गाँधी का विलाप - (सुशोभित)

 

कस्तूरबा की पार्थिव देह के निकट शोकसंतप्त गाँधीजी का चित्र बहुत विकल करता है।

यह 22 फ़रवरी, 1944 है। पुणे का आग़ा ख़ाँ पैलेस, जहाँ गाँधीजी, कस्तूरबा और महादेव भाई देसाई नज़रबंद किए गए थे। नेहरू जी अहमदनगर क़िले में थे! कुछ माह पूर्व ही महादेव भाई की मृत्यु हुई थी। फिर कस्तूरबा चली गईं! गाँधीजी के दोनों हाथ टूट गए। 1947-48 आते-आते जिस अकेलेपन, त्याग दिए जाने की भावना, उपेक्षा, आत्मकरुणा ने गाँधीजी को ग्रस लिया था, उसका आरंभ इसी आग़ा ख़ाँ पैलेस से होता है। गाँधीजी इन दोनों की मृत्यु से कभी उबर नहीं सके।

शाम 7 बजकर 35 मिनट पर कस्तूरबा ने आख़िरी साँस ली। उनकी देह को धरती पर रखा गया। गाँधीजी उनके सिरहाने बैठे। लकड़ी के एक तख़्ते से अपनी पीठ टिका ली। ख़ुद को शॉल से लपेट लिया। वो सर्दियों के दिन थे और दिल के लगातार दो दौरों से पहले कस्तूरबा को न्यूमोनिया ने जकड़ लिया था। उनके पार्थिव शरीर को फूलमालाओं से सजाया गया, मंचक के समीप गोबर के कंडे जलाए गए। लोग आते, उनके पाँव छूकर आगे बढ़ जाते। गाँधीजी चुपचाप बैठे अपनी सहचरी को निर्निमेष देखते रहे।

पूरे 62 साल पहले पोरबंदर में जब 13 वर्ष की अवस्था में मोहनदास करमचंद गाँधी और कस्तूर कपाड़िया का विवाह हुआ था, तब वह भारतवर्ष में होने वाले असंख्य विवाहों के जैसा ही एक सामान्य प्रसंग था। कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि नियति ने स्वयं का उस संबंध में इतना सुदीर्घ अभिनिवेश कर रखा था।

आरंभिक प्रतिकूलताओं के बाद गाँधी और कस्तूरबा एक-दूसरे के साथ सहज होते गए थे। वर्ष 1906 में दाम्पत्य जीवन के 24 वर्ष उपरांत और पाँच संतानों के जन्म के बाद गाँधीजी ने ब्रह्मचर्य का व्रत ले लिया। उनका कहना था कि जैसे ही वे सार्वजनिक जीवन में आए, लोकहित में स्वयं को खपाया और संबंध से यौनेच्छा का लोप हुआ, कस्तूरबा का समर्पित सेवाभाव एक दूसरे ही स्तर पर चला गया। वे एक-दूसरे के गहरे मित्र बन गए।

कस्तूरबा की पहली पुण्यतिथि से चार दिन पहले 18 फ़रवरी,1945 को गाँधीजी ने लिखा-

“जैसे-जैसे मेरा सार्वजनिक जीवन उज्ज्वल बनता गया, बा खिलती गईं और पुख़्ता विचारों के साथ मुझमें और मेरे काम में समाती चली गईं। जैसे-जैसे दिन बीतते गए, मुझमें और मेरे काम में भेद न रह गया। बा उसमें तदाकार हो गईं। शायद हिन्दुस्तान की भूमि को यह गुण अधिक-से-अधिक प्रिय है। हमारा संबंध सच्चे मित्र का बना और अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति के कारण वे अनजाने ही अहिंसक असहयोग की कला के आचरण में मेरी गुरु बन गईं।”

कस्तूरबा की पार्थिव देह के सिरहाने जब मैं गाँधीजी का वह चित्र देखता हूँ तो उनकी भंगिमा में एक गहरी वेदना पाता हूँ। क्या वे रोए होंगे, जब कैमरे की आँख उनसे हटी होगी और जब उनको एकांत मिला होगा? क्या गाँधीजी कभी रोते भी थे? कल्पना करना कठिन है। इसलिए नहीं कि गाँधीजी के पास मनुष्य का हृदय नहीं था या वे निरे ठूँठ थे। बल्कि इसलिए गाँधीजी का संपूर्ण जीवन ही आत्मसंयम, निस्संगता, राग-द्वेष के प्रति तटस्थता और ममत्व-भाव के त्याग की तपस्या था। वे निर्मोही थे। जहाँ-जहाँ गाँधीजी रहे, वहाँ उन्होंने आश्रम बनाया और अख़बार निकाला। फिर एक दिन उसे छोड़कर बढ़ चले और पीछे लौटकर नहीं देखा। धीरे-धीरे सारे आलंबन उन्होंने छोड़ दिए और जो उनसे छूट गए, उनको उन्होंने जाने से रोका नहीं।

इसकी परणति तब हुई, जब उन्होंने स्वयं को मृत्यु को समर्पित कर दिया। जब देश सांप्रदायिक दंगों की आग में जल रहा था, तब वे पैदल, निहत्थे, धोती-चादर लपेटे नोआखाली में गाँव-गाँव भटककर लोगों से शांति का अनुरोध कर रहे थे। नोआखाली जाने से पूर्व एक पत्र में उन्होंने ‘सुंदर-मरण की कला’ की बात कही। उन्होंने कहा- “हम बहुत अभ्यास से ही यह सीख पाते हैं कि अच्छे से कैसे मरें।” तब उनके भीतर से गोरखनाथ बोल रहे होंगे- ‘मरो हे जोगी मरो।’ जो सहज वृत्ति मनुष्य को मृत्यु के समक्ष जिजीविषा की एक ढाल रखने को प्रवृत्त करती है, उसको गाँधीजी ने अंतिम समय में त्याग दिया था।

तो क्या गाँधीजी कभी रोते थे? क्या कस्तूरबा की मृत्यु पर वे रोए होंगे?

मैं इस प्रश्न का उत्तर तलाशने के लिए यहाँ-वहाँ भटकता रहा। उस काल का ‘हरिजन सेवक’ देखा, ‘बापू के संस्मरण’ टटोले, अख़बारों की रिपोर्टें देखीं- भारत, इंग्लैंड से लेकर दक्षिण अफ्रीका तक। ‘पिट्सबर्ग पोस्ट-गैज़ेट’ की सिंगल कॉलम ख़बर- ‘डेथ टेक्स गाँधीज़ वाइफ़’- देखी और आगे बढ़ गया। न्यूयॉर्क टाइम्स में डबल कॉलम न्यूज़ आइटम पाया- ‘मिसेज़ गाँधी डेड, वाइफ़ ऑफ़ महात्मा।’ और तब, मेरी नज़र पड़ी उस एक पुरानी कतरन पर। ‘टिमथी ह्यूज रेयर न्यूज़पेपर्स’ वेबसाइट पर डेटलाइन बॉम्बे, 23-2-1944, के साथ मौजूद वह सिंगल कॉलम न्यूज़ कह रही थी-

‘गाँधी शेड्स टीयर्स एट वाइफ़्स क्रिमेशन।’

(पत्नी के दाहसंस्कार पर गाँधी की आँखें नम हुईं।)

भीतर ब्योरा था-

‘पत्नी के दाहसंस्कार पर भारत के वयोवृद्ध राष्ट्रवादी नेता मोहनदास करमचंद गाँधी अपने आँसुओं को रोक नहीं सके। वे हाथ में छतरी लिए खड़े थे और चिता को एकटक देख रहे थे। फिर वे इमली के एक पेड़ के नीचे जा बैठे और देर तक चिता को निहारते रहे, जबकि आग की लपटें उनकी पत्नी की पार्थिव देह को निगलती जा रही थीं!’

तो गाँधीजी भी रोते थे। वे चाहे जितने बड़े तपस्वी हों, कस्तूरबा के विछोह पर स्वयं को सँभाल नहीं सके थे। गाँधी का दुर्निवार नाम आज जब चहुँओर आरोप-प्रत्यारोप, घृणा-प्रलाप, असत्यवाचन-दुर्भावना के बीच गूँजता रहता है, तब वह एक बिंब उनके भीतर एक मानुष की प्रतिष्ठा करता है कि गाँधी भी रोते थे।

अपनी तमाम विशिष्टताओं के बावजूद गाँधीजी की सबसे बड़ी विशेषता यही थी कि वे कभी भी एक निरे मनुष्य से अधिक नहीं थे, और इसके साथ ही, वे कभी भी एक निरे मनुष्य से कम नहीं थे।

बा की मृत्यु के पाँच दिन बाद 27 फ़रवरी,1944 को उन्होंने कहा-

“बासठ वर्ष के बाद उनका साथ छूटना चुभता है। कितनी ही कोशिश करूँ, मैं उनकी स्मृति को मन से निकाल नहीं पाता।”

और फिर, एक साल बाद, बा की पहली पुण्यतिथि से पहले-

“आज उनकी कमी को जितना मैंने माना था, उससे कहीं अधिक मैं महसूस कर रहा हूँ। हम असाधारण दंपती थे। हमारा जीवन सुखी, संतोषी और नित्य ऊर्ध्वगामी था।"