गांधी की सुंदरता (सुशोभित) ऑनलाइन पढें | Gandhi ki Sundarta PDF



पहला पन्ना


इतिहासकार बलराम नंदा ने ‘इन सर्च ऑफ़ गाँधी’ में लिखा है-
“30 जनवरी, 1948 की शाम मैं फ़िरोज़पुर में था- भारत और पाकिस्तान के बीच हाल ही में खींची गई सीमारेखा के नज़दीक एक वीरान-सा क़स्बा। क़स्बे में किताबों की एक ही दुकान थी, जिसका नाम था इंग्लिश बुक डिपो। मैं किताबें टटोलने के लिए डिपो में घुसा कि तभी दुकान मालिक नारायण दास, जो कि एक बहुत ही भले बुज़ुर्गवार थे, मेरे पास आए और बोले- ‘अभी-अभी रेडियो पर ख़बर आई कि बापू को गोली मार दी गई है!’
मैं फ़ौरन बाहर निकल आया और घर की ओर पैदल चलने लगा। वह सर्दियों की तिमिर-संध्या थी और सड़क पर एक आदमी नज़र नहीं आ रहा था। मैंने पाया कि मेरा गला रूँध गया है, जैसे कि मैं दुनिया में अकेला रह गया हूँ। मैं फूट पड़ा। उस शाम मुझे कोई सांत्वना नहीं दे सकता था।
जब मैं लाहौर में पढ़ रहा था, तब मैं कभी भी गाँधीजी का वैसा मुरीद नहीं था कि उनकी आलोचना न कर सकूँ। मैं भारत के इतिहास पर गहन अध्ययन कर रहा था और एक इतिहासकार होने के नाते अपने वस्तुनिष्ठ पर्यवेक्षण पर गर्व करता था। किंतु गाँधीजी की मृत्यु पर मेरे भीतर से जो भावनाएँ घुमड़कर आईं, उन्होंने मुझे चकित कर दिया।
तब मैंने ख़ुद से पूछा कि गाँधीजी कब मेरे भीतर यों प्रविष्ट हो गए थे कि मुझे पता ही नहीं चला था? मैंने निश्चय किया कि मैं इसका पता लगाकर रहूँगा।”
---
जो बलराम ने कहा, वो मैं भी बहुधा स्वयं से कहता हूँ-

 “गाँधीजी कब मेरे भीतर यों प्रविष्ट हो गए? मैं इसका पता लगाकर रहूँगा!”

यह पुस्तक इसी प्रश्न का उत्तर तलाशने की एक कोशिश है!


Tags: Read Online Gandhi ki Sundarta by Sushobhit, Download Free Gandhi ki Sundarta pdf by Sushobhit, सुशोभित की गाँधी की सुंदरता किताब ऑनलाइन पढ़ें, सुशोभित की गाँधी की सुंदरता किताब पीडीएफ में फ्री में डाउनलोड करें