गाँधी की सुंदरता - (सुशोभित)

 


रिचर्ड एटेनबरो की फ़िल्म ‘गाँधी’ का रिव्यू लिखते हुए विष्णु खरे ने कहा था- “गाँधीजी कभी भी सौंदर्य और पौरुष की प्रतिमा नहीं थे, अलबत्ता यह इस पर निर्भर करता है कि सौंदर्य और पौरुष के आपके मानदंड क्या हैं!”

वहीं अन्यथा गाँधीजी के कटु आलोचक रजनीश ने एक सहानुभूतिपूर्ण क्षण में कहा था कि जैसे-जैसे गाँधीजी बूढ़े होते गए, उनका व्यक्तित्व आकर्षक होता गया। अपनी युवावस्था में वे बहुत साधारण थे। किंतु जीवन के अंतिम दौर में वे बहुत सुंदर हो गए थे। फिर इसके बाद रजनीश ने जोड़ा, जब आप बुढ़ापे में युवावस्था से भी अधिक सुंदर हो जाते हैं तो माना जा सकता है कि आपने एक समृद्ध जीवन जिया है।

सौंदर्य के हमारे मानदंड क्या हैं, इस पर सच में ही बहुत कुछ निर्भर करता है। पुरुष-सौंदर्य के भी बहुतेरे मानक हैं। केश कुंतल हों, मोर मुकुट हो, सुरुचिपूर्ण अंगवस्त्र हो, हाथ में धनुष हो या सुदर्शन चक्र, संन्यासी के गैरिक वस्त्र हों या इनमें से कुछ नहीं, केवल एक धोती हो, अलंकार के नाम पर केवल एक चश्मा हो- यह आपके पैमानों से तय होता है कि आपके लिए सुंदर क्या है।

मैं जब गाँधीजी का चित्र देखता हूँ तो सौंदर्य की इस मूरत पर मंत्रमुग्ध हो जाता हूँ। जीवन भर के तप, धैर्य, परिश्रम, संकल्प और संघर्ष के ताप में कुंदन की तरह निखरी काया। छरहरा किंतु गठा हुआ शरीर। मुंडा सिर, आँख पर गोल फ़्रेम का चश्मा, पकी मूँछों में चाँदी के तार, हाथों में सितार के जैसे चरखे की डोर, उघड़ा बदन, उन्नत कंधे, चौड़ा सीना, सुघड़ घुटने, और विश्रांति से भरे पाँव, जिन्होंने असंख्य मील लंबी यात्राएँ की थीं। और, व्यक्तित्व में ठहराव, गंभीरता, आश्वस्ति, संतुलन, और एक अनन्य गरिमा। इस मनोहारी रूपछवि ने तीस और चालीस के दशक में स्वाधीनता आंदोलन की गहमागहमियों के परे गाँधीजी को दुनिया के कौतूहल का केंद्र बना दिया था।

1931 में जब गाँधीजी लंदन गए तो उनकी एक झलक देखने भीड़ उमड़ पड़ी। फ़ि‍रंगियों में कौतूहल था कि उनके अपराजेय साम्राज्य को चुनौती देने वाला, उसे झुकने को विवश कर देने वाला भारत का यह अहिंसक जननायक कैसा दिखता होगा। जिस दिन गाँधीजी लंदन पहुँचे, उस दिन वर्षा हो रही थी और यूरोप की हाड़ कँपा देने वाली सर्दी में वहाँ के जन मफ़लर-ओवरकोट में भी काँप रहे थे। तभी वह गौरवशाली भारत-मूर्ति लंदन के क्षितिज पर अवतरित हुई। पैरों में चप्पल, बदन पर लंगोट और शॉल, और उघड़े घुटने। भारत योगियों के देश में रूप में सदैव ही पश्चिम के लिए कौतूहल का विषय रहा है। उस दिन ब्रितानियों ने भारत देश के कर्मयोगी के दर्शन किए और सिर नवाया।

मीराबेन गाँधीजी के साथ थीं। जब वो इंग्लैंड से भारत को चली थीं तो मेडलिन स्लेड कहलाती थीं। जब गाँधीजी की शिष्या के रूप में लंदन आईं तो तपस्विनी बन चुकी थीं- जैसे बुद्ध की आम्रपाली, जैसे जीसस की मेरी मेग्दलीन। सभ्यता के सेतु को लाँघकर दूसरी ओर चली गई उनकी अपनी मेडलिन को तब ब्रिटिश देखते ही रह गए।

किंतु गाँधीजी के रूप-सौष्ठव पर सबसे ज़्यादा लट्टू होने वाली स्त्री का नाम था- मार्गरेट बूर्के व्हाइट। वह वर्ष 1946 में ‘लाइफ़’ मैग्ज़ीन की फ़ोटो-जर्नलिस्ट की हैसियत से भारत पहुँची। उसे गाँधीजी के चरखे के प्रति बड़ा कौतूहल था। वो चरखा चलाते गाँधीजी का छायांकन करना चाहती थी। आश्रमवासियों ने उसके सामने शर्तें रखीं कि उसे स्वयं चरखा चलाना होगा, आश्रम के नियमों का पालन करना होगा, बापू का मौनव्रत हो तो एक शब्द नहीं बोलना होगा और कैमरे के साथ फ़्लैश का इस्तेमाल नहीं करना होगा। मार्गरेट ने हर शर्त मान ली। गाँधीजी के आगे-पीछे घूमते हुए उसने उनकी सैकड़ों तस्वीरें उतारीं। जब भी वो गाँधीजी को किसी उम्दा फ़्रेम में देखती तो मन-ही-मन एक कंपोज़िशन बाँधकर कहती- ठहरिए, एक तस्वीर लेना है। तब गाँधीजी मुस्कराकर कहते- तुम तो भली टॉर्चरर हो, मार्गरेट!

गाँधीजी की सबसे सुंदर तस्वीरें मार्गरेट के ही खाते में आई हैं। जैसे उसकी आँख में बसा अनुराग उसकी छायाकृतियों में उतर आया हो। ध्यान मुद्रा में बुद्ध, सलीब पर जीसस और चरखा चलाते गाँधीजी- ये मनुष्यता के इतिहास की अमर छवियाँ बन गई हैं।

मार्गरेट अपना असाइनमेंट पूरा करके इंग्लैंड लौट गई, किंतु उसका मन गाँधीजी में अटका रहा। 1948 में वो फिर लौटकर भारत आई। 30 जनवरी 1948 को जब गाँधीजी की हत्या की गई, तब संयोग से वह भारत में ही थी। उसने उसी दिन गाँधीजी का इंटरव्यू भी लिया था। यह भी संयोग है कि दुनिया के सर्वश्रेष्ठ फ़ोटो-जर्नलिस्ट कहलाने वाले ऑनरी कार्तिएर ब्रेसाँ भी उस दिन दिल्ली में ही थे। जैसे ही ख़बर फैली कि गाँधीजी को गोली मार दी गई है, ये दोनों बिड़ला हाउस की तरफ़ दौड़े। अफरातफरी का माहौल था और ये दोनों जानते थे कि उनके पास उम्दा कंपोज़िशंस रचने का समय नहीं है। तब उन्होंने अवाक्, स्तब्ध और शोकसंतप्त भारतीयों के बीसियों चित्र उतारे। बदहवास नेहरू जी की छवियाँ कैमरे में क़ैद कर लीं। और जब गाँधीजी की देह को अंतिम दर्शन के लिए बिड़ला हाउस की प्राचीर पर प्रदर्शित किया गया तो उस नश्वर देह के अनेक छायाचित्र उतारे।

गाँधी फ़्यूनरल फ़ोटो एलबम ने ऑनरी कार्तिएर ब्रेसाँ को यूरोप का सितारा फ़ोटोग्राफ़र बना दिया था। जब गाँधीजी की शवयात्रा निकली तो रेडियो पर एक कमेंटेटर ने कहा- लाखों की इस भीड़ में केवल एक ही चेहरा शांत और तन्मय है- स्वयं गाँधीजी का।

मुझे नहीं मालूम मार्गरेट बूर्के व्हाइट ने उस दिन क्या सोचा होगा। किंतु गाँधीजी के रूप-सौष्ठव पर आसक्त वह भूरे बालों वाली युवती निश्चय ही उन्हें यों अचल देखकर संतुष्ट नहीं हुई होगी। वो तो यही चाहती होगी कि यह कर्मठ रक्तपिंड उठे और चरखा चलाने लगे, ताकि वो खिलखिलाते हुए उसकी बारहा तस्वीरें उतार सके। लेकिन गाँधीजी उस दिन उसकी फ़ोटो फ़्रेम्स के बाहर चले गए थे। वो अब उनको टॉर्चर नहीं कर सकती थी।

यों भी, एक निरंतर सुंदर होता गया जीवन अपने उत्कर्ष के क्षण में इससे अधिक और क्या कर सकता था कि आँखें मूँदकर मौन हो जाए?