होता है, उसके प्रयोग उसे स्वयं ही करने होते हैं। आत्मकथा की भूमिका में गाँधीजी ने कहा था- “मैंने ख़ूब आत्म-निरीक्षण किया है, एक-एक भाव की जाँच की है, उसका पृथक्करण किया है। किंतु उसमें से निकले हुए परिणाम सबके लिए अंतिम ही हैं, वे सच हैं अथवा वे ही सच हैं, ऐसा दावा मैं कभी करना नहीं चाहता।” किंतु हम आत्मपरीक्षण के लिए तत्पर नहीं हैं, हमें बने-बनाए सिद्धांत और पहचान चाहिए। कल्पनाशीलता की हमारी जीवन-संगति में क्षति होती है। उसमें भी गाँधीजी के यहाँ तो नैतिक कल्पना थी। यानी जो मेरे लिए ग्राह्य है, वह दूरगामी अर्थों में समाज के लिए त्याज्य या अनैतिक नहीं हो सकता। अगर होगा तो वह मेरे लिए ग्राह्य नहीं हो सकता।

आज भारत के सामने गाँधीजी के परिप्रेक्ष्य में जो संकट मुँह बाए खड़ा है, वह इसी कल्पनाशीलता का संकट है। गाँधीजी की जीवनियाँ बहुत लिखी गई हैं। उन पर विवेचना भी बहुत हुई। किंतु गाँधी-तत्व का सार ग्रहण करके और उसे आत्मसात करके, उससे नई नैतिक और सार्वजनिक युक्तियों का आविष्कार करना एक चुनौती है। स्वयं गाँधीजी ने उस चुनौती का सामना किया था और निरंतर मनोमंथन से अपने लिए वह वस्तु पाई थी, जिसे उन्होंने सत्याग्रह कहा। अहिंसा उसके मूल में थी। एक सुंदर जीवन अहिंसक ही होता है। राजसत्ता अपने स्वरूप में हिंसक होती है। राजा और प्रजा के बीच हमेशा द्वैत रहता है। इनके बीच में समरसता कैसे बने, प्रजा के हित का चिंतन ही सर्वोपरि राजधर्म कैसे निश्चित हो (गाँधीजी इसको सर्वोदय कहते थे), यह गाँधी-चिंतन के मूल में है। आपको अचरज होगा कि गाँधीजी ने राजनिष्ठा के साथ सत्याग्रह का निर्वाह किया था। ‘सत्य के प्रयोग’ में एक पूरा अध्याय राजनिष्ठा पर है। तब राजा अगर सत्याग्रह को राजद्रोह की तरह देखता है, तो यह उसकी दृष्टि की भूल है। गाँधीवादी कल्पनाशीलता का पुंज वैसे ही परस्परों, सामरस्यों, सामंजस्यों से निर्मित हुआ है।

जब मैं बिड़ला हाउस गया तो यह देखकर चकित रह गया कि वहाँ न के बराबर भारतीय थे, किंतु विदेशियों का तो वहाँ ताँता लगा था। फिर मैं राष्ट्रीय गाँधी संग्रहालय गया तो देखा, जर्मन टूरिस्टों की एक बस वहाँ अभी-अभी आकर रुकी है। मेरे पास एक पुस्तक है- ‘जर्मनों की दृष्टि में गाँधी’। काश कि हम जान सकते, यूरोप और अमेरिका में गाँधीजी को आज कैसी आश्चर्यदृष्टि से देखा जाता है। दूरी एक परिप्रेक्ष्य देती है। निकटता दृष्टि को बाधित करती है। भारत के साथ यही दुर्भाग्य घटित हुआ है कि यहाँ गाँधी-छवि यत्र-तत्र-सर्वत्र व्याप्त है। इससे यह भ्रम निर्मित होता है कि हम गाँधीजी को जानते हैं। तिस पर, गाँधीजी के प्रति राजनीतिक पूर्वग्रहों का एक घोर कुहासा भी लोकमानस पर छा गया है। इससे वह गाँधियन इमेजिनेशन धूमिल हो जाती है, जो ग़ैरभारतीयों को अपनी ओर आकृष्ट करती है। वे गाँधी को व्यक्ति नहीं विचार की तरह देखते हैं। उन्हें लगता है कि दुनियाभर के सिविल सोसायटी आंदोलनों की वैध रूपरेखा गाँधीजी ने अपने सत्याग्रह आंदोलनों के माध्यम से बीसवीं सदी के आरंभ में ही रच दी थी। राजा और प्रजा के अनिवार्य-द्वैत में सत्याग्रह से अधिक स्वीकार्य कोई दूसरा मार्ग किसी को आज तक नहीं सूझा है।

शिव विश्वनाथन ने इस गाँधीवादी कल्पनाशीलता पर बड़ी सुंदर बात कही। उन्होंने कहा, गाँधीजी की मृत्यु के बाद एक दशक बीतते ना बीतते उनके सभी मेधावी शिष्य इतिहास में कहीं गुम हो गए, जबकि प्रतिकार की पश्चिमी ज्ञान-परंपरा में गाँधी-तत्व ने अपनी जड़ें अधिक उर्वरता से जमाई हैं। इस पर आगे बढ़कर मैं कहूँगा, जैसे बौद्ध धर्म भारत में जन्मा किंतु दक्षिण-पूर्व एशिया में व्यापा, वैसे ही गाँधीजी भारत में जन्म कर दुनिया में व्यापे हैं। जापान में बौद्ध धर्म ने ज़ेन का रूप ले लिया। इसे हम बौद्ध कल्पनाशीलता का परिविस्तार कहेंगे। तथागत बुद्ध को उन्होंने एक सारतत्व की तरह ग्रहण किया और ज़ेन की भावभूमि रच दी। वैसे ही गाँधीवादी कल्पनाशीलता ने पश्चिम में अनेक नायक रचे हैं, जिनके बारे में हम जानते भी नहीं।

क्या आपको मालूम है कि दनीलो दोल्ची को इटली का गाँधी कहा जाता था? वे ऐसे ही अहिंसक सत्याग्रह करते थे, जैसे गाँधीजी भारत में करते थे। वे उपवास आदि भी करते थे। वे गाँधीजी से प्रेरित थे। जर्मनी में पेत्रा केली, दक्षिण अफ्रीका में स्टीव बीको और अमेरिका में मार्टिन लूथर किंग ने गाँधीवादी कल्पनाशीलता को भिन्न-भिन्न रूपों में ग्रहण किया था। ई.एफ़. शुमाकर ने एक चर्चित किताब लिखी थी- ‘स्मॉल इज़ ब्यूटीफ़ुल’। यह अपने स्वरूप में गाँधियन थी। जेने शार्प, एरिक एरिकसन, मार्टिन ग्रीन, इवान इल्यीच, क्लॉद अल्वारेस : इन सभी ने अपने-अपने स्तर पर गाँधीवादी कल्पनाशीलता का सम्यक परिष्कार किया है।

भारत को भी गाँधीजी को पुनराविष्कृत करना होगा। गाँधीजी को एक प्रतिमा, एक देवता, एक विग्रह से बढ़कर उनके सारभूत रूप में स्वीकार करना होगा। भारत के सामने दोहरी दुविधा है। एक तो गाँधीजी को लेकर राजनीतिक वैमनस्य, जो जनमानस में विषबेल की तरह गहराई तक पैठ गया है, ने उनके बारे में हमारे विवेक को भोथरा किया है। दूसरे, गाँधीजी पर लिखी गई इतिवृत्तात्मक पुस्तकें, जिन्होंने भले गाँधीजी पर गहरी गवेषणा करके तथ्य प्रस्तुत किए हों, किंतु गाँधीवादी कल्पनाशीलता को उन्होंने और अमूर्त ही बनाया है। मैं तो भारत के हर विवेकी प्राणी से यही अनुरोध करूँगा कि वह अपने स्तर पर गाँधीजी से साक्षात करे और उनका पुनराविष्कार करे। ‘सत्य के प्रयोग’ और ‘हिन्द स्वराज’ का सजग-पाठ किए बिना यह संभव नहीं। 1908 में लिखी ‘हिन्द स्वराज’ में गाँधीजी ने जो विचार व्यक्त किए, वे आज अपनी अभिधाओं में आपके काम आएँ न आएँ, अपनी व्यंजनाओं में वे गहरे अर्थों में मानवीय हैं। उसे ही ग्रहण करना आवश्यक है। ‘सत्य के प्रयोग’ में जिन कसौटियों पर गाँधीजी ने स्वयं को तपाया, वे ही कसौटियाँ हम सबके भी समक्ष हैं। हम सबके अपने-अपने पाप और पछतावे हैं, सजग-विवेक से उनका मूल्यांकन करना हमें एक परिमार्जित मनुष्य बनाता है।

गाँधीवादी कल्पनाशीलता का एक अर्थ असंभव आदर्शों और स्वप्नों का पुनरावलोकन भी है। ये असंभव आदर्श हैं- सच्चाई, ईमानदारी, नैतिकता और अहिंसा। कोई लाख कहता रहे कि ये भलाई का ज़माना नहीं, भलाई के बिना कोई और चारा भी नहीं, यह गाँधीजी ने ‘हिन्द स्वराज’ में कह दिया था। दुनिया भलाई के बिना चल नहीं सकती। और तमाम फ़रेब और सिनिसिज़्म के बावजूद आख़िरकार हमें मनुष्य पर भरोसा रखना ही होगा, सरकारों को तो ख़ासतौर पर, गाँधीवादी कल्पनाशीलता का एक अर्थपूर्ण आयाम यह भी है!